लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-20 December 17, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य  गीता का तीसरा अध्याय और विश्व समाज हमने पाकिस्तान के विरूद्घ भारत के प्रधानमंत्री मोदी को ‘सर्जिकल स्ट्राईक’ करते देखा। संयुक्त राष्ट्र में अपनी विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज को पाकिस्तान की बखिया उधेड़ते हुए देखा-ऐसे हर अवसर पर देश में भावनात्मक एकता का परिवेश बना, लोगों में सांस्कृतिक और सांगठनिक […] Read more »  गीता का कर्मयोग आज का विश्व Featured आतंकवाद और गीता गीता गीता का तीसरा अध्याय विश्व समाज
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-19 December 17, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य गीता का तीसरा अध्याय और विश्व समाज सन्त का यह कार्य आपको शिक्षा दे रहा है कि यज्ञीय बन जाओ, जो भी कुछ मिलता है-उसे बांट दो। ज्ञान को भी बांट दो और मिले हुए दान को भी बांट दो। चोर, डकैती या लुटेरा व्यक्ति ऐसा क्यों नहीं कर पाता? इसका कारण […] Read more » Featured geeta karmayoga of geeta आज का विश्व कर्मयोग गीता गीता का कर्मयोग गीता का तीसरा अध्याय विश्व समाज
व्यंग्य छपना है तुझे रचना के लिए December 15, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment अमित शर्मा (CA) किसी लेखक के लिए छपना उतना ही ज़रूरी और स्वाभाविक है जितना कि किसी राजनैतिक पार्टी का टिकट वितरण में धांधली करना। बिना छपे किसी लेखक का वही मूल्य होता है जो मूल्य “श्रीलंका” में “श्री” का या फिर पाकिस्तान में लोकतंत्र का है। किसी भी लेखक के लिए उसकी रचना, जिगर […] Read more » रचना
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-18 December 14, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य  गीता का तीसरा अध्याय और विश्व समाज यहां श्रीकृष्णजी अर्जुन को पुन: उसके धर्म का स्मरण करा रहे हैं कि तू स्वधर्म को पहचान और उसी के अनुसार आचरण कर, अर्थात कर्म कर। यदि तू यह मान रहा है कि कर्म करना ही नहीं है अर्थात स्वधर्म का पालन करना ही […] Read more » Featured आज का विश्व कर्मयोग गीता गीता का कर्मयोग
लेख सिकंदर की पराजय December 13, 2017 by डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री | Leave a Comment डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री आजकल टी वी के एक चैनल पर पोरस शीर्षक से दिखाए जा रहे सीरियल के बहाने एक बार फिर वही कहानी याद आ गई जिसमें वीर योद्धा पुरु (पोरस) को पराजित और आक्रमणकारी सिकंदर को विजयी बताया गया है । इतना ही नहीं, पुरु को क्षमा करके और केवल उसका राज्य नहीं, […] Read more » Featured सिकंदर सिकंदर की पराजय
व्यंग्य साहित्य मानहानि का मुकदमा December 12, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment कल शाम शर्मा जी के घर गया, तो पता लगा कि वे किसी बड़े वकील के पास गये हैं। सज्जन व्यक्ति से मिलने थाने से कोई आ जाए या फिर उसे ही वकील के पास जाना पड़े, तो इसे भले लोगों की बिरादरी में अच्छा नहीं माना जाता। इसलिए मैं चिंता में पड़ गया और […] Read more » Featured मानहानि
व्यंग्य साहित्य हमारा लोकतंत्र और बेचारे गधे December 10, 2017 by प्रभुनाथ शुक्ल | Leave a Comment प्रभुनाथ शुक्ल सुबह सो कर उठा तो मेरी नज़र अचानक टी टेबल पर पड़े अख़बार के ताजे अंक पर जा टिकी । जिस पर मोटे – मोटे अक्षरों में लिखा था ” गधों की हड़ताल” अख़बार के सम्पादक जी कि कृपा से यह खबर फ्रंट पेज की लीड स्टोरी बनी थी। स्वर्णाक्षरों में कई […] Read more » Featured लोकतंत्र
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-17 December 10, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य गीता के दूसरे अध्याय का सार और संसार योगेश्वर कृष्ण जी का कहना है कि हमें अपना मन ‘परब्रह्म’ से युक्त कर देना चाहिए, उसके साथ उसका योग स्थापित कर देना चाहिए। उससे मन का ऐसा तारतम्य स्थापित कर देना चाहिए कि उसे ब्रह्म से अलग करना ही कठिन हो जाए। भाव […] Read more » Featured गीता गीता का कर्मयोग विश्व
लेख गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-16 December 9, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य गीता के दूसरे अध्याय का सार और संसार गीता यह भी स्पष्ट करती है कि ”हे कौन्तेय! पुरूष चाहे कितना ही यत्न करे, कितना ही विवेकशील हो-ये मथ डालने वाली इन्द्रियां बल पूर्वक मन को विषयों की ओर खींच लेती हैं। मन विषयों के पीछे भागता है और इस प्रकार भागता हुआ […] Read more » Featured आज का विश्व कर्मयोग गीता गीता का कर्मयोग विश्व
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-15 December 7, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य  गीता के दूसरे अध्याय का सार और संसार ‘गीता’ का कहना है कि योगस्थ होकर कर्मयोग का अभ्यासी बनकर मनुष्य को कर्म के फल की आसक्ति से स्वयं को मुक्त रखना चाहिए। कर्म की सिद्घि या असिद्घि दोनों में ही मनुष्य को समता का भाव अपनाने का अभ्यासी हो जाना चाहिए। […] Read more » Featured आज का विश्व गीता का कर्मयोग
व्यंग्य साहित्य राजतंत्र का तबेला December 6, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment शर्मा जी की खुशी का पारावार नहीं था। जैसे पक्षी नहाने के बाद पंख झड़झड़कार आसपास वालों को भी गीला कर देते हैं, ऐसे ही शर्मा जी अपने घर से सामने से निकलने वालों को मिठाई खिलाकर गरम चाय भी पिला रहे थे। ठंड के कारण कई लोग तो तीन-चार बार आ गये; पर शर्मा […] Read more » Featured राजतंत्र का तबेला
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-14 December 6, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर् गीता के दूसरे अध्याय का सार और संसार ‘गीता’ कहती है कि इस आत्मा को संसार का कोई शस्त्र छेद नहीं सकता। न इसको अग्नि जला सकती है, और न इसे पानी गला सकता है, इसे वायु सुखा नहीं सकती। अग्नि जला न पाएगा, शस्त्र करे नहीं छेद। पानी गला न पाएगा, […] Read more » Featured geeta karmayoga of geeta आज का विश्व गीता गीता का कर्मयोग