कविता साहित्य ये फूल अनोखे से….. July 15, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment गुलमोहर के पेड़ अनोखे सुन्दर लाल सुनहरी फूलों से आग लगायें। घने पेड़ लगे हों जहाँ उस आग से, मन शीतल होजायें। पीले अमलतास के फूल वृक्षों पर लहराये शोभा हर वन उपवन की मनभाये इतरायें पलाश के जंगल ही जंगल लाल सुनहरे पीले से भी फूल बड़े कुछ छोटे से भी झुंडो मे मुस्कायें […] Read more » फूल
कविता साहित्य वो पीपल July 14, 2017 by राकेश कुमार पटेल | Leave a Comment उनके वो हरे पत्ते जिसके छाॅंव पर हम बनते थे। मिटटी के गत्ते चैरहे पर अकेला ही तो था किसी अनाथ की तरह परोपकार में चढा मानव के हत्थे । दोपहरी में होते हम उसके परिवार दादा देते , हम सबको दुलार चुन्नू, मन्नू, रानू सखियों की होती पुकार और इनमें उनकी वो शीतल छाया […] Read more » पीपल
कविता साहित्य आज का अखबार पढ़ लो July 14, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment आजका ख़बार पढ़ लो खून से लथपथ पड़ा है, शाम को समाचार सुन लो बयानबाज़ी से पटा है ज़रा ज़रा सी बात पर किसीने किसी को डसा है, हर वारदात के पीछे कोई नकोई दल घुसा है। छुरा घोंपा गोलीमारी, रोज़ का किस्सा हुआ है गाय भैसों की रक्षा मे आदमी की जान लेलो ये […] Read more » आज का अखबार पढ़ लो
कविता साहित्य मेरी बेटी July 11, 2017 by राकेश कुमार पटेल | Leave a Comment खुशबू है मेरी आंगन की जो सारे घर को महकाती है। लोरी है मेरी दामन की जो खुद को और मुझे सुलाती है। कोयल है एक डाली की जो सारे बाग को चहकाती है कली है एक फुल की जो बेरंग दुनिया में रंग भर जाती है। एक बुंद है सागर की जो मेरी प्यास […] Read more » मेरी बेटी
लेख साहित्य भारत का सैन्य विज्ञान और हाइफा के बलिदानी July 10, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment मेरा भारत महान है, क्योंकि वह सत्य, संयम, दृढ़ता, पवित्रता और अमृत की रक्षा का शिवसंकल्प लेकर विजयपथ पर आगे बढ़ता है। मि. वार्ड जैसे विदेशी लेखक का कथन है कि हिंदू लोग युद्घकला का बार-बार निरीक्षण करते थे, अर्थात समय समय पर युद्घ का अभ्यास करते थे। यह सुनिश्चित है कि हिन्दू राजा युद्घ के समय अपनी सेना का स्वयं नेतृत्व करते थे और इस कार्य को संपादित करने के लिए उन्हें सैन्य-विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी। Read more » Featured भारत का सैन्य विज्ञान हाइफा हाइफा के बलिदानी
कविता साहित्य कैक्टस July 9, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment असीमित कैक्टस कैक्टस ही कैक्टस, गोलाकार कैक्टस ऊँचा लम्बा कैक्टस फूलवाला कैक्टस, कम पानी में जीता कैक्टस रेगिस्तान की शान कैक्टस रेत की हरियाली कैक्टस मूलभूमि उतरी अमरीका का कैक्टस विश्व व्यापी कैक्टस, मूलभूमि दक्षिणी अमरीका का कैक्टस पूर्व तक पंहुचा कैसे न कैसे कैक्टस आदर न सत्कार पानेवाला कैक्टस घर के अन्दर न लाया […] Read more » कैक्टस
दोहे कभी चल पड़ते हैं हम सर छत्र धारे ! July 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment कभी चल पड़ते हैं हम सर छत्र धारे, छोड़ चल देते कभी सारे नज़ारे; प्रीति की कलिका कभी चलते सँवारे, सुर लिए कोई कभी रहते किनारे ! ज़माने की भीड़ में उर को उबारे, हिय लिए आनन्द की अभिनव सी धारें; भास्वर भव सुरभि की अनुपम घटाएँ, विश्व विच व्यापक विलोके चिर विधाएँ ! […] Read more » कभी चल पड़ते हैं हम सर छत्र धारे !
दोहे साहित्य कुछ भ्रान्तियाँ औ क्रान्तियाँ July 7, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment कुछ भ्रान्तियाँ औ क्रान्तियाँ,ले जा रहीं भव दरमियाँ; भ्रम की मिटाती खाइयाँ,श्रम कर दिखातीं कान्तियाँ। हर किरण ज्योतित भुवन कर,है हटाती परछाइयाँ; तम की तहों को तर्ज़ दे,तृण को दिए ऊँचाइयाँ। छिप कर अणु ऊर्जित रहा,पहचाना ना हर से गया; हर वनस्पति औषधि रही,जानी कहाँ पर वह गई ! हर प्राण अद्भुत संस्करण,संकलन सृष्टि विच […] Read more » कुछ भ्रान्तियाँ औ क्रान्तियाँ
कहानी साहित्य जाम का पेड़ July 7, 2017 / July 7, 2017 by आशीष श्रीवास्तव | 9 Comments on जाम का पेड़ आशीष श्रीवास्तव दादीजी अपने बेटे-बहू और पोती के साथ नये मकान में रहने आयीं तो देखा मोहल्ले में हरियाली का नामोनिशान नहीं। कहीं पर भी पेड़ नहीं फलदार पेड़ तो मोहल्ले के आसपास भी नहीं दिख रहे थे। लोगों ने कुछ पौधे अवश्य गमलों में उगा रखे थे लेकिन वे असली हैं या नकली, ये […] Read more » पेड़़
व्यंग्य साहित्य जातिवाद पे सब बलिहारी July 7, 2017 / July 26, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment - जी हां। और प्रतिभा पाटिल के बारे में तो एक कांग्रेसी नेता ने ही कहा था कि उनके हाथ की बनी चाय इंदिरा जी को बहुत पसंद थी। इसलिए वे प्रायः प्रधानमंत्री भवन पहुंच जाती थीं। इसके पुरस्कारस्वरूप ही उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया। ये बात दूसरी है कि इतना कहने पर ही उसे कांग्रेस से बर्खास्त कर दिया गया। सुना तो ये भी गया है कि अवकाश प्राप्ति के बाद वे राष्ट्रपति भवन से काफी कुछ बटोर कर ले गयीं, जिसे फिर उंगली टेढ़ी करने पर ही वापस भेजा। Read more » जातिवाद
लेख साहित्य भारतीय योद्धाओं के बलिदान ने लिखी इजरायल की आजादी की इबारत July 7, 2017 by लोकेन्द्र सिंह राजपूत | Leave a Comment हाइफा पहुँचने के बाद जब ब्रिटिश सेना को दुश्मन की मोर्चाबंदी और ताकत के बारे में पता चला तब ब्रिगेडियर जनरल एडीए किंग ने सेना को वापस बुला लिया था। ब्रिगेडियर का निर्णय उचित ही था, क्योंकि तुर्की की सेना सुरक्षित और युद्ध की दृष्टि से लाभप्रद स्थिति में थी। परंतु, भारतीय योद्धा सेना को वापस बुलाने के निर्णय से खुश नहीं थे। उन्होंने कहा कि 'हम अपने देश में किस मुंह से जाएंगे। अपने देश की जनता को कैसे बताएंगे कि शत्रु के डर से मैदान छोड़ दिया। Read more » Featured इजरायल भारतीय सैनिकों के शौर्य माउंट कार्मल मेजर दलपत सिंह शेखावत हाइफा युद्ध
दोहे साहित्य छोड़ कर जगत के बंधन ! July 6, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment छोड़ कर जगत के बंधन, परम गति ले के चल देंगे; एक दिन धरा से फुरके, महत आयाम छू लेंगे ! देख सबको सकेंगे हम, हमें कोई न देखेंगे; कर सके जो न हम रह कर, दूर जा कर वो कर देंगे ! सहज होंगे सरल होंगे, विहग वत विचरते होंगे; व्योम बन कभी व्यापेंगे, […] Read more » छोड़ कर जगत के बंधन