सुविधा से ज्यादा जरूरी है सुरक्षा की सड़कें
Updated: July 2, 2022
– ललित गर्ग- भारत का सड़क यातायात तमाम विकास की उपलब्धियों एवं प्रयत्नों के असुरक्षित एवं जानलेवा बना हुआ है, सुविधा की खूनी एवं हादसे…
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स्वामी विवेकानन्द अध्यात्म-विज्ञान के समन्वयक थे
Updated: July 2, 2022
स्वामी विवेकानन्द पुण्यतिथि-4 जुलाई 2022 पर विशेष-ललित गर्ग- स्वामी विवेकानन्द की कीर्ति युग-युगांे तक जीवंत रहेगी, क्योंकि उनका मानवहितकारी चिन्तन एवं कर्म कालजयी हैं, वे…
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अग्निपथ : कुछ अनुत्तरित सवाल
Updated: July 1, 2022
मनोज कुमारकिसी भी समाज की मजबूत नींव उसकी शिक्षा व्यवस्था से होती है. खासतौर पर प्राथमिक शिक्षा में क्या पढ़ाया जा रहा है, यह भविष्य…
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देश में हिंसक होते युवा आंदोलन
Updated: July 1, 2022
-सत्यवान ‘सौरभ’ गोल्डस्टोन ने लिखा है, “युवाओं ने पूरे इतिहास में राजनीतिक हिंसा में एक प्रमुख भूमिका निभाई है,” और एक युवा उभार कुल…
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महर्षि दयानन्द की प्रमुख देन चार वेद और उनके प्रचार का उपदेश
Updated: July 1, 2022
–मनमोहन कुमार आर्य महर्षि दयानन्द ने वेद प्रचार का मार्ग क्यों चुना? इसका उत्तर है कि उनके समय में देश व संसार के लोग असत्य व अज्ञान के मार्ग पर चल रहे थे। उन्हें यथार्थ सत्य का ज्ञान नहीं था जिससे वह जीवन के सुखों सहित मोक्ष के सुख से भी सर्वथा अपरिचित व वंचति थे। महर्षि दयानन्द शारीरिक बल और पूर्ण विद्या से सम्पन्न पुरुष थे। उन्होंने देखा कि सभी मनुष्य अज्ञान के महारोग से ग्रस्त है। उनमें सत्य व असत्य को जानने व समझने की योग्यता नहीं है। अतः अविद्या व अज्ञान का नाश करने के लिए उन्होंने असत्य, अज्ञान व अन्धविश्वासों के खण्डन और सत्य, ज्ञान के प्रचार सहित सामाजिक उत्थान के कार्यों का मण्डन किया। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ उनकी इस प्रवृत्ति व स्वभाव की पुष्टि करता है। सत्यार्थप्रकाश के पहले 10 समुल्लास सत्य से युक्त ज्ञान का मण्डन करते हैं तथा शेष चार समुल्लास असत्य, अज्ञान व अन्धविश्वासों का खण्डन करते हैं। महर्षि दयानन्द धर्मात्मा थे, दयालु थे, ईश्वर का यथार्थ ज्ञान रखने वाले ईश्वर भक्त थे तथा वह जीवात्मा का यथार्थ ज्ञान भी रखते थे। योग व ध्यान के द्वारा उन्होंने ईश्वर व जीवात्मा आदि पदार्थों का प्रत्यक्ष किया था। ऐसा विवेकशील धर्मात्मा सत्पुरुष किसी भी मनुष्य को दुःखी नहीं देख सकता। दुखियों को देख कर वह स्वयं दुखी होते थे। वह सबको अपने समान ईश्वर व आत्मा आदि का ज्ञान प्रदान कर सुखी व आनन्दित करना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने सत्य व यथार्थ ज्ञान का प्रचार करने के लिए ईश्वर से प्राप्त ज्ञान चार वेदों के प्रचार करने का निर्णय किया। यदि वह ऐसा न करते तो उनको चैन वा सुख-शान्ति न मिलती। यदि एक सच्चे डाक्टर के पास किसी रोगी को ले जाया जाये तो वह डाक्टर क्या करेगा? क्या उस रोगी को मरने के लिए छोड़ देगा व उसकी चिकित्सा कर उसे स्वस्थ करेगा? सभी जानते हैं कि सच्चा डाक्टर रोगी को स्वस्थ करने के उपाय करेगा। इसी प्रकार से एक अध्यापक जो ज्ञानी है, वह अपने व अपने लोगों का अज्ञान दूर करेगा। ज्ञानी होने का यही अर्थ होता है कि वह ज्ञान का प्रसार करे और अज्ञान को नष्ट करे। हम यह भी देखते हैं कि जब कोई अन्याय से पीड़ित होता है तो वह किसी शक्तिशाली मनुष्य की शरण में जाता है और उससे अपनी रक्षा की विनती करता है। धर्मात्मा व ज्ञानी शक्तिशाली मनुष्य अन्याय से पीड़ित व्यक्ति की रक्षा करना अपना धर्म वा कर्तव्य समझते हैं। यह सब गुण महर्षि दयानन्द जी में थे अतः उन्होंने सभी असहाय व अज्ञान के रोग से पीड़ित लोगों को वेदों का ज्ञान देकर उन्हें ज्ञानी व शक्ति से सम्पन्न बनाया। हम व अन्य सहस्रों मनुष्य भी उनके ज्ञान से उनकी मृत्यु के 139 वर्षों बाद भी लाभान्वित हो रहे हैं। उनका यह कार्य ही उनको विश्व में आज भी जीवित व अमर रखे हुए है। यदि वह ऐसा न करते तो आज हम व अन्य करोड़ों लोग उनका नाम भी न जानते, उनके प्रति श्रद्धा व आदर रखने का तो तब प्रश्न ही नहीं था। इस स्थिति में हम वेद, ईश्वर, आत्मा व मोक्ष प्राप्ति आदि के उपायों को भी न जान पाते। अतः महर्षि दयानन्द ने अज्ञान रोग से पीड़ित अपने देशवासी बन्धुओं किंवा विश्वभर के सभी मनुष्यों के अज्ञान व अन्धविश्वासों को दूर करने के लिए वेद प्रचार का मार्ग चुना और उसे अपूर्व रीति से सम्पन्न किया। यदि हम सूर्य पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि सूर्य में प्रकाश व दाहक शक्ति अर्थात् गर्मी व ऊर्जा है। सूर्य में आकर्षण शक्ति भी है। अपने इन गुणों का सूर्य अपने लिए प्रयोग नहीं करता अपितु वह इससे संसार व प्राणी मात्र को लाभान्वित करता है। यदि सूर्य न होता तो मनुष्य का सशरीर अस्तित्व भी न होता। इसी प्रकार से वायु पर विचार करने पर ज्ञात होता है कि वायु पदार्थों को जलाने में सहायक व समर्थ होने सहित मनुष्यों को प्राणों के द्वारा जीवित रखने में भी सहायक है। वायु का प्रयोजन अपने लिए कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार से जल, पृथिवी व समस्त प्राणी-जगत है जो स्वयं के लिए कुछ नहीं करते अपितु मनुष्यों व अन्यों के लिए ही अपने जीवन व अस्तित्व को समर्पित करते हैं। यदि सारा संसार व इसके सभी पदार्थ परोपकार कर रहे हैं तो क्या मनुष्य का यह कर्तव्य नहीं है कि उसमें ईश्वर ने जिन गुणों व शक्तियों को दिया है, उससे वह भी अन्य सभी मनुष्यों व प्राणियों का उपकार करें। यह अवश्य करणीय है और परोपकार करना ही मनुष्य का धर्म सिद्ध होता है। मत व धर्म शब्दों में कुछ भिन्नता है। मत का कुछ भाग धर्म को एक अंग के रूप में अपने भीतर लिए हुए होता है लेकिन वेदमत जो कि ईश्वर प्रदत्त मत है, उसे छोड़ कर कोई भी मत सर्वांश में पूर्णतः धर्म नही होता। यदि मतों में से अविद्या व उनके सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों को हटा दिया जाये और उन्हें वेदानुकूल बनाया जाये, तब ही उन्हें धर्म के निकट लाया जा सकता है। महर्षि दयानन्द पौराणिक मत में जन्मे थे। शिवरात्रि की घटना से उन्हें लगा कि ईश्वर की पूजा की यह रीति उपासना की सही रीति नहीं है। अतः उन्होंने उसका त्याग कर दिया और सत्य की खोज की। सत्य की खोज करते हुए उन्हें ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना का सर्वोत्तम साधन योग प्राप्त हुआ। इसका अभ्यास कर उन्होंने ईश्वर का साक्षात्कार व उसका प्रत्यक्ष भी किया जिसे उनके जीवन व कार्यों से जाना जा सकता है। अपनी विद्या प्राप्ति की तीव्र इच्छा को पूरी करने के लिए वह योग्य गुरुओं की तलाश करते रहे जो उन्हें 35 वर्ष की अवस्था में मथुरा के गुरु विरजानन्द जी के रुप में प्राप्त हुई और उनके सान्निध्य में तीन वर्ष रहकर उन्होंने प्राचीन वैदिक संस्कृत भाषा के व्याकरण अष्टाध्यायी-महाभाष्य पद्धति पर पूर्ण अधिकार प्राप्त किया। वैदिक साहित्य का कुछ अध्ययन वह पहले कर चुके थे और इस ज्ञानवृद्धि के प्रकाश में उन सभी ग्रन्थों के सत्यार्थ को जानकर वेदों के ज्ञान को भी उन्होंने प्राप्त किया। हमारे अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि महर्षि दयानन्द ने अध्यात्म के क्षेत्र में विद्या व योगाभ्यास से ईश्वरोपासना की शीर्ष स्थिति असम्प्रज्ञान समाधि को प्राप्त किया था। यह सब प्राप्त कर उनके जीवन का उद्देश्य व प्रयोजन पूरा हो गया था। अब अपने ज्ञान रूपी अक्षय धन को दान करने का अवसर था जिसे गुरु वा ईश्वर की प्रेरणा से प्राप्त कर उन्होंने देश-देशान्तर में पूरी उदारता व निष्पक्ष भाव से वितरित वा प्रचारित किया। …
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मदरसों में पढ़ाया जा रहा है ईशनिंदा का पाठ
Updated: July 1, 2022
संदर्भः उदयपुर में आतंकियों द्वारा कन्हैयालाल साहू की हत्या प्रमोद भार्गव आखिकार उदयपुर में आंतकवादियों द्वारा की गई दर्जी कन्हैयालाल की बर्बर हत्या से…
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आपातकाल – जब राजनीतिक विरोधियों के दमन का हथियार बन गया ‘मीसा कानून’
Updated: July 1, 2022
दीपक कुमार त्यागी देश की आंतरिक सुरक्षा को बेहतर बनाए रखने और उससे जुड़े हुए विभिन्न मामलों के निस्तारण के उद्देश्य से वर्ष 1971 में…
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भाजपा-शिवसेना सरकार : यही तो मिला था जनादेश
Updated: July 1, 2022
सुरेश हिंदुस्थानीमहाराष्ट्र में लम्बे समय तक चली राजनीतिक लड़ाई के परिणामस्वरूप राज्य में भाजपा-शिवसेना की सरकार बन गई है। शिवसेना किसकी है और भविष्य में…
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आदमी हो आदमी के लिए कुछ भला करो
Updated: June 30, 2022
—विनय कुमार विनायकराजनीति ना करो आदमी होआदमी के लिए कुछ भला करो जीओ और मरो! जब तुम काम करते हो मरने मारने के गंदे,तब तुम…
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कोरोना महामारी के बावजूद भारत में आय की असमानता हो रही है कम
Updated: June 30, 2022
कोरोना महामारी के खंडकाल में चूंकि आर्थिक गतिविधियां पूरे विश्व में ही विपरीत रूप से प्रभावित हुई थीं और इससे न केवल कई गरीब परिवारों…
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महंगी होती खाद से खेती करना मुश्किल
Updated: June 29, 2022
-प्रियंका ‘सौरभ’ उत्पादन बढ़ाने के लिए उर्वरक खेतों की उर्वरता बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। भारत अपनी उर्वरक आवश्यकताओं के लिए आयात…
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराने का दांव उल्टा पड़ा
Updated: June 29, 2022
गुजरात दंगे शीर्ष न्यायालय का फैसला प्रमोद भार्गव आखिरकार गुजरात के सांप्रदायिक दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को फंसाने का दांव याचिकाकर्ताओं और उसके उत्प्रेरकों को ही उल्टा पड़ गया। अब प्रमुख साजिशकर्ता तीस्ता शीतलवाड़ और आईपीएस आरबी श्रीकुमार पुलिस हिरासत में हैं। जकिया जाफरी ने एसआईटी रिपोर्ट के विरुद्ध शीर्ष न्यायालय में याचिका दायर की थी। दरअसल इन दंगों में जकिया के पति एहसान जाफरी की मौत हो गई थी। इन दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराने की मांग न्यायालय से की गई थी। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल इस मांग को खारिज कियाए बल्कि एसआईटी की जांच और एसआईटी द्वारा मोदी को दी गई क्लीन चिट को सही ठहराया। अलबत्ता न्यायालय ने तीखा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की कि ष्यह याचिका कड़ाही को खौलाते रहने की मंशा से दायर की गई है। जाहिर है, इसके पीछे का इरादा गलत है। अतएव इस प्रक्रिया में शामिल सभी लोगों को कटघरे में खड़ा करने की जरूरत है। ऐसे लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही जरूरी है।यह टिप्पणी न्यायमूर्ति एएम खानविलकर की अगुवाई वाली पीठ ने 452 पृष्ठ के फैसले में करते हुए कहा है कि जकिया की याचिका किसी दूसरे के निर्देशों से प्रेरित है। जकिया याचिका के बहाने परोक्ष रूप से अदालत में विचाराधीन मामलों में दिए गए फैसलों पर भी प्रश्नचिन्ह लगा रही हैं। ऐसा क्यों कियाए यह उन्हें पता है। स्पष्ट रूप से उन्होंने किनके इशारे पर ऐसा कियाए यह जांच का विषय है जिसे किया जाना आवश्यक है। 2002 में राजधानी अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी नरसंहार से जुड़े मामले में विशेष जांच दल अदालत ने फैसला सुनाया था। अहमदाबाद में हुए दंगों के 14 साल बाद यह फैसला आया था। यह मामला कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी समेत 69 लोगों की हत्या से जुड़ा था। बहुचर्चित इस मामले में विशेष जांच दल ने 66 आरोपियों को नामजद किया था। इनमें से 24 आरोपियों को दोषी और 36 को निर्दोष करार दिया गया था। 24 में से 11 को अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी पाया। बांकी 13 को इससे कमतर अपराधों का दोषी माना था। कुल आरोपियों में से 6 की मौत फैसला आने से पहले ही हो चुकी थी। इस फैसले की सबसे अहम बात यह रही कि किसी भी आरोपी को धारा 120.बी के तहत पूर्व नियोजित साजिश का दोषी नहीं पाया गया था। अदालत ने इस संदर्भ में स्पष्ट रूप से कहा था कि उपद्रवी भीड़ ने जो कुछ भी कियाए वह क्षणिक या तात्कालिक उत्तेजना के चलते किया। दरअसल कांग्रेस समेत जो भी वामपंथी दलए विदेशी धन से पोषित चंद एनजीओ और बौद्विक धड़े थे जिन्होंने अपने बयानों और छद्म लेखन से यह धारणा रचने की पुरजोर कोशिश…
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