गजल देख दौलत की खनक हम भी फिसल सकते थे….. August 13, 2012 / August 13, 2012 by इक़बाल हिंदुस्तानी | 4 Comments on देख दौलत की खनक हम भी फिसल सकते थे….. इक़बाल हिंदुस्तानी सबको संग लेके बड़ी दूर निकल सकते थे, तूने चाहा ही नहीं हालात बदल सकते थे। तुम तो उलझे रहे वंदना में वतन की ख़ालिस, सेवा करते तो नतीजे भी बदल सकते थे। राज करना कोई बच्चो का हंसी खेल नहीं, राज पाने को ज़ेहर हम भी उगल सकते थे। […] Read more »
कविता कविता:थार रेगिस्तान से…. August 12, 2012 / August 12, 2012 by बीनू भटनागर | 1 Comment on कविता:थार रेगिस्तान से…. बीनू भटनागर रेत के टीले रेत का सागर, मीलो तक इनका विस्तार, तेज़ हवा से टीले उड़कर, पंहुच रहे कभी दूसरे गाँव, दूर दूर बसे हैं, ये रीते रीते से गाँव, सीमा पर कंटीले तार, चोकस हैं सेना के जवान शहर बड़ा बस जैसलमेर। ऊँट की सवारी पर व्यापारी, शहर से लाकर गाँव गाँव […] Read more » poem by binu bhatnagar कविता:थार रेगिस्तान से....
कविता कविता:ये मेरा देश August 12, 2012 / August 12, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment राजेश कुमार ये मेरा देश है, जहां अजीब से किस्से होते हैं रोने वाली बात पर हंसते हैं लोग, और चुटकुलों पर रोते हैं बदलाव की चाह करना बेफकूफी है इस देश में जहां सब मुर्दों की तरह जीए जा रहे हैं। कई तो पी रहे हैं विदेशी शराब यहां और बाकी लोग पानी की […] Read more » कविता:ये मेरा देश
कविता कविता – महानगर के मायने August 12, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment मोतीलाल यहाँ मुझे कोई नहीँ पहचानता आकाश की तरह शून्य यहाँ मुझे कोई नहीँ जानता हवाओँ की तरह मुक्त यहाँ मुझे कोई नहीँ दिखता फूलोँ की तरह सौम्य यहाँ मुझे कोई नहीँ सुनता नदी की तरह उनमुक्त यहाँ मुझे कोई नहीँ महसूसता आँच की तरह तपन कोई भी यहाँ नहीँ […] Read more » poem by motilal कविता - महानगर के मायने
व्यंग्य राजनीति के अखाड़े में August 9, 2012 by विजय कुमार | 2 Comments on राजनीति के अखाड़े में विजय कुमार आखिर शर्मा जी ने राजनीति के अखाड़े में उतरने का निश्चय कर ही लिया। वैसे तो अनशन पर बैठने से पहले ही वे इसकी योजना बना चुके थे; पर घोषणा के लिए थोड़ा वातावरण बनाना जरूरी था। इसलिए कुछ दिन अनशन भी करना पड़ा। यह अच्छा हुआ कि अनशन तुड़वाने के लिए दो-तीन […] Read more »
गजल गजल:रात भर तेरी याद आती रही August 9, 2012 / August 8, 2012 by सत्येन्द्र गुप्ता | Leave a Comment रात भर तेरी याद आती रही बेवज़ह क़रार दिलाती रही। जैसे सहरा में चले बादे सबा सफ़र में धूप काम आती रही। दमकता रहा चाँद आसमां पे चांदनी दर खटखटाती रही। ऊंघता बिस्तर कुनमुनाता रहा तेरी ख़ुश्बू नखरे दिखाती रही। कितना मैं अधूरा रह गया था इसकी भी याद दिलाती रही। Read more » gazal Satyendra Gupta गजल:रात भर तेरी याद आती रही
गजल गजल:उबाल ने कुछ बवाल ने तोड़ दिया August 8, 2012 / August 7, 2012 by सत्येन्द्र गुप्ता | Leave a Comment उबाल ने कुछ बवाल ने तोड़ दिया कुछ दिल के मलाल ने तोड़ दिया। जो कमाता था वो ही खाता था वो । एक दिन की हड़ताल ने तोड़ दिया। उमीदों ने पंख नए खरीद लिए थे पर बेतरतीब उछाल ने तोड़ दिया। सिखाई थी अदाकारीहालात ने तो क्या करें उसी कमाल […] Read more » gazal Satyendra Gupta गजल:उबाल ने कुछ बवाल ने तोड़ दिया
गजल मोहब्बत और रोटी August 7, 2012 / August 7, 2012 by पियूष द्विवेदी 'भारत' | Leave a Comment पियूष द्विवेदी ‘भारत’ एक थी मोहब्बत, और थी एक रोटी! फैसला करो कि कौन बड़ी कौन छोटी? मोहब्बत है बोली, हूं मै खूबसूरत! मेरी इस जहाँ में, है सबको ज़रूरत! मेरी इक अदा पर, लग जाती कतारें! मै हँस जो अगर दूं, आ जाती बहारें! मेरी भौंह हिलती, तो आती क़यामत! मै […] Read more » gazal by piyush मोहब्बत और रोटी
गजल गजल:मेरे बाद मुझको ये ज़माना ढूंढेगा August 7, 2012 by सत्येन्द्र गुप्ता | Leave a Comment मेरे बाद मुझको ये ज़माना ढूंढेगा हकीकत को एक अफ़साना ढूंढेगा। सिर्फ यादों में सिमट जायेगा सफ़र अश्क भी बहने का बहाना ढूंढेगा। खत्म हो जायेगी कहानी जब मेरी मेरा ही दर्द अपना ठिकाना ढूंढेगा। सुबहें, शामें, रातें कितनी हसीं थी सूनापन वो खिलखिलाना ढूंढेगा। मुहब्बत करने वाले तन्हा नहीं रहते […] Read more » gazal Satyendra Gupta
कविता निर्दयी मेघ August 7, 2012 / August 7, 2012 by बलबीर राणा | Leave a Comment उत्तराखंड में भीषण मेघ वर्षा का मंजर देखकर मन उद्वेलित होता है, प्रकृति के इस क्रूर व्यवहार से अब किसको दोष दिया जाय नियति या………………….? ??????????????? बलबीर राणा “भैजी” निर्दयी मेघ ये क्या कर गया आना था धरती को सींचने विभित्सिका छोड़ गया हाहाकार मचा गया निर्दोष जीवन पर दोष लगाकर चल गया इतना भी […] Read more »
गजल गजल :गरीब का मुकद्दर August 6, 2012 / August 6, 2012 by सत्येन्द्र गुप्ता | Leave a Comment कभी गरीब प्याज ,गुड ,मिर्च से चने -बाजरे की रोटी खाता था । प्याज तो, कब का गायब हो गया था, उसकी थाली से ! गुड भी अब गायब हो गया है , उसकी थाली से ! बाकी रह गयी- मिर्च , क्या यह भी कभी गायब हो जायेगी , उसकी थाली से […] Read more » गजल :गरीब का मुकद्दर
गजल गज़ल:बाप ही जब बेटियों को इस तरह खाने लगें….. August 5, 2012 / August 5, 2012 by इक़बाल हिंदुस्तानी | 1 Comment on गज़ल:बाप ही जब बेटियों को इस तरह खाने लगें….. इक़बाल हिंदुस्तानी बच्चा बच्चा हाथ में थामेगा ख़ंजर देखना, और आगे चलके इस दुनिया के मंज़र देखना। जुल्म सहना छोड़कर जब उठ खड़े हो जाओगे, ज़िंदगी की भीख मांगेगा सितमगर देखना। फ़ितरतन तो आग उगलेगा शिकायत क्या करें, रख के पानी में हज़ारों साल पत्थर देखना। आपका कुनबा ज़माने में अमर हो […] Read more » gazal by iqbal hindustani गज़ल:बाप ही जब बेटियों को इस तरह खाने लगें