—विनय कुमार विनायक हिन्दी अहसास है अपनापन का, हिन्दी इन्कलाब है भारतजन का, हिन्दी सम्मान है निज वतन का, हिन्दी अभियान है जन मन का!
जंग-ए-आज़ादी की जुबान हिन्दी, रविन्द्र का जन मन गान हिन्दी, बंकिम की बंदे मातरम की बोली, आजाद, भगतसिंह की जुगलबंदी!
बिस्मिल की शेरों-शायरी हिन्दी, गांधी के जेल की डायरी हिन्दी, असफाक की जंगी तैयारी हिन्दी, बाबू कुंवरसिंह की बिहारी हिन्दी!
खुशरो की खुश खबरी ये हिन्दी, रसखान के रस से भरी है हिन्दी, जायसी की पद्मावती सी हिन्दी, रहीमन निजमन व्यथा है हिन्दी!
सूर की माखन मलाई है हिन्दी, तुलसी दास की चौपाई है हिन्दी, कबीर दास की तानाशाही हिन्दी, मीरा बाई ने जो गाई वो हिन्दी!
भारतेंदु की खड़ीबोली है हिन्दी, मैथिली, अंगिका, बांगला, उड़िया, असामी, गोरखाली की ये आली, पूर्वोत्तर की भालो बंगाली हिन्दी!
तेलंगाना की नई जुबान हिन्दी, आन्ध्र की मुस्कान है ये हिन्दी, कर्नाटक की कान है यह हिन्दी, तमिल की तान, धुन केरल की!
राजस्थानी डिंगल-पिंगल बोली, पंजाबी सबद कीर्तन गुरु वाणी, गुजराती का पेम छे भी हिन्दी, मराठी माय बोली सी ये मौसी!
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हिन्दी का अलख है चकाचक, हिन्दी उर्दू की है हम प्याली, मिश्री की डली, गुलाब कली!
हिन्दी भाषा वीर रस में पली, विद्यापति के श्रृंगार से चली, हुंकार दिनकर के स्वभूमि की, ये हिन्दी इसे अपनों ने छली! —विनय कुमार विनायक दुमका, झारखण्ड-814101.
-मनमोहन कुमार आर्य हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डोन सिटी के द्वारा चार वेदों की मूल संहिताओं का चार खण्डों में प्रकाशन होकर इसे ग्राहकों व पाठकों को प्रेषण करना आरम्भ कर दिया गया है। हमने भी वेद संहिताओं का एक पूरा सैट प्रेषित करने के लिये निवेदन किया था। कल की स्पीड पोस्ट डाक से हमें चार खण्डों में वेद संहितायें तथा इनके साथ डा. सोमदेव शास्त्री रचित वेदों पर एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ ‘‘वेदों का दिव्य सन्देश” प्राप्त हुआ है। वेदों के दिव्य सन्देश ग्रन्थ का सम्पादन आर्य विद्वान डा. विनोदचन्द्र विद्यांलकार जी ने किया है। डा. विनोद चन्द्र विद्यालंकार जी कुछ माह पूर्व कीर्तिशेष हुए हैं। 650 से अधिक पृष्ठों का यह भव्य ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को वेद संहिताओं के अग्रिम ग्राहकों को निःशुल्क दिया जा रहा है। हमने इस ग्रन्थ का सम्पादकीय एवं लेखक का प्राक्कथन पढ़ा है जो हमें अत्यन्त ज्ञानवर्धक एवं उपयेागी लगा। वेद ज्ञान में रूचि रखने वाले सभी पाठकों को इस ग्रन्थ से लाभ उठाना चाहिये।
चतुर्वेद मन्त्र संहिताओं को चार खण्डों में भव्य रूप में प्रकाशित किया गया है। ऋग्वेद संहिता दो खण्डों में पूर्ण हुई है। प्रथम खण्ड में 600 तथा दूसरे खण्डों में 592 पृष्ठ हैं। ऋग्वेद संहिता के दो खण्ड कुल 1192 पृष्ठों में पूर्ण हुए हंै। यजुर्वेद संहिता में 272 तथा सामवेद संहिता में 256 पृष्ठ हैं। इन दोनों को एक खण्ड वा जिल्द में प्रकाशित किया गया है। अथर्ववेद मन्त्र संहिता 736 पृष्ठों में पूर्ण हुई है। यह चारों खण्ड देखने में अत्यन्त भव्य हैं। मुद्रण भी सुरुचिपूर्ण व नयनाभिराम कह सकते हैं। कागज व मुद्रण सभी उच्च कोटि का है। इससे पूर्व इससे भव्य रूप में वेद मन्त्र संहितायें प्रकाशित हुई हैं, इसका हमें ज्ञान नहीं है। परमात्मा की वाणी वेद को तो भव्यतम् रूप में ही प्रकाशित होना चाहिये और हमें लगता है कि ऐसा ही हुआ है। सभी मन्त्र संहिताओं में प्रेरक के रूप में स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी का नाम दिया गया है।
हमें लगता है कि हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डोन सिटी के संचालक व अध्यक्ष बन्धुवर श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने यह ऐतिहासिक कार्य किया है। इससे लगभग 25 वर्ष पूर्व स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी के सम्पादन में मैसर्स विजयकुमार गोविन्दराम हासानंद, दिल्ली की ओर से इसके अध्यक्ष श्री अजय आर्य जी द्वारा वेद संहिताओं का प्रकाशन किया गया था। तब इसे एक जिल्द सहित दो जिल्दों में भी प्रस्तुत किया गया था। वह ग्रन्थ भी हमारे संग्रह में हैं। वेद प्रचार में हमारे इन प्रकाशकों का योगदान प्रशंसनीय एवं सराहनीय है। हम ईश्वर से इन प्रकाशकों के लिए हृदय से शुभकामनायें करते हैं। हम आशा करते हैं कि भविष्य में भी हमें इन प्रकाशकों से अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं लाभप्रद वैदिक साहित्य सुन्दर एवं भव्य रूप में प्रकाशित होकर मिलता रहेगा।
यह भी बता दें कि हितकारी प्रकाशन समिति द्वारा प्रकाशित चार वेदों की संहिताओं को मात्र श्रद्धानन्द बलिदान दिवस 23 दिसम्बर, 2020 तक एक हजार सड़सठ रूपये में दिया जा रहा है जिसमें डाक शुल्क भी सम्मिलित है। इसके साथ डा. सोमदेव शास्त्री, मुम्बई का ‘‘वेदों का दिव्य सन्देश” ग्रन्थ निःशुल्क दिया जा रहा है। पाठकों को इस सुविधा का लाभ उठाना चाहिये। वेदों के अनुयायी आर्यसमाज के सदस्यों के घरों पर चारों वेद की मन्त्र संहितायें तथा वेद भाष्य सहित ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश एवं अन्य सभी महत्वपूर्ण ग्रन्थ अनिवार्य रूप से होने चाहियें। वेद मन्त्र संहितायें ही वह ज्ञान है जो परमात्मा ने अपने अन्तर्यामीस्वरूप से आदिकालीन चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को दिया था। इनका हमारे घरों में होना सौभाग्य की बात है। महाभारत के बाद वेदों का अध्ययन शिथिल हो गया था। इसी कारण देश देशान्तर में अज्ञान तथा अन्धविश्वास उत्पन्न हुए थे जिससे सारी मानव जाति को अपार दुःख व अपमान झेलना पड़ा और इसी कारण से संसार में अविद्यायुक्त मत-मतान्तर उत्पन्न जिनसे संसार में दुःख व अशान्ति उत्पन्न हुई। हमारी परतन्त्रता का कारण भी वेदों का विलुप्त होना तथा देश व समाज में अविद्या का प्रसार होना था। अतः ज्ञान, उन्नति, सुख तथा जीवन मुक्ति के प्रतीक वेद एवं वैदिक साहित्य का हमारे घरों में होना अत्यन्त आवश्यक है। हम एक बार पुनः श्री प्रभाकरदेव आर्य जी को इस महद् कार्य को सम्पन्न करने के लिये बधाई देते हैं।
एक दौर था जब पत्रकार ने अपनी लेखनी के जरिए समाजिक हित में बड़े आंदोलनों को जन्म दिया व समाज ने पत्रकार को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना, लेकिन आज स्थितियां लगातार बदल रही हैं। पत्रकारिता पर व्यवसायिकता हावी हो गई है, जिस कारण पत्रकारिता के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है। निजी फायदे के लिए सोशल मीडिया पर फेक न्यूज भेजने का चलन बढ़ा है, जिसका सीधा असर समाज पर पड़ रहा है व समाज में पत्रकार की छवि धूमिल हो रही है। एकस्वर में पत्रकारिता के सिद्धातों का पालन करते हुए पत्रकारिता के मूल स्वरूप को बनाये रखने पर जोर दिया। साथ ही समाज की कठिन समस्याओं पर भी अपनी लेखनी के माध्यम से सरकारों को चेताने की बात कही गयी है, ताकि मानव जीवन के लिए कठिन होती जा रही समस्याओं का समय रहते ही निराकरण हो सके।
किसी भी इमारत या ढांचे को खड़ा करने के लिए चार स्तंभों की आवश्यकता होती है उसी प्रकार लोकतंत्र रूपी इमारत में विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका को लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तम्भ माना जाता है जिनमें चौथे स्तम्भ के रूप में मीडिया को शामिल किया गया है| किसी देश में स्वतंत्र व निष्पक्ष मीडिया उतनी ही आवश्यक व महत्वपूर्ण है जितना लोकतंत्र के अन्य स्तम्भ इस प्रकार पत्रकार समाज का चौथा स्तम्भ होता है जिसपर मीडिया का पूरा का पूरा ढांचा खड़ा होता है जो नीव का कार्य करता है यदि उसी को भ्रष्टाचार व असत्य रूपी घुन लग जाए तो मीडिया रूपी स्तम्भ को गिरने से बचाने व लोकतंत्र रूपी इमारत को गिरने से बचाने में खासी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
एक समय था जब एक पत्रकार की कलम में वो ताक़त थी कि उसकी कलम से लिखा गया एक-एक शब्द देश की राजधानी में बैठे नेता, राजनेता, व अधिकारियों की कुर्सी को हिला देता था, पत्रकारिता ने हमारे देश की आज़ादी में अहम् भूमिका निभाई, देश जब गुलाम था तब अंग्रेजी हुकूमत के पाँव उखाड़ने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से अनेक समाचार पत्र, पत्रिकाओं का सम्पादन शुरू किया गया| इन्ही समाचार-पत्र पत्रिकाओं ने देश को बाँधने व एकजुट करने में महती भूमिका निभाई थी,अपने शुरुआत के दिनों में पत्रकारिता एक मिशन के रूप में जन्मी थी जिसका उद्देश्य सामाजिक चेतना को और अधिक जागरूक करना था महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, पं० नेहरु, गणेश शंकर विद्यार्थी, आदि महान स्वतंत्रता सेनानियों व महान हस्तियों ने अखबारों को अपनी लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हथियार बनाया था दरअसल उनमे एक जूनून था उन्हें कोई डिगा नहीं सकता था,इन्ही के नक़्शे क़दम पर चलने वाले आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो पूंजीपति, सरकार, सामाजिक दीवारों व बंधनों को फांद कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति अब भी करते हैं उन्होंने अपना जीवन पत्रकारिता को ही समर्पित कर रखा है।
वहीँ आज कुछ तथाकथित पत्रकारों ने मीडिया को ग्लैमर की दुनिया और कमाई का साधन बना रखा है अपनी धाक जमाने व गाड़ी पर प्रेस लिखाने के अलावा इन्हें पत्रकारिता या किसी से कुछ लेना देना नहीं होता क्यूंकि सिर्फ प्रेस ही काफी है गाड़ी पर नम्बर की ज़रूरत नहीं, किसी कागज़ की ज़रूरत नहीं, हेलमेट की ज़रूरत नहीं मानो सारे नियम व क़ानून इनके लिए शून्य हो क्यूंकि सभी इनसे डरते जो हैं चाहे नेता हो, अधिकारी हो, कर्मचारी हो, पुलिस हो, अस्पताल हो सभी जगह बस इनकी धाक ही धाक रहती है, इतना ही नहीं अवैध कारोबारियों व अन्य भ्रष्टाचारी अधिकारियों, कर्मचारियों आदि लोगों से धन उगाही कर व हफ्ता वसूल कर अपनी जेबों को भर कर ऐश-ओ-आराम की ज़िन्दगी जीना पसंद करते हैं, खुद भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं, और भ्रष्टाचार को मिटाने का ढिंढोरा समाज के सामने पीटते हैं मानो यही सच्चे पत्रकार हो सभी लोग इनके डर से आतंकित रहते हैं कुछ तथाकथित पत्रकार तो यहाँ तक हद करते हैं कि सच्चे, ईमानदार और अपने कार्य के लिए समर्पित रहने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को सुकून से उनका काम भी नहीं करने देते ऐसे ही लोग जनता में सच्चे पत्रकारों की छवि को धूमिल कर रहे है।
आज हद तो यह है कि आपराधिक मानसिकता के व्यक्ति अपने कारोबार को संरक्षण देने के लिए पत्रकारिता में प्रवेश कर रहे हैं जिससे भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार को बढ़ावा मिल रहा है और हमारा लोकतंत्र दिन-प्रतिदिन खोखला हो रहा है जो आज नहीं तो कल हमारे लिए घातक सिद्ध होगा। पत्रकारिता समाज का आईना होती है जो समाज की अच्छाई व बुराई को समाज के सामने लाती है अब यदि पत्रकार और बुराई के बीच में सेटिंग हो जाती है तो न अच्छाई समाज के सामने आयेगी और न ही बुराई।
पत्रकारिता के गिरते स्तर में ज़्यादा ज़िम्मेदारी किसकी?
पत्रकारिता में थ्योरी तो कई हैं, लेकिन आजकल इस थ्योरी से ही सबकी पहचान हो जाती है। डिग्री में अंतर हो सकता है कि कौन कितने प्रतिशत अजेंडा बनाम सही ख़बर कर रहा है, लेकिन हैं तो लगभग सभी मोटिवेटेड ही।
पत्रकारिता जब पढ़ाई जाती है तो एक और टर्म आता है ‘स्लैंट देना’। मतलब ख़बर को किस झुकाव के साथ परोसा जाए। एथिक्स का भी एक पेपर होता है, लेकिन उसका उतना ही मतलब है जितना हमारे स्कूली जीवन में नैतिक शिक्षा का होता है। हर आदमी दूसरों को एथिकल देखना चाहता है, खुद नहीं होता। आज के दौर में एथिक्स, निष्पक्षता और ‘वाचडॉग’ का महत्व मीडिया पर होने वाले सेमिनार और चर्चाओं में ही सिमट कर रहा गया है।
अर्थात यह कि ये सब महज़ एकेडेमिक बातें हैं जिनका प्रयोग आप चर्चा में, किसी से वाद-विवाद या मीडिया की वर्तमान स्थिति पर बातें करते हुए करते हैं ताकि सामने वाले को लगे कि आप वाक़ई चिंतित हैं। जैसे कि दुःखी हो लेना कि मीडिया का काम ये है, लेकिन ये नहीं। ये सब फ़ालतू की बातें हैं। फ़ालतू इसलिए कि आपको लगता है डायनासोर होते तो मज़ा आ जाता, जबकि सत्य यह है कि वो नहीं हो सकते।
आप सच्चाई से बहुत दूर भागते हैं। आपको आदर्श स्थिति चाहिए कि ऐसा ही होना चाहिए क्योंकि हमने कहीं पढ़ा है कि ऐसा होता तो ग़ज़ब होता। जैसे कि हर आदमी को आठ घंटे काम की बराबर सैलरी मिलनी चाहिए। ये बात सुनकर ही विसंगतियों से भरा लगता है। इसके बुनियाद में ही गलती है क्योंकि न तो हर आदमी एक ही काम करता है, न ही एक ही तरह से उसी काम को करता है, न ही हर आदमी एक जैसा होता है।
अब किसी मार्क्स, एंगल्स या स्कोडा-लहसुन ने कुछ कह दिया, जो आपको बहुत ज़्यादा सेंसिबल लगा क्योंकि ये होता तो वो होता… ऐसे होता नहीं है। आप जिस दिन चाहें उस दिन बारिश नहीं होती, न ही आप लाख कोशिश कर लें राजनीति में साफ़ लोग पहुँचने लगेंगे या मीडिया सही रिपोर्टिंग करने लगेगी। ये मानव जाति की समस्या है कि वो कल्पनाशील होता है। उसे कहानियाँ गढ़ना आता है, वो सोचने लगता है कि हर आदमी को बैठे-बैठे खाना मिलने लगे तो कितना सही रहेगा!
यहाँ पर तर्क गायब हो जाता है। कुछ ऐसा ही आज के मीडिया के मामले में है। हर चीज एक गति से अपने भूतकाल से वर्तमान में आती है और अपना भविष्य बनाती है। इसमें समय, परिस्थितियाँ, समाज आदि उसको प्रभावित करने के मुख्य कारक होते हैं। कोई भी घटना स्वतंत्र नहीं होती। बारिश के होने के लिए वाष्पीकरण होता है, जिसके लिए नदियों को गर्मी मिलनी चाहिए।
मीडिया अगर आज अजेंडा सेट करने में लगी है तो मतलब यह है कि परिस्थितियाँ और समय उसी कार्य के अनुकूल है। यहाँ आप आदर्श मत घुसाइए क्योंकि आदर्श तक पहुँचने के लिए जो समय और परिस्थिति चाहिए उसको भी आपको ध्यान में लाना होगा। क्या आपको लगता है कि आप स्वयं आदर्श हैं? अगर आप हैं भी तो क्या समाज का बहुसंख्यक हिस्सा आदर्श है? क्या वो सही आचरण करता है? सही आचरण से तात्पर्य झूठ न बोलने से लेकर, नागरिक होने के तमाम निर्देशों का पालन करना है।
क्या आप या हम किसी भी स्तर पर आदर्श हैं? क्या आपके दिल की इच्छा नहीं होती कि मीडिया से ऐसी ख़बरें आनी चाहिए, वैसी नहीं? फिर आप क्यों कोसते हैं कि मीडिया तो बिक गई है! मीडिया की इस स्थिति के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी मीडिया को खुद लेनी चाहिए। वो इसलिए कि जब भी इनके तरीक़ों पर सवाल उठते हैं, ये कहते हैं कि हम स्वयं समझदार हैं, और हम ही अपनी समस्याओं को सुलझाएँगे, इसके लिए बाहरी एंटरफेरेंस नहीं चाहिए।
फिर कहिए कि सुधरते क्यों नहीं? इसमें दो बातें हैं। पहली यह कि सुधरना इनके हाथ में नहीं है। इनको एक व्यवसाय चलाना है, जिसके लिए हर सप्ताह इनकी रेटिंग आती है। फिर उसके हिसाब से प्रोग्रामिंग होती है। जबकि मीडिया कोई एंटरटेनमेंट चैनल तो है नहीं कि वो प्रोग्रामिंग करे? उसको तो ख़बरें आती हैं, तो उसको दिखाना है, या फिर चर्चा करानी है। यहाँ जब डेमोग्राफ़िक्स, रेटिंग, लहर, आँधी आदि के हिसाब लगाए जाते हैं तो देखना पड़ता है कि किस बात की रिपोर्टिंग कैसे हो, और किस ख़बर को कैसे दिखाया जाए।
दूसरी बात यह है कि ये बहुत ही आसानी से ये कह देते हैं कि लोग यही देखना चाहते हैं। लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं है ‘वाचडॉग’ की, वो मीडिया की है। इसलिए लोगों को निर्धारित करने का हक़ नहीं देना चाहिए कि उसको बकरी द्वारा एलियन का दूध पीते देखना ज़रूरी है, या दो हज़ार के नोट में चिप की, या फिर किसी की हत्या पर कोर्ट के फ़ैसले से पहले अपने फ़ैसले थोपने की। ये निर्धारण करना भी मीडिया को है कि वो समाज को क्या दिखाना चाहता है।
बड़े, मूर्धन्य पत्रकार खुद स्वीकारते रहते हैं कि हमारा तो एंटरटेनमेंट वाला काम हो गया है। जबकि ये कहने से पहले उनको नैतिकता के आधार पर नौकरी छोड़ देनी चीहिए। आपसे नैतिकता की आशा की जाती है क्योंकि आप उस जगह पर हैं जहाँ से आप एक स्टैंड ले सकते हैं। आपके हाथ में है कि लोग क्या देखें, लेकिन आप अपने व्यवसाय पर ध्यान देते हैं।
समझदार लोग, जो जानते हैं कि किस ख़बर को कैसे दिखाने से क्या होगा, जब एडिटर्स मीटिंग में बोलते हैं कि ‘हाँ, ये वाला एंगल सही रहेगा’, ख़बर की मौत तभी हो जाती है। जब आपके सामने एक चार्ट पड़ा होता है जिसमें पता चलता है कि हिन्दू-मुसलमान वाली ख़बरों को दिखाने से लोग पढ़ते हैं, तो आपको पत्रकारिता में मसीहाई पाने की ख़्वाहिश नहीं करनी चाहिए। आपने उस ख़बर के प्रभाव को पहले ही तय कर दिया कि उसका क्या होगा। जबकि आपका काम सिर्फ ख़बर दिखाना है, उसके विशेषण निकालकर ‘मुस्लिम टेकी की हत्या मुंबई के हिन्दू बहुल इलाके में’ बनाने से आपकी मंशा का पता चलता है।
मंशा आजकल बहुत ज़रूरी है क्योंकि उसी से पता चलता है कि मीडिया इंसाफ़ की बात कर रहा है या फिर इसको रेटिंग चाहिए। जहाँ किसी मामले में बच्ची का बलात्कार ‘मुसलमान/हिन्दू बच्ची’ के बलात्कार में बदल जाता है, ख़बर वहीं दम तोड़ देती है। क्योंकि आपने लोगों के सोचने के तरीक़े को नियंत्रण में ले लिया। जब तक ये साबित न हो जाए कि किसी अपराध के लिए किसी के किसी धर्म या जाति से होना उस अपराध के होने का कारण था, तब तक मीडिया को कोई हक़ नहीं है ऐसी हेडलाइन देने का। किसी का पीड़ित होना अगर उसकी जाति के आधार पर है फिर भी हेडलाइन में उसे लिखना ग़ैरज़रूरी है।
इस पर थोड़ा और कहा जाए तो मतलब यह है कि लोग हेडलाइन पढ़कर ख़बरों के बारे में मन बना लेते हैं। उनके सोचने का रास्ता तैयार हो चुका होता है। आप उनके घृणा या पूर्वाग्रहों को हवा दे चुके होते हैं। जबकि मीडिया को हर ऐसे मौक़े पर, हर ऐसी ख़बर के कवरेज में, ज़िम्मेदारी दिखाते हुए, हैडलाइन को ऐसे रखना चाहिए कि ये एक अपराध है, जो नहीं होना चाहिए। आगे ख़बर की पूरी डिटेल बताने के बाद, ये बताना चाहिए कि पुलिस इस बात की छानबीन कर रही है कि क्या जाति/धर्म से प्रेरित होकर इस अपराध को अंजाम दिया गया।
ये ज़िम्मेदारी मीडिया की है। लेकिन आज के दौर में मीडिया बाइनरी में कार्य कर रहा है। उसके लिए हर बात सत्ता के पक्ष या विरोध में होती है। बिजली आने पर एक हिस्सा भारत के अमेरिका बन जाने की हद तक खुश हो जाता है, तो दूसरा हिस्सा पूरी योजना को असफल बनाने की कोशिश करते हुए चार गाँव ऐसे ले आता है जहाँ बिजली नहीं पहुँची।
बात आएगी कि सरकार ने इतनी सड़कें बनवाईं, तो रिपोर्टरों को सड़के दिखाने की बजाए वैसी सड़क ढूँढ लाने का काम मिलता है जिसमें गड्ढे हों। कहा जाएगा कि ये योजना आई है इससे इतने ग़रीबों को फ़ायदा हुआ है, तो रिपोर्टर दौड़ते हैं ये खोजने कि इसी इलाके की एक औरत है जिसे सिलिंडर नहीं मिला। किसी को इससे कोई मतलब नहीं कि उस औरत को क्यों नहीं मिला। किसी को इससे कोई मतलब नहीं कि जिस सड़क पर गड्ढे हैं वो अभी हुए, या उसपर काम हुआ ही नहीं।
कहने का मतलब यह है कि भारत जैसे बड़े देश में आप जिस भी तरह की ख़बर ढूँढना चाहें आपको मिल जाएगी। आपको जो दिखाना है, वो आपके रिपोर्टर लाकर दिखा देंगे। मोदी ने सौ प्रतिशत गाँव में बिजली नहीं पहुँचाई, सौ गाँव बच गए। किया आपको लगता है कि सरकार की इस उपलब्धि पर चालीस मिनट के शो में तीन मिनट भी सकारात्मक बातें करने का समय नहीं होता?
क्या आपको लगता है कि किसी योजना की आलोचना का मतलब यही है कि उसकी सारी ख़ामियाँ गिना दी जाएँ और फ़ायदों पर बात ही न की जाए? आपने एक घर बनाया, गृहप्रवेश का भोज किया और लोग गिन-गिनकर ये कहने लगें कि खिड़की का रंग बुरा है, वहाँ चूना पसर गया है, बाथरूम के नल में फ्लो नहीं है। और इन तीन चीज़ों के छिद्रान्वेषण के आधार पर घर को बुरा मान लिया जाए?
मैं ये नहीं मानता कि मीडिया का काम सत्ता की आलोचना है। ये एक वाहियात और अपनी एकतरफ़ा रिपोर्टिंग को जस्टिफाय करने वाली बात है। ये एक धूर्त आदमी का बयान है ताकि लोग उसे महान मानें। जब मैंने ही तय कर दिया है कि पीला रंग सबसे खूबसूरत है, और मैं पीले रंग की ही शर्ट पहनता हूँ, तो फिर मुझे गलत कौन कहेगा!
मीडिया का काम सत्ता की आलोचना तक ही सीमित नहीं है। मीडिया का एक काम सूचना पहुँचाना है, और एक काम विवेचना है। विवेचना और चर्चा सिर्फ नाकामियाँ और खोट गिनाने के लिए नहीं होती, न ही सिर्फ हर बात को देवत्व के स्तर पर ले जाकर बताने के लिए होती है। जहाँ सत्ता सही कर रही है, जिस अनुपात में कर रही है, उसी अनुपात में आलोचना और विवेचना होनी चाहिए।
– योगेश कुमार गोयल पिछले दिनों दुनियाभर में विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया गया। मानवाधिकारों की विस्तृत व्याख्या के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने सर्वप्रथम 27 जनवरी 1947 को एक आयोग गठित किया गया था, जिसकी सिफारिशों के सार्वभौमिक घोषणा पत्र को संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों ने 10 दिसम्बर 1948 को सर्वसम्मति से स्वीकार किया था। मनुष्य के जीवनयापन और विकसित होने के मूलभूत (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक) अधिकारों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘मानवाधिकार’ के रूप में स्वीकार किया गया है। वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना ही इस उद्देश्य से की गई थी कि भविष्य में द्वितीय विश्वयुद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न न होने पाए और संयुक्त राष्ट्र ने अपनी स्थापना के कुछ ही समय बाद मानवाधिकारों का संरक्षण किए जाने की ओर ध्यान देना शुरू किया लेकिन विड़म्बना है कि मानवाधिकारों की घोषणा के 72 वर्ष बाद भी दुनियाभर में करोड़ों लोग संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित मानवाधिकारों से वंचित हैं। करोड़ों लोग रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों से महरूम हैं। एक अरब से भी अधिक लोग कम अथवा ज्यादा कुपोषण के शिकार हैं। कुपोषण की वजह से हर रोज हजारों बच्चे काल के ग्रास बन रहे हैं। दुनियाभर में करोड़ों बच्चे बाल मजदूरी का दंश झेल रहे हैं। भारत में 8 करोड़ से भी अधिक बच्चे अपने मासूम बचपन को बाल मजदूरी की तपती भट्ठी में झोंकने को विवश हैं, जो स्कूली शिक्षा से भी वंचित हैं। औद्योगिकीकरण की अंधी दौड़ में देश में मजदूर महिलाओं व छोटे-छोटे मासूम बच्चों का शारीरिक व मानसिक शोषण किसी से छिपा नहीं है। विश्वभर में अरबों लोग आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से वंचित हैं। एक अरब से अधिक लोगों को पीने के लिए स्वच्छ एवं शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं हैं। यदि हम मानवाधिकारों की दृष्टि से इसका विवेचन करें तो क्या ये सभी उचित स्तर पर जीवन यापन के अधिकार, शिक्षा के अधिकार, जीवन के प्रति सुरक्षा के अधिकार, शोषण से मुक्ति के अधिकार तथा अन्य सामाजिक अधिकारों से पूर्णतया वंचित नहीं हैं? क्या यह सरासर मानवाधिकारों के उल्लंघन का मामला नहीं है? क्या यह मानवाधिकार आयोग का दायित्व नहीं है कि वह इन विसंगतियों को दूर करने के लिए सार्थक एवं प्रभावी कदम उठाए? आधुनिक भारत में करोड़ों लोग आज भी भूखे-नंगे अपनी जिंदगी के दिन जैसे-तैसे उद्देश्यहीन पूरे कर रहे हैं। क्या ऐसे लोगों के लिए मानवाधिकारों का कोई महत्व हो सकता है? मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के अलावा लगभग प्रत्येक राष्ट्र में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सक्रिय हैं लेकिन आज भी जिस गति से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, उससे मानवाधिकार आयोगों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगता है। दुनियाभर में दो प्रमुख मानवाधिकार संगठनों ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ व ‘ह्यूमन राइट वाच’ का खासतौर से उल्लेख किया जा सकता है, जो दुनियाभर की स्थिति पर नजर रखते हैं और हर साल इस पर अपनी रिपोर्ट पेश करते हैं। मानवाधिकार हनन के मामले में हर देश की क्रमानुसार स्थिति दर्शायी जाती है और इस रिपोर्ट के आधार पर जिस देश में मानवाधिकार की स्थिति दयनीय होती है, उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर न केवल आलोचना का शिकार होना पड़ता है बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देश उस पर आर्थिक प्रतिबंध भी लाद देते हैं पर वास्तविकता यह है कि पिछले कुछ समय से इन संगठनों की रिपोर्टों को भी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं माना जाता। इन रिपोर्टों के पीछे अमेरिका इत्यादि विकसित देशों के अपने निजी हित या स्वार्थ भी छिपे होते हैं। भारत में मानवाधिकार संगठनों की सक्रियता खासतौर से पंजाब के आतंकवाद के भयावह दौर से देखी जा रही है, जब इन संगठनों को पुलिस व सेना के जवानों का हर छोटा-बड़ा कारनामा तो नजर आता था लेकिन आतंकवादियों की करतूतों के विरूद्ध इनकी जुबान पर लगाम ही कसी रही। इस बारे में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ए.एस. आनंद ने एक बार कठोर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ये संगठन सुरक्षा बलों के अत्याचारों पर तो उंगली उठाते हैं पर आतंकवादी संगठन कश्मीर में जो कुछ कर रहे हैं, उस पर चुप रहते हैं। यह हकीकत भी है कि अगर कोई आतंकवादी या शरारती तत्व पुलिस अथवा सेना के हाथों मारे जाएं तो मानवाधिकारवादी संगठन खूब हो-हल्ला मचाते हैं लेकिन वहीं अगर यही सिरफिरे लोग निर्दोषों के लहू से होली खेलें, अबलाओं की इज्जत के सरेआम चिथड़े उड़ाएं, उन्हें गैंगरेप जैसी पाशविक घटनाओं को अंजाम देकर जिंदा जला डालें तो ऐसी हैवानियत मानवाधिकार के ठेकेदारों को नजर नहीं आती बल्कि ऐसे मामलों में इन संगठनों की भूमिका पर सवाल उठाने वालों के समक्ष तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि आतंकवादी संगठन किसी स्थापित कानून के तहत काम करने वाली कोई सरकारी संस्था नहीं हैं और वैसे भी आतंकवादी संगठनों की कार्रवाई चूंकि कानून की नजर में अपराध है, अतः अगर कोई आतंकवादी या अराजक तत्व पकड़ा भी जाए, तब उसके खिलाफ कानून के मुताबिक ही कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि ऐसा नहीं है कि मानवाधिकार संगठनों की भूमिका हर मामले में संदेहास्पद रही हो बल्कि कुछ मामलों में इन संगठनों ने सही मायनों में पीडि़त मानवता के हित में सार्थक पहल की है पर यह भी सच है कि दुनियाभर में आज भी करोड़ों-अरबों लोग मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा के 72 वर्षों बाद भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए 1961 में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय संगठन ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि दुनियाभर में करीब 120 देशों में मानवाधिकारों का बड़े पैमाने पर हनन हो रहा है। भारत में सितम्बर 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया था, जिसका उद्देश्य मानवाधिकारों का संरक्षण व उनको प्रोत्साहन देना ही था। आयोग के गठन के कुछ ही समय बाद आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि देश की सभी जटिलताओं को दृष्टिगत रखते हुए आयोग मानता है कि जो लोग सर्वाधिक दुर्बल हैं, उनके रक्षण का आयोग पर एक विशेष और अपरिहार्य दायित्व है लेकिन आयोग अपने गठन के बाद के इन 26 वर्षों में भी अपने दायित्वों को निभाने में कितना सफल रहा है, इसकी पड़ताल किए जाने की आवश्यकता है। यह विड़म्बना ही है कि देश की सुरक्षा के नाम पर सुरक्षातंत्र को मजबूत करने व सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक हथियारों व उपकरणों की खरीद-फरोख्त के लिए तो हमारी सरकारें विभिन्न माध्यमों से चंद दिनों में ही अरबों रुपये जुटा सकती है लेकिन जब बात आती है राष्ट्र को निर्धनता, कुपोषण और भुखमरी के घोर अभिशाप से मुिक्त दिलाने की तो सारे सरकारी खजाने खाली हो जाते हैं। यदि इस दिशा में कभी कुछ करने का प्रयास किया भी जाता है तो ऐसी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने से पहले ही उनका बहुत बड़ा हिस्सा हमारे कर्णधार और नौकरशाह डकार जाते हैं। ऐसे में केवल मानवाधिकारों के संरक्षण एवं प्रोत्साहन का ढ़ोल पीटने रहने से ही आखिर हासिल क्या हो रहा है?
हमारामनुष्यजन्महमेंक्योंमिलाहै? इसकाउत्तरहैकिहमनेपूर्वजन्ममेंजोकर्मकियेथे, उनकर्मोंमेंजिनकर्मोंकाभोगहममृत्युकेआजानेकेकारणनहींकरसकेथे, उनकर्मोंकाफलभोगनेकेलियेहमारायहजन्म, जिसेपूर्वजन्मकापुनर्जन्मभीकहतेहैं, होताहै।यहसिद्धान्ततर्क, युक्तिएवंशास्त्रोंकेप्रमाणोंसेसत्यसिद्धहोताहै।योगदर्शनमेंऋषिपतंजलिजीनेकहाहैकिहमारेप्रारब्धकेकर्मोंकेअनुसारहीहमारेइसजन्मकेजाति, आयुऔरभोगनिर्धारितहोतेहैं। जाति का अर्थ मनुष्य, पशु, पक्षी व नाना प्रकार के कीट व पतंग आदि जातियों से है। मनुष्य जाति पूरी की पूरी एक ही जाति है। इस मनुष्य जाति में स्त्री व पुरुष नाम के दो प्राणी होते हैं। दोनों की ही जाति मनुष्य होती है तथा लिंग भेद से एक स्त्री व दूसरा पुरुष कहलाता है। समाज में जो जन्मना जातियां प्रचलित हैं वह मध्यकाल में मनुष्यों द्वारा अज्ञानता से प्रचलित हुई जातियां हैं। ईश्वर प्रदत्त ज्ञान वेद के अनुसार मनुष्य अपने अपने गुण, कर्म व स्वभाव के भेद से चार वर्ण वाले होते हैं जिनके भेद हैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र।
ब्राह्मणवक्षत्रियआदिजातियांनहींहैंअपितुयहवर्णहैंजिसकानिर्धारणआदिववैदिकयुगमेंगुण, कर्मवस्वभावसेहुआकरताथा।यहवर्णगुरुकुलकेआचार्यराज्यव्यवस्थासेनिर्धारितकियाकरतेथे।सभीवर्णोंकेकर्मभीअलगअलगहोतेहैं।इनकोसभीलोगोंद्वाराकियाजाताथा।आजकलसभीमनुष्यअपनीस्कूलीशिक्षाप्राप्तकरकोईभीकर्मकरनेवनकरनेमेंस्वतंत्रहैं।अतःआजकलवर्णव्यवस्थासमाप्तप्रायःहोचुकीहै।जातियांतोपृथकपृथकनहींहोतीहैं, मनुष्यजातिअपनेआपमेंएकहीजातिहैक्योंकिइसमेंसभीमनुष्योंकाउत्पत्तिकातरीकातथाउनकीआकृतियांवकर्मोंमेंसमानतापायीजातीहै।अतःमनुष्योंमेंजोजन्मनाजातियांप्रचलितहैंवहवेदवशास्त्रोंकीभावनावउपदेशोंकेविरुद्धवअप्रासंगिकहैं।आजकल समाज में अन्तर्जातीय विवाह हो रहे हैं। इससे भी जाति का निरर्थक होना विदित होता है। मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव, अनेक प्रकार की सुन्दर व असुन्दर आकृतियां, स्वास्थ्य व बल आदि का ही महत्व होता है। अतः मनुष्य को वेदों की शिक्षाओं को जानना व पालन करना चाहिये। इसी से मनुष्य समाज उन्नत होता है तथा इसी से सुख व शान्ति का विस्तार होता है। ऐसा ही सृष्टि के आदि काल से महाभारत युद्ध के समय तक देश में होता रहा है। रामायण एवं महाभारत नाम के इतिहास ग्रन्थों में अनेक मनुष्यों व सामाजिक पुरुषों का वर्णन आता है परन्तु कहीं किसी के साथ कोई जाति सूचक शब्द प्रयुक्त नहीं होता। हम सब उन्हीं के वंशज और वह सब हमारे पूर्वज थे। जब पूर्वजों के नाम बिना जाति नाम वाले होते थे तो हमें भी अपने नाम के साथ किसी भी प्रकार का उपनाम जाति के नाम पर प्रयोग नहीं करना चाहिये। हमें सार्थक नाम रखने चाहियें और जीवन में ज्ञान, कर्म, बल व स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रकृष्ट मनुष्य बनने का प्रयत्न करना चाहिये।
योगदर्शननेपूर्वजन्ममेंकियेकर्मोंपरआधारितप्रारब्धकेआधारपरहमेंइसजन्ममेंजातिमिलनेकीजोबादकहीहै, वहमनुष्य, पशुआदिवइतरप्राणियोंकेभेदसेकहीगईहै।हमारीइसजन्ममेंआयुकाआधारमुख्यतःहमाराप्रारब्धहीहोताहै।हमेंअपनेमनुष्यजन्ममेंकर्मकरनेकीस्वतन्त्रताप्राप्तहै।इसकाभीहमारीआयुपरप्रभावपढ़ताहै।श्रेष्ठवउत्तमकर्मोंसेआयुकोस्थिरवबढ़ायाजासकताहैऔरनिन्दितवअशुभकर्मोंसेआयुकमभीहोतीहै। ऐसा नहीं है कि हम कुछ भी कैसा भी करें, कुछ भी अच्छा व बुरा खायें, रहन सहन में भी स्वेच्छाचारिता करें, तो इसका प्रभाव हमारी आयु पर नहीं होगा। हमारे सभी कर्मों का किसी न किसी रूप में हमारी आयु पर प्रभाव पड़ता है। अतः हमारा कर्तव्य होता है कि हम प्रारब्ध के आधार पर परमात्मा से मिली आयु को इस जन्म में अपने सद्कर्मों से स्थिरता प्रदान करें, उसका रक्षण करें व उसकी संवृद्धि करें। हमारा आयु का मुख्य कारण हमारे पूर्वजन्म के कर्म अर्थात् प्रारब्ध ही हुआ करता है जिसके आधार पर परमात्मा हमारी आयु का निर्धारण करते हैं। हमारे जन्म का तीसरा आधार हमारे पूर्वजन्म के कर्म व प्रारब्ध के आधार पर भोगों का प्राप्त होना होता है। भोग हमें प्राप्त होने वाले सुख व दुःख को कहा जाता है। हमें जो सुख व दुःख प्राप्त होते हैं वह प्रायः हमारे प्रारब्ध के कर्मों के आधार पर होते हैं। इसके साथ हमें अपने इस जन्म के क्रियमाण कर्मों का सुख व दुःख भी मिला करता है। सुख दुःख के अन्य कारण आधिदैविक, आधिभोतिक तथा अध्यात्मिक भी होते हैं। हमारा यह लिखने का आशय यही है कि हमारे जीवन में कर्म का महत्व है और इसी आधार पर हमें जन्म मिलने सहित सुख व दुःखों की प्राप्ति होती है। अतः हमें कर्म विज्ञान को जानने का प्रयत्न करना चाहिये जिसके लिये हमें वेद, उपनिषद, दर्शन, प्रक्षेप रहित विशुद्ध मनुस्मृति तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का अध्ययन व स्वाध्याय करना चाहिये। ऐसा करके हम अपने जीवन में दुःखों को कम तथा सुखों को बढ़ा सकते हैं।
हमारेजीवनमेंवेदादिशास्त्रोंतथाउनकीसत्यमान्यताओंकामुख्यस्थानहोताहै।शास्त्रीयवचनहै ‘अवश्यमेवभोक्तव्यंकृतंकर्मशुभाशुभं’।इसकाअर्थहैकिमनुष्यकोअपनेकिएशुभवअशुभकर्मोंकेफलअवश्यहीभोगनेपड़तेहैं।शुभकर्मोंकाफलसुखतथाअशुभकर्मोंकाफलदुःखहोताहै।अतःमनुष्यकोशुभवअशुभकर्मोंकाभेदज्ञातहोनाचाहिये।शुभकर्मोंमेंईश्वरोपासना, अग्निहोत्रदेवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ, सद्व्यवहार, सदाचारण, परोपकारवसुपात्रोंकोदानआदिकादेनाआदिकर्मआतेहैं। इनके विपरीत जो कर्म होते हैं वह अशुभ व पाप कर्म कहलाते हैं। उनका परिणाम दुःख होता है। शुभ कर्मों को न करने से भी दुःख मिलता है। हम मनुष्य जीवन में इस पृथिवी, जगत व अन्यान्य प्राणियों से अनेक लाभ प्राप्त करते हैं। हमारा भी कर्तव्य होता है कि हम भी उन सबके प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हुए उन सबको कुछ न कुछ देने का प्रयत्न करें। ऐसा करने से ही हम अन्यों के उपकारों व ऋणों से मुक्त होते हैं। जो व्यक्ति दूसरों का जितना उपकार करता है उसको ईश्वर की व्यवस्था से उतना ही अधिक सुख प्राप्त होता है। अतः हमें ज्ञान प्राप्ति सहित ईश्वर के उपकारों को जानकर भी उसके प्रति कृतज्ञ होकर उसकी उपासना व भक्ति करनी चाहिये। इन कार्यों सहित हमें देश व समाज हित एवं सभी मनुष्यों व प्राणियों के हित व सुख की कामना भी करनी चाहिये। ऐसा करके ही हम स्वयं सुखी होकर उन्नति को प्राप्त हो सकते हैं। ऐसा जीवन ही वस्तुतः प्रशंसनीय जीवन होता है।
कर्मकाफलसभीकोभोगनापड़ताहै।इसकेक्षमाहोनेकाविधानसत्शास्त्रोंमेंनहींहै।राम, कृष्णवदयानन्दजैसेमहापुरुषवमहात्माभीअपनेपूर्वजन्मोंकेकर्मोंकेफलभोगनेसेबचेनहींथे।रामचन्द्रजीकेजीवनमेंआताहैकिजबसीतामाताकारावणनेहरणकरलियातोवहइससेअत्यन्तव्यथितहुए।इसअवस्थामेंवहलक्ष्मरणजीकोएकस्थानपरकहतेहैंकिमैंनेपूर्वजन्ममेंअवश्यहीकुछअशुभकर्मकियेथेजिसकेकारणमुझेपितासेवनवासमिलाऔरयहांभीमेरीपत्नीकाअपहरणहोगया।इसघटनाकोप्रायःसभीस्वीकारकरतेहैं।इससेअनुमानहोताहैकिकर्मकीगतिकोसमझनाकठिनहै। बहुत से महापुरुष यह भी कहते हैं कि जीवन में यदि कभी छोटा या बड़ा दुःख आये जिसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कारण समझ में न आये तो यह समझ लेना चाहिये कि यह किसी पूर्वजन्म के कर्मों का या किन्हीं विस्मृत कर्मों का फल हो सकता है जो परमात्मा की व्यवस्था से हमें मिल रहा है। योगेश्वर श्री कृष्ण तथा ऋषि दयानन्द के संघर्षपूर्ण जीवन को देखकर भी लगता है कि इनका जीवन भी अत्यन्त संघर्षों व दुःखों की छाया से युक्त था। इसके लिए इनका पूर्वजन्म व उसमें किये कर्मों को ही स्वीकार करना होगा।
हमने आर्यसमाज में अनेक विद्वानों से एक ऐतिहासिक घटना को सुना है। इसमें वह बताते हैं कि एक बार एक प्रसिद्ध नामी डाकू अपने साथियों के साथ एक धनवान व्यक्ति के घर पर डाका डालने गया। उस धनवान का घर एक मन्दिर के साथ बना हुआ था। सभी डाकू मन्दिर में पहुंच गये। सबके पास हथियार थे। रात्रि का समय था। उस समय मन्दिर में कथा चल रही थी। विद्वान उपदेशक कर्म फल सिद्धान्त को समझाते हुए शास्त्रीय प्रमाण देकर बता रहे थे कि मनुष्य को जन्म जन्मान्तर में किये हुए अपने शुभ व अशुभ कर्मों के फल अवश्यमेव भोगने पड़ते हैं। बिना भोगे कर्म छूटता नहीं है। इस उपदेश को जब प्रमुख डाकू ने सुना तो वह अपने गुप्त स्थान से कथा में आकर बैठ गया। उस डाकू को स्थानीय लोग पहचानते थे अतः सभी लोग एक एक करते भाग खड़े हुए। कुछ ही देर में ऐसा समय आया कि वक्ता व डाकू के अतिरिक्त वहां कोई नहीं था। डाकू ने वक्ता को कहा कि यदि कोई मनुष्य हजार अच्छे काम करे और कुछ थोड़े से बुरे काम करे तो क्या फिर भी उसे उन बुरे कर्मों का फल भोगना पडे़गा? वक्तानेनिर्भिकतापूर्वकउत्तरदियाकिमनुष्यकोअपनेप्रत्येकशुभकर्मकाफलसुखकेरूपमेंतथाप्रत्येकअशुभवपापकर्मकाफलदुःखकेरूपमेंअलगअलगभोगनापड़ताहै।बिनाभोगेकोईकर्मछूटतावाक्षयकोप्राप्तनहींहोता।इससेउसडाकूकाहृदयपरिवर्तनहोगया।उसनेचोरीवडाकाडालनाछोड़दियाऔरधर्मकीदीक्षालेकरधर्मकार्यकरनेलगा। अध्ययन करते हुए पाठकों को ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। डाकू रत्नाकर को पाप पुण्य का रहस्य विदित होने पर वह ऋषि बाल्मीकि बन गये थे। इस कथा को भी अधिकांश लोगों ने पढ़ा है। यह भी एक दृष्टान्त है जिससे हमें सद्कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।
कर्म फल सिद्धान्त का निष्कर्ष यह है कि हम जो भी शुभ व अशुभ कर्म करते हैं, इन्हें ही पुण्य व पाप कर्म भी कहा जाता है, इनका फल हमें जन्म जन्मान्तर में अवश्य ही भोगना पड़ता है। असत्, पाप व अशुभ कर्मों का फल दुःख तथा सत्, पुण्य व शुभ कर्मों का फल सुख व आनन्द होता है। इस रहस्य को जानकर हमें सत्कर्मों का आचरण तथा असत् कर्मों का त्याग करना चाहिये। ऋषि दयानन्द ने इसे ही आर्यसमाज का चतुर्थ नियम भी बनाया है। नियम है ‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।’ ऐसा करके हमारा जीवन सफलता को प्राप्त हो सकता है। हमें मनुष्य जीवन को सार्थक करने के लिए वेद, उपनिषद, दर्शन, प्रक्षेप रहित मनुस्मृति सहित अनिवार्य रूप से ऋषि दयानन्द कृत सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों का बार बार अध्ययन व मनन करना चाहिये। ऐसा करके ही हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। ओ३म् शम्।
अपनी तरह की एक अनूठी पहल के अंतर्गत, स्कॉटलैंड में अगले साल होने वाली COP26 क्लाइमेट समिट से पहले देश के नागरिकों को ग्लोबल सिटीजन असेंबली में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य पूरी दुनिया के करोड़ों लोगों को एक साथ लाकर इस बात पर विचार विमर्श कराना है कि जलवायु संबंधी संकट से निपटने के लिए दुनिया कौन सी रणनीति अपनाए।
जलवायु संबंधी संकट से निपटने में सरकारों की मदद के लिए सिटीजन असेंबली एक प्रभावी और लोकप्रिय माध्यम के तौर पर तेजी से उभर रही है। यह ऐसे मंच हैं जिनका चुनाव लॉटरी के जरिए होता है। इसकी वजह से जनसांख्यिकी रूप से विविध समूहों के लोग एक मंच पर एकत्र होते हैं और एक नीतिगत मुद्दे पर एक बड़ी अवधि के दौरान विचार-विमर्श करते हैं। इससे उन्हें इस मुद्दे के बारे में और ज्यादा जानने का मौका मिलता है। साथ ही विशेषज्ञों की जानकारी का परीक्षण करने और विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व कर रहे लोगों के साथ बातचीत में शामिल होने तथा आगे बढ़ने के संभावित रास्तों के बारे में अपने साथी सहभागियों के साथ चर्चा करने का अवसर भी मिलता है। यह प्रक्रिया बेहद बारीक बहस और नीतिगत सिफारिशों तथा निर्णयों को जनता द्वारा स्वीकार किए जाने का मौका देती है। हाल ही में हुई फ्रेंच क्लाइमेट असेंबली के बाद किए गए सर्वेक्षण में इस असेंबली के बारे में सुनने वाले फ्रांस के 62% लोगों ने इसमें की गई सिफारिशों का समर्थन किया। वहीं, 60% लोगों ने माना कि सुझाये गए उपाय प्रभावशाली होंगे।
गौर करने वाली बात है कि इस पहल को संयुक्त राष्ट्र का समर्थन हासिल है और इसकी अगुवाई इस साल के शुरू में ब्रिटिश संसद कि क्लाइमेट सिटीजंस असेंबली का संचालन करने वाले संगठन इंवॉल्व के संस्थापक रिक विल्सन कर रहे हैं। इस ग्लोबल असेंबली को अमलीजामा पहनाने के लिए काम कर रही टीम में कैनबरा यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर डेलिबरेटिव डेमोक्रेसी एंड ग्लोबल गवर्नेंस के प्रोफेसर निकोल क्यूरेटो और डॉक्टर साइमन नीमेयर, सोर्टिशन फाउंडेशन के सह निदेशक ब्रेट हेनिग तथा डेनिश बोर्ड ऑफ़ टेक्नोलॉजी के उपनिदेशक बियान बिल्स्टॅ समेत विशेषज्ञों का एक पूरा समूह शामिल है।
स्कॉटलैंड की यह विराट सभा दो हिस्सों में होगी। इसका पहला हिस्सा ऑनलाइन को-असेंबली के तौर पर होगा। इसमें 1000 लोग शामिल होंगे जो दुनिया की आबादी की सटीक जनसांख्यिकीय तस्वीर का प्रतिनिधित्व करेंगे। वहीं, दूसरा हिस्सा राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों के तौर पर होगा जो पूरी तरह से कोर एसेंबली से जुड़ा होगा। इस विशाल सभा में हिस्सा लेने वाले हर व्यक्ति को अंतिम सिफारिशों पर अपनी बात कहने का मौका मिलेगा।
कोर असेम्बली में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किए जाने वाले लोगों का चयन लॉटरी के जरिए होगा और आयोजनकर्ताओं को उम्मीद है कि दुनिया का कोई भी नागरिक इसमें चुना जा सकता है। इसका मतलब यह है कि भारत की किसी फैक्ट्री का एक मजदूर फ्रांस में काम कर रहे किसी बस चालक के साथ मिलकर जलवायु संबंधी संकट से निपटने की योजना पर काम कर सकेगा।
ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त मार्क रायलेंस एक ‘क्राउडफंडर’ लागू करने में मदद करेंगे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ग्लोबल सिटीजन असेंबली का वित्तपोषण उन्हीं लोगों द्वारा हो, जिनके भले के लिए इसका आयोजन किया जा रहा है। इस असेंबली के लिए अनेक तकनीकी तथा अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए धन की जरूरत होगी। इनमें प्रतिभागियों के लिए अनुवादकर्ताओं तथा जरूरी उपकरणों पर होने वाला व्यय तथा उन लोगों के बच्चों की देखभाल के लिए जरूरी चीजों पर होने वाला खर्च शामिल है जो अपने बच्चों के साथ इस कार्यक्रम में हिस्सा नहीं ले पाएंगे।
ऐसी सभाओं को गलत सूचनाओं, सोशल मीडिया, ध्रुवीकरण तथा अत्यधिक पक्षपात और विशेषज्ञों के अविश्वास के जरिए आकार पाये जनसंवाद के बढ़ते असर को संतुलित करने के एक माध्यम के तौर पर भी देखा जा सकता है।
हालांकि पूर्व में राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी जलवायु जनसभाएं आयोजित हुई है, लेकिन अभी तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी किसी असेंबली पर काम नहीं हुआ। साथ ही साथ अभी तक ऐसी कोई सिटीजन असेंबली नहीं हुई जिसमें दुनिया के किसी भी कोने का कोई भी व्यक्ति शामिल हो सके। यह पहलू लोकतंत्र में इसे अपनी तरह का अनूठा प्रयोग बनाता है। उम्मीद है कि अगले साल ग्लास्गो में आयोजित होने जा रही क्लाइमेट समिट के दौरान दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष आम लोगों द्वारा इस अंतर्राष्ट्रीय असेंबली में किए जाने वाले ऐसे केंद्रित विचार विमर्श को नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पिछले साल लॉटरी के जरिए चुने गए 150 नागरिकों को वर्ष 2030 तक देश के कार्बन उत्सर्जन में कम से कम 40% की कटौती करने के रास्तों पर विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया था। नौ महीनों से ज्यादा समय तक इस असेंबली ने तकनीकी सवालों का जवाब हासिल करने में मदद के लिए 130 से ज्यादा विशेषज्ञों को सुना। इस असेंबली में 149 उपाय सुझाए गए जिनमें वर्ष 2040 तक सभी इमारतों में ऊर्जा पुनरुद्धार संबंधी काम मुकम्मल करने जैसे उपाय भी शामिल हैं। इनमें से अनेक उपायों को फ्रांस की पिछली नीति कार्य योजना के मुकाबले कहीं ज्यादा महत्वाकांक्षी माना गया।
ब्रिटिश कोलंबिया के कनाडाई प्रांत ने भी चुनाव सुधारों पर एक सिटीजन असेंबली बुलाई थी, जिसमें जनमत संग्रह को लेकर सफलतापूर्वक एक रास्ता सुझाया गया। इसके अलावा स्वैच्छिक गर्भपात तथा समलैंगिक विवाह के मुद्दों पर हुई आयरिश सिटीजंस असेंबली में संवैधानिक सुधारों पर राष्ट्रीय स्तर पर वाद-विवाद हुआ।
हाई लेवल एक्शन चैंपियन यूएनएफसीसीसी, सीओपी26 नाइजेल टॉपिंग ने कहा “सीओपी26 के लिए ग्लोबल सिटीजन असेंबली अब तक की अपनी तरह की सबसे बड़ी खबर है। इससे दुनिया भर के लोगों के बीच नए रिश्ते कायम होंगे। साथ ही नागरिकों और नेताओं के बीच भी नए संबंध बनेंगे। सीओपी26 को सही मायने में महत्वाकांक्षी बनाने के लिए ऐसे प्रयास जरूरी हैं।”
कैनबरा यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर दिल्ली ब्रिटिश डेमोक्रेसी एंड ग्लोबल गवर्नेंस की प्रोफेसर निकोल कुराटो ने कहा “सीओपी26 के लिए आयोजित की जाने वाली ग्लोबल सिटीजंस असेंबली हमारी जलवायु सुशासन प्रणालियों में बहुप्रतीक्षित रचनात्मकता महत्वाकांक्षा और वैधता को पैवस्त करने का एक बेहतरीन अवसर है। यह एक सर्वोत्तम उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर तैयार किया गया है और यह अंतरराष्ट्रीय जलवायु निर्णय निर्माण में मौलिक रूप से सुधार करने के एक व्यवहारिक तंत्र का प्रतिनिधित्व करता है।”
ग्लोबल असेंबली सीओपी 26 की कोर टीम की सदस्य सूज़न नाकिंग ली ने कहा “जहां नौजवान पीढ़ी बढ़ते हुए तापमान और पारिस्थितिकी प्रणालियों में आ रही खराबी से हताश हैं बल्कि हम भी पुराने राजनीतिक समाधानों को लगातार रीसायकल किए जाने से हताश हैं। जब मुझे ग्लोबल असेंबली बारे में पता लगा तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसी किसी इकाई का अब तक कोई गठन नहीं हुआ था। सीओपी26 के लिए एक वैश्विक जमावड़ा न सिर्फ जरूरी लगता है बल्कि यह एक कॉमन सेंस जैसा भी महसूस होता है।”
इंवॉल्व के संस्थापक और ओएससीए सोशल इंपैक्ट लैब के निदेशक रिक विल्सन ने कहा “जलवायु से लेकर कोविड-19 तक यह लगातार स्पष्ट होता जा रहा है कि हमारी अंतर्राष्ट्रीय शासन प्रणालियां मौजूदा युग में कई संकटों से एक साथ निपटने में मुश्किलों का सामना कर रही हैं। ग्लोबल असेंबली कोई एक परियोजना नहीं है बल्कि यह सुशासन के ढांचे का एक नया हिस्सा है। इसका मकसद अपने नेताओं की बदलावों के बारे में समझ सुनिश्चित करने के साथ-साथ लोगों को नेतृत्व के लिए मानसिक रूप से तैयार करना है क्योंकि इस वक्त हर किसी को अपनी अपनी भूमिका निभानी है।’’
लंबे वक्त से जलवायु पर अंतरराष्ट्रीय बहस में शक्तिशाली माइनॉरिटीज का दबदबा रहा है। अब इसे खत्म करने का समय आ गया है। ग्लोबल सिटीजंस असेंबली वैश्विक लोकतंत्र में किया जा रहा अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग है। यह हमारे सामने खड़े संकट जितना ही बड़ा महत्वाकांक्षी कदम है।
ग्लोबल असेंबली सीओपी26 की कोर टीम की सदस्य क्लेयर मेलियर ने कहा “हम ग्लोबल असेंबली में अनेक नई आवाजें लाएंगे जिन्हें पहले कभी शायद ही सुना गया हो। हो सकता है कि वह उन स्थितियों से सहमत ना होने जा रहे हों, जिनसे हम गुजर रहे हैं या फिर इस बात से सहमत ना हों कि हमें आगे क्या करना चाहिए। बहरहाल, हम लोगों को ध्यानपूर्वक सुनेंगे ताकि वास्तविक समझ सामने आ सके और जब यह होगा तो हम जानते हैं कि नई संभावनाएं प्रकाश में आएंगी, जिनसे पता लगेगा कि हम साथ मिलकर क्या कर सकते हैं।’’
डैनिश बोर्ड ऑफ़ टेक्नोलॉजी के उपनिदेशक बियान बिल्स्टॅ ने कहा “सीओपी26 के लिए ग्लोबल सिटीजंस असेंबली की बुनियाद उन बातों पर टिकी है जो हमने कोपनहेगन और पेरिस सीओपी में वर्ल्ड वाइड व्यूज प्रोजेक्ट्स से सीखी थीं। इस बार अलग यह है कि हम नागरिकों को अपने नीति एजेंडा लेकर सामने आने का मौका दे रहे हैं। हमारे पास बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक विचार-विमर्श है और हम 100% डिजिटल होने को तैयार हैं।’’
भले ही COP26 UN जलवायु वार्ता में फ़िलहाल साल भर का समय हो, लेकिन दुनिया भर के डॉक्टरों और तमाम स्वास्थ्यकर्मियों को अभी से ही एकजुट हो जाना चाहिए उस वार्ता को सार्थक बनाने के लिए। ऐसा इसलिए क्योंकि पेरिस समझौते के लक्ष्यों का पूरा होना सीधे तौर पर पूरी मानवता के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित कर सकता है।
इस विचार को विस्तार से द जर्नल ऑफ क्लाइमेट चेंज एंड हेल्थ में एक लेख में उल्लेखित किया गया है। लेख में स्वास्थ्यकर्मियों और डॉक्टरों से पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने में उनकी भूमिका निभाने के लिए आग्रह किया गया है। लेख के अनुसार नवंबर 2021 में होने वाले COP 26 के परिणाम को प्रभावित करने के लिए स्वास्थ्य पेशेवरों और उनके संगठनों को अभी से एकजुट होना होगा।
हेल्थ प्रोफेशनल्स, द पेरिस अग्रीमेंट, एंड द फीयर्स अर्जेंसी ऑफ़ नाउ शीर्षक के इस लेख को पेरिस समझौते की पांचवीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ एलायंस (GCHA) के निदेशक मंडल के सदस्यों द्वारा लिखा गया है। इस लेख के अनुसार, “स्वास्थ्य पेशेवरों को पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए काम कर रहे विज्ञान-आधारित अधिवक्ताओं के बढ़ते वैश्विक समुदाय में शामिल होना चाहिए। सभी लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा और सुधार के लिए हमारी प्रतिबद्धता को पूरा करने से अभिनेताओं के विविध और व्यापक गठबंधन की आवश्यकता होती है। हमें विश्व की ऊर्जा, परिवहन, कृषि और अन्य भूमि उपयोग प्रणालियों को बदलने के लिए समर्थन और निर्माण करना चाहिए, जो मानव स्वास्थ्य की रक्षा के लिए पर्याप्त है और जलवायु प्रणाली की मरम्मत करता है जिस पर यह निर्भर करता है। स्वास्थ्य पेशेवरों के रूप में, हमें इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक और राजनीतिक निर्माण करने में मदद करनी चाहिए, जिस तरह हम नशे की लत को समाप्त करने और वैक्सीन-रोकथाम योग्य बीमारी को रोकने के लिए काम करते हैं।”
GCHA बोर्ड के सदस्य और जलवायु और चिकित्सा पर मेडिकल कंसोर्टियम का प्रतिनिधित्व करने वाले एडवर्ड मेबाच, ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, “हमारा मानना है कि पेरिस समझौते के लक्ष्य मानवता के सबसे महत्वपूर्ण जनस्वास्थ्य के लक्ष्य भी हैं।” वो आगे कहते हैं, “फ़िलहाल एक-एक दिन की देरी भारी पड़ रही है और तमाम बाधाओं का भी सामना भी करना पड़ रहा है, लेकिन यह अवसर है हम स्वास्थ्य पेशेवरों के के लिए एकजुट होने का।”
आगे, GCHA के कार्यकारी निदेशक जेनी मिलर कहते हैं, “COP26 के साथ एक महत्वपूर्ण मोड़ आने की संभावना है, जो दुनिया भर में वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए मानव स्वास्थ्य, समृद्धि, इक्विटी और न्याय के भाग्य को निर्धारित कर सकता है। और इसमें स्वास्थ्य पेशेवरों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।” इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन में सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दों के लिए लिआसन अधिकारी, ओमानिया एल ओमरानी ने कहा, “दुनिया भर में, हजारों अस्पताल और स्वास्थ्य प्रणाली पहले से ही जलवायु पर काम कर रहे हैं और स्वास्थ्य देखभाल के लिए एक वैश्विक आंदोलन का गठन, लचीलापन और स्वच्छ ऊर्जा तक पहुंच – और यह राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं में एक महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है”।
द क्लाइमेट एंड हेल्थ एलायंस में एसोसिएट प्रोफेसर यिंग झांग, कहते हैं “तूफ़ान और बाढ़ जैसी चरम मौसम घटनाएँ सीधे तौर पर लोगों पर असर करते हैं और हम वैसे ही वायु प्रदूषण, वेक्टर जनित बीमारियों, दूषित भोजन और पानी से बिगड़ते हुए स्वास्थ्य को देख रहे हैं। जो लोग हाशिए पर हैं और बेरोजगार हैं, उन्हें आमतौर पर सबसे ज्यादा नुकसान होता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सभी पर पड़ेगा।”
योगेश कुमार गोयल वर्ष 2001 में ऊर्जा मंत्रालय के अधीनस्थ ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा देश में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम लागू किया गया था। दरअसल दुनियाभर में पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है और उसी के अनुरूप ऊर्जा की खपत भी निरन्तर बढ़ रही है लेकिन दूसरी ओर जिस तेजी से ऊर्जा की मांग बढ़ रही है, उससे भविष्य में परम्परागत ऊर्जा संसाधनों के नष्ट होने की आशंका बढ़ने लगी है। अगर ऐसा होता है तो मानव सभ्यता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। यही कारण है कि भविष्य में उपयोग हेतु ऊर्जा के स्रोतों को बचाने के लिए विश्वभर में ऊर्जा संरक्षण की ओर विशेष ध्यान देते हुए इसके प्रतिस्थापन के लिए अन्य संसाधनों को विकसित करने की जिम्मेदारी बढ़ गई है। ऊर्जा की न्यूनतम मात्रा का उपयोग करने और इसके अनावश्यक उपयोग से बचने को ही ‘ऊर्जा संरक्षण’ कहा जाता है। ऊर्जा संरक्षण का सही अर्थ ऊर्जा के अनावश्यक उपयोग से बचते हुए कम से कम ऊर्जा का उपयोग करना है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो का कहना है कि ऊर्जा संरक्षण योजना को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवहार में ऊर्जा संरक्षण को शामिल करना चाहिए। ऊर्जा के अपव्यय को कम करने, ऊर्जा बचाने और इसके संरक्षण के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए देश में प्रतिवर्ष एक खास विषय के साथ कुछ लक्ष्यों तथा उद्देश्यों को मद्देनजर रखते हुए लोगों के बीच इन्हें अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस भी मनाया जाता है। इसके जरिये ऊर्जा के अनावश्यक उपयोग को न्यूनतम करते हुए लोगों को मानवता के सुखद भविष्य के लिए ऊर्जा की बचत के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया जाता है। विद्युत मंत्रालय द्वारा देश में ऊर्जा संरक्षण की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए शुरू किया गया ‘राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अभियान’ एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान है। देश में ऊर्जा संरक्षण तथा कुशलता को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1977 में केन्द्र सरकार द्वारा पैट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान एसोसिएशन का गठन किया गया था। ऊर्जा दक्षता और ऊर्जा संरक्षण के महत्व के बारे में आम जनता में जागरूकता बढ़ाने के लिए वर्ष 2001 में एक अन्य संगठन ‘ऊर्जा दक्षता ब्यूरो’ (ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी) भी स्थापित किया गया। ब्यूरो का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति छोटे-छोटे कदम उठाकर अपने घर अथवा कार्यालय में लाईट, पंखे, हीटर, कूलर, एसी तथा बिजली के अन्य किसी भी उपकरण के अनावश्यक उपयोग पर नियंत्रण करते हुए ऊर्जा की बचत कर सकता है। छोटे-छोटे स्तर पर ऊर्जा संरक्षण के लिए कदम उठाकर भी प्रत्येक नागरिक देश के राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अभियान में बहुत बड़ी मदद दे सकता है और इस प्रकार बड़ी मात्रा में ऊर्जा संरक्षण किया जा सकता है। अगर ऐसे ही कुछ छोटे उपायों का उल्लेख किया जाए तो पुराने बल्बों के स्थान पर सीएफएल या एलईडी बल्बों का इस्तेमाल किया जाए। आई.एस.आई. चिन्हित विद्युत उपकरणों का ही उपयोग करें। यथासंभव दिन के समय सूर्य की रोशनी का अधिकतम उपयोग किया जाए और जरूरत न होने पर लाइटें, पंखे, कूलर, ए.सी., हीटर, गीजर इत्यादि विद्युत उपकरण बंद रखें। यथासंभव खाना पकाने के लिए बिजली के उपकरणों के बजाय सोलर कुकर और पानी गर्म करने के लिए बिजली के गीजर के बजाय सोलर वाटर हीटर के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। भवन निर्माण के समय प्लाट के चारों ओर वृक्ष लगाए जाएं तो प्रचण्ड गर्मी में भी भवन गर्म होने से बचेंगे और कूलर, एसी इत्यादि की जरूरत कम होगी। मकानों या कार्यालयों में दीवारों पर हल्के रंगों के प्रयोग से कम रोशनी वाले बल्बों से भी कमरे में पर्याप्त रोशनी हो सकती है। इससे न केवल ऊर्जा संरक्षण अभियान में सहभागी बनकर हम भ्विष्य के लिए ऊर्जा बचाने में मददगार बनेंगे बल्कि अपना बिजली बिल भी सीमित रख सकेंगे। सार्वजनिक स्थानों पर सौर लाइटों की व्यवस्था होनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार कार्यस्थल पर दिन के समय प्राकृतिक रोशनी में कार्य करने वाले लोगों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है और ऊर्जा की खपत में अपेक्षित कमी आती है, वहीं तेज कृत्रिम रोशनी वाले स्थानों पर काम करने से कर्मियों में तनाव, सिरदर्द, रक्तचाप, थकान जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं देखी जाती हैं और उनकी कार्यकुशलता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए ऑफिस में यदि पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी का व्यवस्था हो तो इससे ऊर्जा संरक्षण होने के साथ-साथ कर्मचारियों की कार्यक्षमता भी बढ़ती है। प्रतिवर्ष देश में हजारों गैलन पानी बर्बाद होता है, इसलिए ऊर्जा संरक्षण की बात करते समय जल की बर्बादी को रोकने पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना भी बेहद जरूरी है। हालांकि दैनिक जीवन में उपयोग के लिए जीवाश्म ईंधन, कच्चे तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस इत्यादि ऊर्जा स्रोतों द्वारा पर्याप्त ऊर्जा उत्पन्न की जा रही है लेकिन ऊर्जा की लगातार बढ़ती मांग को देखते हुए भविष्य में इन ऊर्जा संसाधनों की अत्यधिक कमी होने या इनके समाप्त होने का भय पैदा हो गया है। यही कारण है कि भारत सहित दुनियाभर में अब ऊर्जा के गैर-अक्षय संसाधनों के मुकाबले अक्षय ऊर्जा संसाधनों की मांग निरन्तर तेजी से बढ़ रही है। इसीलिए भारत में भी अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है और सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा इत्यादि का उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़ी-बड़ी परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं। पर्यावरण संरक्षण पर प्रकाशित बहुचर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के मुताबिक अक्षय ऊर्जा असीमित और प्रदूषणरहित ऊर्जा है, जिसका नवीकरण होता रहता है। ऊर्जा संरक्षण की आदतों को अपनाने के साथ ही ऐसे अक्षय ऊर्जा संसाधनों की ओर कदम बढ़ाना आज समय की सबसे बड़ी मांग है। ग्लोबल वार्मिंग तथा जलवायु परिवर्तन से बचाव के दृष्टिगत भी अक्षय ऊर्जा संसाधनों को प्रोत्साहित किया जाना जरूरी है। न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के समक्ष बिजली जैसी ऊर्जा की महत्वपूर्ण जरूरतें पूरी करने के लिए सीमित प्राकृतिक संसाधन हैं, साथ ही पर्यावरण असंतुलन और विस्थापन जैसी गंभीर चुनौतियां भी हैं। ऐसी गंभीर समस्याओं और चुनौतियों से निपटने के लिए अक्षय ऊर्जा ऐसा बेहतरीन विकल्प है, जो पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने के साथ-साथ ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने में भी कारगर साबित होगा लेकिन ऊर्जा के संसाधन गैर-अक्षय हों या अक्षय, हमें अपने जीवन में ऊर्जा के महत्व को समझते हुए ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूक होना ही होगा। देश के प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि ऊर्जा चाहे किसी भी रूप में हो, वह उसे व्यर्थ में नष्ट न करे। अपने और आने वाली पीढि़यों के सुखद भविष्य के लिए हमें अपने व्यवहार में ऊर्जा संरक्षण की आदतों को शामिल करना ही होगा।
-मनमोहन कुमार आर्य वेद सृष्टि के आदि ग्रन्थ होने सहित ज्ञान व विज्ञान से युक्त पुस्तक हैं। वेद जितना प्राचीन एवं सत्य मान्यताओं से युक्त अन्य कोई ग्रन्थ संसार में नहीं है। वेद से मनुष्य के जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है और मार्गदर्शन प्राप्त होता है। वेदों के सत्यार्थ को जानकर हम न केवल ईश्वर, जीव तथा प्रकृति के सत्यस्वरूप से परिचित होते हैं अपितु हमें अपने जीवन के लक्ष्य का बोध होकर उसकी प्राप्ति का साधन व उपाय भी हमें वेदों से ही प्राप्त होते हैं। वेद जितना महत्वपूर्ण ज्ञान व धर्मग्रन्थ संसार में दूसरा कोई नहीं है। वेद विश्व मानव समाज की सबसे महत्वपूर्ण एवं उत्तम निधि है। अतः सबको वेदों की रक्षा करना, उसको जानना व अज्ञानियों में उसका प्रचार करना कर्तव्य सिद्ध होता है। वेद के प्रचार में अनेक कठिनाईयां आती हैं। वेद ईश्वर की भाषा संस्कृत में हैं। आम व्यक्ति इस भाषा को जानते नहीं हैं, अतः वेदों के ज्ञान का प्रकाश आम मनुष्य सीधे वेदों को मूल भाषा में पढ़कर प्राप्त नहीं कर सकते। प्रचार में दूसरी बाधा उन ग्रन्थों की भी है जिनमें वेदों के असत्य व अज्ञान से युक्त अर्थ किये गये हैं। वेदों पर सबसे अधिक प्रामाणिक भाष्य व टीका ऋषि दयानन्द सरस्वती जी की ही मिलती है। ऋषि दयानन्द वेदों के मर्मज्ञ थे। वह 18 घण्टे तक की समाधि को सिद्ध किये हुए योगी थे। समाधि में मनुष्य को ईश्वर का साक्षात्कार होता है। इसका अर्थ यह है कि ऋषि दयानन्द ने इस संसार को बनाने, चलाने व प्रलय करने वाले ईश्वर, जो सब जीवों का माता, पिता, आचार्य, राजा, न्यायाधीश के समान रक्षक एवं प्रेरक है, उसका साक्षात्कार किया था और इसके सत्यस्वरूप व भावनाओं को यथार्थरूप में जाना था। अतः ऋषि दयानन्द का वेदभाष्य सबसे अधिक प्रामाणित एवं उपादेय है। इसके बाद आर्य विद्वानों के वेदभाष्य व टीकायें भी प्रामाणिक कोटि में आते हैं। सभी मनुष्यों को अपने कल्याण व लाभ के लिये ऋषि दयानन्द और आर्य विद्वानों के वेद भाष्यों का अध्ययन करना चाहिये। वेदाध्ययन कर वेदों की सभी सत्य मान्यताओं वा सिद्धान्तों को जीवन में धारण करने से ही मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति होने सहित ईश्वर की प्राप्ति वा उसका साक्षात्कार तथा धर्म, अर्थ काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनुष्य के लिये ईश्वर व सांसारिक पदार्थों का सत्य ज्ञान ही प्राप्तव्य हैं। इनको प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य का जीवन सफल हो जाता है। उसे और किसी पदार्थ को प्राप्त करना अभीष्ट नहीं रहता।
वेदों को जन सामान्य में प्रचारित करने का सबसे समर्थ एवं प्रमुख साधन सत्यार्थप्रकाश का प्रचार है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ ऋषि दयानन्द सरस्वती की रचना है जिसमें वेदों के सभी सिद्धान्तों व मान्यताओं को संक्षेप में वेदों की भावना के अनुकूल सत्यरूप में प्रस्तुत किया गया है। सत्यार्थप्रकाश की यह विशेषता है कि इससे वेदों का सत्य व यथार्थ स्वरूप जाना जाता है। संसार में सत्यार्थप्रकाश के समान महत्वपूर्ण अन्य कोई ग्रन्थ नहीं है। इस ग्रन्थ को पढ़कर नास्तिक आस्तिक बन जाते हैं। अज्ञानी लोग इसे पढ़कर ईश्वर, जीव व प्रकृति के सत्यस्वरूप को प्राप्त होते हैं। वेदों के अनेक रहस्यों का अनावरण सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ को पढ़ने से होता है। यह सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ 14 समुल्लासों में रचा गया है। सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में ईश्वर के अनेक नामों पर प्रकाश डालकर युक्तियों व तर्कों से बताया गया है कि एक ईश्वर में अनन्त गुण होने से ईश्वर के गुण, कर्म व संबंधों पर आधारित अनन्त नाम हो सकते हैं। इसलिये ईश्वर के अनेक नाम होना दोष नहीं अपितु गुण होता है। मनुष्यों के भी गौणिक, कार्मिक एवं सम्बन्ध सूचक नाम होते ही हैं तब परमात्मा में इनका निषेध करना उचित नहीं होता। अतः मनुष्य को ईश्वर को उसके मुख्य व निज नाम ओ३म् सहित उसके गौणिक आदि नामों से ग्रहण कर उसकी उपासना करनी चाहिये। मनुष्य को चेतन एवं जड़ देवों में अन्तर को भी समझना चाहिये। परमात्मा, माता, पिता व आचार्य आदि चेतन देव होने से उपासनीय होते हैं। जड़ देवता अग्नि, वायु, जल, पृथिवी, सूर्य, चन्द्र आदि से हम जो लाभ लेते हैं उसके लिये अग्निहोत्र यज्ञ करके हम उनके उपकारों के प्रति अपनी कृतज्ञता को व्यक्त करते हैं। कोई भी जड़ देवता उपासनीय व भक्ति करने योग्य नहीं होता। उपासना के लिये एक परमेश्वर जो सब देवों का देव महादेव होता है, वही परमात्मा उपासनीय होता है। ईश्वर में अनन्त गुण हैं जिनसे हमारा अनादि काल से उपकार हो रहा है। हम ईश्वर के ऋणी है। हम ईश्वर को अपनी ओर से कुछ पदार्थ दे नहीं सकते जिसकी उसको आवश्यकता हो व उसके लिए उपयोगी हो। अतः हमें ईश्वर प्रदत्त साधन मानव शरीर को उसकी भक्ति व उपासना में लगाकर उसका गुण कीर्तिन व स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना के द्वारा ही उसके प्रति अपनी कृतज्ञता को प्रकट करना चाहिये।
ऋषि दयानन्द ने वेदों को सप्रमाण सब सत्य विद्याओं का पुस्तक बताया है। यह बात अनेक प्रमाणों से भी सिद्ध होती है। अनेक विद्वानों ने इस विषय पर ग्रन्थ लिखे हैं। उसको पढ़कर हम वेदों की महत्ता को समझ सकते हैं। इस आधार पर ऋषि दयानन्द ने मनुष्यों के लिए उपयोगी अनेक विषयों को सत्यार्थप्रकाश में प्रस्तुत किया है। दूसरे समुल्लास में बाल शिक्षा एवं इससे जुड़े अनेक विषयों को वैदिक मान्यताओं के आधार पर प्रस्तुत कर उनकी विशेषता एव महत्ता को प्रस्तुत किया गया है। तीसरे समुल्लास में बालको व ब्रह्मचारियों के अध्ययन व अध्यापन पर प्रकाश डाला गया है। इसमें गायत्री मन्त्र की व्याख्या, प्राणयाम की शिक्षा, सन्ध्या अग्निहोत्र उपदेश, उपनयन समीक्षा, ब्रह्मचर्य उपदेश, पठन पाठन की विशेष विधि, ग्रन्थों के प्रामाणिक व अप्रमाणिक होने के विषय सहित स्त्री शूद्रों का वेदाध्ययन में अधिकार एवं अन्य अनेक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। चतुर्थ समुल्लास में समावर्तन विषय, विवाह, गृहस्थ जीवन आदि विषयों से जुड़े अनेक पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। पांचवें समुल्लास में वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम के महत्व को बताकर इनके सत्यस्वरूप से परिचित कराया गया है। यह दोनों आश्रम आज भी प्रासंगिक हैं, इसका ज्ञान इस समुल्लास को पढ़कर होता है। छठे समुल्लास में राजधर्म व उससे जुड़े अनेक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। सातवें समुल्लास में ईश्वर से जु़ड़े अनेक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। आठवें समुल्लास में सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय के विषय, नवम् समुल्लास में विद्या, अविद्या, बन्धन तथा मोक्ष विषयों को प्रस्तुत किया गया है। दसवां समुल्लास आचार, अनाचार तथा भक्ष्य व अभक्ष्य विषयों पर विस्तार से प्रकाश डालता है। इन दस समुल्लासों में ऋषि दयानन्द ने प्रमाणों व युक्तियों के साथ वेद की मान्यताओं व सिद्धान्तों का पोषण व मण्डन किया है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के उत्तरार्ध के चार समुल्लासों में ऋषि दयानन्द ने संसार के सभी मत-मतान्तरों पर वेद के आधार पर दृष्टि डाली है और उनकी मान्यताओं व सिद्धान्तों की परीक्षा, समालोचना सहित उनका खण्डन व मण्डन आदि निष्पक्ष एवं मानव जाति के हित की दृष्टि से किया है। सत्यार्थप्रकाश अपने विषय का अनूठा व ‘न भूतो न भविष्यति’ जैसा ग्रन्थ है। अतः सभी मनुष्यों को इस ग्रन्थ को निष्पक्ष भाव से सत्य की प्रतिष्ठा और असत्य के त्याग की भावना से पढ़ना चाहिये।
सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की रचना ऋषि दयानन्द ने सन् 1874 में की थी। इसके बाद इसका संशोधित एवं परिवर्धित संस्कार सन् 1883 में तैयार में किया था। यह संस्करण सन् 1884 में मुद्रित होकर प्रकाशित हुआ। इससे पूर्व 30 अक्टूबर, 1883 में ऋषि का अजमेर में बलिदान हो चुका था। मृत्यु का कारण जोधपुर प्रवास में उनको एक षडयन्त्र के अन्तर्गत विष दिया जाना था। सत्यार्थप्रकाश ने अपनी रचना सन् 1874 से अब तक करोड़ों लोगों के जीवन को प्रकाशित किया है। उन्हें सत्य व कल्याण का मार्ग दिखाया है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का प्रभाव सभी मतों पर पड़ा है। सत्यार्थप्रकाश में मत-मतान्तरों की जो समीक्षायें की गई हैं उसका एक प्रभाव यह हुआ कि अविद्या से युक्त मत-मतानतर भी अपनी मान्यताओं का तर्क व युक्ति से समर्थन करते हुए देखे जाते हैं। ऐसा करते हुए वह निष्पक्ष नहीं दिखाई देते। यदि सभी निष्पक्ष होते तो उसका निष्कर्ष वही निकलता जो ऋषि दयानंद ने प्रस्तुत किया है। सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर हमें विदित होता है कि मनुष्य का धर्म केवल वेद की शिक्षाओं को जानकर उनका आचरण करना ही है। मत-मतान्तर विष सम्पृक्त अन्न के समान है जिनका त्याग कर वेदों को अपनाना ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है। ऐसा मत-मतान्तरों के बहुत से लोगों ने वैदिक धर्म को अपनाकर किया भी है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ और इसके सभी विचार व मान्यतायें आज भी प्रासंगिक हैं। इस ग्रन्थ को जितनी बार पढ़ा जाता है, उतनी बार इससे नई नई प्रेरणाओं एवं रहस्यों का ज्ञान होता है। क्रान्तिकारी देशभक्त वीर सावरकर जी ने सत्यार्थप्रकाश की प्रशंसा में कहा है कि जब तक सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ मौजूद है, कोई मत अपने मत की शेखी नहीं बघार सकता। यह बात सर्वथा उचित है। हमें वेदों को जानने व उससे लाभान्वित होने के लिये प्रथम सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। ऐसा करके हम ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति एवं सृष्टि के सत्यस्वरूप से परिचित हो सकेंगे और इस सृष्टि को साधन बनाकर मनुष्य जीवन के लक्ष्य व पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त हो सकेंगे।
—विनय कुमार विनायक सुनॅ हे भइया! सुनॅ बहिनियाँ! सुनॅ मजदूर किसानवाँना, घर आंगन के स्वर्ग बनावैलॅ तोहरॅ द्वार खड़ा छीं हम्मे याचक बनी राष्ट्र निर्माता गुरु पाहुँनवांना!
भेजॅ तो आपनो मुनिया-सुगनवाँ गुरुकुल-आश्रम आरु शिक्षा भवनवाँ में अंधियारी कॅ कोहरा छांटी के लौटतौं तोहरॅ ललनवां पहनी कॅ विद्या गहनवांना!
सुनॅ हे दशरथ! सुनॅ कौशल्या! सुनॅ केकई! सुनॅ सुमित्रा बहिनियाँना आपन देश बा में रामराज्य लावैलॅ तोहरॅ द्वार खड़ा छीं हम्मे याचक बनी विश्वामित्र रंग के गुरु पाहुँनवांना!
भेजॅ तों हमरो संग आपन संतनवां गांव के विद्यापीठ-यज्ञ स्थलवां में संकटा-ताड़का संहारी के लौटतौं तोहरॅ ललनवां बनी कॅ राम-लक्ष्मणवांना!
सुनॅ ऋषि-मुनि पुत्तर! मांझी,महतो,मड़र जी! सुनॅ संत संताल-पहाड़िया भैया! गंगोता,कादर,मुसहर,मेहतर भाय जी! मानव, मानव के एक बनावैलॅ तोहरॅ द्वार खड़ा छीं हम्मे पंच बनी सामाजिक न्यायॅ के साक्षरता मिशनवांना!
भेजॅ अर्जुन, करण, बनवासी एकलव्य के बूढ़ा बरगद तरे विद्या निकेतनवां में गारंटी छै करण के कानों कॅ कुंडल के आरु एकलव्य कॅ अंगूठवा के अर्जुन जैसन ड्रेस पहिनि कॅ तीनों लगतैय एक मायी के बेटवाना!
सुनॅ मिसर जी,कुम्बर जी, सुनो बाबूभईय्या रायजी! इंसान के खालिस इंसान बनावैलॅ तोहरॅ द्वार पर खड़ा छीं हम्मे व्रतवीर बनी राष्ट्रपिता गांधी के पूरा करै लेली सपनवांना!
भेजॅ तो हमरो संग अपनॅ करेजा के टुकड़ा जनतंत्र के सरकारी स्कूल भवनवां में जात-धरम के बंधन तोड़ी कॅ बनतै हर बचवा आजाद, भगत, अशफ़ाकउल्ला, बिरसा जेन्हों महनवांना!
सुनॅ पातर जी,पाड़े जी,पंडी जी, याचक भाई! हरवाहा, चरवाहा, बाल मजदूर, धनरोपनी माई! हर बचवा के बचपन लौटावैलॅ! बाल मजदूरी से बचाबैलॅ! सभैकॅ शिक्षा अधिकार दिलावैलॅ! तोहरॅ द्वार पर आईलो छीं हम्मे मास्टर बनी संदीपनी गुरु नियर आश्रमुवां सें!
भेजॅ तों हमरो संग कमाउ बचवा कॅ काम छुड़ाय कॅ गांव के पाठशाला आरू शिक्षा केंद्रवांमा पेटभर भात,देहभर कपड़ा, बक्सा भरी किताब लैय तोहरॅ मुन्ना-मुनिया भेद मिटैतौं जी अमीरी गरीबी कॅ; बनीकॅ कृष्ण सुदमुवांना! —विनय कुमार विनायक