लेख जीवन के सही उद्देश्यों की तलाश करें

जीवन के सही उद्देश्यों की तलाश करें

-ललित गर्ग- जीवन का सार है प्रसन्नता और प्रगति। हममें से हर कोई प्रसन्न रहना एवं प्रगति करना चाहता है। हम जब आसपास देखते हैं…

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लेख “आओ! आर्यसमाज के सत्संग में चलें जहां जाने से अनेक लाभ होते हैं”

“आओ! आर्यसमाज के सत्संग में चलें जहां जाने से अनेक लाभ होते हैं”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। यह अकेला नहीं रह सकता। घर पर माता-पिता, भाई-बहिन, पत्नी, सन्तानें आदि पारिवारिक सदस्य होते हैं। घर…

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लेख जाकिर के विषवमन का खतरनाक होना

जाकिर के विषवमन का खतरनाक होना

 ललित गर्ग –भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द एवं आपसी भाईचारें की तस्वीर को रौंदने वाले, हमेशा ही विवादों को अपने साथ लेकर चलते वाले एवं खुद…

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व्यंग्य तब क्यों नहीं ,(व्यंग्य)

तब क्यों नहीं ,(व्यंग्य)

“ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थीपाँव जब जलती हुई शाखों से उतारे हमने इन मकानों को खबर है ना मकीनों को खबर उन दिनों…

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लेख ज्ञानोत्सव : भारतीयता का गौरव बोध कराने वाली होनी चाहिए नयी शिक्षा नीति

ज्ञानोत्सव : भारतीयता का गौरव बोध कराने वाली होनी चाहिए नयी शिक्षा नीति

समग्र शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए  — बृजनन्दन राजू  देश को आजादी मिलने के बाद जिनके हाथ में सत्ता की बागडोर आयी। उनके मन…

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लेख “देश में भारी वर्षा से बाढ़ की स्थिति पर मनुष्य का वश नहीं”

“देश में भारी वर्षा से बाढ़ की स्थिति पर मनुष्य का वश नहीं”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। आजकल वर्षा ऋतु चल रही है। देश भर में वर्षा हो रही है और देश के अधिकांश भागों में वर्षा से…

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लेख छोटे मुंह से बड़ी बड़ी बातें ?

छोटे मुंह से बड़ी बड़ी बातें ?

तनवीर जाफ़री बुज़र्गों से एक कहावत बचपन से ही सुनते आ रहे हैं कि “पहले तोलो फिर बोलो”। इस कहावत का अर्थ यह है कि किसी…

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कविता तन्हाइयां

तन्हाइयां

चाहूं मैं तुम साथ हो, जब पास हो तन्हाइयां कोई भी न साथ दे तब साथ हो तन्हाइयां मेरी हस्ती देख करके सब बिषैले हो…

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कविता आधे-अधूरे हम

आधे-अधूरे हम

एक वे हैं जो केवल , अधिकारों की हमेशा करते हैं मांग। अधिकारों के शोर में, भूल जाते है कर्तव्यों को । एक वे हैं,…

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कविता व्यर्थ ही चिन्ता किए क्यों जाते !

व्यर्थ ही चिन्ता किए क्यों जाते !

(मधुगीति १९०८११ अकासा) व्यर्थ ही चिन्ता किए क्यों जाते, छोड़ क्यों उनके लिए ना देते; करने कुछ उनको क्यों नहीं देते, समर्पण करके क्यों न ख़ुश होते ! कहाँ हर प्राण सहज गति है रहा, जटिलता भरा विश्व विचरा किया; ज़रूरी उनसे योग उसका है, समर्पित उसको उन्हें करना है ! कार्य जो कर सको उसे कर लो, शेष सब उनके हवाले कर दो; उचित विधि उसको लिए जावेंगे, क्षीण संस्कार करा भेजेंगे ! किए रचना जगत में धाया करो, सोच ना विचित्रों को लाया करो; चित्र जो बन रहे बना लो तुम, इत्र उनको भी कुछ छिड़कने दो ! पाएँगे कर वे कुछ ज्यों छोड़ोगे, किसी रस और में वे बोरेंगे; ‘मधु’ कुछ छोड़ भी जगत देते, प्रभु औ प्रकृति द्युति लखे चलते !  ✍? गोपाल बघेल ‘मधु’

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कविता दोषी ना प्राणी कोई जग होता !

दोषी ना प्राणी कोई जग होता !

(मधुगीति १९०८१० सकारा) दोषी ना प्राणी कोई जग होता,  सृष्टि परवश है वह पला होता; कहाँ वश उसके सब रहा होता, लिया गुण- धर्म परिस्थिति होता ! बोध कब बालपन रहा होता, खिलाता जो कोई है खा लेता; बताता जैसा कोई वह करता, धर्म जो सिखाता वो अपनाता ! विवेक अपना पनप जब जाता, समझ कुछ तत्व विश्व में पाता; ज्ञान सापेक्ष जितना हो पाता, बदल वह स्वयं को है कुछ लेता ! कहाँ सम्भव है बदलना फुरना, कहाँ आसान है प्रकृति पुनि रचना; कहाँ जीवन की राह सब मिलता, कहाँ जाती है ग्लानि सकुचाना ! साधना समर्पण है जब होता, मुक्ति रस पान प्रचुर जब होता; ‘मधु’ को प्रभु का भान तब होता, फिर कहाँ भेद दृष्टि रह पाता ! ✍? गोपाल बघेल ‘मधु’

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महत्वपूर्ण लेख पहलू खान की हत्या किसी ने नहीं की

पहलू खान की हत्या किसी ने नहीं की

डॉ. वेदप्रताप वैदिक पहलू खान की हत्या 1 अप्रैल 2017 को अलवर में हुई थी। उसे गायों की तस्करी करने के शक में 6 लोगों…

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