लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-30 January 3, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य   गीता का पांचवां अध्याय और विश्व समाज कर्मयोग श्रेष्ठ या ज्ञानयोग श्रेष्ठ है जैसे आजकल विभिन्न सम्प्रदायों की तुलना करते समय एक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति सभी धर्मों अर्थात सम्प्रदायों को श्रेष्ठ बताकर अपना पल्ला झाड़ लेता है और वह उनमें से किसी के भी अनुयायी या मानने वाले को निराश […] Read more » Featured geeta karmayoga of geeta आज का विश्व गीता गीता का कर्मयोग
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-29 January 3, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य   गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज गीता में आगे गीताकार श्रीकृष्णजी के मुखारविन्द से कहलवाता है कि हे पार्थ! इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आहार को सन्तुलित और नियमित करके अपने प्राणों से प्राणों में ही आहुति देेते हैं। (भारतवर्ष में ऐसे ऐसे योगी भी […] Read more » Featured geeta karmayoga of geeta आज का विश्व गीता गीता का कर्मयोग
कविता चालाक लोमड़ी January 1, 2018 by शकुन्तला बहादुर | Leave a Comment एक लोमड़ी थी चालाक । उसको थी रोटी की ताक ।। उसने देखा आँख उठा कर। कौआ बैठा दिखा पेड़ पर ।। कौए के मुँह में थी रोटी । लोमड़ी की फड़की तब बोटी।। हँसी लोमड़ी , बोली यों । “कौआ भैया, चुप हो क्यों? कुछ तो बोलो, बात करो तुम। अपने दिल का हाल […] Read more » clever fox चालाक लोमड़ी
लेख साहित्य भैया! , सही सही लगाओ January 1, 2018 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment अमित शर्मा “सस्ता रोये बार बार, मँहगा रोये एक बार” यह कहावत सदियो से (पैदल)चली आ रही है लेकिन इस कहावत से पूंजीवादी होने की बदबू, 1600 CC इंजन वाली गाडी की गति की तरह तेज़ आती है, जो हमारे समाजवादी समाज की नाक में दम और दमा दोनों करने का माद्दा रखती है। इस […] Read more » मोलभाव
लेख साहित्य कर्मफल January 1, 2018 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी भारतीय संस्कृति कर्मफल में विश्वास करती है । हमारे यहाँ कर्म की गति पर गहन विचार किया गया है और बताया गया है कि जो कुछ फल प्राप्त होता है, वह अपने कर्म के ही कारण होता हैः- मनुष्याः कर्मलक्षण( म.भा. अश्वमेघ पर्व 43- 21) अर्थात् मनुष्य का लक्षण कर्म ही है […] Read more » कर्मफल
लेख शब्द January 1, 2018 by राजेश करमहे | Leave a Comment काल “कलयति संख्याति सर्वान् पदार्थान् स कालः।” [जो जगत् के सब पदार्थो और जीवों को आगे बढ़ने को बाध्य करता है और उनकी संख्या (आयु) करता है, वही काल है।] ‘कल संख्याने’ धातु में ‘अच’ प्रत्यय करने से ‘काल’ शब्द बनता है। ‘कल’ का दो अर्थ है – १. गिनना या गिनती करना और २. […] Read more » काल
व्यंग्य साहित्य कांग्रेसी संस्कृति के नये अध्याय January 1, 2018 by विजय कुमार | Leave a Comment डा. रामधारी सिंह ‘दिनकर’भारत के एक महान साहित्यकार थे। उनकी एक कालजयी पुस्तक है ‘संस्कृति के चार अध्याय’। चार मोटे खंडों वाली इस पुस्तक को पढ़ना और फिर समझना एक बड़ा काम है। जिन्होंने इस पुस्तक से साक्षात्कार किया है, वही इसे जान सकते हैं। लेकिन पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश में संस्कृति का एक नया […] Read more » Congress Congress culture culture New chapters of Congress कांग्रेसी संस्कृति
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-28 December 30, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज अर्जुन! तुझे याद रखना चाहिए कि जो व्यक्ति सहज प्राप्त वस्तु से सन्तुष्ट है, सुख-दु:खादि द्वन्द्वों से दूर है उनसे परे हो गया है अर्थात उन्हें अपने पास फटकने तक नहीं देता और न स्वयं उधर कभी जाता हुआ देखा जाता है अर्थात चोरी करते […] Read more » Featured geeta karmayoga of geeta आज का विश्व गीता गीता का कर्मयोग
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-27 December 30, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज इसी आनन्दमयी सांसारिक परिवेश को ‘विश्वशान्ति’ कहा जाता है। जिनका चित्त मैला कुचैला है, हिंसक है, दूसरों पर अत्याचार करने वाला है-उनका भीतरी जगत उपद्रवी और उग्रवादी होने से हिंसक हो जाता है, जिसमें शुद्घता नाम मात्र को भी नहीं होती। फलस्वरूप उनका बाहरी जगत […] Read more » Featured geeta karmayoga of geeta आज का विश्व गीता गीता का कर्मयोग
व्यंग्य साहित्य जूता जासूस December 29, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment किसी जमाने में एक शायर हुआ करते थे अकबर इलाहबादी। पेशे से तो वे न्यायाधीश थे; पर उनकी प्रसिद्धि उनकी चुटीली शायरी से अधिक हुई। उनका एक प्रसिद्ध शेर है – जूता बाटा ने बनाया, मैंने इक मजमूं लिखा मेरा मजमूं चल न पाया और जूता चल गया।। अब प्रश्न उठता है कि आज जूते […] Read more » Featured जूता जूता जासूस
लेख वर्ण धर्म और भक्ति : हरि को भजे सो हरि का होई December 28, 2017 / December 28, 2017 by डॉ. चंदन कुमारी | Leave a Comment डॉ. चंदन कुमारी क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर– इन पंचभूतों की समनिर्मिति है समग्र सृष्टि फिर भेद-भाव वाली द्वैतबुद्धि का औचित्य कैसा ! गोस्वामी तुलसीदास के काव्य में वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा झलकती है | उस वर्णाश्रम धर्म का मूल स्वरूप मानो आज धूमिल हो गया है और उसके भ्रामक संस्करण को गले लगाकर […] Read more » caste caste Religion and Devotion Devotion Religion धर्म भक्ति वर्ण
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-26 December 28, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज चिन्तन वही ऊंचा और पवित्र होता है-जिसमें ‘ऋत’ और ‘सत्य’ की साधना की जाती है। भारत के महान पूर्वजों ने ‘ऋत’ और ‘सत्य’ की साधना की थी। ऋत का अभिप्राय उन नियमों से है जो प्रकृति ने बनाये हैं और जिनके कारण सृष्टि का यह […] Read more » Featured आज का विश्व कर्मयोग गीता गीता का कर्मयोग