कविता साहित्य जीवन संघर्ष June 29, 2013 by बीनू भटनागर | 4 Comments on जीवन संघर्ष वेदना के किसी क्षण में, कोई शुभ संदेश आये, अंधियारी रातों मे जैसे, जुगनू कोई चमक जाये। रात पूर्णिमा की हो या, हो अमावस का अंधेरा, दुख दर्द सब समेट लूँ, होने वाला है सवेरा। मुरझाई सी बगिया है , धूप की चकाचौंध से, रात होने से पहले ही, पानी डालूँ हर पौध में। सींच […] Read more » जीवन संघर्ष
कविता साहित्य ताजगी June 28, 2013 by मिलन सिन्हा | 2 Comments on ताजगी सुबह की ठंडी हवा दूर नदी में निरंतर बहती जलधारा आकाश में तैरते छोटे सफ़ेद -काले बादल उड़ते छोटे- बड़े पक्षी दूर तक फैली हरियाली झोला उठाए, कलरव करते बच्चों का पाठशाला जाना गाय- बकरियों का उनके साथ-साथ आसपास चलना युवा किसान का अपने चौड़े कंधे पर हल रखकर बैलों के पीछे-पीछे खेत की ओर […] Read more » ताजगी
कविता साहित्य कैसे कहूँ June 27, 2013 by लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार | Leave a Comment बड़ी मुश्किल से मौका मिला दिल को सुकून मिला बरसों की एक आज मुलाक़ात हुई दूर बैठे देखता रहा .. करीब इतना बैठा की मन नही भरा कुछ मन में कशिश रह गई तेरे होंठो को छूने की तडप रह गई मौसम ,कुछ खास था यांदो की जज्बात था तुम ,अकेली थी पर ,डर का […] Read more » कैसे कहूँ
कविता साहित्य एक अनाम के नाम June 27, 2013 by डा.राज सक्सेना | Leave a Comment रससिक्त छंद कुछ कविता के, कर रहा समर्पण प्रिय तुमको | चाहो, उर मे रख, दुलरा कर, संरक्षित कर लेना इनको | यूं तो तुम स्वंय अकल्पित हो, ऐसा प्रिय रूप, तुम्हारा है | लगता है स्वंय , विधाता ने, रच-रच कर तुम्हें संवारा है | है अंग सुगढ, हर सांचे सा, हर […] Read more » एक अनाम के नाम
कविता साहित्य सत्याग्रह का अस्त्र June 26, 2013 by मिलन सिन्हा | 2 Comments on सत्याग्रह का अस्त्र मौसम प्रतिकूल टूट गयी सड़कें बह गया पुल आम जनता है पस्त अधिकांश नेता – अधिकारी अपने में मस्त दिखने में सब भद्र पर सवाल वही कहाँ है पीड़ितों – गरीबों का सही हमदर्द बड़ा हादसा हो जाता है जब आते है अपनी सुविधा से सफेदपोश सारे जहाज और गाड़ियों में लदकर , लकदक सहानुभूति […] Read more » सत्याग्रह का अस्त्र
कविता साहित्य माँ सरस्वती June 25, 2013 by डा.राज सक्सेना | 1 Comment on माँ सरस्वती कण-कण तन का उज्ज्वल करदे | एक नवल तेज, अविकल करदे | माँ सरस्वती आ, कंठ समा, मन-मस्तक को अविरल करदे | वाणी में मधु की, धार बहा | हो सृजनशील, मस्तिष्क महा | हर शब्द बने, मानक जग में, हर रचना को, इतिहास बना | जन की जिव्हा पर, नाम चढ़े, […] Read more » माँ सरस्वती
कविता साहित्य कारनामा June 25, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment उसका किसी से कोई बैर नहीं जो उससे बैर करे उसकी फिर खैर नहीं जो भी करे वह उसमें कोई शोर नहीं पुलिस अगर तफ्तीश करे भी मिले कोई डोर नहीं सुबह देर तक सोता है रात में काम सब करता है बड़े गाड़ियों में घूमता है जब चाहे उड़ता है कपड़े सफ़ेद पहनता है […] Read more » कारनामा
कविता साहित्य नारी June 25, 2013 by कुमार विमल | Leave a Comment प्रभु की अनुपम कृति , अनुपम रचना,वह है नारी, सो जब रचा था प्रभु ने इस कृति को, सोचा सब अर्पण कर दूँ , इसकी खाली आँचल को खुशियों से भर दूँ । सो दिया उन्होंने रूप रंग,सोंदेर्ये , वह सामर्थ ओंर सहनशीलता वह अतुलनीय नारी शक्ति । प्रभु को गर्व हुआ अपनी इस कृति […] Read more » नारी
कविता कविता – शहर का आदमी June 24, 2013 / June 24, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment मैं कागज काला करता रहा कि पानी खतरे के निशान पार कर रहा है लोगों ने पढ़ा किसी के चेहरे लटक गये कोई तनावग्रस्त हो गया कोई ढूँढने लगा सर छुपाने की जगह कुछ ऐसे भी थे पढ़कर फेंक दिया कूड़ेदान में और सो गया पाँव पसारकर बड़े इत्मिनान के साथ । मैं बार-बार लिखता […] Read more » कविता - शहर का आदमी
कविता वृद्ध- कुमार विमल June 24, 2013 / June 24, 2013 by कुमार विमल | 1 Comment on वृद्ध- कुमार विमल वह गुमनाम सा अँधेरा था , और वहाँ वह वृद्ध पड़ा अकेला था , वह बेसहाय सा वृद्ध वह असहाय सा वृद्ध , वह लचार सा वृद्ध । आज चारो तरफ मला था , पर वह वृद्ध अकेला था , चारो तरफ यौवन की बहार थी , पर वहाँ वृद्धावस्था की पुकार थी , […] Read more » वृद्ध वृद्ध- कुमार विमल
कविता रक्स करतीं थालियां June 24, 2013 by डा.राज सक्सेना | Leave a Comment डा. राज सक्सेना पी सुरा को मस्त होकर, मस्त फिरतीं प्यालियां | बैंगनों के घर में गिंरवीं, रक्स करतीं थालियां | कौरवों की भीड़, आंखें बन्द कर चलती मिली, नग्नतम् सड़कों पे खुलकर, चल रहीं पांचालियां | एक अच्छी व्यंग्य कविता,को समझ पाए न लोग, एक हज़ल पर देर तक, बजती रही थीं तालियां | […] Read more » रक्स करतीं थालियां
कविता साहित्य कुत्तों को बिस्किट June 22, 2013 by डा.राज सक्सेना | 1 Comment on कुत्तों को बिस्किट खिलवाते कुत्तों को बिस्किट, लाखों भूखे सो जाते हैं | जनता के पैसे से नेता, जीवन भर मौज उड़ाते हैं | भारत में भूखे-नंगों को, दे नहीं पा रहे पानी तक , पाकिस्तानी जल प्लावन में, लाखों डालर दे आते हैं | घर अपना सिंगल कमरे का,सूनी आँखों का सपना है, मंत्री जी पच्चिस लाख […] Read more » कुत्तों को बिस्किट