राजनीति कश्मीरः ट्रंप की मध्यस्थता ?

कश्मीरः ट्रंप की मध्यस्थता ?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मेहमान इमरान खान से कह दिया कि नरेंद्र मोदी ने पिछली मुलाकात में उनसे निवेदन किया…

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लेख कश्मीर मसले पर झूठ बोलकर डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से किया विश्वासघात

कश्मीर मसले पर झूठ बोलकर डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से किया विश्वासघात

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार अपने झूठ बोलने व बड़बोलेपन की आदत के लिए विश्व में प्रसिद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड…

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महत्वपूर्ण लेख भाषाई समरूपता से अखण्डित राष्ट्र की परिकल्प

भाषाई समरूपता से अखण्डित राष्ट्र की परिकल्प

डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’ माँ, माटी और मातृभाषा की अनिवार्यता और यथोचित सम्मान की चाह होना हर भारतवंशी का कर्तव्य भी है और नैतिक जिम्मेदारी भी। राष्ट्र केवल लोग नहीं बल्कि वहाँ का समाज, संस्कृति, लोगों के अंदर की भावनाएं, वहाँ की भाषा, वहाँ की जिम्मेदारव्यवस्था मिल कर बनाते है। और राष्ट्र के सम्पूर्ण तत्व की व्याख्या उस राष्ट्र का उपलब्ध ज्ञान भंडार ही कर सकता है, वहाँ की शिक्षा व्यवस्था से उसकी प्रासंगिकता प्रचारित होती है। उस राष्ट्र की आंतरिक अखण्डता और उसे एक सूत्र में बंधे रहने कीआवश्यकता का एकमात्र समाधान भाषाई समरूपता है, यानी ‘एक देश-एक जनभाषा’ की अनिवार्यता होने से सम्पूर्ण राष्ट्र में सामान्य लोक व्यवहार का सहज और सरल हो जाना निहित है।ऐसा इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि विभिन्न भाषा-भाषियों के मध्यआपसी सामंजस्य स्थापित करने के लिए किसी एक बिंदु का एक जैसा होना जरूरी है। किंतु जहाँ बात संवाद की आती है वहाँ संवाद का प्रथम सूत्र ही भाषा का एक होना है। वर्तमान में हिंदुस्तान में लगभग 500 से अधिक बोलियाँ व 22 भाषाएँ उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में जब तमिलनाडु से व्यवहार करना हो तो व्यक्ति को तमिल सीखना होगी और जब पंजाबी से व्यवहार करना हो तो पंजाबी। ऐसे में सामान्य बोलचाल की भाषाएक जैसी नहीं होने से संवाद की स्थापना असंभव है, और बिना संवाद के व्यापार, विनिमय, रिश्तेदारी आदि सभी ताक में रह जाते है। अन्य प्रान्त के लोगों में संवाद की सफलता के लिए एक मध्यस्थ भाषा का होना अत्यंत आवश्यक है। इस कमी को अंग्रेजी भी पूरा कर सकती है किंतु अंग्रेजी स्वभाषा नहीं है, और भारत चूँकि ग्राम प्रधान राष्ट्र होने से आज भी अंचल में अंग्रेजी प्रासंगिक और सहज नहीं है। इसीलिए हिंदी भाषा ही जनभाषा के रूप में एकमात्र श्रेष्ठ विकल्प उपलब्ध है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा है कि- ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।’ निजभाषा का महत्व सदा से ही अपनेपन के साथ संस्कार सींचन हेतु आवश्यक माना गया है। आरंभिक दौर में प्राकृत, पाली से सजा राष्ट्र का तानाबाना देवभाषा संस्कृत के प्रचारित होने के बाद सज नहीं पाया, संस्कृत भी आज के दौर में जनभाषा नहीं हैक्योंकि उसे बोलने-समझने वाले लोग अब मुट्ठीभर शेष है। प्राकृत-पाली के साथ संस्कृत निष्ठ हिन्दी का जन्म हुआ और यह हिन्दी ने जनता के बीच क्षेत्रीय भाषाओं से अधिक स्थान प्राप्त किया। क्षेत्रीय भाषाओं का अपना एक सीमित दायरा है इसमें कोई संशय नहीं है, और आज हिंदुस्तान के 57 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा हिंदी ही है। शेष 43 प्रतिशत लोग भी हिंदी से अपरिचित नहीं है, वे जानते-समझते है किंतु उनकी स्थानीय भाषाओं में वे ज्यादादक्ष है, ज्यादा प्रवीण है। इसीलिए जनभाषा के तौर पर हिन्दी की अस्वीकार्यता नहीं हो सकती, रही बात हिन्दी के विरोध की तो यह केवल भ्रम से उत्पन्न या कहे राजनैतिक प्रेरित विरोध के स्वर है। क्योंकि हिन्दी के प्रचारकों ने जिस तरह हिन्दी को एकसंस्कृति ही बना कर प्रस्तुत किया यह बहुत गलत है। हिन्दी एक भाषा है, न कि अकेली एक संस्कृति या धर्म। हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की सोच से ही हिन्दी भाषा का हश्र बिगड़ा हुआ है। भाषा महज अभिव्यक्ति का माध्यम और जनसंवाद का केंद्र है। यह कदापि सत्य नहीं है कि यदि हिंदी भाषा होगी तो हिन्दूराष्ट्र बनेगा। आज चलन में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव ज्यादा है ,तो क्या हम यह मान ले कि देश फिर इंग्लिशतान या ईसाईयत की तरफ बढ़ गया? या देश पुनः गुलाम हो चुका? भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र है, यहाँ प्रश्न अपनी जनभाषा के सम्मान का है न कि किसी धर्म के आधिपत्य का। भाषा किसी धर्म या पंथ की प्रतिलिपि नहीं होती, भाषा तो संवाद और संचार का माध्यम है। यहाँ बात स्वभाषा की स्थापना की है, न कि धर्म के साथजोड़ कर भाषा की हत्या की। हाल बुरा तो इसी सोच के चलते उर्दू का भी हुआ है। उर्दू के उम्दा फनकार राहत इंदौरी जी का शेर है- क़त्ल उर्दू का भी होता है और इस निस्बत से, लोग उर्दू को मुसलमान समझ लेते हैं जब हिन्दी को हिन्दू और उर्दू को मुसलमान माना जाता है तो इन्ही खोखले आधारों से भाषा के कारण युद्ध और विरोध का जन्म होता है। इसी पर तथाकथित लोगों को राजनीति करने का मौका मिल जाता है, इसे वे एक संस्कृति या धर्म को थोपना बताकरएक जनभाषा की हत्या कर देते है। भाषा मनोवैज्ञानिक प्रभाव का कारक हो सकती है पर वो कभी भी किसी धर्म की ठेकेदार नहीं होती। विखण्डनवादी सोच के चलते हिन्दुस्तान में आज सांस्कृतिक अखण्डता खतरे में है। क्योंकि हिन्दी कही थोपी नहीं जा रही, जो लोग कहते है कि आप हमारी दक्षिण भारतीय भाषा सीखिए, तो वे भी ये बताएं कि कितने प्रतिशत लोगों तक संवाद उससे सहज होगा,मात्र 8 से 10 प्रतिशत लोगों से और हिन्दी के कारण कम से कम 57प्रतिशत और अधिकतम

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गजल हिंदी गजल

हिंदी गजल

अविनाश ब्यौहार नेताजी हो गए अजागर। जनतंत्र है देश का नागर।। उफना रही सरिता अगर है, ढूंढ़ो यहाँ सुरक्षित बागर। तुम सदियों की प्यास बनो…

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प्रवक्ता न्यूज़ “स्वनामधन्य बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय का ऋषि दयानन्द के जीवन साहित्य में प्रमुख स्थान”

“स्वनामधन्य बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय का ऋषि दयानन्द के जीवन साहित्य में प्रमुख स्थान”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। ऋषि दयानन्द के अनुसंधान प्रधान जीवन चरित लेखकों में स्वनामधन्य पं0 देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी का नाम प्रमुख विद्वानों में है। आपके…

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पर्यावरण खुशियां हो या गम, आओ पेड़ लगाये हम

खुशियां हो या गम, आओ पेड़ लगाये हम

युद्धवीर सिंह लांबा पर्यावरण संतुलन के लिए पौधरोपण बहुत ही जरूरी है। प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन व वृक्षों के अंधाधुंध कटान नहीं रुका तो…

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लेख देवालय जाना हो तो ‘आजाद’ का देवालय जाइए

देवालय जाना हो तो ‘आजाद’ का देवालय जाइए

-मनोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार तारीखों के पन्ने में जुलाई 23 तारीख भी दर्ज है लेकिन यह तारीख पूरे भारत वर्ष के लिए गौरव की तारीख…

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कविता हिंदी ग़ज़ल

हिंदी ग़ज़ल

कुछ भी कर लो राजनीति में। कोठी भर लो राजनीति में।। रूप अगर मोहित करता हो सीता हर लो राजनीति में। सेर पे सवा सेर…

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लेख “आत्मा की सत्ता पर स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती जी के सारगर्भित विचार”

“आत्मा की सत्ता पर स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती जी के सारगर्भित विचार”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। स्वामी डॉ0 सत्यप्रकाश सरस्वती आर्यसमाज के शीर्ष विद्वानों में से एक थे। आर्यसमाज में वेद और विज्ञान से जुड़े उच्चकोटि के…

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लेख शिक्षा में नैतिक मूल्य विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी

शिक्षा में नैतिक मूल्य विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी

नई दिल्ली, 22 जुलाई 2019। अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्र मनुमुक्त भवन, नारनौल हरियाणा में ‘शिक्षा में नैतिक मूल्यों का समावेश’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में उल्लेखनीय लेखन, पत्रकारिता,…

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राजनीति हे! राजनीते , अहम त्वमेव शरणम गच्छामि

हे! राजनीते , अहम त्वमेव शरणम गच्छामि

 प्रभुनाथ शुक्ल हे! राजनीते तुझे शत्-शत् नमन। तेरी कोई भाषा और परिभाषा भी है यह मैं आज तक नहीं पढ़ पाया हूं। तेरे व्यक्तित्व की…

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समाज *”सोनभद्र हत्याकांड”  “प्रिंयका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है”*

*”सोनभद्र हत्याकांड” “प्रिंयका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है”*

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में हुए दस लोगों के जघन्य हत्याकांड के बाद प्रियंका गांधी की संघर्षशील कार्यशैली के चलते देश में अपनी राजनीतिक जमीन…

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