व्यंग्य साहित्य जातिवाद पे सब बलिहारी July 7, 2017 / July 26, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment - जी हां। और प्रतिभा पाटिल के बारे में तो एक कांग्रेसी नेता ने ही कहा था कि उनके हाथ की बनी चाय इंदिरा जी को बहुत पसंद थी। इसलिए वे प्रायः प्रधानमंत्री भवन पहुंच जाती थीं। इसके पुरस्कारस्वरूप ही उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया। ये बात दूसरी है कि इतना कहने पर ही उसे कांग्रेस से बर्खास्त कर दिया गया। सुना तो ये भी गया है कि अवकाश प्राप्ति के बाद वे राष्ट्रपति भवन से काफी कुछ बटोर कर ले गयीं, जिसे फिर उंगली टेढ़ी करने पर ही वापस भेजा। Read more » जातिवाद
लेख साहित्य भारतीय योद्धाओं के बलिदान ने लिखी इजरायल की आजादी की इबारत July 7, 2017 by लोकेन्द्र सिंह राजपूत | Leave a Comment हाइफा पहुँचने के बाद जब ब्रिटिश सेना को दुश्मन की मोर्चाबंदी और ताकत के बारे में पता चला तब ब्रिगेडियर जनरल एडीए किंग ने सेना को वापस बुला लिया था। ब्रिगेडियर का निर्णय उचित ही था, क्योंकि तुर्की की सेना सुरक्षित और युद्ध की दृष्टि से लाभप्रद स्थिति में थी। परंतु, भारतीय योद्धा सेना को वापस बुलाने के निर्णय से खुश नहीं थे। उन्होंने कहा कि 'हम अपने देश में किस मुंह से जाएंगे। अपने देश की जनता को कैसे बताएंगे कि शत्रु के डर से मैदान छोड़ दिया। Read more » Featured इजरायल भारतीय सैनिकों के शौर्य माउंट कार्मल मेजर दलपत सिंह शेखावत हाइफा युद्ध
दोहे साहित्य छोड़ कर जगत के बंधन ! July 6, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment छोड़ कर जगत के बंधन, परम गति ले के चल देंगे; एक दिन धरा से फुरके, महत आयाम छू लेंगे ! देख सबको सकेंगे हम, हमें कोई न देखेंगे; कर सके जो न हम रह कर, दूर जा कर वो कर देंगे ! सहज होंगे सरल होंगे, विहग वत विचरते होंगे; व्योम बन कभी व्यापेंगे, […] Read more » छोड़ कर जगत के बंधन
कविता साहित्य एक गाँव है मेरा | July 6, 2017 / July 10, 2017 by राकेश कुमार पटेल | Leave a Comment एक गाँव है मेरा | ( किसी की यादें ) एक गाँव है मेरा जहाँ शाम है , और है सबेरा जहाँ ठंडी हवाओ में उड़ती होंगी तितलियाँ यादों की स्वर में गूंजता होगा घर आंगन मेरा एक गाँव है मेरा जहाँ शाम है और है सबेरा गाँव में लगें मेले होंगे मिठाईयां और होंगे […] Read more » एक गाँव है मेरा
व्यंग्य साहित्य इंशा अल्लाह अब मेरे नाम के आगे भी लिखा जाएगा ‘‘बाबाजी का ठुल्लू एवार्ड प्राप्त’’ July 5, 2017 by डॉ. भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी | Leave a Comment आज सुलेमान काफी संजीदा लग रहा था। मेरे लेखन कक्ष में सामने बैठा पता नहीं कुछ सोच रहा था, मैंने उसे डिस्टर्ब करना भी उचित नहीं समझा था। वह सोच रहा था और मैं लिख रहा था। कुछ देर उपरान्त वह बोल पड़ा- भाई कलमघसीट अब देर मत करो- ऐक्शन में आवो वर्ना……..कुछ हासिल नहीं […] Read more » बाबाजी का ठुल्लू एवार्ड प्राप्त
पुस्तक समीक्षा साहित्य सामाजिक चेतना का अग्रदूत: मन की बात July 5, 2017 by सिद्धार्थ शंकर गौतम | Leave a Comment सकारात्मक बदलाव लाती ”मन की बात” प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पदभार सँभालने के बाद से ही जनमानस से जुड़ाव की कई सकारात्मक कोशिशें की हैं। मन की बात कार्यक्रम में आमजन से संवाद करना, ऐसा ही एक प्रभावी कदम रहा। प्रधानमंत्री का यह कार्यक्रम न केवल लोकप्रिय बना बल्कि आमजन को जागरूक करने में भी […] Read more » मन की बात सामाजिक चेतना का अग्रदूत
लेख साहित्य ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की देश की आजादी में भूमिका July 4, 2017 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनमोहन कुमार आर्य ऋषि दयानन्द (1825-1883) के समय में देश एक ओर जहां अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, मिथ्या परम्पराओं व अनेकानेक सामाजिक बुराईयों से ग्रस्त था वहीं दूसरी ओर इन्हीं कारणों से वह विगत सात सौ से कुछ अधिक वर्षों से पराधीनता के जाल में भी फंसा हुआ था। ऋषि दयानन्द वेदों के उच्च कोटि विद्वान […] Read more » Featured आर्यसमाज की देश की आजादी में भूमिका ऋषि दयानन्द
लेख साहित्य सावधानी हटी – दुर्घटना घटी July 4, 2017 by डा. अरविन्द कुमार सिंह | Leave a Comment साहसिक साईकिल अभियान – वाराणसी से खुजराहों डा. अरविन्द कुमार सिंह, पूर्व एनसीसी अधिकारी नम्बर पन्द्रह हमेशा कष्ट में रहा। पन्द्रह नम्बर पर उसका होना उसके कष्ट से बरी हो जाने का बहाना कभी नहीं बना। कष्ट उसकी नियत थी, संयोग नहीं। पन्द्रह नम्बर से इस लेख की शुरूआत का मात्र कारण इतना है कि […] Read more » Featured साहसिक साईकिल अभियान
व्यंग्य जी एस टी –गिव सर्वाइवल टैक्स July 3, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन प्रकृति का सिद्धांत है जो विपरीत परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल पायेगा वही जीवित रहने का अधिकारी है , बाकी खल्लास . डार्विन ने भी बहुत पहले कह दिया था – सर्वाइवल ऑफ़ दि फिट्टेस्ट . अब भी आपको कोई संदेह है , तो आपका राम ही रखवाला है […] Read more » gst जी एस टी
व्यंग्य साहित्य एक पत्र बरखा रानी के नाम June 29, 2017 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment । तुम आंधी के साथ आओ, बिजली के साथ आओ, बाप बादल की पीठ पर सवार होकर आओ, लेकिन आओ। हम तोके कचौड़ी गली की कचौड़ी खिलाऊंगा, लंगड़ा आम खिलाऊंगा, गोदौलिया की मलाई वाली भांग की ठंढ़ई पिलाऊंगा, रामनगर की लस्सी पिलाऊंगा और लंका के केशव का बनारसी पान खिलाऊंगा। तुम कहोगी तो आईपी माल में ले जाकर हाफ गर्लफ़्रेंड भी दिखा दूंगा। Read more » Featured बरखा रानी
दोहे साहित्य दर्द से ऊपर निकलना चाहिये ! June 27, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment दर्द से ऊपर निकलना चाहिये; छिपा जो आनन्द लखना चाहिये ! झाँकना सृष्टि में सूक्ष्म चाहिये; चितेरे बन चित्त से तक जाइये ! सोचना क्यों हमको इतना चाहिये; हो रहा जो उसको उनका जानिये ! समर्पण कर बस उसे चख जाइये; प्रकाशों की झलक फिर पा जाइये ! मिला मन को इष्ट के […] Read more » दर्द से ऊपर निकलना चाहिये !
लेख फेसबुक पर सात साल June 26, 2017 by बीनू भटनागर | 5 Comments on फेसबुक पर सात साल लगभग सात साल से फेसबक से जुड़ी हूँ। फेसबुक के माध्यम से ही हिन्दी साहित्य की समकालीन गतिविधियों की जानकारी मिली और इसी के माध्यम से आज के साहित्यकारों से व उनकी लेखनी से परिचय हुआ।हिन्दी में आज भी बहुत अच्छा लिखा जा रहा है परन्तु जनमानस का रुझान हिन्दी से इतना हटा है […] Read more » फेसबुक पर सात साल