व्यंग्य जा, तू टमाटर हो जा July 29, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment विजय कुमार बात उन दिनों की है, जब मैं चौथी-पांचवी कक्षा में पढ़ता था। तब टी.वी. भारत में आया नहीं था। रेडियो और टेलिफोन अति दुर्लभ और विलासिता की चीज मानी जाती थी। अखबार भी पूरे मोहल्ले में एक-दो लोग ही मंगाते थे। दोपहर में बुजुर्ग लोग अखबार पढ़ने के लिए उनके घर पहुंच जाते […] Read more » Featured टमाटर
कविता रफ का वो कापी July 29, 2017 by राकेश कुमार पटेल | Leave a Comment रफ का वो कापी थोडी फटी सी, थोडी पुरानी । किसी की यादें किसी की बातें थी उसमें कई कहानी रफ का वो कापी थोडी फटी सी ,थोडी पुरानी । किसी पन्ने पर चुटकुले लिखाते तो किसी पर कविता ,कहानी कहीं पर प्रेम को छुपाते तो कहीं गनित बनाते कई पन्नों को फूलों से सजाते […] Read more » रफ रफ का वो कापी कापी
कविता साहित्य बेटी July 25, 2017 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment धन्य है वह आँगन, जहाँ बेटी की किलकारी है, और हर बेटी को बचाना, हम सबकी जिम्मेदारी है। भारत की हर बेटी पढ़े, ये पावन कर्तव्य हमारा है, क्योकि बेटियों ने तिरंगे, का गौरव सम्मान बढ़ाया है। बेटी वो है जो, दो परिवारों की आन, बान और शान है, और बेटी होना आज, अभिशाप नहीं, […] Read more » बेटी
लेख साहित्य समकालीन साहित्य July 25, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment साहित्यकारों के कुछ प्रिय विषय हैं,जिन्हे बार बार लिखकर उन्हे सार्वभौमिक सत्य की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।सार्वभौमिक सत्य वह होते हैं जो हर काल में, हर स्थान पर खरे उतर सकते हों ।एक ही बात को बार बार कहा जाय तो वह सार्वभौमक सत्य लग सकती है, हो नहीं सकती ।कुछ विषय ऐसे हैं जिन पर जिन पर लिख […] Read more » समकालीन साहित्य
कविता साहित्य जीवन नहीं आसान July 25, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment रात की चादर तो हमेशा से ही अंधेरी ही होती है, रौशनी के लिये दीपक जलाने पड़ते है दोस्तो। जिन्दगी भी कहाँ आसान होती है किसी की भी…… पहाड़ों को काटकर रस्ते बनाने पड़ते हैं। आसानी से जो मिल जाय उसकी कद्र ही नहीं…… मेंहनत से कमाई हर चीज़ अनमोल होती है। सोने को भी […] Read more » जीवन नहीं आसान
व्यंग्य साहित्य पारदर्शी चंदा, मुसीबत का धंधा July 24, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment जब से वित्त मंत्री अरुण जेतली ने राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाने की बात कही है, तब से कई दलों की नींद हराम है। यद्यपि जेतली ने अभी बस कहा ही है; पर सब जानते हैं कि जेतली ने कहा है, तो सरकार अंदरखाने जरूर कुछ तैयारी कर रही होगी। विपक्ष (और अधिकांश सत्तापक्ष) वालों […] Read more » पारदर्शी चंदा मुसीबत का धंधा
गजल साहित्य अभिलाषा July 24, 2017 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment आओ धरती को सजाएं, हम एक उपवन की तरह, इसके हर अंश को महकाएं हम मधुबन की तरह, आओ धरती को सजाएं……….. एक धरती है जो बिन मांगे, अपना सब देती, हमने छलनी किया सीना, चुप कर सब सहती, रात-दिन सजदा करो, चरणों में भगवन की तरह, आओ धरती को सजाएं…….. अपनी एक सांस भी […] Read more » अभिलाषा
व्यंग्य साहित्य फेसबुक टैगिंग या फिर डिजिटल रैगिंग July 24, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment डिजिटल आपाधापी के इस घोर कलयुग में भी इंसानियत समाप्त नहीं हुई है, अभी भी कई लोग टैग की गई सभी पोस्ट अपनी वाल पर दिखने के लिए allow कर देते है। दया और करुणा का एक्स्ट्रा रिचार्ज करवा कर धरती पर डिलीवर किये गए लोग तो टैग किए जाने पर इतने भावविभोर हो जाते है कि टैग किये जाने को ही अपना सम्मान समारोह समझ लेते है और कमेंट बॉक्स में "थैंक्स फॉर द टैग" लिखकर टैगीत होने के ऋण से उऋण होते है। Read more » Featured डिजिटल रैगिंग फेसबुक टैगिंग
गजल साहित्य आग बुझती जा रही है बस धुंआ सा रह गया July 20, 2017 / July 20, 2017 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment आग बुझती जा रही है बस धुंआ सा रह गया राजनीती देख लगता, ये तमाशा रह गया, जात में बंटते दिखे, धर्मों के ठेकेदार सब आदमी उनकी जिरह में बस ठगा सा रह गया, एक बदली ने गिराई चंद बूंदे आस की, उस भरोसे की वजह से खेत प्यासा रह गया, हर […] Read more » आग बुझती जा रही है
व्यंग्य साहित्य हां, भगवान है July 19, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment अब पटना में देखो। वहां विपक्ष से अधिक बखेड़ा सत्ता पक्ष में ही चल रहा है। पहलवान हर दिन लंगोट लहराते हैं; पर बांधते और लड़ते नहीं। लालू जी का निश्चय है कि उनके घर का हर सदस्य उनकी भ्रष्ट परम्परा को निभाएगा। उन्होंने चारा खाया था, तो बच्चे प्लॉट, मॉल और फार्म हाउस खा रहे हैं। आखिर स्मार्ट फोन और लैपटॉप वाली पीढ़ी अब भी घास और चारा ही खाएगी क्या ? उधर नीतीश कुमार अपने सुशासन मार्का कम्बल से दुखी हैं। पता नहीं उन्होंने कम्बल को पकड़ रखा है या कम्बल ने उन्हें। इस चक्कर में शासन भी ठप्प है और प्रशासन भी। फिर भी हर साल की तरह वहां बाढ़ आ रही है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान का अस्तित्व जरूर हैं। Read more » Featured भगवान
कहानी साहित्य कब्र का अजाब July 18, 2017 by आरिफा एविस | Leave a Comment आरिफा एविस ‘नहीं, मदरसे में रूही नहीं जायेगी . ‘पर क्यों अम्मी?’ ‘कहा ना अब वो नहीं जायेगी मदरसे में बस..’ ‘तो क्या रूही आपा अपना कुरआन पूरा नहीं कर पाएंगी ?’ ‘मैंने यह तो नहीं कहा कि रूही अपना कुरआन पूरा नहीं करेगी. मैंने तो इतना ही कहा कि वो अब मदरसे में पढ़ने […] Read more » Featured punishment in the grave कब्र का अजाब
कविता साहित्य धरा पर आये है July 17, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment धरा पर आये हैं तो कुछ धरा को देते जायें धरा ने जितना दिया है कुछ तो उसका मान रखें नदियों मे नही अपनी अस्थियों को बहायें क्यों न किसी पेड़ की खाद बने,लहलहायें। फलफूल से पूजाकरें मिट्टी की मूर्ति बनायें खँडित होने पर भी उसे नदियों में ना बहायें मिट्टी की मूर्ति को मिट्टी ही में मिलायें। धर्म में क्या लिखा है ये तो मै नहीं जानती अपनी इबारत ख़ुद लिखें जो सही लगे वो अपनाये। हम नहीं बदलेंगे सदियों पुरानी इबारते लकीर की फ़कीर पीटेंगे और पिटवायेंगे…… धर्म के नाम पर सिर काटेंगे कटवायेंगे ऐसे किसी भी धर्म को मै नहीं मानती! समय के साथ नदी बदलती लेती है रास्ते, नये टापू उगते हैं तो कई डूब जाते हैं आज जहाँ हिमालय है वहाँ कभी समुद्र था जब वो बदल गये तो हम क्यों ना बदल जायें। Read more » धरा