कहानी लाल रेखा के उस पार July 13, 2026 / July 13, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment अपनी पहचान को परिवार, रिश्तेदारों और समाज की कठोर निगाहों से बचाते हुए उसने जीवन बिताया था। उसके दिनों में सामान्यता थी, पर उसकी रातें अक्सर अपने ही अस्तित्व के प्रश्नों से भरी रहती थीं। Read more » लाल रेखा के उस पार
कहानी एक घर की दास्तान- अंधी बूढ़ी मॉ फुल्लो का दर्द और अंधा समाज July 10, 2026 / July 10, 2026 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment दाड़ी पर एक फेफर का बड़ा पेड़ और एक बरगद का पेड़ था जिनके नीचे बनी मढि़या में नगरा बाबा, खूबतबाबा, लालमन बाबा और ग्वाल बाबा को पत्थर की पिण्डियों के रूप में पूजते थे। Read more » अंधी बूढ़ी मॉ फुल्लो का दर्द
कहानी जीवनदान June 23, 2026 / June 23, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment आज उसे स्वस्थ देखकर तुषार बहुत प्रसन्न हुआ। गार्ड भैया ने बताया- यह कुछ दिन बाद ही यहाँ लौट आया था। ऐसा लगता था जैसे तुम्हें खोज रहा हो। Read more » जीवनदान
कहानी आज़ादी के साल पचहत्तर April 27, 2026 / April 27, 2026 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment पात्र -बच्चे —- १-सूरज -आयु १५ वर्ष २- चंदा-आयु ११ वर्ष ३-रहमान-आयु १६ वर्ष ४-और सलमा-आयु १३ वर्ष […] Read more » आज़ादी के साल पचहत्तर
कहानी अधूरी इच्छाओं का घर April 1, 2026 / April 1, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment रागिनी मिश्रा सिमरन को हमेशा लगता था कि जीवन एक नदी की तरह है, कभी शान्त तो कभी उफनता हुआ। उसका अपना जीवन भी इसी तरह उतार-चढ़ाव से भरा था। वह अपने पति आदित्य से गहरा प्रेम करती थी और आदित्य भी उससे स्नेह करता था, फिर भी उनके रिश्ते में कभी-कभी ऐसे क्षण आ […] Read more » अधूरी इच्छाओं का घर
कहानी बड़ी भूल February 17, 2026 / February 17, 2026 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव अपनी सारी जमीन-जायदाद की रजिस्ट्री अपने मौसेरे भाई रामनिवास के नाबालिग बेटों के नाम कराके भोला दादा गांव लौटे तब बुजुर्ग दीनदयाल ने भोला का भविष्य बांचते हुए कहा,”भोला ने अपने हाथों,अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।अब जाके दुर्दिन दूर नहीं!” दीनदयाल ने आपनी पूरी जिंदगी संघर्ष और कठोर […] Read more »
कहानी कहाँ लौटती हैं स्त्रियाँ? July 21, 2025 / July 25, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment कामकाजी स्त्रियाँ सिर्फ ऑफिस से नहीं लौटतीं, बल्कि हर रोज़ एक भूमिका से दूसरी में प्रवेश करती हैं—कर्मचारी से माँ, पत्नी, बहू, बेटी तक। यह कहानी अनुपमा की है, जो बाहर की तेज़ दुनिया और घर की नर्म ज़िम्मेदारियों के बीच अपनी पहचान तलाशती है। उसकी मुस्कान में थकान है, पर शिकायत नहीं। वह सबके […] Read more » Where do the women return to? कहाँ लौटती हैं स्त्रियाँ
कहानी शिक्षक या सेल्समैन? July 7, 2025 / July 7, 2025 by आलोक कौशिक | Leave a Comment यह कहानी है अविनाश सर की—एक ईमानदार, आदर्शवादी और प्रतिभाशाली शिक्षक की, जो शिक्षा को अपने जीवन का धर्म समझते हैं और विद्यालय को मंदिर। लेकिन जब उनका सामना एक ऐसे विद्यालय से होता है, जिसका संचालन एक पूर्व अपराधी-राजनेता द्वारा किया जा रहा होता है, तो उन्हें अपने आदर्शों और व्यवहारिक यथार्थ के बीच […] Read more » Teacher or salesman?
कहानी मेहमान April 28, 2025 / April 28, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment पाँच की मैगी साठ में खरीदी,सौदा भी कोई सौदा था?खच्चर की पीठ पे दो हज़ार फेंके,इंसानियत भी कोई इरादा था? बीस के पराठे पर दो सौ हँस कर,पचास टिप फोटो वाले को,हाउस बोट के पानी में बहा दिएहज़ारों अपने भूखे प्याले को। नकली केसर की खुशबू मेंअपनी सच्चाई गँवा बैठे,सिन्थेटिक शाल के झूठे रेशों मेंअपने […] Read more » मेहमान
कहानी साहित्य छूत January 7, 2025 / January 7, 2025 by डॉ० शिबन कृष्ण रैणा | Leave a Comment डाक्टर के चले जाने के बाद आइशा ने एक लम्बा निःश्वास छोड़ा। वह उठी और इसी के साथ उसके टखने भी किट-किट बज उठे । उदास नज़रों से बाकी रोगियों को ताकती वह डिस्पेन्सरी से धीरे-धीरे निकलने को हुई । डाक्टर की यह बात, “बेटी, तुझे हिम्मत रखनी चाहिए, क्षयरोग में प्रायः हर रोगी ऐसी ही खुदकुशी […] Read more » छूत
कहानी गिरहकट December 9, 2024 / December 9, 2024 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment पन्ना, मैक, लंबू,हीरा, छोटू इनके असली नाम नहीं थे लेकिन दुनिया अब इसे ही इनका असली नाम मानती थी। मंगल प्रसाद गुप्ता ही पन्ना था, मथुरादास पांडे मैक बन चुका था। लंबू का असली नाम खलील अहमद था। अब का हीरा कभी हरजिंदर हुआ करता था और आफताब को सब छोटू के नाम से जानते […] Read more »
कहानी नानक दुखिया सब संसार August 7, 2024 / August 7, 2024 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment शहर की झोपड़पट्टी माने वाले इलाके का नाम इंद्र पुरी था । अपने नाम के उलट मुर्गी के दड़बों की तरह बेतरतीब बसी हुई इंद्रपुरी झोपड़पट्टी की एक झोपड़ी से निब्बर रोजगार पर जाने के लिये बाहर निकला। दरवाजे के पास एक लोहे के मजबूत पाए से बंधे जंजीर का ताला खोलकर उसने रिक्शा निकाला […] Read more »