लेख पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है आंचलिक पत्रकारिता

पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है आंचलिक पत्रकारिता

 30 मई हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष मनोज कुुमार कल्पना कीजिए कि आपके शरीर में रीढ़ की हड्डी ना हो तो आपका जीवन कैसा होगा? क्या…

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विश्ववार्ता तंबाकू निषेध कोरा दिखावा नहीं, संकल्प बने

तंबाकू निषेध कोरा दिखावा नहीं, संकल्प बने

विश्व तंबाकू निषेध दिवस, 31 मई, 2020 पर विशेष– ललित गर्ग –विश्व जहां कोरोना महामारी से जूझ रहा है, वहीं ऐसी ही गम्भीरतम महामारी है…

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राजनीति अजीत जोगी-बहुत कठिन है उन-सा होना

अजीत जोगी-बहुत कठिन है उन-सा होना

-प्रो.संजय द्विवेदी   जिद, जिजीविषा, जीवटता और जीवंतता एक साथ किसी एक आदमी में देखनी हो तो आपको अजीत जोगी के बारे में जरूर जानना…

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पर्यावरण टिड्डियों के हमले में पाकिस्तान का हाथ

टिड्डियों के हमले में पाकिस्तान का हाथ

——————डॉo सत्यवान सौरभ,  फसलों को बुरी तरह प्रभावित करने वाली टिड्डियों का पिछले कुछ दिनों से राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र (विदर्भ क्षेत्र) के शहरी क्षेत्रों…

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राजनीति समस्या को अवसर में बदलने वाला नायक : योगी आदित्यनाथ

समस्या को अवसर में बदलने वाला नायक : योगी आदित्यनाथ

-ललित गर्ग- उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोरोना संकट काल में जिस प्रकार से अपने राजनैतिक परिपक्वता, सामाजिक अनुभव, नेतृत्व कौशल और फैसले…

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लेख भारत नेपाल पुनः समवेत – चीन हुआ अप्रासंगिक

भारत नेपाल पुनः समवेत – चीन हुआ अप्रासंगिक

1962  से 1967 वाला  हठधर्मी चीन भारत के प्रति 1998 मे सुधरा था और इसे सुधारा था पूर्व  प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जी ने, जो कि भारत…

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पर्यावरण जानिए ऐसे पौधों के बारे में जो देते हैं सकारात्मक ऊर्जा आपके घर में

जानिए ऐसे पौधों के बारे में जो देते हैं सकारात्मक ऊर्जा आपके घर में

आज हम उन पौधों के बारे में चर्चा करेंगे, जिससे जीवन में आ रही समस्याओं का निवारण तो मिलेगा ही, साथ-साथ किन-किन पौधों का प्रभाव…

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विश्ववार्ता ट्रंप की चेतावनी से सहमा डब्लूएचओ

ट्रंप की चेतावनी से सहमा डब्लूएचओ

लिमटी खरे विश्व स्वास्थ्य संगठन अर्थात डब्लूएचओ पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा शंका जाहिर करने के बाद भी डब्लूएचओ के सदस्य देशों…

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जन-जागरण यूजीसी की नई सौगात

यूजीसी की नई सौगात

श्याम सुंदर भाटिया चौतरफा कोरोना वायरस के घुप अंधेरे में विश्वविद्यालय अनुदान-यूजीसी ने अपनी खिड़की से सूर्य की ऐसी रोशनी बिखेरी है, देश के करोड़ों…

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राजनीति मोदी का ‘छक्का’ और पाक के ‘छक्के’

मोदी का ‘छक्का’ और पाक के ‘छक्के’

26 मई को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने प्रधानमंत्री काल के 6 वर्ष पूर्ण किए हैं । इस काल में श्री मोदी ने कई ऐतिहासिक और…

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राजनीति नेपाल सीमा-विवाद के कई सुगम हल हैं।

नेपाल सीमा-विवाद के कई सुगम हल हैं।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक भारत और नेपाल के बीच एक छोटी-सी सड़क को लेकर काफी कहा-सुनी चल पड़ी है। यह सड़क पिथौरागढ़ और नेपाल की सीमा पर है। यह लिपुलेख के कालापानी क्षेत्र से होती हुई सीधी कैलाश-मानसरोवर तक जाती है। इस कच्ची सड़क को पक्की बनाकर इसका उद्घाटन रक्षामंत्री राजनाथसिंह ने कुछ दिन पहले ज्यों ही किया, नेपाल में हड़कंप मच गया। नेपाल की सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों ने कई भारत-विरोधी प्रदर्शन कर दिए। नेपाली विदेश मंत्रालय ने भारतीय राजदूत को बुलाकर एक कूटनीतिक पत्र थमा दिया और पूछा कि इस नेपाली भूमि पर भारत ने सड़क कैसे बना ली ? सत्तारुढ़ पार्टी के सह अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल प्रचंड ने यह भी कह दिया कि भारत इन कूटनीतिक कोशिशों से रास्ते पर नहीं आएगा। नेपाल को आक्रामक कार्रवाई करनी होगी। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली भी कौनसे पीछे रहनेवाले थे ? उन्होंने नेपाल में फैल रहे कोरोना के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा दिया, चीन को नहीं, क्योंकि भारत के सेना-प्रमुख एम.एम. नर्वणे ने एक संगोष्ठी में कह दिया था कि नेपाल किसी अन्य (चीन) के इशारे पर भारत से पंगे ले रहा है। नेपाल के रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल ने नर्वणे की कड़ी आलोचना भी कर दी है। दूसरे शब्दों में 80 किमी की इस नई सड़क को लेकर एक बार दोनों पड़ौसी देश, जिन्हें मैं भातृराष्ट्र (भाईदेश) कहता हूं, फिर उसी कटुता के जाल में फंस जाएंगे, जो हमने 2015 की नेपाल की घेराबंदी के दौरान देखा था। यह विवाद उस 30-35 किमी जमीन का है, जो हमारी 80 किमी की सड़क का हिस्सा है। यह जमीन भारत, नेपाल और तिब्बत के त्रिकोण पर स्थित है। इस कालापानी क्षेत्र को लेकर लंबे समय से भ्रांति बनी हुई है। इस क्षेत्र का इस्तेमाल सैकड़ों वर्षों से तीन देशों के लोग करते रहे हैं। लेकिन 1816 में भारत की ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाली सरकार के बीच सुगौली संधि हुई, जिसमें नेपाल-नरेश ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि काली नदी के पश्चिम के किसी हिस्से पर नेपाल का अधिकार नहीं है। इसी पश्चिम हिस्से में ही वह विवादास्पद सड़क है। नेपाल के हिस्से में कालीनदी का पूर्वी हिस्सा आता है। लेकिन नेपाल सरकार का अब कहना है कि सुगौली संधि में जिस काली नदी का उल्लेख है, उसमें उसका पश्चिमी हिस्सा भी शामिल है, जिस पर भारत ने अपना अधिकार जमा रखा है। हाल ही में नेपाल सरकार ने अपने हिस्से की जमीन पर सीमा-सुरक्षा चौकियां भी बना दी हैं। यह मामला सन 2000 में भी उठा था। नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला ने भारत के प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी से निवेदन किया था कि इसे बातचीत के द्वारा सुलझा लिया जाए। दोनों देशों की सीमा निर्धारण के लिए 1981 में जो संयुक्त-दल बना था, उसने 98 प्रतिशत सीमा तय कर ली थी। सिर्फ कालापानी और सुस्ता के दो मामले रह गए थे। अब जब कैलाश-मानसरोवर सड़क का उदघाटन हुआ है तो नेपाल ने आनन-फानन नक्शे छाप दिए हैं और उसमें पिथौरागढ़ के क्षेत्रों को अपनी सीमा में दिखा दिया है। जब सुगौली की संधि हुई थी तो नेपाल के पास नक्शा छापने की कोई व्यवस्था नहीं थी। ब्रिटिश सरकार ने जो नक्शे छापे, वे ही सर्वस्वीकार्य थे। उस समय काली नदी नाम की दो नदियों की बात भी नेपाल की ओर से कही जाती थी। ब्रिटिश नक्शों की मनमानी व्याख्याएं समय-समय पर चलती रहीं। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद नेपाल ने इस सड़क पर अपना दावा ठोका था लेकिन वास्तविक रुप से इस क्षेत्र पर भारत का ही अधिकार रहा है। 2015 में जब भारत और चीन ने इस लिपुलेख क्षेत्र से व्यापार-मार्ग चलाने का समझौता किया था, तब भी नेपाल ने चाहे, नरम शब्दों में ही सही, उसका विरोध किया था। नेपाल ने यह प्रस्ताव भी पांच-छह साल पहले रखा था कि दोनों देशों के विदेश सचिव बैठकर इस मामले को हल करें। अभी भी नेपाली सरकार का आधिकारिक रुख यही है लेकिन नेपाल की आतंरिक राजनीति इस मामले को उलझाती चली जा रही है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के सह-प्रधान प्रचंड ने प्रधानमंत्री के.पी. ओली को अपदस्थ करने का अभियान चला रखा है। पहले तो नेपाल की खराब आर्थिक स्थिति को बहाना बनाया जा रहा था, अब उन्हें यह नया हथियार हाथ लग गया है। पड़ौसी देशों में राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना को भड़काना हो तो उनका सबसे सुगम हथियार है- भारत-विरोध ! भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ-साफ कहा है कि कोरोना-संकट का समय टलते ही इस सीमा-विवाद का हल वह बातचीत के द्वारा करना चाहता है लेकिन भारतीय सेनाध्यक्ष नर्वणे के बयान को जमकर उछाला जा रहा है। कहा जा रहा है कि भारतीय सेना में लगभग 60 हजार नेपाली गोरखा जवान हैं। उन पर नर्वणे के बयान का क्या असर होगा ? मेरी राय यह है कि नर्वणे वैसा बयान नहीं देते तो अच्छा होता। नेपाल की कई पार्टियों के नेताओं से फोन पर मेरी बात हुई। वे अपनी जनता के सामने जो चाहें, सो बोलें लेकिन सबकी राय यह है कि इस मामले को तूल नहीं दिया जाना चाहिए। मैं कहता हूं कि कोरोना के खत्म होने का इंतजार क्यों किया जाए ? दोनों देश तुरंत बात क्यों नहीं शुरु करें। नेपाल की पूर्व उप-प्रधानमंत्री सुजाता कोइराला ने एक काफी व्यावहारिक सुझाव दिया है। उन्होंने मुझे बताया कि नेपाल-बांग्लादेश सीमांत पर भारत का जो फुलबाड़ी क्षेत्र है (18 किमी), यदि भारत उसे नेपाल को लीज़ पर दे दे तो बंगाल की खाड़ी तक पहुंचने में जमीन से घिरे नेपाल को अत्यधिक सुविधा हो जाएगी और उस कालापानी क्षेत्र को भारत नेपाल से लीज पर ले ले तो सारा मामला हल हो जाएगा। मेरा तो कहना यह है कि नेपाल को यदि हम भाई-देश मानते हैं तो 35 किमी जमीन, जो अब तक हमारी ही है, हम अपने पास रखें और उसके बदले में किसी भी सीमांत पर उससे दुगुनी जमीन उसे भेंट कर दें। इसके अलावा भी कई व्यवहारिक हल हो सकते हैं लेकिन उन्हें जल्दी से जल्दी निकाला जाना चाहिए।

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समाज क्या कोरोना महामारी में भी होगा गरीबों के साथ भेदभाव

क्या कोरोना महामारी में भी होगा गरीबों के साथ भेदभाव

           कोरोना एक वैश्विक महामारी है। यह सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व इसकी चपेट में है। लगभग 2 लाख से अधिक लोगों…

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