मीडिया लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता बेहद जरूरी

लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता बेहद जरूरी

3 मई अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेषदीपक कुमार त्यागी देश के मशहूर शायर “अकबर इलाहाबादी” जी ने प्रेस की ताकत के बारे में एक…

Read more
राजनीति ऐ हिन्द के मुसलमानों

ऐ हिन्द के मुसलमानों

तनवीर जाफ़री  इस समय भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कोरोना महामारी को लेकर स्थितियां असामान्य बनी हुई हैं। परन्तु हमारे देश में कोरोना…

Read more
व्यंग्य मंदिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला

मंदिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला

“मंदिर मस्जिद बैर कराती मेल कराती मधुशाला’’| जी हाँ ! यह बात श्री हरिवंश राय बच्चन जी ने बहुत समय पहले ही अपनी मधुशाला मे लिख…

Read more
विश्ववार्ता वर्ण व्यवस्था, योग साधना व विश्व प्रबंधन!

वर्ण व्यवस्था, योग साधना व विश्व प्रबंधन!

यदि हम अष्टांग या राजाधिराज योग का पालनकरें और आध्यात्मिक साधना करें तो कर्म काण्ड कीआवश्यकता नहीं पड़ेगी। जो जीवन गुण-धर्म तब हम अपनाएँगे वह सहज, सामयिक, ज्ञान विज्ञान युक्त वतर्क संगत होंगे। कुछ नया होने लगेगा या जो सही हो रहा था वह युक्ति पूर्ण लगने लगेगा!  तब हम वर्ण व्यवस्था के व्यूह से निकल ध्यान कर ‘द्विज’(द्वितीय या पुन: जन्मे) अवस्था में आजाएँगे। समाधिसे परे जाकर हम ‘सद्विप्र’ (सद्+विप्र = सच्चे विशुद्ध प्रिय= आध्यात्मिक व्यक्ति) बन जाएँगे।  तब ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय व शूद्र एवं समस्त विश्व वासी मानव, जीव जन्तु व वनस्पति ही नहीं पंचभूत भी हमेंअनायास गद् गद् हो विशुद्ध स्नेह करने लगेंगे और हम उन्हें!  उस मनःस्थिति में पहुँच हम अपनी तथा-कथित स्वनिर्मित सीमाओं से परे जाकर समस्त मानव व भूमा समाजको अन्त: करण से प्रेम करपाएँगे और तत्क्षण उनका भी भरपूर सहयोग व समर्पण हम अपने इन्हीं चक्षुओं सेदेख व चख सकेंगे! ज़रूरत है अपने चित्त को साध दृष्टि भाव ब्रहत्, महत व ब्रह्म-भाव वत कर लेने की!  वर्ण व्यवस्था से प्रत्येक वर्ण पीड़ित व शोषित है। पर यह सब संघर्ष हमारे अपने मन की जड़ताया मोहावस्थाके कारण ही है। यदि हम योग, तंत्र व समाधि से ऊपर की अपनी ईश्वरीय अवस्थाओं में पहुँच जाएँगे तो हमेंसृष्टि प्रबंधन का अधिकार व उत्तरदायित्व मिल जाएगा। तब हमारी सारी सोच, झेंप, झिझक, शिकायत यादोषारोपण की प्रवृत्ति अथवा अकड़, अहंकार व पर-पीड़न की वृत्ति  हमारे मन में में ठहर नहीं पाएगी।  तब सब व्यक्ति, वर्ण व व्यवस्थाएँ और उनकी अवस्थाएँ व सीमाएँ हमें व्यथित व आहत नहीं करेंगी! हम उनकीसेवा व सहभागिता करने दौड़ पड़ेंगे। तब उनके लड़खड़ाते चरण हम कृष्ण बन उन्हें सुदामा-सरिस मित्र समझचूमना चाहेंगे!  मानव व जीव समाज के विकसित, व्यवस्थित व तरंगित होने में लाखों वर्ष लग गए हैं! उनके इतिहास का एकएक पल यद्यपि उल्लेखनीय, गौरवपूर्ण व संग्रहण योग्य है पर उस इतिहास की पीड़ा, क्रीड़ा व संवेदना मेंसबको सब समय उलझना उचित नहीं होगा! उससे सीख समझ कर आगे बढ़ हमें अपना इतिहास बनाना उचितव उपयोगी होगा!  हमारे साथ जो अच्छा हुआ उसे याद रखें। जो कोई अज्ञान वश या संकुचित भाव वश कुछ समुचित नहीं करपाए, उन्हें अपने ईश्वरीय भाव सेक्षमा करते हुए आगे बढ़ जाएँ। सम्भव है अब वभी वैसे नहीं रहे जैसे पहले थे! हम भी तो प्रति पल बदल रहे हैं। अब हम अपने उत्क्रष्ट भाव से उन्हें आध्यात्मिक भाव तरंग दे बदल भी सकतेहैं! आवश्यक हो तो परम पुरुष से ध्यान में शिकवे शिकायत भी कर सकते हैं!  जब हम सद्विप्र होगए तो उनके भी वरेण्य  होगएऔर वे भी हमें पूज्य भाव से देखने लगे! तब द्वैतव द्वेष कहाँरहा!  वस्तुतः यह परिवर्तन, परिमार्जन व परिष्कार हमारे अन्त:करण में हुआ या होना है और जगत (जोहमारे आसपास चल रहा है या परिलक्षित है) हमारी छाया मात्र है! जैसे हम होंगे वैसा ही जग हमारे इर्द गिर्द निर्मितहोगा। हम बदल जाएँ तो वह भी वैसा नहीं रहेगा!  हमारा मन छोटा है तो हमारा सोच, विचार, परिकल्पना, धारणा, योजना, कार्य प्रणाली, व्यवहार, आकाँक्षा, अभिलाषा, अपेक्षा, आदि सब क्षत विक्षत, दीन हीन, संकीर्ण व सीमित हैं!  यदि आत्म ईश्वरीय स्वरूप इख़्तियार कर ले तोसारा विश्व उसके आधीन हो कार्य करने लगता है! पर तब हमअपने ब्रह्माण्ड के हर पिण्ड व अण्ड की सेवा करने, सृष्टि प्रबंधन करने व सब कुछ अर्पण समर्पण कर अपनेपूरे मनोयोग व आत्म- योग से युक्त जहाँ कहीं हैं वहीं से ओत प्रोत योग में समाहित हुए व्यस्त हो जाते हैं!  यह मात्र सिद्धान्त या दर्शन की बात नहीं है। प्रयोगात्मक सार्वभौमिक सत्य है। अनन्त ईश्वरीयसत्ता से संभूतप्राण हर काल, हर देश में, हर पात्र के साथ विश्व रंगमंच पर लीला करते रहे हैं, कर रहे हैं व करते रहेंगे! आवश्यकता है उन्हें समझने की, उनके जैसे बनने व उनसे भी बेहतर कार्य करने की!  बस छोटा सा काम करना है, योग साधना  व ध्यान सीख उसका अभ्यास करना है! इसके लिए मात्र मानव देहहोना पर्याप्त है और कुछ नहीं चाहिए! वैसे अन्य प्राणी भी साधना करते हैं पर मनुज रूप में यह करना ज़्यादाआसान है। हम अपना मन बनायें तो दीक्षा देने वाले स्वयं आ जाएँगे! तो बात बस अपना मन बनाने की है। शेषसब हो जाएगा!  वे हर घड़ी अपनी विश्व व्यवस्था हमारे हाथ में थमा हमें निदेशक,  व्यवस्थापक, प्रबंधक, परिचालक, इत्यादिपदों पर प्रतिष्ठित व सुशोभित करना चाहते हैं! हम सबका सदा स्वागत है!  ✍? गोपाल बघेल ‘मधु’ 

Read more
धर्म-अध्यात्म अचल व शान्त आत्मा में परमात्मा समाहित व प्रकाशित रहता है

अचल व शान्त आत्मा में परमात्मा समाहित व प्रकाशित रहता है

–मनमोहन कुमार आर्य                ईश्वर सृष्टिकर्ता है और वह जीवात्माओं कोके कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म देकर सुख व दुःख का भोग कराता है। मनुष्य…

Read more
विश्ववार्ता कोरोना के दौरान राक्षसी आतंक

कोरोना के दौरान राक्षसी आतंक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक कोरोना महामारी से सारी दुनिया के साथ-साथ भारत और पाकिस्तान भी, दोनों ही परेशान हैं लेकिन इस भयंकर संकट के दौरान कश्मीर…

Read more
राजनीति जब गांधी जी को सरदार भगतसिंह और उनके साथियों ने कहा था ‘कायर’ , भाग — 1

जब गांधी जी को सरदार भगतसिंह और उनके साथियों ने कहा था ‘कायर’ , भाग — 1

26 जनवरी 1930 ई0 का दिन कांग्रेस के इतिहास में एक ऐतिहासिक दिन के रूप में अंकित है । क्योंकि इसी दिन पंजाब में रावी…

Read more
राजनीति प्रतिकूल परिस्थितियों में रोशनी बनता भारत

प्रतिकूल परिस्थितियों में रोशनी बनता भारत

-ललित गर्ग – कोरोना महामारी एवं महासंकट से एक बार फिर साबित हुआ कि जो इन खराब हालात में धैर्य, संयम और खुदी को बुलंद…

Read more
राजनीति गौरवशाली इतिहास हमारा : सोमनाथ के मंदिर के विध्वंस का ले लिया गया था साथ के साथ ही प्रतिशोध

गौरवशाली इतिहास हमारा : सोमनाथ के मंदिर के विध्वंस का ले लिया गया था साथ के साथ ही प्रतिशोध

महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ के मंदिर को तोड़े जाने की घटना 1026 ईस्वी की है । इसके बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि…

Read more
राजनीति कोरोना का चमत्कार तब्लीगी हुए बेनकाब

कोरोना का चमत्कार तब्लीगी हुए बेनकाब

इतिहास में ऐसी अनेक घटनाएं मिलती हैं जिनसे यह ज्ञात होता रहा हैं कि बुराईयों में भी अच्छाईयां छिपी होती हैं।आज भारत सहित विश्व के…

Read more
आर्थिकी मनरेगा के दुर्दशा का जिम्मेदार कौन ?

मनरेगा के दुर्दशा का जिम्मेदार कौन ?

डाँ०अजय पाण्डेय महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा ) 2005 मे एक विधान के रूप मे लागू किया गया इस योजना के अन्तर्गत…

Read more
कविता क्यो होता है श्रमिको का शोषण ?

क्यो होता है श्रमिको का शोषण ?

क्यो होता है श्रमिको का शोषण ?क्यो नहीं मिलता उनको पूरा पोषण ? सारे दिन रात करते वे मजदूरी |फिर भी न मिलती पूरी मजदूरी…

Read more