लेख आज भी ग्वाल समाज में सवा रूपये के नेग से होती है सगाई January 23, 2020 / January 23, 2020 | Leave a Comment हमारी परम्परायें समाज में लौकिक आचरण का बड़ा महत्व है और वैदिक आचरण से इसका तानाबाना जोड़कर लोकाचारों को पूरा किया जाता है। भारत में हजारों साल से यादवों का वर्चस्व रहा है जिसमें कई शताब्दियों से यादव समाज की एक शाखा ग्वालवंश आज भी वैवाहिक बंधन में बंधने से पूर्व युवक-युवतियों के गुणों का […] Read more » ग्वाल समाज
लेख काव्यों में ब्रज की होली है-प्रेम और सौन्दर्य का दिव्यधाम January 22, 2020 / January 22, 2020 | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव Read more » ब्रज की होली
लेख जब गौमाता की रक्षा के लिये नामधारी सिख फाॅसी पर झूले January 22, 2020 / January 22, 2020 | Leave a Comment लेख-आत्माराम यादव पीव जिस समय सुनाई गयी थी उसी दिन श्री भैणी साहब श्रीसतगुरू रामसिंह जी के सत्संग भवन में सत्संग चल रहा था। उस सत्संग में वे सभी नामधारी सिख मौजूद थे जो अमृतसर में कसाईयां की हत्या करके आये थे। श्री सतगुरूजी को यह पता चल गया था कि कसाईयों के हत्यारे वे […] Read more » When the Namdhari swings on the Sasi Fasi to protect Gaumata गौवध पूर्णतया प्रतिबन्धित
लेख बच्चों में कौतूहल भरने वाली लोक कहावतें और खेल कहां खो गये ? January 20, 2020 / January 20, 2020 | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव बच्चों में मेघनाशक्ति का अद्भुत संचार करने वाली किस्से कहानियाँ, कहावतों का एक दौर गुजरे मुश्किल से तीन दशक बीते हैं। इतिहास गवाह है कि दादी और नानी जब अपने नौनिहाल को शाम को भोजन के बाद बिस्तर में लेकर लेटती थी तब विश्वास,आश्चर्य और समाधानकारक बाल मनोवृत्ति […] Read more » Where are the folk proverbs and games that mislead children?
ज्योतिष ज्योतिषशास्त्र में राधा-कृष्ण का अवलम्बन January 16, 2020 / January 16, 2020 | Leave a Comment लेख – आत्माराम यादव पीव बृषभानु नंदिनी राधा सम्पूर्ण ब्रजमण्डल की अधीश्वरी और श्रीकृष्ण की नित्य और आल्हादिनी-संगिनी है।श्रीकृष्ण स्वयं राधाजी की आराधना करते है तभी भक्त राधाभक्ति के बाद श्रीकृष्ण पूजा का अधिकार पाते है। देवी भागवत में ’’श्री राधायै स्वाहा’’ का षडक्षर मंत्र राधा जी की कृपा पाने के लिये उपासकों […] Read more » राधा-कृष्ण का अवलम्बन
कविता यह खूनी सड़क January 16, 2020 / January 16, 2020 | Leave a Comment मेरे शहर की यह शांतचित्त सड़क कभी बहुत खिलखिलाया करती थी बचपन में इसके तन पर हम खेला करते थे गिल्लीडंडा तब कभी कभार दिन में दो-चार बसें और इक्का-दुक्का वाहन भोंपू बजाकर सड़क से गुजर जाते थे। पूरे शहर के हर मोहल्ले के बच्चे इस सड़क पर इकटठा होते और कोई गिल्लीडंडा खेलता तो […] Read more » गिल्लीडंडा
कविता सीख देती चीटियाॅ January 16, 2020 / January 16, 2020 | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव कभी चीटियों को देखों मुॅह मिलाकर प्रेम करती है अंजान चीटी से पहचानकर नेह का यह मिलाप असीम अपनत्व का इजहार है वे मुॅह मिलाकर एक दूसरे को आभार व्यक्त करने के साथ नमस्कार करती है। कभी चीटी जैसे किसी जीव का ओढ़ना-बिछाना, चैका-चूल्हा थाली बघौनी देखी है किस रंग के होते […] Read more » सीख देती चीटियाॅ
लेख राम से मित्रता के बाद सुग्रीव को भय ओर संदेहों से मिली मुक्ति January 15, 2020 / January 15, 2020 | Leave a Comment (2) सुग्रीव के जीवन मे झाँका जाये तो वह एक विषयी जीव रहा है जिसका आत्मविश्वास कभी भी खुद पर नही रहा ओर संदेहो से भरा होने पर वह इतना आतुर रहा जिसमे किसी भी कार्य के परिणाम जाने बिना स्वंम निर्णय लेकर समस्याओ ओर परिस्थियों से वह भाग खड़ा होता था । […] Read more » सुग्रीव सुग्रीव को भय ओर संदेहों से मिली मुक्ति
कविता खानावदोश झुग्गिया January 14, 2020 / January 15, 2020 | Leave a Comment भारत के हर शहर में होती है अछूत झुग्गियाॅ बसाहट से दूर किसी भी सड़क के किनारे खास मौके पर चार खूटियों और तिरपाल से तन जाती है दर्जनों झुग्गियाॅ। ये वे अछूत झुग्गियाॅ है जिनमें रहने वाले गरीब दो वक्त की रोटी कमाने हर शहर की गली-कूंचे में घरों-महलों की सजावट का सामान बेचते […] Read more » खानावदोश झुग्गिया
कविता बुढ़ापे पर सवार अजगर January 14, 2020 / January 15, 2020 | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव बड़ी मासूमियत से बुजुर्ग पिता ने कहा- बेटा] बुढ़ापा अजगर सा आकर मेरे बुढ़ापे पर सवार हो गया है जिसने जकड़ रखे है मेरे हाथ पैर न चलने देता है न उठने-बैठने देता है। बेटा, मेरे बाद तेरी माँ को अपने ही पास रखना। पिता के चेहरे पर पॅसरी हुई थी उदासी […] Read more » बुढ़ापे पर सवार अजगर
कविता सोफे का दर्द January 14, 2020 / January 20, 2020 | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव मैं अपने सोफे पर बैठा मोबाईल में डूबा हुआ था और ढूंढ रहा था पसंद की रिंगटोन चिड़ियों की चहकने-फुदकने कोयल-बुलबुल की बोलियाॅ गिलहरियों सहित अनेक कर्णप्रिय आवाजें मुझे जंगल के खग-मृग का मधुर कलरव सा आनंद दे रही थी। अचानक मेरी तंद्रा टूटी जैसे लगा कि मेरा सोफा मुझसे कुछ बातें […] Read more » सोफे का दर्द
कविता कहाँ गये भवानीप्रसाद मिश्र के ऊँघते अनमने जंगल January 14, 2020 / January 14, 2020 | Leave a Comment भवानीप्रसाद मिश्र ने देखे थे सतपुड़ा के घने जंगल नींद में डूबे हुये मिले थे वे उॅघते अनमने जंगल। झाड़ ऊॅचे और नीचे जो खड़े थे अपनी आंखे मींचे जंगल का निराला जीवन मिश्रजी ने शब्दो में उलींचें। मिश्र की अमर कविता बनी सतपुड़ा के घने जंगल आज ढूंढे नहीं मिलते सतपुड़ा की गोद में […] Read more » ऊँघते अनमने जंगल