जातिवाद

“आर्यसमाज ने देशवासियों में स्वाभिमान जगाया है : आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ”

मनमोहन कुमार आर्य,  वैदिक साधन आश्रम तपोवन-देहरादून के शरदुत्सव के तीसरे दिन की रात्रि सभा

 जातिवाद पे सब बलिहारी   

– जी हां। और प्रतिभा पाटिल के बारे में तो एक कांग्रेसी नेता ने ही कहा था कि उनके हाथ की बनी चाय इंदिरा जी को बहुत पसंद थी। इसलिए वे प्रायः प्रधानमंत्री भवन पहुंच जाती थीं। इसके पुरस्कारस्वरूप ही उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया। ये बात दूसरी है कि इतना कहने पर ही उसे कांग्रेस से बर्खास्त कर दिया गया। सुना तो ये भी गया है कि अवकाश प्राप्ति के बाद वे राष्ट्रपति भवन से काफी कुछ बटोर कर ले गयीं, जिसे फिर उंगली टेढ़ी करने पर ही वापस भेजा।

वोट के नाम पर धर्म और जाति के उलझे धागे

सभी राजनीतिक दल भले ही जातिवाद एवं धार्मिक राजनीति के खिलाफ बयानबाजी करते रहें, लेकिन चुनावी तैयारी जाति एवं धर्म के कार्ड को आधार बनाने के अलावा कोई रास्ता उन्हें दिखाई ही नहीं देता है। सच यह भी है कि यदि कोई भी दल परोक्ष रूप से जातिगत निर्णयों से बचना चाहे तो भी वह कुछ जातियों को नजरंदाज करने के आरोप से बच नहीं सकते, जैसे भाजपा में केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर यह कहा गया कि वहां पिछड़ी जातियों को आकर्षित करने के लिये यह कदम उठाया गया है और कांग्रेस द्वारा शीला दीक्षित को चुनावी चेहरा बनाने पर पार्टी के ऊपर ब्राह्मणों को रिझाने का आरोप लगा।