लेख साहित्य ग्रामीण पत्रकारिता में जनक एक स्वतंत्रता सेनानी पं.गोपालकृष्ण पुराणिक August 9, 2017 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव मैं जब पोहरी के आदर्श विद्यालय में कक्षा पांच से नवीं तक पढ़ा, तब पत्रकारिता में मेरा ज्ञान शून्य था। जबकि मैं उस महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और ग्रामीण पत्रकारिता के प्रमुख जनकों में एक पं गोपालकृष्ण पुराणिक द्वारा स्थापित विघालय में पढ़ता था। यह कालखंड 1964 से 1969 के बीच का रहा […] Read more » Featured पं.गोपालकृष्ण पुराणिक स्वतंत्रता सेनानी स्वतंत्रता सेनानी पं.गोपालकृष्ण पुराणिक
व्यंग्य माले मुफ्त दिले बेरहम August 8, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment इसे पढ़कर आप कोई गलतफहमी न पालें। मैं कोई मुफ्त चीज बांटने नहीं जा रहा हूं। इस कहावत का अर्थ है कि यदि कोई चीज मुफ्त में मिल रही हो, तो फिर उसके लिए हाथ, जेब और झोली के साथ ही दिल भी बेरहम हो जाता है। भले ही वो हमारे काम की हो या […] Read more » Featured माले मुफ्त दिले बेरहम मुफ्तखोरी
लेख कर्मण्येवाधिकारस्ते August 6, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment आचार्य राधेश्याम द्विवेदी कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ श्रीमद् भगवत गीता के अध्याय दो के 47वें श्लोक का अर्थ होता है कि कर्तव्य कर्म करने में ही तेरा अधिकार है फलों में कभी नहीं. अतः तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो. इस […] Read more » कर्मण्येवाधिकारस्ते
व्यंग्य पेशेवर कांग्रेस August 5, 2017 / August 5, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment पिछले रविवार को शर्मा जी मिले, तो बहुत खुश थे। खुशी ऐसे छलक रही थी, जैसे उबलने के बाद दूध बरतन से बाहर छलकने लगता है। उनके मुखारविन्द से बार-बार एक फिल्मी गीत प्रस्फुटित हो रहा था, ‘‘दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे..।’’ – शर्मा जी, क्या परिवार में कोई […] Read more » Congress Featured पेशेवर कांग्रेस
व्यंग्य कैसी – कैसी आजादी …!! August 5, 2017 / August 5, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा फिर आजादी … आजादी का वह डरावना शोर सचमुच हैरान करने वाला था। समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह कैसी आजादी की मांग है। अभी कुछ महीने पहले ही तो देश की राजधानी में स्थित शिक्षण संस्थान में भी ऐसा ही डरावना शोर उठा था। जिस पर खासा राजनैतिक […] Read more » आजादी
कविता अजीब सा सपना August 3, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment कल रात देखा मैने इक अजीब सा सपना, समझ में आये किसी को तो उसका अर्थ समझाना। दिशाहीन से सब दौड़ रहे थे, किसी को पता ही नहीं था अपना ही ठिकाना। कुछ बच्चे बिलख रहे थे भूखे और प्यासे! कुछ बच्चे भाग रहे थे निन्यानवें के पीछे! कुछ बच्चे करतब दिखा रहे थे नाच […] Read more » सपना
लेख साहित्य पुस्तकालय व्यवसाय नहीं सेवा है August 3, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी एक व्यवसाय के रुप में पुस्तकालयाध्यक्षता (लाइब्रेरियनशिप) रोजगार के विविध अवसर प्रदान करती है। पुस्तकालय तथा सूचना.विज्ञान में आज करियर की अनेक संभावनाएं हैं। अर्हताप्राप्त लोगों को विभिन्न पुस्तकालयों तथा सूचना केन्द्रों में रोजगार दिया जाता है। प्रशिक्षित पुस्तकालय व्यक्ति अध्यापक तथा लाइब्रेरियन दोनों रूप में रोजगार के अवसर तलाश कर सकते […] Read more » पुस्तकालय
व्यंग्य साहित्य घुन और खत-पतवार August 2, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment एक बार विजयनगर साम्राज्य के प्रतापी राजा कृष्णदेव राय ने अपने दरबारी तेनालीराम से पूछा कि साल में कितने महीने होते हैं ? तेनाली ने कहा, “दो महाराज।” राजा हैरान हो गये। इस पर वह बोला, “महाराज, वैसे तो महीने बारह हैं; पर यदि उनमें से सावन और भादों निकाल दें, तो फिर बाकी सब […] Read more » Featured खत-पतवार
कविता साहित्य वो तस्वीर हो गया August 1, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment अपना जब कोई बस तस्वीर होगया…… कल तक ‘है’ था, आज ‘था’ हो गया……. लगता है आ जायेगा लौटकर कहीं से भी यहीं कहीं होगा अग्नि को सौंपा था जिसे कल ही, वो कहीं कोई सपना ही तो नहीं था! यथार्थ को स्वीकारना सरल तो नहीं होता इस दौर से गुज़रता है जब अपना ही […] Read more » वो तस्वीर हो गया
कविता साहित्य बेबसी July 31, 2017 by तेजू जांगिड़ | Leave a Comment लाचार, बेबस था वो उसकी आँखों मे स्पष्ट झलक रहा था उस दिन सड़क किनारे वो दिखा देखकर आदिमानव सी छवि उभर आई बढ़ी हुई दाढ़ी उलझे बाल मुह से लार टपकती थी हाथ मे कुछ पैसे पकड़े हुए और कुछ दुकानों से गिरी सब्जियां ये सब तो प्रति दिन होता है पर… उस दिन […] Read more » बेबसी
व्यंग्य साहित्य साहित्य का अग्निपथ July 31, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment अमित शर्मा चतुर्वेदी जी मंझे हुए साहित्यकार है। वे हमेशा साहित्यिक साधना में लीन रहते है,उनके चारो और हमेशा साहित्य भिनभिनाता रहता है। साहित्यिक तेवर को ही वे अपना ज़ेवर मानते है। अपनी रचनात्मक चेत “ना” पर सवार होकर वे काफी लंबी साहित्यिक दूरी तय कर चुके है। इतना दूर आने के बाद उन्हें समझ […] Read more » अग्निपथ साहित्य साहित्य का अग्निपथ
व्यंग्य चट तलाक –पट ब्याह July 29, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन अबकी बार तो मुझे पक्का भरोसा है , निशा मौसी का नाम जरूर गिनीज बुक में दर्ज होगा . शाम को तलाक , रात होने से पहले सगाई और दिन निकलते ही फेरे . कमाल है मौसी का भी . शाम को तो लोग- बाग़ फूस –फूस कर रहे थे , अब […] Read more » Featured चट तलाक –पट ब्याह