कविता केवल अमलतास September 19, 2014 by सुरेश हिन्दुस्थानी | Leave a Comment ऊँघते/ अनमने उदास झाड़ियों के बीच इठलाता अमलतास चिड़ाता जंगल को जंगल के पेड़ों को, जिनके झर गए पत्ते सारे लेकिन पीले पुष्प गुच्छों से आच्छादित अमलतास आज भी श्रंगारित है, उसे नाज है अपने रूप पर अपने फूलने पर, पर क्या – उसका यह श्रंगार स्थायी है/ नहीं शायद इस सनातन सत्य को भूल […] Read more » केवल अमलतास
कविता गुनगुनाती हवा September 19, 2014 by लक्ष्मी जायसवाल | 2 Comments on गुनगुनाती हवा ये गुनगुनाती हवा चुपके से जाने क्या कहकर चली जाती है। वक़्त हो चाहे कोई भी हर समय किसी का संदेशा दे जाती है। सुबह का सर्द मौसम और ठंडी हवा का झोंका किसी की याद दिला जाती है। दोपहर की तपती धूप और हवा की तल्खी दर्द की थपकी दे जाती है। शाम का […] Read more » गुनगुनाती हवा
कविता तीन कवितायें: पानी, खनन और नदी जोङ September 18, 2014 / September 18, 2014 by अरुण तिवारी | 1 Comment on तीन कवितायें: पानी, खनन और नदी जोङ अरुण तिवारी पानी हाय! समय ये कैसा आया, मोल बिका कुदरत का पानी। विज्ञान चन्द्रमा पर जा पहुंचा, धरा पे प्यासे पशु-नर-नारी। समय बेढंगा, अब तो चेतो, मार रहा क्यों पैर कुल्हाङी ? गर रुक न सकी, बारिश की बूंदें, रुक जायेगी जीवन नाङी। रीत गये गर कुंए-पोखर, सिकुङ गईं गर नदियां सारी। नहीं […] Read more » खनन नदी जोङ पानी
कविता बच्चों का पन्ना कविता : प्रतीक September 18, 2014 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा यह पेड़ है हम सबका पेड़ है। इसे मत छांटो इसे मत तोड़ो इसे मत काटो इसे मत उखाड़ो इसे फलने दो इसे फूलने दो इसे हंसने दो इसे गाने दो यह पेड़ है हम सबका पेड़ है। इसपर सबके घोसले हैं कौआ का है, मैना का है बोगला का […] Read more » प्रतीक
कविता व्यथा September 17, 2014 / September 17, 2014 by कुलदीप प्रजापति | 2 Comments on व्यथा कल-कल करती बहती नदियाँ हर पल मुझसे कहती हैं , तीर का पाने की चाहत मैं दिन रात सदा वह बहती हैं, कोई उन्हें पूछे यह जाकर जो हमसे नाराज बहुत , मैने सहा बिछुड़न का जो गम क्या इक पल भी सहती हैं | मयूरा की माधुर्य कूकन कानो मैं जब बजती […] Read more » व्यथा
कविता पीड़ा का पिंजरा September 12, 2014 by बीनू भटनागर | Leave a Comment पीड़ा के पिंजड़े की क़ैदी हूँ, पिंजड़े को तोडकर निकलना चाहती हूँ… पर सारी कोशिशें नाकाम हो रही हैं। जब भी ऐसा करने की कोशिश करती हूँ, पीड़ा बाँध लेती है, जकड़ लेती है। किस जुर्म की सज़ा मे क़ैद हूँ, नहीं पता…… कितने दिन के लिये क़ैद हूँ, ये भी नहीं पता… कुछ […] Read more » पीड़ा का पिंजरा
कविता तौहिनी लगाती है-कविता September 12, 2014 / September 12, 2014 by डॉ नन्द लाल भारती | Leave a Comment डॉ नन्द लाल भारती बोध के समंदर से जब तक था दूर सच लगता था सारा जहां अपना ही है बोध समंदर में डुबकी क्या लगी सारा भ्रम टूट गया पता चला पांव पसारने की इजाजत नहीं आदमी होकर आदमी नहीं क्योंकि जातिवाद के शिकंजे में कसा कटीली चहरदीवारी के पार झांकने तक की इजाजत […] Read more » कविता तौहिनी लगाती है
कविता कविता-जातिवाद का नरपिशाच September 11, 2014 / September 12, 2014 by डॉ नन्द लाल भारती | Leave a Comment डॉ नन्द लाल भारती मै कोई पत्थर नहीं रखना चाहता इस धरती पर दोबारा लौटने की आस जगाने के लिए तुम्ही बताओ यार योग्यता और कर्म-पूजा के समर्पण पर खंजर चले बेदर्द आदमी दोयम दर्ज का हो गया जहां क्यों लौटना चाहूंगा वहाँ रिसते जख्म के दर्द का ,जहर पीने के लिए ज़िन्दगी के हर […] Read more » जातिवाद का नरपिशाच
कविता जलियांवाला बाग September 10, 2014 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार “राघव” सोलह सौ पचास गोलियां चली हमारे सीने पर , पैरों में बेड़ी डाल बंदिशें लगीं हमारे जीने पर | रक्त पात करुणाक्रंदन बस चारों ओर यही था , पत्नी के कंधे लाश पति की जड़ चेतन में मातम था | इंक़लाब का ऊँचा स्वर इस पर भी यारों दबा नहीं , भारत […] Read more » जलियांवाला बाग
कविता अंधेरे रास्तों पर September 9, 2014 by लक्ष्मी जायसवाल | Leave a Comment जीवन में क्यों कोई राह नजर नहीं आती है ? हर राह पर क्यों नई परेशानी चली आती है ? जब जब चाहा भूल जाऊं अपनी उलझनों को तब तब एक और नई उलझन मिल जाती है। खुलकर जीना और हंसना मैं भी चाहती हूं पर ज़िन्दगी हर बार ही बेवजह रुला जाती है। पूछना […] Read more » अंधेरे रास्तों पर
कविता मैं ‘लड़की’ हूं September 6, 2014 by लक्ष्मी जायसवाल | Leave a Comment जकड़ी हूं बंधन में सदियों से अब मुझे मुक्ति चाहिए। बंधन खोल सके जो आज़ादी दे मुझे वो शक्ति अब चाहिए। उड़ना चाहती हूं स्वच्छंद गगन में ‘पर’ मुझे मेरे चाहिए। मैं लड़की हूं हां मैं लड़की हूं तो क्या हुआ जीना का हक़ मुझे भी चाहिए। अब न सहूंगी बंधन अब न उठाऊंगी रिवाजों की […] Read more » मैं 'लड़की' हूं
कविता सुबह या शाम ? September 5, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -मनु कंचन- अभी आँख खुली है मेरी, कुछ रंग दिखा आसमान पे, लाली है तो चारों ओर, पर पता नहीं दिन है किस मुकाम पे, दिशाओं से मैं वाक़िफ़ नहीं, ऐतबार करूँ तो कैसे मौसमों की पहचान पे, चहक तो रहे हैं पंछी, पर उनके लफ़्ज़ों का मतलब नहीं सिखाया, किसी ने पढ़ाई के नाम […] Read more » कविता सुबह या शाम ? हिन्दी कविता