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बंगाल चुनाव देश की राजनीति की दिशा तय करेगा।

बंगाल एक बार फिर चर्चा में है। गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद, सुभाष चंद्र बोस, औरोबिंदो घोष, बंकिमचन्द्र चैटर्जी जैसी महान विभूतियों के जीवन चरित्र की विरासत को अपनी भूमि में समेटे यह धरती आज अपनी सांस्कृतिक धरोहर नहीं बल्कि अपनी हिंसक राजनीति के कारण चर्चा में है।

वैसे तो ममता बनर्जी के बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में दोनों ही कार्यकाल देश भर में चर्चा का विषय रहे हैं। चाहे वो 2011 का उनका कार्यकाल हो जब उन्होंने लगभग 34 साल तक बंगाल में शासन करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी को भारी बहुमत के साथ सत्ता से बेदखल करके राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली हो। या फिर वो 2016 हो जब वो 294 सीटों में से 211 सीटों पर जीतकर एकबार फिर पहले से अधिक ताकत के साथ राज्य की मुख्यमंत्री बनी हों। दीदी एक प्रकार से बंगाल में विपक्ष का ही सफाया करने में कामयाब हो गई थीं।

क्योंकि विपक्ष के नाम पर बंगाल में तीन ही दल हैं जिनमें से कम्युनिस्ट के 34 वर्ष के कार्यकाल और उसकी कार्यशैली ने ही बंगाल में उसकी जड़ें कमजोर करीं तो कांग्रेस बंगाल समेत पूरे देश में ही अपनी जमीन तलाश रही है। लेकिन वो बीजेपी जो 2011 तक मात्र 4 प्रतिशत वोट शेयर के साथ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बंगाल में अपना अस्तित्व तलाश रही थी, 2019 में 40 प्रतिशत वोट शेयर के साथ तृणमूल को उसके ही गढ़ में ललकारती है। बल्कि 295 की विधानसभा में 200 सीटों का लक्ष्य रखकर दीदी को बेचैन भी कर देती है।

इसी राजनैतिक उठापटक के परिणामस्वरूप आज उसी बंगाल की राजनीति में भूचाल आया हुआ है। लेकिन जब बात राजनीतिक दाँव पेंच से आगे निकल कर हिंसक राजनीति का रूप ले ले तो निश्चित ही देश भर में चर्चा ही नहीं गहन मंथन का भी विषय बन जाती है। क्योंकि जिस प्रकार से आए दिन तृणमूल और भाजपा के कार्यकर्ताओं की हिंसक झड़प की खबरें सामने आती हैं वो वहाँ की राजनीति के गिरते स्तर को ही उजागर करती हैं। भाजपा का कहना है कि अबतक की राजनैतिक हिंसा में बंगाल में उनके 100 से ऊपर कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। यह किसी से छुपा नहीं है कि बंगाल में चाहे स्थानीय चुनाव ही क्यों न हों , चुनावों के दौरान हिंसा आम बात है। लेकिन जब यह राजनैतिक हिंसा बंगाल की धरती पर होती है, तो उसकी पृष्ठभूमि में “माँ माटी और मानुष” का नारा होता है जो माँ माटी और मानुष इन तीनों शब्दों की व्याख्या को संकुचित करने का मनोविज्ञान लिए होता है। इसी प्रकार जब वहाँ की मुख्यमंत्री बंगाल की धरती पर खड़े होकर गैर बंगला भाषी को “बाहरी” कहने का काम करती हैं तो वो भारत की विशाल सांस्क्रतिक विरासत के आभामंडल को अस्वीकार करने का असफल प्रयास करती नज़र आती हैं। क्योंकि ग़ुलामी के दौर में जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इस देश के अलग अलग हिस्सों से अलग अलग आवाजें उठ रही थीं तो वो बंगाल की ही धरती थी जहाँ से दो ऐसी आवाजें उठी थीं जिसने पूरे देश को एक ही सुर में बांध दिया था। वो बंगाल का ही सुर था जिसने पूरे भारत की आवाज़ को एक ही स्वर प्रदान किया था। वो स्वर जिसकी गूंज से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलने लगी थी। वो गूंज जो कल तक इस धरती पुत्रों के इस पुण्य भूमि के प्रति प्रेम त्याग और बलिदान का प्रतीक थी वो आज इस देश की पहचान है। जी हाँ “वंदे मातरम” का नारा लगाते देश भर में न जाने कितने आज़ादी के मतवाले इस मिट्टी पर हंसते हंसते कुर्बान हो गए। आज वो नारा हमारा राष्ट्र गीत है और इसे देने वाले बंकिमचन्द्र चैटर्जी जिस भूमि की वंदना कर रहे हैं वो मात्र बंगाल की नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की है। रबिन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित “जन गण मन” केवल बंगाल की नहीं हमारे भारत राष्ट्र की पहचान है। इसी प्रकार 1893 में विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने सनातन धर्म की व्याख्या करते समय भारत देश का प्रतिनिधित्व किया था बंगाल का नहीं। बंगाल की धरती ऐसे अनेकों उदाहरणों से भरी पड़ी है। और जब ऐसी धरती से देश के अन्य राज्य के नागरिक के लिए “बाहरी” शब्द का प्रयोग किया जाता है वो भी वहाँ की मुख्यमंत्री के द्वारा वो केवल बंगाल की महान सांस्कृतिक विरासत का ही अपमान नहीं होता बल्कि देश के संविधान को भी नकारने का प्रयास होता है। दरसअल जब राजनैतिक स्वार्थ राष्ट्र हित से ऊपर होता है तो इस प्रकार के आचरण सामने आते हैं। लेकिन दीदी को समझना चाहिए कि वर्तमान राजनैतिक पटल पर अब इस प्रकार की राजनीति का कोई स्थान नहीं है।

बंगाल के आने वाले चुनावों की तैयारी करने से पहले उन्हें देश में हुए कुछ ताज़ा चुनाव परिणामों पर नज़र डाल लेनी चाहिए ताकि उन्हें वोटर का मनोविज्ञान समझने में आसानी हो। किसान आंदोलन के बीच राजिस्थान जिला परिषद और पंचायत के ताजा चुनावों में किसान आंदोलन का समर्थन करने वाले दलों को जनता नकार देती है। असम में तिवा स्वायत्त परिषद के चुनाव में बीजेपी को

36 में से 33 सीट देकर वहाँ की जनता अलगाववाद की बात करने वाले संगठनों को पूरी तरह से बाहर का रास्ता दिखा देती है। इसी प्रकार हाल ही में जम्मू कश्मीर के डीडीसी चुनावों में धारा 370 की वकालत करने वाले छह दलों के गुपकार गठबंधन को भी जनता अस्वीकार कर देती है। यह कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो देश में भविष्य की राजनीति की बदलती दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं। यह इस बात का संकेत हैं कि वोट बैंक की राजनीति अब जीत की कुंजी नहीं रही।

लेकिन फिर भी अगर बंगाल की वोट बैंक की राजनीति की बात करें तो वहाँ का वोट चार दलों में बंटता है। पिछले चुनाव परिणाम बताते हैं कि तृणमूल का वोट शेयर 43 प्रतिशत था और बीजेपी का 40 प्रतिशत। कांग्रेस 5 प्रतिशत और कम्युनिस्ट पार्टी लगभग 4 प्रतिशत। पिछले दो तीन चुनावों में (लोकसभा और विधानसभा मिलाकर) तृणमूल का वोट शेयर बरकरार है जबकि कांग्रेस का कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से भाजपा को फायदा होता है। और चूंकि इस बार 2014 से ही भाजपा ने बंगाल में जमीनी स्तर पर काम किया है तो कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी से हताश बंगाल के लोगों को मोदी ब्रांड भाजपा में तृणमूल का एक सशक्त विकल्प नज़र आ रहा है। रही सही कसर ममता सरकार की ही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति पूरी कर सकती है जो काफी हद तक वहाँ के गैर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण का एक मजबूत कारण बन सकती है। इसलिए दीदी को समझना चाहिए कि इस दौर में नकारात्मक राजनीति से सकारात्मक परिणाम मिलने मुश्किल हैं। लेकिन दीदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस बार उनका मुकाबला विपक्ष के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करने वाले या कर्ज़ माफी जैसे खोखले नारे देने वाले किसी दल से ना होकर बूथ लेवल पर काम करने वाले संगठन से है। इसलिए बंगाल का यह चुनाव तृणमूल बनाम भाजपा मात्र दो दलों के बीच का चुनाव नहीं रह गया है बल्कि यह चुनाव देश की राजनीति के लिए भविष्य की दिशा भी तय करेगा। बंगाल की धरती शायद एक बार फिर देश के राजनैतिक दलों की सोच और कार्यशैली में मूलभूत बदलाव की क्रांति का आगाज़ करे।

डॉ नीलम महेंद्र

कांग्रेस को अब डूबने से कोई नहीं बचा सकेगा

मुंबई। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। मुंबई कांग्रेस का नेतृत्व बदलते ही पार्टी के वरिष्ठ नेता भंवरसिंह राजपुरोहित ने कांग्रेस अंदरूनी खस्ता हालत पर तीखा हमला बोलते हुए पार्टी में उत्तर भारतीयों, मारवाड़ियों और गुजरातियों जैसे बहुत बड़े वर्ग की उपेक्षा से होनेवाले नुकसान की बात कही है। हाल ही में की गई नियुक्तियों पर राजपुरोहित ने कहा है कि मुंबई के सबसे बड़े वर्ग को पूरी तरह से दरकिनार किया गया है, जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा फिर मुंबई में कांग्रेस को डूबने से कोई नहीं बचा सकेगा।

मुंबई कांग्रेस के एक दशक तक उपाध्यक्ष रहे भंवरसिंह राजपुरोहित ने कांग्रेस की वर्तमान हालत पर जारी अपने एक बयान में कहा है कि मुंबई कांग्रेस में नेतृत्व की बंदरबांट करते हुए उत्तर भारतीयों, मारवाड़ियों और गुजराती समाज जैसे बहुसंख्यक वर्ग को हर तरह से दरकिनार करने से वह बहुत अपमानित महसूस कर रहा है। उनका कहना है कि कांग्रेस अपने सबको साथ लेकर चलने के सिद्दांत से भटक गई है, इसके बहुत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मुंबई के कांग्रेसियों में पंडितजी के नाम से सम्मान पानेवाले वरिष्ठ नेता राजपुरोहित ने आहत भाव से कहा कि जन्मजात कांग्रेसी होने का कारण उन्हें दुख है कि जिस मुंबई शहर में कांग्रेस का जन्म हुआ और जहां से देश भर में कांग्रेस के राज का डंका बजा, वहीं कांग्रेस विचित्र स्थिति में समाते हुए गर्त में जा रही है। पांच दशक से भी ज्यादा वक्त तक कांग्रेस में विभिन्न पदों पर काम करनेवाले वरिष्ठ नेता भंवरसिंह ने दुख व्यक्त किया कि यह बहुत खतरनाक संकेत हैं, फिर भी किसी को इस बात की चिंता नहीं है।

कांग्रेस में उत्तर भारतीयों, मारवाड़ियों और गुजराती समाज की अवहेलना पर राजपुरोहित ने कहा कि मुंबई के इस सबसे बड़े वर्ग की उपेक्षा कांग्रेस को बरबाद करने की कोशिश है, जिसे नेतृत्व को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं न तो किसी पद की रेस में था, न हूं और न ही मुझे किसी पद की लालसा है। लेकिन मुंबई के 50 फीसदी से भी ज्यादा मतदाता मतदाताओं वाले उत्तर भारतीय, मारवाड़ी और गुजराती समाज की बहुत बड़ी ताकत को दरकिनार करके कांग्रेस ने उनका अपमान किया है। जबकि कांग्रेस के लिए यह, हर वर्ग के लोगों को जोड़ने का और संगठन को मजबूत करने का अवसर है। क्योंकि मुंबई में जमीनी स्तर पर पार्टी का संगठन चरमरा चुका है। लेकिन कांग्रेस ने तो संगठन में बहुसंख्यक वर्ग को दरकिनार करके उसे दूसरी पार्टियों में जाने के लिए स्वतंत्र कर दिया गया है।

मुंबई महानगरपालिका के फरवरी 2020 में होनेवाले चुनावों की बात करते हुए उन्होंने कहा कि देश के सबसे बड़े कॉस्मोपॉलिटन शहर में किसी भी वर्ग या समाज की उपेक्षा कांग्रेस को बहुत भारी पड़ सकती है, लेकिन फिर कांग्रेस ने इस तथ्य की चिंता किए बिना उत्तर भारतीयों, मारवाड़ियों व गुजरातियों को दरकिनार किया है। ऐसे में, महानगरपालिका में कांग्रेस की वर्तमान सीटों पर भी फिर से जीत पाना संभव नहीं होगा। उन्होंने सरकार में बैठे मंत्रियों एवं नेतृत्व की कमजोरी को उठाते हुए कहा है कि महाराष्ट्र में महाविकास आघाड़ी सरकार कांग्रेस की ताकत से ही बनी हुई है, लेकिन कार्यकर्ताओं को इस बात का कोई गर्व ही नहीं है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजपुरोहित ने पार्टी नेतृत्व से कहा है कि कार्यकर्ताओं और नेताओं में प्रदेश में अपनी सरकार के होने का फील ने आने के पीछे की वास्तविक वजहें भी तलाशनी चाहिए।

कांग्रेस को होनेवाले संभावित भारी नुकसान की तरफ इंगित करते हुए मुंबई कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भंवरसिंह राजपुरोहित ने कहा कि साफ दिख रहा है कि अब मुंबई में कांग्रेस को डूबने से कोई नहीं बचा सकता। कांग्रेस के लिए यह वक्त गलतियों से बचने का है, लेकिन संगठन में हर स्तर पर गलती और हर काम में बहुत देरी हो रही है। इस गलती का खामियाजा भी कांग्रेस को भुगतना होगा। 

दुनिया का अनोखा स्कूल “हिम्‍मतशाला”

विजयलक्ष्मी सिंह

आठवीं कक्षा यानि महज 13-14 वर्ष की उम्र, ये वो समय होता है जब किशोर जिंदगी का ककहरा सीखना शुरू ही करते हैं। इसी अपरिपक्व उम्र में चार बालको ने अपने सहपाठी मोनू पर स्कूल के नजदीक खेत में बीयर की टूटी बोतल से कई वार किए। मोनू सौभाग्यशाली रहा पेट में कांच के टुकड़े घुस जाने के बाद भी बच गया। किंतु इन चार किशोरों के लिए 10 सितंबर 2012 को जीवन के सारे दरवाजे बंद हो गये। पुणे की मुळशी तालुका में पिरंगुट गांव के सरकारी स्कूल ने इस घटना के बाद इन चारों को स्कूल से निकाल दिया। दो वर्ष किशोर सुधार गृह में रहने के बाद जब वे पिरंगुट वापस लौटे तो माथे पर अपराधी का टैग लग चुका था। गांव के लोगों से मिल रही घृणा उपेक्षा शायद उन्हें वापस उसी अपराध के दलदल में धकेल देती यदि उनका हाथ थाम कर उन्हें सही राह हिम्मत शाला ने न दिखाई होती।यह अनोखा “हिम्मत विद्यालय” पुणे की मुळशी तालुका में अंबडवेट नामक गांव में राष्ट्रीय सर्वांगीण ग्रामविकास संस्था‍न पुणे द्वारा संचालित किया जाता है। यह विद्यालय उन ड्रॉपआउट बच्चों को पढ़ाकर दसवीं बोर्ड़ परीक्षा उत्तीर्ण करवाता है जो अपराध,नशा व अन्य विड़म्बानाओं का शिकार होकर अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं। कुछ बच्चे तो 10 से 12 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद पुनः यहां से दसवीं पढते हैं। संघ के पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के प्रांत सेवा प्रमुख श्री अनिल व्यास एवं स्वयंसेवक नितिन घोडके के प्रयासों से 15 जुलाई 2012 को 8 बच्चों से शुरू हुआ यह अनोखा विद्यालय जिसे नाम दिया गया हिम्मत शाला। इस विद्यालय में सिर्फ एक ही कक्षा पढ़ाई जाती है वो है दसवीं। यहां देश भर के विभिन्न बोर्ड से आए बच्चे पढ़ते हैं। यहां इन्हें पढाई के साथ-साथ मोबाईल रिपेयरिंग, ड़ेयरी पालन, खेती ,विद्युत चालित यंत्र मरम्मत जैसे रोजगार परक प्रक्षिक्षण भी कराये जाते हैं। यहां से पढकर इन दिनों हिंजेवाडी आई.टी पार्क में केटरिंग कंपनियों को चपाती सप्लाई करने के ठेके लेने वाला मनीष आठवले (परिवर्तित नाम) वही बालक है जिसने बियर की बोतल से मोनू पर सबसे ज्यादा वार किए थे। पुणे के प्रतिष्ठित कुलकर्णी परिवार के इकलौते बेटे सुशील से अब सह्याद्रि स्कूल के प्रिंसिपल को कोई शिकायत नहीं है। वर्षों पहले सुशील ने गुस्से में आकर स्कूल पिकनिक पर सिगरेट के लाईटर से पूरी बस को आग लगा दी थी । आज वही युवक नासिक के प्रतिष्ठित कॉलेज से अपनी इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर रहा है। इन बच्चों में आए परिवर्तन का श्रेय जाता है -विद्यालय की योग अनुशासन व संस्कारों से परिपूर्ण दिनचर्या व राष्ट्रभाव से परिपूर्ण शिक्षाप्रणाली को। यह कहना है स्कुल के आरंभ से ही यहां मराठी विषय पढ़ाने वाले प्रदीप पाटिलजी का। वे बताते हैं कि यहां बच्चों को नियमित व्यायाम व योग के साथ खेतों में भी काम करवाया जाता है। वे कहते हैं हम किताबी पढाई से अधिक बल व्यावसायिक प्रशिक्षण पर देते हैं। यह सच है कि औद्योगिक विकास जीवन में समृद्धि के द्वार खोलता है परंतु विडंबना यह है कि कभी-कभी चुपके से विनाश भी उसी रास्ते से प्रवेश कर जाता है। पुणे से 40 कि.मी. दूर स्थित मुलशी तालुका में जब बहुत सारी फैक्ट्रियां खुली तो यहां की जमीन के दाम आसमान छूने लगे। अपनी जमीन बेचकर नए-नए लखपति बने लोग न खुद को सम्हाल पाए न अपने बच्चों को। नतीजा ये हूआ कि ये किशोर कई तरह के नशे के शिकार होकर अपराध की राह पर चल पड़े। 2011-12 में हालात इतने बिगडे कि मुलशी तालुका किशोर अपराधों में महाराष्ट्र में पहले स्थान पर पहुंच गया।दूसरी ओर राज्य सरकार के नियमानुसार आठवीं तक किसी बच्चे को अनुत्तीर्ण न करने की नीति के चलते नौंवी में स्कूल पर बोझ बन चुके पढाई में बेहद कमजोर बच्चों को स्कूल फेल करने लगे। ऐसे कुछ बच्चों का हाथ थामा हिम्मत शाला ने। शाला के संचालक योगेश कोळवणकर बताते हैं कुछ बच्चे यहां ऐसे भी आते हैं जो नौंवी कक्षा में ठीक से पढना तक नहीं जानते। कुछ तो १० साल पढाई छोडने के बाद यहां आते है। ऐसे बच्चों को दसवीं पास करने में दो से तीन वर्ष भी लग जाते हैं। वे संतोष काकडे का उदाहरण देते हैं जिसने 21 वर्ष की उम्र में स्कूल में एडमिशन लिया व ड्रग्स की लत का शिकार इस युवा ने दो वर्ष की मेहनत के बाद चार विषय उत्तीर्ण कर लिए । अब वह ड्रग्स नहीं लेता व अपने घर में पिता के साथ खेती कर रहा है।गत् 8 वर्षों में 160 से अधिक बच्चों के उज्जवल भविष्य की नींव रखने वाला हिम्मत विद्यालय अपने आप में देश का अनोखा विद्यालय है।

राजनीति में शुद्धता एवं सुशासन के प्रेरक महानायक

अटल बिहारी वाजपेयी जन्म जयंती-25 दिसंबर 2020
-ललित गर्ग-

राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने के आदर्श को जीने वाले महानायक एवं शासन में सुशासन के प्रेरक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जन्म जयंती 25 दिसंबर को भारत सरकार प्रतिवर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाती है। भारतीय राजनीति के महानायक, अजातशत्रु, हिंदी कवि, पत्रकार, प्रखर वक्ता एवं भारतीय जनता पार्टी के 96 वर्षीय दिग्गज नेता, श्री अटल विहारी वाजपेयी ने न केवल देश के लोगों का दिल जीता है, बल्कि विरोधियों के दिल में भी जगह बनाकर, अमिट यादों को जन-जन के हृदय में स्थापित कर हमसे जुदा हुए थे।
उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे। वहीं शिन्दे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटलजी का जन्म हुआ था। महात्मा रामचन्द्र वीर द्वारा रचित अमर कृति ‘विजय पताका’ पढ़कर अटलजी के जीवन की दिशा ही बदल गयी। छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे। डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ तो पढ़ा ही, साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलतापूर्वक करते रहे। अटलजी ने किशोर वय में ही एक अद्भुत कविता लिखी थी – हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय, जिससे यह पता चलता है कि बचपन से ही उनका रुझान देश हित, राष्ट्रीयता एवं हिन्दुत्व की तरफ था। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता, जिजीविषा, व्यापक दृष्टि आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति से जुड़े विचार उनके काव्य में सदैव ही दिखाई देते थे।
अटल विहारी वाजपेयी ने पांच दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, केंद्रीय विदेश मंत्री व प्रधानमंत्री- पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे, अनूठे रहे। घाल-मेल से दूर। भ्रष्ट राजनीति में बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। भारत सरकार ने सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से उनको अलंकृत किया, देश के सर्वोच्च सम्मान से जिसे सम्मानित किया जाये तो वह उस व्यक्ति की श्रेष्ठता का शिखर होता है। नेहरु-गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओं में शामिल है जिन्होंने सिर्फ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर न केवल सरकार बनाई बल्कि एक नयी सोच की राजनीति को पनपाया, पारदर्शी एवं सुशासन को सुदृढ़ किया। वाजपेयी बेहद नम्र इंसान थे और वह अंहकार से कोसों दूर थे। उनके प्रभावी एवं बेवाक व्यक्तित्व से पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू भी प्रभावित थे और उन्होंने कहा था कि अटलजी एक दिन भारत के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे। आज भारतीय जनता पार्टी की मजबूती का जो धरातल बना है, वह उन्हीं की देन है। 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वे इसे अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताते थे। 1980 में वे बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे। वे नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक। 1962 से 1967 और 1986 में वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वे संसद में बहुत प्रभावशाली वक्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं और महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके भाषण खासे गौर से सुने जाते रहे हैं, जो भारत के संसदीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है।
अटल विहारी वाजपेयी 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद 1998 तक वे लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। एनडीए का नेतृत्व करते हुए मार्च 1998 से मई 2004 तक, छह साल भारत के प्रधानमंत्री रहे।
इस दौरान उनकी सरकार ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीकी से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊचाइयों को छुआ। उन्होंने पडौसी देश पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सौहार्दपूर्ण बनाने की दृष्टि से भी अनेक उपक्रम किये। 19 फरवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। कुछ ही समय पश्चात् पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतर्राष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया।
अटल विहारी वाजपेयी चाहे प्रधानमन्त्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष- बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की, नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी करने में अटलजी कभी नहीं चूके। भारत को लेकर उनकी स्वतंत्र सोच एवं दृष्टि रही है-ऐसा भारत जो भूख, भय, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो। उनकी कविता जंग का ऐलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का जय-संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है। उन्होंने विज्ञान की शक्ति को बढ़ावा देने के लिए लाल बहादुर शास्त्री के नारे ‘जय जवान जय किसान’ में बदलाव किया और ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान’ का नारा दिया।
इस शताब्दी के भारत के ‘महान सपूतों’ की सूची में कुछ नाम हैं जो अंगुलियों पर गिने जा सकते हंै। अटल विहारी वाजपेयी का नाम प्रथम पंक्ति में होगा। मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे वाजपेयीजी से मिलने के अनेक अवसर मिले, रायसीना हिल पर अणुव्रत आन्दोलन एवं आचार्य तुलसी के कार्यक्रमों के सिलसिले में अनेक बार मिला। प्रधानमंत्री रहते 7 रेडक्रोस रोड पर तीन-चार मुलाकातें हुई। इस वर्ष उनके जन्म दिन पर कृृष्णा मेनन मार्ग पर भी उनके दर्शनों का दुर्लभ अवसर मिला। उनमें गजब का अल्हड़पन एवं फक्कड़पन था। वे हमेशा बेपरवाह और निश्चिन्त दिखाई पड़ते थे, प्रायः लोगों से घिरे रहते थे और हंसते-हंसाते रहते थे। उनके जीवन के सारे सिद्धांत मानवीयता एवं राष्ट्रीयता की गहराई ये जुड़े थे और उस पर वे अटल भी रहते थे। किन्तु किसी भी प्रकार की रूढ़ि या पूर्वाग्रह उन्हें छू तक नहीं पाता। वे हर प्रकार से मुक्त स्वभाव के थे और यह मुक्त स्वरूप भीतर की मुक्ति का प्रकट रूप है।
भारतीय राजनीति की बड़ी विडम्बना रही है कि आदर्श की बात सबकी जुबान पर है, पर मन में नहीं। उड़ने के लिए आकाश दिखाते हैं पर खड़े होने के लिए जमीन नहीं। दर्पण आज भी सच बोलता है पर सबने मुखौटे लगा रखे हैं। ऐसी निराशा, गिरावट व अनिश्चितता की स्थिति में वाजपेयीजी ने राष्ट्रीय चरित्र, उन्नत जीवन शैली और स्वस्थ राजनीति प्रणाली के लिए बराबर प्रयास किया। वे व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के बदलाव की सोचते रहे, साइनिंग इंडिया- उदय भारत के सपने को आकार देते रहे। उनका समूचा जीवन राष्ट्र को समर्पित एक जीवन यात्रा का नाम है,“ आशा को अर्थ देने की यात्रा, ढलान से ऊंचाई की यात्रा, गिरावट से उठने की यात्रा, मजबूरी से मनोबल की यात्रा, सीमा से असीम होने की यात्रा, जीवन के चक्रव्यूहों से बाहर निकलने की यात्रा। मन बार-बार उनकी तड़प को प्रणाम करता है। उस महापुरुष केे मनोबल को प्रणाम करता है!

यम नियमों का पालन किये बिना भक्ति व उससे लाभ होना असम्भव

-मनमोहन कुमार आर्य
मनुष्य ईश्वर का बनाया हुआ एक चेतन प्राणी है जिसके पास पांच ज्ञान एवं पांच कर्म इन्द्रियों से युक्त मानव शरीर है। शरीर में मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार नाम वाला अन्तःकरण चतुष्टय भी होता है। बुद्धि का कार्य ज्ञान प्राप्ति व उस ज्ञान का उपयोग करने में सहायक होना होता है। बुद्धि की सहायता से मनुष्य सत्य व असत्य का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। वह सत्य व असत्य का विचार कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग कर सकता है। सत्य को जानना, मानना व आचरण में लाना इस लिये आवश्यक होता है। सत्य से ही मनुष्य की उन्नति व असत्य व तदनुरूप आचरण से मनुष्य का पतन होता है। मनुष्य जितना अधिक ज्ञान प्राप्त करता है उसमें उसकी बुद्धि का योगदान होता है। इस ज्ञान को उसे अपने आचरण में ढालने के साथ दूसरों को भी सदुपदेश द्वारा ऐसा ही करने की प्रेरणा करनी होती है। परमात्मा नामी सत्ता एक न्यायाधीश के समान है। वह सब जीवों के सभी कर्मों की साक्षी होती है। मनुष्य ने इस जन्म व पूर्वजन्मों में नाना योनियों में जो भी कर्म किये होते हैं, परमात्मा उन सबको जानता है। परमात्मा का अपना कर्म फल विधान है जिसके अनुसार सदाचार व पुण्य कर्मों को करने से आत्मा व प्राणी को सुख मिलता है तथा इसके विपरीत असत्य आचरण करने पर दण्ड व दुःख प्राप्त होता है। वेदों का सत्य वेदार्थ ईश्वर को समाधि अवस्था में प्राप्त वेदों के ज्ञानी ऋषि ही जान सकते हैं। वह राग, द्वेष व निजी महत्वाकांक्षाओं से रहित तथा प्राणी मात्र के हितकारी होते हैं। उन्होंने ही वेदानुकूल शास्त्रों की रचना की है। योगदर्शन भी वेदों के अनुगामी ऋषि महर्षि पतंजलि की रचना है। योगदर्शन की समस्त सामग्री वेदों से ली गई है। इस सामग्री को ऋषि पंतजलि जी ने उपासना विषय के अनुरूप अपने ज्ञान व विवेक से साधारण जनता को समझाने के लिये योगदर्शन के रूप के प्रस्तुत किया है। योग के आठ अंग होते हैं जिनके नाम हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। योग के प्रथम दो अंग यम व नियम हैं। यम नियमों को जाने व इनका आचरण किये बिना कोई मनुष्य योग के फलों ध्यान व समाधि अर्थात् ईश्वर का सम्यक चिन्तन तथा उसके साक्षात्कार को प्राप्त नहीं हो सकता। अतः यम व नियमों को जानकर तथा उनको आचरण में लाकर ही भक्ति व उपासना के क्षेत्र में आगे बढ़ा जा सकता है। यम व नियम में जो मनुष्य व उपासक प्रवीणता व सिद्धि को प्राप्त हो जाते हैं उन्हीं का ध्यान करना व समाधि लगना सम्भव होता है। ईश्वर का सम्यक ध्यान करने के लिये मन व शरीर की जिस स्थिति की आवश्यकता होती है वह यम व नियमों का पालन करने से ही उत्पन्न होती व बनती है। अतः यम व नियम को जानकर इनका पालन करना सभी ईश्वर भक्तों, उपासकों व योगनिष्ठों का आवश्यक कर्तव्य होता है।

यम व नियम का पालन करने से मनुष्य का शरीर ईश्वर की भक्ति व साधना के लिये तैयार होता है। यम पांच होते हैं जिन्हें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह के नाम से जाना जाता है। मनुष्य को अहिंसा का तात्विक अर्थ समझ में आना चाहिये। अकारण किसी प्राणी को कष्ट या दुःख नहीं दिया जाना चाहिये। अहिंसा का अर्थ अन्य प्राणियों से वैर त्याग करना होता है। जब हमारा किसी प्राणी से वैर नहीं होगा तो हम उसके प्रति हिंसा, द्वेष व घृणा का व्यवहार कदापि नहीं करेंगे। हिंसा में द्वेष व घृणा तथा अज्ञान निहित होता है। अतः योगी व भक्त के लिए अपने मन से दूसरे प्राणियों के प्रति सभी प्रकार के वैर के भावों का त्याग कर देना चाहिये और किसी भी प्राणी को जाने अनजाने में कष्ट नहीं देना चाहिये। यदि अनजाने में भी हमसे किसी को कष्ट हो जाये तो उनसे क्षमा प्रार्थना करने के साथ ईश्वर से भी क्षमाप्रार्थी होना चाहिये तथा उस हिंसा के दोष से मुक्त होने के लिये पंचमहायज्ञों सन्ध्या, देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा बलिवैश्वदेव यज्ञों को करना चाहिये। अहिंसा को सिद्ध कर लेने पर दूसरे हिंसक प्राणी तक उस मनुष्य के प्रति हिंसा करना छोड़ देते हैं। ऐसा मनुष्य देश देशान्तर व घने वनों में भी निश्चिन्त, निर्भय व स्वछन्द घूम सकता है। ऐसा कहा व माना जाता है कि दूसरे प्राणी उसको हिंसा द्वारा हानि नहीं पहुंचाते। ईश्वर की भक्ति के लिये मनुष्य का अहिंसक होना आवश्यक होता है। इसका एक कारण यह भी होता है कि सभी प्राणी हमारे समान ईश्वर की सन्तानें हैं और अपने अपने कर्म फलों का भोग कर रहे हैं। ईश्वर को ही अधिकार है कि वह उन्हें सुख व दुःख प्राप्त कराये वा दण्ड दे। हमें अकारण किसी भी प्राणी को दुःख नहीं देना चाहिये। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम दूसरे प्राणियों पर अन्याय करने से ईश्वर के दण्ड के भागी बनते हैं। ऐसे मनुष्यों को ईश्वर भक्ति करने पर वह लाभ व सुख नहीं मिल सकता जो ईश्वर की यथावत आज्ञापालन करने वाले मनुष्यों को मिलता है। अतः सुख व आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक सभी मनुष्यों को ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए दूसरे प्राणियों के प्रति वैर त्याग कर पूर्ण अहिंसक बन जाना चाहिये। इससे उनकी ईश्वर भक्ति व उपासना को सफलता प्राप्त करने में सहायता प्राप्त हो सकती है।

अहिंसा के बाद दूसरा यम सत्य है। जो पदार्थ जैसा है उसको वैसा मानना सत्य व उसके विपरीत मानना असत्य होता है। मनुष्य को सत्य का ही सेवन करना चाहिये तथा असत्य को छोड़ना चाहिये। तीसरे नियम अस्तेय का अर्थ है मन में चोरी करने का विचार न आने देना। हम छिपकर कोई कार्य न करें। हमें यह ज्ञात होना चाहिये कि सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी ईश्वर हमारे सभी कर्मों का द्रष्टा व साक्षी है। अतः हमें किसी के पदार्थ को अधर्म से प्राप्त करने का विचार नहीं करना चाहिये। इसके विपरीत हमें अपने पास आवश्यकता से अधिक पदार्थों को दूसरे पात्र व साधनहीन लोगों में वितरीत करना चाहिये। हमें अपनी आवश्यकतायें कम से कम रखनी चाहियें। इसकी प्रेरणा भी ईश्वर ने वेदों में की है। पांच यमों में चैथे स्थान पर ब्रह्मचर्य पालन को आवश्यक बताया गया है। ब्रह्मचर्य को धारण कर ही हम ईश्वर की अनुभूति व उसका ध्यान करने में सफल हो सकते हैं। ब्रह्मचर्य का अर्थ भी सभी इन्द्रियों को पूर्ण संयम में रखना तथा उनसे कभी किसी प्रकार की कुचेष्टा का न करना होता है। ईश्वर व उसके स्वरूप में ही विचरण करना व उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना से युक्त रहना भी ब्रह्मचर्य होता है। ईश्वर भक्त व उपासक का जीवन ब्रह्मचर्य से युक्त होना चाहिये। पांचवां यम अपरिग्रह है। अपरिग्रह का अर्थ है पदार्थों, धन व साधनों का आवश्यकता से अधिक संचय न करना और अपनी आवश्यकतायें न्यूनतम रखना। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। 

पाचं नियम शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान हैं। शौच का अर्थ सभी प्रकार की स्वच्छता रखना होता है। हम शरीर व विचारों से भी स्वच्छ व शुद्ध रहें। हमारा जीवन शुद्ध व पवित्र होना चाहिये। सन्तोष का अर्थ है कि हानि-लाभ तथा मान-अपमान सहित अनुकूल व विपरीत परिस्थितियों में भी दुःखी न होना और मन को सामान्य, प्रसन्न व सन्तुष्ट रखना। ईश्वर की उपासना में मनुष्य का विपरीत परिस्थितियों में भी सन्तुष्ट रहना आवश्यक होता है। तीसरा नियम तप है। तप धर्म के आचरण में कष्ट व दुःखों को सहन करने को कहते हैं। धर्म का आचरण करने में हमें दुःख हो सकता है व होता ही है। ऐसा होने पर हमें उस काम को जारी रखना, निराश न होना तथा उद्देश्य प्राप्ति तक कार्य को करते जाने को तप कह सकते हैं। अतः हमें दुःख व कष्टों के भय से तप करना छोड़ना नहीं चाहिये। तप के बाद स्वाध्याय नाम का तीसरा नियम है। इस नियम का पालन करते हुए हमें वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन व चिन्तन मनन करना चाहिये। स्वाध्याय नित्य होना चाहिये। हम जितना स्वाध्याय करेंगे हमारा ज्ञान बढ़ेगा तथा हम निःशंक व भ्रान्तिरहित हांेगेे। ईश्वर प्रणिधान में हमें ईश्वर के प्रति दृण आस्थावान व समर्पित रहना चाहिये। हम हर क्षण ईश्वर की अपनी आत्मा में उपस्थिति को अनुभव करें और उसकी स्तुति व प्रार्थना करते रहें। उसको विस्मृत न होने दें। इस प्रकार इन पांच यम व नियमों का पालन करने के लिये हमें किसी धार्मिक स्थल पर जाने व विशेष रीति से पूजा करने की आवश्यकता नहीं है। सद्ज्ञान एवं सद्कर्म जिसमें ईश्वरोपासना व देवयज्ञ अग्निहोत्र सम्मिलित है, यह पूर्ण उपासना, भक्ति व पूजा है। ऐसा करके ही हम ईश्वर को प्राप्त होकर उसका साक्षात्कार कर सकते हैं। यम व नियमों से रहित भक्ति, उपासना व पूजा कृत्रिम कार्य होता है। हमें ईश्वर की भक्ति यम व नियमों का पालन करते हुए योगदर्शन के सभी नियमों व सिद्धान्तों के अनुसार ही करनी चाहिये। तभी हमारी भक्ति व जीवन सफल होगा और हम धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त हो सकेंगे। 

बढ़ते उपभोक्तावाद पर संयम का अंकुश जरूरी

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस- 24 दिसम्बर, 2020
-ः ललित गर्ग:-

उपभोक्ता में उत्पादकता और गुणवत्ता संबंधित जागरूकता को बढ़ाने, जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट, अधिक दाम, कम नाप-तौल इत्यादि संकटों से उपभोक्ता को मुक्ति दिलाने एवं उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के बारे में लोगों को जानकारी देकर उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने केे उद्देश्य से भारत में 24 दिसंबर को राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने के लिए इसी दिन 24 दिसंबर, 1986 को भारत सरकार ने ऐतिहासिक उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 लागू किया गया था। इसके बाद इस अधिनियम में 1991 तथा 1993 में संशोधन किए गए। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को अधिकाधिक कार्यरत और प्रयोजनपूर्ण बनाने के लिए दिसंबर 2002 में एक व्यापक संशोधन लाया गया और 15 मार्च 2003 से लागू किया गया। यह दिन भारतीय ग्राहक आन्दोलन के इतिहास में सुनहरे अक्षरांे में लिखा गया है। भारत में यह दिवस पहली बार वर्ष 2000 में मनाया गया और आगे भी प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है।
उपभोक्ता संरक्षण कानून से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य यह है की किसी भी शासकीय पक्ष ने इस विधेयक को तैयार नहीं किया बल्कि अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने प्रथमतः इस विधेयक का मसौदा तैयार किया। हम में से हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में उपभोक्ता है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुसार कोई व्यक्ति जो अपने उपयोग के लिये सामान खरीदता है, वह उपभोक्ता है। उपभोक्ता क्योंकि संगठित नहीं हैं इसलिए हर जगह ठगा जाता है। इसलिए उपभोक्ता को जागना होगा और खुद को इन संकटों से बचाना होगा। बहुत कम उपभोक्ता जानते होंगे कि उनके क्या अधिकार हैं। राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस इसलिये मनाया जाता है ताकि उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा सके और इसके साथ ही अगर वह धोकाधड़ी, कालाबाजारी, घटतौली आदि का शिकार होते हैं तो वह इसकी शिकायत कर सकें। इस कानून में जीवन एवं संपत्ति के लिए हानिकारक सामान और सेवाओं की बिक्री के खिलाफ सुरक्षा का अधिकार दिया गया है, खरीदी गई वस्तु की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, स्तर और मूल्य, जैसा भी मामला हो के बारे में जानकारी का अधिकार एवं इसके लिए आवाज उठाने का अधिकार है।
उपभोक्ता दिवस मनाते हुए हम केवल उपभोक्ता अधिकारों की ही बात नहीं करते बल्कि उपभोक्ता की उन्नत एवं सम्यक् सोच को भी विकसित करते हैं। फ्रांसीसी विचारक विचारक ज्यां बोद्रियो ने आधुनिक उपभोक्तावाद की मीमांसा करते हुए कहा है कि पहले वस्तु आती है तो वह सुख देने वाली लगती है। अंत में वह दुःख देकर चली जाती है। पहले वह भली लगती है, किन्तु अंत में बुरी साबित होती है। आर्थिक विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के लिये उपभोक्ता जागृति जरूरी है। आज का उपभोक्तावादी दृष्टिकोण एक प्रकार का सम्मोहन बन गया है, हिस्टीरिया की बीमारी बन गया है। सम्मोहन करने वाला जैसा नचायेगा, उपभोक्ता वैसा ही नाचेगा, फिर उपभोक्ता संरक्षण कैसे संभव होगी? यह तभी संभव है जब हमारा उपभोग के प्रति सम्यक् दृष्टिकोण होगा।
अमेरिकी लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर ब्रिएना विएस्ट ने कहा भी है कि जब निजी स्तर पर हमारा दर्शन सिर्फ यही रह जाए कि हम बिना कोई प्रश्न पूछे वही करने लगें, जो हमें कहा जाए, तो इसका अर्थ है कि हम उपभोक्तावाद या अपने अहं या किसी के प्रति अंध श्रद्धा का शिकार हो रहे हैं या किसी ऐसे की इच्छा का पोषण कर रहे हैं, जो हमें नियंत्रित करना चाहता है। आज की बाजार शक्तियों इसी तरह उपभोक्ताओं का शोषण करती है। इन्हीं उपभोक्तावादी एवं बाजार शक्तियों के कारण जीवन में सुख का अभिप्राय केवल भोग और उपभोग को माना जाने लगा हैं। ऐसे में झूठी शानो-शौकत के दिखावे के चक्कर में उपभोक्ता अविवेकशील होकर अनावश्यक चीजों को भी थैले में भरकर घर ला रहा है। बाजार एवं उपभोक्तावादी संस्कृति के इस काले जादू के आगे उपभोक्ता बेबस एवं लाचार खड़ा हैं। जिसके कारण वस्तुओं की गुणवत्ता के स्तर में गिरावट आ रही हैं। कोई भी चीज मिलावटरहित मिलना अब संभव नहीं है। न चाहते हुए भी उपभोक्ता लूट का शिकार बन रहा है।
इतना ही नहीं, उपभोक्तावादी संस्कृति ने भोगवादी जीवन जीने के लिए मनुष्य के समक्ष नए आयाम प्रस्तुत किए हैं तथा उसे सुविधाभोगी बना दिया है। भोग्य वस्तुओं का उपयोग ही जीवन का प्रमुख लक्ष्य बन गया है। भोगवाद के कारण सबसे बड़ी हानि यह हुई है कि भोगों के प्रति रुचि या रति का गहरा पोषण हुआ है। बढ़ रही भोगों के प्रति रुचि भोगों से ऊपर नहीं उठने देती। आज के व्यक्ति का मूल्यांकन इन भोग-उपभोग की वस्तुओं के आधार पर होने लगा है। जिसके पास भोग की वस्तुएं अधिक होती हैं उसे समाज में अधिक प्रतिष्ठा मिलती है। भोगियों के बीच अधिक भोगी का महत्व हो, यह अस्वाभाविक भी नहीं है, ऐसा होता आया है, किंतु इससे भोगों को ही बढ़ावा मिलता है। व्यक्ति फिर भोगों के दोषों को गौण करके भी उनकी अभिवृद्धि में ही अपना जीवन अर्पित कर देता है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवन में भोग का नहीं, त्याग का महत्व बताया है। साधा जीवन उच्च विचार की बात कही है। क्योंकि जीवन में आंतरिक शक्तियों की अभिव्यक्ति बाह्य भोगों में उलझने से नहीं, अपितु उनका त्याग करने से होती है। भगवान महावीर ने इच्छाओं के परिसीमन, व्यक्तिगत उपभोग का संयम एवं संविभाग यानी अपनी संपदा का समाजहित में सम्यक् नियोजन के सूत्र दिये हैं। पंूजी, प्रौद्योगिकी और बाजार के उच्छृंखल विकास को नियंत्रित कर, व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सादगी एवं संयम को बल देकर, आर्थिक समीकरण एवं मानवीय सोच विकसित करके ही हम नया आदर्श समाज दर्शन प्रस्तुत कर सकते हैं। तभी जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण, त्याग एवं आडम्बर-दिखावामुक्त जीवन को प्राथमिकता दी जा सकेगी। इसी में विश्व की अनेक समस्याओं को समाधान निहित है और इसी में हमने कोरोना महाव्याधि से मुक्ति का मार्ग पाया है। असल में कोरोना महामारी ने जीवन को नये रूप में निर्मित करने की स्थितियां खड़ी की है, जिसका आधार बढ़ते उपभोक्तावाद पर नियंत्रण है। जिसने इच्छाएं सीमित रखी, वह कभी दुःखी नहीं होगा। क्योंकि वह इस सचाई को जानता है कि इच्छा को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। तभी तो महात्मा गांधी ने कहा- सच्ची सभ्यता वह है जो आदमी को कम-से-कम वस्तुओं पर जीना सीखाए। आज की उपभोक्तावादी एवं सुविधावादी जीवन-धारा में जैसे-जैसे भोगवाद बढ़ता जारहा है, कोरोना महामारी, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्रकृति दोहन, आतंकवाद, युद्ध, संघर्ष की स्थितियों बढ़ती जा रही है। समाज, राष्ट्र एवं विश्व में व्याप्त प्रदर्शन, दिखावा एवं फिजुलखर्ची पर नियंत्रण जरूरी है। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा भी है कि अगर तुम जितना कमाते हो और उससे कम खर्च करते हो तो तुम्हारे पास पारस पत्थर है।
नया उपभोक्तावाद एक प्रकार से नई हिंसा यानी कोरोना महामारियों का उपक्रम है। हिंसा, प्रतिस्पर्धा, सत्ता की दौड़ एवं आर्थिक साम्राज्य को इससे नया क्रूर आकार मिला है। क्योंकि उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ ने व्यक्ति को संग्रह, सुविधा, सुख, भोग-विलास एवं स्वार्थ से जोड़ दिया है। समस्या सामने आई- पदार्थ कम, उपभोक्ता ज्यादा। व्यक्तिवादी मनोवृत्ति जागी। स्वार्थों के संघर्ष में अन्याय, शोषण एवं अनैतिकता होने लगी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई तो दूसरी ओर गरीबी एवं अभाव की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में जलने लगा, तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गई। आदमी-आदमी से असुरक्षित हो गया।
प्रदर्शन एवं विलासिता में होने वाला अर्थ का अपव्यय समाज को गुमराह अंधेरों की ओर धकेलता है। विवाह शादियों में 35-40 करोड़ का खर्च, क्या अर्थ बर्बादी नहीं है। प्रश्न उठता है कि ये चकाचैंध पैदा करने वाली शादियां, राज्याभिषेक के आयोजन, राजनीतिक पार्टियां, जनसभाएं- मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विनाश के ही कारण हैं। इस तरह की आर्थिक सोच एवं संरचना से क्रूरता बढ़ती है, भ्रष्टाचार की समस्या खड़ी होती है, हिंसा को बल मिलता है और मानवीय संवेदनाएं सिकुड़ जाती है। अर्थ केन्द्रित उपभोक्तावाद समग्र मनुष्य-जाति के लिये भयावह बन रही है। इसलिये राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस जैसे उपक्रमों की आज ज्यादा उपयोगिता प्रासंगिकता है। 

अडिग संकल्प का ‘अटल’ एक राजनेता

(भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी के जन्मदिवस 25 दिसम्बर पर विशेष)

प्रभुनाथ शुक्ल 

भारत के राजनीतिक इतिहास में अटल बिहारी बाजपेयी का संपूर्ण व्यक्तित्व शिखर पुरुष के रुप में दर्ज है। दुनिया में उनकी पहचान एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रशासक, भाषाविद, कवि, पत्रकार व लेखक के रुप में है। संघी विचारधारा में पले- बढ़े अटलजी खुद को कभी बड़ा नहीँ समझा। राजनीति में उदारवाद एवं समता- समानता के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं। विचारधारा की कीलों से कभी अपने को नहीं बांधा। राजनीति को दलगत और स्वार्थ की वैचारिकता से अलग हट कर अपनाया और उसको जिया। जीवन में आने वाली हर विषम परिस्थितियों और चुनौतियों को स्वीकार किया।अटल बिहारी बाजपेयी राजनीति में कभी भी आक्रमकता के पोषक नहीं थे। वैचारिकता को उन्होंने हमेंशा तवज्जों दिया।

अटलजी नीतिगत सिद्धांत और वैचारिकता का कभी कत्ल नहीं होने दिया। राजनीतिक जीवन के उतार चढ़ाव में उन्होंने आलोचनाओं के बाद भी अपने को संयमित और तटस्थ रखा। राजनीति में धुर विरोधी भी उनकी विचारधाराओं और कार्यशैली के कायल थे। लेकिन पोखरण जैसा आणविक परीक्षण कर तीसरी दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के साथ दूसरे मुल्कों को भारत की शक्ति का एहसास कराया। आपातकाल के दौरान डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की श्रीनगर में मौत के बाद सक्रिय राजनीति में दखल दिया। हालाँकि उनके राजनीतिक मूल्यों की पहचान बाद में हुईं और भाजपा सरकार में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

संघ के संस्थापक सदस्यों में एक अटल ने 1951 में संघ की स्थापना की थी। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को हुआ था। उनके पिता कृष्ण बिहारी बाजपेयी शिक्षक थे। उनकी माता कृष्णा जी थी। वैसे वे मूलतः उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के बटेश्वर गांव के रहने वाले थे। लेकिन पिताजी मध्य प्रदेश में शिक्षक थे इसलिए उनका जन्म वहीं हुआ।
उनकी मृत्यु 16 अगस्त 2018 को नई दिल्ली स्थित एम्स में हुई।

उत्तर प्रदेश से उनका राजनीतिक लगाव सबसे अधिक रहा। प्रदेश की राजधानी लखनऊ वे सांसद थे। जबकि उन्हें श्रेष्ठ सांसद और लोकमान्य तिलक पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। कविताओं को लेकर उन्होंने कहा था कि मेरी कविता जंग का एलान है। पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का जय संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है। उनकी कविताओं का संकलन ‘मेरी इक्यावन कविताएं‘ खूब चर्चित हुई जिसमें….हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा…खास चर्चा में रही। राजनीति में संख्या बल का आंकड़ा सर्वोपरि होने से 1996 में उनकी सरकार सिर्फ एक मत से गिर गई और उन्हें प्रधानमंत्री का पद त्यागना पड़ा। यह सरकार सिर्फ तेरह दिन तक रही। बाद में उन्होंने प्रतिपक्ष की भूमिका निभायी। इसके बाद हुए चुनाव में वे दोबारा प्रधानमंत्री बने। संख्या बल की राजनीति में यह भारतीय इतिहास के लिए सबसे बुरा दिन था। लेकिन अटल बिहारी बाजपेयी बिचलित नहीं हुए उन्होंने इसका मुकाबला किया। 16 मई से 01 जून 1996 और 19 मार्च से 22 मई 2004 तक वे भारत के प्रधानमंत्री रहे। 1968 से 1973 तक जनसंघ के अध्यक्ष रहे।

राजनीतिक सेवा का व्रत लेने के कारण वे आजीवन कुंवारे रहे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए आजीवन अविवाहित करने का निर्णय लिया था। अटल बिहारी बाजपेयी गैर कांग्रेसी सरकार के इतर पहले प्रधानमंत्री बने जिन्होंने अपनी राजनीतिक कुशलता से भाजपा को देश में शीर्ष राजनीतिक सम्मान दिलाया। दो दर्जन से अधिक राजनीतिक दलों को मिलाकर उन्होंने राजग बनाया। जिसमें 80 से अधिक मंत्री थे, जिसे जम्बू मंत्रीमंडल भी कहा गया। सरकार ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। उन्हीं अटलजी की देन है कि आज़ भाजपा नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार का नेतृत्व कर रही है।

राजनीति के शिखर पुरुष अटलजी मानते हैं कि राजनीति उनके मन का पहला विषय नहीं था।राजनीति से उन्हें कभी-कभी तृष्णा होती थी। लेकिन वे चाहकर भी इससे पलायित नहीं हो सकते थे। क्योंकि विपक्ष उन पर पलायन का मोहर लगा देता। वे अपने राजनैतिक दायित्वों का डट कर मुकाबला करना चाहते थे। यह उनके जीवन संघर्ष की भी खूबी रही। वे एक कुशल कवि के रुप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे।

अटल ने अपने कार्यशील जीवन की शुरुवात पत्रकारिता से किया था। पत्रकारिता ही उनके राजनैतिक जीवन की आधारशिला बनी। उन्होंने संघ के मुखपत्र पांचजन्य,
राष्ट्रधर्म और वीर अर्जुन जैसे अखबारों का संपादन किया। अपने कैरियर की शुरुवात पत्रकारिता से किया।1957 में देश की संसद में जनसंघ के सिर्फ चार सदस्य थे। जिसमें एक अटल बिहारी बाजपेयी थी थे। संयुक्तराष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी में भाषण देने वाले अटलजी पहले भारतीय राजनीतिज्ञ थे। हिन्दी को सम्मानित करने काम विदेश की धरती पर अटल ने किया। उन्होंने सबसे पहले 1955 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। बाद में 1957 में गोंडा की बलरामपुर सीट से जनसंघ उम्मीदवार के रुप में जीत कर लोकसभा पहुंचे। उन्हें मथुरा और लखनऊ से भी लड़ाया गया। लेकिन हार गए । अटल जी बीस सालों तक जनसंघ के संसदीय दल के नेता के रुप में काम किया।

इंदिराजी के खिलाफ जब विपक्ष एक हुआ और बाद में जब देश में मोरारजी देशाई की सरकार बनी तो अटल जी को भारत का विदेशमंत्री बनाया गया। इस दौरान उन्होंने अपनी राजनीतिक कुशलता की छाप छोड़ी और विदेश नीति को बुलंदियों पर पहुंचाया। बाद में 1980 में वे जनतापार्टी से नाराज होकर पार्टी का दामन छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। उसी साल उन्हें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कमान सौंपी गयी। इसके बाद 1986 तक उन्होंने भाजपा अध्यक्ष पद का कुशल नेतृत्व किया। इंदिरा गांधी के कार्यों की सराहना की थी। जबकि संघ उनकी विचारधाराओं का विरोध कर रहा था।

कहा जाता है कि ससंद में इंदिरा गांधी को दुर्गा की उपाधि उन्हीं की तरफ से दी गई। उन्होंने इंदिरा सरकार की तरफ से 1975 में लादे गए आपातकाल का विरोध भी किया। लेकिन बंग्लादेश के निर्माण में इंदिरा गांधी की भूमिका को सराहा। उनका साफ कहना था कि जिसका विरोध जरुरी था उसका विरोध किया और जिसकी प्रशंसा चाहिए थी उसे वह सम्मान मिलना चाहिए। लेकिन आज़ के राजनीतिक संदर्भ में यह विचार लागू नहीँ होता। अब तो सिर्फ आलोचना ही राजनीति का मुख्य विषय है । अटल हमेंशा से समाज में समानता के पोषक थे। विदेश नीति पर उनका नजरिया साफ था। वह आर्थिक उदारीकरण एंव विदेशी मदद के विरोधी नहीं थे। लेकिन वह इमदाद देशहित के खिलाफ हो ऐसी नीति को बढ़ावा देने के वह हिमायती नहीं रहे।

पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री रहे लालबहादुर शास्त्री जी की तरफ से दिए गए नारे जय ‘जवान जय किसान’ के नारे में अलग से ‘जय विज्ञान’ भी जोड़ा। देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता गवांरा नहीं था। वैश्विक चुनौतियों के बाद भी राजस्थान के पोखरण में 1998 पांच परमाणु परीक्षण किया। इस परीक्षण के बाद अमेरिका, आस्टेलिया और यूरोपिय देशों की तरफ से भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया गया। लेकिन उनकी दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति इन परिस्थितियों में भी उन्हें अटल स्तंभ के रुप में अडिग रखा। कारगिल उद्ध की भयावहता का भी डट कर मुकाबला किया और पाकिस्तान को धुल चटायी।

दक्षिण भारत के सालों पुराने कावेरी जल विवाद का हल निकाला। इसके बाद स्वर्णिम चर्तुभुज योजना से देश को राजमार्ग से जोड़ने के लिए कारिडोर बनाया। मुख्य मार्ग से गांवों को जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना बेहतर विकास का विकल्प लेकर सामने आयी। कोंकण रेल सेवा की आधारशिला उन्हीं के काल में की गई थी। भारतीय राजनीति में अटल बिहारी बाजपेयी एक अडिग, अटल और लौह स्तभं के रुप में आने वाली पीढ़ी को सिख देते रहेंगे। हमें उनकी नीतियों और विचारधराओं का उपयोग देशहित में करना चाहिए।

मकर संक्रान्ति, उत्तरायण पर्व (बड़ा दिन) आज 22-12-2020 को

मनमोहन कुमार आर्य

                श्री राधेश्याम गोयल ‘ढाणीवाला’, नीचम का एक लेख 22 दिसम्बर को ‘‘सूर्य मकर रेखा पर पाणिनी कन्या गुरुकुल की आचार्या जी से व्हटशप पर प्रसारित होकर हमें प्राप्त हुआ है। इस लेख में लेखक की दो बातों का हम उद्धृत कर रहे हैं।

1-            22 दिसम्बर को पृथिवी पर मकर रेखा पर जब सूर्य की सीधी किरणें पड़ती हैं, तब पृथिवी का दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की सीधी किरणों के सामने रहने से दक्षिणी गोलार्द्ध के सभी देशों में प्रखर ग्रीष्म ऋतु रहती है जबकि उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की तिरछी किरणों के सामने रहने पर उत्तरी गोलार्द्ध के भारत सहित सभी देशों में प्रखर शीत ऋतु रहती है।

2-            22 दिसम्बर को सूर्य के मकर रेखा प्रवेश काल से ही सूर्य की उत्तरायण गति आरम्भ हो जाती है एवं दिन बढ़ने लगते है। सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व मकर-संक्रान्ति है। अतः 22 दिसम्बर को ही मकर संक्रान्ति मनाया जाना सर्वथा उचित है। क्योंकि ज्योतिष एवं धर्म का आधार खगोल विज्ञान ही है।

                इस आधार पर 22 दिसम्बर अर्थात् आज 22-12-2020 को मकर संक्रान्ति व उत्तरायण पर्व मनाये जाने की सार्थकता है। इसी बात को आर्य पर्व पद्धति के लेखक पं. भवानी प्रसाद जी ने भी स्वीकार किया है। उन्होंने लिखा है यद्यपि इस समय (14 जनवरी को) उत्तरायण परिवर्तन ठीकठीक मकर संक्रान्ति पर नही होता और अयनचयन की गति बराबर पिछली ओर को होते रहने के कारण इस समय (सवंत 1994 वि. में) मकर संक्रान्ति (14 जनवरी) से 22 दिन पूर्व धनु राशि के 7 अंश 24 कला पर ‘‘उत्तरायणहोता है। इस परिवर्तन को लगभग 130 वर्ष लगे हैं परन्तु पर्व मकर संक्रान्ति के दिन ही होता चला आता है, इससे सर्वसाधारण की ज्योतिषशास्त्रानभिज्ञता का कुछ परिचय मिलता है किन्तु शायद पर्व का चलते रहना अनुचित मानकर मकरसंक्रान्ति के दिन ही पर्व की रीति चली आती हो।

                इस विवरण से स्पष्ट है कि भले ही हम मकर संक्रान्ति 14 जनवरी को मनायें, परन्तु उत्तरायण 22 दिसम्बर को आरम्भ होता है। आज 22 दिसम्बर, 2020 को ही वास्तविक रूप में उत्तरायण आरम्भ हो गया है। आज इसका प्रथम दिवस है। आज से दिन का बढ़ना तथा रात्रि की अवधि घटनी आरम्भ हो गयी है। इससे पहले दिन की अवधि घट रहे थे और रात्रि की अवधि बढ़ रही थी। वस्तुतः मकर संक्रान्ति वा उत्तरायण पर्व आज ही हैं, यह हमें ज्ञात होना चाहिये। हम यह भी बताना चाहते हैं कि 25 दिसम्बर से दिन बढ़ना आरम्भ नहीं होता जैसी कि कुछ लोगों में मिथ्या धारणा है। आज उत्तरायण आरम्भ हुआ तथा दक्षिणायण कल समाप्त हो गया है। 22 दिसम्बर से दिन बढ़ना आरम्भ हो चुका है और आगामी 6 महीने तक दिन के काल में वृद्धि जारी रहेगी। हमें इस ज्योतिषीय वा खगोलीय स्थिति का ज्ञान होना चाहिये।                 मकर संक्रान्ति वा उत्तरायण पर्व की सभी बन्धुओं को शुभकामनायें बधाई।

मनुष्य का आत्मा ही ईश्वर प्राप्ति व प्रार्थनाओं की पूर्ति का धाम है

-मनमोहन कुमार आर्य
मनुष्य की अपनी अपनी आवश्यकतायें एवं इच्छायें हुआ करती हैं। वह उनकी पूर्ति के लिये प्रयत्न भी करते हैं। मनुष्य जिस सामाजिक वातावरण में रहता है वहां उसे अपने बड़ों से जो शिक्षा मिलती है उसमें उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति हो जाती है। वह बिना छानबीन व विवेक से उन्हें स्वीकार कर लेता है। उसके पास अपना निजी ज्ञान व बुद्धि इतनी नहीं होती कि वह उनकी सत्यता को जान व समझ सके। मध्यकाल में लोगों ने अनेक स्थानों पर ईश्वर के धाम कल्पित किये व बनाये। देश की जनसंख्या का अधिकांश भाग अपने अपने मत व विश्वासों के अनुसार उन पर विश्वास रखता है। समय समय पर नाना प्रकार से वह उन स्थानों की यात्रायें कर वहां जाते हैं और अपने शुद्ध मन से अपनी सभी आवश्यकताओं व इच्छाओं सहित सुख एवं ऐश्वर्य की कामना करते हैं। ऐसा करते हुए विवेक बुद्धि वाले मनुष्यों को लगता है कि ईश्वर के विषय में इन श्रद्धालु बन्धुओं को यह भी ज्ञान नहीं है कि ईश्वर एकदेशी सत्ता नहीं अपतिु वह तो सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दस्वरूप, दयालु, अनादि व नित्य है। उसने मनुष्य व इतर प्राणियों की जीवात्माओं के लिये ही इस समस्त जगत वा सृष्टि को बनाया है। इसका पालन व प्रलय करना भी उसी एक ईश्वर की सामर्थ्य व शक्ति में है। हमारे पास अपना शरीर व मकान, कार, धन आदि जो जो पदार्थ हैं, उन सब का स्वामी व दाता भी वही एक परमेश्वर है। परमेश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक तथा सर्वान्तर्यामी सत्ता है। वह हमारी जीवात्मा के भीतर व बाहर सर्वत्र जगत व उससे भी दूर दूर तक विद्यमान है। जीव का ईश्वर से सम्बन्ध 24×7 अर्थात् हर क्षण व हर पल रहता है। मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति, उससे प्रार्थना करने व मांगने सहित उसे प्रसन्न करने के लिए अपने निवास से इतर किसी अन्य स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं है। वह तो हमारे मन की सभी बातों का जिनका हम क्षणिक विचार भी करते हैं, उन्हें पूर्णरूपेण तत्काल जान लेता है और उनका हमें फल भी प्रदान करता है।

ईश्वर हमारी सभी कामनाओं को हमारे ज्ञान, पुरुषार्थ व उसके लिये की गई सत्क्रियाओं के अनुरूप पूरी भी करते हैं। अतः ईश्वर प्राप्ति के लिये किसी अन्य स्थान व धाम आदि पर जाने की आवश्यकता वेद आदि सत्य शास्त्रों, ज्ञान व तर्क बुद्धि से सत्य सिद्ध नहीं होती। परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि सत्य व असत्य, उचित व अनुचित तथा करणीय व अकरणीय कार्यों के ज्ञान के लिये ही दी है। इस बुद्धि का प्रयोग न करना और सत्य व मिथ्या परम्पराओं को बिना विचार किये स्वीकार कर लेना मनुष्यपन अर्थात् मननशीलता नहीं है। वैदिक नियम भी है कि मनुष्य को प्रत्येक कार्य सत्य व असत्य का विचार कर ही करने चाहिये। यदि हम सब ऐसा करेंगे तभी कृतकार्य व सफल मनोरथ हो सकते हैं। वैदिक साहित्य का अध्ययन व तदनुरूप आचरण के द्वारा ही मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ व इष्ट पदार्थों धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त इष्ट व मनोरथ सिद्ध करने का अन्य कोई मार्ग नहीं है। यदि हम अनुचित तरीके से किसी पदार्थ को प्राप्त करने की इच्छा करेंगे वा वेद विरुद्ध आचरण करेंगे तो इसका दण्ड व दुःख हमें ईश्वर की व्यवस्था से अवश्य ही मिलेगा। हमें इस विषय में गम्भीरता से विचार कर अपने जीवन की दिनचर्या बनानी चाहिये जिसमें स्वाध्याय एवं ईश्वर के मनन आदि के लिए पर्याप्त समय होना चाहिये। ओ३म् तथा गायत्री मन्त्र के अर्थज्ञान पूर्वक जप से मन व आत्मा की शुद्धि होकर उन्नति को प्राप्त होती है। यह तर्क सिद्ध बात व मान्यता है। हम विश्वास रखते हुए प्रातः सायं अथवा खाली समय में जप व भक्ति आदि कार्यों को करेंगे तो हमें जीवन व परजन्म में भी इसका लाभ होगा। अतः हमें वेद, उपनषिद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों सहित ऋषि दयानन्द एवं आर्य विद्वानों के वेदभाष्यों का स्वाध्याय व अध्ययन नित्य प्रति श्रद्धा के साथ करना चाहिये। इसी से हमारी आत्मा की उन्नति होगी, हमें पुरुषार्थ की प्रेरणा प्राप्त होंगी और हम अपने जीवन में सभी आवश्यक वस्तुओं व पदार्थों सहित धन ऐश्वर्य से सम्पन्न हो सकते हैं। 

प्राचीन काल में हमारे ऋषि, मुनि, वानप्रस्थी, संन्यासी, विद्वान व वैज्ञानिक आदि गुरुकुलों व आश्रमों आदि में रहा करते थे। वहां जाकर हम उनका सम्मान करते थे और अपने योग्य सदुपदेश ग्रहण करते थे। हमारी धर्म व उपासना संबंधी जो शंकायें व समस्यायें होती थी उनका निराकरण भी उन विद्वानों से हो जाता था। ये विद्वान भी समाज में गृहस्थियों के यहां यदा कदा आते जाते रहते थे और अपने सदुपदेशों से उनको लाभान्वित करते रहते थे। इससे मनुष्यों को अपनी किसी मन्नत को पूरी करने के लिये किसी स्थान विशेष पर जाकर कुछ मांगना व कहना नहीं पड़ता था। विद्वान बता देते थे कि कुछ भी प्राप्त करना है उसके लिये ज्ञान से युक्त तदनुकूल कर्म व पुरुषार्थ करना होगा। ईश्वर को हृदय व आत्मा में धारण करना होगा। सत्कर्मों में प्रेरणा व कार्यों में सफलता की कामना अपने निवास पर ही ईश्वर से प्रार्थना करते हुए करनी होगी। ऐसा करके उचित समय बाद हमारी सभी कामनायें पूरी हो सकती है। सभी मनुष्यों को जो स्वयं को धर्मपारायण वा धार्मिक कहते हैं उनको पांच यम व पांच नियमों का ज्ञान होना चाहिये। पांच यम अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह हैं। पांच नियम शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान हैं। इन यम नियमों में प्रयुक्त शब्दों के सत्य अर्थ व इनके पालन का तरीका हमें आना चाहिये। सन्तोष रखने वाले मनुष्यों की आवश्यकतायें अति न्यून होती हैं। ऐसा करके ही हम स्वस्थ एवं प्रसन्न रह सकते हैं। अधिक मात्रा में धन हो जाने, सुख के साधन हो जाने तथा नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन करने से हम सुखी नहीं होते अपितु इनका भोग करने से परिणाम में अस्वस्थता आदि दुःख होते हैं और सुख-सुविधायें मनुष्य के जीवन को धर्मपरायण व तपस्वी रखने में भी बाधक होती हैं। अतः मनुष्य को अस्तेय एवं अपरिग्रह पर ध्यान देना चाहिये और भौतिक सम्पत्ति के साथ आध्यात्मिक सम्पत्ति यथा सद्गुणों व ईश्वर के ज्ञान व उपासना से आत्मा की उन्नति पर अपने मन को लगाना चाहिये। इसी में सभी मनुष्यों का कल्याण है। 

वेदों में मनुष्य के लिये पंचमहायज्ञों वा पांच पूजाओं का विधान है। यह कार्य मनुष्य जीवन के सुख व आत्मा की उन्नति के लिये ही किये जाते हैं। इनसे स्वस्थ जीवन व भौतिक उन्नति सहित आत्मा की उन्नति का लाभ भी प्राप्त होता है। प्रथम महायज्ञ व पूजा ईश्वर की उपासना है जिसे सन्ध्या व सम्यक् ध्यान करना कहा जाता है। यह प्रातः व सायं समय में रात्रि व दिन तथा दिन व रात्रि की सन्धि वेलाओं में किया जाता है। सन्ध्या का समय दोनों समय न्यून एक घंटा होने पर अधिक लाभ प्राप्त होते हैं। वैदिक धर्म में इसके अनुयायियों को प्रतिदिन प्रातः व सायं देवयज्ञ अग्निहोत्र करने का भी विधान है। इससे वायु शुद्धि, आत्म शुद्धि, आरोग्य तथा कामनाओं की सिद्धि होती है। देवयज्ञ अग्निहोत्र कर हम अनेक पापों से मुक्त भी होते हैं। यदि हम अग्निहोत्र नहीं करते व करेंगे तो हमें उन पापों का दुःख भोगना पड़ सकता है जो अनायास हमारे जीवन व्यतीत करने से वायु व जल विकार, इतर प्राणियों को अनचाहें होने वाली पीड़ा आदि के द्वारा होता है। जिन कामनाओं की पूर्ति के लिये हम अनेक धामों की यात्रायें करते व कष्ट सहन करते हैं वह तो ईश्वर की उपासना व देवयज्ञ अग्निहोत्र करने से घर बैठे ही पूरी हो जाती हैं। हमारे आजकल के धार्मिक स्थल व धाम विगत 2500 वर्षों के भीतर ही अस्तित्व में आये हैं। इससे पूर्व के लगभग दो अरब वर्षों में इन धार्मिक स्थानों व धामों की अनुपस्थिति में भी लोग धर्म कर्म करते थे। उन्हीं दिनों हमारे देश में ऋषि, मुनि, योगी, राम, कृष्ण, भीष्म पितामह, हनुमान, भीम आदि जैसे पुरुषश्रेष्ठ हुआ करते थे। अतः हमें स्वाध्याय तथा पंच महायज्ञों पर विशेष ध्यान देना चाहिये। वेद, शास्त्रों तथा ऋषियों की आज्ञा को देखना व पालन करना चाहिये। ऐसा करके ही हमारे समस्त मनोरथ पूर्ण होंगे। हमारा यह जन्म व परजन्म अर्थात् लोक व परलोक सुधरेगा। ईश्वर का परमधाम, जो हमारी आत्मा में निहित है, वहां उस ईश्वर का दर्शन व साक्षात्कार होगा तथा हमारी आत्मा दुःखों से मुक्त होकर मोक्षगामी होगी। इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं। 

लोकतंत्र की जीवंतता कैसे कायम हो?

ललित गर्ग
वर्तमान में भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र एक जीवित तंत्र है, जिसमें सबको समान रूप से अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार मर्यादा में, शालीनता एवं शिष्टता से चलने की पूरी स्वतंत्रता होती है, लेकिन सत्ता एवं राजनीति के शीर्ष पर बैठे लोगों द्वारा लोकतंत्र के आदर्शों को भूला दिया जाये तो लोकतंत्र कैसे जीवंत रह पायेगा? इनदिनों राजनीतिक खींचतान का जरूरत से ज्यादा बढ़ना और अदालत में पहुंचना लोकतंत्र के लिए दुखद ही नहीं, शर्मनाक भी है। राजनीतिक एवं सार्वजनिक जीवन में जो भी शीर्ष पर होते हैं वे आदर्शों को परिभाषित करते हैं तथा उस राह पर चलने के लिए उपदेश देते हैं। पर ऐसे व्यक्ति जब स्वयं कथनी-करनी की भिन्नता से लोकतांत्रिक मूल्यों के हाशिये से बाहर निकल आते हैं तब रोया जाए या हंसा जाए। लोग उन्हें नकार देते हैं। ऐसे व्यक्तियों के राजनीतिक जीवन चरित्र के ग्राफ को समझने की शक्ति/दक्षता आज आम जनता में है। जो ऊपर नहीं बैठ सका वह आज अपेक्षाकृत ज्यादा प्रामाणिक है कि वह सही को सही और गलत को गलत देखने की दृष्टि रखता है, समझ रखता है। लेकिन प्रश्न है कि लोकतंत्र के सिपहसलाहकार में लोकतंत्र की रक्षा की चेतना कैसे और कब जगेगी?


आए दिन किसी-न-किसी राज्य से अप्रिय राजनीतिक घटनाक्रम सामने आता है, कर्नाटक विधानसभा में विधानसभा अध्यक्ष के साथ अभद्र एवं आशालीन व्यवहार होता है तो कहीं पश्चिम बंगाल सरकार बिना प्राथमिक जांच के भाजपा नेता के खिलाफ मामले दर्ज कर देती है तो कहीं दिल्ली में आम आदमी पार्टी को केंद्रीय गृह मंत्री और दिल्ली के उप-राज्यपाल के घर के आगे प्रदर्शन में पुलिस जबरन रोक देती है। भोले से भोला व्यक्ति भी यह समझ सकता है कि पश्चिम बंगाल एवं दिल्ली में सत्ताधारी दल कानून-व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहा है। लोकतांत्रिक मूल्य राजनीतिक क्षेत्र में सिर का तिलक है और इनका हनन त्रासदी एवं विडम्बना का पर्याय होते जा रहे हंै।
राजनीतिक मकसद से विरोधियों या विपक्षियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति हो या सत्ताधारी सरकारों के काम में विपक्ष द्वारा अनुचित एवं अलोकतांत्रिक तरीकों से अवरोध खडे करना- अब किसी एक राज्य की स्थिति नहीं है, हर तरफ संविधान की शपथ लेने वाली सरकारों को अनुच्छेदों का दुरुपयोग करते देखा जाता है तो विपक्षी दल सदन की कार्रवाही में अवरोध खड़े करते हंै, गाली-गलौचपूर्ण अशालीन प्रदर्शन करते हैं। कैसी विडम्बनापूर्ण स्थितियां बन रही है कि इन त्रासद घटनाओं का संज्ञान अदालतों को लेना पड़ रहा है। गत शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने जहां पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगा, वहीं दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से। सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा के उन पांच नेताओं को राहत दी है, जिनके खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार बिना प्राथमिक जांच के मामले दर्ज किए जा रही थी। कोर्ट ने आदेश दिया है कि भाजपा नेताओं अर्जुन सिंह, कैलाश विजयवर्गीय, पवन सिंह, सौरव सिंह और मुकुल रॉय के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। अर्जुन सिंह का मामला तो खासतौर पर राजनीतिक भयादोहन की जीती जागती मिसाल है, जिसमें तृणमूल कांग्रेस छोड़ने के बाद बिना प्राथमिक जांच के ही अर्जुन सिंह के विरुद्ध पुलिस ने 64 मामले बना दिए हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट में मामला के निर्णय के बाद राज्य सरकार अपनी सम्मान रक्षा, लोकतंत्र की मर्यादा और सुशासन के लिए ज्यादा सक्रिय होगी।
दिल्ली पुलिस की खिंचाई जिस वजह से हुई है, वह वजह भी विचारणीय एवं नयी बन रही शासन-व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी है। आम आदमी पार्टी दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री और दिल्ली के उप-राज्यपाल के घर के आगे प्रदर्शन करना चाहती है। मामला भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले उत्तरी दिल्ली नगर निगम द्वारा धन की कथित हेराफेरी का है। लोकतंत्र के हिसाब से आप पार्टी को विरोध करने का हक है, पर दिल्ली पुलिस ऐसा करने नहीं दे रही। आप के कार्यकर्ता सीमित समय के लिए शांतिपूर्वक धरना एवं प्रदर्शन करना चाहते हैं, पर दिल्ली पुलिस ने 30 सितंबर से लागू दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के एक आदेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी में सभी राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा रखा है। अब दिल्ली पुलिस को हाईकोर्ट में अपना जवाब दाखिल करना है। सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या किसी आदेश से शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन को रोका जा सकता है? कहीं स्वयं राजनीतिक प्रदर्शन करना और कहीं विरोधियों के प्रदर्शन को रोकना लोकतांत्रिक दृष्टि से आदर्श स्थिति कतई नहीं है।
जनमत का फलसफा यही है और जनमत का आदेश भी यही है कि चुने हुए प्रतिनिधि चाहे किसी भी दल के हो, लोकतंत्र की भावनाओं एवं मूल्यों को अधिमान दें। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक सही अर्थों में लोकतंत्र का स्वरूप नहीं बनेगा तथा असंतोष किसी न किसी स्तर पर व्याप्त रहेगा। आज लोकतंत्र में बोलने की स्वतंत्रता का उपयोग गाली-गलौच एवं अतिश्योक्तिपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप में हो रहा है, लिखने की स्वतंत्रता का उपयोग किसी के मर्मोद्घटान, व्यक्तिगत छिंटाकशी एवं आरोपों की वर्षा से किया जा रहा है। चिन्तन एवं आचरण की स्वतंत्रता ने जनप्रतिनिधियों को अपने लोकतांत्रिक मूल्यों, अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं नैतिक मूल्यों से दूर धकेल दिया है। पीड़ा, दुःख एवं चिन्ता का दुश्चक्र तो यह है कि अधिकांश नेताओं एवं जनप्रतिनिधियों को इस स्थिति का न तो भान है और न ही परवाह भी है।
देश में लोकतंत्र कैसे मजबूत एवं संगठित होगा जब लोकतंत्र को संचालित करने एवं उसे जीवंतता देने का सामान्य व्यवहार भी नेताओं के पास नहीं है। शालीन ढंग से भी राजनीति हो सकती है और सभ्य-संवेदनशील तरीकों से सरकारें भी काम कर सकती हैं। संविधान में विरोध प्रदर्शन और उसकी सीमा स्पष्ट है। फिर क्यों लोकतांत्रिक मूल्यों एवं संविधान का हनन जनप्रतिनिधियों द्वारा एक बार नहीं, बार-बार हो रहा है। ऐसी आवश्यकता है कि मंत्रियों, सांसदों, विधायकों सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को लोकतंत्र का प्रशिक्षण मिले। यह आश्चर्य की बात है कि जब एक वकील, इंजीनियर, डाक्टर के लिये प्रशिक्षण अनिवार्य है तो जनप्रतिनिधियों के लिये प्रशिक्षण क्यों नहीं अनिवार्य किया जाता?
लोकतंत्र में किसी को भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन से नहीं रोका जा सकता, अगर हम ऐसा करने लगेंगे, तो लोकतंत्र की एक बड़ी विशिष्टता का लोप हो जाएगा। लेकिन इसके लिये प्रशिक्षण एवं शालीन तौर-तरीकों की अपेक्षा है। हर नेता या हर पार्टी को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े क्या यह लोकतंत्र के लिये उचित है? लोकतंत्र के मन्दिर की पवित्रता एवं जीवंतता इसी में है कि जनता को साथ लेकर ऐसे चला जाए कि जनता का शासन जनता के लिये हो, जिसमें सत्ता में रहते न कानूनों के दुरुपयोग की जरूरत पड़े और न विपक्ष में रहते कानून तोड़ने की। राजनीति में जब व्यक्ति राजनीतिक क्षेत्र में उतरता है तो उसके स्वीकृत दायित्व, स्वीकृत सिद्धांत व कार्यक्रम होते हैं, जिन्हें कि उसे क्रियान्वित करना होता है या यूं कहिए कि अपने कर्तृत्व के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों को जीकर बताना होता है परन्तु इसका नितांत अभाव है। लोकतंत्र के रेगिस्तान में कहीं-कहीं नखलिस्तान की तरह कुछ ही प्रामाणिक राजनीतिक व्यक्ति दिखाई देते हैं जिनकी संख्या अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। सत्ता एवं पद के लिए होड़ लगी रहती है, व प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर पद एवं सत्ता को येन-केन-प्रकारेण, लाॅबी बनाकर प्राप्त करना चाहते हैं। अरे पद तो क्राॅस है- जहां ईसा मसीह को टंगना पड़ता है। पद तो जहर का प्याला है, जिसे सुकरात को पीना पड़ता है। पद तो गोली है जिसे गांधी को सीने पर खानी होती है। पद तो फांसी का फन्दा है जिसे भगतसिंह को चूमना पड़ता है। आवश्यकता है, राजनीति के क्षेत्र में जब हम जन मुखातिब हों तो लोकतांत्रिक मूल्यों का बिल्ला हमारे सीने पर हो। उसे घर पर रखकर न आएं। राजनीति के क्षेत्र में हमारा कुर्ता कबीर की चादर हो।

मोतीलाल वोराः बड़े आदमी

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

20 दिसंबर को कांग्रेस के नेता श्री मोतीलाल वोरा का 93 वाँ जन्म दिन था और 21 दिसंबर को उनका निधन हो गया। वे न तो कभी राष्ट्रपति बने और न ही प्रधानमंत्री लेकिन क्या बात है कि लगभग सभी राजनीतिक दलों ने उनके महाप्रयाण पर शोक व्यक्त किया ? यह ठीक है कि वे देश या कांग्रेस के किसी बड़े (सर्वोच्च) पद पर कभी नहीं रहे लेकिन वे आदमी सचमुच बड़े थे। उनके- जैसे बड़े लोग आज की राजनीति में बहुत कम हैं। वोराजी जैसे लोग दुनिया के किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में आदर्श नेता की तरह होते हैं। वे अपनी पार्टी और विरोधी पार्टियों में भी समान रुप से सम्मानित और प्रिय थे। वे नगर निगम के पार्षद रहे, म.प्र. के राज्यमंत्री रहे, दो बार वहीं मुख्यमंत्री बने, उ.प्र. के राज्यपाल बने और चार बार राज्यसभा के सांसद रहे। कांग्रेस पार्टी के वे 18 वर्ष तक कोषाध्यक्ष भी रहे। असलियत तो यह कि ज्यादातर नेताओं की तरह उनमें न तो अहंकार था और न ही पदलिप्सा। उन्हें जो मिल जाए, उसी में वे खुश रहते थे। उनकी दीर्घायु और सर्वप्रियता का यही रहस्य है। उनका-मेरा संबंध पिछले लगभग 60 वर्षों से चला आ रहा था। वे रायपुर में सक्रिय थे और मैं इंदौर में। मैं कभी किसी दल में नहीं रहा लेकिन वोराजी डॉ. राममनोहर लोहिया की संयुक्त समाजवादी पाटी के कार्यकर्ता थे। मुझे जब अखिल भारतीय अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन का मंत्री बनाया गया तो मैंने वोराजी को म.प्र. का प्रभारी बना दिया। जब मैंने नवभारत टाइम्स में काम शुरु किया तो उन्हें अपना रायपुर संवाददाता बना दिया। वे इतने विनम्र और सहजसाधु थे कि जब भी मुझसे मिलने आते तो मेरे कमरे के बाहर चपरासी के स्टूल पर ही बैठ जाते थे। मुख्यमंत्री के तौर पर वे बिना सूचना दिए ही मेरे घर आ जाते थे। 1976 में मैंने जब हिंदी पत्रकारिता का महाग्रंथ प्रकाशित किया तो उन्होंने आगे होकर सक्रिय सहायता की। स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर उन्होंने पत्रकारों के इलाज में सदा फुर्ती दिखाई। वे उम्र में मुझसे काफी बड़े थे लेकिन राज्यपाल बन जाने पर भी मुझे भरी सभा में ‘बाॅस’ कहकर संबोधित करते थे। वे मेरे संवाददाता थे और मैं उनका सम्पादक लेकिन मैं हमेशा उनके गुण एक शिष्य या छोटे भाई की तरह ग्रहण करने की कोशिश करता था। वोराजी को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि!

आज की भाजपा में कितना प्रसांगिक होते अटल!


                                                                                       संजय सक्सेना

25 दिसंबर का दिन हिन्दुस्तान की तारीख में अहम स्थान रखता है। 25 दिसंबर को जहां पूरी दूनिया ‘क्रिसमस डे’ मनाती है, वहीं भारत में ‘क्रिसमेस डे’ के अलावा इस दिन को भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन को भी मनाया जाता है। 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में शिन्दे की छावनी में ब्राह्ममुहूर्त में अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ था। कहा जाता है कि महात्मा रामचंद्र वीर द्वारा रचित अमर कृति ‘विजय पताका’  पढ़कर अटल जी के जीवन की दिशा ही बदल गई थी।अटल जी ऐसे भारत निर्माण की कल्पना करना चाहते थ,ेे जिसमें जनता भूख-डर से, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो। ग्वालियर में जन्मे और 16 अगस्त 2018 को दिल्ली में दुनिया से ‘कूच’ कर गए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के 96 वें जन्मदिन पर केन्द्र की मोदी और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार कई कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के मौके पर 25 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के किसानों से संवाद का कार्यक्रम रखा है।इस संवाद में उत्तर प्रदेश के करीब 2500 इलाकों से किसान हिस्सा लेंगे। वही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 96वीं जयंती पर आगरा में अटल जी के पैतृक गाँव बटेश्वर में 14 करोड़ रुपये की विकास परियोजना शुरू करने की योजना बनाई है। बहुउद्देश्यीय सुविधा वाली इस परियोजना में ‘भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी संस्कृत संकल्प केंद्र’ बनाकर इसमें एक खुला थियेटर, लाइब्रेरी और बच्चों के लिए पार्क और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की जाएगी। साथ ही गांव में हाई मास्ट एलईडी लाइटें लगाई जाएंगी। कई अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों ने भी अटल जी की याद में कार्यक्रम रखे हैं।
     बहरहाल,अटल ही के 96 वें जन्मदिन पर एक तरफ केन्द्र की मोदी और राज्यों की भाजपा सरकारें तमाम कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं तो दूसरी तरफ सवाल उठ रहा है कि यदि आज अटल जी जीवित होते तो वह आज की भाजपा में कितना प्रसांगिक होते, यह सवाल इस लिए उठ रहा है,क्योंकि मोदी-आडवाणी से इत्तर मोदी-शाह की भाजपा काफी बदल चुकी है। अटल और मोदी का सरकार चलाने का तरीका एकदम अलग है। मोदी-शाह की भाजपा अपने विरोधियों को अपनी नहीं उन्हीं की शैली और जुबान में जबाव देती है। मोदी-शाह वाला भाजपा आलाकमान ‘दूध का दूध, पानी का पानी’ करने में गुरेज नहीं करता है। मौजूदा भाजपा नेृतत्व यह नहीं भूला है कि किस तरह से अटल जी की सरकार एक वोट से गिर गई थी। तब अटल जी ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान कांगे्रस और उनके साथ खड़े विपक्षी नेताओं से कहा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा,जब संख्याबल हमारे साथ होगा। बात 28 मई, 1996 की है जब अटल जी सदन में अपनी सरकार का बहुमत नहीं सिद्ध कर पाए थे,तब अटल जी ने अपने भाषण में कहा था,‘ अघ्यक्ष महोदय, हम संख्याबल के सामने सिर झुकाते हैं। मैं अपना इस्तीफा राष्ट्रपति जी को देने जा रहा हूं.।’ आज मोदी के साथ जबर्दस्त संख्या बल है। इसी संख्या बल के सहारे उन्होंने कश्मीर से धारा-370 हटा दी। नागरिकता संशोधन कानून बदल दिया। मुस्लिम महिलाओं को इंस्टेंट तीन तलाक के अभिशाप से मुक्ति दिला दी। अयोध्या में भगवान राम लला का भव्य मंदिर निर्माण भले ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हो रहा हो,लेकिन इसमें मोदी सरकार की इच्छाशक्ति का भी योगदान कम नहीं थी। विपक्ष के हो-हल्ले की चिंता किए बिना मोदी सरकार ने जीएसटी और नोट बंदी जैसे कड़े फैसले लिए। अटल जी को भले संख्याबल के सामने झुकना पड़ गया था,मोदी के साथ ऐसा कुछ नहीं है। बल्कि इसके उलट मोदी सरकार संख्याबल के सहारे विपक्ष के नापाक मंसूबों पर पानी फेरने में लगा है। अटल जी राजनीति में विरोधियों से संवाद पर जोर देेते थे,लेकिन मोदी सरकार विपक्ष से उतना ही संवाद करती है,जितना उसकी सरकार के कामकाम में फर्क न पड़े। इसी लिए वह अपने फैसले के खिलाफ होने वाले विरोध-प्रदर्शनों की भी चिंता नहीं करती है।  
    आज की तारीख में यह कहा जाए कि करीब 41 वर्ष पुरानी अटल-आडवाणी युग से काफी आगे निकल गई तो ऐसा कहना गलत नहीं होगा। अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी युग तक बीजेपी ने अपने 41 वर्षो के संघर्ष में तमाम तरह के उतार चढ़ाव से गुजरते हुए शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है। 10 सदस्यों के साथ जिस बीजेपी की नींव पड़ी थी,वह आज पहाड़ सी ऊंचाई छू रही है। आज भाजपा के देश में 18 करोड़ के करीब सदस्य हैं। केंद्र से लेकर 18 राज्यों में अपनी या गठबंधन की सरकार है और पार्टी के 303 लोकसभा सांसद हैं। बीजेपी देश ही नहीं, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा भी करती है।
  अप्रैल 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी,लाल कृष्ण आडवाणी,मुरली मनोहर जोशी,विजयाराजे सिधिंया, सिकंदर बख्त जैसे नेताओं ने मिलकर बीजेपी का गठन किया था। तब बीजेपी की कमान अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपी गई थी और पार्टी ने उनके नेतृत्व में सत्ता के शिखर तक पहुंचने का सपना देखा था। चार साल के बाद 1984 में लोकसभा चुनाव हुए तो भाजपा मात्र 2 सीटों पर सिमट गई। इस हार ने बीजेपी को रास्ता बदलने पर मजबूर होना पड़ा और पार्टी की कमान कट्टर छवि के माने जाने वाले नेता लालकृष्ण आडवाणी को सौंपी गई। एक तरफ कट्टर छवि वाले लाल कृष्ण आडवाणी तो दूसरी तरफ पार्टी का उदार चेहरा समझे जाने वाले अटल बिहारी वाजयेपी की सियासी जुगलबंदी देखने लायक थी। आडवाणी भले ही पार्टी अध्यक्ष थे,लेकिन अटल जी को वह ‘राम’ की तरह मानते थे। कभी भी दोनों नेताओं के बीच मनभेद नहीं देखा गया।
    खैर, आडवाणी के कंधों पर अब बीजेपी के नेतृत्व की जिम्मेदारी थी तो पार्टी पर नियंत्रण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का था। आडवाणी हिंदुत्व व राममंदिर मुद्दे को लेकर आगे बढ़े और इसके बाद ये रास्ता बनता हुआ सत्ता से शीर्ष तक चलता चला गया। यहां एक बात का और जिक्र जरूरी है।भारतीय जनता पार्टी पर अक्सर आरोप लगता रहता था की उसकी छवि कट्टर हिन्दुवादी थी। 1988 में भाजपा का एक फैसला उसके लिए टर्निंग प्वांइट साबित हुआ। इसी वर्ष हिमाचल के पालमपुर में बीजेपी के राष्ट्रीय अधिवेशन में अयोध्या मुद्दे को पार्टी के एजेंडे में शामिल कर लिया गया। लाल कृष्ण आडवाणी की चर्चित सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा ने बीजेपी में नई ऊर्जा का संचार किया और आडवाणी की लोकप्रियता भी बढ़ी और वह संघ से लेकर पार्टी की नजर में काफी बुलंदी पर पहुंच गए। इसी के चलते बीजेपी को 1989 के लोकसभा चुनाव में नई संजीवनी मिली,जब बीजेपी दो सीटों से सीधे देश में दूसरे नंबर की पार्टी बन गई। इसी दौरान छह दिसंबर को अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने  और आडवाणी का नाम ‘जैन हवाला डायरी’ में आने के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने आडवाणी से दूरी बना ली।
    तत्पश्चात, बीजेपी और संघ परिवार ने आडवाणी के बजाय उदारवादी छवि वाले अटल बिहारी वाजपेयी के चेहरे के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया। 1995 में मुंबई अधिवेशन में वाजपेयी को बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। हालांकि, पार्टी की कमान आडवाणी के हाथों में रही। अटल-आडवाणी की जोड़ी ने बीजेपी को शून्य से शिखर तक पहुंचाने का काम किया। बीजेपी ने 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में पहली बार 13 दिन की सरकार बनाई. इसके बाद 1998 में पार्टी की 13 महीने तक सरकार चली। 1999 में फिर एक ऐसा वक्त आया, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने बतौर प्रधानमंत्री अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। इस तरह वह सबसे लंबे समय तक गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे, लेकिन 2004 में बीजेपी की सत्ता में वापसी नहीं करा सके. इसके चलते बीजेपी को 10 साल तक सत्ता का वनवास झेलना पड़ा। यहीं से बीजेपी में मोदी युग की शुरुआत हुई। संघ की इच्छानुसार भारतीय जनता पार्टी ने  गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव के लिए पीएम उम्मीदवार चुना और अध्यक्ष बने अमित शाह। अमित शाह जो गुजरात में मोदी सरकार में भी मंत्री रहे थे। फिर मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने वो कर दिखाया, जो अभी तक नहीं हुआ था. 2014 में बीजेपी ने पहली बार पूर्ण बहुमत का आंकड़ा पार किया और आसानी से सरकार बनाई।
    2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष बनने के साथ ही बीजेपी की तीन धरोहर अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर युग की समाप्ति हो गई। यह कहना गलत नहीं होगा कि अटल जी ने भले ही स्वास्थ्य कारणों से राजनीति को अलविदा कह दिया था,लेकिन आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के सामने सक्रिय राजनीति से अलग जो जाने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा था।
   अब भाजपा में मोदी युग चल रहा है। अटल युग समाप्त होने और मोदी युग के आगमन के साथ पार्टी का नेता ही नहीं संगठन, चुनाव लड़ने का तरीका, सरकार चलाने का तौर तरीका, फैसले लेने और उन्हें शिद्दत से लागू करने की तत्परता, पार्टी की नई पहचान बन गई बीजेपी अकेले या सहयोगियों के साथ सत्ता की उस ऊंचाई पर पहुंच गई, जहां पहुंचने का उसके संस्थापकों ने कल्पना भी नहीं की होगी। बीजेपी दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है तो सवाल यह भी खड़ा होने लगा है कि अटल और मोदी में कौन बड़ा नेता है।
    अटल के जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला जाए तो अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को और मृत्यु 16 अगस्त 2018 को हुई थी। भारत के तीन बार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजयेयी पहले 16 मई से 1 जून 1996 तक, तथा फिर 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। अटल जी न केवल सफल नेता रहे बल्कि वे हिंदी कवि, पत्रकार व एक प्रखर वक्ता भी थे। भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में एक अटल 1968 से 1973 तक जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने लंबे समय तक राष्ट्रधर्म, पाञ्चजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया।
   चार दशकों से भारतीय संसद के सदस्य अटल जी लोकसभा के लिए दस और राज्य सभा के लिए दो बारं चुने गए थे। अटल जी लोकसभा का पहला चुनाव उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से जीते थे। अटल ने लखनऊ के लिए संसद सदस्य के रूप में कार्य किया। 2005 मेें स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण सक्रिय राजनीति से सेवानिवृत्त हुए। अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर प्रारंभ करने वाले वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने गैर काँग्रेसी प्रधानमंत्री पद के 5 वर्ष बिना किसी समस्या के पूरे किए। आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेने के कारण इन्हे भीष्म पितामह भी कहा जाता है। वैसे अटल जी अक्सर मजाक में कहा करते थे कि अविवाहित जरूर हैं,लेकिन ब्रहमचारी नहीं  रहे। अटल ने 24 दलों के गठबंधन से सरकार बनाई थी जिसमें 81 मंत्री थे।
   आज भले मोदी को सख्त फैसले लेने के लिए जाना जाता हो,लेकिन अटल जी भी देशहित में कोई फैसला लेने में हिचकिचाते नहीं थे।उनकी सरकार के कुछ फैसले इसकी मिशाल हैं। अटल सरकार ने निजीकरण को बढ़ावा-विनिवेश की शुरुआत की तो संचार क्रांति का दूसरा चरण भी अटल राज में ही शुरू हुआ था। इसके अलावा सर्व शिक्षा अभियान,   पोखरण का परीक्षण,पोटा कानून, संविधान समीक्षा आयोग का गठन,   जातिवार जनगणना पर रोक जैसे फैसले लेकर अटल सरकार ने खूब सुर्खिंया बटोरी थीं।
  अटल जी ने एक बार तो मौजूदा प्रधानमंत्री और तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री तक क राजधर्म का पालन  करने की नसीहत दे दी थी। हर प्रधानमंत्री की तरह वाजपेयी के फैसलों को अच्छे और खराब की कसौटी पर कसा जाता रहा है, लेकिन गुजरात में 2002 में हुए दंगे के दौरान एक सप्ताह तक उनकी चुप्पी को लेकर वाजपेयी की सबसे ज्यादा आलोचना हुई थी। गोधरा कांड 26 फरवरी, 2002 से शुरू हुआ था और तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी का पहला बयान तीन मार्च, 2002 को आया जब उन्होंने कहा कि गोधरा से अहमदाबाद तक जिस तरह से लोगों को जिंदा जलाया जा रहा है वो देश के माथे पर दाग है, लेकिन उन्होंने इसे रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।
   करीब एक महीने बाद चार अप्रैल, 2002 को वाजपेयी अहमदाबाद गए और वहां वाजपेयी बोले भी तो केवल इतना ही कहा कि मोदी को राजधर्म का पालन करना चाहिए। हालांकि वे खुद राजधर्म का पालन क्यों नहीं कर पाए, ये सवाल उठता रहा और संभवत ये बात वाजपेयी को भी सालती रही।उन्होंने बाद में कई मौकों पर ये जाहिर किया कि वे चाहते थे कि मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर इस्तीफा दे दें ? लेकिन ना तो तब नरेंद्र