कविता साहित्य प्रेरणा January 28, 2017 / January 28, 2017 by अजय कुमार | Leave a Comment बस्ती – बस्ती गली – गली फैली एक निराशा | कल कल करती बहती नदियां फिर भी मैं हूं प्यासा || जीवन के दुख द्वन्द लिए पागल पथिक सा चलता जाऊं | एक क्षण में रोता हूं दूजे क्षण मैं गाता जाऊं || समझ चुका था जीवन का हर नियम और वो कायदा | तपकर […] Read more »
लेख साहित्य हाथीयुद्ध मनोरंजन का लोकप्रिय साधन तथा आगरा के हाथीघाट का इतिहास January 26, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा- राधेश्याम द्विवेदी हाथियों का व्ंशानुगत इतिहास :- हाथी जमीन पर रहने वाला विशाल आकार का स्तनपायी प्राणी है। आज के समय में हाथी परिवार कुल में केवल दो प्रजातियाँ जीवित हैं। एलिफस तथा लॉक्सोडॉण्टा। तीसरी प्रजाति मैमथ विलुप्त हो चुकी है। जीवित दो प्रजातियों की तीन जातियाँ पहचानी जाती हैं। लॉक्सोडॉण्टा प्रजाति की दो […] Read more » आगरा के हाथीघाट आगरा के हाथीघाट का इतिहास हाथीघाट हाथीयुद्ध हाथीयुद्ध मनोरंजन का लोकप्रिय साधन
कविता साहित्य गीत सुनाने निकली हूँ January 26, 2017 by शालिनी तिवारी | Leave a Comment भारत माँ की बेटी हूँ और गीत सुनाने निकली हूँ, वीरों की गाथा को जन जन तक पहुँचाने निकली हूँ, भारत माँ के शान के खातिर सरहद पर तुम ड़टे रहे, सर्दी गर्मी बरसातों में भी तुम अड़िग वीर बन खड़े रहे, कोई माँ कहती है कि मेरा लाल गया है सीमा पर, दुश्मन को […] Read more » गीत सुनाने निकली हूँ
लेख साहित्य अजब गजब रिवाज थे राज रजवारे के January 26, 2017 by अनिल अनूप | 3 Comments on अजब गजब रिवाज थे राज रजवारे के अनिल अनूप पटियाला (पंजाब) में पुरानी रियासत के महल आज भी महाराजा भुपिंदर सिंह की 365 रानियों के किस्से बयान करते हैं। महाराजा भुपिंदर सिंह ने यहां वर्ष 1900 से वर्ष 1938 तक राज किया। महाराज भुपिंद्र सिंह का जीवन रंगीनियों से भरा हुआ था। इतिहासकारों के मुताबिक महाराजा की 10 अधिकृत रानियों के समेत […] Read more » महाराजा भुपिंदर सिंह
व्यंग्य साहब, आदमी अभी ओर कितना नीचे गिरेगा ? January 26, 2017 by मयंक चतुर्वेदी | Leave a Comment डॉ. मयंक चतुर्वेदी रामभुलावन आज सुबह बहुत गुस्से में आया था । गणतंत्र दिवस था, मैंने दरवाजा खोला तो उम्मीद नहीं थी अंदर आए वगैर ही रामभुलावन इस तरह से मन में दबी हुई अपनी किसी बात पर प्रतिक्रिया देगा । मैंने कहा… रामभुलावन आज खुशी का मौका है …देश को आज ही के दिन […] Read more » आदमी अभी ओर कितना नीचे गिरेगा
कविता साहित्य संस्कार सुर में फुरक कर ! January 24, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment संस्कार सुर में फुरक कर, ‘सो-हं’ की गंगा लुढ़क कर; ‘हं’ तिरोहित ‘सो’ में हुआ, ‘सो’ समाहित ‘हं’ में हुआ ! वह विराजित विभु में हुआ, अपना पराया ना रहा; अपनत्व पा महतत्व का, था सगुण गुण ले मन रहा ! शाश्वत खिला पा द्युति दिशा, मन महल वत चमका किया; रहना था बस उसका […] Read more »
व्यंग्य ताजा दल बदलिए से संवाद January 23, 2017 / January 23, 2017 by अशोक गौतम | Leave a Comment वे नख से शिख तक अलग ही भाव भंगिमा में लचकते- मटकते आते दिखे पर फिर भी उन्हें पहचानते देर न लगी। सोचा, चुनाव के दिनों में ठूंठ भी लहलहाने लगते हैं और ये तो …… वे नजदीक आए तो वही निकले पर उनके सिर पर उस विरोधी दल की टोपी देख हैरत हुई जिसे […] Read more » ताजा दल बदलिए से संवाद
कविता साहित्य जो रक्तकणों से लिखी गई,जिसकी “जयहिन्द” निशानी है । January 23, 2017 by शकुन्तला बहादुर | 2 Comments on जो रक्तकणों से लिखी गई,जिसकी “जयहिन्द” निशानी है । सुभाष चंद्र बोस*भारत के अमर स्वतन्त्रता सेनानी नेताजी शुभाषचन्द्र बोस के * * जन्मदिवस २३ जनवरी के पुनीत अवसर पर श्रद्धा सुमन -* है समय नदी की बाढ़ कि, जिसमें सब बह जाया करते हैं , है समय बड़ा तूफ़ान , प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं । अक्सर दुनिया के लोग समय में, चक्कर […] Read more » Featured poem on subhash chandra bose
व्यंग्य साहित्य मारक होती ‘ माननीय ‘. बनने की मृगतृष्णा …!! January 23, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा … देश और जनता की हालत से मैं दुखी हूं। इसलिए आपके बीच आया हूं। अब बस मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं… राजनीति से अलग किसी दूसरे क्षेत्र के स्थापित शख्सियत को जब भी मैं ऐसा कहता सुुनता हूं तो उसका भविष्य मेरे सामने नाचने लगता है। मैं समझ जाता हूं […] Read more » ' माननीय '. बनने की मृगतृष्णा ...!! मृगतृष्णा
लेख साहित्य जीवित अन्त्येष्टि January 17, 2017 by गंगानन्द झा | 2 Comments on जीवित अन्त्येष्टि कभी कभार आपको ऐसी किताब मिल जाती है जो आपको चौंकाती है और जीवन के प्रति आकर्षण बढ़ाती है। पिछले दिनो एक किताब पढ़ने का अवसर मिला। किताब का नाम है Tuesdays with Morrie. यह किताब अमेरिका के मैसाचुसेट्स के ब्राण्डिस विश्वविद्यालय में सामाजिक मनोविज्ञान के प्रोफेसर मॉरी श्वार्ज़ की कहानी कहती है। मॉरी जीवन […] Read more » Tuesdays with Morrie जिन्दगी और मौत के बीच के आखिरी पुल की सैर जीवित अन्त्येष्टि
कहानी साहित्य प्यार की गरमी January 16, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment मोहन उनकी इरादे समझ गया। वह बोलना तो नहीं चाहता था, पर आज उससे रहा नहीं गया, ‘‘हां, ठीक कहते हो। तुम्हारे स्वेटर और कोट इतने गरम हो भी नहीं सकते। चूंकि उनमें पैसों की गरमी है और मेरे स्वेटर में दीदी के प्यार की गरमी। सब लड़कों का मुंह बंद हो गया। Read more » warmth of love प्यार की गरमी
कविता साहित्य खड़े जब अपने पैर हो जाते ! January 15, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment खड़े जब अपने पैर हो जाते, आत्म विश्वास से हैं भर जाते; सिहर हम मन ही मन में हैं जाते, अजब अनुभूति औ खुशी पाते ! डरते डरते ही हम ये कर पाते, झिझकते सोचते कभी होते; जमा जब अपने पैर हम लेते, झाँक औरों की आँख भी लेते ! हुई उपलब्धि हम समझ लेते, […] Read more » खड़े जब अपने पैर हो जाते !