व्यंग्य व्यंग्य बाण : बातों और वायदों का ओलम्पिक August 19, 2012 / August 20, 2012 by विजय कुमार | Leave a Comment विजय कुमार शर्मा जी बचपन से ही खेलकूद में रुचि रखते हैं। यद्यपि उन्होंने आज तक किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया। इसलिए पुरस्कार जीतने का कोई मतलब ही नहीं; पर कबाड़ी बाजार से खरीदे कप, ट्रॉफी और शील्डों से उनका कमरा भरा है, जिसे वे हर आने-जाने वाले को विभिन्न राज्य और राष्ट्र स्तर […] Read more »
व्यंग्य व्यंग्य:अबके पूरे छह हजार! August 19, 2012 / August 18, 2012 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य:अबके पूरे छह हजार! हालांकि उनके आजकल रमजान के रोजे चले हैं। बंदे हैं कि दिनभर पानी भी नहीं लेते तो नहीं लेते। अच्छी बात है, इसी बहाने हमारे मुहल्ले के नलकों का पानी भरी बरसात में तो बच रहा है! नहीं तो भर बरसात में नल के पास होने वाली लड़ार्इ में न चाहते हुए बाल्टी नचाते उन्हें […] Read more »
व्यंग्य ईमानदारों पर भौंकते और गुर्राते हैं कुत्ते August 19, 2012 / August 18, 2012 by डॉ. दीपक आचार्य | 2 Comments on ईमानदारों पर भौंकते और गुर्राते हैं कुत्ते डॉ. दीपक आचार्य कलियुग में ईमानदारों पर भौंकते और गुर्राते हैं कुत्ते वह जमाना अब चला गया जब त्रेता युग में कुत्ते भी मनुष्य की वाणी बोलते थे। वो जमाना भी करीब-करीब चला ही गया है जिसमें चोर-उचक्कों और संदिग्धों को देख-सूंघ कर भौंकते थे कुत्ते। युधिष्ठिर का जमाना भी गुजर गया जब वफादारी दिखाने […] Read more »
कविता दोस्ती, प्यार और प्रजनन August 18, 2012 / August 18, 2012 by पियूष द्विवेदी 'भारत' | Leave a Comment पियूष द्विवेदी ‘भारत’ प्यार के शुरुआत का, दोस्ती को श्रेय है! भिन्न-लैंगिक दोस्ती में, प्यार ही तो ध्येय है! प्यार सुन्दर भावना, सत्य है, हूं मानता! पर इक सत्य और, जो हरकोई है जानता! जानने के बाद भी, बोलता कोई नही! प्यार के इस रूप को, खोलता कोई नही! सत्य ये, प्यार […] Read more » poem by pyush dwovedi दोस्ती प्यार और प्रजनन
कविता राजनीति तेरा चेहरा August 18, 2012 / August 18, 2012 by बलबीर राणा | Leave a Comment बलबीर राणा “भैजी” राजनीति तेरा चेहरा कितना बदल गया जन हित छोड स्वहित पर टिक गया राज नेता राज के लिये नहीं केवल ताज पहनने के लिये होते हैं देश प्रेम में महानुभाव देशद्रोहियों को पालते हैं विकाश की परपाटी को भ्रष्टाचार से पोतते हैं राजनीति तेरा चेहरा कितना बदल गया जन हित छोड […] Read more » poem by balbir rana राजनीति तेरा चेहरा
व्यंग्य तुम मेरा पीठ खुजाओ, मैं तेरा पीठ खुजाता हूँ ! August 18, 2012 / August 18, 2012 by राजीव पाठक | Leave a Comment राजीव पाठक आपके जीवन में भी एक ऐसा क्षण जरुर आया होगा जब आपके पीठ में बहुत तेज खुजली हो रही हो और उसे खुजाने के लिए आपका अपना हाथ काम न आये, लेकिन भगवन का शुक्र उसी समय कोई दिख जाये और वह आपके पीठ को आपके कहने पर वहीँ-वहीँ खुजा दे | आ..हा.हा…कितना […] Read more » hindi blogging हिंदी ब्लागिंग
व्यंग्य आजादी…क्यों मजाक करते हो भाई… August 17, 2012 / August 16, 2012 by हिमांशु डबराल | Leave a Comment हिमांशु डबराल ‘क्या आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्हें एक पहिया ढोता है? या इसका कोई ख़ास मतलब होता है’ धूमिल की ये पंक्तियाँ आज भी ज़हन में कई सवाल छोड़ जाती….आज़ादी…हम आज़ाद है, ये कहने पर एक बंधू बोल पड़े – क्यों मजाक करते हो भाई? सच में कई बार मजाक […] Read more » आजादी
कविता व्यंग – कविता:आज़ादी August 17, 2012 / August 16, 2012 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार ”राघव” फहर रहा था अमर तिरंगा जगह युनिअन जैक की | गुजर गयी थी स्याह रात चमकी किस्मत देश की | स्वाधीन हुआ परतंत्र देश फिर नया सवेरा आया | पन्द्रह अगस्त का दिन खुशियों की झोली भर कर लाया | बापू, चाचा, सरदार सभी की मेहनत रंग थी लायी | भगत सिंह, […] Read more » poem by raghvenfra व्यंग - कविता:आज़ादी
कविता आज़ादी के जश्न पर एक चिंतन-गीत / गिरीश पंकज August 15, 2012 / August 15, 2012 by गिरीश पंकज | 5 Comments on आज़ादी के जश्न पर एक चिंतन-गीत / गिरीश पंकज आजादी का जश्न अभी भी, फीका-फीका लगता, असफल दिल्ली देख-देख कर दिल अपना यह दुखता एक नए भारत का फिर से, करना है विस्तार, जहाँ कुर्सियां अपने जन से, करे हमेशा प्यार. न वो लाठी चलवाए, न गोली से मरवाए… ——— अभिव्यक्ति पर लगे हैं पहरे, उफ़ काले कानून. लगा है सत्ता के मुँह पर […] Read more » स्वतंत्रता दिवस
कविता गीत-मिट जाऊ वतन पर ये….. August 14, 2012 / August 14, 2012 by शादाब जाफर 'शादाब' | 1 Comment on गीत-मिट जाऊ वतन पर ये….. शादाब जफर ‘‘शादाब’’ मिट जाऊ वतन पर ये मेरे दिल में लगन है। नजरो में मेरी कब से तिरंगे का कफन हैं हर ग़ाम पडौसी को मेरे यू भी जलन है सोने की है धरती यहा चांदी का गगन है पंजाब की रूत है कही कश्मीर की रंगत गंगा का मिलन है कही जमना […] Read more » poem by shadab zafar गीत-मिट जाऊ वतन पर
व्यंग्य देश वासी सुनें प्लीज! August 14, 2012 / August 14, 2012 by अशोक गौतम | Leave a Comment अशोक गौतम विक्रम के कंधे से अचानक कूद बेताल ने देश को संबोधित करना शुरू किया,’ हे मेरे देश के हल्ले वालो! लो आज फिर स्वतंत्रता दिवस आ गया। वैसे स्वंतत्र तो हम हर रोज ही हैं। कुछ भी करने के लिए! यहां किसीको पूछता ही कौन है? सभी को यहां पूरी छूट है। बस, […] Read more »
कहानी नियम August 13, 2012 / August 13, 2012 by पियूष द्विवेदी 'भारत' | Leave a Comment पियूष द्विवेदी ‘भारत’ आज दो दिन हो गए थे उसको गाँव आए! करीब दस साल बाद वो गाँव आया था! इन दस सालों में उसके मम्मी-पापा तो कई बार गाँव आए, पर शैक्षिक-विवशताओं के कारण वो नही आ पाया! पर अब, जब वो गाँव पर था, तो घूम-घूमकर उन सब चीजों को देख रहा था, […] Read more » Story