Home Blog Page 733

बंद दरवाजों की बजाय माहवारी पर खुलकर चर्चा की जरूरत है.

—-प्रियंका सौरभ 

हाल ही में मासिक धर्म के झूठे और बेबुनियादी  कलंक और शर्म को दूर करने के उद्देश्य से भारतीय खाद्य वितरण की दिग्गज कंपनी जोमाटो ने 8 अगस्त को एक नई पीरियड लीव ’नीति की घोषणा की है, जिससे इस गंदी सोच के प्रवचन को तेजी से समाज से दूर किया जा सके। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों सहित मासिक धर्म  सभी महिला कर्मचारियों के लिए एक वर्ष में 10 अतिरिक्त छुट्टियों की अनुमति वाली इस नीति को सोशल मीडिया पर बहस के दौरान इस मुद्दे पर लोगों के बीच की खाई को बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाया गया है।
बदलते दौर में भारत ने हाल के दिनों में कुछ प्रगतिशील परिवर्तन देखे हैं और उम्मीद है कि आने वाले दिनों में प्रगतिशील सूची में हम दुनिया का नेतृत्व करेंगे। हालाँकि, कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो हमेशा से हमारे देश में चर्चा से दूर रहे हैं और एक ऐसा ही मुद्दा है महिलाओं में माहवारी ’का, जिसे आमतौर पर पीरियड्स कहा जाता है। भारत जैसे देश में इसके बारे में खुली चर्चा करना बहुत मुश्किल है क्योंकि यहाँ के लोग इस बारे खुलकर बात करते वक्त बेहद असहज महसूस करते हैं लेकिन बंद दरवाजों के पीछे इस पर चर्चा करना जिंदगी में सबसे ज्यादा पसंद करते हैं।
पीछे देखे तो 2018 में अरुणाचल प्रदेश से लोकसभा के सदस्य निनॉन्ग एरिंग द्वारा  मासिक धर्म लाभ विधेयक पर बहस के दौरान देश भर की महिलाओं के लिए उनके जीवन के सबसे अहम हिस्से पर सार्वजिनक रूप से चर्चा की गई थी. इस दौरान हर महीने काम करने के लिए मासिक धर्म की छुट्टी नीति की आवश्यकता पर व्यापक चर्चा शुरू हुई। विश्व स्वास्थ्य संगठन  द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में सभी प्रजनन रोगों में से 70 प्रतिशत के लिये ख़राब मासिक धर्म, स्वच्छता का कारण माना जाता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में आज भी 62% लड़कियाँ तथा महिलाएँ मासिक धर्म के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं तथा 28% किशोरियाँ तो मासिक धर्म के दौरान स्कूल ही नहीं जाती हैं। केमिकल सेनेटरी पैड (जिस पर बहुत सी महिलाएँ भरोसा करती हैं) को विभिन्न बीमारियों के कारण के रूप में जाना जाता है, जिनमें मधुमेह, एलर्जी और त्वचा प्रतिक्रियाएँ शामिल हैं।
मासिक धर्म लाभ विधेयक सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को हर महीने मासिक धर्म के दो दिनों के अवकाश के साथ-साथ मासिक धर्म के दौरान कार्यस्थल पर आराम करने की बेहतर सुविधा प्रदान करने की वकालत करता है। इसका लाभ देश भर में सरकारी मान्यता प्राप्त स्कूलों में कक्षा आठवीं और उससे ऊपर की महिला छात्राओं को भी दिया जाएगा। हालाँकि इससे पहले   केरल राज्य ने  लड़कियों के स्कूल ने 1912 से अपने छात्रों को मासिक धर्म की छुट्टी की अनुमति दी थी और 1992 से बिहार में दो दिनों के लिए महिलाओं को ‘विशेष आकस्मिक अवकाश’ दिया गया था.
अगर अब ऐसा विधेयक आता है तो उसमे हर सेक्टर, उद्योग, पेशे, नौकरी की भूमिकाओं में लड़कियों और महिलाओं को शामिल करने की जरूरत है ,न कि सिर्फ सफेदपोश काम करने वाली कुछ एक विशेष महिलाओं के लिए। इस विधेयक को समान रूप से नीले, सफेद, गुलाबी, सुनहरे और कॉलर नौकरियों में सभी महिलाओं, लड़कियों के लिए लाना चाहिए। इस बारे में चर्चा / बहस करते समय, यह महत्वपूर्ण है कि किसी भी महिला या लड़की के साथ पक्षपात न किया जाए और केवल महिला जाति पर ध्यान केंद्रित किया जाए क्योंकि सभी वर्गों की महिलाएँ चाहे वे किसी भी तरह का काम करती हों, मासिक धर्म उनके जीवन का हिस्सा हैं।
मासिक धर्म के दौरान अनुभव किए गए दर्द और असुविधा के लिए अलग-अलग शरीर अलग-अलग प्रतिक्रिया देते हैं। महिलाओं को होने वाली कठिनाइयों और जैविक जटिलताओं को देखते हुए, मुझे लगता है कि यह बहुत महत्वपूर्ण है कि इस तरह के विधेयक को जल्द पारित किया जाए और आवश्यकता पड़ने पर महिलाओं को इस छुट्टी का लाभ उठाने का हर अधिकार दिया जाए।
विधेयक की बात करते समय, कुछ चिकित्सा शर्तों को ध्यान में रखना आवश्यक है जो मासिक धर्म से जुड़ी होती हैं जैसे कि मेनोरेजिया, एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉएड श्रोणि सूजन की बीमारी आदि। महिलाओं का एक वर्ग इस विधेयक के पक्ष में नहीं है क्योंकि उनका मानना है कि इस तरह के कानून से कार्यस्थल पर उनके खिलाफ पूर्वाग्रह बढ़ेगा और उन्हें पूर्वाग्रह, कम वेतन, धीमी पदोन्नति और कम भागीदारी के रूप में अनुचित उपचार से निपटने की आवश्यकता पैदा करेगा।
इसे आज बदलने की आवश्यकता है। महिलाओं को उनके जैविक ढांचे के लिए दोषी नहीं माना जाना चाहिए। अगर महिलाओं की चुप्पी में हम अपना स्वार्थ ढूंढते है  तो हम निश्चित रूप से पितृसत्ता के चक्र को आगे बढ़ा रहे हैं। हमें अपने आप को यह याद दिलाना महत्वपूर्ण है कि जब हम कार्यस्थल पर समानता की बात करते हैं तो इसका मतलब है कि पुरुषों और महिलाओं के लिए सभी कामकाजी परिस्थितियों की समानता है।  इसलिए अगर किसी महिला को अपने नियंत्रण में नहीं रहने की स्थिति में काम करना मुश्किल लगता है तो उन्हें इस छुट्टी का लाभ उठाने की अनुमति दी जानी चाहिए।
यह जरूरी है कि इस तरह के कानून के सख्त होने के लिए, इसके आसपास होने वाली बातचीत को खुले तौर पर करने की जरूरत है। कार्यस्थल पर महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह के कुचक्र को तोड़ने का ये सही समय हैं  इसलिए इस बिल को सफलतापूर्वक पारित करने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम एक संवेदनशील, अच्छी तरह से चाक-चौबंद और सावधानीपूर्वक नियोजित नीति को इसमें शामिल करें।
ऐसे देश में जहां मासिक धर्म  के दौरान लड़कियों को परिवार से अलग-थलग कर दिया जाता है। कहीं मंदिर, तो कहीं रसोईघर में प्रवेश वर्जित कर दिया जाता है,और घृणा से देखा जाता है, वहां ‘मासिक धर्म अवकाश’ नीति के लिए प्रस्ताव करना बड़ा मुश्किल होगा लेकिन फिर भी सही दिशा में ये एक बहुत जरूरी और महिला हितेषी कदम होगा।
“आज देश भर के पुरुषों को जोमाटो के सन्देश को  समझने और अपनाने की बेहद सख्त जरूरत है–
 जिसमे महिला सहयोगियों की छुट्टी पर असहज न होने की बात कही गई है। और बताया गया है कि माहवारी के दिन महिलाओं के जीवन का एक हिस्सा है, और जब तक हम पूरी तरह से यह नहीं समझते कि महिलाएं इन दिनों में किस माध्यम से गुजरती हैं, तब तक हमें उन पर भरोसा करने की आवश्यकता है। जब वे कहती हैं कि उन्हें आराम करने की आवश्यकता है तो पुरुर्षों को आभास होना चाहिए कि मासिक धर्म की ऐंठन बहुत सारी महिलाओं के लिए कितनी दर्दनाक है – और हमें ऐसे समय उनका समर्थन करना चाहिए तभी हम सही मायने में एक सहयोगी संस्कृति का निर्माण कर पाएंगे.

खबरों की भीड़ में ….!!

तारकेश कुमार ओझा

खबरों की भीड़ में ,
राजनेताओं का रोग है .
अभिनेताओं के टवीट्स हैं .
अभिनेत्रियों का फरेब है .
खिलाड़ियों का उमंग है
अमीरों की अमीरी हैं .
कोरिया – चीन है
तो अमेरिका और पाकिस्तान भी है .
लेकिन इस भीड़ से गायब है वो आम आदमी
जो चौराहे पर हतप्रभ खड़ा है .
जो कोरोना से डरा हुआ तो है लेकिन
जिसे चिंता वैक्सीन की नहीं
यह जानने की है ट्रेनें कब चलेंगी ,
जो उसे उसकी मंजिल पर नहीं
तो कम से कम वहां पहुंचा दे
जहां उसे रोटी मिल सके .
खबरों की भीड़ से
बिल्कुल ही गायब है .
अस्पतालों की कतारों में धक्के खाता
वो आम आदमी
जो सितारे भी बनाता है
और सरकार भी
.

वेदादि ग्रन्थों के स्वाध्याय से मनुष्य अन्धविश्वासों व दुष्कर्मों से बचता है

मनमोहन कुमार आर्य

                वेद अपौरुषेय रचना है। सृष्टि आरम्भ में परमात्मा ने ही अपने अन्तर्यामीस्वरूप से चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा को उनकी आत्माओं में वेदों का ज्ञान कराया वा दिया था। प्राचीन काल से अद्यावधिपर्यन्त सभी ऋषि वेदों की परीक्षा कर इस तथ्य को स्वीकार करते आये हैं कि वेद वस्तुतः ईश्वर से ही प्राप्त हुआ ज्ञान है। वेद सभी प्रकार की अविद्या अन्धविश्वासों से सर्वथा रहित हैं। वेदों की इसी महत्ता के कारण से प्राचीन काल से भारत में वेदों के स्वाध्याय की परम्परा विद्यमान रही है। कहा जाता है कि जो वेदों का स्वाध्याय नहीं करता तथा जो वेदों की निन्दा आदि करता है, वह मनुष्य नास्तिक होता है। नास्तिक एक प्रकार से ईश्वर व वेद विषयक सत्य तथ्यों को न जानने व और उन्हें अपनी अविद्या आदि के कारण न मानने वाले लोग होते हैं। ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने अपने समय में वेदों की महत्ता व वेद ज्ञान की सर्वोच्चता से परिचित कराने के लिये वेदों का प्रचार करने के साथ सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों का प्रणयन किया था। इनका अध्ययन कर अध्येता को इस बात का निश्चय हो जाता है कि वेद वस्तुतः ईश्वर से प्राप्त ज्ञान है और वेद ज्ञान के अनुसार जीवन व्यतीत करने में ही जीवन की सफलता है।

                सृष्टि के आदि राजा महाराज मनु ने अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थमनुस्मृतिमें कहा है कि समस्त वेद धर्म का मूल वा आदि स्रोत है। वेदों में जिन आचरणों कर्तव्यों का विधान किया गया है, वही धर्म और जिनका निषेध किया गया है अथवा जो वेदविरुद्ध कार्य व्यवहार होते हैं, वही अधर्म होता है। मनुष्य का धर्म एक ही होता है और वह वेद वैदिक धर्म ही है जिसे आर्यधर्म भी कहते हैं। वेद से इतर मनुष्यों द्वारा चलाये गये मत, पन्थ सम्प्रदाय हो सकते हैं, परन्तु धर्म वैदिक मान्यताओं सिद्धान्तों के आचरण पालन करने को कहते हैं। सृष्टि के आरम्भ से महाभारत युद्ध तक के 1.96 अरब वर्षों से अधिक समय तक पूरी सृष्टि वा पृथिवी पर वैदिक धर्म ही संसार के सभी मनुष्यों का धर्म रहा है। महाभारत के बाद देश-देशान्तर में अज्ञान का अन्धकार छा जाने से मत-मतानतरों का प्रचलन व प्रचार हुआ है। किसी भी मत व सम्प्रदाय व उसकी मान्यताओं को धर्म की संज्ञा नहीं दी जा सकती। धर्म वह तभी हो सकते हैं जब कि वह पूर्णतः वेद की मान्यताओं व सिद्धान्तों के अनुकूल हों। इसी कारण से वेदों के महान विद्वान ऋषि दयानन्द ने सभी मतों को विषसम्पृक्त अन्न की उपमा दी है। धर्म शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है। इसका सम्बन्ध किसी पदार्थ के गुण, कर्म व स्वभाव से होता है। जिस पदार्थ के जो मौलिक गुण, कर्म व स्वभाव होते हैं, जो कभी बदलते व पदार्थ का साथ नहीं छोड़ते, वही उसका धर्म भी कहलाते हैं। इसी प्रकार से मनुष्य का धर्म भी सत्य बोलना तथा वेद की शिक्षाओं यथा ईश्वर का ध्यान उपासना, अग्निहोत्र यज्ञ करने सहित मातापिता की सेवा उनकी आज्ञा पालन, विद्वान अतिथियों की सेवाशुश्रुषा तथा पालतू पशुओं तथा पक्षियों को भोजन अन्न प्रदान करना ही होता हैं। सभी मनुष्यों को धर्म के दस लक्षणों का ज्ञान होना चाहिये। धर्म के यह दस लक्षण हैं 1- धृति वा धैर्य, 2- क्षमा, 3- दम, 4- अस्तेय वा चोरी का व्यवहार करना, 5- शौच अर्थात् शारीरिक विचारों की शुद्धि, 6- इन्द्रियनिग्रह, 7- बुद्धि विचारों की शुचिता, 8- विद्या, 9- सत्य 10- क्रोध करना, यह धर्म के दस लक्षण हैं। जिस मनुष्य के जीवन में धर्म के यह लक्षण साक्षात रूप में विद्यमान होते हैं, वही धार्मिक कहलाता है। वेद इन्हीं लक्षणों को जीवन में धारण करने की प्रेरणा करते हैं। जिन मनुष्यों के जीवन में धर्म के दस लक्षण पूर्णता वा अधिकांश मात्रा में नहीं है, वह धार्मिक कदापि नहीं कहला सकते। जो अपने व्यवहार में सब प्राणियों पर दया के स्थान पर हिंसा का आश्रय लेते व मांसाहार आदि करते हैं, वह वेदों व वैदिक साहित्य की दृष्टि में धार्मिक व सज्जन कोटि के मनुष्य नहीं होते।

                वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन करने से मनुष्य का अज्ञान अविद्या दूर होती है। मनुष्य ईश्वर आत्मा के सत्यस्वरूप को जान लेता है। प्रकृति इसके विकारों सृष्टि सृष्टि के पदार्थों को भी जान लेता है। भोग का परिणाम दुःख रोग तथा त्यागपूर्वक पुरुषार्थ तप से युक्त जीवन व्यतीत करना ही सुख शरीर आत्मा की उन्नति का आधार होता है। वेदों के स्वाध्याय के लिये ऋषि दयानन्द उनके अनुचर आर्य विद्वानों के ग्रन्थ ही श्रेयस्कर उपादेय हैं। अतीत में सायण महीधर आदि लोगों ने वेदों के मिथ्या भ्रष्ट अर्थ करके वेदों को अपमानित किया था। यह इन लोगों की अविद्या व सत्य वेदार्थ को न जानने के कारण हुआ। ऋषि दयानन्द ने इन भाष्यकारों की अविद्या व त्रुटियों पर विस्तार से प्रकाश डाला है और वेद के सत्य अर्थों के समर्थन में अनेक प्रमाण भी दिये हैं। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थ का अध्ययन करने से ऋषि दयानन्द की शास्त्रीय योग्यता तथा वेदों की महत्ता के दर्शन होते हैं। इस ग्रन्थ सहित ऋषि दयानन्द के ही सत्यार्थप्रकाश व वेदभाष्य का अध्ययन करने से ईश्वर के सत्यस्वरूप सहित ईश्वर के जीवों को उनके कर्मों का फल प्रदान करने के सिद्धान्त का भी ज्ञान हो जाता है। इन ग्रन्थों का अध्ययन करने वालों की ईश्वर के अस्तित्व विषयक सभी शंकाओं का समाधान व भ्रान्ति-निवारण भी हो जाता है। स्वाध्याय करने वाला मनुष्य सच्चा आस्तिक एवं ईश्वर भक्त बन जाता है। इन ग्रन्थों वा सत्साहित्य के अध्ययन से मध्यकाल व बाद के समय में उत्पन्न व प्रचलित हुए सभी मत-मतान्तरों के अविद्यायुक्त व अन्धविश्वासों से युक्त होने का ज्ञान भी होता है। इससे पाठकों को यह लाभ होता है कि वह मत-मतान्तरों के फैलाये भ्रम जाल में फंसने से बच जाते हैं। स्वाध्याय का मुख्य लाभ अविद्या की निवृत्ति सहित आत्मा में सत्य ज्ञान का प्रकाश होना ही होता है जो कि केवल वेद व वेदानुकूल ग्रन्थों के अध्ययन से ही प्राप्त होता है। स्वाध्याय का एक लाभ यह भी होता है कि इससे ईश्वर से मेल व संगति हो जाती है। जब हम ईश्वर विषय का अध्ययन करते हैं तो हमें ईश्वर संबंधी ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह ज्ञान हमारी अविद्या, अन्धविश्वासों, कुसंस्कारों, निन्दित आचरणों को सुधारता है। इससे हमारे आचरण का शुद्धिकरण हो जाता है जिससे ईश्वर की उपासना में प्रवृत्ति उत्पन्न होकर हम उपासना के क्षेत्र में भी सफलता को प्राप्त करते हैं। ऐसा ही सृष्टि की आदि से वर्तमान समय तक होता आ रहा है। हमारे जितने ऋषि व योगी आदि विद्वान बनते थे वह सब वेद व वैदिक साहित्य व ग्रन्थों के स्वाध्याय तथा तदनुकूल तप वा पुरुषार्थ से ही बनते थे। स्वाध्याय से हम सत्य विचारों, सत्य ज्ञान, सदाचरण, ईश्वर उपासना, शरीर व आत्मा की उन्नति तथा मोक्षगामी बनते हैं। अतः स्वाध्याय व उपासना को मनुष्य को विशेष महत्व देना चाहिये।

                स्वाध्याय करने से हम अन्धविश्वासों से बचते हैं। हमारी शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति में भी वेदों का स्वाध्याय लाभदायक है। स्वाध्याय अमृत प्राप्ति वा मोक्ष में सहायक है। स्वाध्याय से हमें ज्ञान तो मिलता ही है, हमारा यश भी बढ़ता है। यश ही मनुष्य की वास्तविक सम्पत्ति होती है। कहा गया है कि जिसका यश कीर्ति होती है, वह मर कर भी जीवित रहता है। अपने यश व कीर्ति के कारण ही हम राम, कृष्ण, दयानन्द, श्रद्धानन्द, वीर सावरकर, रामप्रसाद बिस्मिल आदि को आज भी याद करते हैं। इसका कारण उनके सुकर्म ही थे। वह सुकर्म उन्होंने स्वाध्याय व सत्पुरुषों की संगति आदि से ही प्राप्त किये थे। अतः हमें भी स्वाध्याय सहित सत्पुरुषों की संगति वा सत्कर्मों को अपना मित्र बनाना चाहिये। इससे निश्चय ही हमारा कल्याण होगा और हम जीवन में आगे बढ़ेगे। इससे हमें जीवन में सच्चा सुख व सन्तोष भी प्राप्त होगा। ओ३म् शम्। 

रील हीरो से रियल हीरो बने सोनू सूद

इन दिनों समाज सेवा के क्षेत्र में सोनू सूद का नाम बहुत ही लोक प्रिय हो रहा है | उनके द्वारा प्रवासी श्रमिकों को आवास और रोज़गार के लिए किये जा रहे प्रयासों की चर्चा भी चारों ओर हो रही है | कोरोना महामारी में लॉकडाउन के कारण मुंबई में फँसे हजारों प्रवासी मजदूरों और विद्यार्थियों को देश के विभिन्न भागों में गंतव्य तक पहुँचाने वाले फ़िल्म अभिनेता  सोनू सूद अब  समग्र देश में  आशा की नई किरण बनकर उभरे हैं | असहाय,निरुपाय एवं विवश लोगों का उनके प्रति विश्वास इतना बढ़ गया है कि अन्य शहरों में फँसे लोगों ने भी उनसे सहायता की याचना की और उन्हें भी समय रहते सकुशल घर पहुँचाया गया | केरल में ओडिशा  की 177 लड़कियां  जो कपड़ा फैक्ट्री में काम करती थीं, जब सहायता के सभी मार्ग बंद हुए तो उन्होंने सोनू सूद को फोन किया और सोनू सूद की टीम ने उन्हें हवाई जहाज द्वारा उनके गंतव्य तक पहुँचवाया | इस फिल्म अभिनेता के सेवा कार्य से स्वयम्भू जनता के मसीहा और युवा हृदय सम्राट कहलाने वाले तथाकथित नेताओं को भी यह समझ आ गया होगा, कि जनसेवक होने के लिए किस प्रकार कार्य किया जाता है | एक समय था जब ‘नेता जी’  शब्द सम्मान सूचक संबोधन हुआ करता था किन्तु अब व्यंग्य बन गया है |  चुनाव के समय यूपी बिहार सहित पूरे देश के नेता अपने-अपने मतदाताओं को दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद आदि शहरों से वातानुकूलित  बसों में बिठा कर लाते हैं और ससम्मान उन्हें वापस भी छुड़वाते हैं | किन्तु महामारी के समय किसी भी जनप्रतिनिधि ने अपने मतदाताओं के प्रति ऐसी सहानुभूति  नहीं दिखाई ,सभी सरकारों का मुँह तकते रहे | वंशानुगत राजनीति करने वाले अरबपति नेताओं ने भी अपनी जेब ढीली नहीं होने दी  | मजदूरों के गिरते-पड़ते या दम तोड़ते द्रश्य चैनलों और सोशल मीडिया में रातदिन  तैरते रहे किन्तु स्वयं को राष्ट्रीय नेता कहने वाले व्यक्तियों  या दलों  ने ऐसा कोई अनुकरणीय कार्य नहीं किया जिसे समाज सदैव स्मरण करता | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को छोड़ दें तो समग्र देश में एक साथ सेवा करते हुए अन्य कोई भी स्वयं सेवी संगठन द्रष्टि गोचर नहीं हुआ | संघ से जुड़े लोगों ने अकेले मध्य भारत प्रान्त में ही लगभग 2 लाख 25 हजार परिवारों तक सहायता पहुँचाई |यदि पूरे देश में लॉक डाउन के समय के आंकड़े जोड़ें तो एक रिकॉर्ड बन जाएगा |  देश में लाखों स्वयं सेवी संगठन/एन्जियो चलते हैं, इन्हें करोड़ों  रुपये का देशी और विदेशी अनुदान भी मिलता है किन्तु महामारी के समय में देश भर में फैले इन तथाकथित स्वयंसेवी संगठनों से कई गुना अधिक सेवा कार्य आम जनता ने स्वयं के संसाधनों से किये | हर गली-मोहल्ले में रहने वाले नव युवकों ने अपनी क्षमता से भी अधिक श्रम किया और आस पास रहने वालों को भोजन कराया | गुरुद्वारा कमेटियों और मंदिरों ने तन-मन-धन से सेवा कार्य किये किन्तु हमारे देश के राजनीतिक दलों ने ऐसे समय में भी  कोई अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत नहीं किया | यह अत्यंत विचारणीय प्रश्न है कि जो  राजनीति  समाज सेवा का माध्यम हुआ करती थी वह अब केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन कर रह गई है अन्यथा लाखों सदस्य संख्या वाले दल यों हाथ पर हाथ धरे न बैठते  | घोर विपत्ति के समय में एक अभिनेता अपने निज सहायकों को लेकर सेवाकार्य में जुट गया  और देखते-देखते ही देखते वह  देश भर में आशा की किरण बन गया | यह कार्य अनुकरणीय और अभिनंदनीय है | सोनू सूद से उन खिलाडियों/सेलिब्रिटी  को भी सीख लेनी चाहिए जिन्हें देश सिर-माथे रखता है और सन्यास लेते ही राजनीतिक दल राज्यसभा भेजने की होड़ में आगे पीछे घूमने लगते हैं | यदि सोनू सूद की भाँति देश में बीस-पचास  लोग उठ खड़े हों तो लोगों की राजनेताओं पर से निर्भरता टूट सकती है | आज भी महानगरों में पहुँचने वाले निर्धन विवश लोग दलालों द्वारा ठगे जाते हैं | दिल्ली और मुंबई में उपचार अथवा रोजगार  हेतु गए लोगों को भोजन,आवास और धन की कमी के कारण अपने-अपने सांसदों के बंगलो पर चक्कर काटने पड़ते हैं | इनमें भी कुछ तो ऐसे सांसद हैं जिनके यहाँ आने वालों को पानी तक की नहीं पूछा जाता | यद्यपि कुछ अपवाद भी हैं मुरैना सांसद और केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने ग्वालियर-चम्बल से पहुँचने वाले लोगों के लिए अपने बंगले पर भोजन और विश्राम की अनुकरणीय व्यवस्था कर रखी है कुछ अन्य नाम भी हैं पर संख्या में कम ही हैं | यदि सभी राजनेता इसी प्रकार से अपने-अपने क्षेत्र के लोगों की चिंता करना आरंभ कर दें तो जनता का बड़ा हित हो सकता है | राजनेताओं के पास कर्यकर्ताओं का बड़ा समूह होता है किन्तु वे इसका प्रयोग समाज सेवा के स्थान पर अपनी सेवा के लिए ही करते हैं इसीलिए सोनू सूद जैसा एक अभिनेता महामारी के समय में देश भर के एन्जिओ, तथाकथित समाज सेवी संगठनों और तथाकथित राजनेताओं से अधिक लोकप्रिय  हो जाता है | आज सोनू सूद समाज सेवा के महानायक के रूप में देखे जा रहे हैं | उनके ट्विटर,फेसबुक और ईमेल पर हजारों लोग प्रतिदिन उनसे सहायता माँगते हैं | पंजाब में जन्मे सैंतालीस वर्षीय इस युवा अभिनेता नेबॉलीवुड के लिए भी प्रेरक उदहारण प्रस्तुत  किया है | अभी कोरोना महामारी से पिंड छुड़ाने में  पूरी दुनिया को कुछ माह और लगने की संभावना है, तब तक प्रवासी मजदूरों के सामने उनके गृह नगर में भी अनेक चुनौतियाँ आएँगी | देश भर के समृद्ध और संपन्न लोगों के समक्ष  उदारता दिखाने का यही उचित समय है | निजी क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों के सामने भी बहुत बड़ी चुनौती उत्पन्न हो गई है, अपना समग्र जीवन कंपनी/संस्था को देने वालों को साल-छह माह काम बंद होने पर ही नौकरी से निकाल देने वाली सक्षम संस्थाओं,जिनके पास हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति है,को भी इस युवा अभिनेता से प्रेरणा लेनी चाहिए | सोशल मीडिया पर उनके सोनू के चाहने वाले उन्हें राजनीति में आ जाने का आह्वान भी कर रहे हैं |  बॉलीवुड से रानीति में आने वालों की एक लम्बी सूची है अमिताभ  बच्चन, शत्रुघन सिन्हा, राज बब्बर आदि सहित दक्षिण भारत में भी अभिनेताओं की राजनीतिक में आने की परंपरा रही है | यदि सोनू सूद भी राजनीति में आते हैं तो इसमें बुराई क्या है | किन्तु राजनीति में आ जाने के बाद सामाजिक कार्यों का मूल्यांकन और उद्देश्य थोड़ा संकुचित हो जाता  है और  व्यक्ति का आयाम भी सिकुड़ जाता है,  किन्तु  अच्छे विचार,कर्म वाले लोग यदि देश की सक्रिय राजनीति से जुड़ें तो इससे राजनीति के स्तर में भी  सुधार होगा | 

डॉ.रामकिशोर उपाध्याय

भारत में बुज़ुर्गों की बढ़ती संख्या एवं उनकी स्थिति

अभी हाल ही में जनसंख्या एवं विकास पर भारतीय सांसदों की एक समिति (Indian Association of Parliamentarians on Population and Development – IAPPD) ने देश में बुज़ुर्गों की स्थिति पर एक विस्तृत प्रतिवेदन तैयार किया है। इस प्रतिवेदन के अनुसार, इस समय भारत में 10.5 करोड़ बुजुर्ग व्यक्ति हैं और वर्ष 2050 तक इनकी संख्या 32.4 करोड़ तक पहुंच जाने की सम्भावना है। पूरे विश्व में वर्ष 2050 तक हर पांचवा व्यक्ति बुजुर्ग व्यक्ति होगा और भारत सहित 64 ऐसे देश होंगे जहाँ की 30 प्रतिशत आबादी 60 वर्ष से अधिक उम्र की होगी। आज, भारत में बुज़ुर्गों की कुल संख्या का 70 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण इलाक़ों में रहता है। गांव में वरिष्ठ नागरिकों की आबादी में वृद्धि का मुख्य कारण युवा आबादी का बड़े पैमाने पर गावों से शहरों की ओर पलायन करना है। ग्रामीण इलाकों में इनमें से कुछ बुजुर्ग, उम्र के इस पड़ाव में, उनके बच्चों द्वारा इन्हें गावों में छोड़कर जाने के बाद, भेदभाव, बेदखली, अकेलेपन और दुर्व्यवहार का सामना कर रहे हैं। यह भारत जैसे देश के लिए निश्चित ही गम्भीर चिंता का विषय है, क्योंकि हमारे संस्कार इस प्रकार के क़तई नहीं हैं कि बुजुर्गों का निरादर होने दिया जाय।  उक्त समिति ने प्रतिवेदन में यह भी एक चौकाने वाला तथ्य बताया है कि देश में बुज़ुर्गों की कुल आबादी में से 70 प्रतिशत यानी करीब आठ करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे है।

 

भारत सरकार के नियमों के अनुसार 60 साल से ऊपर की उम्र वाला व्यक्ति बुज़ुर्ग कहलाता है। बुज़ुर्ग जनसंख्या भारत में तेज़ी से बढ़ रही है। विकसित देशों में जहाँ 60/70 वर्षों में बुज़ुर्गों की संख्या दुगुनी होती हैं वहीं भारत में बुज़ुर्गों की संख्या 30 वर्षों से कम समय में ही दुगुनी हो जाएगी। देश में बुज़ुर्गों को तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है। एक, वो बुज़ुर्ग जो बिस्तर पर केंद्रित हैं एवं बिस्तर से उठ ही नहीं सकते। चाहे किसी बीमारी के चलते अथवा किसी अन्य कारण से बिस्तर से जुड़े हुए हैं। दूसरे, वो बुज़ुर्ग जिनकी गतिशीलता प्रतिबंधित है। किसी शारीरिक कमी के चलते पूरे तौर पर चल फिर नहीं पाते हैं। इस श्रेणी के बुज़ुर्ग सामान्यतः बिस्तर पर तो नहीं पड़े हैं लेकिन अपने घर से कुछ ही दूरी तक आ जा सकते हैं अथवा घर में ही घूम फिर सकते हैं। तीसरे, वो बुज़ुर्ग जो गतिशील हैं एवं अपनी रोज़ाना की दिनचर्या का कार्य आसानी से कर सकते हैं और चल फिर सकते हैं एवं अपनी स्वास्थ्य सेवाएँ लेने के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक भी जा सकते हैं।

 

केंद्र सरकार बुज़ुर्गों की मदद करने का भरपूर प्रयास कर रही है। वर्ष 2010 में बुज़ुर्गों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम (National Programme for Health care of Elderly) प्रारम्भ किया गया था। परंतु, इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन में संतोषप्रद गति नहीं आ पाई थी। जिस गति से भारत में बुज़ुर्गों की संख्या  बढ़ती जा रही है वो हमारे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी होने जा रही है। अभी तक  तो देश में युवा जनसंख्या (demographic dividend) की बात ही चल रही थी कि  इस वर्ग को ट्रेनिंग, आदि प्रदान कर देश में उत्पादकता बढ़ाने में इस वर्ग का भरपूर योगदान लिया जा सकता है। लेकिन यहाँ तो अब बढ़ती बुज़ुर्गों की संख्या एक चुनौती के रूप में मुँह बाये खड़ी होने जा रही है।

 

देश में केवल बुज़ुर्गों की संख्या ही नहीं बढ़ रही है बल्कि इसमें भी एक ट्रेंड देखने में आ रहा है और वह यह है कि इस संख्या में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रही है। वर्ष 2011 की जनगणना में महिलाओं का अनुपात 935 से बढ़कर 943 प्रति 1000 पुरुष हो गया था। लेकिन, बुज़ुर्गों की आबादी में यह अनुपात 1033 महिलाएँ प्रति 1000 पुरुष है। भारत में महिलाओं का अपेक्षित जीवन काल पुरुषों की तुलना में अधिक पाया गया है। हमारे देश में 29/30 करोड़ कुल परिवार हैं, इसमें क़रीब 2 करोड़ परिवार केवल एक ही व्यक्ति के परिवार हैं। एक ही व्यक्ति के परिवारों में भी यह पाया गया है कि अधिकांश परिवारों में केवल महिलाएँ ही निवास कर रही हैं। इस प्रकार हमारे देश में जेंडर का आयाम भी बदल रहा है।

 

एक और महत्वपूर्ण बिंदु है बुज़ुर्गों के अपने परिवार के सदस्यों के ऊपर आश्रित होने का।   बुज़ुर्ग तीन प्रकार से आश्रित हो सकते हैं – पूरे तौर पर आश्रित, केवल कुछ देखभाल के लिए आश्रित अथवा आर्थिक दृष्टि से आश्रित। इस प्रकार कुल मिलाकर देखा जाय तो   भारत में लगभग 65 प्रतिशत बुज़ुर्ग किसी न किसी रूप में अपने परिवार पर अथवा किसी दूसरे व्यक्ति पर आश्रित हैं। इन बुज़ुर्गों में भी ज़्यादातर बूढ़ी औरतें हैं।

 

बुज़ुर्गों के स्वास्थ्य का मुद्दा देश में एक ज्वलंत समस्या बनता जा रहा है। देश में बुज़ुर्गों की कुल संख्या में 69 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो अपने को स्वस्थ नहीं मानते हैं एवं इन्हें स्वास्थ्य सम्बंधी कोई न कोई समस्या है। लगभग 31 प्रतिशत बुज़ुर्गों को गम्भीर प्रकार की बीमारीयाँ हैं।

 

सरकार ने बुज़ुर्गों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए विशेष बुज़ुर्ग स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम प्रारम्भ किया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत तीन स्तर हैं। प्रथम, प्राइमरी स्वास्थ्य देखभाल स्तर। जैसे कि, गाँवों में जहाँ कम्यूनिटी स्तर पर स्वास्थ्य महिलाएँ (आशा कार्यकर्ता)  उपलब्ध हैं या जहाँ आयुषमान भारत योजना लागू की जा चुकी है या जहाँ स्वास्थ्य एवं वेल्लनेस केंद्र बन रहे हैं वहाँ पर सरकार ये कोशिश कर रही है कि जहाँ पहिले से ही कुछ निर्धारित बुज़ुर्ग हैं एवं जिनके बारे में यह पता है कि इन्हें डायबिटीज़ अथवा हाइपरटेन्शन है, या कुछ ऐसे बुज़ुर्ग है जिनके बारे में लगता है कि इन्हें स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या है परंतु इस विशेष बीमारी की पहिचान नहीं की जा सकी है। इस स्थिति में प्राइमरी स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर कोशिश की जा रही है कि बुज़ुर्गों की स्क्रीनिंग हो पाए। बुज़ुर्ग यदि बिस्तर पर है तो उन्हें घर पर ही स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।

 

परंतु प्राइमरी स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर बुज़ुर्गों को स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना इतना आसान नहीं है क्योंकि कई बुज़ुर्गों में सामान्यतः यह सोच रहता है कि जो भी शारीरिक समस्या हो रही है वह उसके बुज़ुर्ग हो जाने के कारण ही है और बुज़ुर्ग होने के चलते शरीर में कुछ न कुछ तो चलता ही रहेगा, इस सोच के चलते शरीर में उभरने वाले बीमारी सम्बंधी लक्षणों को कई बुज़ुर्ग नज़र अन्दाज़ कर देते हैं। जबकि हो सकता है कि शरीर में ये लक्षण किसी गम्भीर बीमारी के चलते उभर रहे हों। साथ ही, बहुत सारे बुज़ुर्ग ऐसे भी पाए जाते हैं जो अपने रोग की जाँच पड़ताल करवाने के लिए न तो किसी डॉक्टर को दिखाने जाते हैं और न ही अपने रोग की पहचान कराने के लिए किसी प्रकार की टेस्टिंग करवाते हैं। कुल मिलाकर कई बुज़ुर्गों की तरफ़ से बीमारी को गम्भीरता से लिया ही नहीं जाता है। अतः इस समस्या का निदान करने के लिए “आशा” कार्यकर्ताओं को लगाया जाना चाहिए ताकि वे सर्वे कर यह पता लगाएँ कि इनके इलाक़ों में कौन सा बुज़ुर्ग किस प्रकार की बीमारी से ग्रसित है एवं किस प्रकार उसकी बीमारी के इलाज की व्यवस्था की जा सकती है। साथ ही, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को लेकर बुज़ुर्गों की एक सूची भी बनायी जा सकती है इसमें इस बात का वर्णन हो कि किस बुज़ुर्ग को किस चीज़ की ज़रूरत है, यह ज़रूरत स्वास्थ्य समस्या सम्बंधी हो सकती है, अथवा आर्थिक मदद से सम्बंधित हो सकती है, अथवा समाजिक समस्या सम्बंधी हो सकती है।

 

दूसरा, सेकंडेरी स्वास्थ्य देखभाल स्तर। ज़िला स्तर पर अस्पतालों आदि में बुज़ुर्गों के लिए अलग OPD का विशेष प्रावधान किया गया है। साथ ही, 10 बिस्तरों का एक वार्ड अलग से बुज़ुर्गों के लिए हर ज़िला अस्पताल में बनाया गया है। अगर किसी भी प्रकार का संक्रमण रोग फैलता है तो इन विशेष वार्डों में इन बिस्तरों का इस्तेमाल केवल बुज़ुर्गों के लिए करना आवश्यक कर दिया गया है।

 

तीसरे स्तर पर क्षेत्रीय स्वास्थ्य देखभाल केंद्र स्थापित किए गए हैं। 19 मेडिकल महाविद्यालयों में बुज़ुर्गों के लिए एक विशेष विभाग स्थापित करने की स्वीकृति प्रदान की गई है। साथ ही कोशिश की जा रही है कि कम से कम हर मेडिकल कॉलेज में बुज़ुर्गों के लिए एक विशेष विभाग बनाया जा सके ताकि देश में बुज़ुर्गों के स्वास्थ्य सम्बंधी समस्यायों का निदान किया जा सके। राष्ट्रीय स्तर पर भी अखिल भारतीय मेडिकल सायंस संस्थान, दिल्ली (AIIMS) एवं मद्रास मेडिकल कॉलेज, चेन्नई में बुज़ुर्गों के लिए राष्ट्रीय केंद्र बनाए जाने की स्वीकृति प्रदान की जा चुकी है। इन केंद्रों में विशेष रूप से बुज़ुर्गों के लिए OPD की सेवाएँ शुरू होंगी और बुज़ुर्गों के लिए ही 200 बिस्तरों का एक विशेष वार्ड भी स्थापित किया जाएगा।

 

उक्त प्रयास तो केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे हैं। समाज की भी कुछ ज़िम्मेदारी बनती है। भारतीय संस्कार ऐसे नहीं हैं कि हम हमारे बुज़ुर्गों को बग़ैर किसी देखभाल के ही छोड़ दें। अतः हमें हमारे समाज में ऐसी स्थिति निर्मित करनी होगी कि हम लोग एवं हमारे बच्चे बुज़ुर्गों की देखभाल करें। हमारे बच्चों में भी हमें यह संस्कार डालने ही होंगे। साथ ही, बुज़ुर्गों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाए जाने के प्रयास भी किए जाने चाहिए, ताकि बुज़ुर्ग केवल “बेचारा ही है” की भावना से ऊपर उठा जा सके एवं बुज़ुर्गों को भी आदर की दृष्टि से देखा जा सके। बुज़ुर्गों को भी समाज के एक सम्माननीय हिस्से के रूप में स्वीकार करना होगा। केवल बुज़ुर्ग हो गए, और जीने का जैसे अधिकार ही नहीं रहा अथवा समाज में इज़्ज़त कम हो जाए, ऐसी सोच को विकसित ही नहीं होने देना चाहिए।।  

 

देश में कुल बुज़ुर्गों का केवल 8 प्रतिशत हिस्सा ही पूरे तौर पर बिस्तर पर जीवन यापन करने को मजबूर है अन्यथा बाक़ी 92 प्रतिशत हिस्सा तो अपनी दिनचर्या का निर्वहन करने में सक्षम है। अतः बुज़ुर्गों को भी अपने परिवार को सहयोग करते रहना चाहिए। बुज़ुर्गों को अपने परिवार पर एकदम आश्रित नहीं हो जाना चाहिए। जब तक सम्भव हो और शरीर  चल रहा है तो शरीर को चलायमान रखकर परिवार की जिस प्रकार की भी मदद हो सके  वह करते रहना चाहिए एवं इस प्रकार अपने आप को व्यस्त बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।

 

हालाँकि हमारे देश में एक सिल्वर लाइनिंग भी है क्योंकि आगे आने वाले समय में जो व्यक्ति वृद्ध होने वाले हैं वे शायद दूसरों पर आश्रित नहीं होंगे क्योंकि आर्थिक रूप से ये लोग तुलनात्मक रूप से शायद ज़्यादा सक्षम हैं। आजकल तो देश में महिलाएँ भी नौकरी कर रही हैं एवं आर्थिक दृष्टि से किसी पर आश्रित नहीं हैं। आज की परिस्थियों को देखते हुए यह एक अलग आयाम हो सकता है कि आने वाले समय में शायद हमारे बुज़ुर्ग इतने गम्भीर माहौल में न रहें।

 

 

प्रह्लाद सबनानी

मां और मौसी


मां पर सभी कवि लिखते हैं,
मौसी पर कभी नहीं लिखते है।
मौसी भी तो मां जैसी है पर ,
उस पर क्यो नहीं हम लिखते है ?

मौसी भी तो मां के समान है,
उसका भी तुम सम्मान करो।
देखो उनमें कितना प्यार है,
उस पर तुम अभिमान करो।।

मां मरती है तो मौसी पालती है,
अपने बच्चो को छोड़ तुम्हे खिलाती है।
भूलना न कभी एहसान उसका तुम,
जो अपना दूध तुम्हे पिलाती है।।

मां मौसी दोनों एक समान है,
दोनों ही एक कोख से जन्म लेती है।
ये उपवन की दो कलियां है,
दोनों ही एक रंग रूप लेेती है।।

देखो ये कैसे समाज के नियम है,
शादी के बाद दोनों अलग हो जाती है।
जन्म लेती है एक परिवार में,
फिर दूसरे परिवार में चली जाती है।।

मौसी में भी मां शब्द छिपा है,
इस पर भी तुम जरा गौर करो
मां मौसी दोनों एक ही तो,
इसका भी तुम जरा आभास करो।।

भाई भाई से तुमने लड़ता देखा होगा,
उनका बटवारा भी तुमने देखा होगा।
पर तुमने दो सगी बहनों में कभी,
भाई वाला न बटवारा देखा होगा।।

मां और मौसी दोनों ही तो
गंगा यमुना जैसी बहना है।
मिलती हैं जब एक दूजे से,
बन जाती प्यार का गहना है।।

आर के रस्तोगी

आदरणीय मोदी जी हमारे “मन की बात” भी सुनें

माननीय प्रधानमंत्री जी

सादर वंदे

विषय: “मन की बात” कार्यक्रम में राष्ट्रहित हेतू कुछ आवश्यक सुझाव___

1__जब सन् 1947 में देश के विभाजन का आधार ही हिन्दू-मुस्लिम था और पाकिस्तान इस्लामिक देश घोषित हुआ तो उस समय यह स्वाभाविक मान लिया गया था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र होगा। लेकिन 73 वर्ष उपरांत भी भारत को अभी तक हिन्दू राष्ट्र घोषित न किया जाना देशवासियों के साथ क्या विश्वासघात नहीं है? अत: इस सन्दर्भ में आपसे विनम्र निवेदन है कि  सभी आवश्यक संवैधानिक संशोधन करके भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिये।

2__भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार देश के समस्त नागरिकों में समानता हो इसके लिये  “समान नागरिक संहिता” का प्रावधान करना होगा। इस सन्दर्भ में  “सर्वोच्च न्यायालय” ने भी अनेक बार शासन को निर्देश दिये हैं। “संयुक्त राष्ट्र संघ” ने भी सभी नागरिकों के लिये एक समान आचार संहिता का सुझाव पूर्व में तत्कालीन भारत सरकार को दिये थे।अत: इसमें आने वाले सभी व्यवधानों को हटवा कर “समान नागरिक संहिता” की अविलंब व्यवस्था करके राष्ट्रीय विकास को गति प्रदान की जा सकती है।

3__यह भी सर्वविदित है कि आज  देश की विभिन्न समस्याओं की जड़ बढती जनसंख्या भयंकर रूप ले चुकी है।अत: अनेक राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिये सभी देशवासियों के लिये एक समान “जनसंख्या नियन्त्रण कानून” बनाना आवश्यक हो गया है।

4_बहुसंख्यकों व अल्पसंख्यकों में परस्पर बढते संघर्षों पर अंकुश लगाने के लिये “अल्पसंख्यक मंत्रालय” व “अल्पसंख्यक आयोग” आदि व इससे सम्बंधित सभी संस्थाओं को निरस्त करके समस्त देशवासियों में सामाजिक व साम्प्रदायिक सद्भाव बनाने का सार्थक प्रयास किया जाना चाहिये ।

5_क्या यह विचार करना अनुचित होगा कि विदेशी आक्रांताओं के धर्म/मजहब को हमारे देश में धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक नहीं माना जा सकता हैं? क्योंकि उन धर्मों का उद्गम भारत भूमि पर नहीं हुआ है। ऐसे में  “संयुक्त राष्ट्र संघ” के अनुसार “अल्पसंख्यक” कौन को परिभाषित करके सुनिश्चित किया जाना उचित होगा।

6__आपातकाल में धर्मनिरपेक्षता को संविधान में जोड़ना न्यायसंगत नहीं था, अत: इसकी पुन: विवेचना करके राष्ट्रहित में इसे हटाया जाए।

अत: अन्त में आपसे विनम्र अनुरोध है कि आज जब “सबका साथ, सबका विकास व सबका विश्वास” राष्ट्रीय मन्त्र बन चुका है तो सशक्त व समर्थ भारत के लिये ऐसे कुछ कठोर निर्णय लेकर माँ भारती के प्रधान सेवक की भूमिका को चरितार्थ करें।

देश ही सर्वोच्च है।


जिस देश में हमने जन्म लिया,
उस देश पर हम बलिदान हो जाए।
जो निर्बल है पिछड़े है इस देश में,
उनको तारे हम पहले फिर खुद तर जाए।।

रहे ध्यान निज मान मर्यादा का,
उसका हनन हम कभी न होने दे।
जो करे हनन हमारी मर्यादाओं का,
उनको देश में कभी हम बढ़ने न दे।।

करे देश की रक्षा हम सब,
हर सीमा पर हम डट जाएं।
जो देखे देश को कुदर्ष्टी से,
उनके सीने पर हम चढ़ जाए।

करे विकास देशवासियों का हम सब
कोई विकास से वंचित न रह जाए।
जो रहे देश में पिछड़े अभी तक,
उनको आगे हर क्षेत्र में लेे जाए।।

जो करे हमारे देश के टुकड़े टुकड़े,
उनको देश से बाहर निकाला जाए।
पानी फेरे उनके इस इरादे को,
उनको अब मृत्यु दण्ड दिया जाए।।

करे सम्मान उन सब लोगों का,
जो देश की सेवा निस्वार्थ करते हो।
दे सम्मान अमर शहीदों जैसा,
जो अपना निज बलिदान करते हो।।

करे सम्मान देश के संविधान का,
वहीं देश की कुरान व गीता है,
जो चले देश के संविधान विरूद्ध,
उनको अब केवल फांसी का फीता है।।

भारत मां से न बडा कोई देश में,
जो उसका अपमान देश में करता हो,
उनके सीने में अब गोली दागनी,
चाहे वह कितना बड़ा लीडर हो।।

आर के रस्तोगी

पुलिस अकादमी के आईपीएस अधिकारी मनुमुक्त मानव की संदिग्ध मृत्यु का खुलासा क्यों नहीं हुआ?


 डॉo सत्यवान सौरभ, 

28 अगस्त 2014 को भारतीय पुलिस सेवा के युवा और प्रतिभाशाली आईपीएस अधिकारी मनुमुक्त मानव  की 31साल नौ मास की अल्पायु में नेशनल पुलिस अकादमी हैदराबाद तेलंगाना में स्विमिंग पूल में डूबने से संदिग्ध मृत्यु हो गई थी. स्विमिंग पूल के पास ही स्थित ऑफिसर्स क्लब में चल रही एक विदाई पार्टी के बाद आधी रात को जब मनमुक्त का शव स्विमिंग पूल में मिला तो अकादमी ही नहीं पूरे देश में हड़कंप मच गया था  क्योंकि यह भारत की सर्वोच्च पुलिस अकादमी में 66 साल के इतिहास में घटित  होने वाली सबसे बड़ी घटना थी.

उल्लेखनीय है कि मनुमुक्त  मानव 2012 बैच और हिमाचल कैडर के परम मेधावी और ऊर्जावान युवा पुलिस अधिकारी थे. 23 नवम्बर 1983 को हिसार में जन्मे तथा पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से उच्च शिक्षा प्राप्त मनुमुक्त एनसीसी के सी सर्टिफिकेट सहित तमात उपलब्धिया प्राप्त सिंघम अधिकारी थे. वह बहुत अच्छे चिंतक होने के साथ-साथ बहुमुखी कलाकार और सधे हुए फोटग्राफर थे, सेल्फी के तो वो मास्टर थे, तभी तो उनके सभी दोस्त उनके मुरीद थे. समाज सेवा के लिए वो बड़ी सोच रखते थे. वह छोटी से उम्र में अपने दादा-दादी कि स्मृति में अपने गाँव तिगरा (नारनौल) हरियाणा में एक स्वास्थ्य केंद्र और नारनौल में सिविल सर्विस अकादमी स्थापित करना चाहते थे. समाज के लिए उनके और भी बहुत सारे सुनहरे सपने थे, जिनको वो पूरा करने के बेहद करीब थे, मगर उनकी असामयिक मृत्यु ने उन सब सपनों को ध्वस्त कर दिया.

इकलौते जवान आईपीएस बेटे कि मृत्यु मनुमुक्त के पिता देश के प्रमुख साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ रामनिवास मानव और माँ अर्थशास्त्र की पूर्व प्राध्यापिका डॉ कांता के लिए किसी भयंकर वज्रपात से कम नहीं थी. ऐसे दिनों में कोई भी दम्पति टूटकर बिखर जाता मगर मानव दम्पति ने अद्भुत धैर्य का परिचय देते हुए न केवल असहनीय पीड़ा को झेला, बल्कि अपने बेटे मनुमुक्त की स्मृतियों को  सहेजने, सजाने और सजीव बनाए रखने के लिए भरसक प्रयास भी शुरू कर दिए. उन्होंने अपने जीवन की संपूर्ण जमापूंजी लगाकर मनुमुक्त मानव मेमोरियल ट्रस्ट का गठन किया और नारनौल हरियाणा में मनुमुक्त मानव भवन का निर्माण कर उसमे लघु सभागार,संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना की.

ट्रस्ट द्वारा मनुमक्त मानव की स्मृति में हर साल अढ़ाई लाख का एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, एक लाख का राष्ट्रीय पुरस्कार, इक्कीस-इक्कीस हज़ार के दो और ग्यारह-ग्यारह हज़ार के तीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किये जा रहें है.  मनुमुक्त भवन में साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम भी नियमित रूप से चलते रहते है, जिनमे अब तक एक दर्जन से अधिक देशों की लगभग तीन सौ से अधिक विभूतिया सहभागिता कर चुकी है. मात्र अढ़ाई वर्ष की अल्पावधि में ही अपनी उपलब्धियों के साथ नारनौल का मनुमुक्त भवन अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हो रहा है.

आईपीएस मनुमुक्त मानव युवा शक्ति के प्रतिक ही नहीं, प्रेरणा स्त्रोत भी थे. उनकी मृत्यु के छ वर्ष बाद भी उनकी यादें वैसी की वैसी है, हर वर्ष इनको बड़े सम्मान के साथ याद किया जाता है. उनके परिवार ने मनुमुक्त भवन की गतिविधयों को मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी प्रेरक स्मृतियों को जीवंत रखा हुआ है. इस कार्य में उनकी बड़ी बहन और विश्व बैंक वाशिंगटन की अर्थशास्त्री डॉ एस अनुकृति भरसक प्रयास करती रहती है.

मगर अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारत कि सबसे बड़ी पुलिस अकादमी में उसी के आईपीएस  अधिकारी की संदिग्ध मृत्यु का खुलासा क्यों नहीं हुआ. मामले की जांच को छह साल बाद भी वही का वही क्यों दफनाया गया है. उनकी मृत्यु को अभी तक उजागर क्यों नहीं किया गया. मनुमुक्त का परिवार इस आस में दिन काट रहा कि एक दिन उनको न्याय मिलेगा. न्याय मिलना भी चाहिए. ये मामला मनुमुक्त के परिवार और मात्र भारत की नया व्यवस्था से नहीं जुड़ा. भारतीय पुलिस के आईपीएस अधिकारी का इस तरह मृत्यु का ग्रास बनाना विश्व भर की पुलिस के लिए प्रश्न चिन्ह है. भारत के गृह मंत्रालय को इस मामले की जांच सीबीआई से करवाकर सच सामने लाना चाहिए ताकि मनुमुक्त को न्याय मिल सके और आने वाले युवा पुलिस अधिकारी बिना किसी भय के सीना तानकर देश सेवा कर सके.

 डॉo सत्यवान सौरभ, 

पाकिस्तान का उलट-पैंतरा


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

संयुक्तराष्ट्र संघ में पाकिस्तान के दूत मुनीर अकरम ने एक ऐसा पैंतरा मारा है, जिसे देखकर उन पर तरस आता है। उन्होंने पाकिस्तान की इमरान सरकार की भद्द पीट कर रख दी है। अकरम ने दावा किया है कि उन्होंने सुरक्षा परिषद में भाषण देकर ‘भारतीय आतंकवाद’ की निंदा की है। अकरम से कोई पूछे कि सुरक्षा परिषद में आपको घुसने किसने दिया ? 15 सदस्यी सुरक्षा परिषद का पाकिस्तान सदस्य है ही नहीं। गैर-सदस्य उसकी बैठक में जा ही नहीं सकता। संयुक्तराष्ट्र के महासचिव ने एक बैठक बुलाई थी, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के बारे में। इस बैठक का एक फोटो जर्मन दूतावास ने जारी किया है, जिसमें पाकिस्तान का प्रतिनिधि कहीं नहीं है। फिर भी पाकिस्तानी दूतावास ने जो बयान जारी किया है, वह झूठों का ऐसा पुलिंदा है, जिस पर खुद पाकिस्तानी लोग विश्वास नहीं करते। पहला, अकरम ने दावा किया है कि अल-क़ायदा गिरोह का खात्मा और उसामा बिन लादेन का सफाया पाकिस्तान ने किया है। सबको पता है कि उसामा को अमेरिका ने मारा था और इमरान उसे ‘शहीद उसामा’ कहते रहे हैं। दूसरा, यह भी मनगढ़ंत गप्प है कि भारत ने कुछ आतंकवादियों को भाड़े पर ले रखा है, जो पाकिस्तान में हिंसा फैला रहे हैं। सच्चाई तो यह है पाकिस्तान अपने आतंकवादियों से भारत से भी ज्यादा तंग है। खुद इमरान ने पिछले साल संयुक्तराष्ट्र महासभा के अपने भाषण में कहा था कि उनके देश में 40 से 50 हजार दहशतगर्द सक्रिय हैं। तीसरा, पाकिस्तान ने अपनी नीति को भारत की नीति बता दिया। भारत सीमा-पार आतंकवाद क्यों फैलाएगा। चौथा, 1267 प्रस्ताव की प्रतिबंधित आतंकवादियों की सूची में भारतीयों के नाम भी हैं, यह सरासर झूठ है। उसमें एक भी भारतीय का नाम नहीं है। पांचवां, अकरम का यह कहना भी गलत है कि भारत में अल्पसंख्यकों का जीना हराम है। वास्तव में 1947 में पाकिस्तान में 23 प्रतिशत अल्पसंख्यक थे जबकि अब 3 प्रतिशत रह गए हैं। भारत में अल्पसंख्यक लोग कई बार राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री तक बने हैं। मुनीर अकरम ने भारत के विरुद्ध ये बेबुनियाद आरोप लगाकर इमरान सरकार की जगहंसाई करवा दी है। प्रधानमंत्री इमरान खान को चाहिए कि वे मुनीर अकरम को इस्लामाबाद बुलाकर डांट पिलाएं। इन्हीं गैर-जिम्मेदाराना बयानों के कारण इस्लामी देशों में भी पाकिस्तान की साख गिरती जा रही है। 

अब तो सवाल यह उठता है कि कांग्रेस जिंदा भी रहेगी या नहीं


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

इस बार कांग्रेस की कार्यसमिति से बहुत आशाएं थीं, लेकिन खोदा पहाड़ और उसमें चुहिया भी नहीं निकली। सारी बैठक में इसी मुद्दे पर सात घंटे बहस होती रही कि 23 नेताओं ने यह बैठक बुलाने की मांग क्यों की? जिन्होंने कांग्रेस की दशा सुधारने के लिए सोनिया गांधी को चिट्‌ठी लिखी थी, वे बेचारे अपना बचाव करते रहे।

चिट्‌ठी लिखनेवालों में ज्यादातर कौन थे? उनमें सेवा-निवृत्त होने वाले राज्यसभा सदस्य, पूर्व मंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व प्रांताध्यक्ष आदि थे। यानी वे लोग जो सोनिया परिवार के कभी कृपा-पात्र रह चुके हैं और अब वे सूखे पत्तों की तरह कांग्रेस के पेड़ पर टंगे हुए हैं।

ये लोग क्या चाहते थे? ये चाहते थे कि कांग्रेस का अब कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष हो। सोनिया जी आजकल बीमार रहती हैं और राहुल का कहना है कि मैं फिर से अध्यक्ष नहीं बनना चाहता। ऐसी स्थिति में इस चिट्‌ठी का असली अर्थ क्या हुआ? यही न कि कोई सोनिया परिवार के बाहर का व्यक्ति अध्यक्ष बने।

इस पर राहुल ने पूछ लिया कि ऐसी चिट्‌ठी लिखने का क्या यही सही वक्त था? सोनिया जी अस्पताल में थीं और ये नेता लोग उन्हें चिटि्ठयां भेज रहे थे। इन नेताओं ने यह भी कहा था कि सरकार के कदमों की सही और कड़ी आलोचना करने का यह समय कांग्रेस चूक रही है। इस पर राहुल ने वार कर दिया कि इन 23 चिट्ठीबाज नेताओं की भाजपा के साथ मिलीभगत है।

इस पर राज्यसभा में कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद और पूर्व मंत्री कपिल सिब्बल ने आपत्ति की तो कांग्रेस प्रवक्ता ने राहुल के बयान पर लीपा-पोती कर दी। इस कार्यसमिति ने असली मामले को अगली बैठक तक के लिए टाल दिया। यह अगली बैठक 6 माह बाद होगी या उसके भी बाद, कुछ पता नहीं।

लेकिन सोनिया गांधी ने अपने भाषण में परिपक्वता का परिचय दिया और उन्होंने चिट्‌ठी भेजनेवाले नेताओं के प्रति स्नेहपूर्ण शब्द कहे। इस बैठक में जो पांच प्रस्ताव पारित हुए हैं, वे सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तारीफ में हैं और ‘कई संकटों से घिरे’ वर्तमान भारत के बारे में हैं।

भारत कई संकटों से घिरा है या नहीं, लेकिन यह तय है कि कांग्रेस इस समय जैसे संकट में घिरी है, पिछले 135 साल के इतिहास में कभी नहीं घिरी। पिछली सौ-सवा सौ साल में कांग्रेस दर्जनों बार टूटी और बड़े-बड़े नेता उससे अलग हुए लेकिन वह हर बार यूनानी पक्षी फिनिक्स की तरह पुनर्जीवित होती रही है। लेकिन अब तो यह सवाल पैदा हो गया है कि कांग्रेस जिंदा भी रहेगी या नहीं?

कांग्रेस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे पुरानी पार्टी है। भारत को आजाद कराने का श्रेय भी इसे ही दिया जाता है। आज यह पार्टी संसद और विधानसभाओं में बहुत सिकुड़ गई है लेकिन देश के हर जिले में आज भी इसका संगठन मौजूद है और यह देश की सबसे बड़ी विरोधी पार्टी है।

लेकिन डर यह लगता है कि 1885 में इस पार्टी का सृजन विदेश में जन्मे ए.ओ. ह्यूम ने किया था तो अब क्या इसका विसर्जन भी विदेश में जन्मीं सोनिया के हाथों ही होगा? यदि ऐसा हुआ तो यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य होगा। सबल विपक्ष के बिना राज्यतंत्र वैसा ही हो जाता है, जैसे बिना ब्रेक की कार होती है।

आज कांग्रेस इतनी अधमरी हो गई है और उसके नेता इतने कमजोर हो गए हैं कि वे कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र को ही जीवित नहीं रख सकते, तो वे भारत के लोकतंत्र को कैसे जीवंत रख पाएंगे? जिन 23 नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखा था, उनमें से क्या किसी एक की भी हिम्मत हुई है कि जो बाल गंगाधर तिलक या सुभाषचंद्र बोस या आचार्य कृपलानी या डॉ लोहिया या जयप्रकाश या चंद्रशेखर की तरह बगावत का झंडा उठा सके? कांग्रेस में पिछले 50 साल से चल रहे परिवारवाद को चुनौती दे सके?

कार्यसमिति में जब ये पत्रप्रेषक नेता बोले तो इनकी घिग्घी बंधी हुई थी। अकेले राहुल गांधी ने इन सबकी हवा निकाल दी। इनमें से किसी की भी जड़ें जमीन में नहीं हैं। छत में हैं। ये सब उल्टे लटके हुए हैं। इनमें से किसकी हिम्मत है, जो कांग्रेस जैसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को लोकतांत्रिक बनाने की मांग कर सके।

कांग्रेस का यह रोग भारत में महामारी की तरह फैल गया है। यदि कांग्रेस मां-बेटा पार्टी बन गई है तो कोई पार्टी भाई-भाई पार्टी, कोई पति-पत्नी पार्टी, कोई बाप-बेटा पार्टी, कोई चाचा-भतीजा पार्टी और कोई बुआ-भतीजा पार्टी बन गई है।

यदि अगली कार्यसमिति की बैठक में कोई गैर-सोनिया परिवार के व्यक्ति को अध्यक्ष बना भी दिया गया तो वह देवकांत बरुआ ही तरह झुके रहेंगे? पी.वी. नरसिंहराव की तरह चतुर नेता बहुत कम हैं, जो वैतरणी में से भी अपनी नाव पार कर ले गए। सीताराम केसरी का हश्र हम सबने देखा।

अब या तो कांग्रेस में अध्यक्ष और कार्यसमिति की नियुक्ति खुले पार्टी-चुनाव के द्वारा हो या फिर राहुल ही दोबारा अध्यक्ष बनें। वे जरा पढ़े-लिखे, अनुभवी नेताओं और बुद्धिजीवियों से सतत मार्गदर्शन लें और अच्छा भाषण देना सीखें तो शायद कांग्रेस बच जाए। 

महिला समानता के लिए पहले मानसिकता बदलें…….

डाॅ0 दयानिधि सेवार्थी

आज विश्व महिला समानता की बात करता है। परन्तु भारत का इतिहास कहता है कि महिलाओं का स्थान पुरुषों से हजारों गुना अधिक है। वैदिक काल में अनेकों ऋषिकाओं को ऋषियों से आगे बढकर मंत्र विचार हो या शास्त्रार्थ हो कार्य करने का मौका रहता था। गार्गी मैत्रेयी जैसे अनेकों उदाहरण हमारे सामने है। रामायण काल में कैकई सीता अनुसुया वसन्तसेना और महाभारत काल कुन्ति गान्धारी द्रोपदी सुभद्रा उत्तरा जैसी अनेकों महिलाओं को उदाहरण हमारे सामने है कि महिलाएं पुरुषों से आगे ही रही है। महर्षि मनु ने अपने ग्रन्थ के 3.56वें श्लोक में कहा है कि जहां महिलाओं की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है।पूजा से मतलब है मान सम्मान देना। आखिर ऐसा क्या हुआ कि विश्व स्तर पर आज महिला समानता की बात करनी पड रही है। 26 अगस्त को विश्व महिला समानता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। इसके पीछे एक ही कारण है हमारी मानसिता । हमारी मानसिकता ही है जिसने श्री राम के आदर्शों को नहीं रावण के आदर्शों को अपनाया और जिस महिला का स्थान सबसे बडा था उसे अपने भोग विलासता के लिए तथा अपने झूठे अहंकार की पूर्ति के लिए दबा कर रख दिया। हमारी मानसिकता ही है जिसके कारण हमने योगेश्वर श्री कृष्ण के आदर्शो को न अपनाते हुए दुस्शासन और दुर्योधन बनकर द्रोपदी जैसी महान महिला शक्ति का अपमान करते पीछे नहीं हटते। जिस दिन से हमने महर्षि मनु महर्षि वेदव्यास महर्षि बाल्मीकि सत्यवादी हरिश्चन्द्र श्री राम श्री कृष्ण श्री बलराम श्री युधिष्ठिर सम्राट् चन्द्रगुप्त स्वामी दयानन्द स्वमी श्रद्धानन्द जैसे महापुरुषों के आदर्शों को त्यागा उसी दिन से हमारे समाज में महिलाओं का स्थान बढना तो दूर बराबर भी नहीं रहा ओैर महाशक्ति विदूषी जगजननी वैभवी निर्मातृ गुरू आचार्या आदि सम्बोधनों के स्थान पर पैरों की जूती ताडना के अधिकारी सन्तानों की खेत अबला लाचार आदि सम्बोधन दिए जाने लगे। तब एक सशक्त महिला पहली आई.पी.एस. किरण वेदी जिसने पहले स्वयं को सिद्ध किया फिर उसके बाद कहा- कि महिलाओं को हमें सशक्त बनाने की जरुरत है उन्हे ऐसे पद पर पहुचने की जरुरत है जहां उन्हें त्याग करने की बजाय चुनाव करना पडे। हम भारत की प्रथम सफल महिलाओं के रूप में प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल प्रथम मिस यूनिवर्स सुस्मिता सेन प्रथम विश्व सुन्दरी रीता फारिया प्रथम महिला चिकित्सक कादम्बिनि गांगुली प्रथम महिला पायलट सुषमा प्रथम महिला एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली कमलजीत सिंधु प्रथम अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट में 100 विकेट लेने वाली डायना इदुल प्रथम सर्वोच्च न्यायालय महिला न्यायाधीश मीरा साहिब फातिमा बीबी और प्रथम उच्च न्यायालय महिला न्यायाधीश लीला सेठ प्रथम महिला अधिवक्ता रेगिना गुहा प्रथम महिला आईपीएस किरण बेदी प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा प्रथम फिल्म अभिनेत्री देविका रानी प्रथम महिला सांसद राधाबाई सुबारायन प्रथम दलित महिला मुख्यमंत्री मायावती प्रथम महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी प्रथम भारतीय वायु सेना महिला पायलट हरिता कौर देओल प्रथम महिला लोक सभा अध्यक्ष मीरा कुमार प्रथम हिमालयी पर्वतारोही बछेंद्री पाल प्रथम भारत रत्न इंदिरा गाँधी पहली महिला ग्रैंड मास्टर भाग्य श्री थिप्से आदि का नाम लेते हैंए वर्तमान में भी तीस ऐसी महिलाएं हैंए जो अपने अपने कार्यक्षेत्र में शिखर पर हैं। समाज का दूसरा पहलू यह है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस दौर में भी लड़कियों को बोझ माना जाता है। आए दिन कन्या भ्रूणहत्या के मामले गैरकानूनी होने के बावजूद सामने आते रहते हैं। ऐसा तब है जब मौका मिलने पर लड़कियों ने हर क्षेत्र हर कदम पर खुद को साबित किया है फिर भी महिलाओं की स्थिति और उनके प्रति समाज के रवैये में ज्यादा फर्क नहीं आया है। दरअसल असल परिवर्तन तो आना चाहिए आम लोगों के जीवन में। जरुरत है उनकी सोच में परिवर्तन लाने की। उन्हें बदलने की। आम महिलाओ के जीवन में परिवर्तन उनकी स्थिति में उनकी सोच में परिवर्तन। अपराध बढ़ रहे है। शहर असुरक्षित होते जा रहे है। कुछ चुनिंदा घटनाओ एवं कुछ चुनिंदा लोगों की वजह से कई सारी अन्य महिलाओं एवं लड़कियों के बाहर निकलने के दरवाजे बंद हो जाते है। जरुरत है बंद दरवाजों को खोलने की। रौशनी को अंदर आने देने की। प्रकाश में अपना प्रतिबिम्ब देखने की। उसे सुधारने की । निहारने की। निखारने की। अगर शिक्षा में कुछ अंश जोड़ें जाये जो आपको किताबी ज्ञान के साथ व्यवहारिक ज्ञान भी दे। आपके कौशल को उपयुक्त बनाये। आपको इस लायक बनाये की आप अपना खर्च तो वहन कर ही सके। तभी शिक्षा के मायने सार्थक होंगे। जरुरी नहीं कि हर कमाने वाली लड़की डाक्टर या शिक्षिका हो। वे खाना बना सकती है। पार्लर चला सकती है। कपड़े सी सकती है। उन्हें ये सब आता है। वे ये सब करती है। पर सिर्फ घर में। उनके इसी हुनर को घर के बाहर लाना है। आगे बढ़ाना है। देश की चंद महिलाओं की उपलब्धियों पर अपनी पीठ थपथपाने की बजाय हमें इस पर भी ध्यान देना चाहिए सार्वजनिक जगहों पर यौन हिंसा के मामले आए दिन सुर्खियों में आते रहते हैं। यह कैसे कम हो सके। जब तक हम अपने आप में समानता नहीं लाएंगे तब तक महिलाओं को समानता का अधिकार नहीं मिल सकता। जिसका प्रमाण दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज में सहायक प्रोफेसर डॉ मधुरेश पाठक मिश्र के कथनों से प्राप्त होता है वो कहती हैं कि कॉलेजों में लड़कियों की संख्या देखकर लगता है कि अब उन्हें अधिकार मिल रहे हैं। लेकिन एक शिक्षिका के बतौर जब मैंने लड़कियों में खासकर छोटे शहर की लड़कियों में सिर्फ शादी के लिए ही पढ़ाई करने की प्रवृत्ति देखी तो यह मेरे लिए काफी चैंकाने वाला रहा। आज भी समाज की मानसिकता पूरी तरह नही बदली नहीं है। परन्तु कुछ राहत मिलती है दिल्ली महिला आयोग की सदस्य रूपिन्दर कौर के कथनों को सुन कर वो कहती है कि- बदलाव तो अब काफी दिख रहा है। पहले जहां महिलाएं घरों से नहीं निकलती थीं वहीं अब वे अपने हक की बात कर रही हैं। उन्हें अपने अधिकार पता हैं और इसके लिए वे लड़ाई भी लड़ रही हैं। यह सकारात्मक विचार हमें राहत जरूर देता है परन्तु महिलाओं के समानता की बात हो तो हमें पहले अपने घर की ओर देखना होगा। क्या हम अपने परिवार की बहू बेटियों को महिलाओं को समानता दी है। पुत्र और पुत्री में समानता है भाई बहन में समानता है पति और पत्नी में समानता है अपवाद के रूप में कुछ परिवारों में समानता हो सकती है परन्तु हमे कुछ से आगे भी बढना है और सभी के उत्तर जिस दिन हां मे आ जाएगा उस दिन 26 अगस्त जेसे महिला समानता दिवस को मनाने की आवश्यकता ही नहीं पडेगी। तो आईए संकल्प ले कि हम अपने आप से बदलाव को प्रारम्भ करेंगे फिर परिवार मित्र पडोसी और गांव मोहल्ले से लेकर विश्व स्तर तक महिला को समान अधिकार दिलाएंगे तभी मेरे इस लेख की सार्थकता होगी