कविता हर हुस्न का जो जश्न था April 12, 2015 / April 12, 2015 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment हर हुस्न का जो जश्न था, एक रोशनी में ढ़ल गया; हर अहं का जो बहम था, परमात्म में मिल घुल गया । बिन बात के जीवन तरी, थी उछलती नदिया रही; सब कुछ गँवा उसमें समा, वह समुन्दर समगे रही । हर अंग की जो थी उमंग, बस चन्द रातों की रही; अनुराग की […] Read more » Featured हर हुस्न का जो जश्न था
कविता सहज April 10, 2015 / April 11, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment सहज शब्द सरल नही है ,सहने की मजबूरी है जिस तरह प्रसव पीडा में ,पीडा सहना जरूरी है साथ में जन्म लेने वाला भी ,सहज कहलाता है जोकि ज का अर्थ जन्म ,लेने वाला हो जाता है सहज में ह को निकाले ,दुनिया जो सज जाती है वही ह फिर स को जोडे ,मधुरता मुस्काती […] Read more » Featured सहज सुनील एक्सरे
कविता तुम्हारी आँखें April 1, 2015 / April 4, 2015 by अनुप्रिया अंशुमान | Leave a Comment —-अनुप्रिया अंशुमान मोहब्बत की दुनिया है तुम्हारी आँखें, चमकता हुआ सितारा है तुम्हारी आँखें । तुम्हारे ही दम से है मेरा ये नसीब, मेरी पहचान है ये तुम्हारी आँखें ॥ आँखें बोलती है तुम्हारे दिल की धड़कन, दिल की धडकनों की आवाज़ है तुम्हारी आँखें । आँखों से बरसता है जहाँ हल्का सा नशा ॥ […] Read more » Featured चमकता हुआ सितारा है तुम्हारी आँखें । तुम्हारे ही दम से है मेरा ये नसीब तुम्हारी आँखें मेरी पहचान है ये तुम्हारी आँखें ॥ मोहब्बत की दुनिया है तुम्हारी आँखें
कविता विवशता April 1, 2015 / April 4, 2015 by लक्ष्मी अग्रवाल | Leave a Comment माफ कर देना मुझे गर हो सके तो क्योंकि मेरी लाडो ये दुनिया नहीं है तेरे लिए यहां पग-पग तेरी राहों पर बिछे होंगे कांटे तेरे पैदा होते ही शुरू हो जाएगा चारों ओर मातम। जैसे-जैसे बड़ी होगी तू मेरी रानी शुरू हो जाएगी तेरे जीवन में परेशानी समाज नहीं देगा हक तुझे कोई गर […] Read more » Featured mother's problem लक्ष्मी जायसवाल अग्रवाल विवशता
कविता आख़िर खुदकुशी करते हैं क्यों ? March 30, 2015 / April 4, 2015 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment आख़िर खुदकुशी करते हैं क्यों ? जिंदगी जीने से डरते हैं क्यों ? फंदे पर लटककर झूले जीवन है अनमोल ये भूले। अपनों को देकर तो आंसू, छोड़ दिए दुनिया में अकेले। कभी ट्रेन के आगे आना, कभी ज़हर को लेकर खाना। कभी मॉल से छलांग लगा दी, देते हैं वो खुद को आज़ादी। इस […] Read more » Featured no suicide why i quit why to quit आख़िर खुदकुशी करते हैं क्यों ? रवि श्रीवास्तव
कविता मृगनयनी March 30, 2015 / April 4, 2015 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment “मृगनयनी तू किधर से आई, काली मावस रातों में, क्यों उलझाती मेरे मन को, प्यार की झूठी बातों में।।“ रंग-रूप आंदोलित करता हलचल होती कुछ मन में, उसके स्पर्शन का जादू कम्पन भर जाता तन में, हार दिख रही प्रतिपल मुझको, उनकी तीखी घातों में, क्यों उलझाती मेरे मन को, प्यार की झूठी बातों में।। […] Read more » Featured कुलदीप प्रजापति मृगनयनी
कविता पीड़ा March 30, 2015 / April 4, 2015 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment कभी किट बन, कभी बीज बन आती हैं पीड़ा कभी बरसात बन के सीने पर करती हैं क्रीड़ा है प्रकृति तुमने ये कैसा तांडव मचा दिया तेरे अजब इस खेल ने जीवन तबाह किया था जो कुछ पास में सब कुछ तो हार बैठा हूँ क्यों सितम किया इतना मैं भी तो तेरा बेटा हूँ […] Read more » Featured कुलदीप प्रजापति पीड़ा
कविता फ़ुर्सत के दिन March 25, 2015 by बीनू भटनागर | Leave a Comment कुछ दिन लाये थे , फ़ुर्सत के ढूंढकर, दो सोचने मे लग गये, कंहा चलें क्या करें। कंही पहाड पर चढ़े, या किसी मंदिर की, सीढियां चढे, या समुद्र तट पर ही न क्यों चलें। ये भी नहीं तो निकट ही, रंगीले राजस्थान की तरफ़ चलें। पर ऐसा कुछ हो न सका, बीमारियों ने हमे […] Read more » फ़ुर्सत के दिन बीनू भटनागर
कविता धर्म-अध्यात्म नूतन नवल उमंग March 24, 2015 by हिमकर श्याम | 4 Comments on नूतन नवल उमंग [नव संवत्सर, सरहुल और रामनवमी पर दोहे] नव संवत्, नव चेतना, नूतन नवल उमंग। साल पुराना ले गया, हर दुख अपने संग।। चैत शुक्ल की प्रतिपदा, वासन्तिक नवरात। संवत्सर आया नया, बदलेंगे हालात।। जीवन में उत्कर्ष हो, जन-जन में हो हर्ष। शुभ मंगल सबका करे, भारतीय नव वर्ष।। ढाक-साल सब खिल […] Read more » चैत शुक्ल की प्रतिपदा नव संवत्सर नूतन नवल उमंग रामनवमी वासन्तिक नवरात
कविता उनकी तमन्ना March 24, 2015 by रवि श्रीवास्तव | 1 Comment on उनकी तमन्ना उन्होने तमन्नाओं को पूरा कर लिया, मुझे नही है उनसे कोई भी शिकवा। किसी के वादों से बधां मजबूर हूं, उन्हें लगता है शायद कमजोर हूं। बड़ो का आदर, छोटों का सम्मान सिखाया है, मेरे परिवार ने मुझे, ये सब बताया है। हर क्रिया की प्रतिक्रिया, हम भी दे सकते हैं, जान हथेली पर हमेशा […] Read more » उनकी तमन्ना कमजोर मजबूर
कविता मां भारती का जलगान March 23, 2015 by अरुण तिवारी | Leave a Comment जयति जय जय जल की जय हो जल ही जीवन प्राण है। यह देश भारत…. सागर से उठा तो मेघ हिमनद से चला नदि प्रवाह। फिर बूंद झरी, हर पात भरी सब संजो रहे मोती-मोती।। है लगे हजारों हाथ, यह देश भारत….. कहीं नौळा है, कहीं कहीं जाबो कूळम आपतानी। कहीं बंधा पोखर पाइन है […] Read more » अरुण तिवारी जलगान मां भारती का जलगान
कविता मातृभूमि का कर्ज़ अभी बाकी है March 23, 2015 by नरेश भारतीय | Leave a Comment नरेश भारतीय वह क्रांति का शंखनाद था अन्याय के अंत का उनका आह्वान था शोषणमुक्त समाज के निर्माण का सन्देश था बिना किसी प्रतिदान या इनाम की उम्मीद के मातृभूमि की मुक्ति का यह महासंकल्प था हँसते हंसते मृत्यु को जो गले लगाने चल पड़े उन शहीदों को नमन, शत शत नमन, शत […] Read more » poem on Bhagat Singh poem on bhagat singh in martyrs day poem on martrys day भगत सिंह के बलिदान दिवस पर राजगुरु के बलिदान दिवस पर सुखदेव के बलिदान दिवस पर