मुस्लिम तुष्टिकरण

भारत-इजराइल : धरती से स्वर्ग तक अटूट संबंध

मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के वशीभूत इंदिरा गाँधी ने इजराइल के सबसे बड़े शत्रु फिलिस्तीन को सबसे पहले मान्यता दी और उसके “फिलिस्तीन मुक्ति संगठन” के अध्यक्ष यासिर अराफात को करोड़ों रुपये का ‘नेहरु शांति पुरस्कार’ 1980 में दिया था । इसके बाद राजीव गाँधी ने भी अपने कार्यकाल में उसको ‘इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार’ दिया था।जब के समाचारो से ज्ञात हुआ था कि राजीव गाँधी ने तो उसको पूरे विश्व में घूमने के लिए एक बोईंग 747 विमान भी उपहार में दिया था। मुस्लिम परस्ती भारत के नेताओं में उस समय इतनी अधिक छायी हुई थी कि  यासिर अराफात को छींक भी आती थी तब वो भागकर दिल्ली चला आता था और हमारे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा और राजीव गांधी आदि उसके लिए पलकें बिछाए रहते थे।

मुसलमानों का सशक्तिकरण क्यों ?

यह भी समझना होगा कि कुल मुसलमानों की संख्या की तुलना में भी हिंदुओं की संख्या अधिक है जो पिछड़ी हुई है और संसाधनों की कमियों को झेल रही है।सुरेश तेंदुलकर समिति की संभवतः 2012-13 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 37.2 % भाग गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे रहता है। अतः इसके अनुसार बीपीएल के नीचे रहने वाले हिंदुओं की संख्या उस समय लगभग 35-36 करोड़ थी जोकि अधिकांशतः ग्रामीण क्षेत्रो व नगरों में झुग्गी – झोपड़ियों में रहने को विवश है।

मुस्लिम तुष्टिकरण के बिना भी बड़ी जीत

पा, बसपा और कांग्रेस ने जिस तादात में मुस्लिमों को टिकट दिए और संप्रदाय व जतीयता को उभारने के प्रयत्न किए, उसके चलते मायावती से जहां उसका परंपरागत जाटव वोट छिटका, वहीं सपा से यादव छिटक गए। मुलायम कुनबे की लड़ाई ने भी इस क्षरण में इजाफा करने का काम किया। कांग्रेस का राहुल गांधी के नेतृत्व में जिस तरह से जनाधार सिमट रहा है, उससे साफ है कि वंशवादी राजनीतिक परंपरा से जनता अब छुटकारा चाहती है। देश की 58 प्रतिशत आबादी और 25 फीसदी जीडीपी वाले 14 राज्यों में भाजपा की सरकारें बन जाना इसका प्रमाण है।