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सिंपल लिविंग एंड हाई थिंकिंग : चौधरी चरण सिंह

धरतीपुत्र चौधरी चरण सिंह की जयंती 23 दिसंबर, 1902 पर विशेष

अमरदीप सिंह

सादगी, ईमानदारी, प्रतिबद्धता, अनुशासन के पर्याय समझे जाने वाले चौधरी चरण सिंह की सोच, सांसों और धड़कन में हमेशा – हमेशा खेत-खलिहान और धरतीपुत्र ही रचे और बसे रहे। काश्तकारों के मसीहा चौधरी चरण सिंह अगर आज हमारे बीच होते तो 118 बरस के होते I सिंपल लिविंग और हाई थिंकिंग को साक्षात् अपने जीवन में उतारने वाले चौधरी साहब आज भी किसानों के दिलों में राज करते हैं I उन्होंने अपने जीवन में किसी भी पद को सुशोभित किया हो, लेकिन उनकी जीवनशैली ठेठ ग्रामीण ही रही। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री होते हुए भी अपनी संस्कृति और संस्कार से कतई नहीं डिगे। अपने बंगले में एक कालीन बिछाकर बैठते और छोटी-सी मेज पर रखकर सरकारी कामकाज को अंतिम रूप देते। किसानों के मसीहा कहे जाने वाले चौधरी साहब का जन्म 23 दिसंबर,1902 को हापुड़ के नूरपुर गाँव में हुआ I इनके पिता श्री मीर सिंह एक गरीब काश्तकार थे I माली हालत पतली होने से प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च तालीम तक सारा खर्च इनके ताऊ लखपति सिंह ने उठाया I कहने का अभिप्रायः यह है, चौधरी साहब मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर पैदा नहीं हुए। इसीलिए वह नेहरू से लेकर इंदिरा गाँधी तक बार-बार टकराते रहे, क्योंकि वह ग्रामीण परिवेश की जमीनी हकीकत से पूरी तरह वाक़िफ़ थे। 1959 में नेहरू के खेती के सहकारी प्रस्ताव के साथ-साथ खाद्यान्न के सरकारी व्यापार के प्रस्ताव को भी  नामंजूर करते हुए उन्होंने यूपी के कांग्रेस मंत्रिमंडल से यह कहते हुए अंततः इस्तीफा दे दिया था कि ये दोनों योजनाएं हमारे प्रजातांत्रिक जीवन की विरोधी हैं। वह राजस्व एवं परिवहन मंत्री थे। चौधरी साहब ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के नागपुर के सालाना अधिवेशन में पीएम नेहरू की एक न चलने दी और ये प्रस्ताव पारित नहीं हो सके। दरअसल चौधरी साहब अपनी बात हमेशा आंकड़ों के संग बहुत ही बेबाकी से कहते थे, नतीजन उनके सामने किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती थी। नागपुर कॉंग्रेस के इस ऐतिहासिक अधिवेशन में नेहरू के विरोध के चलते चौधरी साहब का व्यक्तित्व ऐसा निखरा कि वह किसानों के मसीहा कहलाने लगे।

महर्षि दयानन्द सरस्वती के विचारों का चौधरी साहब पर गहरा असर पड़ा। आर्य समाजी होने के नाते उन्होंने अपनी सोच में जाति या धर्म को कभी नहीं आने दिया। उन्होंने अपनी दो बेटियों का अंतरजातीय विवाह किया। यह ही क्यों, गाज़ियाबाद में वकालत करते समय उनका रसोइया भी हरिजन था I वह जातिवादी बेड़ियों को तोड़ना चाहते थे ताकि भारतीय समाज जाति प्रथा से मुक्त हो जाए। चौधरी साहब कहा करते थे, मुझे जाट बिरादरी में पैदा होने का गौरव है, लेकिन यह मेरी इच्छा से नहीं हुआ। उन्होंने सरकारी नौकरियों के साक्षात्कार में हिन्दू उम्मीदवारों से जाति न पूछे जाने का प्रस्ताव भी सरकार के सामने रखा था I हिन्दुओं में ऊंच-नीच के भेदभाव को कम करने के लिए उन्होंने नेहरू को एक पत्र भी लिखा था।

चौधरी साहब का सम्पूर्ण जीवन जनकल्याण के लिए ही समर्पित रहा I राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया का भी उनके जीवन पर गहरा असर पड़ा। कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित होने के बाद वह राजनीति में सक्रिय हो गए। 1930 में जब महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया तो वह भी उसमें कूद पड़े। उन्होंने गाज़ियाबाद में हिंडन नदी के किनारे नमक बनाया तो उन्हें आन्दोलन के लिए पहली बार 6 महीने की जेल हुई I जेल में ही उन्होंने अपनी दो प्रमुख किताबों- मंडी बिल और कर्जा कानून लिखीं I जेल जाने का सिलसिला यहीं तक ही नहीं थमा I कांग्रेस से जुड़ाव के चलते वह पंडित गोविन्द वल्लभ पंत के संपर्क में भी आए। स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें 1940 में डेढ़ वर्ष का कारावास हुआ। 1942 में अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय योगदान के चलते उन्हें दो वर्ष की फिर सजा हुई। 1942 में ही युवा चरण सिंह ने भूमिगत होकर गुप्त क्रांतिकारी संगठन भी तैयार किया। उसी समय मेरठ प्रशासन ने चरण सिंह को देखते ही गोली मारने का आदेश भी जारी किया था, लेकिन वह बिना घबराए अपना काम करते रहे I एक तरफ पुलिस चरण सिंह की टोह लेती थी, वहीं दूसरी तरफ वह जनता के बीच सभाएं करके निकल जाया करते थे। पकड़े जाने पर जेल में ही चौधरी साहब की लिखी गई पुस्तक-शिष्टाचार भारतीय संस्कृति और समाज के शिष्टाचारी नियमों का एक बहुमूल्य दस्तावेज है।

चौधरी चरण सिंह किसानों के लिए पैदा हुए। उन्ही के लिए जिए। अंत तक उन्ही के लिए समर्पित रहे। भूमि उपयोग बिल से लेकर जमींदारी उन्मूलन अधिनियम का श्रेय चौधरी साहब को ही जाता है I खासकर यूपी के काश्तकारों के लिए जमींदारी उन्मूलन  वरदान साबित हुआ। व्यापारियों की मनमानी लूट से किसानों को बचाने के लिए उन्होंने कृषि उत्पादन मार्केटिंग बिल का यूपी विधान सभा में प्रस्ताव रखा। इस कानून को बाद में सभी राज्यों ने भी लागू किया I खेती की बदहाली और सरकारों की किसान विरोधी नीतियों को देखते हुए उन्होंने किसान संतानों को सरकारी नौकरियों में 50% आरक्षण देने की पुरजोर वकालत की I उन्होंने 1949 में मंडी बिल भी पारित कराया। लगनशीलता और लोकप्रियता के चलते 1936 से लेकर 1974 तक छपरौली विधान सभा से लगातार चुने जाते रहे। वह पंडित गोविन्द वल्लभ पंत, सम्पूर्णानन्द, सुचेता कृपलानी के मंत्रिमंडलों में विभिन्न मंत्री पदों को सुशोभित किया। वह 1967 और 1969 में दो बार यूपी के सीएम रहे। 1977 में पहली बार वह बागपत लोकसभा क्षेत्र से चुने गए। जनता पार्टी की सरकार में वरिष्ठ उप प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, गृहमंत्री बनाए गए। 1979 में इंदिरा कांग्रेस के समर्थन से देश के पांचवे प्रधानमंत्री बने। नतीजो की चिंता किए बिना किसानों के लिए हमेशा अपनी बात पूरी ईमानदारी और बेबाकी से कहने वाले चरण सिंह ने पूरे सियासी सफर में 11 बार कुर्सी ठुकराई। यह चौधरी साहब का ही बूता था, उन्होंने पंचवर्षीय योजना में  33% गांवों को बजट में व्यवस्था कराईI अपने सिद्धांतों और मर्यादित व्यवहार की वजह से ही उन्हें राजनीति के चौधरी साहब कहा जाता है I

देश में मौजूदा किसानों का आंदोलन चौधरी साहब का भावपूर्ण स्मरण करा रहा है। यदि मोदी सरकार सच में काश्तकारों की हितैषी है तो उनके दर्द को संजीदगी से सुने। तीनों कृषि सुधार कानूनों में कहीं झोल है तो समाधान के लिए केंद्र सरकार इन आंदोलनकारियों को आश्वस्त करे। यदि संसद का सत्र भी बुलाना पड़े तो बुलाए। इसके अलावा मोदी सरकार को चौधरी साहब के धरतीपुत्रों के प्रति समर्पण, संकल्प और सेवाभाव को देखते हुए भारत रत्‍न सम्मान से नवाजे। सच यह है, मोदी सरकार को देश के इस सर्वोच्च सम्मान का ऐलान बिना समय गंवाए कर देना चाहिए। यह ही, भारत के इस अनमोल कोहिनूर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(लेखक निजी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में सीनियर फैकल्टी हैं )

बिहार पुलिस का शपथ, शराबबंदी को कितना बनाएगा सफल

– मुरली मनोहर श्रीवास्तव
बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर देश-दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बंदी का बिहार में भी काफी प्रभाव पड़ा है। समाज का स्वरुप बहुत हद तक परिवर्तित भी हुआ। देश तथा देश की बाहर की संस्थाएं बिहार आकर शोध भी शराबबंदी की सफलता पर कर चुकी हैं, सभी ने नीतीश कुमार के इस कदम की सराहना की है। बिहार में शराबबंदी होने के बाद आमदनी पर भी गहरा असर पड़ा है। आर्थिक दृष्टिकोण से बिहार थोड़ा कमजोर जरुर हुआ है। बावजूद इसके नीतीश कुमार का यह कदम ऐतिहासिक है। इसके लिए बिहार में बनी मानव श्रृंखला ने दुनिया के रिकॉर्ड को भी तोड़ा।
क्यों फिर लेनी पड़ी शपथः
बिहार पुलिस, जिसके बूते सूबे की सरकार सभी चीजों पर कंट्रोल करती है। इसी में शामिल है शराबबंदी जिस पर नकेल कसने के लिए पुलिसिया तंत्र को जिम्मेदारी सौंपी गई। शराबबंदी पर लगाम भी लगी, मगर इस कानून को अगर किसी ने तार-तार किया तो उसमें बड़े पैमाने पर संपन्न लोग और पुलिसकर्मी इसमें शामिल हैं। हलांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर अपने उद्बोधन में कहते रहते हैं कि कुछ लोग इसको अपनी लिबर्टी से जोड़कर देखते हैं। बावजूद इसका किसी पर असर नहीं पड़ा रहा था। लिहाजा पुलिसकर्मियों एक बार फिर से शराब नहीं पीने तथा इसके धंधे में संलिप्तता से दूर रहने के लिए शपथ दिलायी गई।
शपथ का कितना असर पड़ेगाः
इससे पहले भी बिहार के पुलिसकर्मी शराबबंदी को सफल बनाने को लेकर शपथ ले चुके हैं, इसका समाज पर कितना असर पड़ा यह किसी से छूपा हुआ नहीं है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फरमान के बाद पुलिसकर्मियों ने एक बार फिर से शराब नहीं पीने की शपथ लिया है। पुलिस मुख्यालय के आदेश के बाद थाना से लेकर पुलिस मुख्यालय तक सभी पुलिसकर्मियों ने शराब नहीं पीने, शराब के कारोबार में शामिल नहीं होने की भी शपथ ली है। लेकिन इसके बाद भी बिहार के पुलिसकर्मियों पर इसका कितना असर पड़ेगा अब तो आगे पता चलेगा। इसके पहले शपथ लेने के बाद भी शऱाब पीने, इसके काले कारोबार में शामिल होने की हर दिन कई शिकायतें मिलती ही रहती हैं। कानून लागू रहने के बाद भी बिहार में शराब का कारोबार परवान पर है। अब देखना ये है कि आगे इस शपथ का बिहार में कितना असर पड़ेगा पुलिसकर्मियों पर यह तो आने वाले समय में पता चल ही जाएगा।
पूर्ण शराबबंदी कड़ाई से लागूः
बिहार में पांच अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी लागू है और इसे कड़ाई से लागू किए जाने के लिए नीतीश कुमार सरकार ने बिहार मद्य निषेध और उत्पाद अधिनियम 2016 को सर्वसम्मिति से विधानमंडल से पारित करवाया था पर बाद में इसके कुछ प्रावधानों को कड़ा बताए जाने तथा इस कानून का दुरूपयोग किए जाने के भी नीतीश सरकार पर अक्सर आरोप लगते रहते हैं, आलोचनाएं विपक्ष के द्वारा की जाती हैं। शराबबंदी कानून में कुछ तब्दीली से संबंधित पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवाल के एक जवाब पर मुख्यमंत्री ने कहा था कि हम लोगों ने राज्य में पूरी ईमानदारी से शराबबंदी कानून को लागू किया है। इसमें कुछ कड़े प्रावधान हैं, इसके लिए कार्यक्रम में एक राय बनाने के लिए ऑल पार्टी मीटिंग की गई थी, उसके बाद इसको लागू किया गया था।
समीक्षा बैठक में नाराजगी का असरः
बिहार में शराबबंदी कानून के लागू होने के बाद नवनिर्वाचित पुलिस महानिदेशक ने बिहार के सभी जिलों के एसपी, रेल एसपी को पत्र लिखा है कि शराब के कारोबार में शामिल न हों पुलिसकर्मियों को इसकी शपथ दिलायी जाए। पुलिस महानिदेशक ने अपने पत्र में उल्लेख किया था कि 9 दिसंबर को मुख्यमंत्री नीतीश ने मद्य निषेध की बैठक की थी। बैठक में मुख्यमंत्री ने इस संबंध में निर्देश दिया था। लिहाजा बिहार के सभी पुलिसकर्मी 21 दिसंबर को शऱाब नहीं पीने की शपथ लें। 21 दिसंबर को पूरे बिहार के पुलिसकर्मी 11 बजे अपने दफ्तर में शऱाब नहीं पीने,शराब के कारोबार में शामिल नहीं होने की शपथ लें।
महिलाओं की मांग पर बिहार में शराबबंदी कानून लागू कर नीतीश कुमार ने महिलाओं को बल दिया। शराब गरीब तबकों के बीच तो थोड़ी थम गई मगर अपर क्लास के बीच इसकी खपत कम नहीं हुई। लेकिन जिसके बूते शराबबंदी प्लान को सक्सेस करने की नीतीश ने मुहिम शुरु की उनलोगों ने ही शराब तस्करी को बढ़ावा दिया और आज की तारीख में नतीजा है कि शराब तस्करी का धंधा बिहार में बड़े पैमाने पर फलफूल रहा है। इस धंधे में पर्दे के पीछे से आम से लेकर खास तक जुड़ गए हैं। अब देखने वाली बात ये है कि इस बार पुलिसकर्मियों की शपथ शराबबंदी कानून को कितना सफल बनाएंगे साथ ही जो लोग लिबर्टी से जोड़कर शराब को देख रहे हैं सरकार इस बात को जानती है तो उनलोगों के गले तक फंदा आखिर क्यों नहीं पहुंच रहा है।

तालाब जितने सुंदर व श्रेष्ठ होंगे, अनुपम की आत्मा उतना सुख पायेगी – राजेन्द्र सिंह

अरुण तिवारी

हम सभी के अपने श्री अनुपम मिश्र नहीं रहे। इस समाचार ने खासकर पानी-पर्यावरण जगत से जुडे़ लोगों को विशेष तौर पर आहत किया। अनुपम जी ने जीवन भर क्या किया; इसका एक अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अनुपम जी के प्रति श्रृ़द्धांजलि सभाओं के आयोजन का दौर इस संवाद को लिखे जाने के वक्त भी देशभर में जारी है। पंजाब-हरियाणा में आयोजित श्रृद्धांजलि सभाओं से भाग लेकर दिल्ली पहुंचे पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह ने खुद यह समाचार मुझे दिया। राजेन्द्र जी से इन सभाओं का वृतांत जानने 23 दिसम्बर को गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंचा, तो सूरज काफी चढ़ चुका था; 10 बज चुके थे; बावजूद इसके राजेन्द्र जी बिस्तर की कैद में दिखे। कारण पूछता, इससे पहले उनकी आंखें भर आई और आवाज़ भरभरा उठी। कुछ संयत हुए, तो बोले – ’’यार, क्या बताऊं, शाम को विजय प्रताप जी वगैरह आये थे। अनुपम भाई को लेकर चर्चा होती रही। उसके बाद से बराबर कोशिश कर रहा हूं, नींद ही नहीं आ रही। अनुपम की एक-एक बात, जैसे दिमाग को मथ रही हैं। चित्त स्थिर ही नहीं हो रहा। क्या करूं ?’’
अनुपम जी – पानी..पर्यावरण की गहरी समझ वाले दूरदृष्टा, राजेन्द्र जी – पानी के अभ्यासक; मैं समझ गया कि दो पानी वाले रातभर आपस में मिलते रहे हैं। मैं एक लेखक हूं। इस अनुपम मिलन को जानने और लिखने का लोभ संवरण करना मेरे लिए संभव नहीं हुआ। मैने राजेन्द्र जी की स्मृति को कुरेदा। जो सुना, वह उसे आप तक पहुंचा रहा हूं:
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प्र. – पंचतत्वों से बने शरीर का एक ही तो सत्य है – मृत्यु….और फिर अनुपम जी अपनी जीवन साधना में जितना कुछ कर गये, ऐसी उपलब्धि वाली देह के जाने पर आप जैसे व्यक्ति के मन में दुख से ज्यादा तो कुछ संकल्प आना चाहिए। आप दुखी होंगे, तो कैसे चलेगा ?

उ. – नहीं यार, अभी तो अनुपम भाई की और ज्यादा जरूरत थी हम सभी को। सिद्धराज जी भाईसाहब ( प्रख्यात गांधीवादी नेता ) के जाने के बाद एक अनुपम ही तो थे, जो मुझे टोकते थे। काम से रोकते नहीं थे, लेकिन टोकते जरूर थे। कहते थे – तुम यह करो। यह मत करो। अब मेरा कुर्ता पकड़कर कौन खींचेगा ? कौन टोकेगा ?
( राजेन्द्र फिर भावुक हो गये। )
..अच्छा करो, तो पीठ भी थपथपाते थे। कैसा तो स्वभाव था उनका! काम की बात पूरी होते ही अक्सर कह उठते थे – ’’राजेन्द्र, अब अपन की सब बातें हो गईं। कुछ और हो, तो बताओ; नहीं तो अब जाओ। तुम्हे कई काम होंगे। तुमसे मिलने वाले तुम्हारा इंतजार कर रहे होंगे।’’ ऐसे स्वभाव वाला व्यक्ति तो अनुपम ही हो सकता है। कमी तो खलेगी। इतना आसान तो नहीं है, जीपीएफ आने पर अनुपम को भूल जाना।

प्र. – जीपीएफ के वातावरण में इस कमी को कोई तो भरेगा ही ? हम उम्मीद कैसे छोड़ सकते हैं ?

उ. – मुझे याद है, मैं, 1972 में पहली बार रमेश शर्मा जी के साथ यहां, जीपीएफ (गांधी शांति प्रतिष्ठान) आया था। उससे पूर्व रमेश भाई एक स्वैच्छिक कार्यकर्ता के तौर पर हमारे गांव डौला आते-जाते रहते थे। रमेश भाई के माध्यम से ही अनुपम जी से मेरा पहला परिचय हुआ था। 1984 आते-आते हमारा परिचय, गाढ़ी दोस्ती में बदल गया था। अनुपम, पहली बार 1986 में तरुण भारत संघ आये थे। तब से मैं जब भी दिल्ली आता हूं, तो जीपीएफ जरूर आता हूं। जीपीएफ में ही रुकने का प्रयास करता हूं। जीपीएफ आऊं और अनुपम व रमेश भाई जैसे मित्रों से ऊर्जा लिए बगैर चला जाऊं, ऐसा शायद ही कभी हुआ हो।

सुबह उठकर अनुपम से मिलना तो मेरा मुख्य एजेण्डा रहता था। टेबल पर आमने-सामने हम कभी शांत नहीं बैठते थे। उनके साथ चर्चा से मैने निरंतर सीखा है। खासकर, अनुपम जी की सहिष्णुता ने मुझे बहुत सिखाया। अनुपम न हो, तो भी अनुपम के कक्ष में झांककर मैं लौट आता था। उस कक्ष में जाने भर से मुझे ऊर्जा मिलती थी। जीपीएफ में अनुपम और रमेश..दोनो ही मेरे लिए ऊर्जा के केन्द्र थे।

आज आया हूं, तो यहां अनुपम भाई नहीं हैं। रमेशभाई भी जीपीएफ से सेवामुक्त हो चुके हैं। मैं आशावान व्यक्ति हूं। आशा करता हूं कि अनुपम के नहीं रहने के बाद, जीपीएफ अनुपम के व्यवहार से सीखेगा। अनुपम के व्यवहार के कारण ही जीपीएफ में अच्छी लोगों की लाइन बनी रही। इसे आगे बनाये रखने की कोशिश करनी चाहिए। व्यक्ति के साथ संस्था न मरे, ऐसी सब गांधीवादी कार्यकर्ताओं की इच्छा माननी चाहिए। अतः मैं तो यही मानता हूं कि यदि गांधी शांति प्रतिष्ठान को जिंदा रहना है, तो अनुपम के व्यवहार को यहां जिंदा रखना होगा।

अनुपम, गांधी मार्ग पत्रिका के संपादक मात्र नहीं थे; उनके खान-पान, आचार-विचार, पहनावे में भी गांधीजी की जीवन पद्धति का दर्शन मौजूद था। उनके साथ घूमते हुए.. चिंतन-मनन करते हुए एक सहज-सार्थक जीवंतता का संचार महसूस होता था।

प्र. – आप, अनुपम का सबसे बड़ा गुण क्या मानते हैं ?

उ.- अनुपम, एक इनोवेटिव शब्दशिल्पी थे। पानी परम्परा के वह सच्चे शोधार्थी थे। मैं, अनुपम भाई को भारत में पर्यावरण शब्द व्यवहार का जनक मानता हूं। पानी-पर्यावरण क्षेत्र में काम करने वालों के लिए वह किसी साहित्यिक गुरु से कमतर नहीं थे।

अनुपम की सबसे खास विशेषता यह थी कि लोग अपने जिस खो गये को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, अनुपम उसका एहसास करने व कराने वाले व्यक्ति थे। तरुण भारत संघ की पहली पुस्तक ’जोहड़’ अनुपम जी ने मुझसे लिखवाई और खुद बैठकर उसे पढ़ने लायक बनाया।

शब्दों को रचना आसान हो सकता है, लेकिन वे लोक व्यवहार में भी उतरें, इसके लिए समाज की स्वीकार्यता हासिल करना आसान नहीं होता। इसके लिए शब्दों को समाज के मनोनुकूल परोसना भी आना चाहिए। बिहार की बाढ़, भारत के सुखाड़ व नदी जोड़ पर लिखे उनके तीन लेख तथा आज भी खरे हैं तालाब और राजस्थान की रजत बूंदे नामक पुस्तकें – अनुपम साहित्यमाला के इन मोतियों को हटा दें, तो पानी के क्षेत्र में कोई ऐसी पुस्तक या रचना नहीं है, जो लोक व्यवहार में हो।

एक प्रेक्टिसनर को ज्यादा सटीक व्यावहारिक ज्ञान होना चाहिए। किंतु मैं देखता हूं कि अनुपम उस व्यवहार को एक प्रेक्टिसनर से भी ज्यादा सरलता से समाज को परोसना जानते थे। उसे समाज के मन में उतार देना. बिठा देना; यही अनुपम का अनुपम गुण था। इसी गुण के कारण अनुपम, नये ज़माने के लोगों के बीच में भी पुरातन ज्ञान का लोहा मनवाने में सफल रहे। इसी गुण के कारण मैं अनुपम को सिर्फ लेखक-साहित्यकार न कहकर एक अभ्यासक भी मानता हंू।

प्र. – आपकी निगाह में अनुपम जी का सबसे बड़ा योगदान क्या रहा ?

उ. – मेरी निगाह में अनुपम भाई का सबसे बड़ा योगदान सतत् चलने वाली उनकी वह कोशिश थी, जिसके जरिये वह पानी का काम करने वाले अनेक दूसरे अनेक साथी बनाने और उन्हे बढ़ाने में सफल रहे। मुझे ध्यान है। गोपालपुरा की पश्चिमी पहाड़ी के तालाब से पानी निकालने के लिए तालाब की प्रकृति अनुकूल जगह छोड़ी थी। अनुपम ने देखा, तो बोले – ’’यहां एक छोटी सी, संुदर सी दीवार बना दो। उस पर ’अपरा’ लिख दो।’’
मैने पूछा -’’इससे क्या होगा ?’’
अनुपम बोले -’’यह दीवार पाल पर चढ़ने के काम आयेगी। यह एक लाभ होगा। दूसरा बड़ा लाभ यह होगा कि इससे पानी का संस्कार आगे जायेगा। यदि हमें तालाबों को अगली पीढ़ी को दिखाना है, समझाना है, आगे बढ़ाना है तो तालाबों के अंग-प्रत्यंगों को शब्दों में प्रस्तुत करना भी सीखें।’’
अनुपम की बात गहरी थी। बाद में मैने दीवार बनवाई और उस पर ’अपरा’ भी लिखा।
मुझे भरोसा है कि अनुपम के बनाये लोग, अनुपम की अनुपस्थिति से तत्काल उभरे शून्य को आगे चलकर भरेंगे।

प्र. – तरुण भारत संघ के काम में भी अनुपम जी का कोई योगदान रहा है ?

उ.- तरुण भारत संघ आकर पानी का काम शुरु कराने और उसे आगे बढ़ाने में यदि सबसे ज्यादा किसी का योगदान है, तो अनुपम जी भाईसाहब का। यदि मैं सबसे ज्यादा कहता हूं तो इसका मतलब है, मुझसे भी ज्यादा। चाहे भांवता का सिद्धसागर हो या कोई और खास कार्य, अनुपम का शिक्षण व साथ हमें हर जगह मिला।
एक बार पांच पेड़ लगाने को लेकर कलक्टर ने मुझ पर जुर्माना ठोक दिया था। अनुपम जी को पता चला, तो वह चण्डीप्रसाद भट्ट, प्रभाष जोशी और अनिल अग्रवाल को लेकर वहां पहंुच गये। प्रभाष जी के कहने पर मुख्यमंत्री द्वारा कलक्टर का ट्रांसफर आदेश भी जारी हो गया। मैं खुश हुआ कि देखो, यह कलक्टर ही गड़बड़ कर रहा था। इससे मुक्ति मिली।

अब अनुपम जी की कुशलता देखो। उन्हे हमारी व हमारे काम की छवि की भी चिंता थी। उन्होने मुझे फोन करके कहा कि कलक्टर को सम्मान देकर विदा करना। उन्होने मुझे समझाया – ’’तुम्हे अलवर में काम करना है। लोगों के बीच में प्रेम बढ़ाना है। इसलिए ऐसा करना अच्छा होगा।’’ मैने वैसा ही किया। कलक्टर को खुद जाकर आमंत्रित किया। मांगू पटेल के चैक में खीर बनवाई। जिन बंजारों के कारण विवाद था, उन्हे भी न्योता। कलक्टर को बाकायदा गणेश जी की प्रतिमा देकर विदा किया।

पग-पग पर टोकना, संभालना, थपथपाना. इसे मैं कम योगदान नहीं मानता। तरुण भारत संघ का मतलब ही है, अनुपम मिश्र। भाभी मंजुश्री, बेटा शुभम..सभी का श्रम तरुण भारत संघ मंे लगा है। अनुपम नहीं होते, तो तरुण भारत संघ के काम को कोई नहीं जान पाता।

प्र. – पानी-पर्यावरण और इससे इतर क्षेत्रों में शोषण, अत्याचार, अनाचार के खिलाफ कई आंदोलन इस बीच देश में चले हैं। मुझे नहीं याद पड़ता कि उन्हे लेकर अनुपम जी कभी उत्तेजित हुए हों अथवा उन्होने उनमें कभी सक्रिय योगदान दिया हो। इसकी वजह आप क्या मानते हैं – अनुपम जी का स्वभाव या आंदोलनों को लेकर अनुपम जी का कोई खास दृष्टिकोण ?

उ. – अनुपम जी की मान्यता थी कि राज पर विकास का भूत चढ़ा है। इस भूत की सवारी जब तक रहेगी, विकास के नाम पर विनाशक कार्य चलते रहेंगे। चूंकि वह अत्यंत विद्वान और दूरदृष्टा थे, अतः वह जिन कामों के बारे में देखे लेते थे कि हम इन्हे रोक नहीं पायेंगे, उनमें सक्रिय नहीं होते थे। अपनी ऊर्जा का उपयोग अन्यत्र करते थे। लेकिन ऐसा नहीं था, कि वह ऐसे कार्यों से बेखबर रहते थे। वे आंदोलन व आंदोलनकारियों का हालचाल बराबर रखते थे। यमुना नदी में खेलगांव निर्माण के खिलाफ चले यमुना सत्याग्रह में यूं वह कभी नहीं आये, लेकिन जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लालकिले की प्राचीर से नदियों की शुद्धि की बात की तो खुद गये और कहा – ’’ राजेन्द्र, तुम्हारी बात सरकार ने मान ली है। अब यह सत्याग्रह पूर्ण करो।’’

वह दूर रहते थे, लेकिन आंदोलनों से विरत नहीं रहते थे। ऐसे कामों में लगे साथियों को समर्थन देते थे। जीत हो, तो पीठ थपथपाते थे। वैसे वह अत्यंत विनम्र थे, लेकिन अच्छा काम करने वालों के बुरे वक्त में सहारा देने को लेकर अत्यंत निर्भीक भी थे।

प्र. – आपसे आखिरी मुलाकात में अनुपम जी ने कुछ ऐसा कहा, जो उनके चाहने वालों को आगे का काम बताये ?

उ.- पता है, उन्हे अक्सर गुस्सा नहीं आता था। पिछली बार जब मैं उनसे मिलने गया था, तो बहुत गुस्से में थे। बोले – ’’यह सरकार कुछ भी कर ले, गंगा साफ नहीं कर सकती। ये तो सारे प्रोग्राम, सारा पैसा..सब ठेकेदारों के लिए हो रहा है। गंगा को प्रेम और समर्पण चाहिए। राजेन्द्र, यह कैसे संभव हो ?
फिर शांत हुए, तो बोले – ’’ राजेन्द्र, तालाबों का काम ही टिकेगा; बाकी तो सब लुटेगा। तालाबों के काम पर ही जोर लगाने की जरूरत है।’’

वह लूट की छूट और समाज की टूट से भी दुखी थे। समाधान में वह बताते रहे कि जो समाज बंधे-जोहड़ों को बनाता था, बंधे-जोहड़ कैसे उस समाज को जोड़ने वाले साबित होते थे। बोले कि तालाबों का काम चलते रहना चाहिए। सरकार, तालाबों का काम आगे बढ़ाने के लिए कोई अथाॅरिटी ही बना दे। इसी से कुछ काम आगे बढ़े।
जैसी मेरी आदत है, मैने कहा – ’’भाईसाहब, अथाॅरिटी बनाने से क्या होगा ? रेनफेड अथाॅरिटी बनी तो है। उसका हश्र हम सभी देख रहे हैं। तालाबों की अथाॅरिटी भी ऐसे ही सरकारी रवैये वाली होगी, तो उसके भी प्लान और पैसे ठेकेदारों की जेब में रहेंगे।’’

खैर, मैं कह सकता हूं कि जीवित अनुपम की आत्मा, उनकी देह से ज्यादा, तालाबों में वास करती थी। भारत ही नहीं, दुनिया में कहीं भी तालाब जितने सुंदर व श्रेष्ठ होंगे, अनुपम की आत्मा उतना ही अधिक सुख पायेगी।

श्री अनुपम मिश्र : सबसे लम्बी रात का सुपना नया

अरुण तिवारी

सबसे लम्बी रात का सुपना नया
देह अनुपम बन उजाला कर गया।
रम गया, रचता गया
रमते-रमते रच गया वह कंडीलों को
दूर ठिठकी दृष्टि थी जो
पता उसका लिख गया
सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

रमता जोगी, बहता पानी
रच गया कुछ पूर्णिमा सी
कुछ हिमालय सा रचा औ
हैं रची कुछ रजत बूंदें
शिलालेखों में रचीं कुछ सावधानी
वह खरे तालाब सा मन बस गया
सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

अकाल के भी काल में
अच्छे विचारों की कलम सा
वह चतुर बन कह गया।
रच गया मुहावरे कुछ
साफ माथे की सामाजिक सादगी से
भाषा का वह मार्ग गांधी लिख गया
सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

अर्थमय जीवन में है जीवन का अर्थ
एक झोले में बसी खुश ज़िदगी
व्यवहार के त्यौहार सी वह जी गया
जब गया, नम्र सद्भावना सा
मृत्यु से भी दोस्ती सी कर गया
सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

अनुपम साहित्य को खंगालने का वक्त

अरुण तिवारी


जब देह थी, तब अनुपम नहीं; अब देह नहीं, पर अनुपम हैं। आप इसे मेरा निकटदृष्टि दोष कहें या दूरदृष्टि दोष; जब तक अनुपम जी की देह थी, तब तक मैं उनमें अन्य कुछ अनुपम न देख सका, सिवाय नये मुहावरे गढ़ने वाली उनकी शब्दावली, गूढ से गूढ़ विषय को कहानी की तरह पेश करने की उनकी महारत और चीजों को सहेजकर सुरुचिपूर्ण ढंग से रखने की उनकी कला के। डाक के लिफाफों से निकाली बेकार गांधी टिकटों को एक साथ चिपकाकर कलाकृति का आकार देने की उनकी कला ने उनके जीते-जी ही मुझसे आकर्षित किया। दूसरों को असहज बना दे, ऐसे अति विनम्र अनुपम व्यवहार को भी मैने उनकी देह में ही देखा।

कुर्सियां खाली हों, तो भी गांधी शांति प्रतिष्ठान के अपने कार्यक्रमों में हाथ बांधे एक कोने खडे़ रहना; कुर्सी पर बैठे हों, तो आगन्तुक को देखते ही कुर्सी खाली कर देना। किसी के साथ खडे़-खड़े ही लंबी बात कर लेना और फुर्सत में हों , तो भी किसी के मुंह से बात निकलते ही उस पर लगाम लगा देना। श्रृद्धावश पर्यावरण संबधी पुस्तक भेंट करने आये एक प्रकाशक को अनुपम जी ने यह कहकर तुरंत लौटाया, कि उन्हे पुस्तक देने से उसका कोई मुनाफा नहीं होने वाला।

अरवरी गांव समाज के संवाद पर आधारित ‘अरवरी संसद’ किताब छपकर आई, तो उन्होने कहा – ”इसे रंगीन छापने की क्या जरूरत थी ?”

 उन्होने इसे पैसे की अनावश्यक बर्बादी माना। वहीं गंवई कार्यकर्ताओं की बाबत् तरुण भारत संघ के राजेन्द्र भाई को यह भी कहते भी सुना – ”पैसा आये, तो कभी कार्यकर्ताओं को घूमाने ले जाओ। खूब बढ़िया खिलाओ-पिलाओ। दावत करो।” कार्यकर्ताओं पर किए खर्च को वह पैसे की बर्बादी नहीं मानते थी। कभी यह सब उनकी स्पष्टवादिता लगता था, कभी साफ दृष्टि, कभी सहजता और कभी विनम्रता। पत्रकार श्री अरविंद मोहन ने ठीक लिखा था, कभी-कभीं संपर्क में आने वाले को यह उनका बनावटीपन भी लग सकता था।

देह के बाद सिखाते अनुपम

‘नमस्कार’ और ’कैसे हो ?’ – जब तक देह थी, अनुपम जी ने इससे आगे मुझसे कभी नहीं बात की। न मालूम क्यों, उनके सामने मैने भी अपने को हमेशा असहज ही पाया। अब देह नहीं, तो अनुपम जी से लगातार संवाद हो रहा है। उनके सम्मुख अब मैं लगातार सहज हो रहा हूं। अब अनुपम जी मुझे लगातार सिखा रहे हैं, व्यवहार भी और भाषा भी। उनकी देह के जाने के बाद पुष्पाजंलियों और श्रृ़द्धांजलियों ने सिखाया। देह से पूर्व और पश्चात् अनुपम जी के प्रति जगत का व्यवहार भी किसी पाठशाला से कम नहीं।

भाषा का गांधी मार्ग

बकौल अनुपम – ”हिंसा, भाषा की भी होती है। भाषा, भ्रष्ट भी होती है।……गांधी मार्ग की भाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें न बेवजह का जोश दिखे और न ही नाहक का रोष।”

 इससे पता चला कि भाषा का भी अपना एक गांधी मार्ग है। जाहिर है कि हिंसामुक्त-सदाचारी भाषा गांधीवादी लेखन का प्राथमिक कसौटी है। स्वयं को गांधीवादी लेखक से पहले किसी को भी अपने लेखन को भाषा की इस कसौटी पर कसकर देखना चाहिए। मैं और मेरा लेखन, इस कसौटी पर एकदम खोटे सिक्के के माफिक हैं। संभवतः यही वजह रही कि अनुपम जी ने कभी मेरी किसी रचना की न आलोचना की, न ही सराहा और न ही किसी पत्र का कभी उत्तर दिया।

भाषा का मन्ना मार्ग

अनुपम जी के नहीं रहने पर आयोजित आख्यानों में से एक में बोलते हुए अनुपम परिवार की रागिनी नायक ने कानपुर के यशस्वी कवि यश मालवीय की पंक्तियों में समय का संदेश याद दिलाया –

”दबे पांव उजाला आ रहा है।
फिर कथाओं को खंगाला जा रहा है।
धुंध से चेहरा निकलता दिख रहा है।
कौन क्षितिजों पर सवेरा लिख रहा है।”

मैं अनुपम जी में जो अनुपम था, उसे खंगालने में लग गया। मैने पाया कि जब तक देह रही, अनुपम पानी लेख खासम-खास पर प्रतिष्ठित रहे। देह जाने के बाद अब उनका लगातार विस्तार हो रहा है; अनुपम साहित्य अब और अधिक देखने को मिल रहा है। अनुपम जी की प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 17 है। ’मन्ना: वे गीत फरोश भी थे’ – साफ माथे का समाज से लिया यह लेख पढ़ रहा हूं, तो कह सकता हूं कि अनुपम जी ने अनुपम लेखन और व्यवहार के गुणसूत्र पिता भवानी भाई और उनकी कविताओं से ही पाये थे।


”जिस तरह तू बोलता है, उस तरह तू लिख
और उसके बाद मुझसे बड़ा तू दिख।”

”कलम अपनी साध,
और मन की बात बिल्कुल ठीक कह एकाध।”

”यह कि तेरी भर न हो, तो कह,
और बहते बने सादे ढंग से तो बह।”

मन्ना यानी पिता भवानीशंकर मिश्र को याद करते हुए अनुपम जी ने उक्त पंक्तियों का विशेष उल्लेख किया है। उक्त पंक्तियों के जरिये भाषा और व्यवहार तक के चुनाव का जो परामर्श भवानी भाई ने दिया, अब लगता है कि अनुपम जी ने उनका अक्षरंश पालन किया। अनुपम जी ने पर्यावरण जैसे वैज्ञानिक पर अपने व्याख्यान भी ऐसी शैली में दिए, मानो जैसे कोई कविता कह रहे हों ; नदी से बह रहे हों। इसीलिए वह अपने साथ दूसरों को बहाने में सफल रहे।

लेखन का समाज मार्ग

बाज़ार से काग़ज खरीद कर लाने की बजाय, पीठ कोरे पन्नों पर लिखना; खूब अच्छी अंग्रेजी आते हुए भी उनके दस्तखत, खत-किताबत सब कुछ बिना किसी नारेबाजी के, आंदोलन के हिंदी में करना; ये सब के सब संस्कार अनुपम जी को मन्ना से ही मिले। अनुपम जी खुद लिखते हैं कि कविता छोटी है कि बड़ी है, टिकेगी या पिटेगी; मन्ना को इसमे बहुत फंसते हमने नहीं देखा। अनुपम जी का लिखा देखें, तो कह सकते हैं कि उनका लेखन भी टिकने या पिटने के चक्कर में कभी नहीं फंसा। उन्होने जो लिखा, उसमें आइने की तरह समाज को आगे रखा। यदि मन्ना के गीत ग्राहक की मर्जी से बंधे नहीं थे, तो ग्राहक की मर्जी से बंधना तो अनुपम जी का भी स्वभाव नहीं था। कई वजाहत में शायद यह एक वजह थी कि अनुपम जी जो लिख पाये, वह दूसरों के लिए अनुपम हो गया।

”मूर्ति तो समाज में साहित्यकार की ही खड़ी होती है, आलोचक की नहीं।”

अनुपम जी द्वारा भवानी भाई की किसी कविता का पेश यह भाव एक ऐसा निष्कर्ष है, जो पत्रकार और साहित्यकार के बीच के भेद और उनके लिखे के समाज पर प्रभाव का आकलन सामने रख देता है। इस आकलन को सही अथवा गलत मानने के लिए हम स्वतंत्र हैं और उसके आधार पर अपने कौशल और प्राथमिकता सामने रखकर यह तय करने के लिए भी कि हमें लेखन की किस विधा में अपनी कितनी ऊर्जा लगानी है।

राजरोग का विकास मार्ग

देह बिन अनुपम अब मुझे एक और भूमिका में दिखाई दे रहे हैं; एक दूरदृष्टा रणनीतिकार की भूमिका में। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी, तो केन-बेतवा नदी जोड़ बनने की संभावना पूरी मानी जा रही थी। पानी कार्यकर्ता पूछ रहे थे कि अब क्या करें ? विकास के नाम पर समाज और प्रकृति विपरीत शासकीय पक्षधरता से क्षुब्ध कई नामी संगठन इस विकल्प पर भी बार-बार विचार करते दिखाई दे रहे थें कि वे खुद एक राजनीतिक दल बनायें; ताकि देश की त्रिस्तरीय जनप्रतिनिधि सभाओं में ज्यादा से ज्यादा जगह घेरकर समाज व प्रकृति अनुकल कार्यों के अनुकूल नीति व निर्णय करा सकें ।

ऐसे में अनुपम जी के लिखे ने आगाह किया – ”अच्छे लोग भी जब राज के करीब पहुंचते है, तो उन्हे विकास का रोग लग जाता है; भूमण्डलीकरण का रोग लग जाता है। उन्हे भी लगता है कि सारी नदियां जोड़ दें, सारे पहाड़ों को समतल कर दें, तो बुलडोजर चलाकर उनमें खेती कर लेंगे।…… इसका सबसे अच्छा उदाहरण रामकृष्ण हेगडे़ का है। कर्नाटक में 37 साल पहले बेड़धी नदी पर एक बांध बनाया जा रहा था। किसानों को इस बांध बनने से उनकी खेती का चक्र नष्ट हो जाने की आशंका हुई। उन्होने इसका विरोध किया। कर्नाटक के किसानों ने संगठन बनाकर सरकार से कहा कि वे उन्हे इस बांध की ज़रूरत नहीं है। संपन्नतम खेती वे बिना बांध के ही कर रहे हैं और इस बांध के बनने से उनका सारा चक्र नष्ट हो जायेगा। रामकृष्ण हेगडे़, उस आंदोलन के अगुवा बने। पांच साल तक वह इस आंदोलन के एकछत्र नेता रहे। बाद में वह राज्य के मुख्यमंत्री बने। बांध बनने के बाद हेगडे़ खुद बेड़धी बांध के पक्ष में हो गये। उन्हे भी राजरोग हो गया।”

राजरोग का चिकित्सा मार्ग

मैने पूछा कि ऐसे में एक कार्यकर्ता की भूमिका क्या हो ? अनुपम जी ने नदी जोड़ को राजरोगियों की ख़तरनाक रज़ामंदी कहा। आवाज़ दी कि इस रज़ामंदी के बीच हमारी आवाज़ दृढ़ता और संयम से उठनी चाहिए। जो बात कहनी है, वह दृढ़ता से कहनी पडे़गी। प्रेम से कहने के लिए हमें तरीका निकालना पडे़गा।

”देखो भाई, प्रकृति के खिलाफ हो रहे अक्षम्य अपराधों को न तो क्षमा नहीं किया जा सकता है और न ही इसकी कोई सजा भी दी जा सकती है। नदी जोड़ना, विकास की कड़ी में सबसे भंयकर दर्जे पर किया जाने वाला काम होगा। इसे बिना कटुता जितने अच्छे ढंग से समझ सकते हैं, समझना चाहिए। नहीं तो कहना चाहिए कि भाई अपने पैर पर तुम कुल्हाड़ी मारना चाहते हो, तो मारो; लेकिन यह निश्चित ही पैर-कुल्हाड़ी है। ऐसा कहने वालों के नाम एक शिलालेख में लिखकर दर्ज कर देना चाहिए। और कुछ विरोध नहीं हो सके, तो किसी बड़े पर्वत की चोटी पर यह शिलालेख लगा दें कि भैया आने वाले दो सौ सालों तक के लिए अमर रहेंगे ये नाम। इनका कुछ नहीं किया जा सका।”

अनुपम जी ने यह भी कहा – ”हमें अब सरकार का पक्ष समझने की कोई ज़रूरत नहीं है। उसे समझने लगे, तो ऐसी भूमिका हमें थका देगी। हम कोई पक्ष नहीं जानना चाहते। हम कहना चाहते हैं कि यह पक्षपात है देश के साथ, देश के भूगोल के साथ, इतिहास के साथ; इसे रोकें।”

इस वक्त भी सरकार का पक्ष समझने की भूमिका ने देश के कई लोगों को सचमुच थका दिया है। लिखते, कहते, प्रेम की भाषा में प्रतिरोध करते हुए भी काफी समय बीत गया। बकौल अनुपम, जब राज हाथ से जाता है, तो यह रोग अपने आप चला जाता है। हेगडे़ के पाला बदलने के बावजूद किसान आंदोलन चलता रहा। हेगड़े का राज चला गया। राजरोग भी चला गया। आंदोलन के कारण वह बांध आज भी नहीं बन सका है। राजरोग से निपटने का आखिरी तरीका यही है।

अच्छे विचारों की हिमायत का संदेश

भारतीय ज्ञानपीठ ने हाल ही में अनुपम जी के व्याख्यानों को प्रकाशित किया है। पुस्तक का शीर्षक है –  ‘अच्छे विचारों का अकाल’। व्याख्यानों के चयन और प्रस्तुति का दायित्व निभा राकी गर्ग ने बता दिया है कि अच्छे विचारों के हिमायती सदैव रहते हैं, देह से पूर्व भी, पश्चात् भी। अकाल से भयंकर होता है, अकाल में अकेले पड़ जाना। अतः देह के बाद अनुपम मिश्र जी के इस संदेश को कोई सुने, न सुने; यदि अच्छा लगे तो हम सुने; कहना शुरु करें; कहते रहें; कहने वालों का शिलालेख बनाते रहें; इससे अकाल में भी साझा बना रहेगा। अकाल में भी अच्छे विचारों का अकाल नहीं पडे़गा, तो एक दिन ऐसा ज़रूर आयेगा, जब ऐसे राजरोगियों का राज जायेगा। जाहिर है कि तब राजरोग खुद-ब-खुद चला जायेगा। किंतु यह सब कहते-करते हम यह न भूलें कि कोई भी पतन, गड्डा इतना गहरा नहीं होता, जिसमें गिरे हुए को स्नेह की उंगली से उठाया न जा सके। हालांकि व्यवहार की इस सीढ़ी को लगाने की सामथ्र्य सहज संभव नहीं, लेकिन किसी भी गांधी स्वभाव की बुनियादी शर्त तो आखिरकार यही है।

अंत में यही कह सकता हूं कि अनुपम जी तो गए। हम उन्हे अनुपम बनाने वाली भाषा, संवेदना और मूल्यों को संजो सकें, तो समझिए कि हम पर कुछ छाप अनुपम है।

खुद बीमार है उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था

बसंत पाण्डे
बागेश्वर, उत्तराखंड

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं पटरी से उतर चुकी हैं। खास तौर से भौगोलिक विषमताओं वाले यहां के पर्वतीय क्षेत्रों में मातृ एवं शिशुओं की देखभाल के सरकारी इंतजाम अति दयनीय दशा में हैं। पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों के हालात और भी ज़्यादा खराब हैं। यहां के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र स्वयं गंभीर रूप से बीमार हैं। इन केंद्रों मे पानी व बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं होने से ही अंदाजा लगाया जा सकता है यह केन्द्र किस तरह संचालित हो रहे होंगे। इन बीमार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व अस्पतालों पर आश्रित रोगी सिर्फ भगवान भरोसे ही आते हैं।

इसका प्रत्यक्ष उदाहरण उत्तराखंड के बागेश्वर जिले से समझा जा सकता है। यहां की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 2,59,898 है। जिसमें 1,35,572 महिलाएं हैं। उक्त जिले में मात्र एक एल्ट्रासाउन्ड की मशीन है जिसके टैक्नीशियन भी यदा-कदा ही मिला करते है। इसी जनपद की काफलीगैर तहसील में बागेश्वर ब्लाॅक का सबसे अधिक जनसंख्या वाला असों मल्लाकोट गांव है। इस गांव की जनसंख्या लगभग 2600 है। गांव के लोगों के बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यहां एक एएनएम सेंटर स्थापित किया गया है, लेकिन यहां नियुक्त एएनएम माह में एक या दो बार ही आती हैं। वह गांव की जगह शहर में ही रहने को प्राथमिकता देती हैं। हालांकि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण एएनएम सेंटर में सुविधाओं की कमी का होना है। सेंटर पर बिजली और पानी का उचित प्रबंध भी नहीं है। मुख्य सड़क गांव से 4 से 5 किलो मीटर दूरी पर है। ऐसे में आपातकाल में रोगियों को सड़क तक डोली में उठाकर लाया जाता है। रास्ते इतने संकरे हैं कि जान जोखिम में डालकर लोग मुश्किल से एएनएम सेंटर तक पहुंचते हैं, परन्तु वहाँ पहुंचने के बाद उन्हें अधिकतर ताला लगा ही दिखता है। ग्रामीणों का कहना है कि यहां एक फार्मासिस्ट आते हैं लेकिन वह 11 बजे के बाद सेंटर पर कभी भी मौजूद नहीं रहते हैं।

इस संबंध में एएनएम बबीता गोस्वामी का कहना है कि वह अधिकतर समय फील्ड में रहती हैं, उनके पास 5 गांव असों मल्लाकोट, तरमोली, सीमतोली-2, पाना व किसरोली की ज़िम्मेदारी है। जिनमें उन्हें फील्ड वर्क करना होता है। यही कारण है कि वह एएनएम सेंटर में नियमित नहीं बैठ पाती हैं। उनका कहना है कि आवास जनपद मुख्यालय में होने के कारण वह गांव में रात्रि सेवा नहीं दे पाती हैं। वहीं ग्राम प्रधान नन्दन सिंह असवाल ने बताया कि उनके गांव में कई घर खाली हैं जहां वह स्वास्थ्य कर्मियों को आवास उपलब्ध कराने के लिए तैयार हैं, परंतु फार्मासिस्ट और एएनएम गांव में रहने को तैयार नहीं हैं। इससे दोपहर बाद या रात में किसी भी गर्भवती महिला को आपातकालीन अवस्था में गाड़ी बुक कर 38 किलोमीटर दूर जनपद मुख्यालय बागेश्वर ले जाना पड़ता है या कभी कभी 80 किलोमीटर दूर अल्मोड़ा जाना पड़ता है। इस दौरान उसकी जान को खतरा बना रहता है। यदि एएनएम गांव में ठहरे तो प्रसव के लिए प्राथमिक सहायता मिलना संभव हो सकता है।

सरकारी स्तर पर भगवान भरोसे निर्भर पूरे इलाके में दायी मां के नाम से प्रसिद्ध जयंती देवी ही गर्भवती महिलाओं की एकमात्र आस हैं। जो पिछले 35 वर्षों से इस पूरे इलाके में दायी का काम करते हुए प्रसव के काम में दक्ष हो चुकी हैं। वह दिन-रात हर समय उपलब्ध रहकर गर्भवती महिलाओं की देखभाल व प्रसव का कार्य बड़ी कुशलता से कर रही हैं। यह एक बड़ी बिडम्बना है कि प्रशिक्षित एएनएम, डाॅक्टर व फार्मासिस्ट जिस कार्य का वेतन लेते हुए भी करने में असमर्थ हैं, उसी कार्य को दायी जयंती देवी अपना धर्म समझते हुए सेवाभाव से कर रही हैं। जयंती देवी बताती हैं कि वह अब तक असों मल्लाकोट, किसरौली, सिरसोली, तरमोली, पाना व मयो गांव के लगभग 3500 से अधिक बच्चों का जन्म घर पर ही सफलतापूर्वक करा चुकी हैं और आज तक एक भी प्रसव कराने में असफलता नहीं मिली है। उन्होंने बताया कि असम राइफल्स मणिपुर मेें सेवारत अपने पति मोहन सिंह मनकोटी के साथ रहने के दौरान उनके पड़ोस में रहने वाली एक नर्स ने उन्हें अपने साथ आर्मी अस्पताल में सहायिका के रूप में कार्य करना सिखाया। इस दौरान उन्होंने 10 वर्षों तक निरंतर आर्मी अस्पताल में प्रसव संबंधी कार्य सीखा और धीरे-धीरे इसमें निपुणता हासिल कर ली। पति के सेवानिवृत्त होने के बाद गांव में रहने पर उन्होंने गर्भवती महिलाओं की मदद करनी शुरू की।

स्वास्थ्य सेवा की ऐसी कुव्यवस्था केवल इसी गांव तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस गांव से 15 किलोमीटर दूर बोहाला में भी यही स्थिति है। जहां मातृ एवं शिशु कल्याण केन्द्र में दांतों की डाॅक्टर के अलावा कोई अन्य डाॅक्टर उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि हरियाणा निवासी वह दंत चिकित्सक भी अपना इस्तीफा देने को तैयार है। सड़क की जर्जर अवस्था होने के कारण गांव के बीमार मरीज़ों को डोली में ऊपर सड़क तक लाया जाता है और किसी तरह अल्मोड़ा या हल्द्वानी के अस्पतालों तक पहुंचाया जाता है। इस संबंध में सामाजसेवी व राजकीय इंटर कॉलेज के अध्यक्ष शंकर सिंह ने बताया कि क्षेत्र में कोई डाॅक्टर न होने से मामूली रोगों के उपचार के लिए भी लोगों को अन्यत्र जाना पड़ता है। स्थानीय निवासी 75 वर्षीय रतन सिंह मनकोटी ने बताया कि उनकी पत्नी को बुखार था, जिसके लिए क्षेत्र में कोई डाॅक्टर उपलब्ध नहीं था। वहीं शहर ले जाने के लिए कोई सरकारी व्यवस्था भी नहीं है। ऐसे में 12000 रूपए में टैक्सी बुक कर वह जाने को मजबूर हो गए। इस संबंध में फार्मासिस्ट का तर्क है कि असों गांव में एएनएम सेंटर पर पानी व बिजली की व्यवस्था नहीं होने के कारण प्रसव नहीं कराया जाता है। जिसके लिए उच्चाधिकारियों के साथ कई बार पत्राचार भी किया गया। जिसके बाद विभाग द्वारा सर्वे कराया गया, परन्तु कोई कार्य नहीं हुआ। आशा वर्कर गंगा असवाल का कहना है कि उसे गर्भवती महिलाओं को अल्ट्रासांउड करना होता है, परन्तु जिले में एकमात्र अल्ट्रासाउंड मशीन है, उसमें भी स्पेशलिस्ट यदा-कदा ही आते हैं। जब मरीज़ का नम्बर लगाया जाता है तो उसे कई दिनों के बाद का नंबर दिया जाता है। इससे बचने के लिए परिजन गर्भवती महिलाओं को अन्य जिलों में ले जाकर अल्ट्रासाउंड व अन्य जांच कराने पर मजबूर होते हैं।

उत्तराखड के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था की खस्ताहाल दशा कई बार देखने को मिल जाती है। पिथौरागढ़ जिले की गंगोलीहाट तहसील के गांव पिलखी निवासी तिनराम को देर रात सीने में तेज दर्द हुआ। परिजन उन्हें गंगोलीहाट ले गये, जहां से उन्हें राजकीय अस्पताल हल्द्वानी के लिए रेफर कर दिया गया। इसके बाद तिनराम को टैक्सी बुक कर दर्द झेलते हुए लगभग साढ़े 6 घंटे की यात्रा कर 197 कि.मी. दूर तराई स्थित हल्द्वानी के सुशीला तिवारी राजकीय अस्पताल आना पड़ा। उनकी मुसीबत यहां आकर तब और बढ़ गई, जब उन्हें पता चला कि यह अस्पताल सिर्फ कोरोना मरीजों के इलाज के लिए आरक्षित है। गरीबी रेखा से नीचे किसी तरह जीवन-निर्वाह कर रहे परिजन घर से जल्दबाजी में बीपीएल कार्ड साथ लाना भूल गये थे, हालांकि आयुष्मान कार्ड साथ में होने की वजह से कुछ राहत मिली। गरीब तिनराम के परिजनों ने अपने एक परिचित की मदद से उन्हें हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल में भर्ती करा दिया। जहां रात भर आइसीयू में रखा गया और सुबह अस्पताल वालों ने उन्हें 70 हजार रुपये का बिल थमा दिया। गरीबी की मार झेल रहे इस परिवार के लिए यहाँ आयुष्मान कार्ड भी काम नहीं आया।

चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था पर बागेश्वर के ज़िलाधिकारी विनीत कुमार ने भी अंसतोष जताया। उन्होंने असामल्लाकोट के एएनएम सेंटर के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी से बातचीत कर त्वरीत कार्यवाही करने के निर्देश भी दिया। परन्तु एक माह से अधिक समय हो जाने के बाद भी उक्त सेंटर पर कोई भी कार्यवाही नहीं हुई है। बहरहाल देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खस्ताहाल स्वास्थ्य व्यवस्था एक तरफ जहां इस क्षेत्र के लचर प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाता है वहीं दूसरी ओर सरकार की उदासीनता पर भी सवाल खड़ा करता है। पूरे जिले में हृदय, बच्चों के डाॅक्टर एक या दो ही हैं। ऐसी स्थिति में यहां के लोगों का जीवन किस प्रकार कठिनाइयों से गुज़रता होगा, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। यही कारण है कि गांवों के लोग पहाड़ पर अपनी पैतृक ज़मीन और घर को छोड़कर नीचे मैदानी इलाकों में स्थाई रूप से बस चुके हैं। इससे तिब्बत (चीन) से लगा पूरा सीमांत इलाका बहुत तेजी से जनशून्य होता जा रहा है। यदि सरकार इस विशाल सीमा क्षेत्र में चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, संचार की अच्छी सेवाएं उपलब्ध नहीं कराती तो यह आगे चलकर निश्चित ही देश की सुरक्षा के लिए बहुत हानिकारक साबित हो सकता है।

ईश्वर में आस्था सत्य व ज्ञान से युक्त होने पर ही सार्थक होती है

-मनमोहन कुमार आर्य
हम एक बहु प्रचारित विचार को पढ़ रहे थे जिसमें कहा गया है ‘ईश्वर में आस्था है तो मुश्किलों में भी रास्ता है।’ हमें यह विचार अच्छा लगा परन्तु यह अपने आप में पूर्ण न होकर अपूर्ण विचार है। इसको यदि ठीक से समझा नहीं गया तो इससे लाभ के साथ कभी कभी बड़ी हानि भी हो सकती है। आस्था कहने व रखने मात्र से मनुष्य की आत्मा की उन्नति व जीवन का कल्याण नहीं हो सकता व हो जाता। ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को पूर्णता व अधिकांश रूप में जानना भी अत्यन्त आवश्यक होता है। ईश्वर को जानकर ही हम उसके गुण, कर्म व स्वभाव से परिचित हो सकते हैं। यह स्थिति वेद व वैदिक साहित्य का स्वाध्याय करने से ही प्राप्त होती है। संसार में अनेक मत-मतान्तर हैं और उनके अपने अपने ग्रन्थ व पुस्तकें हैं। क्या सबमं सत्य ज्ञान से युक्त सभी आवश्यकता की बातें हैं? इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो यह ज्ञात होता है कि मत-मतान्तरों के ग्रन्थ अविद्या व विद्या से युक्त होने के साथ हमें पूर्ण ज्ञान से परिचित नहीं कराते। ऋषि दयानन्द (1825-1883) और विद्वान बताते हैं कि अविद्या से युक्त ग्रन्थ उसी प्रकार से त्याज्य होते हैं जैसे कि विष से युक्त अन्न वा भोजन त्याग करने योग्य होता है। यह बात सत्य एवं प्रामाणिक है। यही कारण था कि वेदों के मर्मज्ञ एवं ईश्वर को समाधि अवस्था में प्राप्त ऋषि दयानन्द जी ने सत्य की खोज की और ईश्वर व आत्मा का सत्यस्वरूप जानने व उपासना की यथार्थ विधि सीखने के लिये उन्होंने अपने समय के प्रायः सभी आध्यात्मिक विद्वानों से सम्पर्क किया। ऐसा करते हुए उन्होंने सत्य ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयत्न किया और इससे वह योग विद्या सहित वेद एवं वेदोगो के ज्ञान से युक्त हुए जिससे उन्हें सत्य व असत्य अथवा विद्या व अविद्या का यथार्थ स्वरूप विदित हुआ। अविद्या का नाश तथा सब सत्य विद्याओं का प्रकाश करने के लिये ही उन्होंने अपना समस्त जीवन वेद ज्ञान व शिक्षा के प्रचार में लगाया। उनके प्रयत्नों से अविद्या दूर होकर विद्या व सत्य ज्ञान का प्रकाश हुआ। उनके द्वारा अनुसंधान किया गया समस्त ज्ञान हमें सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा उनके ऋग्वेद आंशिक तथा यजुर्वेद सम्पूर्ण वेदभाष्य में प्राप्त होता है। इस स्थिति को प्राप्त होने पर ही ईश्वर में सच्ची आस्था उत्पन्न होती है।

मनुष्य ज्ञानी हो या न हो, ईश्वर में आस्था रखना अच्छी बात होती है। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि उसे ईश्वर, आत्मा व सृष्टि के रहस्यों का सत्य ज्ञान विदित हो। यह सत्य ज्ञान ही ऋषि दयानन्द जी के ग्रन्थों से प्राप्त होता है। ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों से ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति व कार्य सृष्टि का जो ज्ञान प्राप्त होता है वह संसार में उपलब्ध अन्य ग्रन्थों से प्राप्त नहीं होता। इसी लिये मनुष्य को अपने हित में ऋषि दयानन्द के साहित्य को पढ़ना चाहिये। इसमें उनका अपना कल्याण व लाभ है। ईश्वर का सत्यस्वरूप क्या व कैसा है, इस पर वेदों के आधार पर निष्कर्ष रूप में ऋषि दयानन्द ने कहा है ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।’ ऋषि ने अन्यत्र यह भी बताया है कि ईश्वर जीवों के कर्मों का भोग कराने के लिये उनके कल्याण के लिये ही सृष्टि की रचना व पालन तथा प्रलय करते हैं तथा सभी जीवों को उनके प्रत्येक शुभ व अशुभ वा पुण्य व पाप कर्म का सुख व दुःख रूपी फल देते हैं। कोई भी जीवात्मा व मनुष्य ईश्वर के विधान से अपने किसी कर्म का फल भोगे बिना बचता नहीं है। यह सद् ज्ञान वा विद्या है। ईश्वर के इस सत्यस्वरूप को यदि मनुष्य जानते हैं तो उसकी ईश्वर में आस्था सत्य है। बहुत से लोग व मत इस सत्य मान्यता को न तो जानते हैं और न ही स्वीकार करते हैं। उन्होंने अपने अपने विचार व मान्यतायें बना रखी हैं जो कुछ सत्य हैं व कुछी नहीं हैं। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर विषयक प्रायः सभी प्रकार के विचारों व मान्यताओं की समीक्षा कर उपर्युक्त निष्कर्ष निकालें हैं। ईश्वर विषयक उपर्युक्त विचार व सिद्धान्त ही सत्य हैं। अतः देश, जाति, मत व पन्थ से ऊपर उठकर ईश्वर के उपर्युक्त स्वरूप को ही सबको स्वीकार करना चाहिये। इसके विपरीत वा वेदों के विपरीत विचार व मान्यतायें अप्रमाण होने से मानने योग्य नहीं हैं। यह भी बता दें कि आत्मा का जन्म व पुनर्जन्म होता है। हमारे व सभी जीवात्माओं के इस जन्म से पहले असंख्य वा अनन्त बार जन्म व मरण हो चुके हैं। अनेकानेक बार मोक्ष भी हुआ है। भविष्य में भी यही सिलसिला जिसे आवागमन कहते हैं, जारी रहेगा। यह वैदिक सत्य सिद्धान्त है। इसमें सबको आस्था रखनी चाहिये। 

हमें अपनी आत्मा के सत्यस्वरूप का भी ज्ञान होना चाहिये। जीवात्मा एक सत्य व चेतन सत्ता है। इसका परिमाण अणु के समान एकदेशी व ससीम है। यह जीवात्मा अनादि, अमर, अनुत्पन्न, अविनाशी, जन्म-मरण धर्मा, सुख का अभिलाषी, सुख व दुःखों का भोक्ता, सद्ज्ञान को प्राप्त होकर तथा उसके अनुसार आचरण कर यह बन्धनों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है। मोक्ष प्राप्ति ही सभी जीवात्माओं अर्थात् हमारा उद्देश्य व लक्ष्य है। इसी के लिये सभी ऋषि, मुनि, विद्वान, धर्माचार्य विवेकवान, मुमुक्षु व सत्याचारण करने वाले मनुष्य ज्ञान प्राप्ति व सदाचरण करते आये हैं। वर्तमान और भविष्य में भी सभी मनुष्यों का यही लक्ष्य रहेगा। इसकी प्राप्ति की विधि भी सत्य वेदज्ञान की प्राप्ति व सत्याचरण व सदाचार ही है। अतः ईश्वर में आस्था मात्र करने से काम नहीं चलता। हमें मोक्ष, जो कि सुख व आनन्द का पर्याय है, उसकी प्राप्ति के लिये भी प्रयत्न व पुरुषार्थ करने ही होंगे। इस मोक्ष वा मुक्ति की तर्कपूर्ण चर्चा तथा इसकी उपलब्धि के साधनों संबंधी विचार हमें वैदिक साहित्य सहित सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में पढ़ने को मिलते हैं। अतः आत्मा की उन्नति के इच्छुक सभी बन्धुओं को पक्षपातरहित होकर इन ग्रन्थों को श्रद्धापूर्वक पढ़ना चाहिये और अपने जीवन व आत्मा की उन्नति करनी चाहिये। आत्मा की उन्नति का लक्ष्य प्राप्त कर ही मनुष्य की आत्मा को विश्राम मिलता है अन्यथा वह आवागमन में फंसा रहता है जहां सुख व दुःख का भोग करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। 

मनुष्य को कोरी व अविवेकपूर्ण आस्था नहीं रखनी चाहिये। इससे अधिक लाभ नहीं होगा। हम संसार में ईश्वर के प्रति आस्था रखने वाले मनुष्यों को भी अन्याय, अत्याचार, पक्षपात, हिंसा, मनुष्यों व प्राणियों का उत्पीड़न, अधर्म, उपद्रव आदि करते हुए देखते हैं। इससे निष्कर्ष निकलता है कि केवल ईश्वर में आस्था रखने से हमारी व्यक्तिगत व सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। इसके लिये तो सत्य ज्ञान के पर्याय वेद व वैदिक साहित्य उपनिषद, दर्शन सहित सत्यार्थप्रकाश आदि के ज्ञान को प्राप्त होना ही होगा। इनके अध्ययन से ही हम यम व नियमों अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान से परिचित हो सकेंगे और इनको जीवन में धारण कर ही सच्चे मनुष्य बन सकेंगे। मनुष्य को ईश्वर में आस्था रखते हुए अपने ज्ञान को बढ़ाना चाहिये और वैदिक साहित्य के अध्ययन सहित जीवन में यम व नियमों को धारण करना चाहिये। वेद विहित पंचमहायज्ञों को करना चाहिये। सत्य का ग्रहण तथा असत्य का त्याग करना चाहिये। अविद्या का नाश तथा विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। ऐसा मनुष्य ही सच्चा आस्थावान व आस्तिक मनुष्य कहा जा सकता है। ओ३म् शम्। 

सत्य बोलने में सदा होता है भूमा का सुख

—विनय कुमार विनायक
हे भगवन!मुझे ज्ञान दो! मुझे जानना क्या?

‘सत्य जानने योग्य है, तुम सत्य को जानो
और सत्य संभाषण करो! सच हमेशा बोलो’
सत्य के सिवा सब है मिथ्या औ’ अविद्या!

मिथ्या को सत्य मान कदापि नहीं बोलना!

जब ज्ञान नही, तो सत्य भान कैसे होगा?
सत्य से अनजान हूं,मैं सत्य कैसे बोलूंगा?

‘अस्तु सत्य जानने के लिए करो जिज्ञासा!
विशेष ज्ञान विज्ञान ही जानने योग्य होता!
क्योंकि विशेष ज्ञान ही सत्य को बतलाता!

विशेष ज्ञान पा करके सर्वदा सत्य बोलना!

किन्तु विशेष ज्ञान मिलता है कहां? कैसे?
‘विशेष ज्ञान मनन करने से ही तो मिलते!
अस्तु मनन हेतु ज्ञान योग्य होती है मति!’

पर बिना श्रद्धा से मनन होता कभी नहीं,
अस्तु श्रद्धा ही ज्ञेय है,तो श्रद्धा का ही
विशेष ज्ञान पाने की मैं इच्छा करता हूं!

‘किन्तु निष्ठा बिना श्रद्धा नहीं जगती!’

तब तो निष्ठा ही जानने योग्य होती है,
पर बिना क्रिया की निष्ठा कहां होती है?

‘फिर तो जानने योग्य है कार्य की प्रकृति,
किन्तु बिना सुख की क्रिया दुखदाई होती!’

‘ऐसी स्थिति में जानने योग्य है सुख ही,
अस्तु; जिज्ञासा करो आत्मसुख पाने की!

किन्तु सुख हो यदि अत्यल्प, फिर क्या?
वैसे अल्प सुख का हमको है क्या करना?

‘अस्तु जानने योग्य होता है एकमात्र भूमा!’

क्योंकि अल्प सुख होता है सदा तृष्णादायी!
अंततः भूमा सुख ही होता संपूर्ण सुखदायी!

भूमि से आसमान के पार तक विस्तृत जो,
भूमा में आच्छादित सत्य,सनातन,अमृतत्व,
सत्य बोलने में सदा होता है भूमा का सुख!
(छान्दोग्योपनिषद से प्रेरित स्वरचित काव्य)
— विनय कुमार विनायक

किसान आन्दोलन समस्या नही वरन् ताला राजनीति

डॉ० अजय पाण्डेय

देश में किसान आंदोलन चल रहा है, किसान भड़के हए है । इनकी वजह से लाखों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही आंदोलन और बंद की वजह से देश की अर्थव्यवस्था को भी हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। इन जटिल होती स्थितियों के बीच मुद्दा यह नहीं है कि देश के राजनीतिक दल किन नीतियों का समर्थन करते हैं और किनका विरोध। असली मुद्दा तो यह है कि देश के राजनीतिक दल, देश की जनता के साथ छलावा करके देश के लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान और कानून का मखौल क्यों उड़ाते हैं? इस देश में अधिकांश समस्याओं की जड़ इन राजनीतिक दलों का दोहरा रवैया और अलोकतांत्रिक गतिविधियां तथा राजनीतिक स्वार्थ ही हैं।
          इन्हीं राजनीतिक दलों की दोहरी नीतियों के कारण यह किसान आन्दोलन किसान आन्दोलन न होकर एक राजनीतिक आन्दोलन बन गया है। किसान आन्दोलन का समर्थन देने के वजाय राजनीतिक दल किसान आन्दोलन के अगुआई करने लगे है आन्दोलन से किसान गायब हो चुका है राजनीतिक पार्टीया आन्दोलन को चुनाव हथियार के रुप मे इस्तेमाल करने लगी है।
अब यह केवल तथाकथित विरोधी दल के नेताओं के बलबूते की बात नहीं रही कि वे किसान आन्दोलन जैसी अराजक स्थितियों एवं अलोकतांत्रिक स्थितियों को रोक सके, गिरते मानवीय मूल्यों को थाम सकें, समस्याओं से ग्रस्त सामाजिक व राष्ट्रीय ढांचे को सुधार सकें, जो भेदभावरहित हो, राजनीतिक स्वार्थों से परे हो, समतामूलक हो, जो एक प्रशस्त मार्ग दें और सही वक्त में सही बात कहें। इसलिए अब वक्त आ गया है कि देश के सभी राजनीतिक दल स्वार्थ एवं वोटों की राजनीति छोड़कर मूल्यों की राजनीति करें, वे यह तय करें कि उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क न हो। अगर आप सत्ता में रहते हुए किसी कानून की वकालत करते हो, सदन में मत के दौरान किसी बिल का खुल कर या मौन समर्थन करते हो तो फिर बाहर सड़क पर विरोध का नाटक क्यों?
किसानों के व्यापक हितों के लिये केंद्र सरकार ने संसद के दोनों सदनों में इन तीन कृषि कानूनों को पारित किया, जो राष्ट्रपति की सहमति से लागू किए गए। अब विभिन्न राजनीतिक दलों की शह पर इन कानूनों के खिलाफ ये किसान दिल्ली की सीमा पर डटे हुए हैं। इस आंदोलन की शुरुआत एमएसपी अर्थात् न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी की मांग के साथ हुए थी लेकिन सरकार द्वारा बातचीत करने के लिए तैयार हो जाने के बाद अब किसान नेता तीनों कानूनों को ही रद्द करने की मांग कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि शायद इन किसान संगठनों या किसान नेताओं को अपने हितों की नहीं, इन राजनीतिक दलों की चिन्ता है। 6 लम्बी बैठकों में सरकार ने लगातार यह साफ कर दिया था कि एमएसपी की व्यवस्था से कोई छेड़-छाड़ नहीं की जाएगी। सरकार ने किसानों की अन्य अनेक मांगों को भी माना है, लेकिन जैसे-जैसे सरकार झुकती गयी, किसान हावी होते गये हैं, क्योंकि वे तथाकथित राजनीतिक दलों के इशारों पर आन्दोलन की दशा और दिशा तय करने में लगे हैं। देश में किसान एक बड़ा वोट बैंक है और कोई भी सरकार अपने पर किसान विरोधी होने का ठप्पा नहीं लगाना चाहेगी। किसान अपने हक की लड़ाई लड़े किसी को एतराज नहीं है, लेकिन प्रमुख राजमार्गों को अवरूद्ध कर देना, देश के सर्वोच्च एवं लोकतांत्रिक तरीकों से चुने गये नायक के लिये अभद्र, अशालीन एवं अराजक भाषा का उपयोग किया जाये, यह कैसा लोकतांत्रिक विरोध का तरीका है? हालांकि यह एक सच्चाई है कि आजादी के बाद से ही देश के किसान ठगे गए हैं। सरकारों की मंशा चाहे जो भी रही हो लेकिन इसी सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत कार्य कर रही व्यवस्था ने हमेशा किसानों के साथ छल ही किया है। इसी छल से मुक्ति के लिये सरकार ने कुछ साहस दिखाया तो विरोधी राजनीतिक दलों पर वह नागवार गुजरा।
इन विडम्बनापूर्ण एवं विरोधाभासी स्थितियों में विभिन्न दल राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां तो खूब सेक रहे हैं, लेकिन किसानों के हित में कोई राजनीतिक दल सच्चे मन से सामने आया हो, प्रतीत नहीं होता। तभी केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के पुराने स्टैंड को बताते हुए विरोधी दलों के दोहरे एवं विरोधाभासी रवैये को लेकर जमकर निशाना साधा। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस ने खुद अपने 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में कृषि से जुड़े  एपीएमसी एक्ट को समाप्त करने की बात कही थी। कृषि मंत्री के तौर पर पिछली सरकार में एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने लगातार इन सुधारों की वकालत की थी। आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार ने 23 नवंबर 2020 को नए कृषि कानूनों को नोटिफाई करके दिल्ली में लागू कर दिया है। लालू और मुलायम के समर्थन पर टिकी देवगौड़ा, गुजराल और मनमोहन सरकार के दौरान भी आर्थिक सुधार की नीतियों को तेजी से लागू किया गया। लेकिन आज ये सभी दल सिर्फ विरोध करने के नाम पर विरोध करने की खानापूर्ति कर रहे हैं और इसका नुकसान देश की जनता को उठाना पड़ रहा है, देश कमजोर हो रहा है।
आज हम जीवन नहीं, मजबूरियां जी रहे हैं। जीवन की सार्थकता नहीं रही। अच्छे-बुरे, उपयोगी-अनुपयोगी का फर्क नहीं कर पा रहे हैं। मार्गदर्शक यानि नेता शब्द कितना पवित्र व अर्थपूर्ण था पर नेता अभिनेता बन गया। नेतृत्व व्यवसायी बन गया। आज नेता शब्द एक गाली है। जबकि नेता तो पिता का पर्याय था। उसे पिता का किरदार निभाना चाहिए था। पिता केवल वही नहीं होता जो जन्म का हेतु बनता है अपितु वह भी होता है, जो अनुशासन सिखाता है, विकास की राह दिखाता है, गलत को गलत एवं सही को सही कहने के मूल्यों को जीता है, आगे बढ़ने का मार्गदर्शक बनता है और राष्ट्रीयता को पोषित करता है।
देश में लोकतंत्र होने के बावजूद एक साजिश चल रही है कि जैसे भी हो सत्ता को काबिज करने के लिये हर तरीके के जायज-नाजायज हथकंडे अपनाये जा रहे हैं किसानों को कारगर हथियार को हथियार बना कर सरकार को   किसान विरोधी घोषित करके अपने लक्ष्य को मजबूत किया जा रहा है। जो स्वस्थ राजनीतिक मूल्यों पर नहीं बल्कि भटकाव के कल्पित आदर्शों पर आधारित है। जिसमें सभी नायक बनना चाहते हैं, पात्र कोई नहीं। भला ऐसी मानसिकता एवं आन्दोलन की राह किस के हित में होगी?
स्वार्थ के घनघोर बादल छाये हैं, सब अपना बना रहे हैं, सबका कुछ नहीं। और उन्माद की इस प्रक्रिया में आदर्श बनने की पात्रता किसी में नहीं है, इसलिये आदर्श को ही बदल रहे हैं, नये मूल्य गढ़ रहे हैं। नये बनते मूल्य और नये स्वरूप की तथाकथित राजनीति क्रूर, भ्रष्ट, बिखरावमूलक अमानवीय और जहरीले मार्गों पर पहुंच गई है। सचाई से परे हम व्यक्तिगत एवं दलगत स्वार्थों मे बधे हुए। आज आवश्यकता है कि केवल थोक के भावों से भाषण न दिये जायें, कथनी और करनी यथार्थ पर आधारित हों। उच्च स्तर पर जो निर्णय लिए जाएं वे देश हित में हों। दृढ़ संकल्प हों। देश की जनता का जिसमे विश्वास जगे।
आज की असली समस्या ‘किसान आन्दोलन’ नहीं बल्कि ‘काली राजनीति’ है। श्मशान पहुंचाने के लिए चार आदमी ही काफी हैं। समस्याओं से जूझते किसानो के आंसुओं को लाखों मिलकर भी नहीं पोछ सकते, उसके लिये साफ नीतियां और नियत वाला विपक्ष चाहिए और चाहिए इन नीतियों के निर्माताओं एवं उनको क्रियान्वित करने वाले उन्नत चरित्र वाले राजनेता। आवश्यकता है देश में ऊंचे कद वाले नेता हों। सेवा और चरित्र निर्माण के क्षेत्र में श्रेष्ठ पुरुषों की एक शृंखला हो। केवल व्यक्ति ही न उभरे, नीति उभरे, जीवनशैली उभरे। चरित्र की उज्ज्वलता उभरे। हरित क्रांति, श्वेत क्रांति के बाद अब चरित्र क्रांति का दौर हो। वरना मनुष्यत्व और राष्ट्रीयता की अस्मिता बौने होते रहेंगे।

ब्रिटेन में स्ट्रेन की दहशत से डरी दुनिया

ललित गर्ग

कोरोना की एक नई प्रजाति स्ट्रेन के खतरनाक स्वरूप में उभरने की आशंका ने दुनिया में नया तनाव एवं चिन्ताएं पैदा कर दी है। चिंता इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि महामारी की इस कथित नई किस्म के ज्यादा तेजी से फैलने की आशंकाएं की जा रही है। प्रश्न है कि क्या स्ट्रेन को लेकर की जा रही आशंकाएं, चिन्ताएं, दहशत तनाव की स्थितियां वास्तविक है या कोरी काल्पनिक है। जो भी स्थिति हो, दुनिया को पूरी तरह सर्तकता एवं सावधानी बरतने की जरूरत है। जिस तरह हमने कोरोना महामारी से संघर्ष करते हुए उसे परास्त किया, ठीक उसी तरह कोरोना के नये स्वरूप स्ट्रेन को भी पूरे मनोबल, धैर्य, संकल्प एवं संयम से हराना होगा, कहीं हमारा भय, तनाव एवं कपोल-कल्पनाएं इस महामारी के बढ़ने का कारण न बन जाये।
स्ट्रेन के खतरनाक स्वरूप में उभरने की आशंका के सामने आने के बाद सबसे पहले तो यूरोप ने खुद को ब्रिटेन से अलग कर लिया है। भारत सहित फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, इटली, तुर्की, कनाडा और इजराइल भी ब्रिटेन आने जाने वाली उड़ानों पर रोक लगा चुके हैं। स्वाभाविक है, दुनिया का कोई भी देश महामारी की किसी नई किस्म स्ट्रेन को अपने यहां कतई स्वीकार नहीं करेगा। इस परिदृृश्य में भारत जैसे विशाल देश की चिंता भी वाजिब है, क्योंकि भारत का ब्रिटेन से गहरा जुड़ाव रहा है। दोनों देशों के बीच यातायात भी खूब है, भारत की बड़ी आबादी ब्रिटेन में रहती है, इसलिये भारत सहित दुनिया में कोरोना के इस नये रूप को लेकर दहशत एवं तनाव का होना स्वाभाविक है। भारत ने ब्रिटेन से आने वाली विमान सेवाओं पर 31 दिसंबर तक के लिए रोक भी लगा दी है। हालांकि, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. हर्षवर्धन ने लोगों को आश्वस्त करते हुए कहा है कि घबराने की जरूरत नहीं है। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि ये काल्पनिक स्थितियां है, काल्पनिक बातें हैं, ये काल्पनिक चिन्ताएं हैं। अपने आपको इनसे दूर रखें। भारत सरकार हर चीज के बारे में पूरी तरह जागरूक है। हमने बीत एक साल में बहुत कुछ सीखा है।’ लेकिन खतरे की आहट को गंभीरता से लेना, समझदारी है।
ब्रिटिश सरकार ने चेतावनी दी थी कि वायरस का नया स्ट्रेन नियंत्रण से बाहर है। यह मौजूदा कोरोना वायरस से 70 फीसदी ज्यादा तेजी से फैलता है। लंदन और दक्षिण इंग्लैंड में तेजी से बढ़ते मामलों के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने संक्रमण की दर बढ़ने को लेकर सख्त पाबंदियों के साथ अब तक का सबसे कड़ा लॉकडाउन लगाने का फैसला किया था। लेकिन स्ट्रेन ज्यादा घातक है, इसके सबूत अभी नहीं मिले हैं। फिर भी ब्रिटेन से वायरस के इस नए स्ट्रेन को आने से रोकने के लिए समूची दुनिया के देशों में व्यापक हलचल देखने को मिल रही है, इसी कारण विभिन्न संभावनाओं पर चर्चाएं हो रही है, कहते हैं दूध का जला छाछ को फूंक-फूंक कर पीता है, वाली स्थिति बनना स्वाभाविक है, समझदारी है।
भारत में भी चिंता के स्तर को इस बात से समझा जा सकता है कि इस नए संकट से निपटने के तरीकों पर विचार के लिए ज्वॉइंट मॉनिर्टिंरग ग्रुप की बैठक बुलानी पड़ी है। दुनिया और भारत के शेयर बाजारों पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। बड़ा प्रश्न तो यह है कि क्या वाकई ब्रिटेन में नए किस्म के कोरोना ने हमला बोल दिया है? वैज्ञानिकों को इसकी तह में जाना चाहिए, यह महज महामारी के कुछ लक्षणों में वृद्धि का मामला है या वायरस ने कोई नया रूप ले लिया है? ब्रिटेन भले ही लॉकडाउन की मुद्रा में है, लेकिन दुनिया का कोई देश अब लॉकडाउन नहीं चाहेगा, और भारत की सरकार तो किसी भी सूरत में नहीं। ब्रिटेन तुलनात्मक रूप से एक छोटा देश है, वहां की कुल आबादी सात करोड़ भी नहीं है, लेकिन  भारत तो आबादी की दृष्टि से दुनिया का दूसरा सबसे घनी आबादी का देश है।  अतः भारत को हर हाल में ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। केंद्र सरकार अगर सतर्क है, तो इसका सीधा अर्थ है, हवाई अड्डों पर निगरानी चैकस होगी। याद रखना चाहिए, भारत में कोरोना विदेश से ही आया और शुरुआत में हवाई अड्डों पर ढिलाई बरती गई थी, इसलिए अब तो यूरोप से आने वाली फ्लाइटों पर रोक लगाने का निर्णय समयोचित है। व्यापक प्रयत्नों के बाद भारत में पिछले कुछ महिनों से न केवल कोरोना संक्रमण घट रहा है, बल्कि जान गंवाने वालों की संख्या भी घटी है। हम कह सकते हैं कि हमारे यहां संक्रमण काबू में आ रहा है, ऐसे में, भारत को किसी भी देश से आने वाले नये खतरे के प्रति बहुत सावधान रहना ही चाहिए।
इस बिन्दु पर सोच उभरती है कि हम दायें जाएं चाहे बायें, अगर आने वाले संकट से बचना है तो दृढ़ मनोबल चाहिए। गीता से लेकर जितने ग्रंथ हैं वे सभी हमें यही कहते हैं कि ”मनोबल“ ही वह शक्ति है जो ऐसे संकटों से बचाते हुए व्यक्ति को सुरक्षित जीवन के लक्ष्य तक पहुंचाती है। घुटने टेके हुए व्यक्ति को हाथ पकड़ कर उठा देती है। अंधेरे में रोशनी दिखाती है। विपरीत स्थिति में भी मनुष्य को कायम रखती है। वरना हम तनाव, भय, आशंका एवं दहशत के चक्कर में मनोबल जुटाने के बहाने और कमजोर हो जाते हैं। दृढ़ मनोबली के निश्चय के सामने किस तरह कोरोना महामारी झुकी है, जानलेवा बाधाएं हटी हैं, कोरोना से उपरत होते हुए हमने देखा है। जब कोई मनुष्य समझता है कि वह किसी काम को नहीं कर सकता तो संसार का कोई भी दार्शनिक सिद्धांत ऐसा नहीं, जिसकी सहायता से वह उस काम को कर सके। यह स्वीकृत सत्य है कि दृढ़ मनोबल से जितने कार्य पूरे होते हैं उतने अन्य किसी मानवीय गुणों से नहीं होते। इसलिये स्ट्रेन को न केवल भारत बल्कि समूची दुनिया परास्त करेंगी। इसके लिये सरकारी प्रयत्नों, पाबंदियों एवं चिकित्सीय उपक्रमों के साथ-साथ मनोबल कायम रखना होगा, संयम बरतना होगा। संयम का अर्थ त्याग नहीं है। संयम का अर्थ है मनोबल का विकास। संकल्प शक्ति का विकास। संयम नहीं, संकल्प नहीं, मनोबल नहीं, तो जीवन क्या है? मात्र बुझी हुई राख है। फिर तो वह मृत्युमय जीवन है, भयभीत जीवन है। हमें भय एवं आशंकाओं से बाहर आना ही होगा।
गांव की एक सुनसान गली। रात का सन्नाटा। एक व्यक्ति अपने घर लौट रहा है। गली में कुत्ता भौंकता है। मनुष्य डर जाता है। कुत्ते के काट खाने की कल्पना मात्र से ही भयभीत हो जाता है। उसे अकेले में कुछ नहीं सूझता। एक पत्थर उठा लेता है। हथेली में मजबूती से पकड़ कर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और भौंकते कुत्ते के पास से गुजर कर घर पहुंच जाता है।
यह पत्थर ही तो है – मनोबल, संकल्प, संयम, जिसके सहारे कोरोना के नये संस्करण स्ट्रेन को पार किया जा सकता है। 

अच्छा नहीं इंतजार, रास्ता निकाले सरकार

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

किसान आंदोलन गंभीर रुप धारण करता जा रहा है। तीन हफ्ते बीत गए, लेकिन इसका कोई समाधान दिखाई नहीं पड़ रहा है। कृषि मंत्री और गृहमंत्री के साथ किसान नेताओं की कई दौर की बातचीत हो चुकी है लेकिन कितनी विचित्र स्थिति है कि अब सर्वोच्च न्यायालय को बीच में पड़ना पड़ रहा है। मुझे नहीं लगता कि अदालत की यह मध्यस्थता भी कुछ मददगार हो पाएगी, क्योंकि किसान इस पर अड़े हुए हैं कि सरकार इन तीनों कृषि सुधार कानूनों को वापस ले ले और सरकार किसानों को यह समझाने में लगी है कि ये कानून उनके फायदे के लिए ही बनाए गए हैं।
यह आंदोलन किसानों का है लेकिन विरोधी दलों की चांदी हो गई। उनके भाग्य से छत्ता टूट पड़ा है। पिछले छह साल में मोदी सरकार ने कई भयंकर भूलें कीं लेकिन विपक्ष उसका बाल भी बांका नहीं कर पाया लेकिन किसानों के बहाने विपक्ष के हाथ में अब ऐसा भौंपू आ गया है, जिसकी दहाड़ें देश और विदेशों में भी सुनी जा सकती हैं।
इस विसंगति के लिए मोदी सरकार की जिम्मेदारी कम नहीं है। उसने ये तीनों कृषि-कानून आनन-फानन बनाए और कोरोना के दौर में संसद से झटपट पास करा लिए। न तो उन पर संसद में जमकर बहस हुई और न ही किसानों से विचार-विमर्श किया गया। जैसे नोटबंदी, जीएसटी, तीन तलाक और नागरिकता संशोधन कानून एक झटके में थोप दिए गए, वही किसान-कानून के साथ किया गया। सरकार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसके विरुद्ध इतना बड़ा आंदोलन उठ खड़ा होगा।
यह ठीक है कि यह आंदोलन विलक्षण है। देश में ऐसा आंदोलन पहले कभी नहीं हुआ। कड़ाके की ठंड में हजारों किसान तंबुओं और खुले आसमान के नीचे डटे हुए हैं। पंजाब और हरयाणा के इन किसानों के लिए खाने-पीने, बैठने-सोने और नित्य-कर्म का जैसा इंतजाम हम टीवी चैनलों पर देखते हैं, उसे देखकर दंग रह जाना पड़ता है। कोई राजनीतिक दल अपने प्रदर्शनकारियों के लिए ऐसा शानदार और सलीकेदार इंतजाम कभी नहीं कर सका। यह विश्वास ही नहीं होता कि जो लोग धरने पर बैठे हैं, वे भारत के गरीब किसान हैं।
इन किसानों पर यह आरेाप लगाना अनुचित है कि ये सब खालिस्तानी या पाकिस्तानी इशारों पर उचके हुए हैं। यह ठीक है कि वे सब भारत-विरोधी तत्व इस आंदोलन से प्रसन्न होंगे और हमारे अपने विरोधी दल भी इसमें क्यों नहीं अपनी रोटियां सेकेंगे, चाहे कल तक वे अपने चुनावी घोषणा पत्रों में इसी नीति का समर्थन करते रहे हों लेकिन हमारे किसानों की सराहना करनी पड़ेगी कि उन्होंने इन विघ्नसंतोषी नेताओं को जरा भी भाव नहीं दिए। वे स्वयं ही सरकार से बातें कर रहे हैं। इस आंदोलन को ब्रिटेन और कनाडा के कुछ भारतवंशियों का भी समर्थन मिल रहा है।

लेकिन भारत की आम जनता बड़े असमंजस में है। अपने किसानों के लिए उसके दिल में प्रेम और सम्मान तो बहुत है लेकिन उसकी समझ में यह नहीं आ रहा है कि इन कानूनों से किसानों को क्या नुकसान होनेवाला है। सरकार ने वायदा किया है कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य कायम रखेगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आंकड़े देकर बताया है कि उनकी सरकार ने किसानों की गेहूं और धान की फसलों की खरीद में कितनी बढ़ोतरी की है और उन्हें कितनी ज्यादा कीमतों पर खरीदा है। कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने लिखित आश्वासन दे दिया है कि समर्थन मूल्य की नीति कायम रहेगी और मंडी-व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। यदि किसान बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर खेती करना चाहेंगे और अपना माल मंडियों के बाहर बेचना चाहेंगे तो उन्हें यह सुविधा भी मिलेगी। यदि कंपनियों और किसानों के बीच कोई विवाद हुआ तो वे सरकारी अधिकारियों नहीं, अदालतों के शरण में जा सकेंगे। सरकार ने उपजों के भंडारण की सीमा भी खत्म कर दी है।
सरकार और अनेक कृषि विशेषज्ञों की राय है कि इन कानूनों से भारतीय खेती के आधुनिकीकरण की गति बहुत तेज हो जाएगी। किसानों को बेहतर बीज, सिंचाई, कटाई, भंडारण और बिक्री के अवसर मिलेंगे। अब तक भारतीय किसान एक एकड़ में जितना अनाज पैदा करता है, वह चीन और कोरिया जैसे देशों के मुकाबले एक-चौथाई है। भारत में खेती की जमीन दुनिया के ज्यादातर देशों के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। देश में किसानों की संख्या का अनुपात भी अन्य देशों के मुकाबले कई गुना है। पंजाब, हरयाणा और उत्तरप्रदेश के मुट्ठीभर किसानों के अलावा भारतीय किसानों की हालत अत्यंत दयनीय है।
लेकिन हमारे किसान नेताओं का कहना है कि ये तीनों कानून थोपकर यह सरकार किसानों की अपनी गर्दन पूंजीपतियों के हाथ में दे देने की साजिश रच रही है। धीरे-धीरे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था खत्म होती चली जाएगी, मंडियां उजड़ जाएंगी और आढ़तिए हाथ मलते रह जाएंगे।
किसानों में यह शंका इतनी ज्यादा घर कर गई है कि अब सरकार या अदालत शायद इसे दूर नहीं कर पाएगी। अभी तक तो किसानों ने सिर्फ रेल और सड़कों को ही थोड़े दिन तक रोका है लेकिन यदि वे तोड़-फोड़ और हिंसा पर उतारु हो गए तो क्या होगा ? सरकार हाथ पर हाथ धरे तो बैठ नहीं सकती। यदि वह प्रतिहिंसा पर उतर आई तो आम जनता की सहानुभूति भी किसानों के साथ हो जाएगी।
ऐसी स्थिति में अब सरकार क्या करे? वह चाहे तो राज्यों को छूट दे दे। जिन राज्यों को यह कानून लागू करना हो वे करें, जिन्हें न करना हो, न करें। या फिर सरकार आंदोलनकारी समर्थ किसानों के मुकाबले देश के सभी किसानों के समानांतर धरने-प्रदर्शन आयोजित करे या वह इन कृषि-कानूनों को वापस ले ले। अब भी देश के 94 प्रतिशत किसान एमएसपी की दया पर निर्भर नहीं हैं। वे मुक्त हैं, किसी भी कंपनी से सौदा करने, अपना माल खुले बाजार में बेचने और अपनी खेती का आधुनिकीकरण करने के लिए। इन कानूनों के रहने या न रहने से उनको कोई खास फायदा या नुकसान नहीं है। केंद्र सरकार चाहे तो केरल की कम्युनिस्ट सरकार की तरह, जैसे 16 सब्जियों पर उसने समर्थन मूल्य घोषित किए हैं, वैसे दर्जनों अनाज, फल और सब्जियों पर भी घोषित कर सकती है। उन्हें वह खरीदे ही यह जरुरी नहीं है। सरकार किसानों पर कृपा करने का श्रेय-लाभ लेने की बजाय उन्हें अपने हाल पर ही छोड़ दे तो क्या बेहतर नहीं होगा ?

पैसा नही रचना कोई ईश्वर की

—विनय कुमार विनायक
खत्म हुआ आदमियत
सब कुछ हो गया पैसा,
मिला नहीं अवैध पैसा
कलतक जो अपना था,
अब हो गया ऐसा-वैसा!

सभी जानता पैसा अना
फना होनेवाला असासा,
पास होने पर अहसास
दिलाता है अच्छाई का,
आदमी बुरा बिना पैसा!

पैसा पाकर जैसा-तैसा
आदमी समझने लगता
अपने को ऐसा, मानो
पैसा ही सबकुछ होता,
ईश्वर से उपर है पैसा!

पैसों में परख नहीं है
आदमियत इंसान का,
सबकुछ खरीदता पैसा,
पर मानव की सच्चाई
खरीद नही पाता पैसा!

पैसा नही रचना कोई
ईश्वर की सृष्टि की,
बिना पैसों का जीवन
कैसे पार लग जाता है
भू के बाकी जीवों का?
—विनय कुमार विनायक