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ट्रूडो ने लिया कार्बन टैक्स चार गुना करने का फ़ैसला

कनाडा में कार्बन उत्सर्जन करने वालों का टूटेगा हौसला

ख़ासे इंतजार के बाद आखिर कनाडा ने अपनी लंबे समय से प्रतीक्षित जलवायु योजना का खुलासा कर ही किया है। इस प्लान की सबसे ख़ास बात है प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रूडो का कार्बन एमिशन पर टैक्स बढ़ाने का फ़ैसला। उनका मानना है कि टैक्स बढ़ाने से उत्सर्जन पर लगाम लगायी जा सकती है। इसके साथ ही, सरकार ने इस दिशा में $15 बिलियन के नए निवेश का भी फ़ैसला लिया है।

फ़िलहाल कनाडा में $24 प्रति टन कार्बन उत्सर्जन का फेडरेल टैक्स लगता है, जिसे अब सरकार ने धीरे-धीरे बढ़ाते हुए साल 2030 तक $133 तक करने का फ़ैसला किया है। कनाडा सरकार की मानें तो यह फ़ैसले कनाडा के लिए न सिर्फ़ एक स्वस्थ पर्यावरण और एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल कराएँगे बल्कि 2030 तक उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य को पार करने में भी मदद करेंगे।

हालांकि कनाडा के जलवायु विशेषज्ञों ने कार्बन की बढ़ती कीमत और जलवायु कार्रवाई में $15 बिलियन के नए निवेश का स्वागत किया है, वे कहते हैं कि कनाडा को वास्तव में एक वैश्विक स्वच्छ अर्थव्यवस्था में शामिल होने और अपने उत्सर्जन को कम करने के लिए बहुत अधिक धन की आवश्यकता है।

पेरिस में, COP21 में, कनाडा 2030 तक उत्सर्जन में 2005 के स्तर से 30 प्रतिशत की कटौती करने के सुपुर्द रहा। यह पूर्व कंजर्वेटिव सरकार द्वारा उसी वर्ष पहले निर्धारित किया गया लक्ष्य है। यह नई योजना 2030 तक 2005 के स्तर से 32-40 प्रतिशत उत्सर्जन में कमी के बीच एक लक्ष्य निर्धारित करती है। संघीय सरकार के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि अगर योजना के सभी उपायों को लागू किया जाता है, तो वे वर्तमान लक्ष्य से 40 प्रतिशत तक बढ़ा हुआ नतीजा पाएंगे।

नई जलवायु योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कार्बन की बढ़ती कीमत है। वर्तमान में, कार्बन की कीमत 30 डॉलर प्रति टन है और 2022 तक प्रति वर्ष 10 डॉलर बढ़कर 50 डॉलर प्रति टन होने वाली है। इस नई योजना के साथ, 2022 के बाद यह 15 डॉलर प्रति वर्ष के उच्च मूल्य पर बढ़ेगा और यह 2030 तक 170 डॉलर प्रति टन तक पहुंच जायेगा।

हालांकि, कार्बन मूल्य निर्धारण के आसपास एक शेष बाधा यह है कि ओंटारियो, अल्बर्टा और सस्कैचेवन के प्रांत संघीय कार्बन मूल्य के लिए अदालत कीमें चुनौतियों का अनुसरण कर रहें हैं। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई सितंबर में हुई और यह पता नहीं किप्रांतों के दावे पर कि संघीय सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र के दायरे के बहार कदम उठाएं हैं पर फैसला कब आएगा।

जलवायु योजना के अन्य उल्लेखनीय तत्वों में बॉर्डर कार्बन समायोजन की छान-बीन के प्रस्ताव शामिल हैं, जो अपने कार्बन मूल्य के बिना क्षेत्राधिकारों से आयात पर एक मूल्य डालते हैं, और मीथेन नियमों को मजबूत करते हैं।

योजना की कमियों में आने वाले स्वच्छ ईंधन मानक को सीमित करना शामिल है, जो कनाडा में सभी गैसीय जीवाश्म ईंधन पर लागू होता था लेकिन जिसमें अब गैस या ठोस ईंधन शामिल नहीं हैं। इस योजना से शून्य उत्सर्जन वाहनों के लिए जनादेश के लक्ष्य भी शामिल नहीं हैं।

जलवायु कार्रवाई के लिए नए खर्च में $15 बिलियन की मुख्य विशेषताओं में शामिल हैं

• प्रमुख परियोजनाओं में उत्सर्जन में कटौती के लिए भारी उद्योग को $3 बिलियन (स्टील और तेल)

• अरीना रंगभूमि) (और हॉल जैसी इमारतों की ऊर्जा दक्षता में सुधार के लिए समुदायों के लिए $1.5 बिलियन

• स्वच्छ ऊर्जा बिजली ग्रिड और बिजली भंडारण का विस्तार करने के लिए लगभग $1 बिलियन

• स्वदेशी समुदायों सहित दूरदराज के क्षेत्रों में डीजल ईंधन से दूर संक्रमण के लिए मदद करने के लिए $300 मिलियन

• शून्य-उत्सर्जन वाहनों के लिए छूट (रिबेट) के लिए $287 मिलियन

• कम कार्बन ईंधन के उत्पादन और उपयोग में वृद्धि के लिए $1.5 बिलियन

हालाँकि कनाडा इस नई योजना के साथ संजीदा दिखा रहा है, लेकिन लक्ष्यों को बना कर उन्हें पूरा न करने और साथ ही नीतियों को उद्योग द्वारा कमज़ोर करने का इतिहास रहा है इस देश का। 1990 के दशक की शुरुआत से, कनाडा ने अभी तक एक एकल उत्सर्जन कटौती लक्ष्य को पूरा नहीं किया है। कनाडा 2030 के लक्ष्य को 77 मिलियन टन से चूकने वाला है, जो कि एक वर्ष में 16 मिलियन यात्री कारों से उत्सर्जन के बराबर होगा।

पिछले पांच वर्षों में, लिबरल प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रूडो के नेतृत्व में, कनाडा ने जलवायु पर एक मिश्रित रुख दर्शाया है। हालाँकि प्रधान मंत्री ट्रूडो ने जलवायु कार्रवाई के महत्व के बारे में बार-बार बात की है, लेकिन उन्होंने अल्बर्टा तेल रेत को भी सहयोग दिया है। (कनाडा में, 1990 और 2018 के बीच, तेल और गैस क्षेत्र कार्बन प्रदूषण का सबसे तेजी से बढ़ने वाला स्रोत था, जिसका मुख्य कारण कार्बन-सघन तेल रेत उत्पादन में वृद्धि है। 2017 में, देश के 27 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए तेल और गैस जिम्मेदार थे।)

• कोविड-19 आर्थिक सुधार प्रयासों के हिस्से के रूप में, कनाडा ने स्वच्छ ऊर्जा के लिए 11.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर के मुकाबले जीवाश्म ईंधन का समर्थन करने के लिए कम से कम $ 14.14 बिलियन अमरीकी डॉलर देने के लिए वचन दिया है। सभी जी-20 देशों में से, कोविड-19 से पहले भी, कनाडा जीवाश्म ईंधन के लिए सार्वजनिक वित्त में प्रति जीडीपी के आधार पर सबसे अधिक खर्च करता था।

• राष्ट्रपति इलेक्ट जो बिडेन के साथ अपनी पहली कॉल में प्रधान मंत्री ट्रूडो ने न केवल जलवायु परिवर्तन पर चर्चा की, बल्कि उन्होंने कीस्टोन एक्सएल पाइपलाइन का मुद्दा भी उठाया, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में क्रूड तेल रेत को ले जाएगा।

• 2018 में, जब किंडर मॉर्गन, ट्रांस माउंटेन पाइपलाइन के मालिकों ने पाइपलाइन मार्ग (टीएमएक्स परियोजना) का विस्तार करने की योजना को त्याग दिया, तो कनाडा सरकार ने इसे खरीदने के लिए $ 3.4 बिलियन अमरीकी डालर खर्च किए।

क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क कनाडा – Réseau action climat Canada (CAN-Rac Canada) की कार्यकारी निदेशक, कैथरीन अब्रू, का कहना है, “ऐसी नीतियों का होना अच्छा है जो, अगर जल्दी और बड़ी कठोरता के साथ लागू की जाती हैं, तो कनाडा की जलवायु लक्ष्यों को वर्तमान अपर्याप्त पेरिस प्रतिज्ञा से आगे अधिक महत्वाकांक्षी बनाएं। जलवायु कार्रवाई में $15 बिलियन का निवेश देखना भी अच्छा है। हालांकि, ये संख्या यूरोपीय संघ में हमारे निकटतम व्यापारिक भागीदारों द्वारा और संयुक्त राज्य अमेरिका (एक नए बिडेन प्रशासन के नेतृत्व में) द्वारा की गई प्रतिबद्धताओं की तुलना में कम है। प्रांतों और क्षेत्रों को कनाडा की जलवायु महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए अपनी कोशिशों को और बढ़ाना होगा, जहां उन्हें होने की आवश्यकता है वहां उन्हें पहुँचने के लिए, और सभी सरकारों को हमारे द्वारा आवश्यक परिवर्तनकारी बदलाव लाने के लिए तालिका में बहुत बड़े निवेश लाने की आवश्यकता है।”
कैथरीन की बात को आगे ले जाते हुए एन्वाइरोमेन्टल डिफेंस (पर्यावरण रक्षा) कनाडा में राष्ट्रीय जलवायु कार्यक्रम प्रबंधक, डेल मार्शल, कहते हैं, “हम कार्बन मूल्य के खुदरा हिस्से की सार्थक वृद्धि और जलवायु कार्रवाई में $15 बिलियन के निवेश का स्वागत करते हैं। लेकिन वह राशि, जो प्रति व्यक्ति के आधार पर अन्य देशों कर रहें हैं का एक छोटा सा हिस्सा है, स्पष्ट रूप से काम नहीं कर सकता है। अगर कनाडा को अमेरिका या ईयू की महत्वाकांक्षा के स्तर का अनुसरण करना है तो कनाडा को 270 बिलियन डॉलर का निवेश करना चाहिए। यह भी निराशाजनक है कि संघीय सरकार उन उपायों को अनदेखा करना जारी रखती है जो कि कनाडा के कार्बन उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोतों को कम करतें हैं: तेल और गैस क्षेत्र, और सड़क परिवहन। उत्सर्जन को कम करने के यह कदम अच्छी तरह से ज्ञात हैं – कोई नई तेल और गैस परियोजनाएं ना होना, जीवाश्म ईंधन उत्पादन और उपयोग से बाहर हटने के लिए एक क्रमिक चरण, इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन बढ़ाने के लिए कार्रवाई। इन उपायों पर काम करने का समय कबका आ गया है, उन श्रमिकों और समुदायों के लिए एक उचित संक्रमण योजना के साथ जो जीवाश्म ईंधन क्षेत्र पर निर्भर हैं।

समस्या का समाधान हां या ना में नहीं संवाद में

देश में लगभग एक पखवाड़े से जारी किसान आंदोलन  भारत के सशक्त लोकतंत्र का बेहतरीन और विपक्ष की ओछी राजनीति का ताज़ा उदाहरण है। क्योंकि आंदोलन के पहले दिन से ही किसानों की मांगों का जिस प्रकार केंद्र में बहुमत वाली सरकार सम्मान कर रही है, उनकी आशंकाओं का समाधान करने का हर सम्भव प्रयास कर रही है वो सराहनीय है। यह बात सही है कि मौजूदा सरकार कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष के पिछले चार पांच सालों के इतिहास को देखते हुए इन कृषि सुधार कानूनों को लाने से पहले ही किसान नेताओं या फिर राज्य सरकारों को विश्वास में ले लेती तो आज पूरा देश इस अराजक स्थिति और अनावश्यक विरोध की राजनीति से बच जाता लेकिन या तो सरकार ने इस मामले में दूर की दृष्टि नहीं रखी या फिर उसने विपक्ष की ताकत को कम आंक लिया। खैर अब वो इस स्थिति में अपना नरम और सकारात्मक रुख का परिचय दे रही है चाहे वो किसानों द्वारा दिल्ली के बुराड़ी मैदान में आंदोलन करने से मना कर देना हो या किसानों द्वारा सरकार से बिना शर्त बात करने की मांग करना हो। चाहे कृषि मंत्री से लेकर गृहमंत्री तक विभिन्न स्तरों पर किसान नेताओं की बैठकों का दौर हो।और या फिर अपने ताज़ा कदम में आखिर किसानों की मांगों को देखते हुए सरकार द्वारा कृषि कानूनों में संशोधनों का प्रस्ताव किसानों के पास भेजना हो। सरकार अपने हर कदम से बातचीत करके किसानों की समस्याओं को दूर करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता, अपनी नीयत और मंशा स्पष्ट कर रही है। वहीं दूसरी तरफ किसान संगठनों का रवैया किसान नेताओं की मंशा और विश्वसनीयता दोनों पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। क्योंकि इन कानूनों के  जिन मुद्दों को उठाकर यह किसान आंदोलन खड़ा किया गया है सरकार उन सभी पर संशोधन करने के लिए तैयार है। बावजूद इसके किसान नेता संशोधनों को मानने के बजाए कानून वापस लेने की अपनी मांग पर ही अड़े हैं। तो किसान आंदोलन पर सवाल यहीं से खड़े हो जाते हैं क्योंकि,

1. 2015 की शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार देश के केवल 6% किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है लेकिन फिर भी किसान एमएसपी की मौजूदा व्यवस्था पर आश्वासन चाहते हैं जो कि सरकार लिख कर देने को तैयार है।

2. किसानों को डर है कि मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी जबकि यह कटु सत्य है कि मौजूदा मंडी व्यवस्था के अंतर्गत मंडियों में ही किसानों का सर्वाधिक शोषण होता है। वो मंडियों में कम दामों पर अपनी उपज बेचने के लिए आढ़तियों के आगे विवश होते हैं और ये आढ़तिये इन्हीं फसलों को आगे बढ़ी हुई कीमतों पर बेचते हैं यह किसी से छिपा नहीं है। फिर भी “तथाकथित किसानों” की मांगों को देखते हुए केंद्र सरकार राज्य सरकारों को यह छूट देने के लिए तैयार है कि वे प्राइवेट मंडियों पर बहु शुल्क लगा सकती हैं।

3.किसानों की आशंकाओं को देखते हुए सरकार कानून में संशोधन करके उन्हें सिविल कोर्ट कचहरी जाने का विकल्प देने को भी तैयार है।

4. जिस कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून को लेकर भृम फैलाया जा रहा था कि किसानों की जमीनें प्राइवेट कंपनियों द्वारा हड़प ली जाएंगी उसको लेकर भी कानून में स्पष्ठता की जाएगी कि खेती की जमीन या बिल्डिंग गिरवी नहीं रख सकते।

5. किसानों ने यह मुद्दा उठाया था कि नए कृषि कानूनों में कृषि अनुबंधों के पंजीकरण की व्यवस्था नहीं है तो सरकार ने संशोधन में आश्वासन दिया है कि कंपनी और किसान के बीच कॉन्ट्रैक्ट की 30 दिन के भीतर रजिस्ट्री होगी।

6.किसान बिजली से जुड़े नए कानून लागू करने के खिलाफ थे, सरकार ने संशोधन में आश्वस्त किया है कि बिजली की पुरानी व्यवस्था जारी रहेगी और वो बिजली संशोधन बिल 2020 नहीं लाएगी।

7. किसानों को आपत्ति थी कि नए कानूनों से वो निजी मंडियों के चुंगल में फंस जाएंगे सरकार ने संशोधित प्रस्ताव में निजी मंडियों के रेजिस्ट्रेशन की व्यवस्था की है ताकि राज्य सरकारें किसानों के हित में फैसले ले सकें।

लेकिन किसान नेताओं द्वारा सरकार के इस संशोधित प्रस्ताव को ठुकराना और संशोधन नहीं केवल कानून वापस लेने की मांग पर अड़ जाना, सरकार के साथ बैठकों में कानून पर बात करने के बजाए  (“यस और नो”) हाँ या ना” के प्लेकार्ड लहराना या फिर सरकार द्वारा संशोधन भेजने के बावजूद आंदोलन और तेज करने की घोषणा करना, जिसमें अडानी अंबानी के सामान का बहिष्कार करना, जैसे कदम उठाए जा रहे हैं , इस आंदोलन में किसानों के पीछे छुपे असली चेहरों को बेनकाब कर रहे हैं। क्योंकि इससे पहले भी जब सरकार के साथ 9 तारीख को बैठक प्रस्तावित थी तब किसान संगठनों द्वारा 8 तारीख को भारत बंद का आह्वान,इस बंद को समूचे विपक्षी दलों का समर्थन और राहुल गांधी शरद पवार समेत विपक्षी दलों के एक प्रतिनिधि मंडल का राष्ट्रपति से मिलकर इन कानूनों को रद्द करने की मांग करने, ये सभी बातें अपने आप में इसके पीछे की राजनीति को उजागर कर रही हैं। खास बात यह है कि इस आंदोलन में रहने खाने से जुड़े मूलभूत विषय हो या सरकार से बात करने की रणनीति तैयार करने जैसे गंभीर विषय हों जिस प्रकार की खबरें सामने आ रही हैं या फिर प्रसाद के रूप में काजू किशमिश बांटने जैसे वीडियो सामने आ रहे हैं वो इस आंदोलन को शाहीन बाग़ जैसे आंदोलन के समकक्ष खड़ा कर रहे हैं।आंदोलन स्थल पर रोटी बनाने की मशीनें, हाइवे पर जगह जगह लगी  वाशिंग मशीनें, ट्यूब वाटर पम्प का संचालन करने वाली मोबाइल सोलर वैन को मोबाइल फोन चार्ज करने और बैटरी बैंक के रूप में तब्दील करना, बिजली के लिए सोलर पैनल और इन्वर्टर का प्रयोग। अगर हमारे किसानों ने एक हाइवे की सड़क पर अपने दम पर यह इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है तो इसका मतलब यह है कि हमारे किसान हर प्रकार से सक्षम हैं और आधुनिक तकनीक का प्रयोग भी बखूबी जानते हैं तो फिर वे अपने इस हुनर का प्रयोग आंदोलन करने की बजाए खेती और फसल को उन्नत करने में लगाते तो वो खुद भी आगे जाते और देश की तरक्की में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते। लेकिन हमारे देश के किसानों की हकीकत किसी से छुपी नहीं है।देश के 86 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं जो खुद खेती में निवेश भी नहीं कर सकते। किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या के आंकड़े उनकी दयनीय स्थिति बताने के लिए काफी हैं। इसलिए जब इस किसान आंदोलन के जरिए हमारे देश के किसानों की यह विरोधाभासी तस्वीरें सामने आती हैं तो इनसे राजनीति की बू आती है। जब केजरीवाल एक तरफ दिल्ली में इन कृषि कानूनों में से एक को लागू करते हैं और दूसरी तरफ किसानों के बीच जा कर इन कानूनों के विरोध में खड़े हो जाते हैं। या जब राहुल गांधी किसानों से कानून वापस लेने तक पीछे नहीं हटने का आह्वान करते हैं लेकिन अपने चुनावी घोषणा पत्र में इन्हीं कृषि सुधारों को लागू करने का वादा करते हैं। या जब शरद पवार आज इन कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन का समर्थन करते हैं लेकिन खुद कृषि मंत्री रहते हुए राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर इन कृषि सुधारों को लागू करने की वकालत करते हैं।

लेकिन राजनीति से इतर यह बात भी सही है कि सरकार द्वारा लाए इन कृषि सुधार क़ानूनों में छोटे किसानों के मद्देनजर और सुधार की गुंजाइश हो सकती है और किसान संगठनों का मुख्य उद्देश्य इन छोटे किसानों के ही हित की रक्षा करना होता है। इसलिए किसान नेताओं का दायित्व है कि वे विपक्ष के हाथों अपना राजनैतिक इस्तेमाल होने से बचाएं और देश के लोकतंत्र का सम्मान करते हुए सरकार से बातचीत कर आम किसानों के हितों की रक्षा की पहल करें ना कि अड़ियल रुख का परिचय दें। क्योंकि समझने वाली बात यह है कि विपक्ष की इस राजनीति में दांव पर विपक्ष नहीं बल्कि किसानों का भविष्य लगा है।

डॉ नीलम महेंद्र

दहाई आंकड़े की विकास दर एवं 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता भारत

पिछले कुछ वर्षों से देश में केंद्र सरकार एवं कुछ राज्य सरकारें आर्थिक माहौल बनाने में जुटी हुई हैं जिससे देश में पूंजी निवेश बढ़े, आधारिक संरचना का विकास हो, इसके लिए कई क्षेत्रों में लगातार आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं। अभी हाल ही में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना लागू की गई है। इसी प्रकार कृषि क्षेत्र में एक लम्बे अरसे के बाद एतिहासिक सुधार कार्यक्रम लागू किया गया है, जिसके अंतर्गत तीन क़ानूनों को लागू किया गया है जिससे न केवल किसानों की आय दुगुनी होने की सम्भावनाएं बढ़ गई हैं बल्कि देश से कृषि उत्पादों का निर्यात भी अब अधिक मात्रा में हो सकता है। श्रम क्षेत्र में भी क्रांतिकारी सुधार क़ानून लागू किए गए हैं। कुल मिलाकर केंद्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारें भारत को दहाई आंकड़े की विकास दर की श्रेणी में ले जाकर 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की ओर आगे बढ़ने का लगातार प्रयास कर रहे है।

कृषि क्षेत्र को केंद्र में रखकर ही देश के आर्थिक विकास को गति देने का प्रयास किया जा रहा है, इसके लिए ग्रामीण इलाक़ों में फ़ूड प्रॉसेसिंग इकाईयों, गोदाम एवं कोल्ड स्टोरेज की स्थापना तथा आधारिक संरचना का विकास करने के लिए एक लाख करोड़ रुपए की एक वृहद्द योजना बनाई गई है। उद्योग जगत को भी इस हेतु आगे लाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि वे भी ग्रामीण क्षेत्रों में अपना निवेश बढ़ा सकें। ग्रामीण इलाक़े आगे बढ़ेंगे तो देश भी आगे बढ़ेगा और उद्योग जगत को भी इससे फ़ायदा होगा क्योंकि उनके उत्पादों की मांग भी ग्रामीण क्षेत्रों से ही निकलेगी। ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश की अत्यधिक आवश्यकता है, और अभी तक इस ओर पूर्व की सरकारों द्वारा उचित ध्यान नहीं दिया गया है। अंततः इससे ग्रामीण इलाक़ों में उत्पादकता में भी सुधार होगा और पूरे देश को ही इसका फ़ायदा मिलेगा।

अब तो आर्थिक विकास सम्बंधी सारे संकेत बता रहे हैं कि कोरोना महामारी के बाद भारत अब काफ़ी आगे आ चुका हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा मॉनिटर किए जा रहे 48 में से 30 संकेतो में कोरोना काल के पहिले की स्थिति को प्राप्त कर लिए गया है। औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादों की मांग ठीक तरीक़े से बढ़ रही है। रोज़गार के अवसर भी बढ़ते जा रहे हैं तो मांग और भी आगे बढ़ेगी। साथ ही उपभोक्ता वस्तुओं की मांग ग्रामीण इलाक़ों में भी अच्छे स्तर पर दिखने लगी है। देश में बरसात ठीक रही थी अतः विभिन्न उत्पादों की पैदावार भी अच्छी रही है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफ़ी अच्छी वृद्धि दर्ज कर रही है। ट्रैक्टर  आदि उत्पादों की बिक्री बढ़ी है। आत्म निर्भर भारत योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार ने 3 चरणों में कई उपाय लागू किए थे उनका भी अब अच्छा परिणाम देखने को मिल रहा है। श्रम क्षेत्र में क़ानूनों में संशोधन, कृषि क्षेत्र में बदलाव, ऋणों के माध्यम से लघु उद्योग एवं अन्य क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में तरलता बढ़ाई गई, अर्थव्यवस्था में रोकड़ की कमी थी जिसे दूर कर लिया गया, इन सभी उपायों के चलते अब उत्पादों की मांग में वृद्धि दृष्टिगोचर हो रही है।

भारतीय अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाया जा रहा है ताकि श्रमिक वर्ग को उद्योग जगत द्वारा, केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा घोषित किए जा रहे विभिन्न उपायों के अंतर्गत, लाभ प्रदान किए जा सकें। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों की परिभाषा में भी परिवर्तन किया गया है। पूर्व में इस क्षेत्र में बहुत छोटी छोटी इकाईयों की स्थापना होती थी इसके चलते इनके द्वारा उत्पादित सामान की मात्रा बहुत कम रहती थी। परंतु, अब नई परिभाषा के अंतर्गत सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों का आकार बढ़ाने में सहायता मिलेगी एवं ये इकाईयां अपने उत्पाद की मात्रा को बढ़ा सकेंगे तथा अपने उत्पादों को  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना सकेंगे।

उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना का लाभ भी अब दिखने लगा है। अभी हाल ही में सेमसंग कम्पनी ने घोषणा की है कि वे 4825 करोड़ रुपए का निवेश कर अपनी मोबाइल उत्पादन इकाई को चीन से भारत में स्थानांतरित कर रहे हैं। इसी प्रकार की घोषणाएं कुछ अन्य बड़ी बड़ी कम्पनियों द्वारा किया जाना अपेक्षित है। अक्टोबर 2020 माह में औद्योगिक उत्पादन में 3.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, कोरोना महामारी के चलते विनिर्माण के क्षेत्र में पिछले 7 माह से लगातार कमी दर्ज की जा रही थी। बिजली का उत्पादन अक्टोबर 2020 में, अक्टोबर 2019 की तुलना में, 11.2 प्रतिशत से बढ़ा है।

अभी तक हम भारत में कृषि उत्पादों का मात्र 10 प्रतिशत ही संसाधित कर पाते हैं। फल एवं सब्ज़ियों का तो लगभग 30/40 प्रतिशत हिस्सा, प्रसंस्करण इकाईयों एवं कोल्ड स्टोरेज के अभाव में, ख़राब हो जाता है। अब कृषि क्षेत्र में किया जा रहे क्रांतिकारी सुधारों के चलते यदि इस लगभग 30/40 प्रतिशत हिस्से को ही बचा लिया जाता है तो देश के किसानों का कितना फ़ायदा होने वाला है। यह ख़राब हो जाने वाला हिस्सा बचाकर ही देश से कृषि उत्पादों के निर्यात बढ़ाए जा सकते है। इन उपायों का फ़ायदा दरअसल अब दिखने भी लगा है। सितम्बर 2020 को समाप्त छमाही में भारत से कृषि उत्पादों में 43 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है एवं ये 53,626 करोड़ रुपए तक पहुंच गए हैं। अभी हाल ही में अप्रेल-अक्टोबर 2020 के आंकड़े भी जारी  किये गए है और इस दौरान कृषि उत्पाद के निर्यात बढ़कर 70,000 करोड़ रुपए के ऊपर पहुंच गए हैं। भारतीय कृषि उत्पादों की अन्य देशों में मांग लगातार बढ़ती जा रही है। अतः केंद्र सरकार द्वारा इस दौरान कृषि क्षेत्र में जो भी सुधार कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं वे किसानों के हित में हैं एवं इससे न केवल देश के किसानों बल्कि पूरे देश को ही फ़ायदा होने वाला है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था को आसानी से 5 लाख करोड़ डॉलर के स्तर पर लाया जा सकेगा।       

चूंकि भारत में लगभग 60 प्रतिशत आबादी गावों में निवास करती है अतः भारतीय अर्थव्यवस्था में आगे आने वाले समय में ग्रामीण एवं छोटे शहरों का दबदबा बना रहने वाला है। उद्योगों को ग्रामीण इलाक़ों एवं छोटे शहरों की ओर अपना रूख करना ही होगा। आज भी विभिन्न उत्पादों की मांग ग्रामीण इलाक़ों से ही आ रही है, अतः ग्रामीण इलाक़ों में उत्पादों को पहुंचाना होगा अथवा कहें कि इनका उत्पादन भी ग्रामीण इलाक़ों में ही करना होगा।  सामाजित आधारभूत संरचना का भी ग्रामीण इलाक़ों में विकास करना अब ज़रूरत बन गया है। इसके लिए निजी क्षेत्र को भी अपना योगदान बढ़ाना होगा।

अभी फ़ार्मसी के क्षेत्र में भारत ने पूरे विश्व में अपना दबदबा क़ायम कर लिया है एवं 100 से भी अधिक देशों को भारत से दवाईयों का निर्यात होने लगा है। अब आगे आने वाले समय में इसी प्रकार भारत कृषि उत्पादों के क्षेत्र में भी पूरे विश्व में अपनी धाक जमा सकता है। भारत में इसकी क्षमता है। हमारे स्थानीय उत्पादों के लिए पूरे विश्व में बाज़ार उपलब्ध है। हमें अपने देशी उत्पादों के लिए वोकल होना पड़ेगा। भारत में निर्मित उत्पाद का मतलब बेस्ट क्वालिटी उत्पाद होना चाहिए। इससे देश के किसानों की आमदनी बढ़ेगी। अगले साल यदि देश को दहाई आंकड़े की विकास दर में ले जाना है तो ग्रामीण इलाक़ों, टायर 2 एवं टायर 3 जैसे छोटे शहरों में निवेश बढ़ाना होगा।

प्रधान मंत्री वाणी योजना को भी पूरे देश में लागू किया जा रहा है जिसके अंतर्गत वाइफ़ाई हाट स्पाट्स की स्थापना की जाएगी ताकि देश में इंटरनेट का जाल बिछाया जा सके। इससे ग्रामीण इलाक़ों में भी ई-कामर्स सुविधाएं एवं वाइफ़ाई हाट स्पाट्स बढ़ेंगे तथा ग्रामीण इलाक़ों में भी कार्यक्षमता के स्तर में सुधार होगा। ग्रामीण इलाक़ों में भी लोग अपना व्यवसाय शुरू कर सकेंगे। आज के ज़माने में युवा वर्ग को तकनीक के साथ जोड़ना ज़रूरी हो गया है। निजी क्षेत्र को भी इसमें आगे आना होगा। यदि केंद्र सरकार 10 लाख नए वाइफ़ाई हाट स्पॉट स्थापित कर लेती है तो निजी क्षेत्र भी अपने व्यवसाय मॉडल को इस प्रकार विकसित कर सकता है ताकि इस सुविधा को 10 गुना आगे बढ़ाया जा सके। दरअसल देश में वाइफ़ाई हाट स्पॉट विकसित किए जाने की महती आवश्यकता है क्योंकि इंटरनेट कनेक्टिविटी आज एक आवश्यकता बन गया है।

देश में डिजिटल भुगतान हेतु आधारिक संरचना पहिले ही विकसित की जा चुकी है। आज प्रतिदिन यूपीआई प्लेटफ़ोर्म पर लाखों करोड़ों रुपए के लेनदेन हो रहे हैं। अक्टोबर 2020 में यूपीआई सिस्टम पर 4 लाख करोड़ रुपए के लेनदेन हुए हैं। डिजिटल लेनदेन का भारतीय पेमेंट सिस्टम पूरे विश्व में एक रोल मॉडल बन गया है। कोरोना महामारी के दौरान पूरा विश्व यह सिस्टम ढूंढ रहा था, जब कि भारत में यह पहिले से ही मौजूद था। डीबीटी (सुविधाओं का सीधा हस्तांतरण) देश में एक बहुत मज़बूत सिस्टम बन गया है इसके अंतर्गत करोड़ों हितग्राहियों के खातों में हज़ारों करोड़ रुपए सीधे ही जमा किये जा रहे हैं।

भारत में शेयर बाज़ार भी आज रोज़ाना नए स्तर को छूते नज़र आ रहे हैं। विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार में काफ़ी अधिक मात्रा में निवेश बढ़ाते जा रहे हैं। दिनांक 11 दिसम्बर 2020 को बीएसई सेन्सेक्स 46099 एवं एनएसई 13514 के रिकार्ड स्तर पर बंद हुए हैं। विदेशी निवेशकों ने भी इस वर्ष अभी तक 928 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश भारतीय शेयर बाज़ार में किया है। विदेशी निवेशक तो भविष्य में होने वाली आर्थिक गतिविधियों को ध्यान में रखकर ही विदेशी बाज़ारों में निवेश करते हैं। आज चूंकि विदेशी निवेशकों को भारतीय बाज़ार में अपार सम्भावनाएं नज़र आ रही हैं इसीलिए वे अपना निवेश भारतीय शेयर बाज़ार में बढ़ाते जा रहे हैं। 

हिंदुत्व की जीवंतता का प्रयास है ‘यशस्वी भारत’

ललित गर्ग

सूरज की एक किरण को देखकर सूरज बनने का सपना संजोने वाला महान होता है। वह और अधिक महान होता है, जो सूरज बनने का सपना देखकर परिपूर्ण सूरज बन जाता है। शताब्दियों के बाद कोई-कोई व्यक्ति ऐसा होता है। वह अपनी रोशनी से एक समूची परंपरा एवं संस्कृति को उद्भासित कर देता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में कुछ ऐसे विरल सरसंघचालक हुए हैं, संघ के सरसंचालकों की समृद्ध एवं शालीन परंपरा में वर्तमान का बहुचर्चित नाम है मोहन भागवत। उनकी विरलता या महत्ता के प्रमुख मानक हैं- सशक्त राष्ट्रीयता, हिन्दुत्व और लोकहितकारी प्रवृत्तियां। इन तीन सोपानों के आधार पर वे महत्ता के ऊंचे शिखर पर आरूढ़ हो गए। उन्होंने हिंदुत्व की नयी व्याख्याएं दी हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं हिंदुत्व को लेकर उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘यशस्वी भारत’ का दिल्ली में 19 दिसम्बर 2020 को विमोचन होने जा रहा है। यह केवल पुस्तक नहीं है बल्कि हिंदुत्व को समग्र परिवेश में समझने का एक आईना है। आज हिंदू शब्द की परिभाषा को फिर से परिष्कृत कर राष्ट्रीयता के साथ सम्बद्ध करना आवश्यक है और यह पुस्तक इस महत्वपूर्ण कार्य को करने का एक माध्यम है।
किताब में मोहन भागवत ने हिंदुत्व-दर्शन का निरूपण किया है, वह समग्र है, शाश्वत है, सार्वकालिक है, वह कोई कांच का नाजुक घर नहीं है कि आलोचना की बौछार से किरचें-किरचें होकर बिखर जाये। भागवत ने जिस सत्य को उजागर किया है, वह हजारों साल पहले भी सत्य था और आज भी उतना ही सत्य है। बल्कि नई परिस्थितियों एवं राजनीतिक स्थितियों के साथ उसकी उपयोगिता और अधिक बढ़ी है। क्योंकि भारत से निकले सभी संप्रदायों का जो सामूहिक मूल्यबोध है, उसका नाम ‘हिंदुत्व’ है। इसलिए संघ हिंदू समाज को संगठित, अजेय और सामथ्र्य-संपन्न बनाना चाहता है। इस कार्य को संपूर्णता तक पहुंचाना ही संघ का उद्देश्य है। इस किताब में मोहन भागवत के भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग विषयों पर दिये गये कुल 17 भाषणों का संग्रह है।
संघ और हिंदुत्व को लेकर अक्सर उद्देश्यहीन, उच्छृंखल एवं विध्वंसात्मक आलोचनाएं होती रही हैं लेकिन इस तरह की नीति के द्वारा किसी का हित सधता हो, तो ऐसा प्रतीत नहीं होता तथा न ही उससे संघ पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। संघ की ऐसी आलोचना करने वाले समय, शक्ति और अर्थ का अपव्यय करते हैं तथा अपनी बुद्धि के दिवालियापन को उजागर करते हैं। संघ न केवल देश बल्कि दुनिया का बहुचर्चित एवं सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन है। जो बहुचर्चित होता है उसका विरोध भी होता है। निरूद्देश्य एवं स्तरहीन विरोध, विरोधी विचारधाराओं एवं संगठनों की स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति, ईष्र्या एवं विध्वंस की नीति का स्वयंभू प्रमाण बन जाता है। संघ एवं मोहन भागवत की आलोचना करने वाले तथा उनके व्यक्तित्व पर कीचड़ उछालने वाले लोग एवं संगठन स्वयं को कमजोर अनुभव करते हुए भी समाज एवं राष्ट्र में प्रतिष्ठित होना चाहते हैं, वे ही ऐसी आलोचना करते हैं। उनकी आलोचनाएं एक जीवंत परंपरा को झुठलाने के असफल प्रयास ही रहे हैं। ऐसे लोगांे और संगठनों को सही तथ्यों की जानकारी देने की दृष्टि से ‘यशस्वी भारत’ किताब की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
भारत एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है और हिंदुत्व देश की पहचान का सार है। संघ स्पष्ट रूप से देश की पहचान को हिंदू मानता है क्योंकि राष्ट्र की सभी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाएं इसी के सिद्धांतों से चलती हैं। भागवत के अनुसार ‘हिन्दुत्व’ ऐसा शब्द है, जिसके अर्थ को धर्म से जोड़कर संकुचित किया है। संघ की भाषा में उस संकुचित अर्थ में उसका प्रयोग नहीं होता। यह शब्द अपने देश की पहचान, अध्यात्म आधारित उसकी परंपरा के सनातन सत्य तथा समस्त मूल्य सम्पदा के साथ अभिव्यक्ति देने वाला शब्द है। संघ मानता है कि ‘हिंदुत्व’ शब्द भारतवर्ष को अपना मानने वाले, उसकी संस्कृति के वैश्विक व सार्वकालिक मूल्यों को आचरण में उतारना चाहने वाले तथा यशस्वी रूप में ऐसा करके दिखाने वाली उसकी पूर्वज परम्परा का गौरव मन में रखने वाले सभी 130 करोड़ लोगों पर लागू होता है।
मोेहन भागवत की खोजपूर्ण निगाहों ने अपने युग के पार देखकर जिस सत्य को पकड़ा, दुस्साहसी कालचक्र उसे किसी भी कोण से खण्डित नहीं कर पाया। उसने तो देश के हर उदारवादी एवं प्रबुद्ध विचारक एवं व्यक्ति को एक ठोस जमीन दी है, काश! चिन्तन का सिलसिला सही ढंग से सही दिशा में आगे बढ़ पाता तो राजनीतिक स्वार्थ, कट्टरपन व अलगाव की भावना, भारत के प्रति शत्रुता तथा जागतिक वर्चस्व की महत्वाकांक्षा, इनका एक अजीब सम्मिश्रण भारत की राष्ट्रीय एकात्मता के विरुद्ध काम नहीं कर पाती। देश व समाज को तोड़ना चाहने वाले, हमें आपस में लड़ाना चाहने वाले, इस शब्द को, जो सबको जोड़ता है, अपने तिरस्कार व टीका टिप्पणी का पहला लक्ष्य बनाकर अपना स्वार्थ साधते रहे हैं।
 ‘हिन्दू’ किसी पंथ, सम्प्रदाय का नाम नहीं है, किसी एक प्रांत का अपना उपजाया हुआ शब्द नहीं है, किसी एक जाति की बपौती नहीं है, किसी एक भाषा का पुरस्कार करने वाला शब्द नहीं है। मोहन भागवत के अनुसार ‘हिन्दू’ शब्द की भावना की परिधि में आने व रहने के लिए किसी को अपनी पूजा, प्रान्त, भाषा आदि कोई भी विशेषता छोड़नी नहीं पड़ती। केवल अपना ही वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा छोड़नी पड़ती है। स्वयं के मन से अलगाववादी भावना को समाप्त करना पड़ता है। भारत की विविधता के मूल में स्थित शाश्वत एकता को तोड़ने का घृणित प्रयास, हमारे तथाकथित अल्पसंख्यक तथा अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों को झूठे सपने तथा कपोलकल्पित द्वेष की बातें बता कर चलता रहा है। ’भारत तेरे टुकड़े होंगे’ ऐसी घोषणाएँ देने वाले लोग इस षड्यंत्रकारी मंडली में शामिल हैं। यह पुस्तक ऐसे लोगों को सावधान करती है।
मोहन भागवत जैसे महान व्यक्तित्व को निंदा के वातूल विचलित नहीं कर पाते और प्रशंसा की थपकियां प्रमत्त नहीं बना सकती। सभी सर संघचालकों ने निंदा एवं प्रशंसा दोनों को सहना सीखा है, सम रहना सीखा है। इसलिए संघ महान बना है। उस पर कीचड़ उछालने की जो हरकते होती रही हैं, वर्तमान में वे पराकाष्ठा पर पहुंच गयी हैं, पर इससे संघ का वर्चस्व कभी धूमिल होने वाला नहीं है। क्योंकि इसकी नीति विशुद्ध और सैद्धांतिक आधार पुष्ट है। विरोध करने वाले व्यक्ति और संगठन भी इस बात को महसूस करते हैं फिर भी जनता को गुमराह करने के लिए और मनोबल कमजोर करने के लिए जो व्यक्ति और संगठन उजालों पर कालिख पाते रहे हैं, इससे उन्हीं के हाथ काले होते हुए देखे गये हैं। ऐसे लोगांे को सद्बुद्धि आये, वे अपना समय एवं श्रम किसी रचनात्मक काम में लगाये तो राष्ट्र एवं मानवता की अच्छी सेवा हो सकती हैं। संघ ने स्तर का विरोध एवं आलोचना का हमेशा स्वागत किया है। उसकी तटस्थ समीक्षा के लिए संघ के द्वार हर क्षण खुले रहे हैं। ऐसी तटस्थ समीक्षाओं का निचोडऋ है ‘यशस्वी भारत’ पुस्तक। यह पुस्तक भारत को सशक्त बनाने का आह्वान है, जिसमें मोहन भागवत नेे विभिन्न मुद्दों पर संघ के दृष्टिकोण को समग्रता से विवेचित किया है। पुस्तक के प्रथम संस्करण का शीर्षक है- हिंदू, विविधता में एकता के उपासक। इसमें कहा गया है कि ‘हम स्वस्थ समाज की बात करते हैं, तो उसका आशय संगठित समाज होता है। हमको दुर्बल नहीं रहना है, हमको एक होकर सबकी चिंता करनी है। किताब में संघ के बारे में कहा गया है, हमारा काम सबको जोड़ने का है। संघ में आकर ही संघ को समझा जा सकता है। संगठन ही शक्ति है। विविधतापूर्ण समाज को संगठित करने का काम संघ करता है।
पुस्तक में राष्ट्रीयता को संवाद का आधार बताया गया है। संघ मानता है कि वैचारिक मतभेद होने के बाद भी एक देश के हम सब लोग हैं और हम सबको मिलकर इस देश को बड़ा बनाना है। इसलिए हम संवाद करेंगे। संघ का काम व्यक्ति निर्माण का है। व्यक्ति से समाज एवं समाज से राष्ट्र निर्मित होता हैं। समाज में आचरण में परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। यह स्वावलंबी पद्धति से, सामूहिकता से चलने वाला काम है। आइए संघ के हाथों को इतना मजबूत और विश्वसनीय बनायें कि निर्माण का हर क्षण इतिहास बने। नये एवं सशक्त भारत का निर्माण हो, जिसका हर रास्ता मुकाम तक ले जाये। सबकी सबके प्रति मंगलभावनाएं मन में बनी रहे। आज देश ने राष्ट्रीयता के ईमान को, कत्र्तव्य की ऊंचाई को, संकल्प की दृढ़ता को और मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिये ‘यशस्वी भारत’ के रूप में मोहन भागवत ने फिर आह्वान किया है। आओ, फिर एक बार जागें, संकीर्णता एवं स्वार्थ की दीवारों को ध्वस्त करें।

वेदों के प्रचार से अविद्या दूर होने सहित विद्या की प्राप्ति होती है

-मनमोहन कुमार आर्य
मनुष्य अल्पज्ञ प्राणी है। परमात्मा ने सब प्राणियों को स्वभाविक ज्ञान दिया है। मनुष्येतर प्राणियों को अपने माता, पिता या अन्य किसी आचार्य से पढ़ना व सीखना नहीं पड़ता। वह अपने स्वभाविक ज्ञान के सहारे अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। इसके विपरीत मनुष्य के पास स्वाभाविक ज्ञान इस मात्रा में नहीं होता कि वह अपना पूरा जीवन उसके आधार पर सुखपूर्वक व्यतीत कर सकें। उसे अपने माता, पिता, आचार्य, विद्वानों तथा विद्वान पूर्वजों वा ऋषि मुनियों के सत्ज्ञान से युक्त ग्रन्थों का अध्ययन कर ही ज्ञान प्राप्त कर जीवन व्यतीत करना होता है। समाज में मनुष्य को जो ज्ञान प्राप्त होता है वह सत्य व असत्य से युक्त व मिश्रित होता है। सत्य व असत्य का पृथक पृथक ज्ञान साधारण मनुष्यों को नहीं होता। साधारण मनुष्य असत्य को भी सत्य मानकर उसका प्रयोग व व्यवहार करते हैं। विद्वान मनुष्य ही सत्य व असत्य के भेद को जानते हैं। ऋषि दयानन्द के समय में मूर्तिपूजा प्रचलित थी। मूर्तिपूजा में मूर्ति को ही ईश्वर का पर्याय मान लिया जाता है। सभी मूर्तिपूजक प्रायः इसको स्वीकार करते हैं। ऋषि दयानन्द बालक थे जब शिवरात्रि के दिन उन्होंने मन्दिर में रात्रि समय में शिव की मूर्तियों पर चूहों को अबाध रूप से क्रीडा करते व उछल कूद करते हुए देखा था। इस घटना से उन्हें मूर्ति के सर्वशक्तिमान शिव व ईश्वर होने में सन्देह हो गया था। अतः इस घटना की प्रेरणा से उन्होंने अपना जीवन ईश्वर के सच्चे स्वरूप की खोज में लगाया था।

ऋषि दयानन्द को अत्यन्त तप व अनुसंधानों के बाद मूर्ति के ईश्वर व शिव न होने तथा ईश्वर व कल्याण करने वाले शिव के सत्यस्वरूप का ज्ञान हुआ था। इसके साथ उनको यह भी ज्ञान हुआ था सभी मत मतान्तरों में अविद्या व अन्धविश्वास विद्यमान है। ऐसा कोई मत नहीं था जो पूर्ण सत्य मान्यताओं, सिद्धान्तों व परम्पराओं पर आधारित हो। इस कारण उन्होंने परमात्मा की आज्ञा व प्रेरणाओं को ग्रहण कर ईश्वर प्रदत्त सत्य ज्ञान वेदों व उसकी मान्यताओं तथा सिद्धान्तों के प्रचार व प्रसार का कार्य किया था। इसका कारण यह है सत्य को जानने व उसका आचरण करने तथा असत्य को भी जानने व उसका त्याग करने से ही मनुष्य जाति की उन्नति होती है। मनुष्य का जीवन व परलोक सुधरता था। मनुष्य के दुःख व दारिद्रय दूर होने के साथ मनुष्य सुखी व सन्तुष्ट होता है। संसार व उसके सभी मनुष्यों व इतर प्राणियों के हित व कल्याण के लिये ही ऋषि दयानन्द अविद्या व असत्य ज्ञान से रहित तथा सद्ज्ञान व विद्या से पूर्णतया युक्त वेदज्ञान के प्रचार व प्रसार में प्रवृत्त हुए थे। उनके प्रचार व प्रयत्नों से ही संसार को अविद्या व विद्या का यथार्थ भेद पता चला। ऋषि दयानन्द के अनुयायी आज भी वेदज्ञान के महत्व को जानते हैं और मत-मतान्तरों व उनके ग्रन्थों में जो अविद्या व अविद्यायुक्त मान्यतायें व परम्परायें हैं, उसका भी उन्हें ज्ञान है। इसी कारण से वह अविद्या का त्याग कर ज्ञानयुक्त ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र यज्ञ, पितृ यज्ञ, अतिथि यज्ञ तथा बलिवैश्वदेव यज्ञ करने सहित देश व समाज हित तथा परोपकार आदि के काम करते हैं। संसार के मत-मतान्तरों को आर्यसमाज का विरोध करते हुए भी देखा जाता है जिसका कारण उनके मतों की अविद्या व उनके आचार्य व अनुयायियों के उनसे जुड़े हित व अहित हुआ करते हैं। 

वेदों के प्रचार से अविद्या दूर होती है यह बात पूर्णतया सत्य है। इसे अनेक उदाहरणों व प्रमाणों से भी सिद्ध किया जा सकता है। मनुष्य के सामने प्रश्न होता है कि संसार में ईश्वर है या नहीं यदि है तो उसका स्वरूप कैसा है? इस प्रश्न का उत्तर वेदों से मिलता है। वेद ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं और इस सृष्टि को ईश्वर से बना हुआ बताते हैं। अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि जिस ईश्वर ने इस सृष्टि और समस्त प्राणी जगत को बनाया है उसका स्वरूप कैसा है? इसका विस्तृत ज्ञान वेदों व वेद के ऋषियों के बनाये दर्शन एवं उपनिषद आदि ग्रन्थों में सुलभ होता है। वेदों से ईश्वर का जो सत्यस्वरूप प्राप्त होता है उसे ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के दूसरे नियम के रूप में सूत्रबद्ध कर प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है।’ ऋषि दयानन्द ने बताया है कि ईश्वर एक चेतन सत्ता है जिसमें अनन्त गुण हैं। वह स्वभाव से दयालु व धार्मिक है। सभी जीव, मनुष्य व प्राणी ईश्वर की सन्तान के तुल्य हैं। वह सब जीवों का माता, पिता, आचार्य, राजा, न्यायाधीश, बन्धु, सखा व मित्र आदि के समान रक्षा, पालन व सहायक है। सभी मनुष्यों को उसकी ही शरण में जाकर उसकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी चाहिये। ईश्वर के स्थान पर कोई भी जीवित वा मृत आचार्य, महापुरुष, धर्मज्ञ व गुणसम्पन्न व्यक्ति उपासनीय व भक्ति करने योग्य नहीं है। संसार के सब मनुष्यों का उपासनीय एक ही सच्चिदानन्दगुणयुक्त परमेश्वर है। उसकी उपासना से ही मनुष्य को ज्ञान, बल, स्वास्थ्य, आरोग्य, रोगों व दुःखों से निवृत्ति, सुखों की प्राप्ति तथा लौकिक व पारलौकिक उन्नति की प्राप्ति होती है। इसी कारण हमारे अविद्या से मुक्त तथा विद्या से युक्त पूर्वज ऋषि, मुनि, योगी व विद्वान हुआ करते थे तथा वह सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामीस्वरूप वाले एक ईश्वर की ही स्तुति, प्रार्थना, उपासना व भक्ति वैदिक रीति से किया करते थे। आज भी संसार से दुःख व क्लेशों को दूर करने के लिये मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त मान्यताओं का त्याग कर सब मनुष्यों को एक ही सत्यस्वरूप परमेश्वर की उपासना करनी योग्य एवं उचित है। ऐसा करके ही सबकी उन्नति व दुःखों की निवृत्ति हो सकती है। 

ऋषि दयानन्द ने जीवात्मा तथा सृष्टि का कारण जड़ पदार्थ प्रकृति के सत्यस्वरूप को भी वेद व दर्शन आदि के आधार पर अपने सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों में प्रस्तुत किया है जो ज्ञान व विज्ञान के नियमों व कसौटी पर सत्य सिद्ध होता है। ईश्वर जीव व प्रकृति का सत्य व यथार्थ ज्ञान होना ही विद्या कहलाती है। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर तथा जीवात्मा के गुण, कर्म और स्वभाव पर प्रकाश भी डाला है। परमात्मा और जीवात्मा के कुछ गुणों में समानता है। इसका उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा है कि ईश्वर व जीव दोनों चेतनस्वरूप हैं। दोनों का स्वभाव पवित्र, अविनाशी और धार्मिकता आदि है। परमेश्वर के सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, सब को नियम में रखना, सब जीवों को पाप पुण्यों के फल देना आदि धर्मयुक्त कर्म हैं। यह कर्म जीव में नहीं होते। ईश्वर से भिन्न जीव में सन्तानोत्पत्ति, सन्तानों का पालन, शिल्पविद्या आदि अच्छे बुरे कर्म हैं। ईश्वर में नित्य ज्ञान, आनन्द तथा अनन्त बल आदि गुण हैं। ईश्वर के गुणों से इतर जीवों में जो गुण हैं उन पर भी ऋषि दयानन्द ने प्रकाश डाला है। वह लिखते हैं कि जीवों में इच्छा वा पदार्थों की प्राप्ति की अभिलाषा, दुःख आदि की अनिच्छा, वैर, प्रयत्न वा पुरुषार्थ, बल, सुख व आनन्द, दुःख अर्थात् विलाप व अप्रसन्नता, ज्ञान वा विवेक तथा मनुष्य व इतर प्राणियों को कुछ चिन्हों आदि के द्वारा पहिचानना आदि अनेक गुण होते हैं। 

जीवात्मा के अन्य गुणों में प्राण वायु को बाहर निकालना, प्राण को बाहर से भीतर को लेना, आंख को मींचना, आंख को खोलना, जीवन वा प्राण को धारण करना, मन से विचारणीय विषयों व प्रकरणों में सत्यासत्य का निश्चय करना, अहंकार करना, गति करना व चलना, सब इन्द्रियों को चलाना, भिन्न भिन्न क्षुधा, तृषा, हर्ष शोकादियुक्त होना आदि जीवात्मा के गुण परमात्मा से भिन्न हैं। जीवात्मा के यह गुण मनुष्यादि प्राणी योनियों में जन्म होने पर प्रकाशित होते हैं। ऋषि लिखते हैं कि जब तक आत्मा देह में होता है तभी तक ये गुण प्रकाशित रहते हैं और जब शरीर छोड़ चला जाता है तब ये गुण शरीर में नहीं रहते। जिस के होने से जो हों और न होने से न हों वे गुण उसी के होते हैं। जैसे दीप और सूर्यादि के न होने से प्रकाशादि का न होना और होने से होना है, वैसे ही जीव और परमात्मा का ज्ञान-विज्ञान गुण द्वारा होता है। ईश्वर और जीव के गुण, कर्म व स्वभाव की ही भांति ऋषि दयानन्द जी ने प्रकृति के गुणों, विकारों व सृष्टि उत्पत्ति, पालन व प्रलय आदि से संबंधित प्रश्नों के उत्तर भी विस्तार से अपने महत्वपूर्ण ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में दिये हैं। सभी पाठकों को सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ पढ़ना चाहिये। इससे उनकी सभी शंकाओं व भ्रान्तियों का समाधान हो जायेगा। 

विद्या के अन्तर्गत आने वाले सभी विषयों पर ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश आदि अपने ग्रन्थों में प्रकाश डाला है। उपासना की सत्य व लाभकारी विधि भी हमें ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों से विदित होती है। ऋषि दयानन्द के ज्ञान का आधार ईश्वर प्रदत्त चार वेदों का ज्ञान था। उन्होंने ऋग्वेद आंशिक तथा यजुर्वेद सम्पूर्ण का संस्कृत व हिन्दी में भाष्य, मन्त्रों के पदार्थ व भावार्थ भी अपने वेदभाष्य में दिये हैं। उनके अनुयायी विद्वानों ने भी चारों वेदों के भाष्य किये हैं जिससे वेदों का अध्ययन कर मनुष्य की अविद्या पूर्णतः दूर हो जाती है। वेदों व वैदिक साहित्य के अध्ययन से जो लाभ मनुष्य को होता है वह किसी मत-मतान्तर व उसके ग्रन्थों के अध्ययन से नहीं होता। सभी मतों की मान्यताओं में मिश्रित अविद्या का ज्ञान भी ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में की गई अपनी समालोचना में प्रस्तुत किया है। इससे हम सभी मत-मतान्तरों की यथार्थ स्थिति को जान सकते हैं। हमें अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता। वेदों की सर्वोपरि विशेषता के कारण ही निष्पक्ष भाव से ऋषि दयानन्द ने ईश्वरप्रदत्त ज्ञान वेदों को अपनाया था। जो मनुष्य अपनी सांसारिक व पारलौकिक उन्नति करना चाहते हैं उन्हें धर्म मार्ग पर चलकर अर्थ, काम व मोक्ष को सिद्ध करना चाहिये। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के लिए वेदमार्ग पर चलना अपरिहार्य है। इसका अन्य उपाय नहीं है। कृत्रिम दया व सेवा के काम करने मात्र से हमारी व किसी की पारलौकिक उन्नति व मोक्ष आदि की प्राप्ति असम्भव है। अतः सभी को ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों तथा वेदों का अध्ययन कर अपने जीवन को विद्या से युक्त तथा अविद्या से मुक्त करना चाहिये। आर्यसमाज से जुड़ने पर अनेक वेदाचार्यों एवं वेद के विद्वानों से हमारा सम्पर्क हो जाता है और इससे हम अपने जीवन को सत्य व विवेक से युक्त कर सकते हैं और इष्ट फलों को प्राप्त कर सकते हैं। 

इनकी बेफ़िक्री घोल रही है आपकी सांसों में ज़हर

आपकी सांसों में ज़हर घोलने वालों को ट्रैक कर सबके सामने रखने के इरादे से 25 से अधिक पर्यावरण समूह एक साथ एक मंच पर आ गये हैं। और इनके साझा प्रयास से अब ये साफ़ हो रहा है कि दरअसल हमारी सांसों में ज़हर घोलने के लिए थर्मल पावर प्लांट काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं।
दरअसल बीते कुछ सालों से कोयला बिजलीघरों में उत्सर्जन नियन्त्रण संयंत्रों को लगाये जाने की समय सीमा में लगातार देरी होती जा रही है। डेडलाइन नज़दीक आते ही ये बिजली उत्पादक नई समयसीमा माँग लेते हैं।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा नए वायु प्रदूषण नियंत्रण मानदंडों का पालन करने के लिए 2015 में कोयला बिजली कंपनियों को 2 साल की समय सीमा दी गई थी। दिसंबर 2017 तक भारत के 300 कोयला बिजली संयंत्रों को कोयला जलाने पर उत्सर्जन (पार्टिकुलेट मैटर, एसओ 2 और एनओएक्स) को नियंत्रित करने के लिए स्क्रबर्स, फिल्टर और ग्रिप गैस डी-सल्फ्यूरेशन (एफजीडी) तकनीक स्थापित करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन क्लीन एनर्जी एंड एयर (CREA) द्वारा हाल ही में किए गए एक विश्लेषण से पता चलता है कि 2015 के बाद से केवल 1% बिजली संयंत्रों ने ही इन मानदंडों को लागू किया। उस समय के निर्णय की सराहना की गई थी क्योंकि भारत ने अपनी हवा को साफ करने के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की थी, लेकिन कार्यान्वयन किया जाना था 2017 से 2020 तक, लेकिन देरी होती रही और अब 2022 तक फिर समय की मांग होने लगी है। उम्मीद है कि थर्मल प्लांट्स को यह समय भी मिल ही जाएगा।
इस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए CREA के विश्लेषक सुनील दहिया कहते हैं, “बीते पिछले पांच वर्षों को देखते हुए अब समझ यही आता है कि बिजली कंपनियों के दबाव के कारण 2015 की अधिसूचना के तहत सभी मानदंडों को या तो हल्का किया जा रहा है या फिर वो सब कमजोर पड़ने के लिए प्रक्रिया में है।”
और इस सब का ही नतीजा है कि स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020 की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में सिर्फ 2019 में ही वायु प्रदूषण के दीर्घकालिक जोखिम ने 1.67 मिलियन लोगों की जान ली। साल 2014 में शहरी उत्सर्जन और संरक्षण एक्शन ट्रस्ट द्वारा किए गए एक अन्य अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों के परिणामस्वरूप अगले 15 वर्षों में लगभग 229,000 समय से पहले मौतें होंगी।

अपनी मजबूरी और परेशानियाँ बताते हुए, जनवरी 2016 में, पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (एपीपी) ने दावा किया कि प्रदूषण नियंत्रण मानदंडों को पूरा करने के लिए तकनीकी उन्नयन के लिए उन्हें अगले दो वर्षों में INR 2.4 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की आवश्यकता होगी। इस आँकड़े पर आपत्ति जताते हुए काउंसिल फॉर एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईवी) दावा किया कि असल लागत INR 90,000 करोड़ के आसपास होगी। आपकी सांसों में ज़हर घोलने वालों को ट्रैक कर सबके सामने रखने के इरादे से 25 से अधिक पर्यावरण समूह ने Airoffenders.in के माध्यम से यह साफ़ कर दिया है कि 2015 से अब तक किसने कब प्रदूषण नियंत्रण में ढिलाई बरती है। इस वेबसाइट से यह भी साफ़ होता है कि कैसे थर्मल पावर प्लांट गलत बयानी, बेफ़िक्री, और गैरज़िम्मेदारी के धुंए के गुबार की पीछे छिपे हुए हैं।

भारत में हेल्दी एनर्जी इनिशिएटिव सह-समन्वयक श्वेता नारायण कहती हैं, “कोयला बिजली संयंत्र भारत के वायु प्रदूषण संकट के सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक हैं। कई अध्ययनों से पता चला है कि थर्मल पावर प्लांट्स के पास रहने वाले लोगों के फेफड़ों पर इन प्लांट्स के उत्सर्जन का गम्भीर असर होता है। लेकिन आत्मानिर्भर भारत का सपना अस्वस्थ भारत की नींव पर नहीं टिक सकता। हर दिन मानदंडों के कार्यान्वयन में देरी के साथ हम बीमारी और विकलांगता वाले अंधकारमय भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं।”
एक डॉक्टर की नज़र से, डॉ अरविंद कुमार, संस्थापक ट्रस्टी, लंग केयर फाउंडेशन कहते हैं, “उत्सर्जन मानदंडों में एक एक दिन की देरी हम पर भारी है। हम सबकी जीवन प्रत्याशा इसके चलते कम हो रही है। जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का वक़्त है ये।”

कोरोना मे दिन मैंने कैसे काटे


मत पूछो,कोरोना मे दिन कैसे मैंने काटे,
हाथो मे पड थे छाले,पैरों में चुभे थे कांटे।
दर दर ठोकरें हर जगह मुझे खानी पड़ी थी,
ये मेरे लिए मुश्किल की बहुत बड़ी घड़ी थी।

घर में बन्द था,नहीं जा सकता था मै बाहर,
बच्चे भी मना कर रहे थे,जाओ नहीं बाहर।
घर में बैठ कर लिखता था मै कुछ कविता,
तड़फ रहा था मै सुने तो मेरी कोई कविता।

कर रहा था मै घर से ही दफ्तर का काम,
मिल रहा न था मुझे तनिक भी विश्राम।
बना लिया था घर को मैंने अपना था कार्यलय,
मंदिर भी बन्द थे इसलिए घर बना था देवालय।

मुंह पर मास्क लगाना,रकखी दो गज की दूरी,
समझो इसे डर मेरा,या समझो मेरी मजबूरी।
घुटता था दम मेरा काम करने में होती परेशानी,
जान है तो जहान है इसे समझो न मेरी नादानी।

कुछ फरमाइशें लेकर मतलब से कोई मिलने आया,
जिनकी की थी मैंने सहायता कोई काम न मेरे आया।
ले रहे थे सब अपने अपने मतलब के खर्राटे,
पूछो मत कोरोना मे दिन मैंने किस तरह काटे।

आर के रस्तोगी

देशद्रोही ताकतों का ‘मुखौटा’ बनने का क्योें मजबूर हैं आंदोलनकारी किसान

                               संजय सक्सेना

नया कृषि कानून खारिज करने की जिद पर अड़े आंदोलकारी  किसान अब अपने बुने जाल में फंसते जा रहे हैं। यही वजह है कि मुट्ठी भर मोदी विरोधी विपक्ष को छोड़कर जो लोग कल तक किसानों के साथ खड़े नजर आ रहे थे, वह अब इस बात से आश्चर्यचकित हैं कि जब मोदी सरकार ने किसानों की तमाम मांगे मांगने के साथ कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण दे दिया है तो फिर कृषि कानून वापस लिए जाने की बात क्यों उठाई जा रही है। आंदोलनकारी किसानों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह न तो देश के 80-90 करोड़ किसानो का प्रतिनिधित्व करते हैं, न ही वह सड़क, चक्का या रेल मार्ग जाम करके आम जनता के लिए मुसीबत खड़ी करने का हक रखते हंै। आंदोलनकारी किसान यदि किसानों की समस्याओं और उनके हक की ही आवाज उठा रहे होते तो राजस्थान पंचायत चुनाव जिसे किसानों और गांव का चुनाव माना जाता है के नतीजे कुछ और होते। आंदोलनकारी किसानों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वह देश विरोधी ताकतों के हाथ का खिलौना न बनें। किसानों के आंदोलन में खालिस्तान समर्थको का क्या काम है ? किसानों के धरना स्थल पर दंगाइयों के पोस्टर लगाया जाने को किन्हीं भी तर्को के सहारे सही नहीं ठहराया जा सकता है।
टिकरी बॉर्डर पर धरने पर बैठे किसानों के मंच और महिला किसानों के हाथों में दिखे बैनर-पोस्टरों में दिल्ली दंगों के मास्टरमाइंड शरजील इमाम, उमर खालिद समेत अन्य आरोपियों और भीमा कोरेगांव के आरोपियों के लहराते पोस्टर और इनको छोड़ने की मांग से किसानों के आंदोलन का क्या लेना-देना है। इसी वजह से किसानों के आंदोलन पर संशय जताया जा रहा है। आरोप लग रहे हैं कि किसानों के आंदोलन को वामपंथियों और माक्र्सवादियों ने हाईजैक कर लिया है। जिस कार्यक्रम में यह बैनर-पोस्टर दिखाई दिए उसका आयोजन किसानों के संगठन भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहां) ने किया था। कार्यक्रम में उगराहां ने जेल में बंद बुद्धिजीवियों और लोकतांत्रिक अधिकार कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा करने की भी मांग की । इतना ही नहीं गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की तस्वीरों के साथ एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए संगठन के प्रदेश अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा कि आज इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स डे के मौके पर हमें जीवन का अधिकार, जीवन की बेहतरी के लिए लड़ने का अधिकार और मानवता की गरिमा के लिए संघर्ष करने का अधिकार है।  
  बहरहाल,मुददे पर आया जाए तो नये कृषि कानून को लेकर किसान आंदोलन के बीच राजस्थान पंचायत चुनाव में जहां कांगे्रस की सरकार है, वहां से भारतीय जनता पार्टी की शानदार जीत और कांगे्रस को करारी हार यह बताने के लिए काफी है कि सभी किसान नये कषि कानून से परेशान नहीं हैं। राजस्थान के किसानों ने पंचायत चुनाव में बीजेपी के पक्ष में जबर्दतस्त मतदान करके आंदोलनकारी किसानों को आइना दिखाने का काम किया है। यह बता जितनी जल्दी आंदोलनकारी समझ जाएंगें उतना अच्छा होगा। आंदोलनकारी किसानों के बीच नये कानून को लेकर अभी भी कोई दुविधा है तो वह इसे सरकार से बाचतीत करके ही दूर कर सकते हैं। 14 दिसंबर को आंदोलनकारी किसानों ने टोल प्लाजा खोलने सहित मॉल, रिलायंस के पंप, भाजपा नेताओं के दफ्तर और घरों के आगे धरना देने की घोषणा करके बात बनाने की बजाए बिगाड़ने का काम किया है। किसानोें को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि वह विपक्ष की भाषा बोलने या उनका मोहरा बनने की बजाए अपने हितों का ध्यान रखें। किसानों को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि उनके आंदोलन के चलते आम जनता को कोई परेशानी या उसके मौलिक अधिकारों का हनन न हो।
 बात किसानोें के हित की कि जाए तो इससे पूर्व नये कृषि कानून के खिलाफ किसानों के ‘भारत बंद’ में मोदी विरोधी नेताओं ने जर्बदस्ती कूद कर अपनी सियासत भले चमका ली हो, लेकिन इससे किसानों का भला कुछ नही हुआ, उलटा किसानों का उनके नेताओं की हठधर्मी के चलते नुकसान होता साफ दिख रहा है, जो मोदी सरकार ‘भारत बंद’ से पूर्व तक किसानों की मांगों को लेकर गंभीर थी, अब उसी सरकार के कई नुमांइदे यह कहने से चूक नहीं रहें हैं,’यह किसानों का नहीं, विपक्ष का राजनैतिक बंद था। किसान तो विपक्ष की सियासत का मोहरा बन गए हैं।’ यह हकीकत भी है। किसान लगातार कोशिश कर रहे थे कि उनके आंदोलन पर ‘सियासी रंग’ न चढ़ पाए, इसी लिए किसान नेता लगातार उनके आंदोलन को समर्थन कर रहे तमाम राजनैतिक दलों को आइना दिखा रहे थे कि किसानों के आंदोलन या फिर ‘भारत बंद के दौरान किसी भी राजनैतिक दल का कोई भी नेता या कार्यकर्ता पार्टी के झंडे-बैनर लेकर आंदोलन में शिरकत नहीं करेगा,लेकिन ‘चतुर भेड़िए’ की तरह कांगे्रसी, सपाई, बसपाई, वामपंथी, आकाली दल आदि पार्टी के नेतागण न सिर्फ किसान आंदोलन में कूदे बल्कि किसानों के आंदोलन को पूरी तरह से ‘हाईजैक’ भी कर लिया। जगह-जगह तमाम दलों के नेता और कार्यकर्ता अपने झंडे-बैनरों के साथ अपनी सियासत चमकाने के लिए सड़क से लेकर रेल पटरियों तक पर नजर आ रहे थेे। इसमें से तमाम नेता और दल ऐसे थे जिनकी सियासी जमीन पूरी तरह से खिसक चुकी है और यह लोग समय-समय पर दूसरों के मंच और आंदोलन को हथियाने की साजिश रचते ही रहते हैं। अभी यह किसानों के साथ हुआ है। इससे पूर्व नागरिका संशोधन कानून हो या फिर एक बार में तीन तलाक,कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने आदि का मसला सब जगह मोदी विरोधी नेता दूसरे का मंच हड़पने में लगे दिखाई दिए थे।
 आश्चर्य होता है कि तमाम राजनैतिक दल और उनके नेता सकरात्मक राजनीति करने के बजाए। हर उस मुददे को हवा देने में लग जाते हैं जिससे मोदी सरकार असहज हो सकती है। वर्ना कोई कारण नहीं था जिस कृषि कानून में बदलाव के लिए कांगे्रस के गठबंधन वाली मनमोहन सरकार से लेकर शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, अकाली दल, राष्ट्रीय जनता दल, आम आदमी पार्टी हामी भर रहे थे, वह आज मौकापरस्ती की सियासत में उलझ कर इस कानून की मुखालफत करने में लग गए हैं। किसानों को भड़का रहे हैं कि वह मोदी सरकार पर नया कृषि कानून वापस लेने के लए दबाव बनाए,जिसके लिए मोदी सरकार कभी तैयार नहीं होगी और विपक्ष इसी का फायदा उठाने की साजिश रच रहा है।  
बहरहाल, मौजूदा हालात में किसानों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह सियासत में फंसने की बजाए अपने दूरगामी हितों की रक्षा को अधिक प्राथमिकता दें। हठ से काम नहीं चलने वाला है। किसान नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार प्रारंभ में कुछ कठिनाइयां जरूर पैदा करते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि किसी भी क्षेत्र में सुधार प्रकिृया को ही ठप कर दिया जाए। आखिर यह कौन बात हुई की किसान कृषि कानून की खामियों को दूर करने की बजाए इसको पूरी तरह से वापस लिए जाने की हठधर्मी  करने लगें। किसान और उनके नेता जितनी जल्दी यह बात समझ जाएंगें कि मोदी विरोधी नेता और दल उनको समर्थन के नाम पर उनकी (किसानों की) पीठ में छुरा भोंकने का काम कर रहे हैं, उतना उनके लिए अच्छा होगा।
 आश्चर्य होता है कि किसानों को अपनी मांगे सरकार के सामने रखने के लिए योगेन्द्र यादव जैसे तथाकथित किसान नेताओं का सहारा लेना पड़ता है जिनका वजूद ही मोदी विरोध पर ही टिका है। किसानों को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि नये कषि कानून को लेकर पंजाब और हरियाणा के ही किसान क्यांे ज्यादा उद्वेलित हैं। पिछले कुछ वर्षो का रिकार्ड उठाकर देखा जाए तो पंजाब में किसानों को लेकर जिस तरह की सियासत होती है,उसी के चलते कभी खेतीबाड़ी से समृद्धि के मामले में देश में अग्रणी रहने वाला पंजाब का किसान आज की तारीख में अन्य राज्यों के किसानों के मुकाबले पिछड़ता जा रहा है। कई राज्यों के किसानों की औसत आय पंजाब के किसानों से कहीं अच्छी हो गई है।
 वैसे हकीकत यह भी है कि पिछले कु़छ दिनों में मोदी सरकार ने जिस तरह से नये कृषि कानून को लेकर किसानों में जागरूकता फैलाने की मुहिम शुरू की थी, उसके चलते बड़ी संख्या में किसानों की आंखों के सामने से झूठ का पर्दा हटने लगा है। किसानों की आंखें धीरे-धीरे खुलने लगी है।उधर,किसानों से जबरन कराए गए ‘भारत बंद’ की विफलता के बाद किसान हितों की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे दलों को भी इस बात का आभास हो गया है कि जनता ही नहीं पूरी तरह से किसान भी उनके बहकावे में नहीं आए। इसी लिए तो भारत बंद के दौरान हरियाणा के कैथल जिले में किसानों के बीच पहुंचे कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रणदीप सुरजेवाला को किसानों के जबर्दस्त विरोध के चलते वहां से बैरंग लौटना पड़ गया। इससे पूर्व सुरजेवाला स्वयं ही वहां पहुंचकर धरना दे रहे किसानों के बीच बैठ गए थे, लेकिन किसानों को यह नागवार गुजरा। विशेष तौर पर युवाओं ने रणदीप सिंह सुरजेवाला से भी सवाल-जवाब शुरू कर दिए। थोड़ी ही देर में हंगामा होने लगा और किसानों ने रणदीप सुरजेवाला के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।  कुछ देर तो सुरजेवाला किसानों के बीच जमीन पर ही बैठे रहे, लेकिन जब वे उठे तो हालात बेकाबू हो गए और उन्हें बेहद मुश्किल से वहां से बचाकर निकाला गया।

 आखिर कांगे्रस का यह कौन सा तर्क है कि मोदी सरकार नए कृषि कानूनों को रद कर नए सिरे से कानून बनाए। क्या इसका यही मतलब नहीं हुआ कि एक तरफ तो कांग्रेस कृषि सुधारों की आवश्यकता महसूस कर रही है दूसरी ओर वह सियासी फायदा उठाने का मौका भी नहीं छोड़ना चाहती है। कांगे्रस यदि कृृषि कानून में बदलाव नहीं करना चाहती है तो उसने बीते लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में कृृषि कानून में सुधार की बात क्यों कही थी। कांगे्रस को मोदी सरकार के सूत्रों से आ रहे उन दावों की भी हकीकत बतानी चाहिए जिसमें कहा जा रहा है कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानून में कांग्रेस कार्यकाल के दौरान की एक समिति के सुधार उपाय शामिल किए हैं। इस समिति की अध्यक्षता हरियाणा के तत्कालिक मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने की थी जो आज विपक्ष में रहते कृृषि कानून की मुखालफत करने में लगे हैं। बेहतर हो कि किसान संगठन कांग्रेस, राकांपा और तृणमूल कांग्रेस सरीखे मौकापरस्त दलों के असली चेहरे की पहचान करें और यह समझें कि इन दलोें का उद्देश्य उनकी आंखों में धूल झोंकना ही है। यदि नए कृषि कानूनों में कहीं कोई खामी है तो उस पर बात करने में हर्ज नहीं। खुद सरकार भी इसके लिए तैयार है, लेकिन इसका कोई तुक नहीं कि कृषि कानूनों को रद करने की बात की जाए। इस तरह की बातें कुल मिलाकर किसानों का अहित ही करेंगी, क्योंकि खुद किसान भी यह अच्छी तरह जान रहे हैं कि पुरानी व्यवस्था को अधिक दिनों तक नहीं ढोया जा सकता है। उचित यह होगा कि किसान संगठन कांग्रेस सरीखे तमाम दलों से पल्ला झाड़कर अपने हितों की चिंता करें और इस क्रम में यह देखें कि किसी भी क्षेत्र में सुधार एक सतत प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं और समय के साथ व्यवस्था सही आकार लेती है। विभिन्न क्षेत्रों में किए गए आर्थिक सुधार यही बयान भी कर रहे हैं। किसानोें को अपने हितों की चिंता करते समय इस पर भी गौर करना होगा कि उन्हें अपने दूरगामी हितों की रक्षा को अधिक प्राथमिकता देनी होगी। किसी भी क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार प्रारंभ में कुछ कठिनाइयों को जन्म देते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सुधारों को अपनाने से बचा जाए और अप्रासंगिक नियम-कानूनों और तौर-तरीकों को बनाए रखने की जिद पकड़ ली जाए।

फ्रांस के मुस्लिम मुसीबत में

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

फ्रांस के 56 लाख मुसलमानों में आजकल कंपकंपी दौड़ी हुई है, क्योंकि ‘इस्लामी अतिवाद’ के खिलाफ फ्रांस की सरकार ने एक कानून तैयार कर लिया है। राष्ट्रपति इमेन्यूएल मेक्रो ने कहा है कि यह कानून किसी मजहब के विरुद्ध नहीं है और इस्लाम के विरुद्ध भी नहीं है लेकिन फिर भी फ्रांस के मुसलमान काफी डर गए हैं। फ्रांस में तुर्की, अल्जीरिया और अन्य कई यूरोपीय व पश्चिमी एशियाई देशों के मुसलमान आकर बस गए हैं। ऐसा माना जाता है कि उनमें से ज्यादातर मुसलमान फ्रांसीसी धर्मनिरपेक्षता (लायसीती) को मानते हैं लेकिन अक्तूबर में हुई एक फ्रांसीसी अध्यापक सेमुअल पेटी की हत्या तथा बाद की कुछ घटनाओं ने फ्रांसीसी सरकार को ऐसा कानून लाने के लिए मजबूर कर दिया है, जो मुसलमानों को दूसर दर्जे का नागरिक बनाकर ही छोड़ेगा। इस कानून के विरुद्ध तुर्की समेत कई इस्लामी देश बराबर बयान भी जारी कर रहे हैं। इस कानून के लागू होते ही मस्जिदों और मदरसों पर सरकार कड़ी निगरानी रखेगी। उनके पैसों के स्त्रोतों को भी खंगालेगी। वह मुस्लिम बच्चों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान देगी। उन्हें कट्टरवादी प्रशिक्षण देने पर रोक लगाएगी। यदि मस्जिद और मदरसे फ्रांस के ‘गणतांत्रिक सिद्धांतों’ के विरुद्ध कुछ भी कहते या करते हुए पाए जाएंगे तो उन पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। लगभग 75 प्रतिबंध पिछले दो माह में लग चुके हैं और 76 मस्जिदों के विरुद्ध अलगाववाद भड़काने की जांच चल रही है। इमामों को भी अब सरकारी देखरेख में प्रशिक्षण दिया जाएगा। सरकार ने इस्लामद्रोह-विरोधी संगठन को भी भंग कर दिया है। अब तक अरबी टोपी, हिजाब, ईसाई क्राॅस आदि पहनने पर रोक सिर्फ सरकारी कर्मचारियों तक थी। उसे अब आम जनता पर भी लागू किया जाएगा। तीन साल से बड़े बच्चों को घरों में तालीम देना भी बंद होगा। डाॅक्टरों द्वारा मुसलमान लड़कियों के अक्षतयोनि (वरजिनिटी) प्रमाण पत्रों पर भी रोक लगेगी। बहुपत्नी विवाह और लव-जिहाद को भी काबू किया जाएगा। तुर्की और मिस्र जैसे देशों में इन प्रावधानों के विरुद्ध कटु प्रतिक्रियाएं हो रही हैं लेकिन फ्रांस के 80 प्रतिशत लोग और मुस्लिमों की फ्रांसीसी परिषद भी इन सुधारों का स्वागत कर रही है। ये सुधार राष्ट्रपति मेक्रो की डगमगाती नैया को भी पार लगाने में काफी मदद करेंगे। उन्हें 2022 में चुनाव लड़ना है और इधर कई स्थानीय चुनावों में उनकी पार्टी हारी है और उनके कई वामपंथी नेताओं ने दल-बदल भी कर लिया है।

नए संसद भवन से देश की अपेक्षाएं

किसी भी संस्था या संस्थान को गरिमामय बनाने के लिए उसका दिव्य और भव्य होना बहुत आवश्यक माना गया है। जब तक कोई संस्था ,संस्थान या व्यक्तित्व दिव्य और भव्य नहीं होगा तब तक उसकी गरिमा में चार चांद नहीं लग सकते । यही कारण है कि मनु महाराज सहित हमारे जितने भी राजनीति शास्त्री प्राचीन काल में हुए हैं, उन सबने राजा की पोशाक और उसके निवास स्थानों के दिव्य और भव्य होने की आवश्यकता पर बहुत अधिक बल दिया है।
भारत की वर्तमान मोदी सरकार ने देश की संसद के नए भवन का शिलान्यास बीते 10 दिसंबर को किया है। स्वयं प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा इस नए भवन का शिलान्यास किया गया है। इसकी दिव्यता और भव्यता पर सरकार ने विशेष ध्यान दिया है।
नया संसद भवन हमारी वर्तमान संसद के निकट ही बनाया जा रहा है । वर्तमान संसद भवन को अंग्रेजों ने अपनी औपनिवेशिक आवश्यकताओं के अनुरूप 1921 में बनाना आरम्भ किया था और 1927 की 18 जनवरी को इसे देश के लिए समर्पित किया था ।उस समय यह संसद भवन उपनिवेशवादी व्यवस्था का प्रतीक था।
आर्थिक संसाधनों की कमी के चलते स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात इस भवन के दोबारा निर्माण की आवश्यकता को उचित नहीं माना गया, अन्यथा उचित तो यही होता कि उपनिवेशवादी व्यवस्था के प्रतीक इस संसद भवन को गिराकर या इसका किसी और प्रकार से सदुपयोग करते हुए नया संसद भवन स्वाधीन भारत अपने लिए बनाता। वैसे कांग्रेसी सरकारों को अंग्रेजो के द्वारा बनाई गई किसी भी इमारत में कोई उपनिवेशवादी सोच या दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता था। अब जो नया संसद भवन बनाया जा रहा है वह तिकोना होगा जबकि वर्तमान संसद भवन वृत्ताकार है ।
देश में जिस प्रकार जनसंख्या बढ़ती जा रही है, उसी के अनुरूप समस्याएं भी बढ़ी हैं। अब से 40 वर्ष पूर्व जिलाधिकारी के कार्यालय जितने छोटे आकार में हुआ करते थे , वह भी अब उतने आकार के नहीं रहे । समय की आवश्यकता के अनुरूप उनमें भी वृद्धि की गई है यद्यपि 40 वर्ष पूर्व देश में जितने जिले थे,उन जिलों के भी लगभग दोगुने जिले अब हो चुके हैं । इसके उपरांत भी जिलाधिकारियों के कार्यालयों को विस्तार दिया गया है । स्पष्ट है कि जब जिलाधिकारियों के कार्यालयों का विस्तार या वृद्धि समय की आवश्यकता को समझते हुए की गई है तो देश के संसद भवन का विस्तार भी किया जाना समय की आवश्यकता बन चुकी थी । वर्तमान संसद इस बदली हुई परिस्थिति के लिए छोटी पड़ती जा रही थी ।
हमारी वर्तमान संसद अत्याधुनिक सुविधाओं से लेस नहीं मानी जा सकती। इसके उपरांत भी कांग्रेस जैसी पार्टियां नए संसद भवन के शिलान्यास को लेकर यह कहकर आलोचना कर रही हैं कि जब देश पहले ही आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है तब देश का पैसा नए संसद भवन पर खर्च करना मोदी सरकार की मूर्खता है। अब इन कांग्रेसियों से कौन पूछे कि देश तो एशियाड और ओलंपियाड के समय भी आर्थिक विषमताओं से जूझ रहा था, जिस समय हजारों हजारों करोड रुपए कांग्रेसी सरकारों ने खेलों पर व्यर्थ में ही बहा दिया था । इतना ही नहीं, उन खेलों में इतने लंबे चौड़े घोटाले हुए थे कि वर्तमान मोदी सरकार जितने पैसे में एक संसद भवन बनाने जा रही है उस जैसे संसद भवन अनेकों बन सकते थे। घोटालों में नष्ट किए गए उस पैसे को क्या कांग्रेस ने अपने बाप का पैसा समझ लिया था ? – निश्चित रूप से वह धन भी जनता का ही था, जिसे देश के बदन से चिपकी हुई कांग्रेस नाम की जोंक चूस रही थी। वर्तमान में कांग्रेस की यह प्रवृत्ति बन चुकी है कि जिस काम को वह स्वयं करे वह तो जनहित में माना जाए और जिसे केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार करे वह जनविरोधी है।
हमारा मानना है कि कांग्रेस की सरकारों के द्वारा यदि एशियाड और ओलंपियाड का आयोजन किया गया तो वह भी देश के सम्मान के लिए उस समय आवश्यक था, उसी प्रकार देश की वर्तमान आवश्यकता और परिस्थितियों के दृष्टिगत नए संसद भवन का निर्माण किया जाना भी समय की आवश्यकता है।
लोकसभा सचिवालय के अनुसार नया संसद भवन अक्तूबर 2022 तक बनकर तैयार हो जाएगा। ध्यान रहे कि 2022 वह वर्ष है जब हमारे देश को स्वाधीन हुए 75 वर्ष पूर्ण हो रहे होंगे अर्थात स्वाधीनता की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश नए संसद भवन से अपनी सरकार को चलते हुए देखेगा।
हमारी वर्तमान लोकसभा में 543 सदस्य होते हैं । संसदीय क्षेत्रों के नए परिसीमन के अनुसार इनकी संख्या भविष्य में बढ़ना निश्चित है और जिस प्रकार देश की जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है उसके दृष्टिगत भविष्य में इनके निरंतर बढ़ते रहने की संभावना है । इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए नए संसद भवन में 888 लोकसभा सदस्यों के बैठने की व्यवस्था की गई है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि नई संसद भवन में लोकसभा भूतल पर ही रखी जाएगी।
यदि संसद के उच्च सदन अर्थात राज्यसभा की बात करें तो उसमें वर्तमान में 245 सदस्य होते हैं , जबकि नए संसद भवन में इन सदस्यों की संभावित संख्या भी 384 रखी गई है । यदि भविष्य में किसी भी अवसर पर संसद का संयुक्त अधिवेशन आहूत किया जाता है तो ऐसी व्यवस्था भी की गई है कि 1272 सदस्य उस स्थिति में एक साथ बैठ सकेंगे।
हमारे सांसद वर्तमान में लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं । जिनके लिए यह आवश्यक है कि संसद के भीतर ही उनका अपना निजी कक्ष हो । जिसमें वह अपने क्षेत्र के लोगों से मेल मुलाकात कर सकें या संसद में चल रही किसी बहस में सम्मिलित होने के लिए या अपने किसी क्षेत्रीय समस्या को उठाने के लिए वहां बैठकर अपनी तैयारी कर सकें। इस बात को दृष्टिगत रखते हुए नए संसद भवन में यह व्यवस्था की गई है कि सभी सांसदों को डिजिटल सुविधाएं प्रदान की जाएं और उन्हें अपना अलग से कार्यालय भी प्रदान किया जाए।
नए संसद भवन में एक भव्य संविधान कक्ष या कांस्टीट्यूशनल हॉल भी होगा। जिसमें भारत की लोकतांत्रिक विरासत को पूर्ण भव्यता के साथ प्रकट करने की व्यवस्था की जाएगी। जिससे किसी भी आगंतुक को भारत की लोकतांत्रिक विरासत से परिचित कराया जाए सकेगा। इस भवन या कक्ष में भारत के संविधान की मूल प्रति को भी सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाएगा। इस भवन के साथ सांसदों के बैठने के लिए एक बड़ा हॉल, उनके पढ़ने के लिए अच्छे पुस्तकालय , समितियों के लिए कई कमरे, भोजन कक्ष और बहुत सारी पार्किंग की व्यवस्था भी नए भवन में की जाएगी।
इस पूरे प्रोजेक्ट का निर्माण क्षेत्र 64,500 वर्ग मीटर होगा। यह वर्त्तमान संसद भवन से 17,000 वर्ग मीटर अधिक होगा। जहां तक वर्तमान संसद भवन के उपयोग की बात है तो इस भवन को भी यथावत रखा जाएगा। क्योंकि यह भवन भी हमारे बीते 75 वर्षों के इतिहास का एक जीता जागता साक्षी होगा। निश्चित रूप से आने वाले समय में यह संसद भवन भी इतिहास के जिज्ञासु विद्यार्थियों को भारत के समकालीन इतिहास के बारे में बहुत कुछ स्पष्ट करता रहेगा। इसलिए इसकी उपयोगिता को बनाए रखने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि इसमें संसदीय आयोजन कराए जाते रहेंगे। हमारा वर्तमान संसद भवन 566 वर्ग मीटर में बना हुआ है, जिसके निर्माण पर 1921 में 83 लाख रुपये व्यय किए गए थे। इस संसद भवन का उद्घाटन उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन ने 18 जनवरी 1927 को किया था। उस समय इस संसद भवन का डिज़ाइन एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने बनाया था। यही कारण है कि आज भी संसद भवन के इर्द-गिर्द के क्षेत्र को लुटियंस जोन कहा जाता है। यद्यपि यहां पर यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि लुटियंस और उसके साथियों ने भारत की वर्तमान संसद का नक्शा कहीं अपने देश या अपने मस्तिष्क से तैयार नहीं किया था अपितु इसका नक्शा भी उन्होंने बटेश्वर स्थित गुर्जर प्रतिहार शासकों के मंदिरों को देखकर ही तैयार किया था।
अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में बनने जा रहे इस नए संसद भवन पर 971 करोड़ रूपया खर्च होगा। नये संसद भवन के निर्माण का ठेका टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को दिया गया है। उसने सितंबर 2020 में 861.90 करोड़ रुपये की बोली लगाकर ये ठेका प्राप्त किया था। नई संसद भवन के बारे में यह भी पता चला है कि नया संसद भवन सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इस प्रोजेक्ट का खाका गुजरात स्थित एक आर्किटेक्चर फ़र्म एचसीपी डिज़ाइन्स ने तैयार किया है। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत एक कॉमन केंद्रीय सचिवालय बनाया जाएगा। वहाँ मंत्रालयों के कार्यालय होंगे। राजधानी के इस क्षेत्र को और भी अधिक दिव्य ,भव्य और गरिमामय बनाने के दृष्टिकोण से राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक तीन किलोमीटर लंबे राजपथ को भी नया रूप दिया जाएगा। ऐसी संभावना भी है कि प्रधानमंत्री कार्यालय और उनके आवास को साउथ ब्लॉक के पास ले जाया जा सकता है।
वहीं उपराष्ट्रपति के आवास को नॉर्थ ब्लॉक के पास ले जाया जा सकता है। प्रोजेक्ट के तहत उपराष्ट्रपति का वर्त्तमान आवास उन भवनों में आता है जिन्हें गिराया जाना है। नई व्यवस्था के अंतर्गत नॉर्थ और साउथ ब्लॉक को संग्रहालयों में बदल दिए जाने की योजना है। प्रोजेक्ट के तहत केंद्रीय सचिवावय बनाने के लिए उद्योग भवन, कृषि भवन और शास्त्री भवन की इमारतों को तोड़ा जा सकता है।
अब से पूर्व दिल्ली ने अपने निर्माण के कई दौर देखे हैं। कई सम्राटों, सुल्तानों या बादशाहों ने इसे समय-समय पर अपने ढंग से सजाया और संवारा है। दिल्ली के लंबे इतिहास ने कई राजवंशों को उठते और पतन में जाते हुए देखा है । अपने इसी प्रकार के अनुभवों की श्रंखला में एक और कड़ी जोड़ते हुए अब दिल्ली अपने लिए फिर एक नया संसद भवन देखने जा रही है ।
हमें आशा करनी चाहिए कि नया संसद भवन पूर्व के सभी राजभवनों से कहीं अधिक दिव्य, भव्य और गरिमामय इतिहास को लिखने वाला होगा। हमें यह भी अपेक्षा करनी चाहिए कि मोदी सरकार इस नए संसद भवन में ऐसा कानून भी बनाएगी जो ताजमहल के सच्चे स्वरूप को स्थापित कराएगा और कुतुबमीनार या ऐसे सभी भवनों या ऐतिहासिक स्थलों के हिंदू स्वरूप को प्रकट करने का मार्ग प्रशस्त करेगा जिनसे हिंदू इतिहास पर पड़ी धूल को साफ करने में हमें सहायता मिलेगी । नए संसद भवन से ही हमें यह भी अपेक्षा है कि महाभारत कालीन इंद्रप्रस्थ से लेकर वर्तमान तक के दिल्ली के सारे इतिहास को दिल्ली के पुराने किले में चित्रों और भवनों के माध्यम से प्रकट करने की दिशा में भी सरकार कोई स्पष्ट कानून बना सकेगी। देखते हैं कि नया संसद भवन हमारी अपेक्षाओं पर कितना खरा उतर सकता है?

ओ मां! भारत मां!

ओ मां! मेरी मां! भारत मां!
तेरी कोख को ना भूल पाऊंगा,
तेरी गर्भ में जन्म ले आऊंगा,
ओ मां! मेरी मां! भारत मां!

कभी बेटा बनकर तन जाऊंगा,
कभी बेटी बन-ठनकर आऊंगा,
कभी बनूंगा तेरा पहरेदार!
ओ मां! मेरी मां! भारत मां!

कभी तुम्हारी धानी चुनरिया,
कभी तिरंगा बन लहराऊंगा,
कभी सीमा की कटीली झार!
ओ मां! मेरी मां! भारत मां!

कभी अमुवां डाल की कोयल,
कभी फसल खेत की बनकर,
हर जनम में मैं आऊंगा!
ओ मां! मेरी मां! भारत मां!

अंततः चिता की क्षार बनकर,
तेरी गंगा में मिल जाऊंगा!
फिर भी क्या मुक्ति पाऊंगा?
ओ मां! मेरी मां! भारत मां!
—विनय कुमार विनायक

हमारा यह संसार इससे पहले अनन्त बार बना व नष्ट हुआ है

-मनमोहन कुमार आर्य
हम इस संसार में जन्में हैं व इसमें निवास कर रहे हैं। हमारी आंखें सीमित दूरी तक ही देख पाती हैं। इस कारण हम इस ब्रह्माण्ड को न तो पूरा देख सकते हैं और अपनी अल्पज्ञता के कारण इसको पूरा पूरा जान भी नहीं सकते हैं। सभी मनुष्यों में यह इच्छा होती है कि काश वह इस संसार को पूरा देख सकते व जान पाते। ऐसा हमारी अणु परिमाण व एकदेशी आत्मा के लिए सम्भव नहीं है। सीमित सत्ता में असीमित ज्ञान व शक्ति नहीं हो सकती। यदि जीवात्मा अपना ज्ञान बढ़ाना चाहता है तो उसे अपने से अधिक ज्ञानवान तथा शक्तिशाली मनुष्य व अन्य सत्ता जो सर्वशक्तिमान है, वह ईश्वर है, उसकी संगति करनी होती है। विद्वानों से संगति करने से मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है। ज्ञान से उसकी विचार करने व शारीरिक शक्तियों में भी सुधार होता है। ईश्वर एक सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान सत्ता है। संसार में जिस व जिन पदार्थों का भी अस्तित्व हैं वह सब पदार्थ दो प्रकार के होते हैं। एक अनादि व नित्य तथा दूसरे सादि व किसी विशेष काल में बने हुए होते हैं। जो पदार्थ स-आदि अर्थात् उत्पत्तिधर्मा, होते हैं उनका नाश होकर वह अपने बनने से पूर्व तत्व व सत्तात्मक पदार्थ में विलीन हो जाते हैं। लकड़ी जलने पर अपने पंच भौतिक पदार्थों में विलीन होकर मिल जाती है। वह यद्यपि दिखाई नहीं देती परन्तु उसका अस्तित्व उसके कारण पदार्थों में विद्यमान रहता है। हमारी यह समस्त सृष्टि भी कारण पदार्थों से बना हुए एक कार्य है। यह कार्य सृष्टि स-आदि अर्थात् सादि है। इसका जन्मख् उत्पत्ति व निर्माण हुआ है, अतः यह नाशवान है। इसका नाश व प्रलय अवश्य होगा। इसी लिये सृष्टि को उत्पत्तिधर्मी एवं प्रलय को प्राप्त होने वाली माना जाता है।

हमारी यह सृष्टि जिस पदार्थ से बनी है उसकी चर्चा वेद व दर्शन ग्रन्थों में मिलती है। वहां इस मूल पदार्थ को प्रकृति बताया गया है। प्रकृति का पदार्थ व सत्ता तीन गुणों सत्व, रज व तम गुणों वाला है। इन्हीं गुणों में विकार होकर यह समस्त जड़ वा पंचभौतिक जगत बना है। इस जगत में सभी भौतिक सत्तायें सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, अग्नि, जल, वायु, आकाश, लोक-लोकान्तर, निहारिकायें तथा नक्षत्र आदि सम्मिलित हैं। प्रकृति मूल पदार्थ है। इसका विनाश व अभाव कभी नहीं होता है। यह कभी बना नहीं परन्तु सदा अर्थात् अनादि काल से अस्तित्व में है और सदैव अर्थात् अनन्त काल तक रहेगा। अतः प्रकृति नामी जड़ सत्ता अनादि व नित्य है। यह सदा से है और सदा रहेगी और यह जैसी वर्तमान में सृष्टि रूपी कार्य अवस्था में विद्यमान है, इसी प्रकार अनन्त काल तक इसी प्रकार उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय को प्राप्त होती रहेगी। प्रलय के बाद पुनः उत्पत्ति होना इसका स्वभाविक धर्म कहा जा सकता है। अतः इस जगत् में प्रकृति नामक मूल जड़ पदार्थ की सत्ता सिद्ध होती है और इसी से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व प्रलय होकर पुनः पुनः सृष्टि की उत्पत्ति व प्रलय का चक्र चलता रहता है। इस रहस्य को जानकर मनुष्य को ज्ञान उत्पन्न होता है और जो अति पवित्र व शुद्ध आत्मायें होती हैं उनमें वैराग्य भाव भी उत्पन्न होता है। किसी भी पदार्थ में राग तभी होता है जब हम उसके नाशवान स्वरूप को भूले रहते हैं। जिस समय हमारे ज्ञान में यह बात दृण हो जाती है कि यह पदार्थ नाशवान है और कुछ समय बाद यह नाश को प्राप्त होने वाला है, तो हमारा उस पदार्थ व जंगम प्राणी से राग व मोह कम वा समाप्त हो जाता है, हम वैराग्य को प्राप्त हो जाते हैं। ऋषि दयानन्द, महात्मा बुद्ध आदि के जीवन में हम वैराग्य को देखते हैं जिन्होंने वैराग्य अर्थात् बोध होने पर सभी सुख सुविधाओं का त्याग कर तप, ज्ञान व ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग चुना था। इससे इन्हें लाभ हुआ। ऋषि दयानन्द तो वेदों के उद्धारक, प्रचारक, अद्वितीय धर्माचार्य तथा ईश्वर का साक्षात्कार करने वाले ऋषित्व को प्राप्त भी हुए थे जिनसे पूरे विश्व का अपूर्व उपकार हुआ। 

जिस प्रकार प्रकृति अनादि व नित्य अर्थात् अनुत्पत्ति व नाशरहित धर्म वाली सत्ता है, उसी प्रकार से सृष्टि में दो अन्य चेतन सत्तायें भी हैं। इन्हें हम ईश्वर व जीव कहते हैं। संसार में कुल तीन ही अनादि व नित्य पदार्थ हैं। ये पदार्थ ईश्वर, जीव व प्रकृति कहलाते हैं। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप है, वह कभी किसी प्रकार के विकार व भिन्न अवस्था को प्राप्त नहीं होता। जीव जन्म व मरण धर्मा होतें हैं। सभी जीव जन्म व मरण को प्राप्त होने वाले होते हैं। जीव का जन्म व मरण उसके कर्म फल बन्धन के कारण होता है। इस कर्म बन्धन का क्रम भी अनादि काल से ही सृष्टि में चल रहा है। बन्धन सुख व दुःख का कारण होते हैं। अतः दुःखों से पूर्णतया छूटने का उपाय बन्धनों को काटना व दूर करना होता है जो सद्ज्ञान वा विद्या से प्राप्त होता है। विद्या के अनुरूप आसक्ति वा फल की इच्छा का त्याग कर कर्म करने से मनुष्य कर्मों में लिप्त नहीं होते। वह अपने समस्त उपासना व यज्ञ आदि कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देते हैं। इससे वह कर्मों के फल भोग में वह फंसते नहीं हैं। ऐसा करने से जीव एक व अधिक जन्मों मंर मुक्ति वा मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं। सभी जीवों का मुख्य लक्ष्य बन्धन व उसके कारणों को जानना व उसकी मुक्ति के उपाय व साधन करना होता है। वेद एवं इतर ऋषियों द्वारा बनाये शास्त्रों में इस विषय को विस्तार से बताया गया है। ऋषि दयानन्द कृत सत्यार्थप्रकाश एवं वैदिक विद्वानों के अनेक ग्रन्थों में इस विषय पर अच्छा प्रकाश पड़ता है जिसे पढ़कर इस विषय को समझा जा सकता है। पूरा सत्यार्थप्रकाश अथवा इसके समुल्लास 7 व 9 का अध्ययन करने से इस विषय को अच्छी तरह से जाना जा सकता है। 

ईश्वर व आत्मा की सत्तायें अनादि व नित्य हैं। यह काल की सीमा से परे हैं। यह सदा से हैं और सदा रहेंगी। ईश्वर ज्ञानवान तथा सर्वशक्तिमान सत्ता है। हमारी यह सृष्टि ईश्वर की सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता तथा तप से उत्पन्न हुई है। ईश्वर ने यह सृष्टि जीवों को पूर्वकल्प व उसके पूर्वजन्मों में किए कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल देने व मुक्तात्माओें के कर्मों के अनुसार मुक्ति का सुख व उनको भी उनके कर्मों के अनुसार जन्म देने के लिये उत्पन्न की है। अतः सृष्टि की प्रलय के बाद भी जीवों को उनके कर्मानुसार सुख व दुःख आदि का भोग कराने के लिये सृष्टि की उत्पत्ति व पालन की आवश्यकता होती है जिसे ईश्वर अपने स्वभाव व कर्तव्य भावना से करते हैं। इस प्रकार से जीवों के कर्म कभी समाप्त न होने वाला क्रम है। इसका आदि भी नहीं है और अन्त भी नहीं है। इसी कारण से ईश्वर अनादि काल से इस प्रकृति से जीवों को सुख दुःख व मुक्ति आदि प्रदान करने के लिये संसार की रचना व पालन  करते आ रहे हैं। आगे भी वह ऐसा करते रहेंगे। इससे सिद्ध होता है कि हमारी यह सृष्टि इससे पूर्व भी अनादि काल से असंख्य व अनन्त बार बनी व प्रलय को प्राप्त हुई है। प्रत्येक सृष्टि में हमारा भी हमारे कर्मानुसार जन्म मरण हुआ है। इस सृष्टि के बाद भी यह सृष्टि अनन्त काल तक अनन्त बार बनेगी व प्रलय को प्राप्त होगी। यह क्रम कभी अवरुद्ध व समाप्त होने वाला नहीं है। इससे यह भी ज्ञात होता है कि हमारी आत्मा इस व इससे पूर्व अनन्त बार अनेकानेक योनियों में कर्मानुसार जन्म ले चुकी है और आगे भी लेगी। इस रहस्य को जानकर भी जिनको वैराग्य नहीं होता इसका अर्थ यह होता है कि हमारी आत्मा पर अज्ञान व अविद्या के संस्कार विद्यमान हैं। जब यह अविद्या दूर हो जाती है तो मनुष्य वास्तविक ज्ञानी, योगी व विरक्त होकर साधना व उपासना के मार्ग पर चल पड़ता है और उसके बाद उसकी निरन्तर आध्यात्मिक व पारमार्थिक उन्नति होती जाती है जो उसे मोक्ष के निकट ले जाती है। जब तक हम मुक्त नहीं होंगे हमारा जन्म मरण होता रहेगा और मुक्त होने के बाद हम 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों तक ईश्वर के सान्निध्य का आनन्द का भोग कर पुनः जन्म व मरण के चक्र में आ फसंगे। यह सत्य वैदिक सिद्धान्त व यथार्थ ज्ञान ईश्वर, जीव व प्रकृति के विषय में है। इस परिवर्तनशील जगत तथा जन्म मरण व उत्पत्ति प्रलय को जानकर मनुष्य को अविद्या से निकल कर सत्य वेदमार्ग का अनुसरण कर मुक्ति प्राप्ति हेतु मुमुक्षु बनना चाहिये। इसी में हम सबकी आत्माओं का कल्याण है। ऐसा नहीं करेंगे तो हम जन्म व मरण के चक्र में फंसे रहेंगे और इस कारण हम सुख व दुःख दोेनों को ही प्राप्त होते रहेंगे। 

यह ध्रुव सत्य है कि हमारी यह सृष्टि सत्व, रज व तम गुणों वाली त्रिगुणात्मक प्रकृति नामक अनादि व नित्य जड़ पदार्थ से बनी है। ईश्वर ही ने इसे बनाया है। सृष्टि उत्पत्ति का कारण जीव व उसके कर्म होते है। जीव का लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना होता है। मोक्ष प्राप्ति तक यह जन्म व मरण की यात्रा चलती है। मोक्ष प्राप्ति पर इस यात्रा में विराम आता है। इसके बाद मोक्ष अवधि पूर्ण होने पर पुनः जीवों वा हमारा जन्म मरण होना आरम्भ हो जाता है। इस जन्म व मरण की व्यवस्था के लिए ही रपरमात्मा इस सृष्टि को बनाते व चलाते हैं तथा यथासमय इसकी प्रलय करते हैं। हमारी यह सृष्टि इससे पूर्व अनन्त व असंख्य बार बन चुकी है आगे भी इसी प्रकार से इसकी उत्पत्ति व प्रलय आदि होते रहेंगे। इन सब रहस्यों को जानकर हमें वेद व ईश्वर की शरण में जाना चाहिये। यही हमारे जीवन के लिये सबसे अधिक सार्थक, उपयोगी व उन्नति का मार्ग है। इसके विपरीत पतन व दुःखों का मार्ग है जिसका हमें त्याग करना चाहिये।