कविता साथ जो छोड़ कर चले जाते ! January 15, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment (मधुगीति १७०११४ ब) साथ जो छोड़ कर चले जाते, लौटकर देखना हैं फिर चहते; रहे मजबूरियाँ कभी होते, वक़्त की राह वे कभी होते ! देखना होता जगत में सब कुछ, भोग संस्कार करने होते कुछ; समझ हर समय कोई कब पाता, बिना अनुभूति उर कहाँ दिखता ! रहते वर्षों कोई हैं अपने बन, विलग […] Read more »
व्यंग्य साहित्य डिलीट गांधी –पेस्ट मोदी January 14, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन खादी ग्रामोद्योग के कलेंडर –डायरी से गांधी जी की फोटो डिलीट कर मोदी जी की फोटो पेस्ट कर देने मात्र से न जाने कुछ लोगों के पेट में क्यों मरोड़े उठने लगे हैं । समय बड़ी तेज़ी से बदल रहा है । इतने लंबे अरसे तक गांधी जी को चरखे पर सूत […] Read more » Featured खादी ग्रामोद्योग के कलेंडर –डायरी डिलीट गांधी पेस्ट मोदी
लेख साहित्य स्थानीय हिन्दू शासक भी लड़ते रहे अपना स्वतंत्रता संग्राम January 14, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य  सिकंदर लोदी बना सुल्तान बहलोल लोदी की मृत्यु जुलाई 1489 ई. में हो गयी थी। तब उसके पश्चात दिल्ली का सुल्तान उसका पुत्र निजाम खां सिकंदर दिल्ली का सुल्तान बना। उस समय दिल्ली सल्तनत कोई विशेष बलशाली सल्तनत नही रह गयी थी। उसके विरूद्घ नित विद्रोह हो रहे थे और सुल्तानों […] Read more » इब्राहीम लोदी सिकंदर लोदी स्वतंत्रता संग्राम हिन्दू शासक
कविता साहित्य बोन्साई January 12, 2017 by बीनू भटनागर | 1 Comment on बोन्साई मेरी ज़ड़ों को काट छाँट के, मुछे बौना बना दिया, अपनी ख़ुशी और सजावट के लिये मुझे, कमरे में रख दिया। मेरा भी हक था, किसी बाग़ मे रहूँ, ऊँचा उठू , और फल फूल से लदूँ। फल फूल तो अब भी लगेंगे, मगर मै घुटूगाँ यहीं तुम्हारी, सजावट के शौक के लिये, जिसको तुमने […] Read more » बोन्साई
कहानी साहित्य लघुकथा : बचपन की पूंजी January 12, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment घर में सब लोग साथ बैठकर खाना खा रहे थे। चार साल के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग सब वहां थे। मां सेब काट कर सबको दे रही थीं। जब उन्होंने चार साल के चुन्नू को भी एक फांक दी, तो वह मचलता हुआ बोला, ‘‘मैं दो सेब लूंगा।’’ मां ने चाकू […] Read more » बचपन की पूंजी
लेख विविधा साहित्य हिंदी दिवस विश्व हिन्दी दिवस का हिन्दी के वैश्विक विस्तार में योगदान January 11, 2017 / January 11, 2017 by डॉ. शुभ्रता मिश्रा | Leave a Comment डॉ. शुभ्रता मिश्रा 10 जनवरी का दिन विश्व हिन्दी दिवस के रुप में मनाया जाना हर उस भारतवासी के लिए गौरव का विषय है, जो अपनी हिन्दी भाषा से सच्चा प्रेम करता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी माता, अपनी मातृभूमि और अपनी मातृभाषा से प्राकृतिक रुप से प्रेम होता है। इसे जताने की आवश्यकता नहीं […] Read more » Featured विश्व हिन्दी दिवस हिन्दी के वैश्विक विस्तार में योगदान
लेख साहित्य अत्याचारों की करूण गाथा के उस काल में भी आशा जीवित रही January 11, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य सिकंदर के शासन काल में हिंदुओं की स्थिति कश्मीर में सिकंदर का शासन और हिंदुओं की स्थिति इस प्रकार थी कि सिकंदर का शासन मानो खौलते हुए तेल का कड़ाह था और हिंदू उसमें तला जाने वाला पकौड़ा। ऐसी अवस्था में बड़ी क्रूरता से हिंदुओं से जजिया वसूल किया जाता था। […] Read more » सिकंदर के शासन काल में हिंदुओं की स्थिति Featured अत्याचारों का करूण क्रंदन अत्याचारों की करूण गाथा अलबेरूनी केवल 11 हिंदू परिवार ही बचे थे कश्मीर ज्ञान छिपाने की भावना हिंदुओं में क्यों वर्तमान न्यायपालिका के प्रति अश्रद्घा क्यों? हिंदुओं के धर्मप्रेमी स्वरूप का गौरवमयी वर्णन
लेख साहित्य जब कश्मीर के राजा जशरथ ने बढ़ाया भारत का ‘यश’ रथ January 10, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य संसार एक सागर है संसार एक सागर है, जिसमें अनंत लहरें उठती रहती हैं। ये लहरें कितने ही लोगों के लिए काल बन जाती हैं, तो कुछ ऐसे शूरवीर भी होते हैं जो इन लहरों से ही खेलते हैं और खेलते-खेलते लहरों को अपनी स्वर लहरियों पर नचाने भी लगते हैं। ऐसा संयोग इतिहास […] Read more » Featured कश्मीर कश्मीर के राजा जशरथ जशरथ राजा जशरथ लोदी वंश
कविता आज नया कुछ लिख ही दूँ January 9, 2017 by बीनू भटनागर | 3 Comments on आज नया कुछ लिख ही दूँ कुछ नया करने की चाह में, अपनी ही कविताओं के, अंग्रेज़ी में अनुवाद कर डाले, या उन्हे ही उलट पलट कर, दोहे कुछ बना डाले। जो कल नया था आज पुराना सा लगने लगा है अब….. तो सोचा….. आज कुछ नया ही लिख दूँ। रोज़ होते रहे बलात्कार, उनपर टीका टिप्पणी और विश्लेषण तो अब […] Read more » आज नया कुछ लिख ही दूँ
कविता साहित्य दिल्ली पुस्तक मेला January 9, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment प्रगति मैदान लग गया,पुस्तक का भण्डार अपना अपना शोर है, अपनी अपनी रार! बड़े-बड़े लोगों के ,अपने अपने स्टाल, वे ही सब ले जायेंगे,पुरुस्कार या शाल! बड़े बड़े अब रचयिता, आये दिल्ली द्वार, किसकी किताब ने किया,सर्वाधिक व्यापार? कवि व्यापारी से लगें,जब बेचते किताब, आज एक से लग रहे, आफ़ताब महताब! मेला किताब का लगा,होगा […] Read more » दिल्ली पुस्तक मेला
कविता माँ तुम्हें पुकारती, माँ तुम्हें पुकारती ।। January 4, 2017 by शकुन्तला बहादुर | 2 Comments on माँ तुम्हें पुकारती, माँ तुम्हें पुकारती ।। एक आह्वान एवं भावांजलि – वीर सेनानियों को । देश के सपूतों ! मातृभू के रक्षकों ! शूरवीर सैनिकों ! क्रान्तिवीर बन्धुओं ! साहसी सेनानियों ! माँ तुम्हें पुकारती , माँ तुम्हें पुकारती ।। * आज सब आतंकियों को, आक्रमणकारियों को, और देशद्रोहियों को , भेज दो यमलोक को । माँ तुम्हें पुकारती, माँ तुम्हें […] Read more » माँ तुम्हें पुकारती
कविता साहित्य याद तुम्हारी January 3, 2017 / January 3, 2017 by मधु शर्मा कटिहा | Leave a Comment मधु शर्मा कटिहा खुश बहुत थी याद तेरी अब मुझे आती नहीं, डूबकर इक अक्स में अब मैं खो जाती नहीं। उफ़! भूलते ही याद आ गया फिर से तू क्यों? कोई रिश्ता ही नहीं तो दर्द भी देते हो क्यों? चल रही हवा तो पत्ते चुप से हैं मायूस क्यों? रोशनी सूरज की […] Read more » याद तुम्हारी