Home Blog Page 734

परोपकार का महत्व

परोपकार शब्द ‘पऱउपकार’ इन दो शब्दों के योग से बना है । जिसका अर्थ है निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करना ।अपनी शरण में आए मित्र, शत्रु, कीट-पतंग, देशी-परदेशी, बालक-वृद्ध सभी के दुःखों का निवारण निष्काम भाव से करना परोपकार कहलाता है । ईश्वर ने सभी प्राणियों में सबसे योग्य जीव मनुष्य बनाया । परोपकार ही एक ऐसा गुण है जो मानव को पशु से अलग कर देवत्व की श्रेणी में ला खड़ा करता है । पशु और पक्षी भी अपने ऊपर किए गए उपकार के प्रति कृतज्ञ होते हैं । मनुष्य तो विवेकशील प्राणी है उसे तो पशुओं से दो कदम आगे बढ़कर परोपकारी होना चाहिए ।प्रकृति का कण-कण हमें परोपकार की शिक्षा देता है- नदियाँ परोपकार के लिए बहती है, वृक्ष धूप में रहकर हमें छाया देता है, सूर्य की किरणों से सम्पूर्ण संसार प्रकाशित होता है । चन्द्रमा से शीतलता, समुद्र से वर्षा, पेड़ों से फल-फूल और सब्जियाँ, गायों से दूध, वायु से प्राण शक्ति मिलती है। राजा रंतिदेव को चालीस दिन तक भूखे रहने के बाद जब भोजन मिला तो उन्होंने वह भोजन शरण में आए भूखे अतिथि को दे दिया पर । उपकार अर्थात दूसरों के हित के लिए किया गया कार्य ही परोपकार कहलाता है। मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए काम आए। अंपने लिए तो सभी जीते हैं लेकिन जीवन उसका सफल है जो दूसरों की भलाई करे । संसार में परोपकार ही व गुण है जिससे मनुष्य में अथवा जीवन में सुख की अनुभूति होती है। समाज सेवा की भावना देश प्रेम की भावना देश भक्ति की भावना , दुख में पीड़ित लोगों की सहायता करने की भावना यह सब कार्य व्यक्तियों की निशानी है।परोपकार का सबसे बड़ा लाभ है आत्म संतुष्टि, आत्मा को शांति मिलना कि मैंने दूसरों के हित के लिए यह काम किया है। परोपकार निस्वार्थ भाव से किया जाता है किंतु इसके बदले में परोपकारी प्राणी को वो संपत्ति प्राप्त हो जाती है जो लाखों रुपए देकर भी नहीं खरीदी जा सकती वह संपत्ति है मन का सुख। परोपकार का अर्थ होता है दूसरों का अच्छा करना। परोपकार का अर्थ होता है दूसरों की सहयता करना। परोपकार की भावना मानव को इंसान से फरिश्ता बना देती है। परोपकार के समान कोई धर्म परोपकार ऐसा कृत्य है जिसके द्वारा शत्रु भी मित्र बन जाता है। जीवन में परोपकार का बहुत महत्व है। परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः । परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थ मिदं शरीरम् ॥ जिस तरह से वृक्ष कभी भी अपना फल नहीं खाता है, नदी अपना पानी नहीं पीती है, सूर्य हमें रोशनी देकर चला जाता है। परोपकार एक उत्तम आदर्श का प्रतीक है। पर पीड़ा के समान कुछ भी कार्य अधर्म एवं निष्कृष्ट नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास ने परोपकार के बारे में लिखा- “परहित सरिस धर्म नहिं भाई।पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।” विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि मरने के बाद भी हमारी नेत्र ज्योति और अन्य कई अंग किसी अन्य व्यक्ति के जीवन को बचाने का काम कर सकते है। इनका जीवन रहते ही दान कर देना महान उपकार है। दया, प्रेम, अनुराग, करुणा, एवं सहानुभूति आदि के मूल में परोपकार की भावना है। वृक्ष फलते दृ फूलते हैं, सरिताये प्रवाहित है। सूर्य एवं चंद्रमा प्रकाश लुटाकर मानव के पथ को आलोकित करते है। बादल पानी बरसाकर थे को हरा-भरा बनाते हैं, जो जीव- जंतुओं को राहत देते हैं। प्रकृति का कण-कण हमें परोपकार की शिक्षा देता है- नदियाँ परोपकार के लिए बहती है, वृक्ष धूप में रहकर हमें छाया देता है, चन्द्रमा से शीतलता, समुद्र से वर्षा, गायों से दूध, वायु से प्राण शक्ति मिलती है। परोपकारी मानव के हृदय में शांति तथा सुख का निवास है। परोपकार की ह्रदय में कटुता की भावना नहीं होती है। अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। समस्त पृथ्वी ही उनका परिवार होती है। यदि हम अपने प्राचीन इतिहास पर दृष्टिपात करें तो हमें दानवीर कर्ण, भगवान बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरुनानक, महर्षि दयानन्द, विनोबा भावे, आदि अनेक महापुरुष इसके उदाहरण हैं। जिनसे ज्ञात होता है कि किस तरह यहां के लोगों ने परोपकार के लिए अपनी धन-सम्पत्ति तो क्या अपने घर-द्वार, राजपाट और आवश्यकता पड़ने पर अपने शरीर तक अर्पित कर दिए। महर्षि दधीचि के उस अवदान को कैसे भुला सकते हैं जिन्होंने देवताओं की रक्षा के लिए अपने प्राण सहर्ष ही न्यौछावर कर दिए थे अर्थात् उनकी हड्डियों से वज्र बनाया गया जिससे वृत्रासुर राक्षस का वध हुआ। राजा शिवि भी ऐसे ही परोपकारी हुए हैं, उन्होंने कबूतर के प्राणों की रक्षा के लिए भूखे बाज को अपने शरीर का मांस काट-काट कर दे दिया था। “सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया के पीछे भी परोपकार की भावना ही प्रतिफल है। हमें “स्व” की संकुचित भावना से ऊपर उठा कर “पर” के निमित्त बलिदान करने को प्रेरित करता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की हमे परोपकार करने की निम्नलिखित शब्दों में प्रेरणा दे रहे है वो इस प्रकार है। “यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे। वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।” हम भी छोटे-छोटे कार्य करके अनेक प्रकार परोपकार कर सकते हैं। भूखे को रोटी खिलाकर, भूले-भटके को राह बतला कर, अशिक्षितों को शिक्षा देकर, अन्धे व्यक्ति को सड़क पार करा कर, प्यासे को पानी पिला कर, अबलाओं तथा कमजोरों की रक्षा करके तथा धर्मशालाए आदि बनवाकर परोपकार किया जा सकता है। परोपकार की महिमा अपरम्पार है। परोपकार से आत्मिक व मानसिक शान्ति मिलती है। परोपकारी मनुष्य मर कर भी अमर रहते हैं। परोपकार के द्वारा सुख, शान्ति, स्नेह, सहानुभूति आदि गुणों से मानव-जीवन परिपूर्ण हो सकता है। सच्चा परोपकार वही है जो कर्त्तव्य समझकर किया गया हो। अतः परोपकार ही मानव का सबसे बड़ा धर्म है। इस प्रकार परोपकार का हमारे जीवन में अत्यन्त महत्तव है। जिसका आचरण हमें करते रहना चाहिए।

डाo दयानिधि सेवार्थी 

यादव राजवंश ने की है करौली राज्य की स्थापना

                           आत्माराम यादव पीव

       महाराजा करौली सुप्रख्यात यदुवंश के है। करौली राज्य की स्थापना यादववंश के महाराजा जिन्द्र्पाल यादव ने की है इसलिए कहा जा सकता है की करौली का अति प्राचीन इतिहास है। पौराणिक कथानक से पता चलता है कि मथुरा के राजा यदु के पुत्र जिन्द्र्पाल के द्वारा अपनी राजधानी बियाना (जो अभी भरतपुर में है) को परिवर्तित कर करौली राज्य किया। महाराज जिन्द्र्पाल यादव प्रपौत्र सन 995 में राजगद्दी पर बैठे तब बियाना का किला बनवाया गया। वर्ष 1327 में महाराजा अर्जुनदेव ने राजगद्दी संभाली तब 21 वर्ष बाद नीन्दार पर अधिकार करने के बाद उन्होने मथुरा जिले कि 24  परगनों पर यदुवंश का ध्वज फहराया। महाराज जिन्द्र्पाल का करौली राज्य का सपना 1348 में पूर्ण हुआ ओर करौली पर इस राजवंश की कई पुश्तों ने राज्य किया जिसमें महाराज गोपालसिंह यादव ने सन 1533 से 1569 तक राज्य किया ओर दिल्ली के सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार करके उनके कहने पर दौलताबाद में दाऊदखाँ से युद्ध कर उसे पराजित किया जिसपर सम्राट अकबर ने प्रसन्न होकर रणजीत नगारा भेंट किया जो अभी तक करौली में मौजूद होना बताया गया है। दौलताबाद फतह होने पर अकबर ने महाराज गोपालसिंह यादव को अजमेर का किलेदार बना दिया तथा आगरा किले की नीव आपके द्वारा ही रखी गई थी ओर बहादुरपुर का किला आपने बनवाया था। आपकी पीढ़ी में 6 पीढ़ी बाद महाराज धर्मपाल यादव हुये जो बड़े ही बहादुर थे ओर आए दिन मीणा समाज के लोगों द्वारा करौली राज्य को हथियाने का प्रयास होता तो आपकी तलवार उन्हे रोके रखती ओर करौली को राजधानी बनाए रखा। हिण्डौन नगर करौली जिले की सबसे बडी नगरी है। सम्भवतः यह भूमि हिरण्यकश्यप व भक्त प्रहलाद की कर्म भूमि रही है। यहां पर आज भी नृसिंह मन्दिर, प्रहलाद कुण्ड, हिरण्यकश्यप के महल, बावड़ियों के अवशेष हैं। यहां से कुछ दूरी पर कुण्डेवा, जगर, दानघाटी पौराणिक स्थान है। जनश्रुतियो के अनुसार महाभारत कालीन हिडिम्बा नामक राक्षसी की कर्मस्थली भी यही क्षेत्र रहा था।  पुरानी देशी रियासत करौली से 23 किलोमीटर दक्षिण में अरावली पर्वत श्रृंखला के त्रिकूट पर्वत की चोटी पर बने कैलादेवी मंदिर का इतिहास भी पुराना है। गोस्वामी केदारगिरी द्वारा 1114 ई0 में कैलादेवी की प्रतिमा की स्थापना किए जाने के बाद इस क्षेत्र के तत्कालीन यादवकुल के  राजा ने कैलादेवी के साथ इसी मंदिर में प्रति स्थापित किया। 1348 ई0 में करौली की स्थापना के बाद मंदिर की सार-संभाल करौली के यादवराजकुल द्वारा की जाने लगी। अकबर के दौलतवाद विजय अभियान पर करौली नरेश गोपालदास के साथ जाने से पूर्व कैलादेवी की मनौती मानने पर विजयी होने का प्रसंग मॉ पर अटूट श्रद्वा से जुडा हुआ है। कैलादेवी जहाँ शक्तिस्वरूपा है, वहीं उसका गण लांगुरिया भैरव स्वरूप है। इसकी प्रतिभा देवी मंदिर के सामने बनी हुई है। मेले के अवसर पर गाये जाने वाले लोक गीत लांगुरिया को ही सम्बोधित करके गाये जाते है।

सन 1724 का वह समय था जब इस राज्य का महाराजा गोपालसिंह राजगद्दी पर बैठे तब वे नाबालिग थे। महाराजा के मंत्रीगण अपने राजा के प्रति वफादार थे। करौली शहर का विकास आपके द्वारा किया आया ओर आसपास शहर पनाह बनवाने से प्रजा का अपने राजा के प्रति अटूट प्यार रहा। महाराज गोपालसिंह धर्म कर्म पर ज्यादा विश्वास करते थे ओर उन्होने तब गोपालमंदिर, कल्याणजी का नया मंदिर ओर मदनमोहन जी का मंदिर बनवाए । जयपुर के राजघराने से नाता जोड़कर आपने अपनी बहिन कि शादी महाराज जयसिंह के साथ की। समय को देखते हुये महाराज गोपालसिंह ने सबलगढ़ के किले को जीत कर यादवों कि पताका लहराई। इतना ही नही ग्वालियर के आसपास भी अपनी विजय का डंका बजवाते रहे आपकी बहादुरी के चर्चे दिल्ली के दरवार तक पहुचे। दिल्ली मुगल दरबार ने सन 1753 में बुलवाया ओर मुगल सम्राट ने आपको “महिमुरातीव”” से नाबाजा गया। आपके द्वारा करौली में बनाए गए 2 विशाल भवन आज भी आपकी याद दिलाते है। सन 1757 को आपका देहांत हो जाने के बाद करौली में आपकी याद में बने स्मारक के रूप में एक छत्री आज भी करौली के राजाओ में आपका विशेष गौरव रखती है। आपके बाद आपके पुत्र महाराजा प्रतापपाल राजसिंहासन पर विराजमान हुये जो 1837 से 1850 तक राजकाज संभालते रहे। महाराजा कोटा के साथ आपने अपनी छोटी बहिन का विवाह किया। आपके राज परिवार को अनेक विपत्तियों ने आकार घेर लिया तब आपके उत्तराधिकारी महाराज नरसिंह पाल ने अंग्रेज़ लेफ्टिनेंट मांकमेसन से सहायता ली ओर  अंग्रेज़ फोज का साथ मिलने पर अंग्रेजों से आपकी मित्रता जगजाहिर रही।

       जहा एक ओर देश में 1857 की क्रांति का ज्वर शबाव पर था ओर हरेक देशवासी अंग्रेजों को देश से खदेड़ने में लगे थे तब महाराजा प्रताप सिह के स्थान पर महाराजा मदनपाल करौली के राज्य सिंहासन पर विराजमान थे ओर उन्होने अंग्रेजों के सहायक के रूप में भूमिका निभाई। तत्कालीन गवर्नर जनरल 5 जून 1857 को करौली राज्य की ओर से की गई सहायता पर प्रसन्न होकर 25 हजार रुपए मासिक देने का बचन दिया ओर आपकी मुक्त कंठ से तारीफ की गई।  1857 के क्रांतिकारी नाबाब वजीर मोहम्मद खा की अगुआई में करौली सीमा के पास हिडोन सहित आसपास की पहाड़ियों पर अपना अधिकार जमा चुका था तब करौली की फोजों ने हमला कर नाबाव वजीर खाँ को मार डाला ओर उनके साथियों को कैद कर अंग्रेजों को सौंप दिया जिन्हे अंग्रेजों ने कत्ल कर दिया। यह अलग बात थी की आपके बहनोई कोटा के महाराज ने अग्रेज़ अफसरो को मारने के साथ क्रांतिकारियों का साथ दिया तब अंग्रेजों के कहने पर आपने अपने अपने बहनोई के खिलाफ अग्रेजों के पक्ष मे मोर्चा खोल दिया। 2 दिसंबर सन 1859 को तत्कालीन वाइसराय लार्ड केनिग ने अंग्रेजों के साथ दिये जाने के कारण 20 हजार रुपए का उपहार ओर कर्ज माफ किया वही आपको 17 तोपों की सलामी दी गई। यही कारण था की 1862 मे आपको गोद लेने की सनद अंग्रेज़ सरकार ने दी ओर सन 1866 में जी॰सी॰एस॰ आई॰ की पदवी से नवाजा गया।  महाराज मदनपाल के बाद महाराजा लक्ष्मणपाल करौली के सिंहासन पर विराजे किन्तु नशे के आदि होने से वे जल्द ही काल के गाल में चले गए उनके बाद महाराजा जयसिंहपाल ओर महाराजा अर्जुनपाल ने शासन किया। महाराज अर्जुनपाल के बाद भंवरपाल, देवबहादुर पाल यदुकुल चन्द्र्भल जीसीआई ई करौली का शासन करने लगे। आपको शिकार का बड़ा शौक था तभी आपने लगभग 300 शेरों का शिकार किया। आपने मदनपुर रुंडकपुर के तालाब बनवाए ओर हिंडोन ओर करौली के बीच नदी पर पल बनवाया।  करौली में 7 स्कूल बनवाए जिसमें एक हाई स्कूल है इस प्रकार आपके द्वारा करौली राज्य में एक दर्जन स्कूल बनवाए जो आपकी आज भी याद ताजा करते है। 

यह कांग्रेस के अंत की पटकथा या कुछ और ?

कांग्रेस अंदरूनी घमासान से आजाद नहीं हो पा रही है। पार्टी में सबसे ज्यादा संख्या उन लोगों की है,  जो हर हाल में सोनिया गांधी या राहुल का ही नेतृत्व बनाए रखना चाहते हैं। गांधी परिवार के संरक्षण में पार्टी चलाना शायद कांग्रेस की मजबूरी है। लेकिन ताजा घमासान कांग्रेस के संकट को और गहरा कर सकता है।

निरंजन परिहार

न तो वे कोई इतने बड़े नेता है, न उनकी कोई राजनीतिक हैसियत है और न ही वे भविष्यवक्ता हैं। लेकिन फिर भी संजय झा ने जब यह कहा कि यह कांग्रेस के अंत की शुरुआत है, तो कई बड़े कांग्रेसी भी हत्तप्रभ होकर इसमें सच की संभावना तलाशने लगे। कायदे से कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सोनिया गांधी जब फिर कांग्रेस की अध्यक्ष बन गई थी, तो बवाल थम जाना चाहिए था। लेकिन घमासान रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। जिस चिट्ठी पर जमकर विवाद हुआ, उसे लिखने वाले नेताओं ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक खत्म होने के बाद अपनी बैठक की। आगे क्या करना है, कैसे करना है, और किसको किस हद तक जाना है, इस बारे में आगे की रणनीति तय हुई। इस बैठक के बाद कपिल सिब्बल ने जो ट्वीट किया, उससे अटकलों, आशंकाओं और कयासों का जो दौर शुरू हुआ है, वह कांग्रेस के भविष्य की एक नई कहानी गढ़ रहा है।

कांग्रेस पार्टी के नेता अब खुलकर बोलने लगे हैं। कार्यसमिति की बैठक के दूसरे दिन कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल ने अपने ट्वीटर पर लिखा – यह किसी पद की बात नहीं है। यह मेरे देश की बात है, जो सबसे ज्यादा जरूरी है। तो, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के छोटे बेटे और कांग्रेस नेता बड़े नेता अनिल शास्त्री ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में कुछ कमी है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पार्टी के नेताओं के बीच बैठकें नहीं होती और वरिष्ठ नेताओं से प्रदेशों के नेताओं का मिलना आसान नहीं है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीसी चाको ने भी कहा है कि मुझे लगता है कि नेतृत्व में कुछ चीजें दुरुस्त होनी चाहिए। उन्होंने असंतोष जताते हुए कहा कि दिल्ली में काफी चीजें कामचलाऊ तरीके से चल रही हैं। अपनी उपेक्षा से बेहद आहत वरिष्ठ नेता चाको ने लगभग नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि मैं सीडब्लूसी का स्थायी सदस्य हूं, लेकिन मुझे आमंत्रित भी नहीं किया गया । शायद, मैं बैठक में होता तो, कोई समाधान दे देता।  

कांग्रेस के नेतृत्व की कमजोरी को कुछ ऐसे समझिए। चिट्ठी लिखने के मामले कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी की नाराजगी के बाद गुलाम नबी आजाद के घर पर कांग्रेस के नेताओं की जो बैठक हुई, इसमें क्या हुआ, यह दो दिन बाद भी किसी को कुछ नहीं पता। लेकिन कार्यसमिति की बैठक में जो चल रहा था, उसकी पल पल की खबर पूरे देश और दुनिया में पैल रही थी। यह कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी का सार्वजनिक सबूत नहीं तो और क्या है। सिब्बल कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य नहीं है। फिर भी अंदर क्या चल रहा था, उन्हें खबर थी। सो, सोमवार की कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक को दौरान ही उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ बागी तेवर दिखाते हुए बीजेपी से मिलीभगत की बात को खारिज करते हुए ट्वीट किया। उन्‍होंने तो अपने ट्विटर बायोडेटा से कांग्रेस भी हटा लिया।

जाने माने राजनीतिक विश्लेषक अभिमन्यु शितोले मानते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व यानी आलाकमान अर्थात गांधी परिवार के तीनों सदस्यों का अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के प्रति अगर यही रुख रहा, तो आनेवाले समय में कांग्रेस की परेशानियां बढ़ती ही जाएगी। शितोले कहते हैं कि कांग्रेस में मजबूत और उर्जावान नेतृत्व की कमी हैं, यह सच है। खेमेबाजी और क्षमता की बजाय चाटुकारिता को मिल रहे प्रश्रय से जूझ रही कांग्रेस की हालत कुछ ऐसी हो गई है कि एक दीवार को संभालने की कोशिश होती है तो दूसरी भरभराने लगती है। शितोले मानते हैं कि कांग्रेस में तय नहीं हो पा रहा है कि परिवार बचाया जाए या पार्टी। या यूं कहा जाए कि अब तक कांग्रेस के नेता यही नहीं समझ पा रहे हैं कि परिवार और पार्टी दोनों अलग अलग हैं, और कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता पार्टी के लिए हैं, परिवार के लिए नहीं?

कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की अंदरूनी राजनीति की गहन जानकारी रखनेवाले राजनीतिक विश्लेषक संदीप सोनवलकर कहते हैं कि ताजा संकट को अगर, कांग्रेस ने शीघ्र नहीं सम्हाला, तो आनेवाले वक्त में कुछ ऐसा होगा कि आज तो सिर्फ नेता ही सवाल उठा रहे हैं, लेकिन मामला आगे बढ़ा तो कल विद्रोह की स्थिति भी पैदा हो सकती है।  सोनवलकर कहते हैं कि राज्यों के नेताओं का हाल तो और भी खराब है। कांग्रेस आलाकमान कहलानेवाले तीनों नेताओं से राज्यों के नेताओं का मिलना ही संभव नहीं हो पाता।  सोशल मीडिया में दिए गए सिब्बल के सार्वजनिक बयान पर कई तरह की अटकलबाजियों का दौर शुरू होने की बात कहते हुए सोनवलकर कहते हैं कि सिब्बल के इस ट्वीट में बगावत के तेवर साफ है। कांग्रेस नेतृत्व को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा।

बात जिन संजय झा से शुरू हुई थी उनके बारे में निश्चित रूप से आप नहीं जानते होंगे। तो, जान लीजिए कि वे कोई बहुत बड़ी तोप नहीं हैं। वे मुंबई के हैं, लेकिन मुंबई के कांग्रेसी भी उन्हें नहीं जानते। वे मीडिया में अपने व्यक्तिगत संपर्कों का उपयोग करके कांग्रेस नेतृत्व की नजरों में चढ़ने के लिए पार्टी की पूरी ताकत से पैरवी करते हुए टीवी पर बोलते थे। नजर में चढ़े तो बिना बहुत सोचे समझे नेतृत्व ने उन्हें सीधे प्रवक्ता बना दिया। फिर जब कांग्रेस के खिलाफ एक लेख लिखा, तो सोनिया गांधी ने पार्टी से निलंबित भी कर दिया। वहीं संजय झा कांग्रेस के अंत की शुरुआत होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। निष्ठावानों को नकारने, अपनों की उपेक्षा करने और अनजानों को ओहदे देने का इतना नुकसान तो होता ही है।  कांग्रेस नेतृत्व को समय रहते अपने फैसलों पर भी चिंतन करना चाहिए। वरना, अंत की भविष्यवाणियां भी सच होते देर कहां लगती है !

पूंछ दिखा वनराज को चिढ़ा रहा उत्पाती वानर

 सामयिक व्यंग्य

सुशील कुमार ‘नवीन’

चलिये आज एक नई कहानी सुनाते हैं। जंगल में एक पेड़ पर दो बन्दर रहते थे। शैतान तो दोनों ही थे पर एक ज्यादा था। मित्रवत थे सो एक-दूसरे के सुख-दुख के साझी भी थे। एक दिन पेड़ पर आदतन उछलकूद कर रहे थे। दूर एक पेड़ की छांव में एक शेर को सोए हुए देखा। दोनों के मन में शेर को परेशान करने की खुराफात जन्म ले गई। उछलते-कूदते उस पेड़ पर जा पहुंचे जिसके नीचे शेर सोया हुआ था। बदमाश बन्दर बोला- यार आज तो वनराज की पूंछ खींचने का मन कर रहा है। दूसरा बोला-भाई, यहीं पेड़ पर बैठे-बैठे इसके मजे ले लो। कोई आम तोड़कर इस पर फैंक दो। कोई डाली फैंक दो। पास मत जाओ। पीछा छुटाना मुश्किल हो जाएगा। बदमाश बन्दर बोला-पीछा तो तब छुटवाना होगा जब मैं इसके हाथ आऊंगा। जंगल के राजा को रोज-रोज थोड़े ही छेड़ने का मौका मिलता है। दूसरे ने पहले को बहुत समझाया पर वो नहीं माना। दूसरे ने उसे कहा कि एक बार रुक जा। मैं थोड़ी दूर निकल जाता हूं अन्यथा तेरे किए का फल मुझे भी भुगतना पड़ेगा। कोई बात नहीं जा तूं दौड़ जा। मैं तो आज मजे लेकर रहूंगा-बदमाश बन्दर ने कहा। दूसरे बन्दर के जाते ही उसने शेर की पूंछ खींच ली। शेर नींद से जाग उठा। देखा तो एक बन्दर को पूंछ पकड़े पाया। शेर ने जोर से दहाड़ लगाई। बन्दर पर उसका कोई असर नहीं दिखा। शेर ने झटके से पूंछ खींची और बन्दर की और झपटा। बन्दर भी पहले से तैयार था। शेर के झपटने से पहले दूसरी तरफ छलांग लगा दी। दूसरे पेड़ पर बैठे साथी बन्दर ने आवाज लगाई कि भागकर पेड़ पर चढ़ जाओ अन्यथा ये पीछा नहीं छोड़ेगा। पर वो पेड़ पर नहीं चढ़ा। उसके मन में अभी भी कुछ खुराफाती चल रही थी। शेर को कभी दाएं कभी बाएं दौड़ाता फिर रहा था। दौड़ते-दौड़ते दोनों अन्य वन प्रदेश में पहुंच गए। वह वन प्रदेश एक गधर्भराज के अधीन था। इसी दौरान बन्दर पेड़ों के झुरमुट में जा घुस गया। शेर उसे काफी देर तक  ढूंढता रहा पर उसका कुछ पता नहीं चला। इतने में गधर्भराज का आना हो गया। अपने इलाके में शेर को आया देखकर उसने कहा- तुम जंगल का नियम भूल गए हो। अपने वन प्रदेश में लौट जाओ। अन्यथा मुझे महा वनप्रदेश पंचायत बुलानी पड़ेगी। नियमों के हवाले पर शेर बोला-मेरा एक शिकार तुम्हारे इलाके में आ गया है, उसे मुझे सौंप दो। मैं लौट जाऊंगा। गदर्भराज ने साफ इंकार कर दिया और कहा-मेरे इलाके में जब कोई आया ही नहीं तो तुम्हे कहां से सौंप दूं। शेर बोला- ठीक है मैं अपनी सीमा पर उसके इंतजार में बैठा हूँ, कभी तो वो मुझे दिखेगा जब पकड़कर तुम्हारे सामने से ले जाऊंगा। गदर्भराज हंसे और बोले-दिखेगा तभी तो ले जाओगे। तब से नियमों में बंधे वनराज अपने प्रदेश की सीमा पर डेरा जमाए हुये है और वह बन्दर गदर्भराज के इलाके में शरण लिए हुए है। दुष्ट बन्दर कब शेर के हाथ लगेगा और कब वह उससे अपनी पूंछ खींचने का बदला लेगा यह अभी भविष्य के गर्भ में ही है। हां अब वो बन्दर पेड़ों के झुरमुट से अपनी पूंछ बाहर निकाल वनराज को अब चिढ़ाने जरूर लगा है। 

(नोट: कहानी मात्र मनोरंजन के लिए है इसे दाऊद इब्राहिम के पाकिस्तान प्रवास से न जोड़ें) 

संसार की श्रेष्ठतम रचना यह सृष्टि ईश्वर से ही प्रकाशित हुई है

-मनमोहन कुमार आर्य

                प्रत्येक रचना एक रचयिता की बनाई हुई कृति होती है। हमारी यह विशाल सृष्टि किस रचयिता की कृति है, इस पर विचार करना आवश्यक एवं उचित है। सृष्टि की रचना उत्पत्ति आदि विषयों का अध्ययन करने पर यह अपौरुषेय रचना सिद्ध होती है। अपौरुषेय रचनायें वह होती हैं जिनको मनुष्य नहीं बना सकते। संसार में अपौरुषेय सत्ता एक ईश्वर ही है। निश्चय ही ईश्वर मनुष्य से इतर कोई चेतन, बुद्धियुक्त, बलवान वा सर्वशक्तिमान सत्ता के होने से इसे ईश्वर रचित ही मानना होगा। यह वस्तुतः है भी सत्य। वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन करने पर विद्वानों की भी सहमति व सन्तुष्टि हो जाती है कि इस सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व प्रलय का कर्ता यदि कोई है, तो वह केवल और केवल एक सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि नित्य एवं जन्म-मरण से रहित परमेश्वर ही है व वही हो सकता है। आर्यों व हिन्दुओं का सौभाग्य है कि उनको वेद व ऋषियों के उपनिषद, दर्शन एवं मनुस्मृति आदि ग्रन्थ बड़ी संख्या में उपलब्ध है। ऋषि दयानन्द और उनके परवर्ती आर्य विद्वानों ने भी इस विषय पर व्यापक विचार एवं मंथन किया है और एतद्विषयक साहित्य की रचना व लेख आदि द्वारा अपने अनुभव हमें प्रदान किये हैं जिनसे सृष्टि की रचना पर प्रकाश पड़ता है। ऋषि दयानन्द सरस्वती का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ ऐसा ही एक ग्रन्थ है जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति वा पालन तथा प्रलय का वर्णन मिलता है। हम सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ से ही सृष्टि की रचना विषयक कुछ सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं।

                सत्यार्थप्रकाश के अष्टम समुल्लास में उपदेश करते हुए ऋषि दयानन्द कहते हैं कि जिस से यह विविध सृष्टि प्रकाशित हुई है, जो धारण और प्रलयकर्ता है, जो इस जगत् का स्वामी है, जिस व्यापक में यह सब जगत् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय को प्राप्त होता है, वह परमात्मा है। उसे ही मनुष्यों को जानना चाहिये और उसके स्थान पर किसी दूसरी सत्ता को सृष्टिकर्ता नहीं मानना चाहिये। ऋषि कहते हैं कि यह सब जगत् सृष्टि बनने से पहले अन्धकार से आवृत्त, रात्रिरूप में जानने के अयोग्य, आकाशरूप सब जगत् तथा तुच्छ अर्थात् अनन्त परमेश्वर के सम्मुख एकदेशी (परिमित व सीमित) अच्छादित था। पश्चात परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य से कारणरूप प्रकृति से इसे कार्यरूप सृष्टि बना दिया। ऋषि बताते हैं कि सूर्यादि सब तेजस्वी पदार्थों का आधार परमात्मा है। जो यह जगत् हुआ है और होगा उस का एक अद्वितीय स्वामी परमात्मा इस जगत् की उत्पत्ति के पूर्व विद्यमान था। जिस परमात्मा ने पृथिवी से लेकर सूर्यपर्यन्त जगत् को उत्पन्न किया है, उस परमात्मा की सब मनुष्यों को प्रेम से भक्ति करनी चाहिये। यजुर्वेद के मन्त्र के आधार पर वह आगे बताते हैं कि जो सब में पूर्ण पुरुष और जो नाश रहित कारण ओर सभी जीवों का स्वामी है, जो पृथिव्यादि जड़ और जीवों से अतिरिक्त है, वही पुरुष इस सब भूत भविष्यत् और वर्तमान जगत् का बनाने वाला है। ऋषि दयानन्द ने वैदिक साहित्य के आधार पर यह भी कहा है कि जिस परमात्मा द्वारा की गई रचना से यह सब पृथिव्यादि प्राकृतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं, जिस से जीवित व पालित होते हैं और जिस में प्रलय को प्राप्त होते हैं, वही ब्रह्म वा परमात्मा है। उस के जानने की सब मनुष्यों को इच्छा करनी चाहिये और ज्ञान, तर्क एवं युक्तियों से सिद्ध तथा वेद प्रमाणों से पुष्ट उसी सच्चिदानन्दस्वरूप सत्ता को ईश्वर को मानना चाहिये।

                मनुष्य को उस ब्रह्म परमात्मा को जानने की इच्छा करनी चाहिये जिस से इस जगत् का जन्म, स्थिति और प्रलय होता है। संसार में वह परमात्मा ही सभी मनुष्यों के लिये जानने योग्य है। यह समस्त जगत् वा सृष्टि निमित्त कारण परमात्मा से ही उत्पन्न हुआ है अन्य किसी के द्वारा किसी अन्य अनादि पदार्थ से उत्पन्न नहीं हुआ। परमात्मा द्वारा उत्पन्न इस जगत् का उपादान कारण प्रकृति है। जगत् के उपादान कारण प्रकृति को परमात्मा ने उत्पन्न नहीं किया है। प्रकृति अनादि अनुत्पन्न है। अनादि उन पदार्थों को कहते हैं कि जो स्वयंभू हों अर्थात् जिसकी उत्पत्ति अन्य किसी कारण पदार्थ, उपादान व निमित्त कारण, से न हुई हो। हमारे संसार में ईश्वर, जीव और जगत् का कारण प्रकृति यह तीन अनादि पदार्थ हैं। ऋग्वेद और यजुर्वेद के मन्त्रों में परमात्मा ने मनुष्यों को उपदेश देकर बताया है कि ब्रह्म और जीव दोनों चेतनता और पालनादि गुणों से सदृश, व्याप्य-व्यापक भाव से संयुक्त, परस्पर मित्रतायुक्त, सनातन व अनादि हैं। ऐसा ही अनादि मूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात् जो स्थूल होकर प्रलय में छिन्न भिन्न हो जाता है, वह तीसरा अनादि पदार्थ प्रकृति है। इन तीनों अनादि पदार्थों के गुण, कर्म और स्वभाव भी अनादि व अपरिवर्तनीय हैं। ब्रह्म व जीव इन दो चेतन पदार्थों में से एक जीव है। वह इस वृक्षरूप जड़ संसार में पापपुण्यरूप फलों को अच्छे प्रकार भोक्ता है और परमात्मा कर्मों के फलों को न भोक्ता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है। जीव, ईश्वर व प्रकृति यह तीनों पदार्थ परस्पर पृथक पृथक, एक दूसरे से सर्वथा भिन्न तथा तीनों अनादि हैं। यजुर्वेद मेंशाश्वतीभयः समाभ्यःवचन से परमात्मा ने कहा है कि अनादि सनातन जीवरूप प्रजा के लिये वेद द्वारा उसने सब विद्याओं का बोध किया है।

                उपनिषद में कहा गया है कि प्रकृति, जीव और परमात्मा तीनों अज अर्थात् जिन का जन्म व उत्पत्ति कभी नहीं होती और न कभी वह जन्म लेते हैं अर्थात् तीनों अनादि पदार्थ सब जगत् के कारण हैं। इन तीन अनादि पदार्थों की उत्पत्ति का कारण इनसे भिन्न अन्य कोई कारण व सत्ता नहीं है। इस अनादि प्रकृति का भोग अनादि जीव करता हुआ इसमें कर्म के बन्धनों में फंसता है। ब्रह्म इस जगत् का जीव की तरह सुख दुःख रूपी भोग करने से इसमें फंसता नहीं है।

                प्रकृति का लक्षण बताते हुए ऋषि दयानन्द ने सांख्य सूत्रों के आधार पर लिखा है कि सत्व वा शुद्ध, रजः मध्य तथा जाड्य अर्थात् जड़ता, इन तीन वस्तुओं के मिलने से जो एक संघात है उस का नाम प्रकृति है। उस प्रकृति से क्रमशः 1- महतत्व बुद्धि, उससे 2- अहंकार, उससे 3-7 पांच तन्मात्र सूक्ष्म भूत और 8-17 दश इन्द्रियां तथा 18- ग्यारहवां मन, पांच तन्मात्राओं से 19-23 पृथिव्यादि पांच भूत ये तेईस, चैबीस और पच्चीसवां 24- पुरुष अर्थात् जीव और 25- परमेश्वर हैं। इनमें से प्रकृति अविकारिणी और महत्तत्व, अहंकार तथा पांच सूक्ष्म भूत प्रकृति का कार्य और इन्द्रियां मन तथा स्थूलभूतों का कारण हैं। आत्मा और परमात्मा सृष्टि रचना में उत्पन्न विकारों व पदार्थों में से न किसी पदार्थ की प्रकृति व उपादान कारण हैं और न ही यह दोनों चेतन पदार्थ किसी मूल पदार्थ का कार्य हैं।

                इस प्रकार प्रकृति नामी उपादान कारण से निमित्तकारण परमात्मा द्वारा इस सृष्टि की रचना हुई है। सृष्टि की रचना का प्रयोजन जीवों को उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का भोग अर्थात् सुखदुःख प्रदान करना है। यदि जीव होते तो ईश्वर को सृष्टि बनानी पड़ती। यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान होकर भी सृष्टि की रचना पालन करता तो उस पर यह आरोप होता कि वह सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान नहीं है, होता तो अवश्य ही जीवों को सुख प्रदान करने के लिये सृष्टि की रचना उसका करता। ईश्वर के गुण, कर्म स्वभावों में सृष्टि की रचना, पालन प्रलय करना तथा सृष्टि के आरम्भ में सभी मनुष्यों के कल्याण के लिये वेदों का ज्ञान देना उसका स्वाभाविक एवं आवश्यक कर्म, कर्तव्य कार्य हैं। अपने इन स्वभाविक कर्मों को ईश्वर प्रत्येक सर्ग में करता है व भविष्य में भी करता रहेगा। अतः हमें अपने सभी भ्रमों को दूर कर ज्ञान व विज्ञान के आधार पर ईश्वर को ही इस सृष्टि का कर्ता, धर्ता व हर्ता स्वीकार करना चाहिये। इसका सर्वत्र प्रचार करना चाहिये। ऐसा करने से ही संसार में अविद्या दूर होगी। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का सभी मनुष्यों को अवश्यमेव अध्ययन करना चाहिये। इससे परमात्मा की बनाई इस सृष्टि के प्रायः अधिकांश व सभी रहस्यों से पर्दा उठता है। मनुष्य भ्रान्तियों से रहित होता। ईश्वर के सच्चे स्वरूप का ज्ञान होता है। ईश्वर की उपासना का महत्व उससे मनुष्य जीवन की सफलता का रहस्य भी विदित होता है। वेदों से ही मनुष्यों को अपने सभी कर्तव्य कर्मों निषिद्ध कर्मों का भी ज्ञान होता है। कर्तव्यों को करने की प्रेरणा में उत्साह उत्पन्न होता है निषिद्ध कर्मों को करने में निरुत्साह एवं उनके प्रति उपेक्षाभाव जागृत होता है। वेद प्रतिपादित ईश्वर ही संसार के सब मनुष्यों का उपास्य है। सभी को मतमतान्तरों की अविद्यायुक्त बातों का त्याग कर वेदवर्णित स्वरूप वाले ईश्वर की उपासना कर उसका साक्षात्कार वा प्रत्यक्ष करना चाहिये। इसी से हम सबको सभी दुःखों से अवकाश मिलेगा और हम परमान्दमय ईश्वर को प्राप्त होकर अपने जीवन के लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त हो सकेंगे। ओ३म् शम्।

कांग्रेस की चिट्ठी चिंतन बैठक

नवेन्दु उन्मेष
कांग्रेस मुख्यालय में जैसे ही चिट्ठी आयी कुछ लोग गाने लगे ’-चिट्ठी आयी
है आयी है, चिट्ठी आयी है। बड़े दिनों के बाद कांग्रेसियों की चिट्ठी आयी
है।‘ यह सुनकर वहां बैठे कुछ कांग्रेसी पदधारी बौखला गये। उन्होंने
मुख्यालय से बाहर निकलकर गीत गाने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को समझाया
कि अगर चिट्ठी आ गयी है तो आने दो। तुम लोग चिट्ठी आने पर गीत क्यों गा
रहे हो ?
तभी एक कार्यकर्ता ने कहा कि बहुत दिनों के बाद वतन के कांग्रेसियों की
चिट्ठी कांग्रेस मुख्यालय में पहुंची है। पहले गांव में चिट्ठी आने से
पूरा गांव यह जानने को उत्सुक हो जाता था कि आखिर अमुक व्यक्ति के घर पर
किस तरह की चिट्ठी आयी है। चिट्ठी को पढ़ने के लिए गांव में पढ़े-लिखे
लोगों की तलाश की जाती थी। लेकिन कांग्रेस मुख्यालय में तो पढ़े लिखे
लोगों की कमी है नहीं। मुख्यालय में बैठे लोगों ने तो चिट्ठी पढ़ ली होगी
कि उसमें क्या लिखा है। इसलिए हम कार्यकर्ताओं को यह बताना चाहिए कि
चिट्ठी में आखिर क्या बातें लिखी हैं।
इस पर कांग्रेस के उक्त पदधारी ने कहा कि अंदर कांग्रेस की चिट्ठी चिंतन
बैठक आनलाइन चल रही है। चिट्ठी पढ़ने के बाद सभी कांग्रेसियों को बता दिया
जायेगा कि चिट्ठी में लिखा क्या है।
चिट्ठी चिंतन बैठक में चिट्ठी पढ़ने के बाद राहुल गांधी ने सीधे चिट्ठी
लिखने वालों के माथे पर ठीकरा फोड़ा कि कुछ लोग भाजपा से मिले हुए हैं और
वे भाजपा के एजेंट हैं। फिर क्या था चिट्ठी चिंतन बैठक भाजपा पर ठीकरा
फोड़ो बैठक में तब्दील हो गयी। बांग्ला में कहावत है ’ सब दोष नंदो घोष।‘
फिर क्या था सभी कांग्रेसी देश की सभी समस्याओं के लिए भाजपा को दोषी
ठहराने लगे। इसी बीच एक कांग्रेसी ने कहा कांग्रेस की सभी मुसीबतों की जड़
तो नरेंद्र मोदी हैं। यह आदमी न गुजरात से दिल्ली आया होता और न कांग्रेस
की लुटिया डूबी होती। उसने आगे कहा कि कांग्रेस को उस व्यक्ति की तलाश
करनी चाहिए जो मोदी को गुजरात से दिल्ली लेकर आया था।
बैठक के बाद घोषणा हो गयी कि कांग्रेस में ’ बिन गांधी सब सून’। अब
सोनिया ही अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी। यह बात वैसे भी पूरे देश को मालूम
है कि कांग्रेस गांधी परिवार के बगैर एक कदम आगे नहीं चल सकती है।
मुख्यालय के बाहर चिट्ठी आयी है का गीत गाने वाले कांग्रेस कार्यकर्ता
ढोल-नगाड़े बजाने लगे। इसके बाद गाना शुरू हो गया ’आयी-आयी अब तो आ जा।‘
इसी बीच एक विरोधी दल के नेता फेसबुक पर लिखा कि कांग्रेस ’आई’ और ’माई’
के सहारे ही चलती है। यह हर कोई जानता है। एक बार कांग्रेस टूटी थी तो
कांग्रेस ’आई’ हो गयी थी। तब इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थी। अब
कांग्रेस ’आई’ नहीं रही तो कांग्रेस ’माई’ के सहारे चल रही है। एक समय था
जब कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी गाय और बछड़ा हुआ करता था। तब इंदिरा गांधी
के साथ संजय गांधी हुआ करते थे। मेरा मानना है कि अगर कांग्रेस में शिव
का धनुष तोड़ो प्रतियागिेता हो तो धनुष भी गांधी परिवार ही तोड़ेगा, बाकि
कांग्रेसियों को सिर्फ धनुष के दर्शन होंगे।

सुवा घणा ए आच्छया सै, तै अपणै नै लगवा ले…

सुशील कुमार ‘नवीन’

एक बच्चे को उसके माता-पिता बीमार होने पर अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने बच्चे का चेकअप किया। चेकअप में बुखार ज्यादा दिखने पर डॉक्टर ने कहा-इंजेक्शन लगाना पड़ेगा। जल्दी असर हो जाएगा। बच्चे की माता जी बोली-डॉक्टर साहब!इंजेक्शन तो मुन्ना मरे भी न लगवाए। धक्का किया तो अस्पताल अधर उठा लेगा। आपकी क्या चीज टूटेगी क्या बचेगी,राम जाने। डॉक्टर भी पूरा कॉन्फिडेंस वाला था। बोला-आप चिंता न करें। बच्चों को टेकल करना मुझे आता है। इससे पहले मैं बच्चों के अस्पताल में ही था। ऐसे में बच्चे कैसे मानते हैं मुझे सब पता है। आप बस थोड़ा बाहर बैठ जाइए। अब डॉक्टर और बच्चा आमने-सामने की मुद्रा में थे। डॉक्टर चेहरे पर मोहनी मुस्कान धारण किये हुये थे। उधर,बच्चा इसे नजरअंदाज कर अपने ही मूड में था। डॉक्टर ने नाम पूछा तो तपाक उतर दिया। नाम को छोड़ो इलाज करो। आप मेरी मैडम थोड़े हो, जो आपको नाम बताउं। डॉक्टर जवाब से सकपका सा गया पर निर्लज्ज हो फिर दूसरा सवाल दाग दिया। बोलो बेटा जी! आप कैसे हैं। बच्चा फिर गुर्राते हुए बोला- दिख नहीं रहा,  बीमार हूं। तुम पॉपकॉर्न बेचने वाले थोड़े ही हो,जो तुमसे पॉपकॉर्न लेने आया हूं। तुम से तो मैं पॉपकॉर्न लूंगा भी नहीं। डॉक्टर भी पूरा ढीठ था। हार वो भी मानने वाला नहीं था। बोला-बेटा जी, आप तो समझदार दिख रहे हो। आपके बुखार है, इंजेक्शन लगाना पड़ेगा। लगवा लोगे ना। बच्चा झट से बोला-क्यों ऐसा क्या है उसमें। मैं नहीं करवाता अपने दर्द। 

डॉक्टर ने उसे बहलाने का प्रयास जारी रखा। बोले-बेटा, इंजेक्शन फायदे की चीज है। सेकंडों में बीमारी पर असर करता है। दर्द बिल्कुल भी नहीं करता। चींटी के कांटे में भी दर्द हो सकता है पर इंजेक्शन लगने में दर्द नहीं होगा। ठंडा-ठंडा महसूस होगा जैसे बर्फ की वादियों में आ गए हो। एक बार लगवाकर देखो, मजा ना आये तो मुझे कहना। डॉक्टर ने हें-हें कर नकली हंसी शुरू कर दी। 

बच्चा भी जोर से हंसने लगा। गम्भीर मुद्रा में बोला-डॉक्टर साहब, बच्चा हूं, पागल नहीं। जब इंजेक्शन लगवाने में इतने ही मजे हैं तो मेरे ही क्यों लगाने पर तुला है। अपने ही लगा ले। ठंडा-ठंडा भी महसूस कर लेना और सारे मजे भी खुद ही ले लेना। मुझे तो टेबलेट और पीने की दवाई दे दे। यही काफी रहेगी मेरे लिए। इंजेक्शन तुम्हे ही मुबारक। अब डॉक्टर को कोई जवाब देते नहीं बना। चुपचाप पर्ची पर कुछ टेबलेट और पीने की दवा लिख दी। बच्चा बाहर आया तो मम्मी ने कहा-बेटा इंजेक्शन में दर्द नहीं हुआ। बच्चा बोला-इंजेक्शन तो मैं डॉक्टर साहब के लगा आया। दर्द तो उनके होगा मेरे थोड़े ही। 

आप भी सोचते होंगे ये ‘नवीन जी’ भी अजीब किस्म के आदमी है। बात शुरू कहां से करते हैं और खत्म कहां पर।  उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र, और हिमाचल प्रदेश के बाद हरियाणा भी पंचायत चुनाव में ‘राइट टू रिकॉल’ (वापस बुलाने का अधिकार) लागू करने जा रहा है। एक वर्ष बाद ग्रामसभा सरपंच को बदलवा सकेगी। नियम का लागू होना एक अच्छी पहल है पर क्या इसे धरातल पर लागू किया जा सकेगा। उत्तर प्रदेश में राईट टू रिकॉल 1947 से और मध्य प्रदेश में सन 2000 से है लेकिन कानून की जानकारी के अभाव में इसका प्रयोग बहुत कम हुआ है | सब परिचित है आज के समय में राजनीतिक हस्तक्षेप हर जगह है। इस कानून के प्रयोग में भी यही आड़े आएगा। तो क्या हो। अपनी भाषा में इंजेक्शन में इतना ही अगर फायदा है तो माननीय इसे पहले विधानसभा और लोकसभा स्तर पर क्यों नहीं लागू करते। जनता के साथ सबसे बड़ा धोखा तो यही करते हैं। वोट रामलाल के नाम पर मांगते हैं जीतने के बाद स्वार्थसिद्धि के लिए श्यामलाल का चोगा थाम लेते हैं। सरपंच तो भाईचारे का ही एक प्रतिनिधि होता है। काम न करे तो उसे भाईचारे में समझाया भी जा सकता है। भाईचारे की ही ये ताकत है कि इस कानून का प्रयोग पंचायत स्तर पर ग्रामीणों द्वारा नहीं किया गया है।एमएलए-एमपी के लिए उमीदवार तो पैराशूट से उतार दिए जाते हैं,मतदाताओं को मजबूरन बाहरी को ही समर्थन देना पड़ता है। यहां इसे लागू करवाएं। देखना लोग पूरा प्रयोग करेंगे। आपने इंजेक्शन बना लिया है तो जनता को पहले बड़ी नेतागिरी पर प्रयोग की छूट दें, देखना सब क्लेश काट देंगे।

नकली किताबों के तंत्र से आहत होती राष्ट्रीयता

  -ःललित गर्ग:-
हमारा चरित्र देश के समक्ष गम्भीर समस्या बन चुका है। हमारी बन चुकी मानसिकता में आचरण की पैदा हुई बुराइयों ने पूरे तंत्र और पूरी व्यवस्था को प्रदूषित कर दिया है। स्वहित और स्वयं की प्रशंसा में ही लोकहित है, यह सोच हमारे समाज मंे घर कर चुकी है। यह रोग मानव की वृत्ति को इस तरह जकड़ रहा  है कि हर व्यक्ति लोकहित के बजाए स्वयं के लिए सब कुछ कर रहा है। इसका एक त्रासद एवं भयावह उदाहरण है उत्तर प्रदेश में नकली किताबों के तंत्र का पर्दाफाश होना। नकली पुस्तकें एवं उनका बड़ा तंत्र विकसित होना मुनाफाखोरी एवं भ्रष्टाचार का सबसे आसान जरिया बन गई है। जीवन कितना विषम और विषभरा बन गया है कि सभी कुछ मिलावटी, सब नकली, धोखा, गोलमाल ऊपर से सरकार एवं संबंधित विभाग कुंभकरणी निद्रा में है।
अवैध तरीके से छापी जा रही एनसीईआरटी की किताबों की भारी संख्या में बरामदगी और कुछ लोगों की गिरफ्तारी से शुरुआती तौर पर जो कुछ सामने आया है वह बेहद गंभीर, त्रासद और चैंकाने वाला है। येन-केन-प्रकारेण एवं गैरकानूनी तरीकों से धन को जितना अधिक अपने लिए निचोड़ा जा सके, निचोड़ लो, वाली मानसिकता ने अनेक शक्लों में भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता को पनपाया है। देश के सौ रुपये का नुकसान हो रहा है और हमें एक रुपया प्राप्त हो रहा है तो बिना एक पल रुके ऐसा हम कर रहे हैं। भ्रष्ट आचरण और व्यवहार अब हमें पीड़ा नहीं देता। सबने अपने-अपने निजी सिद्धांत बना रखे हैं, भ्रष्टाचार की परिभाषा नई बना रखी है। भ्रष्ट तरीकों ने स्कूलों में पढाई जाने वाली पुस्तकों को भी नहीं बख्शा है। नकली पुस्तकों का एक पूरा माफिया तंत्र विकसित हो गया है, जिसे राजनीतिक संरक्षण मिलना अधिक भयावह एवं विडम्बनापूर्ण है।
यूपी बोर्ड मंे एनसीईआरटी की किताबें चलती हैं। पर उत्तर प्रदेश में फुटकर प्रकाशकों को कमीशन न मिलने के कारण कुछ प्रकाशक अवैध तरीके से ये किताबें छापने के धंधे में  कूद पड़े हैं। ये लोग हल्के एवं सस्ते कागज पर एनसीईआटी की किताबें छापते हैं और फर्जी बिल तैयार कर बड़े कमीशन पर एनसीईआरटी के अधिकृत विक्रेताओं को नकद दाम में नकली किताबे बेच देते हैं। जहां असली प्रकाशकों को सिक्योरिटी मनी देकर कागज और प्रिटिंग की गुणवत्ता का ध्यान रखना पड़ता है, वहीं नकली प्रकाशक कम लागत में वैसी ही किताब बाजार में उतार देते हैं। इस धंधे में सालाना 100 करोड़ के टर्न ओवर में करीब 40 करोड़ की काली कमाई थी तो पुस्तक विक्रेताओं को भारी कमीशन मिल रहा था, जिस कारण वे असली किताब खरीदने में रूचि ही नहीं दिखाते थे। उत्तर प्रदेश में ही एनसीईआरटी की किताबों के करीब 300 अधिकृत विक्रेताओं द्वारा फर्जी किताबें खरीदने की चैंकाने वाली जानकारी सामने आयी है।
वैसे हर क्षेत्र में लगे लोगों ने ढलान की ओर अपना मुंह कर लिया है चाहे वह क्षेत्र चिकित्सा का हो या शिक्षा का, सिनेमा का हो या व्यापार का हो, बात पुस्तकों की हो या दवाइयों की, खाद्य सामग्री हो या अन्य जरूरत का सामान- मिलावट, नकली  एवं गुणवत्ताहीन चीजों के रूप में भ्रष्टाचार चारों ओर पसरा है। राष्ट्रद्रोही स्वभाव हमारे लहू में रच चुका है। यही कारण है कि हमें कोई भी कार्य राष्ट्र के विरुद्ध नहीं लगता और न ही ऐसा कोई कार्य हमें विचलित करता है। एनसीईआरटी की किताबें अपनी स्तरीय सामग्री, गुणवत्ता के लिए जानी जाती है, क्योंकि इनमें शोध पर काफी निवेश किया जाता है, लेखकों को भारी पारिश्रमिक दिया जाता है। ऐसे में सिर्फ कागज और छपाई में खर्च कर एनसीईआरटी की किताबों का नकल करने वाले प्रकाशकों के लिए पुस्तक विक्रेताओं को मोटा कमीशन देना, जाहिर है, आसान था। उससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि फर्जी तरीके से छापी जा रही ये किताबें उत्तर प्रदेश से निकलकर दिल्ली और उत्तराखंड और शायद देश के अन्य हिस्सों तक पहुंच चुकी है। चूंकि ये किताबें भारी पैमाने पर छापी जा रही थीं और साफ-सुथरी थीं, इससे संदेह जताया जा रहा है कि स्कैन करने के बजाय कहीं सीधे एनसीईआरटी प्रेस से ही इन किताबों की साॅफ्ट काॅपी न ली जा रही हो! सिर्फ यही नहीं कि अवैध तरीके से किताबें छापने का यह धंधा लंबे समय से चल रहा था, बल्कि इस धंधे को मिल रहे राजनीतिक संरक्षण का आरोप मामले को और गंभीर बनाता है। ऐसे में इस मामलें की न केवल गहराई से जांच होनी चाहिए, बल्कि सुनियोजित ढंग से सरकारी खजाने को चूना लगाने वाले इस समूचे तंत्र की शिनाख्त भी आवश्यक है। दोषियों को कड़ी सजा भी दी जानी चाहिए ताकि इस तरह के भ्रष्ट आचरण का फिर कोई साहस न कर सके।
नकली एवं अवैध पाठ्य-पुस्तकों जैसे राष्ट्रीय जीवन में कितने ही भ्रष्ट एवं अनैतिक तरीके पनप रहे हैं जिनसे मूल्यहीनता एवं भ्रष्टाचार की जहरीली गैसें निकलती रहती हैं। वे जीवन समाप्त नहीं करतीं पर जीवन मूल्य समाप्त कर रही हैं। हमारे राष्ट्रीय चरित्र  इस तरह के कई प्रकार के जहरीले, भ्रष्ट दबावों से प्रभावित है। अगर राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की कहीं कोई आवाज उठाता है तो लगता है यह कोई विजातीय तत्व है जो हमार जीवन में घुसाया जा रहा है। जिस मर्यादा, सद्चरित्र और सत्य आचरण पर हमारी संस्कृति जीती रही है, सामाजिक व्यवस्था बनी रही है, जीवन व्यवहार चलता रहा है उनका लुप्त होना गंभीर चिन्ता का विषय है। नैतिकता, ईमानदारी एवं सद्चरित्र का जो वस्त्र राष्ट्रीय जीवन को ढके हुए था, हमने उसको उतार कर खूंटी पर टांग दिया है। मानो वह हमारे पुरखों की चीज थी, जो अब काम की नहीं रही। राष्ट्रीय चरित्र न तो आयात होता है और न निर्यात और न ही इसकी परिभाषा किसी शास्त्र में लिखी हुई है। इसे देश, काल, स्थिति व राष्ट्रीय हित को देखकर बनाया जाता है, जिसमें हमारी संस्कृति एवं सभ्यता शुद्ध सांस ले सके। लेकिन जितना अधिक प्रयत्न देश को पवित्र, शुद्ध एवं नैतिक करने का होता है, उससे अधिक प्रयत्न अनैतिकता, मूल्यहीनता एवं भ्रष्टाचार को पनपाने के देश में हो रहे हैं। भले ही हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का संकल्प बार-बार दोहराते हो, लेकिन वो डाल-डाल तो भ्रष्ट आचरण वाले पात-पात की उक्ति को चरितार्थ करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने भी यह एक चुनौती है कि वो इस भ्रष्ट एवं नकली पुस्तक तंत्र से कैसे निबटते हैं।  
पिछले कई वर्षों से राजनैतिक एवं सामाजिक स्वार्थों ने हमारे इतिहास एवं संस्कृति को एक विपरीत दिशा में मोड़ दिया है और प्रबुद्ध वर्ग भी दिशाहीन मोड़ देख रहा है। अपनी मूल पवित्रता एवं नैतिकता की संस्कृति को रौंदकर किसी भी भ्रष्टसंस्कृति को बड़ा नहीं किया जा सकता। जीवन को समाप्त करना हिंसा है, तो जीवन मूल्यों को समाप्त करना भी हिंसा है। यों तो गिरावट हर स्तर पर है। समस्याएं भी अनेक मुखरित हैं पर राष्ट्रीय चरित्र को विघटित करने वाली यह नकली पाठ्य पुस्तक का प्रकरण अधिक चिन्ताजनक है। भरपूर बल देकर इन भ्रष्ट पुस्तक प्रकाशकों के खिलाफ एक सशक्त अभियान चलाया जाए ताकि जीवन के हर पक्ष पर हावी हो रही भ्रष्टाचार एवं अवैध तौर-तरीकों की कालिमा को हटाया जा सके, ताकि अनैतिकता व मूल्यहीनता का दंश एवं दाग हमारे राष्ट्रीय चरित्र के लिए खतरा नहीं बन सके। नैतिकता की मांग है कि धन के लालच अथवा राजनीतिक स्वार्थ के लिए हकदार का, गुणवंत का, श्रेष्ठता का हक नहीं छीना जाए।

बीजेपी इतनी ढीली क्यों है कार्यसमिति की बैठक पर!

-निरंजन परिहार

सन 2018 के सितंबर महीने की 8 तारीख को नई दिल्ली में तब के बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि संकल्प की शक्ति को कोई नहीं हरा सकता। इसलिए संकल्प कीजिए कि हम फिर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आएंगे। यह वह बैठक थी, जो राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक से तत्काल पहले राष्ट्रीय पदाधिकारियों की होती है। सभी ने संकल्प लिया, चुनाव लड़ा। इतिहास के सबसे प्रचंड और छप्परफाड़ बहुमत से उसे जीता और भूल गए कि अगली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक तय समय पर करनी है। शायद इसीलिए दो साल होने को है, पार्टी अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक का इंतजार कर रही है। हालात बताते हैं कि छह महीने का वक्त और लग सकता है। होने को तो बीजेपी में जेपी नड्डा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। लेकिन अपनी ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक तय करने से पहले उनको जिनसे इजाजत होनी होती है, उनसे पूछे कौन, यह सबसे बड़ा सवाल है।

बीते तीन दिनों से कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में जो कुछ हुआ, उस पर देश भर में जबरदस्त चर्चा चल रही है। लेकिन आंतरिक लोकतंत्र की अहमियत का दम भरनेवाली बीजेपी अपनी ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दो साल से नहीं कर पाई है, और इस पर कहीं कोई चर्चा भी नहीं है। अंतिम बार सन 2018 के सितंबर महीने की 8 और 9 तारीख को दिल्ली में नए – नए बने अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में यह बैठक आयोजित हुई थी। मुंबई के बांद्रा स्थित रिक्लेमेशन ग्राउंड में 6 अप्रेल 1980 को अपनी स्थापना के बाद बीजेपी को यह 41वां साल चल रहा है, लेकिन इतने लंबे कालखंड में यह पहली बार है, जब दो साल के इतने लंबे अंतराल तक कार्यसमिति की बैठक ही नहीं हुई है। यह शायद इसलिए हैं, क्योंकि बीजेपी के आलाकमान कहे जानेवाले दो सबसे बड़े नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का पूरा ध्यान केवल देश चलाने पर है। शायद वे यही मान रहे होंगे कि पार्टी तो चलती रहेगी।

कायदे से देखें, तो बीजेपी का संविधान कहता है कि साल में 3 बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी और एक बार राष्ट्रीय परिषद् की बैठक होनी चाहिए। राष्ट्रीय परिषद में कार्यकारिणी के निर्णयों का अनुमोदन होता है। संविधान के मुताबिक जब तक राष्ट्रीय परिषद में अनुमोदन नहीं मिल जाता, पार्टी में किसी भी स्तर पर की गई कोई भी नियुक्ति अधिकृत नहीं मानी जा सकती। इसके हिसाब से तो जेपी नड्डा भी बीजेपी के संवैधानिक रूप से अध्यक्ष है या नहीं कौन जाने। और जब अध्यक्ष पद पर बैठे व्यक्ति की नियुक्ति ही तकनीकी रूप से संवैधानिक नही है, तो फिर उनके नियुक्त किए प्रदेशों के अध्यक्ष व अन्य पदाधिकारी कैसे संवैधानिक हो गए। हालांकि निश्चित तौर पर नड्डा सहित सारी नियुक्तियों को वैध साबित करने का बीजेपी ने कोई रास्ता जरूर निकाल लिया होगा। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के निर्णय पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में विचार-विमर्श होने की परंपरा का मामला दो साल से अटका हुआ है।

बीजेपी के केंद्रीय संगठन में बड़े पद पर बैठे एक पदाधिकारी का विश्वास है कि आनेवाले कुछ समय में राष्ट्रीय कार्यकारिणी हो सकती है। वे वर्तमान हालात में कोविड संकट का हवाला देते हुए इस बैठक के छह महीने टलने की संभावना से भी इंकार नहीं करते हैं। लेकिन उन्हें भी यह पता नहीं है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक तत्काल हो जाएगी, या बिहार और बंगाल विधानसभाओं के चुनाव के बाद कुल ढाई साल बाद होगी। वैसे, संविधान में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक और राष्ट्रीय परिषद को विशेष हालात में आगे सरकाए जाने का प्रावधान भी है। ऐसे में फिलहाल तो कोविड का कारण वाजिब है। लेकिन कोरोना संक्रमण भारत में फरवरी के अंत और मार्च में शुरू हुआ, उससे पहले भी छह महीने तो ऊपर वैसे ही निकल ही चुके थे। फिर, अगर राज्यों में चुनावों की वजह से राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक टाली जाती रही, तो हमारे हिंदुस्तान में तो हर छह महीने बाद किसी न किसी प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव डमरू बजाते हुए मैदान मैं आ जाते हैं। ऐसे में देश को दो सर्वशक्तिमान नेता अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को कब तक बंधक बनाए रखेंगे, यह सबसे बड़ा सवाल है। फिर जो बीजेपी, सरकारों के हर काम को तत्काल करने और हर फैसले को त्वरित लागू करने का दम भरती हो, वही बीजेपी अपनी ही राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक को दो साल से भी ज्यादा वक्त तक लटकाए रखे, यह भी तो ठीक बात नहीं है। कहा जा सकता है कि चाल, चेहरा और चरित्र बदलने का दावा करनेवाली पार्टी का हम देख ही रहे हैं कि चरित्र बदल गया है, चेहरे भी बदल गए हैं, लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के मामले में उसकी चाल कछुए जैसी हो गई है।  

विश्व में भारत की नयी साख के पंख

-ः ललित गर्ग:-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सशक्त व मजबूत नेतृत्व के कारण आज भारत की आवाज विश्व में प्रभावी तरीके से सुनी जा रही है। किस तरह मोदी सरकार के दूसरे सफल, कार्यकारी एवं प्रभावी कार्यकाल में भारत की आवाज अब वैश्विक मंच पर कहीं अधिक सुनी जा रही, चाहे वह जी 20 हो या जलवायु सम्मेलन, भारत की आर्थिक नीतियां हो या विकास की योजनाएं, कोरोना महामारी से सफलतम संघर्ष हो या भारत की संस्कृति की विश्व में योग दिवस, अहिंसा दिवस एवं आम व्यवहार में नमस्ते का शिष्टाचार अपनाने की संस्कृति। भारत के घरेलू और विदेश नीति के बीच मजबूत संबंध स्थापित हो रहे हैं। दो दिन पूर्व ही जब फ्रांस के राष्ट्रपति और जर्मनी की चांसलर मिले तो दोनों ने एक-दूसरे को हाथ जोड़कर और नमस्ते बोलकर अभिवादन किया। ऐसा ही ट्रंप और इस्राइल के प्रधानमंत्री भी करते हैं। दुनिया की महाशक्तियां योग भी करती है, तो भारत के अहिंसा को स्वीकारने की वकालत भी करती है- ये दृश्य देखकर दिल खुश होता है, गौरवान्वित होता है, आशान्वित होता है। लेकिन दूसरी ओर यह समझ से परे है कि पाकिस्तान न केवल अपने ही देश की जनता से बल्कि अपने इस्लामी मित्र-देशों से लगातार क्यों कटता जा रहा है?
जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने को मुद्दे को लेकर पाकिस्तान ने विश्व के लगभग सभी देशों से मदद की गुहार लगाई लेकिन एक-दो देशों को छोड़कर किसी ने भी पाकिस्तान का साथ नहीं दिया। अमेरिका ने इसे द्विपक्षीय मुद्दा बताकर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। पाकिस्तान की तरफ से इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में भी उठाने की कोशिश की गई है लेकिन उसे वहां भी मुंह की खानी पड़ी। वह जमाना लद गया जब अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन कश्मीर पर पाकिस्तान की पीठ ठोका करता था। सालों-साल वह भारत-विरोधी प्रस्ताव पारित करता रहा। पिछले साल जब भारत सरकार ने धारा 370 हटाई तो पाकिस्तान का साथ सिर्फ दो देशों ने दिया। तुर्की और मलेशिया। सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसी इस्लामी राष्ट्रों ने उसे भारत का आतंरिक मामला घोषित किया। पाकिस्तान के आग्रह के बावजूद सउदी अरब ने कश्मीर पर इस्लामी संगठन की बैठक नहीं बुलाई। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या में 5 अगस्त 2020 को श्रीराम मन्दिर का शिलान्यास किया तो दुनियाभर में उन्होंने सर्वाधिक प्रशंसा एवं प्रचार मिला, जहां तक पाकिस्तान के मीडिया में भी यह घटना प्रशंसात्मक तरीके से चर्चित रही।
शक्तिशाली मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान को भारत के खिलाफ बयानबाजी करने में संयम बरतने की नसीहत दी है, यह भारत के बढ़ते वर्चस्व को ही उजागर करता है। जब सऊदी अरब के विदेश मंत्री आदिल अल जुबैर और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री अब्दुल्ला बिन अल नाहयान इस्लामाबाद दौरे पर अपने नेतृत्व और कुछ अन्य शक्तिशाली देशों की ओर से संदेश लेकर आए थे। उन्होंने पाकिस्तान से कहा कि वह भारत के साथ  बातचीत करने की कोशिश करे और बयान देने में संयम बरते। इस तरह की स्थितियां बता रही है कि दुनिया में भारत का प्रभाव एवं गुरुता कितनी बढ़ गयी है और भारत की उपेक्षा की स्थितियों पर लगभग नियंत्रण स्थापित हुआ है। जी-7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए निमंत्रण मिलना भारत की बढ़ती ताकत को साफ दर्शाता है। जी-7 दुनिया की सात सबसे बड़ी कथित विकसित और उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों का समूह है, जिसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमरीका शामिल हैं। इसे ग्रुप ऑफ सेवन भी कहते हैं। यह सर्वविदित है कि अब दुनिया की कोई ताकत डंडे के जोर पर कश्मीर को भारत से नहीं छीन सकती, भारत इस सुदृढ़ एवं सशक्त स्थिति में मोदी के कारण ही पहुंचा है।
पाकिस्तान बातचीत का रास्ता अपनाए तथा आक्रमण और आतंकवाद का सहारा न ले तो निश्चय ही कश्मीर का मसला हल हो सकता है। लेकिन एक बड़ी सचाई यह भी है कि कश्मीर का मुद्दा ही पाकिस्तान में सत्ता की चाबी है। इसी मुद्दे पर पाकिस्तान का फौजीकरण हुआ है। इसी कारण वहां की सरकार गरीबों पर खर्च करने की बजाय हथियारों पर पैसा बहा रही है। उसके आतंकवादी जितनी हत्याएं भारत में करते हैं, उससे कहीं ज्यादा वे पाकिस्तान में करते हैं। पाकिस्तान भारत टुकडे़ होने से ही बना था, वह दूसरे देशों के आगे कब तक झोली फैलाता रहेगा? कब अपने वजूद को कायम करेगा?
भारत का वर्चस्व एवं प्रभाव नरेन्द्र मोदी की नीतियों, राजनीति, आर्थिक एवं शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की विचारधारा के कारण नहीं बढ़ रहा है, बल्कि यह पहला अवसर है जब एक सरकार योग, आयुर्वेद, खानपान, साहित्य, परंपरा, ज्ञान और अनुभव को प्रश्रय देने को तत्पर हैं, ये जीवनमूल्य एवं जीवनशैली हजारों वर्ष पहले जीवनोपयोगी थी। उन्हें संग्रहालय की चीज बनने की बजाय विश्व मानवता के लिये उपयोगी सिद्ध करने के लिये मोदी सरकार कृतसंकल्प है, जिस कारण भी दुनिया भारत की ओर आशाभरी नजरों से निहारते हुए उसकी कहीं बातों को महत्व देती हैैं। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति, जीवनदर्शन शाश्वत है, त्रैकालिक, सार्वजनीन, सार्वदैशिक है। इसका संपर्क संपूर्ण अस्तित्व और वृहतर चेतना से रहा है। भारत आदि काल से विश्व सभ्यता के लिए एक ज्ञान-स्रोत है। आज मोदी स्वयं एवं उनकी सरकार अपने इस अखूट खजाने को आधुनिक सन्दर्भ देते हुए जीवंत कर रही हंै उसकी शक्ति उजागर कर रही हैं। इसी शक्ति ने कोरोना महाव्याधि की मार से भारत की जनता को बचाने में सार्थक भूमिका का निर्वाह किया है।
कोरोना महासंकट हो या सीमाओं पर उठापटक इन जटिल स्थितियों के बीच भी हमने देखा है कि नरेन्द्र मोदी जिस आत्मविश्वास से इन संकटों से लडे़, उससे अधिक आश्चर्य की बात यह देखने को मिली कि उन्होंने देश का मनोबल गिरने नहीं दिया। उनसे यह संकेत बार-बार मिलता रहा है कि हम अन्य विकसित देशों की तुलना में कोरोना से अधिक प्रभावी एवं सक्षम तरीके से लडे हैं और उसके प्रकोप को बांधे रखा है। जिससे ऐसा बार-बार प्रतीत हुआ कि हम दुनिया का नेतृत्व करने की पात्रता प्राप्त कर रहे हैं। हम महसूस कर रहे हैं कि निराशाओं के बीच आशाओं के दीप जलने लगे हैं, यह शुभ संकेत हैं।
निश्चित ही जीडीपी के 10 प्रतिशत के बराबर के मोदी के आत्मनिर्भर भारत के भारी-भरकम पैकेज की घोषणा की, जिसकी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हुई है। इससे भारत में एक नई आर्थिक सभ्यता और एक नई जीवन संस्कृति करवट लेगी। इससे न केवल आम आदमी में आशाओं का संचार होगा बल्कि नये औद्योगिक परिवेश, नये अर्थतंत्र, नये व्यापार, नये राजनीतिक मूल्यों, नये विचारों, नये इंसानी रिश्तों, नये सामाजिक संगठनों, नये रीति-रिवाजों और नयी जिंदगी की हवायें लिए हुए आत्मनिर्भर भारत की एक ऐसी गाथा लिखी जाएंगी, जिसमें राष्ट्रीय चरित्र बनेगा, राष्ट्र सशक्त होगा, न केवल भीतरी परिवेश में बल्कि दुनिया की नजरों में भारत अपनी एक स्वतंत्र हस्ती और पहचान लेकर उपस्थित होगा। मोदी की दूरगामी नीतियों से मनोवैज्ञानिक ढं़ग से चीन की दादागिरी और पाकिस्तान की दकियानूसी हरकतों को मुंहतोड़ जबाव दिया जा रहा है। चीन ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि भारत पर निर्भर उसकी अर्थव्यवस्था एवं बाजार को इस तरह नेस्तनाबूंद किया जायेगा। किसी भी राष्ट्र की ऊंचाई वहां की इमारतों की ऊंचाई से नहीं मापी जाती बल्कि वहां के राष्ट्रनायक के चरित्र एवं हौसलों से मापी जाती है। उनके काम करने के तरीके से मापी जाती है। इस मायने में नरेन्द्र मोदी एक प्रभावी विश्व नेतृत्व बनकर उभरा है, विश्व में भारत की नयी साख एवं वर्चस्व का सबब बना है।

दाऊद इब्राहिम पर फिर बेपर्दा हुआ पाकिस्तान

-अरविंद जयतिलक

अंडरवल्र्ड डाॅन व 1993 के मुंबई सीरियल बम विस्फोटों के गुनाहगार दाऊद इब्राहिम पर पाकिस्तान फिर बेपर्दा हुआ है। उसने वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) में सख्ती से बचने के लिए आखिरकार स्वीकार लिया है कि दाऊद इब्राहिम कराची में ही है। उसने 88 प्रतिबंधित संगठनों और उनके आकाओं पर वित्तीय प्रतिबंध की जानकारी एफएटीएफ को सौंप दी है। उल्लेखनीय है कि पेरिस स्थित एफएटीएफ ने 2018 में पाकिस्तान को ग्रे सूची में रखा था और अब इस मसले पर अक्टुबर में बैठक होनी है। पाकिस्तान को अच्छी तरह मालूम है कि अगर उसने आतंकियों का वित्तपोषण बंद नहीं किया तो उसे एफएटीएफ द्वारा काली सूची में डाला जाना तय है। इसका परिणाम यह होगा कि उसे विदेशों से आर्थिक मदद मिलनी बंद हो जाएगी। अगर एफएटीएफ ने पाकिस्तान को काली सूची में डाल दिया तो उसकी दुर्दशा तय है। उसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक समेत अनेक वैश्विक वित्तीय संस्थाओं से कर्ज मिलना मुश्किल होगा। साथ ही मूडी, एस एंड पी, और फिच जैसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां उसकी साख गिरा सकती हैं। ऐसी स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय बाजार से उसके लिए फंड जुटाना लोहे के चने चबाने जैसा होगा। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ साल से पांच फीसद की दर से बढ़ रही है और इस साल सरकार का लक्ष्य इसे 6 फीसद ले जाने का था। लेकिन कोरोना की वजह से सब चैपट हो गया है। सउदी अरब ने भी कर्ज देने से मना कर दिया है। अब अगर वह काली सूची में आ गया तो उसकी अर्थव्यवस्था का रसातल में जाना तय है। किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से मिलने वाली सहायता पर निर्भर है। अगर अर्थव्यवस्था में उठापटक हुआ तो फिर पाकिस्तान में निवेश की गति धीमी होगी और निवेशक भाग खड़े होंगे। विदेशी निवेशक और कारोबारी यहां कारोबार करने से पहले हजार बार सोचेंगे। अगर कहीं शेयर बाजार और लुढ़का तो वित्तीय अनिश्चितता की स्थिति उत्पन होनी तय है। ऐसे हालात में 126 शाखाओं वाला सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय बैंक स्टैंडर्ड चार्टर्ड सहित सिटी बैंक, ड्यूश बैंक इत्यादि अपना कारोबार समेट सकते हैं। साथ ही आयात-निर्यात प्रभावित होगा और यूरोपीय देशों को निर्यात किए जाने वाले चावल, काॅटन, मार्बल, कपड़े और प्याज सहित कई उत्पादों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। फिर घरेलू उत्पादकों को भी भारी नुकसान उठाना होगा। विशेषज्ञों की मानें तो ऐसी अराजक आर्थिक स्थिति में चीन पाकिस्तान में ज्यादा से ज्यादा निवेश कर अपना हित संवर्धन करेगा जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रतिकूल पड़ना तय है। पाकिस्तान की मौजुदा परिस्थियों पर गौर करें तो उत्पादन और खपत दोनों में जबरदस्त गिरावट है और कीमतें आसमान छू रही हैं। गरीबी और बेरोजगारी रिकार्ड स्तर पर है। युवाओं की आबादी का बड़ा हिस्सा नौकरी के लिए पलायन कऱ रहा है। अभी बीते साल ही 10 लाख युवाओं ने देश छोड़ा है। लोगों को स्थिरता और सुरक्षा देने वाली सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो आज पाकिस्तान की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। नए मानकों के आधार पर जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान में गरीबी रेखा से नीचे जीवन गुजर-बसर करने वालों की तादाद 6 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। पाकिस्तान के केंद्रीय योजना व विकास मंत्रालय के मुताबिक देश में गरीबों को अनुपात बढ़कर 40 प्रतिशत के पार पहुंच चुका है। जबकि 2001 में गरीबों की तादाद दो करोड़ थी। आज की तारीख में पाकिस्तान के हर नागरिक पर तकरीबन 1 लाख 60 हजार रुपए कर्ज है। विदेशी लेन-देन और विदेशी मुद्रा प्रवाह में कमी के चलते पहले से ही सिर से उपर चढ़ा पाकिस्तान का चालू खाता घाटा बढ़ा हुआ है। वैसे भी मौजूदा समय में पाकिस्तान के चालू खाते में घाटे का अंतर 7 प्रतिशत के पार पहुंच चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम हो रहा है। गौर करें तो इस हालात के लिए पाकिस्तान स्वयं जिम्मेदार है। वह आतंकियों को प्रश्रय दे रहा है। उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के इशारे पर ही हक्कानी समूह जैसे अनगिनत आतंकी संगठन अफगानिस्तान में तबाही मचाते हैं। ये आतंकी संगठन कई बार अमेरिका एवं भारतीय दूतावासों पर भी हमला कर चुके हंै। हक्कानी समूह को पाकिस्तान का प्रश्रय प्राप्त है। इसके अलावा लश्करे तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद जैसे आतंकी संगठन भी पाकिस्तान में शरण लिए हुए हैं। याद होगा अभी गत वर्ष पहले अमेरिकी विदेश विभाग की वार्षिक रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ कि पाकिस्तान के संघ प्रशासित कबायली क्षेत्र (फाटा), पूर्वोत्तर खैबर पख्तुनवा और दक्षिण-पश्चिम ब्लूचिस्तान क्षेत्र में कई आतंकी संगठन पनाह लिए हुए हैं और यहीं से वे स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक हमलों की साजिश बुन रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक हक्कानी नेटवर्क, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, लश्कर-ए-झंगवी और अफगान तालिबान जैसे अन्य आतंकी समूह पाकिस्तान और पूरे क्षेत्र में अपनी गतिविधियों की योजना के लिए इन पनाहगाहों का फायदा उठा रहे हैं। दुनिया के सामने उजागर हो चुका है कि पाकिस्तान की मदद से ही जम्मू-कश्मीर में लश्करे तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, हरकत-उल-मुजाहिदीन, हरकत-उल-अंसार, हिजबुल मुजाहिदीन, अल-उमर-मुजाहिदीन और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन जैसे आतंकी संगठन सक्रिय हैं। यहां ध्यान देना होगा कि एफएटीएफ ही नहीं बल्कि अमेरिका ने भी पाकिस्तान को आतंकवाद का गढ़ घोषित कर उसे दी जाने वाली सहायता पर रोक लगा रखा है। अमेरिकी कांग्रेस की सालाना रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि पाकिस्तान आतंकवाद पर दोहरा रुख अपनाते हुए आतंकी संगठनों को मदद पहुंचा रहा है। अब जब उसे एफएटीएफ की कार्रवाई का डर सताने लगा है तो उसने स्वीकार लिया कि दाऊद पाकिस्तान में ही है। याद होगा कि पाकिस्तान ने एफएटीएफ की कार्रवाई से बचने के लिए 26 सूत्रीय कार्रवाई योजना का प्रस्ताव दिया था जिसमें इस्लामिक स्टेट, अलकायदा, लश्कर ए तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, हक्कानी नेटवर्क, जमात-उद-दावा, फलाह-ए-इंसानियत और तालिबान से जुड़े लोगों की वित्तीय मदद रोकने की पेशकश के साथ इसे लागू करने के लिए वक्त मांगा था। अब वह समयावधि पूरी हो रही है। नतीजा पाकिस्तान घुटने पर आ गया है। जहां तक दाऊद इब्राहिम का पाकिस्तान में होने का सवाल है तो यह पहली बार नहीं है कि जब उसके द्वारा स्वीकारा गया है। याद होगा कि गत वर्ष पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विशेष दूत शहरयार खान ने लंदन स्थित इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में स्वीकारा था कि ‘दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में ही है। लेकिन चंद घंटे बाद ही उनके सुर बदल गए। फिर वे कहते सुने गए कि ‘गृहमंत्रालय को शायद दाऊद के बारे में पता होगा, लेकिन विदेश मंत्रालय को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। मुझे तो यह भी पता नहीं कि वह पाकिस्तान में रह रहा है। ध्यान देना होगा कि पाकिस्तान ही नहीं बल्कि आईएसआईएस और अलकायदा पर प्रतिबंध की निगरानी करने वाली संयुक्त राष्ट्र की समिति ने भी कड़ी जांच के बाद पाकिस्तान के भीतर दाऊद इब्राहिम के छः पतों को सही पाया था। याद होगा गत वर्ष पहले पश्चिमी देश की एक खुफिया एजेंसी ने दाऊद इब्राहिम के पाकिस्तान में होने का खुलासा किया था। खुफिया एजेंसी ने दाऊद इब्राहिम और दुबई के एक प्रापर्टी डीलर के बीच बातचीत रिकार्ड किया था जिसमें उसका लोकेशन पाकिस्तान के कराची के उपनगर क्लिफटन में होने का पता चला। वेब-पोर्टल न्यूज मोबाइल द्वारा बातचीत का टेप जारी किए जाने के बाद भी पाकिस्तान ने इंकार कर दिया था। याद होगा गत वर्ष पहले पकड़े गए आतंकी अब्दुल करीम टुंडा ने भी कहा था कि दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में ही है। उसने खुलासा किया था कि उसकी डी कंपनी नकली नोट और नशे के कारोबार के अलावा रीयल स्टेट और क्रिकेट मैच फिक्सिंग के धंधे में लिप्त है। भारतीय खुफिया एजेंसियां भी कई बार कह चुकी हैं कि दाऊद इब्राहिम पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के संरक्षण में करांची में है। इसके लिए कई अकाट्य प्रमाण भी दिए जा चुके हैं। लेकिन अभी तक पाकिस्तान मानने को तैयार नहीं था। लेकिन एफएटीएफ की कार्रवाई के डर ने उसे सच बोलने को मजबूर कर दिया। अब उचित होगा कि भारत दाऊद इब्राहिम के प्रत्यर्पण के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाए और दुनिया भर में उसकी कारस्तानी को उजागर करे।   

मनुष्य को प्रतिदिन ईश्वर के उपकारों का स्मरण करना चाहिये

-मनमोहन कुमार आर्य

                हमें यह ज्ञात होना चाहिये कि ईश्वर क्या कैसा है? उसके गुण, कर्म स्वभाव क्या कैसे हैं? इसका ज्ञान करने का सरलतम तरीका सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन है। हमारी दृष्टि में संसार में सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के समान दूसरा महत्वपूर्ण ग्रन्थ नहीं है। इसके अध्ययन से मनुष्य की सभी शंकायें समस्यायें दूर हो सकती हैं। संसार में तीन अनादि नित्य सत्तायें ईश्वर, जीव प्रकृति हैं। इन सत्ताओं के यथार्थ स्वरूप पर भी सत्यार्थप्रकाश में प्रकाश डाला गया है। सत्यार्थप्रकाश से जो ज्ञान प्राप्त होता है वह अन्य सामान्य अल्प बुद्धि वाले लेखकों के ग्रन्थों से नहीं मिल सकता। सत्यार्थप्रकाश के लेखक ऋषि दयानन्द थे। उन्होंने अपना जीवन ईश्वर व सत्य सिद्धान्तों की खोज, योगाभ्यास, ईश्वर की उपासना सहित ईश्वर की आज्ञा के पालन व ईश्वरीय ज्ञान वेदों के प्रचार व प्रसार में लगाया था। वह असाधारण मनुष्य, विद्वान, मनीषी तथा मनुष्य की सर्वोत्तम स्थिति ऋषि उपाधि को प्राप्त महापुरुष थे। उन्होंने जो बातें लिखी हैं वह अपनी विद्वता के प्रदर्शित करने के लिये नहीं अपितु ईश्वर व मानवता के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिये लिखी हैं। अतः सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर उसके अर्थ व भावों को सभी मनुष्यों को ग्रहण व धारण करना चाहिये। जहां किसी को किसी प्रकार की कोई शंका व भ्रान्तियां हों, उसका आर्य वैदिक विद्वानों से निवारण कर लेना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य सन्मार्गगामी बनेंगे। सन्मार्ग-गामी मनुष्य को ही ईश्वर की कृपा, प्रेरणा व आशीर्वाद प्राप्त होता है। मनुष्य मूर्ख से विद्वान, दुःखी से सुखी, साधारण से असाधारण तथा पुरुषार्थ करते हुए उसके अनुरूप लाभों को प्राप्त करता हुआ न केवल धनवान व स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है अपितु मनुष्यों की श्रेष्ठ स्थितियों योगी, विद्वान व ऋषित्व तक को प्राप्त हो सकता व हो जाता है। अतः मनुष्य को सत्यार्थप्रकाश पढ़कर मनुष्य जीवन के सत्य रहस्यों से परिचित होना चाहिये और सही दिशा में प्रयत्न करते हुए अपनी शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति करनी चाहिये। ऐसा होने पर ही हमारा जीवन सफल व सार्थक हो सकता है।

                सत्यार्थप्रकाश पढ़कर मनुष्य को ईश्वर जीवात्मा के अनादित्व अविनाशी होने सहित इस संसार के नाशवान होने तथा सृष्टि में उत्पत्ति, स्थिति प्रलय होते रहने के सिद्धान्तों का ज्ञान होता है। सत्यार्थप्रकाश एवं ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों का अध्ययन करने पर ईश्वर का जो सत्यस्वरूप उपस्थित होता है वह उन्हीं के शब्दों मेंईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र एवं सृष्टिकर्ता है। उसी की (सब मनुष्यों को) उपासना (ध्यान समाधि द्वारा) करनी योग्य है। इस नियम से यह ज्ञात हो जाता है कि संसार में ईश्वर अनादि, नित्य, अविनाशी एवं सदा रहने वाली सत्ता है। जीवात्मा के विषय में भी वेद व ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों से ज्ञान होता है। जीवात्मा सत्य, चित्त, आनन्द गुण से रहित, आनन्द की इच्छुक व इसकी प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहने वाली, अजर, अमर, अनादि, नित्य, एकदेशी, ससीम, कर्मों को करने वाली, जन्म-मरण धर्मा सत्ता है। यह आत्मा वेद विहित कर्मों को करके परजन्म में श्रेष्ठ योनियों को प्राप्त होकर वेदाध्ययन आदि से ज्ञान व श्रेष्ठ कर्मों को करती है तथा ईश्वर का साक्षात्कार करने वाली सत्ता भी है। यह आत्मा मनुष्य योनि में समाधि को प्राप्त कर ईश्वर का साक्षात्कार होने पर जीवनमुक्त अवस्था को प्राप्त होकर मृत्यु होने पर मोक्ष को प्राप्त करने की सामथ्र्य से युक्त सत्ता है। मोक्ष ही सभी जीवात्माओं का एकमात्र लक्ष्य है। मोक्ष में जीवों के सभी दुःखों की सर्वथा मुक्ति हो जाती है। ईश्वर व जीव से इतर तीसरी अनादि सत्ता प्रकृति है जो त्रिगुणात्मक अर्थात् सत्व, रज व तम गुणों वाली है और अत्यन्त सूक्ष्म है। ईश्वर व जीव प्रकृति से भी अधिक सूक्ष्म सत्तायें हैं। इस त्रिगुणात्मक प्रकृति का विकार होकर ही महतत्व, अहंकार, पांच तन्मात्रायें, दश इन्द्रियां, मन, बुद्धि आदि बनते हैं। पृथिवी, अग्नि, वायु, जल और आकाश पंच-महाभूत भी प्रकृति का ही विकार हैं। इन पांच महाभूतों व प्रकृति के विकारों से बना हुआ ही यह संसार है जिसमें हम रहते व आते जाते रहते हैं। इन रहस्यों को जानकर हमारी सभी शंकाओं का समाधान हो जाता है। प्रकृति के रहस्यों का ज्ञान भी हो जाता है और परमात्मा के हम पर जो जो मुख्य उपकार हैं, उनका ज्ञान भी हमें हो जाता है। अतः सबको सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिये।

                ईश्वर का जीवों पर पहला प्रमुख उपकार तो सभी जीवों के लिये इस सृष्टि की रचना इसका पालन करना तथा जीवात्माओं को उनके कर्मानुसार जन्म योनि प्रदान करना है। सभी जीवों को उनके पूर्वकृत कर्मों के अनुसार सुख दुःख रूपी भोग भी परमात्मा द्वारा प्रदान किये जाते हैं। इतना विशाल ब्रह्माण्ड वा संसार जिसमें करोड़ो सूर्य, पृथिवियां, ग्रह, उपग्रह नक्षत्र आदि हैं, परमात्मा ने हमारे सुख कल्याण के लिये बनाये हैं। यह ईश्वर का कोई छोटा उपकार नहीं है। इसके बाद विचार करते हैं तो हमें विदित होता है कि हमें जो भाषा विद्या विषयक ज्ञान होता है वह भी ईश्वर ही कराता है। सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में ही उसने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को उत्पन्न कर चार वेदों का ज्ञान दिया था। वेदों की भाषा संस्कृत संसार की सबसे उत्तम व श्रेष्ठ भाषा है। संसार की भाषाओं व वेदों का अध्ययन कर संस्कृत भाषा की महत्ता का अनुमान किया जाता है। वेदों के ज्ञान के समान संसार में कोई ज्ञान का भण्डार नहीं है। किसी मत-मतान्तर की पुस्तक की यह स्थिति नहीं है कि उनकी तुलना वेदों से की जा सके। वस्तुतः सत्य यह है कि सभी मत-मतान्तरों व उनकी पुस्तकों में जो सत्य ज्ञान है वह सब वेदों से ही वहां पहुंचा है। इसका ज्ञान भी सत्यार्थप्रकाश पढ़कर हो जाता है। वेदों का अध्ययन कर मनुष्य सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त हो जाता है और इसी का पालन वा आचरण करने से ही मनुष्यों के सभी दुःखों की निवृत्ति होकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। संसार को वेदों का जो ज्ञान मिलता है, वह परमात्मा का कोई छोटा उपकार नहीं है। इसकी महत्ता को वैदिक विद्वान ही उचित रूप में अनुभव कर सकते हैं।

                ईश्वर का एक अन्य बड़ा उपकार जीवात्माओं को जन्म, जीवन मृत्यु प्रदान करना है। हमें यह जो जन्म जीवन प्राप्त हुआ है वह भी परमात्मा ने ही दिया है। उसी ने पूर्वजन्म में हमारी मृत्यु होने पर हमारे मातापिता परिवार का निर्धारण किया था। उसी ने वर्तमान जीवन के मातापिता के पास भेजकर हमें जन्म दिया, उनसे हमारा पालन कराया, हमें शिक्षित शरीर का पोषण कराया है। हमारे शरीर का रोम-रोम ईश्वर व अपने माता-पिता का ऋणी होता है। जिस अवस्था में हमारा जन्म होता है उस अवस्था में यदि माता-पिता पालन न करें तो हमारा जीवित रहना असम्भव होता है। दस मास तक माता का सन्तान को गर्भ में रखकर उसकी शरीर रचना में सहयोगी होना, गर्भ की रक्षा करना, जन्म के बाद सारा जीवन अपनी सन्तानों पर अपनी ममता व स्नेह की वर्षा करने से कोई भी सन्तान अपनी माता-पिता के उपकारों से कदापि उऋण नहीं हो सकती। यदि कोई ऐसा सोचे कि उसने अपने माता-पिता का ऋण उतार दिया है तो ऐसा सोचना भी पाप होता है। वस्तुतः मुनष्य माता-पिता के ऋणों से कभी ऋणी नहीं हो सकता। ईश्वर के ऋण से उऋण होना तो असम्भव ही है। हमारे माता-पिता जो सत्कर्म करते हैं वह सब ईश्वर की प्रेरणा व उसके बनाये नियमों से ही करते हैं। इनका अधिकांश श्रेय भी परमात्मा को ही होता है। माता-पिता के बाद हम जिन आचार्यों से ज्ञान की प्राप्ति करते हैं उनका हमारे जीवन निर्माण में योगदान होता है। इसी कारण से माता-पिता व आचार्यों को देव या देवता तथा ईश्वर को महादेव कहा जाता है। हमारा यह जन्म व जीवन पहला जन्म नहीं है। आत्मा व परमात्मा अनादि व नित्य हैं तथा हमारी यह सृष्टि भी प्रवाह से अनादि है। अतः हमारे अनन्त वा असंख्य जन्म इससे पूर्व हो चुके हैं। वह सब परमात्मा ने ही हमें दिये हैं और आगे भी कभी न रुकने वाला यह क्रम चलता ही रहेगा। इस सबके लिये हम परमात्मा के ऋणी हैं। अतः हमारा कर्तव्य बनता है कि हम परमात्मा का प्रतिदिन प्रातः व सायं स्मरण, ध्यान, चिन्तन व मनन आदि करते रहें, ईश्वर की तरह हम भी परोपकार के कार्यों को करें और सर्वव्यापक व निराकार ईश्वर की वैदिक विधि से उपासना करें जिससे हमारा आत्मा दुर्गुणों, दुव्यस्नों व दुःखों से मुक्त होता है तथा सद्गुणों, सुखों व भद्रताओं को प्राप्त होता है। यदि हम ऐसा करेंगे तो निश्चय ही हमारा कल्याण होगा। हम सुखी होंगे। हमारी सामाजिक तथा आत्मिक उन्नति होगी। हम स्वस्थ व दीर्घायु होंगे। हमारा यश फैलेगा। हम ईश्वर, वेद व अपने ऋषि आदि पूर्वजों द्वारा पोषित परम्पराओं का पालन करने वाले बनेंगे, संसार में सुख व न्याय का विस्तार होगा तथा हम अपनी सन्तानों को भी वैदिक परम्पराओं वाला बनाकर जा सकेंगे। अतः हमें वेदाध्ययन, सत्यार्थप्रकाश सहित समस्त वैदिक साहित्य का नित्य प्रति अध्ययन व स्वाध्याय करना चाहिये। सभी वैदिक विधानों का आदर करते हुए उन्हें जानना, मानना व उनका पालन करना कराना चाहिये। इससे हमारा व सभी मनुष्यों का कल्याण होगा। ओ३म् शम्।