व्यंग्य साहित्य वाद, विवाद और विकासवाद February 10, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment सिरदर्द के अनेक कारण होते हैं। कुछ आतंरिक होते हैं, तो कुछ बाहरी। पर मेरे सिरदर्द का एक कारण हमारे पड़ोस में रहने वाला एक चंचल और बुद्धिमान बालक चिंटू भी है। उसके मेरे घर आने का मतलब ही सिरदर्द है। कल शाम को मैं टी.वी. पर समाचार सुन रहा था कि वह आ धमका। […] Read more » Featured पूंजीवाद वाद विकासवाद विवाद विवाद और विकासवाद समाजवाद
साहित्य ऊर्ध्व हर विन्दु रहा अवनी तल ! February 10, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment ऊर्ध्व हर विन्दु रहा अवनी तल, गोल आकार हुआ प्रति-सम चल; जीव उत्तिष्ट शिखर हर बैठा, रेणु कण भी प्रत्येक है एेंठा ! कम कहाँ किसी से रहा कोई, लगता पृथ्वी पति है हर कोई; देख ना पाता कौन इधर उधर, समझता स्वयं को महा भूधर ! अधर फैला हुआ है शून्य तिमिर, घूमते पिण्ड […] Read more » ऊर्ध्व हर विन्दु रहा अवनी तल !
कविता साहित्य उर में आता कोई चला जाता ! February 10, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment उर में आता कोई चला जाता, सुर में गाता कभी है विचलाता; सुनहरी आभा कभी दिखलाता, कभी बे-रंग कर चला जाता ! वश भी उनका स्वयं पे कब रहता, भाव भव की तरंगें मन बहता; नियंत्रण साधना किये होता, साध्य पर पा के वो कहाँ रहता ! जीव जग योजना विविध रहता, विधि वह उचित […] Read more » उर में आता कोई चला जाता !
दोहे साहित्य बीजू के छक्के February 9, 2017 by विजय सिंघल | Leave a Comment तमिलनाडु में चल रही है जूतमपैजार। शशीकला ने खींच ली सेल्वम की सरकार॥ सेल्वम की सरकार कि इस पर मैं बैठूँगी। जया सहेली की विरासत बस मैं ही लूँगी॥ कह “बीजू” जो रौनक़ यूपी के चुनाव में। उससे ज़्यादा मज़ा आ रहा तमिलनाडु में॥ 2. राज्य सभा में अटक गये हैं विपक्ष के प्राण। मोदी […] Read more » बीजू के छक्के
राजनीति व्यंग्य मैं वोट जरूर दूंगा February 8, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment चुनाव के दिन जैसे-जैसे पास आ रहे हैं, हर कोई उसके रंग में रंगा दिख रहा है। किसी ने छत पर अपनी मनपंसद पार्टी का झंडा लगाया है, तो किसी ने सीने पर उसका बिल्ला। कुछ लोगों ने साइकिल, स्कूटर और कार पर ही अपने प्रिय प्रत्याशी को चिपका लिया है। पान की दुकान हो […] Read more » Featured मैं वोट जरूर दूंगा वोट वोट दूंगा
व्यंग्य साहित्य आलू और पनीर (सेल्वम्) February 7, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment दुनिया की हर भाषा में लोकजीवन में प्रचलित प्रतीकों और मुहावरों का बड़ा महत्व है। फल-सब्जी, पशु-पक्षी और व्यवहार या परम्पराओं से जुड़ी बातें साहित्य की हर विधा को समृद्ध करती दिखती हैं। अब आप आलू को ही लें। यह हर सब्जी में फिट हो जाता है। इससे नमकीन और मीठे, दोनों तरह के व्यंजन […] Read more » Featured आलू और पनीर (सेल्वम्)
लेख विज्ञान साहित्य विश्वविख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को भारत के वास्तु वैज्ञानिक राजकुमार झांझरी की चुनौती February 6, 2017 / February 6, 2017 by राजकुमार झांझरी | Leave a Comment विश्वविख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को भारत के वास्तु वैज्ञानिक राजकुमार झांझरी की चुनौती ‘दी गार्डियन’ में “This is the most dangerous time for our planet” शीर्षक से प्रकाशित लेख के संदर्भ में स्टीफन हॉकिंग को भेजे पत्र का हिंदी अनुवाद ‘दी गार्डियन’ में “This is the most dangerous time for our planet” शीर्षक से प्रकाशित […] Read more » “This is the most dangerous time for our planet” “This is the most dangerous time for our planet” शीर्षक से प्रकाशित लेख Featured stephen hawkins The Guardian दी गार्डियन स्टीफन हॉकिंग स्टीफन हॉकिंग को भेजे पत्र का हिंदी अनुवाद
व्यंग्य विवाद की आग जलती रहे, फिल्म वालों की तिजोरी भरती रहे…!! February 4, 2017 / February 4, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा अब स्वर्ग सिधार चुके एक ऐसे जनप्रतिनिधि को मैं जानता हूं जो युवावस्था में किसी तरह जनता द्वारा चुन लिए गए तो मृत्यु पर्यंत अपने पद पर कायम रहे। इसकी वजह उनकी लोकप्रियता व जनसमर्थन नहीं बल्कि एक अभूतपूर्व तिकड़म थी। जिसमें उनके परिवार के कुछ सदस्य शामिल हेोते थे। दरअसल […] Read more » फिल्म वालों की तिजोरी विवाद की आग जलती रहे
कविता साहित्य हे खाली बोतल बता February 2, 2017 / February 2, 2017 by सिया अर्पण राम | Leave a Comment सिया अर्पण राम हे खाली बोतल बता तुझे तो होगा पता क्या था तेरे अंदर ऐसा जिसे पहली बार पीकर ही हो गए वे बावले और छोड़ दिया सब घर-बार दूसरो के हवाले हे खाली बोतल बता तुझे तो होगा पता ऐसी क्या थी वह तरल जवाब तो होगा सरल हे खाली बोतल बता तुझे […] Read more » सिया अर्पण राम
कविता साहित्य वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता ! January 30, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता, निरीक्षण करना बहुत कुछ होता; जाना पहचाना पुरातन होता, परीक्षण करना पुन: पर होता ! समय से बदलता विश्व रहता, द्रष्टा भी वैसा ही कहाँ रहता; द्रष्टि हर जन्म ही नई होती, कर्म गति अलहदा सदा रहती ! बदल परिप्रेक्ष्य पात्र पट जाते, रिश्ते नाते भी हैं सब उलट […] Read more » वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता !
आलोचना राजनीति विचार और व्यवहार के बीच झूलती भारतीय राजनीति January 29, 2017 by विजय कुमार | 1 Comment on विचार और व्यवहार के बीच झूलती भारतीय राजनीति भारतीय राजनीति और राजनेता अजीब असमंजस में हैं। विचार पर दृढ़ रहें या व्यावहारिक बनें। पांच राज्यों के चुनाव के बीच यह यक्षप्रश्न एक बार फिर सिर उठाकर खड़ा हो गया है। आजादी से पहले भारत में कांग्रेस ही एकमेव दल था। उसका मुख्य लक्ष्य आजादी प्राप्त करना था। इसलिए विभिन्न विचारों वाले नेता वहां […] Read more » dynasty politics in political parties dynasty principle in political parties Featured pariwarwad in BJP परिवारवाद भा.ज.पा. में परिवारवाद भारतीय राजनीति राजनेता विचार और व्यवहार
कविता साहित्य ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई ! January 29, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई, बना ऋषि घुमाया है हर कोई; ख़ुद छिपा झाँकता हृदय हर ही, कराता खोज स्वयं अपनी ही ! पूर्ण है पूर्ण से प्रकट होता, चूर्ण में भी तो पूर्ण ही होता; घूर्ण भी पूर्ण में मिला देता, रहस्य सृष्टि का समझ आता ! कभी मन द्रष्टि की सतह खोता, कभी […] Read more » ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई !