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आतंकवाद को लेकर सऊदी अरब में मक्का से लेकर अलकासिम तक सौ मौलवी इमाम किया बर्खास्त

आरबीएल निगम

भारत इतने वर्षों से आतंकवाद की मार झेल रहा है, लेकिन पिछली सरकारें इस्लामिक आतंकवाद को संरक्षण देने “हिन्दू आतंकवाद” और “भगवा आतंकवाद” के नाम से हिन्दू धर्म को कलंकित करने में व्यस्त रहीं। परन्तु 2014 में सत्ता परिवर्तन होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर विश्व स्तर पर पुरजोर तरीके से उठाने के कारण विश्व इस गंभीर मुद्दे पर एकजुट होना शुरू ही नहीं हुआ, बल्कि आतंकवाद के विरुद्ध पाकिस्तान और अन्य आतंकवाद समर्थक देशों के विरुद्ध खड़े होने शुरू हो गए। 

परन्तु भारत में अभी भी कुर्सी के भूखे और तुष्टिकरण पुजारी आतंकवाद के विरुद्ध कार्यवाही करने पर चीख-पुकार करने लगते हैं। अब इन सभी को सऊदी अरब से शिक्षा लेनी चाहिए, जिसने आतंकवाद के विरुद्ध न बोलने वाले इमाम और मौलवियों को बर्खास्त कर दिया। आज विश्व मोदी के पद-चिन्हों पर चल रहा है, लेकिन भारत में मोदी विरोधी आतंकवाद के विरुद्ध कार्यवाही को मुस्लिम विरोधी करार देकर मुस्लिमों को भड़काने में व्यस्त हैं। अब इनसे पूछा जाए कि “क्या सऊदी अरब भी मुस्लिम विरोधी है?”
सऊदी अरब की सरकार ने 100 इमामों और मौलवियों को बरख़ास्त कर दिया है। इन सभी ने कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की आलोचना करने या उसकी हरकतों की निंदा करने से इनकार कर दिया था। इनमें से अधिकार ऐसे मौलवी हैं, जो मक्का और अल-कासिम में उपदेश दिया करते थे। इस्लामी मामलों के मंत्रालय ने इन मौलवियों को निर्देश जारी किया था कि ये समाज को बाँटने वाले ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की आलोचना करें।

लेकिन, इन सभी ने कट्टरपंथी संगठन की हरकतों की निंदा करने से इनकार कर दिया। इससे पहले ‘सऊदी काउंसिल ऑफ सीनियर स्कॉलर्स’ ने निर्देश दिया था कि शुक्रवार को जुमे के दिन होने वाली नमाज के दौरान ये सभी मौलवी मुस्लिमों को ये बताएँ कि ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ एक आतंकी संगठन है जो इस्लाम की सच्ची शिक्षाओं को जनता तक पहुँचाने की बजाए अपने हितों के लिए उसके साथ छेड़छाड़ करता है। मौलवियों को लोगों को बताना था कि ये संगठन इस्लाम की शिक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता।

2014 में ही सऊदी अरब ने ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ को आतंकी संगठन घोषित करते हुए मुल्क में इसे प्रतिबंधित कर दिया था। 1950 के दशक में सऊदी अरब ने संगठन के हजारों कार्यकर्ताओं को शरण दी थी, जिन्हें मिस्र और सीरिया सहित कई इलाकों में प्रताड़ित किया जा रहा था। जल्द ही उन्होंने सऊदी में प्रभाव कायम करना शुरू कर दिया। 1990 में इराक का कुवैत पर हमला और अमेरिका का इराक पर हमले में सऊदी अरब के शामिल होने से संगठन के साथ उसके रिश्ते खराब हो गए।

इस समूह ने मुल्क में अमेरिकी सेना की मौजूदगी की निंदा करते हुए सुधारों की वकालत की। इसके बाद इस संगठन को मुल्क में ‘बुराइयों की जड़’ बताते हुए इसका दमन शुरू कर दिया गया। 2013 में मिस्र में आंदोलन हुआ और ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ से आने वाले मोहम्मद मोर्सी को राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस आंदोलन के पीछे सऊदी अरब का हाथ बताया गया। सऊदी का इस्लामी मंत्रालय इस मामले में सख्त है और उसने कहा है कि मजहब की आड़ में वो इस संगठन को पनपने नहीं देगा।

इससे पहले सऊदी अरब ने बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोगों (NRIs) को वापस प्रत्यर्पित किया था। ये सभी खाड़ी मुल्क में रहते हुए CAA के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे थे। इन्होंने दिल्ली के शाहीन बाग़ विरोध प्रदर्शन से प्रेरित होकर वहाँ भी सड़क पर उतर कर मोदी सरकार के इस कानून के खिलाफ जम कर प्रदर्शन किया था। बाद में सऊदी अरब ने इन सभी को भारत को सौंपने का निर्णय लिया।

राजा पुरुवास अर्थात पोरस का गौरवमयी इतिहास

प्राचीन काल से ही भारतभूमि का इतिहास काफी रोचक रहा है। हमारे देश में सत्ता प्राप्त करने एवं मिली हुई सत्ता सुरक्षित रखने के लिए कई युद्ध हुए हैं, जिनसे जुड़ी जानकारी हमें इतिहास की किताबों के माध्यम से मिलती है। लेकिन इतिहासकारों ने बहुत सी बातों को या तो अधूरा ही रखा है या फिर तोड़मरोड़ कर एक अलग ही तरह से पेश किया है। कुछ इतिहासकारों ने इतिहास में घटित घटनाओं को मिथ्या की चाशनी में इस तरह से डुबोया है कि वो सभी घटनाएं सत्य प्रतीत होते हैं। ऐसी ही एक घटना को मिथ्या की चाशनी में डुबोया था ग्रीक इतिहासकारों ने जिसे आधुनिक इतिहासकार बड़े चाव से हमें परोसते हैं। हम बात कर रहे हैं 2300 वर्ष पूर्व की, जब विश्वविजय का सपना लिए भारतभूमि पर सिकंदर आया जिसे महाप्रतापी राजा पोरस से कठिन चुनौती मिली। इन दोनों ताकतवर राजाओं के बीच झेलम नदी के किनारे भीषणयुद्ध हुआ जिसे आज भी याद किया जाता है।

 आज हम अपने इस लेख में आपको इस युद्ध और राजा पोरस के बारे में वो जानकारी देने जा रहे हैं, जो सम्भवतः आपने कभी पढ़ा ही नहीं हो। क्यों कि हमें यह तो पढ़ाया गया है कि सिकंदर कितना महान था। यहाँ तक कि उसे महान बताने के लिए एक कहावत भी निर्मित हो गई है- ‘जो जीता वही सिकंदर’। लेकिन क्या सिकंदर सचमुच महान था? या फिर ग्रीक इतिहासकारों के प्रभाव से लिखी गई पश्चिम के इतिहास की किताब को दुनिया ने आँख मूँदकर मान लिया है। किंतु जब हम ईरान एवं चीन के बचे हुए ऐतिहासिक श्रोतों के नजरिए से देखते हैं तो असलियत कुछ और ही नज़र आती है। आइए पढ़ते हैं उस महान राजा के बारे में जिसकी उपलब्धि को धत्ता बता, यूनानी इतिहासकारों ने सिकंदर को महिमामण्डित किया और ऐसा करके उन्होंने अपने योद्धा और देश के सम्मान को बचा लिया और दुनियाभर में सिकंदर को महान साबित कर दिया।

कौन थे राजा पुरुवास*

राजा पोरस के बारे में अधिकांश जानकारी जो प्रचलित है वो यूनानी इतिहासकारों द्वारा लिखित है। उनके अनुसार राजा पोरस का समय 340 ईसापूर्व से 315 ईसापूर्व तक का माना जाता है। पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। राजा पोरस का साम्राज्य जेहलम (झेलम) और चिनाब नदियों के बीच स्थित था। इतिहासकार के.पी.दुबे लिखते हैं कि यूनानी लेखकों ने राजा पोरस के बारे में 25 वर्ष की आयु के होने तक कुछ लिखा ही नहीं है। दुर्भाग्यवश हमारे देश के बारे में जो लिखित इतिहास था वो नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बख्तियार ख़िलजी द्वारा लगाई हुई आग में भस्म हो गया। इसके अलावा सन 50 ईसा पूर्व में अलेक्सांद्रिया के पुस्कालय में लगी आग में समसामयिक इतिहास जलकर राख हो गया। हालांकि कुछ इतिहासकार कहते हैं कि जब अलेक्सांद्रिया का पुस्तकालय जल रहा है तब उस क्षेत्र में रहने वाले ईरान एवं चीनी लोगों ने कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों को बचा लिया और अपने अपने देश ले गए। उन दस्तावेजों में भारतीय इतिहास का भी विवरण मिलता है। स्रोतों के अनुसार पोरस या राजा पुरुवास का जन्म सिंध प्रान्त पंजाब में हुआ था। वो राजा बमनी और अनुसुइया के पुत्र थे। गांधार का राजा आम्भी उनका मामा था, जिनका साम्राज्य झेलम नदी से चेनाब नदी फैला हुआ था। लेकिन राजा बमनी से आम्भी के सम्बंध अच्छे नहीं थे। कहते हैं कि राजा पोरस की शारीरिक रचना भी अद्भुत थी, उनकी उचाई 7.5 फिट थी।एक कुशल राजा होने के साथ ही वे अपने राज्य की प्राकृतिक और भौगोलिक जानकार भी थे। राजा पोरस का समय कार्यकाल 340 ईसापूर्व से 315 ईसापूर्व तक माना जाता है।

राजा पोरस के समकक्ष सिकंदर*

उधर सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात अपने सौतेले व चचेरे भाइयों का कत्ल करने के बाद यूनान के मेसेडोनिया के सिन्हासन पर बैठ गया। इसके पश्चात अपनी अतिमहत्वाकांक्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला। उसकी खास दुश्मनी ईरानियों से थी। इसलिए सिकंदर ने सबसे पहले ईरान के पारसी राजा दारा(डराइस) को पराजित कर किया और और स्वंय को विश्व विजेता घोषित कर दिया। इतिहासकार कहते हैं कि राजा दारा भले ही हार गया था लेकिन उसने बड़ी चतुराई से सिकंदर से बचने का रास्ता निकाला। दारा ने कहा, तुम मुझे हराकर स्वयं को विश्वविजेता समझ रहे हो, जब कि असलियत में मुझसे कई गुना बड़ा साम्राज्य हिन्द है। जब तक तुम उस पर कब्ज़ा नहीं कर लेते तुम्हे विश्व विजेता कहलाने का कोई हक नहीं है। कहते हैं कि यहीं से उसकी भूख बढ़ गई। अब वो जल्द से जल्द हिन्द को हथिया कर विश्व विजेता का तमगा हासिल करना चाहता था। सिकंदर को भारत में घुसने से पहले काफ़ी संघर्ष करना पड़ा और जन-धन की हानि उठानी पड़ी। सिकंदर विश्व विजय के लिए निकला था, लेकिन ये उसके लिए आसान नहीं था।”

सिकंदर ने जब भारत पर चढ़ाई की तो तक्षशिला और अभिसार के राजाओं ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार ली। इसके बाद राजा पोरस का राज्य था, जिसने सिकंदर की अधिपत्यता स्वीकारने से मना कर दिया। राजा पोरस द्वारा सिकंदर की अधीनता न स्वीकारने पर दोनों की सेना में युद्ध होना निश्चित था। इसके बाद सिकंदर ने पोरस को हराने के लिए सेना तैयार किया जिसमें उसकी मदद तक्षशिला नरेश आम्भी ने की जो पोरस को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता था। सिकंदर ने आम्भी को अपनी सेना में लाकर झेलम नदी पार की और युद्ध के लिए आगे बढ़ा क्यों कि झेलम को पार किये बगैर राजा पोरस के राज्य में दाखिल होना नामुमकिन था। सिकंदर जानता था कि पोरस जैसे पराक्रमी राजा को हराना इतना आसान नहीं है। इसलिए उसने चालाकी से काम लिया। झेलम नदी के किनारे पर उसने अपनी सेना खड़ी कर दी और ऐसा दिखावा करने लगा कि मानो वे लोग नदी पार करने का रास्ता ढूंढ रहे हों। कई दिन इस तरह बीत जाने पर पोरस के पहरेदार कुछ कम चौकन्ने हो गए।

इसी बीच सिकंदर नदी की दिशा में करीब 17 मील ऊपर जाकर हज़ारों सैनिकों और घुड़सवारों के साथ नदी पार कर गया। उधर राजा पोरस की सेना अभी भी यही मान रही थी कि सिकंदर नदी पार करने का रास्ता ढूंढ रहा है जब कि सिकन्दर दूसरी ओर से खुद उनके समीप पहुँच चुका था। सिकंदर के 60000 सैनिक अब पोरस के राज्य में घुस गए, जिसके बाद भयंकर युद्ध की शुरुआत हुई। इस युद्ध में पहले ही दिन सिकंदर को पोरस के पराक्रम का एहसास हो गया क्यों कि पोरस की सेना के पास बलशाली गजसेना के साथ अद्भुत हथियार भी सम्मिलित थे जिनका जवाब यूनानी सेना के पास नहीं था। राजा पोरस की सेना के पास एक ऐसा भी अस्त्र था जिससे एक ही सैनिक कई शत्रु सैनिकों और घुड़सवार सैनिकों को मार सकते थे।

युद्ध में सिकंदर की सेना को बहुत नुक्सान पहुंचा, हालांकि पोरस के सैनिक भी हताहत हुए एवं वीरगति को प्राप्त हुए। इसी बीच तेज़ बारिश ने सिकंदर की मुश्किलें बढ़ा दी। वो अपने घोड़े को तेजगति से भगाने में अक्षम हो रहा था, तभी राजा पोरस के भाई अमर ने अपने युद्ध कौशल से सिकंदर के घोड़े भवक्पाली (bukifilus) का वध कर दिया और सिकंदर को युद्धभूमि पर गिरा दिया। सिकंदर अपनी मृत्यु से क्षनिक दूर था, उसे राजा पोरस के हाथों की कृपान में अपना काल दिख रहा था। तभी सिकंदर के अंगरक्षकों ने एक किस्म का पदार्थ जमीन पर बिखेर दिया जिससे निकले गन्ध ने राजा पोरस को भ्रमित कर दिया। इस परिस्थिति का फ़ायदा उठाकर सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहाँ से ले गए। अपनी मौत को इतने सामने से देखने बाद सिकंदर बुरी तरह से डर गया था, हालांकि वो चाहता था कि उसके सैनिक पोरस को हराने के लिए उसके साथ रुकें। लेकिन महीनों से युद्ध लड़ते हुए सैनिक थक चुके थे, साथ ही उन्हें अब अपने देश यूनान की याद आ रही थी इसलिए उन सैनिकों ने सिकंदर की बातों को मानने से इनकार कर दिया। इतिहासकार कहते हैं कि सिकंदर ने सैनिकों पर रुकने के लिए ज़ोर भी नहीं दिया, सम्भवतः ऐसा करने पर उसे विद्रोह की आशंका थी। मन मसोसकर सिकंदर यूनान की ओर लौट गया, जहां 323 ईसा पूर्व में बेबीलोन के पास ही किसी बीमारी से उसकी मृत्यु हो गई।

सिकंदर-पोरस युद्ध को अलग तरीके से पेश किया यूनानियों ने*

हम सिकंदर-पोरस के बारे में जो कुछ भी आज जानते हैं वो यूनानियों द्वारा लिखित इतिहास है। जिसमें उन्होंने सिकंदर एवं अपने देश को महान बताने के लिए कहानियां गढ़ी है। उन्होंने लिखा है कि सिकंदर विश्व विजेता बनने के लिए मकदूनिया से निकला था, इसके बाद उसने बड़े-बड़े राजाओं को अपने समक्ष झुकने पर मज़बूर कर दिया। और जिन्होंने उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की उसे सिकंदर ने युद्ध में परास्त किया। लेकिन फ़ारसी इतिहासकार इसका पूरी तरह से खंडन करते हैं। फ़ारसी इतिहासकार लिखते हैं कि सिकंदर को बेवजह ही महान बनाया गया है जबकि उसमें महान बनने के लिए कोई असाधारण गुण मौजूद नहीं था। फ़ारसी कृति ‘शाहनामा’ में सिकंदर को एस्कंदर-ए-मक्दुनी (मॅसेडोनिया का अलेक्ज़ेंडर, एस्कन्दर का अपभ्रंश सिकन्दर है) कहा गया है। जहां उसे एक क्रूर सनकी राजकुमार से अधिक महत्ता नहीं दी गई है। जिस विश्व विजय का वो सपना लेकर निकला था, उसे तो उस विश्व के बारे में जानकारी भी नहीं थी। वो तो समझता था कि फारस का सम्राज्य जीतकर ही वो विश्व विजेता बन जायेगा।(फारस का सम्राज्य मकदूनिया से 40 गुना अधिक बड़ा था, एवं शक्तिशाली एवं सम्पन्न था।) यूनानी इतिहासकार लिखते हैं कि अपनी मृत्यु तक सिकंदर ने विश्व के आधे से अधिक भूमि पर विजय हासिल कर लिया था। लेकिन सत्य ये है की वह पृथ्वी के मात्र 5 प्रतिशत हिस्से को ही जीत पाया था, क्योंकि प्राचीन यूनानियों को धरती के भौगोलिक क्षेत्र के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। कई यूनानी लेखों में तो फारस की खाड़ी को धरती का छोड़ बताया गया है, जिसके उधर एक दूसरी दुनियां मौजूद है।

सिकंदर और पोरस के बीच हुए युद्ध को यूनानी ‘Battle of the Hydaspes’ कहते हैं। यह युद्‍ध मई 326 ईसा पूर्व में लड़ा गया था। सिकंदर की सेना में 50 हजार पैदल सैनिक, 7 हजार घुड़सवार थे तो वहीं पोरस के पास 20 हजार पैदल सैनिक, 4 हजार घुड़सवार, 4 हजार रथ और 130 हाथी थे। सिकंदर अपने चुने हुए 11 हजार आम्भी की सेना भारतीय और सिकंदर की सेना के यूनानी सैनिकों को लेकर झेलम की ओर चला था। इस युद्ध में पोरस ने पराक्रम दिखाया लेकिन वो सिकंदर के सामने टिक नहीं पाया और अंततः उसे हार का सामना करना पड़ा। यूनानियों ने इसपर एक और कहानी गढ़ी जिसे सत्य माना जाता है। उन्होंने लिखा है कि युद्ध हारने के बाद पोरस को सिकंदर के समक्ष पेश किया गया। जहाँ सिकंदर ने पोरस से सवाल किया कि तुम्हारे साथ कैसा बर्ताव किया जाए। इस सवाल के जवाब में पोरस ने बड़े आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के साथ कहा कि ठीक वैसा ही, जैसा कि एक शासक दूसरे शासक के साथ करता है।

 सिकंदर को पोरस का आत्मविश्वास से भरा जवाब पसंद आया और उसके बाद सिकंदर ने खुश होकर पोरस को उसका राज्य वापस कर दिया। राज्य लौटाने के बाद सिकंदर ने अपने प्रतिनिधि के रूप में सेनापति सेल्युकस निकेटर को नियुक्त कर दिया और स्वयं सैनिकों को लेकर मकदूनिया की ओर निकल गया, जहां बेबीलोन के पास किसी बीमारी की चपेट में आकर 32 वर्ष की आयु में सिकंदर की मृत्यु हो गई।

निष्पक्ष इतिहासकारों की दृष्टि से सिकंदर-पोरस युद्ध का परिणाम*

तक्षशिला एवं अभिसार हासिल करने के बाद राजा पुरु के शत्रु लालची आम्भी की सेना लेकर सिकंदर ने झेलम पार कर लिया। लेकिन इधर राजा पुरु पहले से आक्रमण के लिए तैयार थे। राजा पुरु जिसे स्वयं यवनी( यूनानी) 7 फुट से ऊपर का बताते अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े। पोरस की हस्ती सेना ने यूनानियों का जिस भयंकर रूप से संहार किया था उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे थे। सिकंदर और उसके सैनिकों ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। इतिहासकार लिखते हैं कि भारत के पास विदेशी को मार भगाने की हर नागरिक के हठ, शक्तिशाली गजसेना के अलावा कुछ अनदेखे हथियार भी थे जैसे सातफुटा भाला जिससे एक ही सैनिक कई-कई शत्रु सैनिकों और घोड़े सहित घुड़सवार सैनिकों को भी मार गिरा सकता था। इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली। सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए। यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंत: प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया। कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है। राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर को युद्धभूमि में घुसते देखा और आगे से घेरकर उसके घोड़े बुकिफाइलस (संस्कृत-भवकपाली) को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया। कहते हैं कि ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी ऐसा होते हुए नहीं देखा था।

इतिहास को निष्पक्ष तौर पर पेश करने वाले यूनानी प्लूटार्क ने अपने लेख में लिखा है कि उस दिन सिकंदर एवं उनकी सेना ने लगभग 8 घन्टे तक पोरस की सेना से भीषण युद्ध किया लेकिन नियति ने उस दिन उनका साथ नहीं दिया। प्लूटार्क के इस कथन से उन प्राचीन यूनानी लेखों का खंडन होता है जिनमें सिकंदर को महान बताया गया था। वहीं भारत के कई इतिहासकारों का मानना है कि इस युद्ध में राजा पोरस की विजय हुई थी। चूंकि सिकंदर की सेना भारत आने से पहले युद्ध लड़कर थक गई थी। इसके साथ ही जब सिकंदर भारत आया तो वो पोरस की सेना को देखकर दंग रह गया, उसने लड़ाई लड़ी लेकिन वो परास्त हो गया और अंततः सैनिकों के दबाव में उसे वापस लौटना पड़ा। इसके अलावा विशाखदत्त द्वारा रचित मुद्राराक्षस में पश्चिमी भारत के प्रतापी राजा प्रवर्तक नामक का उल्लेख आता है जिसने आचार्य चाणक्य की मदद से विदेशी आक्रमण को रोका था। इसके बाद राजा प्रवर्तक ने धनानंद के साम्राज्य को खत्म कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना करने में आचार्य चाणक्य के शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य की मदद की। कहते हैं कि राजा प्रवर्तक कोई और नहीं राजा पोरस ही थे, जिन्हें अलग अलग नामों से जाना जाता है। लेकिन इन सबमें राजा पोरस की मृत्यु के विषय में भी ज्यादा कुछ ज्ञात नहीं है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार सिकंदर के सेनापति युदोमोस ने ही राजा पोरस की हत्या की थी परन्तु इस बात के कोई पुख्ता स्त्रोत नहीं है। कुछ इतिहासकारों में मत तो यह भी हैं कि आचार्य चाणक्य ने ही विषकन्या के द्वारा पोरस की हत्या करवाई थी क्यों कि चन्द्रगुप्त के साम्राज्य विस्तार में बाधक बन सकते थे। जबकि अन्य इतिहासकारों के अनुसार 315 ईसा पूर्व के आसपास राजा पोरस अपनी स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हुए।

*टिप्पणी* : इतिहास में वर्णित घटनाओं में सिकंदर-पोरस युद्ध सबसे अधिक विवादास्पद है क्यों कि इसके बारे में जो कुछ भी हमें पता है वो एक कहानी के तौर पर गढ़ा गया है। किंतु इस कहानी को लोग सत्य ही मानते हैं। हम सिकंदर के विजय को कहानी इसलिए कह रहे हैं क्यों कि वो सब लिखा गया था सिकंदर के साथ चलने वाले उसके दरबारी लेखकों द्वारा। इसमें कोई शंका नहीं है कि वो अपने राजा को बड़ा दिखाने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर ही लिखेंगे। उन चाटूकारों ने ऐसा ही किया और जो कुछ भी सिकंदर के युद्ध अभियान में लिखा, उसे सिकंदर की मृत्यु के तुरंत बाद मकदूनिया भेज दिया। जहाँ उन लेखों में और बातों को जोड़कर इतिहास के रूप में पेश किया गया। सिकंदर की मृत्यु के 500 साल बाद तक ये इतिहास मकदूनिया के लोगों के अलावा विश्व में भी फैलने लगा था। जिसे आगे चलकर पश्चिमी देशों द्वारा सत्यापित कर दिया गया और इस तरह हारा हुआ सिकंदर विश्व विजेता बन गया और विजयी राजा पोरस को एक पराजित योद्धा के रूप में पेश किया गया। हमारे देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि नालन्दा विश्वविद्यालय में मुस्लिम आक्रान्ता बख्तियार ख़िलजी ने आग लगा दी और हमारे देश का बहुमुल्य इतिहास उसमें जलकर राख हो गया। वरना आज हम प्रमाण के साथ कह सकते थे कि राजा पोरस कितने महान थे, जिन्होंने सिकंदर को हरा उसे उसके देश वापस लौटने पर विवश कर दिया।

किसानों को निरंतर भ्रमित कर रहा है देश का विपक्ष

प्रमोद भार्गव

तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिलकर यह जता दिया है कि ये दल किसानों को बरगलाने का काम कर रहे हैं। जो राहुल गांधी इन कानूनों को किसान विरोधी बता रहे हैं, वही इन कृषि सुधारों को 2012 में मनमोहन सिंह सरकार के रहते हुए लागू करना चाहते थे। किंतु विपक्ष के प्रबल विरोध के चलते यह संभव नहीं हुआ। जो वामपंथी दल पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और सिंगूर में किसानों की जमीन अधिग्रहण कर सेज और टाटा की नैनो के लिए क्रूर हिंसा पर उतर आए थे, वही आज किसान हितों का ढोंग कर रहे हैं। एनसीपी के नेता शरद पवार वही नेता हैं, जिनके केंद्रीय कृषि मंत्री रहते किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्याएं कीं और महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र आज भी इसी स्थिति से गुजर रहा है। 2019 में ही महाराष्ट्र में 3927 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। महाराष्ट्र में चीनी मिल कभी भी किसान से गन्ना खरीद का पूरा भुगतान नहीं करते हैं। इनमें से ज्यादातर मिल शरद पवार और उनकी ही कंपनियों के हैं।

साफ है, ये दल किसान संगठनों में फूंक मारकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना चाहते हैं। क्योंकि अब जब केंद्र सरकार ने किसानों के दस मुद्दों पर संशोधन का प्रस्ताव लिखित में दे दिया है, तब आंदोलन के चलते रहने का कोई औचित्य नहीं रह जाता? वैसे भी संविधान की सातवीं अनुसूची में खेती, भूमि, पानी, शिक्षा, पशुपालन, कृषि-ऋण, राज्य-कर और भू-राजस्व जैसे सभी विषय राज्यों के अधीन हैं, गोया, तीनों नए कानूनों का कोई भी प्रावधान राज्य सरकारों की इच्छा के विपरीत लागू नहीं किए जा सकते हैं। मसलन राज्य इन कानूनों को लागू करने या नहीं लागू करने के लिए स्वतंत्र हैं।

1964 से पहले भारत में किसानों को खाद्य सुरक्षा नहीं मिलती थी। ‘जय किसान, जय जवान’ का नारा देने वाले प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अपने सचिव एलके झा के नेतृत्व में ‘खाद्य अनाज मूल्य नीति समिति’ का गठन किया और किसान हित साधे। दरअसल शास्त्री जी चाहते थे कि किसानों को फसल बेचकर इतनी धनराशि तो मिले की उनकी आजीविका सरलता से सालभर चल जाए। इसी मकसद पूर्ति के लिए 1966 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया गया। तबसे लेकर अबतक यह व्यवस्था लागू है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 फसलों पर एमएसपी सुनिश्चित किया हुआ है। लेकिन नए कानून में इस प्रावधान की गारंटी खत्म कर दी गई थी। संशोधन प्रस्ताव में इस व्यवस्था को बनाए रखने का लिखित भरोसा सरकार ने दे दिया है। मसलन एमएसपी भविष्य में भी किसानों को मिलती रहेगी। हालांकि 2015 में आई संताकुमार समिति की रिपोर्ट पर गौर करे तो बमुश्किल छह प्रतिशत किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है। बावजूद इस प्रावधान का बने रहना जरूरी है।

किसानों को आशंका थी कि जब वह निजी मंडियों में फसल पहले से ही बेचने को स्वतंत्र थे, तब निजी मंडियों की व्यवस्था किसलिए? किसानों को आशंका थी कि वे निजी मंडियों के मालिकों के जाल में फंसते चले जाएंगे। ये मंडियां कर-मुक्त फसल की खरीद करेंगी, इसलिए सरकारी मंडियां बंद होती चली जाएंगी। यह आशंका उचित है। सरकार ने अब संशोधन प्रस्ताव दिया है कि निजी मंडियों में राज्य सरकारें पंजीयन की व्यवस्था लागू कर सकती है और सेस शुल्क भी लगा सकती है। हालांकि निजी मंडियां अस्तित्व में नहीं होने के बावजूद 65 फीसदी किसान स्थानीय निजी व्यापारियों को ही फसल बेचते हैं। महज 25 प्रतिशत परिवार ही सरकारी मंडियों में फसल बेचते हैं।

इस लिहाज से यह बात समझ से परे है कि आखिर निजी मंडियों की जरूरत ही क्या है। हालांकि अब निजी मंडियों पर भी कर के प्रावधान कर दिए जाने से यह भरोसा पैदा होता है कि निजी मंडियां पनप नहीं पाएंगी। किसानों की जमीन पर उद्योगपतियों का कब्जा संविदा खेती के अनुबंध के बावजूद नहीं होगा। क्योंकि इस कानून में संशोधन किया गया है कि किसान की जमीन पर किसी भी प्रकार का ऋण अथवा मालिकाना हक व्यापारी को नहीं मिल सकता है और न ही किसान की जमीन बंधक रखी जा सकती है। इन प्रावधानों के अलावा राज्य सरकारें किसानों के हित में कानून बनाने के लिए स्वतंत्र रहेंगी। यह प्रावधान तय करता है कि तीनों कानूनों में किसानों के हित ध्यान में रखते हुए बदलाव किए जा सकते हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार अस्तित्व में आने के बाद से ही खेती-किसानी के प्रति चिंतित रही है। इस नजरिए से अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण नीति’ लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसानों की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है।

बीते कुछ समय से पूरे देश में ग्रामों से मांग की कमी दर्ज की गई है। निःसंदेह गांव और कृषि क्षेत्र से जुड़ी जिन योजनाओं की श्रृंखला को जमीन पर उतारने के लिए 14.3 लाख करोड़ रुपए का बजट प्रावधान किया गया है, उसका उपयोग अब सार्थक रूप में होता है तो किसान की आय सही मायनों में 2022 तक दोगुनी हो पाएगी। इस हेतु अभी फसलों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने की भी जरूरत है। दरअसल बीते कुछ सालों में कृषि निर्यात में सालाना करीब 10 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं कृषि आयात 10 अरब डॉलर से अधिक बढ़ गया है। इस दिशा में यदि नीतिगत उपाय करके संतुलन बिठा लिया जाता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश की धुरी बन सकती है। हालांकि अभी भी खेती-किसानी का जीडीपी में योगदान 16 फीसदी है और इससे देश की आबादी के 41 प्रतिशत लोगों को रोजगार मिलता है।

केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में ‘ए-2’ फॉर्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसानों की खुशहाली बढ़ेगी। एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग ने भी वर्ष 2006 में यही युक्ति सुझाई थी।

सरकार अब खेती-किसानी, डेयरी और मछली पालन से जुड़े लोगों के प्रति उदार दिखाई दे रही है, इससे लगता है कि भविष्य में किसानों को अपनी भूमि का किराया भी मिलने लग जाएगा। इन वृद्धियों से कृषि क्षेत्र की विकास दर में भी वृद्धि होने की उम्मीद बढ़ेगी। वैसे भी यदि देश की सकल घरेलू उत्पाद दर को दहाई अंक में ले जाना है तो कृषि क्षेत्र की विकास दर 4 प्रतिशत होनी चाहिए। खेती उन्नत होगी तो किसान संपन्न होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था समृद्ध होगी। इसका लाभ देश की उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा।

ज़ुकाम


2020 में सबसे ज़्यादा भाव ज़ुकाम के बढ़े हैं जिसका शुमार कभी बीमारियों में भी नहीं था। कहा जाता था दवा खाए तो भी और दवा न खाए तो भी ज़ुकाम पाँच दिन में ठीक हो ही जाता है।ऐसा नहीं है कि ज़ुकाम कष्टदायक नहीं होता… बहुत कष्ट देता है नाक से पानी के झरने फूटना, लेटते ही उसी नाक का बंद हो जाना यहाँ तक कि कान भी सुन्न हो जाते है और आँखे डबडबाई रहती है फिरभी ज़ुकाम से पीड़ित व्यक्ति अपनी दिनचर्या निभाता है दफ्तर जाता है गृहणियाँ घर के काम निपटाती हैं। ज़ुकाम में कौन बच्चों की स्कूल से छुट्टी करता है। ये बात अलग है कि जुकाम के डर से  2020 मे स्कूल ही बंद हो गये हैं।पहले कभी काम वाली दो चार बार छींकी उसे गोली पकड़ा दी जाती थी काम तो उसे करना ही होगा।2020 में ज़ुकाम को ऐसा क्रोध आया कि उसने दुनियाँ को हिला दिया। ये कोरोना वोरोना कुछ नहीं हैं जुकाम का क्रोध ही है जो कहर बन कर बरस रहा है। यदि ज़ुकाम की क़द्र की होती तोे ये दिन न देखने पड़ते।ज़ुकाम में तीन दिन छुट्टी की होती  बिना किसी अपराधबेध के तो उसे कोरोना का रूप धारण करने की ज़रूरत ही न पड़ती।इतनी सर्दी में दो एक बार ज़ुकाम होना बड़ी मामूली सी बात थी पर 2020  की अदा निराली है , आप सार्वजनिक स्थान पर छींके तो लोग दो नहीं छ: गज़ दूर भागेगें कामवाली को आप हफ्ते भर की छुट्टी दे देंगे। दफ्तर वाले कहेंगे घर से ही काम करते रहो।अगर आपके घर के किसी प्राणी को ज़ुकाम हुआ तो उसको एक कमरे में कैद कर दिया जायेगा बस समय पर खाने को मिलता रहेगा।कहाँ जुकाम में आराम हराम था और अब 2020 में इतना आराम कि आराम से ही नफ़रत हो जाये।

मा.गो.वैद्यः उन्हें भूलना है मुश्किल

-प्रो.संजय द्विवेदी

मुझे पता है एक दिन सबको जाना होता है। किंतु बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जिनके जाने से निजी और सार्वजनिक जीवन में जो शून्य बनता है, उसे भर पाना मुश्किल होता है। श्री मा.गो.वैद्य चिंतक, विचारक, पत्रकार, प्राध्यापक, विधान परिषद के पूर्व सदस्य और मां भारती के ऐसे साधक थे, जिनकी उपस्थिति मात्र यह बताने के लिए काफी थी कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। वे हैं तो सुनेंगें और जरूरत होने पर सुना भी देंगें। उनकी वाणी, कलम और कृति सब एकमेक थे। कहीं कोई द्वंद्व नहीं, कोई भ्रम नहीं।  

वे स्वभाव से शिक्षक थे, जीवन से स्वयंसेवक और वृत्ति(प्रोफेशन) से पत्रकार थे। लेकिन हर भूमिका में संपूर्ण। कहीं कोई अधूरापन और कच्चापन नहीं। सच कहने का साहस और सलीका दोनों उनके पास था। वे एक ऐसे संगठन के ‘प्रथम प्रवक्ता’ बने जिसे बहुत ‘मीडिया फ्रेंडली’ नहीं माना जाता। वे ही ऐसे थे जिन्होंने प्रथम सरसंघचालक से लेकर वर्तमान सरसंघचालक की कार्यविधि के अवलोकन का अवसर मिला। उनकी रगों में, उनकी सांसों में संघ था। उनके दो पुत्र भी प्रचारक हैं। जिनमें से एक श्री मनमोहन वैद्य संघ के सहसरकार्यवाह हैं। यानि वे एक परंपरा भी बनाते हैं, सातत्य भी और सोच भी। 11 मार्च,1923 को जन्मे श्री वैद्य ने 97 साल की आयु में नागपुर में आखिरी सांसें लीं। वे बहुत मेधावी छात्र थे,बाद के दिनों  में वे ईसाई मिशनरी की संस्था हिस्लाप कालेज, नागपुर में ही प्राध्यापक रहे।

प्रतिबद्धता थी पहचान

 उनके अनेक छात्र उन्हें आज भी याद करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रकाश दुबे ने अपने एक लेख में लिखा हैमेरी जानकारी के अनुसार श्री माधव गोविंद वैद्य यानी बाबूराव वैद्य से पहले संघ में प्रवक्ता का पद नहीं हुआ करता था। संघ की आत्मकेन्द्रित गतिविधियों को लेकर तरह तरह के कयास लगाया जाना अस्वाभाविक नहीं था। सरसंघचालक प्रवास के दौरान संवाद माध्यमों से यदा कदा बात करते। उनके कथन में शामिल वाक्यों और कई बार तो वाक्यांश के आधार पर विश्लेषण किया जाता। कपोल-कल्पित धारणाएं तैयार होतीं। श्री वैद्य मेरे गुरु रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में नहीं। श्री वैद्य वर्षों तक संघ से जुड़े मराठी दैनिक तरुण भारत के संपादक थे। नागपुर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में फंडामेंटल्स आफ गुड राइटिंग अंगरेजी पढ़ाते थे। कक्षा में श्री वैद्य से जमकर विवाद होता। तीखा परंतु, शास्त्रार्थ की परिपाटी का। कहीं व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप नहीं। अपनी धारणा पर श्री वैद्य अटल रहते।”  यह साधारण  नहीं था उनके निधन पर देश के प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति से लेकर सरसंघचालक ने गहरा दुख जताया। श्री भागवत और सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने अपने संयुक्त वक्तव्य में कहा कि उनके शरीर छोड़ने से हम सब संघ कार्यकर्ताओं ने अपना छायाछत्र खो दिया है।” 

विनोदी स्वभाव और विलक्षण वक्ता

  श्री वैद्य को मप्र सरकार ने अपने एक पुरस्कार से सम्मानित  किया। उस दिन सुबह भोपाल के एक लोकप्रिय दैनिक ने यह प्रकाशित  किया कि श्री वैद्य संघ के प्रचारक हैं और उन्हें पत्रकारिता का पुरस्कार दिया जा रहा है। वैद्य जी  ने  इस  समाचार पर अपनी प्रतिक्रिया बड़ी सहजता और विनोद भाव से कार्यक्रम  में प्रकट की, आयोजन में  मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान भी मंच पर थे। वैद्य जी  ने अपने संबोधन में  कहा कि भोपाल के एक प्रमुख दैनिक ने  लिखा है कि मैं प्रचारक  हूं, जबकि मैं प्रचारक नहीं हूं, बल्कि दो प्रचारकों का बाप हूं। उनके इस विनोदी टिप्पणी पर पूरा हाल खिलखिला  उठा। बाद में उन्होंने जोड़ा कि मेरे दो पुत्र प्रचारक हैं।  

मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनका सानिध्य अनेक बार मिला। उन्हें सुनना एक विरल अनुभव होता था। इस आयु में भी वे बिना किसी कागज या नोट्स के बहुत व्यवस्थित बातें  करते थे। उनके व्याख्यानों के विषय बेहद सधे हुए और एक -एक शब्द संतुलित होते थे। 19 नवंबर, 2015 को वर्धा के महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के हबीब तनवीर सभागृह में उन्होंने पं. दीनदयाल उपाध्याय पर केंद्रित मेरे द्वारा संपादित पुस्तक ‘भारतीयता का संचारक –दीनदयाल  उपाध्याय’ का लोकार्पण भी किया। यहां उन्होंने राष्ट्रवाद पर बेहद मौलिक व्याख्यान दिया और भारतीय राष्ट्रवाद और पश्चिमी राष्ट्रवाद को बिलकुल नए संदर्भों में व्याख्यायित किया।

  श्री वैद्य एक संपादक के रुप में बहुत प्रखर थे। उनकी लेखनी और संपादन प्रखरता का आलम यह था कि तरूण भारत मराठी भाषा का एक लोकप्रिय दैनिक बना। उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व  में अनेक पत्रकारों का निर्माण किया और पत्रकारों की एक पूरी मलिका खड़ी की। जीवन के अंतिम दिनों तक वे लिखते-पढ़ते रहे, उनकी स्मृति विलक्षण थी।

कुशल संपादक और पारखी नजर

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल ने उन्हें 2018 डी.लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित करने का निर्णय लिया। इस वर्ष श्री अमृतलाल वेगड़, श्री महेश श्रीवास्तव और श्री वैद्य को डी.लिट् की उपाधि मिलनी थी। माननीय उपराष्ट्रपति श्री वैकेंया नायडू दीक्षांत समारोह के लिए 16 मई,2018 को भोपाल पधारे। विश्वविद्यालय के कुलाध्यक्ष के नाते उन्होंने इन नामों की घोषणा की। अपने स्वास्थ्य के चलते श्री वैद्य आयोजन में नहीं आ सके। तत्कालीन कुलपति श्री जगदीश उपासने ने निर्णय लिया कि 23 मई,2018 को उनके उनके गृहनगर नागपुर में एक सारस्वत आयोजन कर श्री वैद्य को  यह उपाधि दी  जाए। उस अवसर पर कुलसचिव होने के नाते समारोह का संचालन मैंने किया। समारोह के बाद व्यक्तिगत भेंट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 90 वर्ष पूरे होने पर मेरे द्वारा संपादित पुस्तक ‘ध्येय पथ’ की प्रति उन्हें भेंट की। मुझे उनके स्वास्थ्य के नाते लग रहा था कि शायद  ही वे पुस्तक को देखें। किंतु 22 जुलाई,2018 को  उनका एक मेल  मुझे प्राप्त हुआ, जिसमें पुस्तक के बारे में उन्होंने लिखा कि कुछ त्रुटियां यत्र-तत्र हैं। उन्होंने लिखा-  

प्रिय प्रो. संजयजी द्विवेदी

सादर सस्नेह नमस्कार।

 मुझे मानद डि. लिट्. पदवी देने के अवसर पर आपने सम्पादित की ‘ध्येयपथ’ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक) यह पुस्तक भेंट की थी। उसको मैंने अथ से इति तक पूरा पढ़ा। किताब अच्छी है। कुछ त्रुटियाँ यत्र तत्र दिखी हैं। किन्तु सम्पूर्ण पुस्तक संघ के कार्य की विशेषताओं को प्रकट करती है।

जब त्रुटियाँ ध्यान में आयी, तब मैंने उनको अंकित नहीं किया था। अत: उनकी चर्चा मैं यहाँ नहीं करूंगा। केवल ‘संघ की प्रार्थना’ इस प्रकरण के सम्बन्ध में मुझे यह कहना है कि संघ की आज की प्रार्थना प्रथम बार 1940 में पुणे संघ शिक्षा वर्ग में गायी गयी थी। बाद में नागपुर में। क्योंकि पुणे का संघ शिक्षा वर्ग प्रथम शुरू हुआ और बाद में नागपुरका।

प्रार्थना का प्रथम गायन, दोनों स्थानोंपर श्री यादवराव जोशी ने ही किया था। प्रार्थना का मराठी प्रारूप 1939 में सिन्दी में (नागपुरसे करीब 50 कि.मी.) बनाया गया था।

 उस बैठक में प. पू. डॉक्टरजी, प. पू. श्री गुरुजी, माननीय आप्पाजी जोशी (वर्धा जिला संघचालक), माननीय बालासाहब देवरस आदि ज्येष्ठ-श्रेष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित थे। उसका संस्कृत श्री. नरहरि नारायण भिडेजी ने किया। वे प्राध्यापक नहीं थे। एक विद्यालय में शिक्षक थे।

अस्तु। शेष सब शुभ।

स्नेहांकित

मा. गो. वैद्य

ऐसे साधक पत्रकार-संपादक की स्मृतियां अनंत हैं। एक याद जाती है तुरंत दूसरी आती  है। उन्हें याद करना एक ऐसे नायक को याद करना है, जिसके बिना हम पूरे नहीं  हो सकते। वे सही मायने में हमारे समय के साधक महापुरुष थे, जिन्होंने अपनी युवावस्था में जिस विचार को स्वीकारा अपनी सारी  गुणसंपदा उसे ही समर्पित कर दी। वे उन लोगों मे थे जिन्होंने पहले संघ को समझा और बाद में उसे गढ़ने में अपनी जिंदगी लगा दी। उनकी पावन स्मृति को शत्-शत् नमन।

राधाकृष्ण की ललित लीलाओं ने दिया आधुनिक धार्मिक चित्रों को जन्म

आत्माराम यादव पीव
ग्यारहवी ईसवी शताब्दि के आसपास के समय पहली बार मंचों से खेला गया रंगमंच या नाट्य के महाअभिनेता के रूप में श्रीकृष्ण और नायिका राधा का अवदान पा जगत उनकी ऋणी हो गया है। आचार्य रामानुुजाचार्य ने कृष्ण राधा को लेकर अनेक रूपक लिखे है जिसमें रूक्मणी स्वयंवर लिखने के बाद कंसवध लिखा किन्तु तत्कालीन समाज को इन नाटकों की प्रस्तुति से पूर्ण संतोष नहीं हुआ परन्तु भरपूर आनन्द पाने की उनकी स्वीकारोक्ति ने इस विधा में गहन संभावनाओं को पाया। तब के समाज के मन में इन दो चरित्रों को लीलारूप में देखने के बाद श्रीकृष्ण-राधा के जीवन की शेष लीलाओं को देखने की जिज्ञासा को पूर्णतृप्ति का आभास को पूर्ण संतुष्टि देने वाले पूर्वी अंचल में अवतरित गौरांग महाप्रभु थे जो श्रीकृष्ण-राधा की लावण्य लीलाओं के माध्यम से झूमते,गाते और नाचते हुये जन-जन के सामने भक्ति और ज्ञान की परमोत्कृष्टता से सबके प्रिय होते गये। यह वह समय था जब इन लीलाओं का मंचन हुआ तब कुछ चित्रकारों ने इन लीलाओं के मंचन के कुछ स्वरूप अपने मस्तिष्क मंें धारण कर उन्हें चित्र रूप में पहली बार प्रगट किया जिसे देखने के लिये अपार भीड़ जुटने लगी। तब इन चरित्रों के स्वरूपों का आधार मानकर कुछ चित्रकारों ने अपनी कल्पनाओं के पंख लगाकर राधा-कृष्ण के चित्रों को कई आयामों में चित्रित कर चित्रकारी को स्थापित किया है।
आचार्य रामानुजाचार्य के नाटकों की प्रस्तुति से बनाये गये चित्रों ने पूरे भारत में एक क्रान्ति सी ला दी और लोकमत मंें इन चित्रों के कुछ मंदिरों की दीवालों पर उकेरने के बाद भीड़ द्वारा चित्रों की पूजा शुरू किये जाने से भी रोकना असंभव सा हो गया तब यह चित्र कपड़ों आदि पर बनाने का क्रम शुरू हुआ। श्रीमदभागवत में वर्णित लीलाओं-कथाओं को प्रमुखता से लिया जाकर तब के चित्रकारों ने रूक्मणी और सत्यभामा को श्रीकृष्ण के साथ न बिठाकर राधा को कृष्ण की सहचरी के रूप में अंकित करते हुये वृन्दावन के निकंुजा वन में श्रीकृष्ण,राधा और गोपियों के मध्य नृत्य करते, रूठते, मनाते, राधा को शयन किया छोड़कर अर्धरात्रि को बांसुरी बजाते, कभी बासुरी की तान पर थिरकते, यमुना के तट पर लीलायें करते चित्रित किया। ये चित्र जब लोगों ने देखें तो वे चित्रों के दीवाने हो गये और प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को श्रीकृष्ण और युवती स्वंयं को राधा रूप में मानते हुये उन्हें अपने अंतरमन में स्थापित कर एक दीवानगी को जीने लगे। पूरे देश में जहाॅ-जहाॅ जिन जनपदों-गाॅवों में ये चित्रकारी पहुॅची वहाॅ के लोग गाॅव की चैपाल को रंगमंच बनाकर खुद राधाकृष्ण के प्रति प्रेम रखते हुये पूरी श्रद्धा ओर वात्सल्य में डूब जाते। राधाकृष्ण की चित्रकारी के इस जुनून ने असम,बंगाल, उड़ीसा, में धूम मचाते हुये वहाॅ की कीर्तन मण्डलियाॅ कृष्ण-राधा की भक्ति में विरह के रस घोलते हुये कीर्तन लोगों के संताप का नाशक बन गया। उत्तरप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान एवं मध्यप्रदेश ये सभी प्रदेश रियासतों में बॅटे हुये थे के भीतर वहाॅ के राजा और राजघराने भी रास लोक कला, संगीत, नृत्य के अभिनय से लोकजीवन मंें भक्ति की गंगा बहाने लगे और चित्रकारों का मान बढ़ने के साथ चित्रकारी सर्वोच्च शिखर पर विराजित हो गयी।
कृष्ण का जन्म भले मथुरा में हुआ किन्तु कृष्ण और राधा की उत्कृष्ट मूर्तियाॅ के वे स्वरूप जिन्हें सदियों से हमारे पूर्वज एक धरोहर मानकर पूजा-अर्चना कर पूजते आये थे उन्हें मुस्लिम लुटेरा मोहम्मद गोरी सहित अन्य आंक्रान्तों द्वारा इन मंदिरों की बेशकीमती सम्पत्ति लूटने, मंदिरों को तोड़ने के साथ मूर्तियों को भी नुकसान पहुॅचाया है। किन्तु दक्षिणभारत इनसे अछूता रहा और वहाॅ श्रीकृष्ण की उत्कृष्ट मूर्तियों और चित्रकला को आज भी देखा जा सकता है। तेरहवी शताब्दी में कर्नाटक में मैसूर के पास सोमनाथपुरम का केशवमंदिर कलाशिल्प के रूप में विख्यात है। वास्तुशिल्प और मूर्तिकला के रूप में होयसल कारीगरों ने इसका निर्माण करते समय द्रविड शैली की अपेक्षा उत्तरी शिल्पकला को प्रमुख स्थान दिया और वैष्णव भक्ति से संबंधित इस क्षैत्र के मंदिरों में विष्णु के चैबीस अवतारोंकी पूर्तियाॅ प्रायः सभी ओर देखी जा सकती है। मंदिर के तोरणों में या भित्तिचित्रों में श्रीकृष्ण के विविभन्न स्वरूप की कृतियों में कालियनाग का वध, गोवर्धन उठाते श्रीकृष्ण,वेणु गोपाल के रूप मे बंजी बजात दिख जायेंगे। इन मंदिरों के शिल्पी होयसल स्वयं ही वास्तुविद भी थे जो मंदिरों की डिजाईनों में बहुरूपता को उकेरने में सिद्धस्थ थे। तेरहवीशदी के त्रिकुटाचल मंदिर में वैष्णव वास्तुकला और शास्त्र सिद्धि का प्रमाण है जहाॅ इन कलाकारों के द्वारा अपनी उत्कृष्ट प्रतिभा का परिचय दिया। केशवमंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण विभिन्न लीलाओं में कृष्ण-केशी असर का युद्ध सहित वृन्दावन के निकुंजों के प्राकृतिक दृश्य को चित्रण ऐसा लगता है मानो आप स्वयं केशव मंदिर में न होकर वृन्दावन के निकुंजवन मंें मौजूद हो। महाभारतीय शिल्प के दृश्यों में श्रीकृष्ण के सारथी रूप में श्रीकृष्ण का कलंगीदारमुकुट है जहाॅ वे पीछे की ओर मुख किये अर्जुन को समझा रहे है चित्र अंकित है।
राधाकृष्ण के चित्रों में जो श्रृंगार और भक्ति का सामंजस्य देश दुनिया के लोग देखते है वह अनेकों भक्तों की भावनाओं का पुष्पगुच्छ है। जयदेव द्वारा लिखित गीतगोविन्द के पदों में मृदंग की थाप पर नृत्यांगनाओं के घुंघरू भी जी जाते है और जगन्नाथपुरी के मंदिर व नदियाद ही नहीं बल्कि पूरे बंगाल, असम और ओडसी की भूमि गोविन्दमयी बन जाती है। इसी श्रृंखला में वल्लाभाचार्य, चण्डीदास, विद्यापति, चन्द्रसखि, सूरदास,नन्ददास, कबीरदास, रैदास, मीराबाई और अष्टछाप के अन्य कवियों ने अपनी काव्यकाकली के माध्यम से हरपुरूष-नारी के मन में निगूढ राधाकृष्ण के अलावा किसी ओर को झाॅकने नहीं दिया। जयदेव के गीतगोविन्द और श्रीमदभागवत के कृष्ण चरित्रों पर तब दुनिया भर के चित्रकार चित्रकारी के लिये आकृष्ट होकर आने लगे और तब दुनिया के सामने इन चित्रों को कलाकार की दृष्टि से पहचाने के लिये अनेक चित्रकारों द्वारा बनाये जाने के कारण चित्रसॅख्या देकर उन चित्रों की गुणवत्ता एवं लोकप्रियता को स्थान दिया गया।
बीकानेर के राजकीय संग्राहालय में सत्रहवी शताब्दी के शुरूआत में गीतगोविन्द पर आधारित चित्रों को आज भी सुरक्षित रखा गया है जिसमें गीतगोविन्द के उस प्रसंग को लिया है जिसमंें -’श्रीकृष्ण राधा के घर बरसाने गये हुये है जहाॅ खेलते खेलते अंधेरा होे जाता है तब नन्दबाबा कहते है कि देखों राधा बादल छा रहे है, अंधेरा हो गया है, कृष्ण को जंगलसे डर लगता है, रास्ते में तमाल के पेड़ों के कारण अंधेरा हो गया है तुम कृष्ण को घर पहुॅचा दो। कृष्ण आयु में राधा से छोटे है और राधा बड़ी है। राधा नंदबाबा के आदेश का पालन कर कृष्ण को घर पहुॅचाने निकल पड़ती है, रास्ते में प्रणयकेलि में दोनों निमग्न हो जाते है। इस दृश्य को चित्रकारने अपनी कूची से बनाकर अमर कर दिया। इस चित्र में नीचे यमुना जी प्रवाहित हो रही है, जल में मीन और पक्षी तैर रहे है, तट पर तमाल के पेड़ है। पाश्र्व में गोविन्द को बछड़ांें के साथ एक ग्वाला हाॅके जा रहा है। ऊपर पाश्र्व में दोनों और महल बनाये है जिसमें वाम पाश्र्व में राधा का तथा दक्षिण मंें कृष्ण का घर है। दोनों के मध्य सघन वृक्ष लगे है जिसके नीचे नन्द कृष्ण और राधा है। नन्द की वेशभूषा सत्रहवी सदी के राजस्थानी किसान की है, राधा घांघरा ओढ़नी पहने है, कृष्ण के मस्तिष्क पर मुकुट जैसी टोपी है। इस पूरे दृश्य को सूक्ष्मतम विवरण केसाथ चित्रकार ने उभारा है। दाहिनी पाश्र्वमें राधाकृष्ण प्रणय आलिंगन में चित्रित किये ये है। चित्र इतना भव्य एवं आकर्षक है जिसे देखते ही किसी की भी नजर उससे नहीं हटती।
पाकिस्तान के लाहौर संग्रहालय में श्रीकृष्ण राधा के अनेक दुर्लभ चित्र लोगों को आकर्षित करते है वहीं लंदन के विक्टोरिया एण्ड अलबर्ट म्युजियम में गीत गाविन्द पर आधारित 15 वीं सें 18 वी शदी के अनेक प्रथम दर्जे के उत्कृष्टतम चित्र इस संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे हैं। दिल्ली के नेशनल म्युजिम में अठारवी शताब्दी के दक्षिणी शैली के कृष्ण-गोपी चित्रों पर कापी लिखा जा चुका है। इन मोहक चित्रों में एक चित्र दुर्लभ है जिसमें एक सफेद गाय कृष्णके पावॅ अपनी जीभ से चाट रही है और बायें पाश्र्व में दो श्यामरंग की गायें ऊपर की ओर मुॅह उठाये है। इसमें कृष्ण और गोपियाॅ ब्रजपरिधानों से सुशोभित है। इसी प्रकार के अनेक श्रेष्ठ चित्र न्यूयार्क के मेट्रोपालिटन म्युजियम में रखा गया है जो 16 सौ ईसवी का गोवर्धन धारण का दुर्लभ बहुरंगी मनोरम चित्र है वहीं दूसरा दुर्लभ चित्र सत्रहवी सदी के दो चित्र है जो आसाम के है। कहते है अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों द्वारा देश के बहुमूल्य चित्र जो सार्वजनिक मंदिरों में आस्था के केन्द्र थे उन्हें सहित अनेक विरासतों के राजाओं के महल से निकलवाकर लंदन पहुॅचाया है जो उनकी धरोहर बने हुये है। इसके अलावा हमारे देश के अनेक भागों में, संग्रहालयों में देश की विभिन्न शैलियों के काष्टचित्र, कूचिका चित्र जिसमें रासलीला के विभिन्न प्रखर रंग और पात्रों की भूमिका अभिव्यक्त है वह देखने को मिल जायेंगे जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हमारे देश में देवी-देवताओं सहित, राधाकृष्ण सीताराम, शिवपार्वती, लक्ष्मी नारायण आदि के चित्रों का प्रकाशन ग्यारहवी शताब्दी के बाद शुरू हुआ तब तक इनकी मूर्तिपूजा को भी स्थान नहीं मिला था। बारहवी शताब्दी के बाद 18 वीं शताब्दी तक देवी देवताओं एवं भगवान के विभिन्न स्वरूपों-अवतारों के चित्रों के प्रकाश में आने के बाद उनका प्रिन्टिंग प्रेस के माध्यम से चित्रों के आधुनिक स्वरूप और ललित लीलाओं की परिकल्पनाओं को साकार करते प्रकाशन शुरू हुआ जो आज हमारी श्रद्धा और आस्था का प्रमुख स्थान पाकर व्यवसायिक स्वरूप ले चुका है जिसमें हम इन पूजनीय अवतारों-अंशों की भक्ति का प्रमाद तो करते है पर इन चित्रों को अपने पैरों तले रौंदने के लिये अखबारों में प्रकाशित कर उनका अपमान करने वाले भी हम ही है, जो इस दिशा में आॅखें बद कर धर्म की खुमारी में डूबे धर्म को रसातल में ले जाने का तत्पर है और हमारी दशा उस लकड़हारे जैसी बना ली है जो जिस डाल को काट रहा होता है, उसी डाल पर बैठकर कुल्हाड़ा चलाता है, परिणामस्वरूप वह डाल सहित जमीदोश हो जाता है। ऐसी स्थिति में यह विचारणीय है कि एक ओर ऐसे लोग है तो दूसरी और मूल चित्रकारी के स्वरूपों से भटके वे प्रिन्टिंग प्रेस वाले है जो राधा-कृष्ण के चित्रों को चित्रपट के कलाकारों के अभिनय में अपने अंगों की मादकता से गंदगी फैलाते है, वे भी ऐसे चित्र प्रकाशित करने धर्म और आस्था पर चोट पहुॅचाते है जो राधाकृष्ण के कामोद्दीपकताको व्यक्त करते हुये उनके हर अंग की मांसलता व्यक्त कर भोंड़ास्वरूप प्रस्तुत कर अपनी तिजौरिया भर रहे है, इनसे और बेबजह अखबारों छपवाकर पैरों से रोंदे जाने वालों से हमें अपने राधाकृष्ण,रामसीता सहित सभी स्वरूपों को मुक्त करना होगा तभी इन चित्रों को मन में आत्मसात कर भक्ति को सार्थक किया जा सकेगा, जो आज की पहली जरूरत है।

लव-ज़िहाद : एक वैश्विक समस्या

उत्तरप्रदेश सरकार ‘विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020’ लेकर आई है। स्वाभाविक है कि इसका आकलन-विश्लेषण सरकार के समर्थक और विरोधी अपने-अपने ढ़ंग से कर रहे हैं। योगी सरकार का कहना है कि  ‘बीते दिनों 100 से ज्यादा ऐसी घटनाएँ पुलिस-प्रशासन के सम्मुख आई थीं, जिनमें ज़बरन धर्म परिवर्तिन का मामला बनता था।’ इस नए अध्यादेश की धारा-3 में झूठ, छल-प्रपंच, कपटपूर्ण साधन, प्रलोभन देकर कराए जा रहे धर्म परिवर्तन को ग़ैर क़ानूनी घोषित किया गया है। उल्लेखनीय है कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी अन्य उपासना-पद्धत्ति का चयन करता है तो उस पर इस क़ानून में कोई आपत्ति नहीं  व्यक्त की गई है। सर्वविदित है कि धर्म परिवर्तन की घटनाओं में सक्रिय एवं संलिप्त विदेशी चंदे से चलने वाली धार्मिक संस्थाएँ आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर एवं वंचित समाज को ही अपना आसान शिकार बनाती हैं। इसलिए इस क़ानून के अंतर्गत महिलाओं, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के मामलों में धर्म परिवर्तन पर अधिक कठोर दंड के प्रावधान किए गए हैं। जहाँ धर्म-परिवर्तन के सामान्य मामलों में 5 साल की सजा और न्यूनतम 15000 रुपये के जुर्माने की व्यवस्था की गई है, वहीं महिलाओं एवं अनुसूचित जाति-जनजाति के संदर्भ में इसे बढ़ाकर 10 वर्ष और न्यूनतम 50,000 रुपये आर्थिक दंड रखा गया है। यह समाज के कमज़ोर एवं वंचित वर्ग की सुरक्षा के प्रति सरकार की प्रथमिकता एवं प्रतिबद्धता का परिचायक है।
पिछले कुछ दशकों में धार्मिक पहचान छिपाकर अंतर्धार्मिक विवाहों के अनगिनत मामले शासन-प्रशासन के संज्ञान में आते रहे हैं। इसके कारण समाजिक सौहार्द्र का वातावरण बिगड़ता रहा है। सांप्रदायिक हिंसा की संभावनाएँ पैदा होती रही हैं, न्यायालयों के समक्ष विधिसंगत जटिलताएँ खड़ी होती रही हैं। इसलिए इस अध्यादेश में इन समस्याओं के समाधान के लिए भी ठोस एवं निर्णायक पहल की गई है। इसकी धारा-6 के अंतर्गत पीड़ित पक्ष न्यायालय को प्रार्थना-पत्र देकर ऐसे विवाह को निरस्त करा सकता है। और यह अधिकार सभी धर्मों के स्त्री-पुरुषों को समान रूप से दिया गया है। भय, धोखा, प्रलोभन या धमकी जैसे तत्त्वों को समाप्त करने के लिए इसकी धारा-8 में निर्देशित किया गया है कि धर्म परिवर्तन करने वाले हर व्यक्ति को कम-से-कम 60 दिन पूर्व जिला न्यायाधीश को सूचना देनी होगी। उसमें उसे शपथपत्र देकर यह घोषणा करनी पड़ेगी कि वह बिना किसी बाहरी दबाव के धर्म परिवर्तन कर रहा है। जिला न्यायाधीश प्रस्तुत साक्ष्यों एवं प्रमाणों के आधार पर यह सुनिश्चित कर सकेंगें कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा एवं स्वतंत्र सहमति से किया गया है। सोचने वाली बात है कि धर्म परिवर्तन करने वाला यदि स्वेच्छा से किसी अन्य धर्म को स्वीकार करता है तो उसे इस प्रकार की सूचना या साक्ष्य प्रस्तुत करने में क्यों कर आपत्ति होनी चाहिए? वैसे तो उत्तरप्रदेश सरकार की यह क़ानूनी पहल स्वागत योग्य है, क्योंकि यह सभी मतावलंबियों को समान रूप से किसी धर्म को मानने या दूसरे धर्म को अपनाने की पारदर्शी-विधिसम्मत प्रक्रिया सुनिश्चित करती है। पर नेपथ्य  में धर्म-परिवर्तन का खेल खेलने वाले और उसके आधार पर थोक में विदेशी धन पाने वालों के पेट में अध्यादेश आते ही मरोड़ें आने लगी हैं। वे धर्म-परिवर्तन और लव-ज़िहाद को गंभीर मामला मानने को ही तैयार नहीं हैं। बल्कि उनमें से कई तो इसे संघ-भाजपा एवं हिंदुत्ववादी संगठनों का एजेंडा और दुष्प्रचार तक बता रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि लव-ज़िहाद का मामला सबसे पहले दिग्गज वामपंथी नेता वी.एस अच्युतानंदन ने आज से दस वर्ष पूर्व उठाया था। फिर केरल के ही काँग्रेसी मुख्यमंत्री ओमान चांडी ने उसकी पुष्टि करते हुए 25 जून, 2012 को विधानसभा में बताया कि गत छह वर्षों में प्रदेश की 2,667 लड़कियों को इस्लाम में धर्मांतरित कराया गया। बल्कि केरल के ही उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के टी शंकरन ने  2009 में लव-ज़िहाद पर सुनवाई करते हुए यह माना कि झूठी मुहब्बत के जाल में फँसाकर धर्मांतरण का खेल केरल में संगठित और सुनियोजित रूप से वर्षों से चलता रहा है। इतना ही नहीं कैथोलिक बिशप कॉउंसिल, सीरो मालाबार चर्च जैसी तमाम ईसाई संस्थाएँ भी लव-ज़िहाद पर चिंता जताती रही हैं। इसी वर्ष 15 जनवरी को कार्डिनल जॉर्ज ऐलनचैरी की अध्यक्षता वाली पादरियों की एक संस्था ने दावा किया था कि बड़ी संख्या में राज्य की ईसाई महिलाओं को लुभाकर इस्लामिक स्टेट एवं आतंकवादी गतिविधियों में धकेला जा रहा है। वे लव-ज़िहाद को कपोल-कल्पना नहीं, वास्तविकता मानते हैं और वहाँ की पुलिस रिपोर्ट के आधार पर उसके साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। तमाम सुरक्षा एवं जाँच एजेंसियाँ भी इन अंतर्धार्मिक विवाहों को संदेह एवं षड्यंत्र से मुक्त नहीं मानतीं। उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, राजस्थान उच्च न्यायालय भी अलग-अलग समयों पर यह कह चुका है कि विवाह के संदर्भों में ज़बरन धर्मांतरण रोका जाना चाहिए। 30 अक्तूबर 2020 को तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय देते हुए टिप्पणी की थी कि ”विवाह से धर्म परिवर्तन का कोई सरोकार नहीं है। जब धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को जिस धर्म को वह अपनाने जा रहा है, उसके मूल सिद्धांतों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है, न उसकी मान्यताओं और विश्वासों के प्रति कोई आस्था है, तो फिर धर्म परिवर्तन का क्या औचित्य?” न्यायालय के समक्ष ऐसी पाँच याचिकाएँ थीं, जिनमें केवल विवाह के लिए धर्म परिवर्तन किया गया था? और जिन भोली-भाली लड़कियों ने धोखे या बरगलाए जाने पर इस्लाम क़बूल कर लिया था, उन्हें इस धर्म के बारे में सामान्य जानकारी तक नहीं थी। और यह केवल इकलौता मामला हो ऐसा नहीं है, ऐसे मामले देश के हर राज्यों की अदालतों और पुलिस-प्रशासन की फ़ाइलों और रिपोर्टों में दर्ज हैं। 2019-20 में केवल कानपुर जिले में एसआईटी को सौंपे गए लव-ज़िहाद के 14 मामलों में से 11 में धोखाधड़ी, धार्मिक पहचान छुपाने, ग़ैर मुस्लिम नाबालिग लड़कियों को बहला-फुसलाकर पहले शादी, फिर यौन-शोषण करने जैसी बातें सामने आईं। ऐसे में इसे किसी संगठन या दल विशेष का दुष्प्रचार मात्र मानना तो हास्यास्पद ही है।
लव ज़िहाद के बढ़ते मामलों को देखते हुए उत्तरप्रदेश के बाद अब हरियाणा, हिमाचल, मध्यप्रदेश, असम, कर्नाटक, गुजरात आदि की सरकारें भी  कठोर क़ानून लाने की तैयारी कर रही हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने तो लव-जिहाद और सामूहिक धर्म परिवर्तन जैसे मामलों में और कठोर दंड के प्रावधान के संकेत दिए हैं। आश्चर्य है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य दलों के नेताओं ने भी लव-ज़िहाद के विरुद्ध क़ानून लाए जाने का विरोध किया है। और उससे भी अधिक आश्चर्य इस बात का है इस देश में बुद्धिजीवी एवं सेकुलर समझा जाने वाला एक ऐसा धड़ा है जो यों तो ऐसे मामलों में तटस्थ दिखने का अभिनय करता है पर जैसे ही कोई सरकार इसके विरुद्ध क़ानून लाने की बात कहती है, जैसे ही कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन साजिशन अंजाम दी गई ऐसी शादियों के विरोध में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, वह अचानक सक्रिय हो उठता है। क़ानून की बात सुनते ही इन्हें सेकुलरिज्म की सुध हो आती है, संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार याद आने लगते हैं, निजता के सम्मान-सरोकार की स्मृतियाँ जगने लगती हैं।क़ानून लाने की सरकार की घोषणा सुनते ही मौन साधने की कला में माहिर ये तबका पूरी ताक़त से मुखर हो उठता है। जिन्हें लव ज़िहाद के तमाम मामलों को देखकर भी कोई साज़िश नहीं नज़र आती, कमाल यह कि उन्हें सरकार की मंशा में राजनीति जरूर नज़र आने लगती है। लव-ज़िहाद के विरुद्ध की गई सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों की प्रतिक्रिया में कट्टरता और संकीर्णता अवश्य दिख जाती है। फिर वे अपने तरकश से अजब-गज़ब तर्कों के तीर निकालना प्रारंभ कर देते हैं। मसलन- क़ानून बनाने से क्या होगा? क्या पूर्व में बने क़ानूनों से महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध कम हो गए, जो अब हो जाएँगें? क्या अन्य किसी कारण से महिलाओं पर ज़ुल्म-ज़्यादती नहीं होती? क्या अब सरकारें दिलों पर भी पहरे बिठाएगी? क्या प्यार को भी मज़हब की सरहदों में बाँधना उपयुक्त होगा? क्या दो वयस्क लोगों के निजी मामलों में सरकार का हस्तक्षेप उचित होगा, आदि-आदि? 
सवाल यह है कि यदि आसाम, गुजरात, कर्नाटक हरियाणा, हिमाचल,  उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश की सरकार अपने राज्य की आधी आबादी की सुरक्षा के लिए कोई क़ानून लाना चाहती है तो उसे लाने से पहले ही पूर्वानुमान लगा लेना, उन पर हमलावर हो जाना या उसमें राजनीति ढूँढ़ लेना कितना उचित है? क़ानून का तो आधार ही समाज में प्रचलित झूठ और फ़रेब के धंधे पर अंकुश लगाना होता है। पीड़ित को न्याय दिलाना और दोषियों को दंड देना होता है। क्या एक चुनी हुई सरकार का अपने राज्य की बहन-बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु पहल करना उचित और स्वागत योग्य कदम नहीं है? क्या लव-ज़िहाद के कारण उत्पन्न  विवाद और विभाजन के कारणों को दूर कर उनके समाधान के लिए निर्णायक पहल और प्रयास करना सरकार का उत्तरदायित्व नहीं है? क्या क्षद्म वेश में बदले हुए नाम, पहचान, वेश-भूषा, चाल, चेहरा, प्रतीकों के साथ किसी को प्रेमजाल में फँसाना धूर्त्त एवं अनैतिक चलन नहीं? रूप बदलने में माहिर इन मारीचों का सच सामने आने पर क्या ऐसे प्रेम में पड़ी हुई युवतियाँ या विवाहित स्त्रियाँ स्वयं को ठगी-छली महसूस नहीं करतीं? क्या ऐसी स्थितियों में उन्हें अपने सपनों का घरौंदा टूटा-बिखरा नहीं प्रतीत होता? क्या छल-क्षद्म की शिकार ऐसी विवाहित या अविवाहित स्त्रियों को न्याय आधारित गरिमायुक्त जीवन जीने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? और उससे भी अच्छा क्या यह नहीं होगा कि वे प्रपंचों एवं वंचनाओं की शिकार ही न हों, अतः ऐसी पहल एवं प्रयासों में क्या बुराई है? जो दल या बुद्धिजीवी क़ानून लाने की सरकार की इस पहल या निर्णय के विरुद्ध खड़े हैं, वे जाने-अनजाने महिलाओं के हितों, जीवन व भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि एक ऐसे दौर में जबकि तमाम बुद्धिजीवी बहुसंख्यक समाज की स्त्रियों पर हो रहे कथित अत्याचार, असमानता, भेद-भाव आदि पर तथाकथित एक्टिविस्टों के स्वर में स्वर मिलाते हों, स्त्री सशक्तिकरण, स्त्री-स्वतंत्रता, स्त्री-अधिकारों आदि की बातें बड़े जोर-शोर से करते हों, प्रायः अंतर्धार्मिक विवाहों के संदर्भ में स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार या स्त्रियों के ज़बरन धर्म परिवर्तन कराए जाने को लेकर मौन साध लेते हैं। और तो और नारीवादियों के मुख से भी इस मुद्दे पर विरोध का एक स्वर नहीं निकलता!
कथित उदार-धर्मनिरपेक्ष (लिबरल-सेकुलर) बुद्धिजीवी विवाह को दो वयस्कों का निजी मसला बताकर प्रायः लव-जिहाद का बचाव करते हैं या अंतर्धार्मिक विवाहों की पैरवी करते हैं। पर बड़ी चतुराई से वे यह छुपा जाते हैं कि यदि यह निजी मसला है तो बीच में मज़हब कहाँ से आ जाता है? क्यों लड़की या लड़के पर मज़हब बदलने का दबाव डाला जाता है? संगीतकार वाज़िद खान की पारसी पत्नी कमलरुख का मामला तो अभी अधिक पुराना भी नहीं हुआ! जो लोग इसे मोहब्बत करने वाले दो दिलों का मसला मात्र बताते हैं, वे यह क्यों नहीं बताते कि ये कैसी मोहब्बत है जो मज़हब बदलने की शर्त्तों पर की जाती है? प्यार यदि धड़कते दिलों और कोमल एहसासों का दूसरा नाम है तो इसमें मज़हब या मज़हबी रिवाज़ों-रिवायतों का क्या स्थान और कैसी भूमिका? चूँकि अंतर्धार्मिक सभी विवाहों में जोर धर्म बदलवाने पर ही होता है, इसलिए इसे लव-ज़िहाद कहना सर्वथा उचित एवं तर्कसंगत है। जैसे सशस्त्र ज़िहाद आज पूरी दुनिया के लिए एक वैश्विक समस्या है वैसे ही लव-ज़िहाद। इस पर अंकुश लगाना सरकारों की जवाबदेही भी है और जिम्मेदारी भी।

गृहस्थ-परंपरा के परिव्राजक/संत थे- माधव गोविंद वैद्य उपाख्य बाबूराव वैद्य

प्रणय

निःसंदेह संघ कार्य को विस्तार एवं व्यापकता देने में परिव्राजक परंपरा के  प्रचारकों का अभूतपूर्व योगदान रहा है। आज के घोर भौतिकतावादी युग में अपना घर-परिवार छोड़कर भारत के गाँव-नगर-प्रांत, खेत-खलिहान, कूल-कछारों की धूलि भरी, टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियाँ नापना कोई आसान काम नहीं। संघ-कार्य को आज जैसी स्वीकार्यता मिली है, वैसी तब कहाँ थीं! तपोनिष्ठ प्रचारकों को तब अपने चरित्र एवं आचरण, ध्येय एवं निष्ठा से ही कार्यक्षेत्र में अनुकूल स्थितियाँ निर्मित कर लोगों के हृदय में स्थान बनाना पड़ता था और  चना-चबेना, रूखा-सूखा खाकर जीवन व्यतीत करना पड़ता था। न दिन का ठिकाना, न रात की चैन; न खाने की सुध, न सोने की चिंता; हर क्षण, हर पल बस एक ही धुन, एक ही लगन कि हिंदू-समाज का संगठन करना है, राष्ट्रीय विचारों को आगे बढ़ाना है, भारत प्रथम, राष्ट्र सर्वोपरि के भाव को परिपुष्ट करना है, भारत को परम वैभव के सिंहासन पर आरूढ़ करना है। ध्यान रहे- समाज का संगठन, समाज में संगठन नहीं। माधव गोविंद वैद्य उपाख्य बाबूराव जी वैद्य प्रचारक श्रेणी के ही गृहस्थ कार्यकर्त्ता थे। वैसे भी आद्य सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार संघ को ऐसे तपोनिष्ठ गृहस्थ कार्यकर्त्ताओं का ही संगठन मानते थे। वे गृहस्थ कार्यकर्त्ताओं के त्याग एवं समर्पण को अधिक महत्त्व प्रदान करते थे। उनका कहना था कि घर-परिवार में रहते हुए सामाजिक एवं राष्ट्रीय सरोकारों और दायित्वों का निर्वहन अधिक दुष्कर एवं परिश्रमसाध्य है। पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों के मध्य संतुलन स्थापित करना एक साधना है। महान भारतवर्ष की निर्गुण संत-परंपरा भी तो यही है। संन्यासी बनने के लिए घर छोड़ने की तुलना में स्वार्थ और सुविधाओं का मोह छोड़ना अधिक मायने रखता है। यों ही नहीं कहा जाता कि राजा भी मन से संन्यासी हो सकता है और संन्यासी भी मन से भोगी हो सकता है। मा.गो.वैद्य मन से संन्यासी थे। उनका पूरा जीवन समाज, राष्ट्र एवं मानवता को समर्पित था।
मा.गो वैद्य उपाख्य बाबूराव जी ने गृहस्थ होते हुए भी संघ द्वारा सौंपे गए दायित्वों का कितना सुंदर-सार्थक निर्वहन किया! वे स्वयंसेवकों एवं कार्यकर्त्ताओं के लिए आदर्श दृष्टांत थे। उन्होंने न केवल अपना जीवन संघ-समाज को समर्पित किया, अपितु अपने दो-दो पुत्रों को भी संघ-सरिता एवं प्रचारक-परंपरा की सतत-अविरल धारा का हिस्सा बनाया। समाज में पर उपदेश कुशल बहुतेरे के उदाहरण बहुत देखने को मिलते हैं। त्याग और नैतिकता के मापदंड प्रायः अपने लिए अलग और औरों के लिए अलग होते हैं। आयु के आधार पर आकलित करें तो उनकी आयु लगभग संघ-आयु के समकक्ष ठहरती है। उन्होंने संघ को आद्य सरसंघचालक से लेकर वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत तक पलते-बढ़ते, विकसित होते देखा। वे अकेले ऐसे कार्यकर्त्ता एवं अधिकारी थे जिन्हें छहों सरसंघचालकों के साथ कार्य करने का दुर्लभ अवसर प्राप्त था। इसीलिए वे न केवल संघ की विचारधारा और रीति-नीति को स्वयं हृदयंगम करने में सफल रहे, अपितु उसे रचने-गढ़ने एवं सरल भाषा में दूसरों तक पहुँचाने में भी उनका कोई सानी नहीं। उनकी मेधा एवं कुशाग्रता इतनी तीक्ष्ण थी कि दसवीं से लेकर परास्नातक तक की सारी परीक्षाएँ उन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थीं। नागपुर में मिशनरी शिक्षण-संस्थान हिस्लॉप कॉलेज में प्राध्यापक रहते हुए भी उन्होंने संघ-कार्य से कोई समझौता नहीं किया। एक तरफ शिक्षण की पृष्ठभूमि, संघ कार्य में सक्रिय एवं प्रत्यक्ष सहभागिता तो दूसरी तरफ संघ के मुखपत्र समझे जाने वाले नागपुर के तरुण भारत में संपादक का गुरुतर उत्तरदायित्व। ऐसे चुनौतीपूर्ण दायित्वों के निर्वाह ने उनके व्यक्तित्व को माँजा-चमकाया एवं ऐसी ऊँचाई प्रदान की कि  वे संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख एवं प्रथम प्रचार प्रमुख बने। बल्कि 1994 में विवादित ढाँचे के विध्वंस के पश्चात मीडिया एवं आम जनता के भ्रम एवं शंकाओं के निवारण हेतु संघ-नेतृत्व ने पहली बार जब प्रवक्ता जैसे पद (दायित्व) की आवश्यकता महसूस की तो उसे माधव गोविंद वैद्य ही इस उत्तरदायित्व के लिए सर्वाधिक उपयुक्त पात्र नज़र आए। उन्होंने इस उत्तरदायित्व का बख़ूबी निर्वाह किया। उस दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय सेना दोनों को मीडिया फ्रेंडली नहीं समझा जाता था। यह वह दौर था जब संघ के आनुषांगिक संगठनों में से एक भाजपा आधी-अधूरी सत्ता में आई थी। संघ के तमाम अन्य आनुषांगिक संगठनों की भी सरकार से बड़ी अपेक्षाएँ थीं। विपक्षी दल के उटपटांग हमलों और मीडिया के तीखे सवालों से लगभग हर रोज संघ को दो-चार होना पड़ता था, ऐसे में मा.गो.वैद्य जी के संतुलित एवं सारगर्भित उत्तर समाधनपरक होते थे। उनका सम्यक एवं संतुलित वक्तव्य विवाद से संवाद और संवाद से सहमति तक का पथ प्रशस्त करता था।
माधव गोविंद वैद्य उपाख्य बाबूराव वैद्य जी का जीवन न केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए अपितु सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले सभी लोगों के लिए प्रेरणादाई हो सकता है। उनका अध्ययनशील-अध्यवसायी मन, तार्किक-बौद्धिक प्रकृति,  संयमित-संतुलित व्यवहार एवं वाणी, वाकपटुता एवं प्रत्युत्पन्नमति  – सब अनुकरणीय है। बल्कि सबसे पहले तो उन स्वयंसेवकों को उनके चिंतन-मनन-लेखन-स्वाध्याय आदि से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए, जिनकी लिखने-पढ़ने में रुचि इन दिनों बहुत कम हो चली है। साधना एवं स्वाध्याय के बिना समाज में सार्थक भूमिका या बदलाव का वाहक बन सकना कदापि संभव नहीं। बाबूराव जी के ऋषि तुल्य व्यक्तित्व के अवसान से उत्पन्न रिक्तता को भर पाना तो कदाचित कठिन होगा, पर उनके राष्ट्रीय एवं कल्याणकारी विचार सभी देशवासियों को पाथेय प्रदान करते रहेंगें। महान पुरुष या मनीषी राष्ट्र की सामूहिक स्मृतियों एवं चेतना में सदैव जीवित रहते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश (भैया) जोशी एवं सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत जी के शब्दों में- ” श्रीमान माधव गोविंद उपाख्य बाबूराव वैद्य के शरीर छोड़ने से हम सब संघ के कार्यकर्त्ताओं ने अपना एक वरिष्ठ छायाछत्र खो दिया है। संस्कृत के प्रगाढ़ विद्वान, उत्तम पत्रकार, विधान परिषद के सक्रिय सदस्य, उत्कृष्ट साहित्यिक, ऐसी सारी बहुमुखी प्रतिभा के धनी, बाबूराव जी ने यह सारी  गुणसंपदा संघ में समर्पित कर रखी थी। वे संघ कार्य विकास के सक्रिय साक्षी रहे।” 

आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लागू करने में अब राज्यों को भी निभानी होगी अपनी भूमिका

विश्व में फैली कोरोना महामारी के बाद अब जब अन्य कई देश अपने बाज़ारों को पुनः खोलने की ओर अग्रसर हो रहे हैं, ऐसे में भारत के लिए, वैश्विक स्तर पर आर्थिक क्षेत्र में अपने योगदान को यदि बढ़ाना है तो, आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को तेज़ी से लागू करना अब ज़रूरी हो गया है। विश्व के लगभग सभी देशों ने इस दौरान यह महसूस किया है कि विदेशी व्यापार के लिए चीन पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता किसी भी देश के लिए ठीक नहीं है। अतः अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सप्लाई चैन में भारत के लिए अपनी भूमिका बढ़ाने का सुअवसर निर्मित हुआ है। इसका पूरा फ़ायदा भारत द्वारा उठाया जाना चाहिए।

यूं तो “ईज़ आफ डूइंग बिज़नेस” की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भारत ने, केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए आर्थिक सुधार कार्यक्रम के दम पर, काफ़ी सुधार किया है एवं यह वर्ष 2014 की 142 की रैंकिंग से बहुत आगे बढ़कर 2019 में 63वें स्थान पर आ गई है। परंतु, अभी भी यदि भारत को विश्व के प्रथम 25 देशों में अपनी जगह बनाना है तो अब राज्य सरकारों को भी अपने स्तर पर कई सुधार कार्यक्रमों को लागू करना होगा। 10 मदों में से मुख्यतः 5 मदों, यथा, पूंजी बाज़ार में निवेशकों के हित सुरक्षित रखने (13), बिजली के लिए मंज़ूरी लेने (22), ऋण स्वीकृत करने (25), निर्माण कार्य हेतु मंज़ूरी प्राप्त करने (27), एवं दिवालियापन के मुद्दों को सुलझाने (52) में भारत की रैंकिंग में काफ़ी सुधार होकर वैश्विक स्तर पर प्रथम 50 देशों की श्रेणी में शामिल हो गए हैं। परंतु, शेष अन्य 5 मदों, यथा अनुबंध पत्रों को लागू करने (163), प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री करने (154), नया व्यवसाय प्रारम्भ करने (136), टैक्स सम्बंधी मुद्दे सुलझाने (115), एवं विदेशी व्यापार करने (68) में अभी भी हम वैश्विक स्तर पर अन्य देशों से काफ़ी पिछड़े हुए हैं। मदों के नाम के आगे भारत की वर्ष 2019 की रेकिंग दी गई है। एक अनुमान के अनुसार, भारत में “ईज़ आफ डूइंग बिज़नेस” में सुधार के लिए अब 60 प्रतिशत से ज़्यादा काम राज्य स्तर पर करने होंगे। केंद्र सरकार तो लगातार आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लागू कर रही है। साथ ही, कुछ राज्य भी इस क्षेत्र में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं जैसे, आंध्र प्रदेश “ईज़ आफ डूइंग बिज़नेस” के मानदंडों में देश में प्रथम स्थान पर है, जबकि उत्तर प्रदेश, द्वितीय स्थान पर एवं तेलंगाना, तृतीय स्थान पर है। साथ ही, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड ने भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी रैंकिंग में बहुत सुधार किया है। बाक़ी प्रदेशों विशेष रूप से पूर्वी राज्यों एवं उत्तर पूर्वी राज्यों को भी अब आगे आना होगा।

उक्त कारणों के चलते ही भारत में विभिन्न राज्यों के बीच सकल घरेलू उत्पाद में विकास की दर में बहुत अंतर है, विशेष रूप से औद्योगिक उत्पादन की दर में। गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु औद्योगिक दृष्टि से विकसित राज्यों की श्रेणी में गिने जाते हैं। अब उत्तर प्रदेश भी तेज़ी से इस मानचित्र पर उभर रहा है। परंतु, कुछ अन्य राज्यों में औद्योगिक वृद्धि दर तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। इस कारण से इन राज्यों में रोज़गार के अवसर निर्मित नहीं हो पा रहे हैं। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान मात्र 16 प्रतिशत ही बना हुआ है और यह बहुत प्रयास के बाद भी आगे नहीं बढ़ पा रहा है। अब देश के सामने एक अवसर आया है, यदि राज्य सरकारें इस क्षेत्र में आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू करने में सफल हो जाती हैं तो कई बड़ी कम्पनियों को अपनी उत्पादन इकाईयों को भारत के इन राज्यों में स्थापित करने में आसानी होगी।   

हमारे देश में बिजली, कृषि, जल आपूर्ति, शिक्षा, आदि अन्य कई क्षेत्र राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं अतः इन सभी क्षेत्रों में सुधार कार्यक्रम लागू करने के लिए राज्य सरकारों को ही निर्णय लेने होंगे। अब समय आ गया है जब राज्य सरकारों को अपना ध्यान अन्य बातों से हटाकर आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लागू करने में लगाना होगा। जब तक “ईज़ आफ डूइंग बिज़नेस” की वैश्विक रैंकिंग में भारत अपनी रैंकिंग में सुधार नहीं कर पाता है तब तक देश में निजी क्षेत्र से पूंजी निवेश भी नहीं बढ़ पाएगा। निजी क्षेत्र से पूंजी निवेश के बग़ैर केवल सरकार अपने ख़र्चों से देश की अर्थव्यवस्था को कब तक विकास के पथ पर बनाए रख सकती है। इसकी भी दरअसल कई प्रकार की सीमायें हैं। निजी क्षेत्र को भी अब अपना पूंजी निवेश देश में बढ़ाना अनिवार्य हो गया है, साथ ही विदेशी निवेश भी देश में प्रोत्साहित करना अब आवश्यक होगा, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सप्लाई चैन में भारत की स्थिति को मज़बूत किया जा सके। इससे देश में न केवल आर्थिक विकास को गति मिलेगी बल्कि रोज़गार के नए अवसरों का सृजन भी होगा।

कोरोना वायरस महामारी के बाद तो दुनिया भर के देशों के सामने अलग अलग रास्ते खुले हुए हैं। भारत किस तरीक़े से अपने आपको इसके केंद्र में ला सकता है, यह भारत के लिए एक अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए। देश में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में आधारिक संरचना विकसित करने के लिए निवेश बढ़ाया जा सकता है, जिसका अर्थव्यवस्था पर चहुमुखी असर होगा। कृषि क्षेत्र, श्रम क्षेत्र, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाईयों की परिभाषा में परिवर्तन आदि कई सुधार कार्यक्रम केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में लागू किए गए हैं, एवं अन्य कई क्षेत्रों में भी सुधार कार्यक्रम लागू किए जाने पर काम तेज़ी से किया जा रहा है जिनका देश के आर्थिक विकास पर दूरगामी परिणाम होगा। परंतु, राज्य सरकारों के लिए भी उक्त वर्णित क्षेत्रों तथा उनके कार्य क्षेत्र में आने वाली अन्य विभिन्न मदों में सुधार कार्यक्रम लागू किए जाने की महती आवश्यकता बन पड़ी है।  

पृथिवी आदि लोकों का आकाश में भ्रमण का सिद्धान्त वेदों की देन है

मनमोहन कुमार आर्य

                महर्षि दयानन्द ने ईश्वर प्रदत्त ज्ञान चार वेदों की भूमिका स्वरूप जिस ग्रन्थ का निर्माण किया है उसका नाम है ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’। इस ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द जी ने चार वेदों के मन्त्रों के प्रमाणों से अनेक ज्ञान विज्ञ़़ान से युक्त विषयों को प्रस्तुत किया है। सृष्टि विद्या विषय भी इस ग्रन्थ में सम्मिलित है। इस प्रकरण सहित आधुनिक ज्ञान विज्ञान के कुछ अन्य विषय भी इस ग्रन्थ में सम्मिलित हैं। ऋषि दयानन्द की मान्यता है कि वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है और सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेदों के इस महत्व के कारण ही वह इन्हें सब मनुष्यों का प्रमुख धर्म ग्रन्थ मानने के साथ इसका सभी के लिये पढ़ना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना अनिवार्य व परमधर्म मानते हैं। परम धर्म मनुष्य का परम कर्तव्य होता है। इस कारण से सब मनुष्यों को किसी भी ग्रन्थ का अध्ययन करने से पूर्व व अध्ययन करते हुए निष्पक्ष भाव से ईश्वरीय ज्ञान होने के कारण वेदों का अध्ययन भी करना चाहिये। इससे मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। मनुष्य की अविद्या दूर हो जाती है। वह ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति व सृष्टि के यथार्थ स्वरूप को जान लेता है। ऐसा होने पर वह भ्रम व शंका आदि से ग्रस्त नहीं होता। उसका पूरा जीवन सद्ज्ञान से युक्त होकर सद्कर्मों को करते हुए व्यतीत होता है जिससे उसके पूरे जीवन में सुख, शान्ति व सन्तोष रहता है। वह कभी निराश नहीं होता और न ही उसे मिथ्या ज्ञान से युक्त ग्रन्थों को पढ़ने व उनका आचरण करने का दुःख व क्षोभ होता है। वेदाध्ययन व वेदाचारण से ही मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष प्राप्त होते हैं। मनुष्य का इहलोक व परलोक दोनों सुधरते हैं। हमारा यह जीवन हमारे पुनर्जन्म का आधार व कारण है। हमारा यह जन्म जितना ज्ञान व सद्कर्मों से युक्त होगा, उतनी ही अधिक मात्रा में हमारी परजन्मों में उन्नति होगी और हमें उसके अनुरूप ही सुख आदि भी प्राप्त हांेगे। अतः वेदों की शरण में आकर मनुष्य अपने जीवन का सुधार कर सुख व शान्ति प्राप्त करने सहित परम आनन्द से युक्त मोक्ष के पथिक बन सकते हैं।

                महर्षि दयानन्द ने अपने ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में वेदों के आधार पर पृथिवी आदि लोकों के भ्रमण का विषय भी प्रस्तुत किया है। इस प्रकरण में उन्होंने यजुर्वेद एवं ऋग्वेद के मन्त्रों के आधार पर विषय को प्रस्तुत किया है और प्रमाणों के साथ हिन्दी भाषा में वेदनिहित ज्ञान को प्रस्तुत किया है। यहां हम ऋषि द्वारा प्रस्तुत विषय को प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं पृथिवी आदि लोक घूमते हैं वा नहीं, इस विषय में लिखा जाता है। वह कहते हैं कि यह सिद्धान्त है कि वेदशास्त्रों के प्रमाण ओर युक्ति से भी पृथिवी और सूर्य आदि सब लोक घूमते हैं। यहां घूमने का अर्थ भ्रमण करना व सूर्य आदि ग्रहों की परिक्रमा करना है। इस विषय में वेदों में जो वर्णन मिलता है उसके अनुसार पृथिवी, सूर्य, चन्द्रमादि लोकों को ‘गौ’ कहा जाता है। ये सब अपनी परिधि में, अन्तरिक्ष के मध्य में सदा घूते रहते हैं परन्तु जो जल है, सो पृथिवी की माता के समान है क्योंकि पृथिवी जल के परमाणुओं के साथ अपने परमाणुओं के संयोग से ही उत्पन्न हुई है और मेघमण्डल के जल के बीच में गर्भ के समान सदा रहती है और सूर्य उसके पिता के समान है। इससे सूर्य के चारों ओर पृथिवी घूमती है। इसी प्रकार सूर्य का पिता वायु और आकाश माता के समान है। चन्द्रमा का अग्नि पिता और जल माता के समान हैं। उनके प्रति वे घूमते वा परिक्रमा करते हैं। इसी प्रकार से सब लोक लोकान्तर अपनी अपनी कक्षा में सदा घूमते हैं। ऋषि बताते हैं कि सूत्रात्मा जो वायु है उसके आधार और आकर्षण से सब लोकों का धारण और भ्रमण होता है। परमेश्वर अपने सामथ्र्य से पृथिवी आदि सब लोकों का धारण, भ्रमण और पालन कर रहा है।

                ऋग्वेद मन्त्र ‘या गौर्वत्र्तनिं पर्येति निष्कृतं पयो दुहाना व्रतनीरवारतः। सा प्रबु्रवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशद्धविषा विवस्वते।।’ में परमात्मा ने लोकों के भ्रमण के विषय में बताया है। गौ नाम का अभिप्राय यह है कि जिनके लिये यह गौ शब्द प्रयोग में आया है वह लोक अपने अपने मार्ग में घूमता और पृथिवी अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर घूमती है अर्थात् परमेश्वर ने जिस जिस के घूमने के लिए जो मार्ग निष्कृत अर्थात् निश्चय किया है उस उस मार्ग में सब लोक घूमते हैं। वह गौ अनेक प्रकार के रस, फल, फूल, तृण और अन्नादि पदार्थों से सब प्राणियों को निरन्तर पूर्ण करती है तथा अपने अपने घूमने के मार्ग में सब लोक सदा घूमते घूमते नियम ही से प्राप्त हो रहे हैं। जो विद्यादि उत्तम गुणों का देनेवाला परमेश्वर है, उसी के जानने के लिये सब जगत् दृष्टान्त है और जो विद्वान् लोग हैं उनको उत्तम पदार्थों के दान से अनेक सुखों को भूमि देती और पृथिवी, सूर्य, वायु और चन्द्रमादि गौ ही सब प्राणियों की वाणी का निमित्त भी हैं।

                ऋग्वेद का मन्त्र है ‘त्वं सोम पितृभिः संविदानोऽनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ। तस्मै त इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्।’ इस मन्त्र में ईश्वर ने उपदेश किया है चन्द्रलोक पृथिवी के चारों ओर घूमता है। कभी कभी सूर्य और पृथिवी के बीच में आ जाता है। इस मन्त्र का उपदेश करते हुए ऋषि दयानन्द कहते हैं कि द्यौः नाम प्रकाश करने वाले सूर्य आदि लोक और जो प्रकाशरहित पृथिवी आदि लोक हैं, वे सब अपनी अपनी कक्षा में सदा घूमते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि सब लोक आकाश में भ्रमण करते हैं।  वेदों से हमें जो ज्ञान प्राप्त हुआ व हो रहा है वही बात विज्ञान से भी ज्ञात होती है। महाभारत युद्ध के बाद वेदों का लोप होने से ज्ञान व विज्ञान की उन्नति प्रभावित हुई थी। संसार में वर्तमान समय में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं। सबके अपने अपने ग्रन्थ हैं। शायद ही किसी ग्रन्थ में लिखा हो कि पृथिवी सहित जितने लोक लोकान्तर विद्यमान हैं वह सब गतिशील हैं एवं आकाश में भ्रमण कर रहे हैं। अनेक ग्रन्थों में विज्ञान की सत्य बातों के विपरीत वर्णन व कथन देखने को मिलते हैं। इतिहास में ऐसे भी उदाहरण है कि जिस वैज्ञानिक ने प्रथम पृथिवी को गोल कहा था उसे मत विशेष के लोगों व आचार्यों ने प्रताड़ित किया था। यदि संसार के लोग मत-मतान्तरों की अविद्या में न फंसे होते और वेदों का अध्ययन करते तो संसार में ज्ञान व विज्ञान का प्रकाश रहता और इससे हमारे जो पूर्वज अतीत में अज्ञान व अन्धविश्वासों में अपना जीवन व्यतीत कर गये हैं, वह अज्ञानता के दुःख से बच जाते। ऋषि दयानन्द (1825-1883) की कृपा हुई कि उन्होंने सत्य की खोज व उससे मानने व मनवाने का अपने जीवन का मिशन बनाया और मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त बातों को स्वीकार न कर सत्य की खोज की। आज का युग ज्ञान व विज्ञान पर आधारित है। सर्वत्र उन्नति देखने को मिलती है परन्तु आज भी मत-मतान्तर अपनी पुस्तकों में निहित ज्ञान व विज्ञान के विपरीत बातों को न तो छोड़ पा रहे हैं न उनमें वेद व इतर ज्ञान के आधार पर आवश्यक संशोधन व परिमार्जन ही कर पा रहे हैं। हमारा सौभाग्य है कि हम भारत में उत्पन्न हुए और हमें ऋषि दयानन्द व उनके विचारों का ज्ञान प्राप्त है। हम वेदों की मान्यता सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करने में विश्वास रखते हैं व इस नियम का  पालन करते हैं। वेदों को अपनाकर व असत्य व मिथ्या ज्ञान का त्याग कर ही मानव जाति की यथार्थ उन्नति हो सकती है जिससे लोक व परलोक दोनों सुधरते हैं। यह कार्य ईश्वर की प्रेरणा व कृपा से ही सम्पन्न हो सकता है। ईश्वर करे कि सभी मनुष्य असत्य का त्याग और सत्य के ग्रहण के लिये तत्पर हों। वेदों के सत्य वेदार्थ

कृषि कानूनों की वामपंथी व्याख्या

प्रातःकाल लाल झंडा उठाए द्रुत गति से दौड़ते हुए, वामपंथी यूनियन के नेता जी को देख एक युवक ने पूछा, नेताजी कहाँ दौड़े जा रहे हो ? नेताजी ने कहा, धरना देने, चलो आप भी चलो | युवक ने पूछा क्यों ? वे बोले, अपने खेत नहीं बचाने क्या | युवक बोला, जरा ठहरो विस्तार से समझाओ क्या हुआ मेरे खेतों को ! नेताजी ने अपना लाल झंडा पेड़ से टिकाया,बैनर-पोस्टर चेले को दिए फिर बोले मोदी सरकार काले कृषि कानून ले आई है | किसानों के खेत अम्बानी अडानी को देने जा रही है उसी को रद्द करवाना है | जमीन बचानी है तो हमारे साथ हड़ताल पर चलो | खेती चली गई तो खाओगे क्या ? अम्बानी अडानी खेत ले जाएँगे सुनते ही युवक का  रक्त उवलने लगा वह भी हड़ताल में जाने को तैयार हो गया | युवक ने कहा उन काले  कानूनों को दिखाइए मैं उनमें अभी आग लगा दूँगा | नेताजी बोले मेरे पास फोटो कॉपी नहीं है | युवक ने तत्काल गूगल सर्च कर कृषि क़ानून पढ़ना आरंभ किया, तो उसका माथा ठनक गया | अब आगे की सुनिए –

नेताजी आप कहरहे थे, इस कानून से हमारे खेतों पर अम्बानी अडानी का कब्जा हो जाएगा पर इसमें तो अम्बानी अडानी का नाम ही नहीं है |

नेताजी, नाम तो प्रतीकात्मक हैं, भोले भाले किसानों और आप जैसे नौजवानों को समझाने के लिए, इसमें कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को पढ़िए | युवक ने कहा, इसीको पढ़ रहा हूँ इसमें लिखा है कि कॉन्ट्रैक्ट फसल का होगा खेतों का नहीं | खेत न गिरवी रखा जाएगा और नहीं बंधक | इसमें तो यह भी लिखा है कि प्राकृतिक आपदा से फसल नष्ट होने पर भी किसान को कोई क्षति नहीं होगी |

नेताजी ने बात काटते हुए कहा आप नहीं समझेंगे इसे छोड़िये, देखिये सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) समाप्त कर के किसानों को बर्बाद कर दिया है | 

युवक ने तीनों कानून, कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) क़ानून, कृषक (सशक्तिकरण-संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार क़ानून एवं आवश्यक वस्तु (संशोधन) क़ानून 2020 ध्यान से पुनः पढ़े फिर कहा, इसमें तो कहीं भी एमएसपी शब्द लिखा ही नहीं है  और आप कह रहे हैं समर्थन मूल्य समाप्त कर दिया | झूठ बोलकर भ्रम मत फैलाइए जो लिखा है उसी पर स्पष्ट चर्चा कीजिए  |

इसबार नेताजी का चेला बोला, कामरेड इन्हें बताओ कि सरकार प्राइवेट मंडी खोलकर, एपीएमसी (कृषि उपज मंडी) बंद करने जा रही है जब मंडी ही नहीं रहेगी तो समर्थन मूल्य देगा कौन ?

युवक ने कहा, छोटे कामरेड जी सभी चीजों को एक साथ मिलाकर गड्ड-मड्ड मत कीजिए |  प्राइवेट मंडी और एमएसपी का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है | सरकार को राष्ट्रिय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए), 2013 के अनुसार देश की लगभग 80 करोड़ गरीब  जनता को सस्ता राशन (दो रु किलो गेंहूँ, तीन रु किलो चावल), विद्यालयों में मिड डे मील, आँगन बाड़ी में पोषण आहार आदि बाँटना होता है | इसके लिए सरकार सदैव ही अनाज खरीदती रहेगी अतः समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद बंद हो ही नहीं सकती | प्राइवेट मंडीके आने से आढ़तिये/कमीशन एजेंटों का एकाधिकार अवश्य समाप्त हो जाएगा किसान को फसल बेचने के दो विकल्प मिलेंगे | आढ़तिये चाहें तो कृषि मंडी को उन्नत बनाने के लिए सरकार से बात करें, न कि किसान के कंधे पर बन्दूक रख कर कानून को रद्द कराने की जिद |

अब नेताजी थोड़े उत्तेजित हो कर बोले आप समझ ही नहीं रहे, किसान बर्बाद हो जाएँगे |

युवक ने कहा, आपको पता है,किसान अभी कितने समृद्ध हैं, प्रतिदिन लगभग 45 किसान आत्महत्या कर लेते हैं क्यों ? केवल पिछले बीस वर्षों का हिसाब लगाओ तो अब तक, तीन लाख छियालीस हजार पाँच सौ अड़तीस  किसान आत्महत्या कर चुके हैं | अब इससे अधिक और क्या बर्बाद होंगे | पढ़े लिखे नव युवक कृषि से दूर भागते हैं क्यों ? वे पाँच-सात हजार की नौकरी कर लेते हैं पर खेती नहीं करना चाहते क्यों ? इसमें छोटे किसान को न धन मिलता है न सम्मान | अपना ही अनाज लिए-लिए  दो-दो  किलोमीटर लम्बी लाइन में चार-पाँच दिन तक खड़े रहो या मंडी में पड़े रहो | आढ़तिये के हाथ जोड़ो कमीशन दो चार-पाँच  महीने बाद बैंक में पैसा आएगा | क्या इसके स्थान पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिए ? कृषि व्यवस्था में सुधार क्यों नहीं होना चाहिए ?

नेताजी थोडा  सोचते हुए, हम सुधार के विरोधी नहीं हैं पर हमें मोदी पर भरोसा नहीं है, देखों पंजाब और हरियाणा के किसान भी इसे रद्द कराने पर तुले हैं |

युवक ने कहा, आपको मोदी पर भरोसा नहीं है तो ये आपकी समस्या है, आप लेनिनवादी हैं और मोदी जी राष्ट्रवादी, अर्थात आप विचारधारा के लिए कृषि कानून का विरोध कर रहे हैं किसानों के लिए नहीं | रहा प्रश्न पंजाब और हरियाणा के किसानों का तो सुनिए हरित क्रांति के लिए इन्हीं किसानों को चुना गया था | इन्हें सरकार ने प्रोत्साहन दिया,इन्होने भी अथक श्रम किया आज ये लोग बहुत ही संपन्न और अमीर हो चुके हैं | अब ये लोग यथा स्थिति चाहते हैं, नए सुधार और परिवर्तन से आशंकित हैं क्योंकि भारत सरकार जिस गेंहूँ,चावल की खरीद करती है ये दोनों राज्य, उसके सबसे बड़े उत्पादक हैं | जिन 6 प्रतिशत किसानों को समर्थन मूल्य का लाभ मिलता है उनमें भी सबसे बड़े लाभार्थी ये ही लोग हैं | इन्हें पट्टी पढ़ाई गई है कि प्राइवेट मंडी के आने से सरकारी खरीद और एमएसपी  समाप्त हो जाएगी जो कि संभव ही नहीं है | मैं आप को बता चुका हूँ आप उन्हें बता देना |

अब नेताजी के पास कहने को कुछ नहीं बचा वे अपना लाल झंडा उठाते हुए खिसकने लगे, जाते-जाते बोल पड़े तो क्या इनमें संशोधन की भी आवश्यकता नहीं है |

युवक ने कहा, संशोधन की आवश्यकता है रद्द करने की नहीं | कोई भी कानून आदर्श नहीं होता उसमें सुधार की संभावना सदैव बनी रहती है | इसमें भी कुछ सुधार होने चाहिए जैसे किसानों को विवाद की स्थिति में न्यायालय में जाने का अधिकार मिले | फसल खरीदने वाले के पंजीयन की व्यवस्था हो आदि सुधारों के साथ इसका स्वागत किया जाना चाहिए | विरोध करने वाले किसानों को ‘हाँ और ना’ की जिद छोड़ संशोधन पर चर्चा करनी चाहिए…युवक बोले जा रहा था किन्तु कामरेड जी तो दौड़ चुके थे भोले भाले किसानों और नवयुवकों की तलाश में |

डॉ.रामकिशोर उपाध्याय

भगवान कृष्ण हैं योग क्षेम के ईश्वर

—विनय कुमार विनायक
भगवान कृष्ण हैं नटवर!
धेनु चराते वंशी धुन पर
नर्तन करते नाग के फन पर
पर्वत उठाते उंगली पर
योग-क्षेम और युद्ध-प्रेम के ईश्वर
भगवान कृष्ण हैं नटवर!

भगवान कृष्ण हैं योगेश्वर!
कर्मयोग, सांख्ययोग,
भागवत भक्ति की घूंटी
भ्रमित अर्जुन को पिलाया
युद्ध भूमि में योगेश्वर बनकर
भगवान कृष्ण हैं योगेश्वर!

भगवान कृष्ण हैं मुनिवर!
ज्ञान मिला था कृष्ण को
घोर आंगिरस अरिष्ठनेमी से,
जो बाईसवें तीर्थंकर नेमीनाथ थे
गीता ज्ञान दिया जो कृष्ण ने
उपनिषद के, वेद से कुछ हटकर
भगवान कृष्ण हैं जैन मुनिवर!

भगवान कृष्ण हैं ईश्वर!
ज्ञान दिया जो अर्जुन को
वह तो उपदेश है, सबको तजो,
सिर्फ मुझे भजो,अहं ब्रह्मास्मि,
ढेर हुए हैं अवतार भूमि पर
भगवान कृष्ण हैं ईश्वर!

भगवान कृष्ण हैं परमेश्वर!
ज्ञान,कर्म और भक्ति का,
अनासक्त भाव से कर्म करो
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
ऐसा तो भगवान ही कहते हैं
भगवान कृष्ण हैं परमेश्वर!
—विनय कुमार विनायक