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भटकता किसान आंदोलन

किसान का झण्डा खालिस्तानी एजेंडा

अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, पाकिस्तान व साऊथ अफ्रीका आदि देशों के कुछ नगरों में भारत में हो रहे किसान आंदोलन के नाम पर खालिस्तानियों को जोड़ा जा रहा है। जबकि सिक्खों का बड़ा वर्ग इसके विरोध में फिर भी उनको “खालिस्तान” व “सिक्खी” के नाम पर जुड़ने के लिए दबाव बनाया जाता है। मुख्यतः अमरीका से लेकर ब्रिटेन तक जहां-जहां भारत विरोधी ऐसे तत्व है वहां-वहां लगभग प्रतिदिन रैलियों में भारत विरोधी,मोदी विरोधी व खालिस्तान समर्थक अनेक गुट सक्रिय हो गए हैं।अनेक प्रकार के भारत विरोधी नारे जिसमें विशेष रूप से मोदी व अमित शाह के विरोध में नारे लगाये जा रहे हैं। पाकिस्तान व खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाने वाला विदेशी नेटवर्क अपने ऐसे पुराने वीडियो भी सोशल मीडिया में पोस्ट करके मोदी विरोधी प्रचार करने में जुट गया हैं।

ये खालिस्तान समर्थक पाकिस्तान का साथ लेकर वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान जिंदाबाद व अल्लाह-हु-अकबर का नारा लगा कर कटरपंथी सोच को प्रकट करके भारत विरोध की चिंगारी को हवा दे रहा हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हमारा जन्मजात शत्रु पाकिस्तान भी इस प्रकार भारत विरोधी षडयन्त्र में लिप्त हैं। समाचारों से पता चला है कि खालिस्तान समर्थक परमजीत पम्मा जो एनआईए का वांटेड आतंकवादी है को लन्दन स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर (6.12.20) व बर्मिघम स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के बाहर (10.12.20) किसान आंदोलन के प्रदर्शन में उपस्थित रहना खालिस्तानी एजेंडे को ही बढ़ावा देता है।

विभिन्न टीवी चैनलों पर आने वाले समाचारों से यह भी पता चलता है कि खालिस्तान से संबंधित 12800 व भिंडरावाले से सम्बंधित 6500 पोस्ट सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचारित होने से किसान आंदोलन की आड़ में खालिस्तानी षड्यन्त्रकारी व उनके समर्थक सक्रिय हो गए हैं। अतः भारत विरोधियों के देश-विदेश में बढ़ते हुए ऐसे दुःसाहस को शीघ्र नियंत्रित करना भारत सरकार व भारत भक्तों के समक्ष एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

यह सर्वथा अनुचित है कि लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान रखने में शासन के सद्व्यवहार के कारण राजनीति के बहाने सक्रिय राजनैतिक दलों व कुछ देशद्रोहियों को पाकिस्तान व चीन जैसे भारत के शत्रुओं का साथ मिल रहा है। यह भी दुःखद है कि कुछ भारत विरोधी तत्वों व खालिस्तानियों के दबाव में ही कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रुदो, ब्रिटेन के 36 सांसदों और संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव अंतोनियो गुतरोस ने किसान आंदोलन का समर्थन करके भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप का दुःसाहस किया है। इसी संदर्भ में प्रतिबंधित संगठन “सिख फोर जस्टिस” ने भी चीन के राष्ट्रपति को पत्र लिख कर सहायता मांगी है। निःसंदेह वैश्विक राजनीति में इसकी भर्त्सना व निंदा व्यापक रूप से होनी चाहिये। अतः भारत की एकता व अखण्डता को बनाये रखने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों को हस्तक्षेप करके किसान आंदोलन की आड़ में बढ़ते खालिस्तान आंदोलन को दबाने में भारत का सहयोग करना चाहिये।

राजद्रोह की राजनीति_

कुछ वर्ष पूर्व काँग्रेस ने जाट आरक्षण के बहाने हरियाणा को जलती आग में झोंका था। उसके बाद कभी एससी/एसटी ऐक्ट के बहाने उत्तरप्रदेश/ सीएए के बहाने पूरा देश/ पटेलों के नाम पर गुजरात, भीमा-कोरेगाँव के नाम पर महाराष्ट्र, अनुच्छेद 370 व 35 ए की वापसी के नाम पर जम्मू-कश्मीर और अब आढ़तियों के बहाने पंजाब। पिछले दिनों जब चीन से सीमाओं पर झड़प हो रही थी उस समय भी कांग्रेसियों के वक्तव्यों में बार-बार शत्रु देश चीन के प्रति सहानुभूति झलकती रही। क्या संसद से राष्ट्रीय सुरक्षा व विकास के लिए संविधानानुसार पारित अधिनियम के प्रति सामान्य नागरिकों को उकसा कर विरोध की राजनीति करने वाली कांग्रेस को मोदी विद्रोह के बहाने भारत विरोध के लिए राजद्रोह का दोषी माना जा सकता है?

याद करो दशकों से देश पर राज करने वाली कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी ने 14 दिसंबर 2019 में रामलीला मैदान, दिल्ली में हुई कांग्रेस की भारत बचाओ रैली में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरुद्ध जनता को भड़काते हुए कहा था कि “लोकतंत्र की रक्षा में हम कुछ भी कुर्बानी देने को तैयार है” और “आर-पार की लड़ाई के लिए घरों से बाहर निकलो”।

उस समय प्रियंका वढेरा के बोल भी कम भड़काऊ नहीं थे “यदि अब भी हम चुप रहे तो संविधान नष्ट हो जाएगा”* आदि भडकाऊ भाषणों के बाद कुछ मुस्लिम व विपक्षी दलों ने देशद्रोहियों का साथ लेकर जामिया व जेएनयू से होते हुए शाहीनबाग जैसे हिंसक व अहिंसक आंदोलन की अनेक नगरों में फैलाया था जिसको समाप्त होने में 101 दिन लगे थे।

इसी प्रकार अनेक विवादित व झूठी बयानबाजी के लिए कुख्यात राहुल गांधी जो सत्ता के लिए इतना तड़प रहा है कि वह बार-बार मोदी सरकार के विरुद्ध जनता को भड़काने के लिए झूठ पर झूठ बोलता आ रहा है। वर्तमान किसान आंदोलन को भड़काने में भी कांग्रेस का बड़ा हाथ है। राहुल गांधी किसानों को भड़काते हुए कहता है कि “आप घबराए नहीं हम आपके साथ है,अभी नहीं खड़े हुए तो कभी खड़े नहीं हो पाओगें,आप हिंदुस्तान है।

अगर यह राजनीति है तो फिर राजद्रोह की परिभाषा क्या होगी?

जेलों में बंद देशद्रोहियों का समर्थन क्यों_

भारतीय किसान यूनियन एकता (उगरांहा) के मंच पर दिल्ली के टिकरी बॉर्डर पर किसान आंदोलन में भीमा कोरेगांव व दिल्ली दंगों के दोषियों की रिहाई के पोस्टर व नारे लगाने वाले जब देशद्रोहियों का समर्थन करेंगे तो क्या उनको किसान माना जा सकता है। क्या भीमा कोरेगांव कांड व दिल्ली दंगों के आरोपियों गौतम नवलखा,जी.एन. साईबाबा, सुधा भारद्वाज, विलसन, शरजील इमाम, उमर खालिद, खालिद सैफी आदि को बुद्धिजीवी व विद्यार्थी के नाम पर निर्दोष मानकर उनकी रिहाई के पोस्टर व नारे लगाए जाएंगे तो क्या किसान आंदोलन को संदिग्ध आतंकवादियों व अर्बन नक्सलियों द्वारा हाईजेक किये जाने का संदेह नहीं होगा? इसको गम्भीरता से समझा जाये तो यह और भी अधिक चिंतित करता है कि इन्हीं अर्बन नक्सलियों के तार सम्भवतः पिछले वर्ष प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी पर आक्रामक प्रहार करने वाले षड़यन्त्रकारियों से जुड़े हुए थे। इससे यही आभास होता है कि इस आंदोलन के पीछे विपक्षी दलों के अतिरिक्त अनेक भारत विरोधी शक्तियां एकजुट होकर सक्रिय हो गई है।

लोकतांत्रिक राजनीति में देशद्रोह व विदेशी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं_

देश में मोदीनीत केंद्रीय शासन के सत्तारूढ़ होने के बाद (मई 2014) विभिन्न अनावश्यक समस्याएं व आपदाएं बनाने में कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दल, गैर सरकारी संगठन, नक्सलवादी , वामपंथी, अलगाववादी व सेक्युलर बुद्धिजीवी आदि निरंतर सक्रिय हैं। निःसंदेह शासन की नीतियों व योजनाओं पर सकारात्मक तर्क-वितर्क होना स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।

लेकिन यह सर्वथा अनुचित है कि लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान रखने में शासन के सद्व्यवहार के कारण राजनीति के बहाने सक्रिय राजनैतिक दलों व कुछ देशद्रोहियों को पाकिस्तान व चीन जैसे भारत के शत्रुओं का साथ मिल रहा है।

यह भी दुःखद है कि कुछ भारत विरोधी तत्वों व खालिस्तानियों के दबाव में ही कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रुदो, ब्रिटेन के 36 सांसदों और संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव अंतोनियो गुतरोस ने किसान आंदोलन का समर्थन करके भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप का दुःसाहस किया है। हमारी सकारात्मक वैश्विक नीतियों का ही परिणाम है कि विभिन्न देशों से हमारे संबंध निरतंर सुदृढ़ हो रहे हैं। जबकि हमारे शत्रु देश पाकिस्तान व चीन को अंतरराष्ट्रीय जगत में बार-बार लज्जित होना पड़ता हैं।

पर्यटकों को भी लुभाता “किसान आंदोलन” _

कृषि कानूनों के विरोध में मुख्यतः पंजाब के किसानों द्वारा चलाया गया किसान आंदोलन अब पंजाब सहित हरियाणा व उत्तरप्रदेश से जुड़ता जा रहा है। देश की राजधानी दिल्ली को केंद्र बना कर हाईवे पर जाम लगाना व टोल नाको को निशुल्क करने जैसी अराजकता शांतिप्रिय व परिश्रमी किसानों को शोभा नहीं देती। दो सप्ताह से चल रहे इस आंदोलन में हज़ारों की संख्या में एकत्रित होकर दिल्ली की विभिन्न सीमाओं के हाईवे पर किसान आंदोलन तीव्र होने के समाचार आये हैं। लेकिन यह सुखद है कि अधिकांश किसान अभी भी कटाई व बुआई करके अपने-अपने खेतों में परिश्रम कर रहा है।

वैसे तो इस आंदोलन को पूर्णतः शांतिपूर्वक चलाये जाने के लिए विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट भोजन, दैनिक प्रयोग की वस्तुएं, हेल्थ चेकअप,आवश्यक दवाइयां, पैरों की मसाज मशीनों की सुविधा, एलसीडी द्वारा फिल्मी मनोरंजन,अध्ययन के लिये पुस्तकें, वाटरप्रूफ टेंट, सोलर पैनल व एयरकंडीशन ट्रेक्टर ट्रॉलियों की भी व्यवस्था विशेष महत्व रखती है। कुछ युवकों ने तो अपनी-अपनी ट्रेक्टर ट्रॉलियों को मॉडिफाइड करके रंग-बिरंगी लाईटों व बेस साउंड सिस्टम आदि लगा कर उसको आकर्षण का केंद्र बना दिया है उसपर फ़ोटो खींचवा कर सोशल मीडिया पर भी डाल कर आनंद ले रहे हैं। ऐसे वातावरण में यह सब आंदोलनकारियों के लिए एक पर्यटन स्थल से कम सुखद नहीं होगा।

“खालसा ऐड” व “दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी” आदि संस्थाएं इस आंदोलन के प्रति सेवा भाव से लगे हुए प्रतीत होते हैं। इसके अतिरिक्त किसानों की फसल पर लाभ कमाने वाले अधिकांश आढ़ती व बिचौलिए आंदोलन में भीड़ जुटाने के लिए गांव गांव से बुजूर्ग व युवा जनों आदि को लाने-ले-जाने के साथ ही उनके भोजन आदि की सारी व्यवस्थाओं में लगे हुए है। कुछ विद्रोही तत्व भी इस आंदोलन में किसानों का भेष धारण करके घुसपैठ कर चुके हैं। इस आंदोलन को लंबे समय तक चलाने के लिए पाकिस्तान भी खालिस्तानियों को पुनः सक्रिय करने के लिए खाद-पानी दे रहा हो तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन क्या इन भटके हुए भोले-भाले आंदोलनकारियों को राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के लिए घातक होने वाले पाकिस्तानी षड़यन्त्रों का कोई आभास होगा?

वैसे यह विचित्र व दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसान आंदोलन में सम्मलित उनके तथाकथित नेता सरकार के साथ हो रही वार्ताओं में सरकारी भोजन लेने से मना करते आ रहे है। जबकि सरकार द्वारा खाद, बीज, कीटनाशक व बिजली आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी एवं वार्षिक आर्थिक सहायता का लाभ लेने में कभी नहीं चूकते।निःसंदेह भारत कृषि प्रधान देश है और किसानों को अन्नदाता माना जाता हैं लेकिन शासन से परस्पर सौहार्दपूर्ण व्यवहार बनाने से ही समस्या का समाधान हो सकेगा। किसी के भी भड़कावे में आकर अड़ियल रुख बनाए रखने से आंदोलन की बागडोर देशविरोधी तत्वों के हाथों में जाने से देश को भारी क्षति हो सकती है।

विनोद कुमार सर्वोदय

क्या प. बंगाल में लोकतंत्र जिन्दा है?

ललित गर्ग –
प.बंगाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जेपी नड्डा के काफिले पर पत्थरबाजी की गई, विरोध प्रदर्शन एवं काले झंडे दिखाने आदि हिंसक एवं अराजक घटना से न केवल भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को गहरा आघात लगा है, बल्कि आमजनता को भी भारी हैरानी हुई है। उसका समर्थन किसी भी रूप मे नहीं किया जा सकता। इन वर्षों में पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक मूल्यों का जिस तरह से मखौल उड़ाया जाता है, हिंसा का सहारा लिया जाता है, वह एक गंभीर चिन्ता का विषय है एवं प. बंगाल की समृद्ध एवं आदर्श लोकतांत्रिक विरासत को धुंधलाना है। वहां हिंसा से मुक्त राजनीति एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।


पश्चिम बंगाल में अगले साल की शुरुआती छमाही में विधानसभा चुनाव होने हैं, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की सरकार एवं पार्टी सुप्रीमो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी सरकार जाती हुई दिखाई दे रही है, बंगाल में भाजपा की गहरी होती जड़े ममता की बौखलाहट का कारण है। बंगाल में बीजेपी ने एक लंबी लड़ाई लड़ी है। 9 साल पहले बंगाल में उसका वोट प्रतिशत 4 था। 2014 में उसकी सीटें 2 होकर वोट प्रतिशत 18 पहुंचा। 2019 में उसकी सीटें 18 हुई और वोट प्रतिशत 40 पहुंचा। अब 2021 के चुनाव में बीजेपी 200 सीट से विजयी होने का दंभ भर रही है। इसलिये ममता और उनकी पार्टी भाजपा पर तरह-तरह के हमले कर रही है। इन्हीं चुनावों की तैयारी सभी राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से कर रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी भी इसी तैयारी में जुटी है, इसी सिलसिले में राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जेपी नड्डा प. बंगाल की यात्रा पर आये, इसी दौरान उनके काफिले पर हमला किया गया जिसमें भाजपा के भी कुछ अन्य नेता थे जिन्हें पत्थरबाजी के दौरान चोटें आयी हैं। प. बंगाल राजनीतिक रूप से बहुत सजग और सांस्कृतिक रूप से बहुत समृद्ध राज्य माना जाता है क्योंकि इस राज्य ने देश की स्वतन्त्रता की लड़ाई में एक से बढ़ कर एक ऐसे बुद्धिजीवी दिये हैं जिनके क्रान्तिकारी विचारों से पूरे देश की जनता प्रेरित हुई है। उनकी इस महान विरासत को इक्कीसवीं सदी में आकर चुनावी विजय के लिए किसी भी स्तर पर कलंकित करने का कार्य कैसे स्वीकार्य हो सकता है?
विडम्बना है कि ममता की शह पर वहां हिंसा, अराजकता, अशांति, डराना-धमकाना, दादागिरी की त्रासद एवं भयावह घटनाएं घटित हो रही है, उसने लोकतांत्रिक मूल्यों के मानक बदल दिये हैं न्याय, कानून और व्यवस्था के उद्देश्य अब नई व्याख्या देने लगे हैं। वहां चरित्र हासिए पर आ गया, सत्तालोलुपता केन्द्र में आ खड़ी हुई। वहां कुर्सी पाने की दौड़ में जिम्मेदारियां नहीं बांटी जा रही, बल्कि चरित्र को ही बांटने की कुचेष्टाएं हो रही हैं और जिस राज्य का चरित्र बिकाऊ हो जाता है उसकी आत्मा को फिर कैसे जिन्दा रखा जाए, चिन्तनीय प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। आज कौन पश्चिम बंगाल में अपने दायित्व के प्रति जिम्मेदार है? कौन नीतियों के प्रति ईमानदार है? कौन लोकतांत्रिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखते हुए निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव कराने के लिये प्रतिबद्ध है? सवाल है कि चुनाव में शामिल पार्टियां विशेषतः सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस एवं ममता अपने कार्यकर्ताओं को यह बात क्यों नहीं समझा पाती कि हिंसा की छोटी वारदात भी न केवल लोकतंत्र को कमजोर करती है बल्कि यह चुनाव प्रक्रिया पर एक कलंक है।
पश्चिम बंगाल में सर्वत्र आगामी विधानसभा चुनाव शांति, अहिंसक एवं निष्पक्ष तरीके से सम्पन्न कराने के प्रश्न पर एक घना अंधेरा छाया हुआ है, निराशा और दायित्वहीनता की चरम पराकाष्ठा ने वहां राजनीतिक प्रक्रिया को जटिल दौर में लाकर खड़ा कर दिया है। हम यह न भूलें कि प्रदेश के नेतृत्व को निर्मित करने की प्रक्रिया जिस दिन अपने सिद्धांतों और आदर्शों की पटरी से उतर गयी तो पूरी लोकतंत्र की प्रतिष्ठा ही दांव पर लग जायेगी, उसकी बरबादी का सवाल उठ खड़ा होगा। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र कितनी ही कंटीली झांड़ियों के बीच फंसा हुआ है। वहां की अराजक एवं अलोकतांत्रिक घटनाएं प्रतिदिन यही आभास कराती है कि अगर इन कांटों के बीच कोई पगडण्डी नहीं निकली तो लोकतंत्र का चलना दूभर हो जायेगा। वहां की हिंसक घटनाओं की बहुलता को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि राजनैतिक लोगों से महात्मा बनने की उम्मीद तो नहीं की जा सकती, पर वे पशुता पर उतर आएं, यह ठीक नहीं है।
पश्चिम बंगाल के भाग्य को निर्मित करने के लिये सबसे बड़ी जरूरत एक ऐसे नेतृत्व को चुनने की है जो और कुछ हो न हो- अहिंसक हो, लोकतांत्रिक मूल्यों को मान देने वाला हो और राष्ट्रीयता को मजबूत करने वाला हो। दुःख इस बात का है कि वहां का तथाकथित नेतृत्व लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर खरा नहीं है, दोयम है और छद्म है, आग्रही और स्वार्थी है, हठ एवं तानाशाही है। इन आगामी विधानसभा चुनावों में ऐसे नेतृत्व को गहरी चुनौती मिलनी ही चाहिए, जो उसके लिये एक सबक बने। सर्वमान्य है कि वही नेतृत्व सफल है जिसका चरित्र पारदर्शी हो। सबको साथ लेकर चलने की ताकत हो, विकासमूलक शासन जिसका ध्येय हो, सापेक्ष चिंतन हो, समन्वय की नीति हो और निर्णायक क्षमता हो। प्रतिकूलताओं के बीच भी ईमानदारी से पैर जमाकर चलने का साहस हो। वहां योग्य नेतृत्व की प्यासी परिस्थितियां तो हैं, लेकिन बदकिस्मती से अपेक्षित नेतृत्व नहीं हैं। ऐसे में सोचना होगा कि क्या नेतृत्व की इस अप्रत्याशित रिक्तता को भाजपा द्वारा भरा जा सकता है? क्या पश्चिम बंगाल के सामने आज जो भयावह एवं विकट संकट और दुविधा है उससे छुटकारा मिल सकता है?
बंगाल की धरती वैचारिक विविधता के बावजूद लोकतांत्रिक मूल्यों की उर्वरा भूमि रही है। इसमें राष्ट्रवादी विचारों से लेकर समाजवादी व माक्र्सवादी विचारों की नदियां इस प्रकार बहती रही हैं कि आम जनता इन सभी के तात्विक गुणों का जायजा लेकर अपना लोकतान्त्रिक रास्ता तय करती रही है। बेशक साठ के दशक के अंत में इसी राज्य से नक्सली आंदोलन शुरू हुआ था जिसने हिंसक रास्तों से राजनीतिक सत्ता को हथियाने की वकालत की थी परन्तु इस आन्दोलन को इसी राज्य की जनता के समर्थन से समाप्त भी कर दिया गया और संसदीय लोकतन्त्र के चुनावी रास्ते से जनसमस्याएं हल करने के लिए यहां की जनता ने माक्र्सवादी पार्टी के नेतृत्व में वामपंथी दलों को बाद में सत्ता चलाने का अधिकार 34 वर्षों से अधिक समय तक के लिए दिया। इस वामपंथी शासन के दौरान राज्य में जो सीनाजोरी की राजनीति संस्थागत रूप में परिवर्तित हो गई थी उसे वर्तमान मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने जनसमर्थन से उखाड़ फेंका।
ममता दी का शासन पिछले दस वर्षों से इस राज्य में चल रहा है जिसे राजनीतिक तौर पर अब भाजपा चुनौती देती दिख रही है। इस चुनौती का जवाब देने के लिए सत्तारूढ़ दल को केवल लोकतान्त्रिक तरीकों का ही इस्तेमाल करना होगा और स्वयं भाजपा को भी ऐसे तत्वों से दूर रहना होगा जो इस स्थिति का लाभ उठाने की गरज से भेष बदल कर राजनीतिक विरोधियों की जमात में शामिल होने को बेताब हो जाते हैं, परन्तु पिछले कुछ महीनों से जिस तरह भाजपा के कार्यकर्ता हिंसा का शिकार हो रहे हैं उससे यह आशंका तो पैदा होती ही है कि राज्य में इस तरह की घटनाओं में सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ताओं की हिमायत हो सकती है। इस शंका का निवारण केवल राज्य सरकार ही कर सकती है क्योंकि कानून-व्यवस्था उसका विशेष अधिकार क्षेत्र है, परन्तु ऐसे मामलों में राज्य के राज्यपाल का हस्तक्षेप भी अपेक्षित नहीं कहा जा सकता।
पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और पुलिस प्रमुख ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के समन को जिस तरह ठुकराया और दिल्ली जाकर गृह सचिव से मुलाकात करने से इन्कार किया वह केवल राज्य प्रशासन के शीर्ष स्तर पर की जाने वाली मनमानी ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तौर-तरीकों का निरादर भी है। बंगाल के इन दोनों शीर्ष अधिकारियों की यह हरकत उसी संघीय व्यवस्था को क्षति पहुंचाने वाली है जिसकी रक्षा करने की जरूरत ममता सरकार रह-रहकर जताती रहती है। ममता दी का दायित्व बनता है कि वह किसी भी तरह राजनीतिक हिंसा को न होने दें और इसके लिए राज्य पुलिस प्रशासन को सदा सावधान रखें। हालांकि श्री नड्डा पर हमले की जांच का आदेश उन्होंने पुलिस प्रशासन को दे दिया है और उसने अपना काम भी शुरू कर दिया है परन्तु हमें ऐसी ही पिछली घटनाओं का भी संज्ञान लेना होगा और देखना होगा कि उनमें की गई जांच का क्या निष्कर्ष निकला? इसके साथ ही पुलिस को अपनी भूमिका पूरी तरह अराजनीतिक होकर निभानी होगी और समस्या की जड़ तक जाना होगा।

हर पल एक नई शुरुआत संभव है

– ललित गर्ग –

कोरोना महाव्याधि एवं संकट से संघर्ष करते हुए हम बहुत टूट गये हंै, निराशाजनक एवं नकारात्मक शक्तियों से घिर गये हैं। इन स्थितियों से उपरत होने के लिये एवं जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने के लिये हमें जीवन को नया आयाम देना होगा। स्वयं की शक्ति को पहचानना होगा, आत्म साक्षात्कार करना होगा एवं ऊर्जा-केन्द्र स्थापित करना होगा, स्वयं के प्रति समर्पित होना होगा,जहां हर शब्द नया वेग देगा और हर वाक्य नया क्षितिज देगा। यूं कहा जा सकता है कि तब अभ्युदय का ऐसा प्राणवान और जीवंत पल हमारे हाथ में होगा, एक दिव्य, भव्य और नव्य महाशक्ति हमारे साथ चलयमान होगी। जैसा कि जोहान वाॅन गोथे ने कहा था-‘‘जिस पल कोई व्यक्ति खुद को पूर्णतः समर्पित कर देता है, ईश्वर भी उसके साथ चलता है।’’
उपयोगी जीवन जीने वालों ने इसी तरह सदा बड़े-से-बडे़ संकट को परास्त करते हुए अपने वर्तमान को आनंदमय एवं सार्थक बनाया है। शक्ति का सदुपयोग करने वालों ने वर्तमान को दमदार और भविष्य को शानदार बनाया है। मगर अफसोस इस बात का है कि शक्ति और समय का दुरुपयोग करने वाले न तो वर्तमान में सुख से जी सकते हैं और न ही अपने भविष्य को चमकदार बना सकते हंै। इसके लिये सकारात्मक बनना होगा, सकारात्मक इंसान बनने का एक सूत्र है अनुशासन। जो व्यक्ति अनुशासन से बंधा रहता है, वह आगे बढ़ता है, शक्ति का अनुभव करता है। हालांकि एक अच्छा इंसान बनने के लिए कोई निर्धारित योग्यता नहीं होती जिसकी शर्तों को पूरा करना पड़े। यह काम जितना सरल प्रतीत होता है, उससे बहुत ज्यादा मुश्किल है। बहुत बार व्यक्तिगत स्तर पर हानि उठाकर भी अपने जीवन में इसे बनाए रखना पड़ता है। जो बहुत सारे धैर्य के साथ बहुत कुछ खो देने के साहस की मांग करता है। प्रो. फ्रिट्ज़्ा के ओसेर के अनुसार, हमने पाया कि जो लोग अच्छाई का दामन थामते हैं, वे कई बार समाज से अलग रह जाते हैं और असफल जिंदगी बिताते हैं।
मनुष्य जन्म की सार्थकता केवल सांसों का बोझ ढोने से नहीं होगी एवं केवल योजनाएं बनाने से भी काम नहीं चलेगा, उसके लिए नजरिया का परिष्कार करना होगा। अपने स्वार्थों को त्यागकर परार्थ और परमार्थ चेतना से जुड़ना होगा। तभी अमेरिकी लेखक और लेक्चरर मार्क ट्वेन का कहना था, ‘अच्छे बनिए और आप अकेले रह जायेंगे।’ खासतौर पर उस मामले में जहां सफलता अनैतिक होने की शर्त पर मिले। पैसा, प्रसिद्धि और शक्ति हासिल कर लेना उतना मुश्किल काम नहीं है, जितना सद्गुणों को बनाए रखना। इसलिये इंसान को सफलता से पहले अच्छाई के लिये प्रयत्नशील बनना चाहिए। उसके बाद मिलने वाली सफलता ज्यादा उपयोगी है। लेकिन हमारे व्यक्तित्व की एक बड़ी विडम्बना रही है कि हम अपने आप की पहचान औरों के नजरिये से, मान्यता से, पसंद से, स्वीकृति से करते हैं जबकि स्वयं द्वारा स्वयं को देखने के नजरिये से ही सही पहचान बनती है।
चीजों की तह मंे जाने में ही बेहतर भविष्य है। इसके बिना बात नहीं बनेगी। सच्चाई है कि जिसे हमने सुख का साधन मान रखा है, वह हमें सुख नहीं दे रहा है, जो है, उसे छोड़कर, जो नहीं है उस ओर भागना हमारा स्वभाव है। फिर चाहे कोई चीज हो या रिश्ते। यूं आगे बढ़ना अच्छी बात है, पर कई बार सब मिल जाने के बावजूद वही कोना खाली रह जाता है, जो हमारा अपना होता है। दुनियाभर से जुड़ते हैं, पर अपने ही छूट से जाते हैं। संत मदर टेरेसा ने कहा है, ‘अगर दुनिया बदलना चाहते हैं तो शुरुआत घर से करें और अपने परिवार को प्यार करें।’
मुख्य बात यह है कि कुछ लोग बेहद मुश्किल समय में भी अच्छाई का साथ नहीं छोड़ते, चाहे उन्हें असफल ही क्यों न होना पड़े। इसलिए कहावत में कहा गया है कि अनंत काल का लक्ष्य लेकर चलेंगे, तब कहीं अच्छे मनुष्य का निर्माण हो सकेगा। इस निर्माण के लिए शक्तिसंपन्न होना जरूरी है। शक्तिसंपन्न वही व्यक्ति हो सकता है, जिसका आत्मविश्वास प्रबल होता है। अस्मिता की पहचान तथा क्षमताओं का बोध करने के साथ विकास के नए क्षितिज की खोज भी आवश्यक है। क्लियरवाॅटर ने सटीक कहा है कि हरेक पल आप नया जन्म लेते हैं। हर पल एक नई शुरुआत हो सकती है। यह विकल्प है- आपका अपना विकल्प। लेकिन व्यक्ति प्रमाद में जीता है और प्रमाद में बुद्धि जागती है प्रज्ञा सोती है। इसलिए व्यक्ति बाहर जीता है भीतर से अनजाना होकर और इसलिए सत्य को भी उपलब्ध नहीं कर सकता। इसलिए मनुष्य की परिस्थितियां बदलें, उससे पहले उसकी स्वार्थ एवं संकीर्णता से जुड़ी प्रकृति बदलनी जरूरी है। बिना आदतन संस्कारों के बदले न सुख संभव है, न साधना और न साध्य।
हर व्यक्ति अच्छा और सफल इंसान बनना चाहता है, क्या अच्छा इंसान और सफल इंसान दो अलग चीजें होती हैं? दोनों में ज्यादा उपयोगी कौन है? इस तुलनात्मक विवेचना से एक तथ्य सामने आता है कि सफलता से ज्यादा उपयोगी अच्छाई है। क्योंकि सबसे खास बात यह है कि एक सफल व्यक्ति की तुलना में एक अच्छे इंसान की उपलब्धि लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती है। उसके लिए किए गए काम का दायरा भी व्यक्तिगत स्तर से ऊपर होता है। लेखक निक हाॅर्नबी के अनुसार, एक सफल व्यक्ति अपनी उपलब्धियों की वजह से पहचाना जाता है। हालांकि यह उपलब्धियां मूलभूत रूप से केवल उसे फायदा पहुंचाने वाली होती हैं, लेकिन एक अच्छे व्यक्ति का काम स्वार्थ से परे होता है।
कबीर, दादू, रैदास, गांधी, आचार्य तुलसी, वल्लभ गुरु आदि ने अनेक रास्तों और अनेक तरीकों से, जीवन की अर्थवत्ता को खोज निकाला था और खुद को उसमें खपा दिया था, वे वही बात बतातेे, जिन्हें उन्होंने खुद आजमाया था। ऐसे अनेक अच्छे इंसानों की जिंदगियां हैं। वे सारे फरिश्ते थे, ऐसा मैं नहीं मानता। लेकिन वे अच्छे इंसान थे, ऐसे लोगों ने आत्मविश्वास, नैतिकता एवं चरित्र का खिताब ओढ़ा नहीं, उसे जीकर दिखाया। जो भाग्य और नियति के हाथों के खिलौना बनकर नहीं बैठे, स्वयं के पसीने से अपना भाग्य लिखा। उन्हें याद करने का इससे अच्छा तरीका और नहीं कि उनकी सूक्तियों एवं जीवन में समायी अपराजेय मेधा का उत्सव मनाया जाये, उनके पदचिन्हों पर चलते हुए आने वाले कल का आविष्कार किया जाये। अरस्तु के अनुसार, अच्छी परिस्थितियों और ऐश्वर्य के बावजूद, एक अच्छी जिंदगी, इस बात पर निर्भर करती है कि एक व्यक्ति सद्गुण के अनुसार व्यवहार करे। हालांकि अन्य दार्शनिक सद्गुण को अच्छी और सफल जिंदगी का केवल एक आयाम मानते हैं। कांट का मानना है कि अगर जिंदगी के सभी आयामों को व्यक्ति व्यावहारिक तार्किकता के आधार पर देखने लगे तो वह ऐसी जिंदगी हासिल कर सकता है, लेकिन यह भी संभव है कि एक व्यक्ति इसके साथ सहज हो और दूसरा नहीं। यह अलग बात है कि आज अच्छाई से ज्यादा महत्व सफलता को मिलता जा रहा है। नैतिकता एवं जीवन मूल्यों की विरासत धूंधली पड़ने लगी है। फिर भी अच्छाई सदैव ऊपर ही रहेगी।

हिन्दीः विश्व में प्रतिष्ठा, देश में उपेक्षा क्यों?


– ललित गर्ग-

हाल ही में एथनोलॉग द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार हिंदी विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन गयी है। वर्तमान में 637 मिलियन लोग हिंदी भाषा का उपयोग करते हैं। हिंदी भारत की राजभाषा है। सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व को समेट हिंदी अब विश्व में लगातार अपना फैलाव कर रही है, हिन्दी राष्ट्रीयता की प्रतीक भाषा है, उसको राजभाषा बनाने एवं राष्ट्रीयता के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठापित करने के नाम पर भारत में उदासीनता एवं उपेक्षा की स्थितियां परेशान करने वाली है, विडम्बनापूर्ण है। विश्वस्तर पर प्रतिष्ठा पा रही हिंदी को देश में दबाने की नहीं, ऊपर उठाने की आवश्यकता है। हमने जिस त्वरता से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की दिशा में पहल की, उसी त्वरा से राजनैतिक कारणों से हिन्दी की उपेक्षा भी है, यही कारण है कि आज भी देश में हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए। देश-विदेश में इसे जानने-समझने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इंटरनेट के इस युग ने हिंदी को वैश्विक धाक जमाने में नया आसमान मुहैया कराया है।
एथनोलॉग के वल्र्ड लैंग्वेज डेटाबेस के 22वें संस्करण में बताया गया है कि दुनियाभर की 20 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में 6 भारतीय भाषाएं हैं, इनमें हिंदी के बाद बंगाली भाषा का स्थान है जो लिस्ट में 26.5 करोड़ लोगों के साथ सातवें स्थान पर है। दुनियाभर में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में पहला स्थान अंग्रेजी का है और पूरी दुनिया में 113.2 करोड़ लोग इस भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा दूसरे स्थान पर चीन में बोली जाने वाली मंदारिन भाषा है जिसे 111.7 करोड़ लोग बोलते हैं। चौथे नंबर पर 53.4 करोड़ लोगों के साथ स्पेनिस और पांचवें नंबर पर 28 करोड़ लोगों के साथ फ्रेंच भाषा है।
दुनिया में हिन्दी की बढ़ती लोकप्रियता एवं विश्व की बहुसंख्य आबादी द्वारा इसे अपनाये जाने की स्थितियां हर भारतीय के लिये गर्व की बात है। देश की आजादी के पश्चात 14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। राष्ट्र भाषा हिन्दी सम्पूर्ण देश में सांस्कृतिक और भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रमुख साधन है। भारत का परिपक्व लोकतंत्र, प्राचीन सभ्यता, समृद्ध संस्कृति तथा अनूठा संविधान विश्व भर में एक उच्च स्थान रखता है, उसी तरह भारत की गरिमा एवं गौरव की प्रतीक राष्ट्र भाषा हिन्दी को हर कीमत पर विकसित करना हमारी प्राथमिकता होनी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन में हिन्दी को राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के रूप में स्कूलों, काॅलेजों, अदालतों, सरकारी कार्यालयों और सचिवालयों में कामकाज एवं लोकव्यवहार की भाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिलना चाहिए, इस दिशा में वर्तमान सरकार के प्रयास उल्लेखनीय एवं सराहनीय है, लेकिन उनमें तीव्र गति दिये जाने की अपेक्षा है। क्योंकि इस दृष्टि से महात्मा गांधी की अन्तर्वेदना को समझना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाषा संबंधी आवश्यक परिवर्तन अर्थात हिन्दी को लागू करने में एक दिन का विलम्ब भी सांस्कृतिक हानि है। मेरा तर्क है कि जिस प्रकार हमने अंग्रेज लुटेरों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक समाप्त कर दिया, उसी प्रकार सांस्कृतिक लुटेरे रूपी अंग्रेजी को भी तत्काल निर्वासित करें।’ लगभग सात दशक के आजाद भारत में भी हमने हिन्दी को उसका गरिमापूर्ण स्थान न दिला सके, यह विडम्बनापूर्ण एवं हमारी राष्ट्रीयता पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह है।
उपराष्ट्रपति वैंकय्या नायडू ने हिन्दी के बारे में ऐसी ही बात पिछले दिनों कही थी, जिसे कहने की हिम्मत महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डाॅ. राममनोहर लोहिया में ही थी। उन्होंने कहा कि ‘अंग्रेजी एक भयंकर बीमारी है, जिसे अंग्रेज छोड़ गए हैं।’’ वैंकय्या नायडू का हिन्दी को लेकर जो दर्द एवं संवेदना है, वही स्थिति सरकार से जुडे़ हर व्यक्ति के साथ-साथ जन-जन की होनी चाहिए। हिन्दी के लिये दर्द, संवेदना एवं अपनापन जागना जरूरी है। हम अपनी स्वभाषा को सम्मान देने के छोटे-छोटे प्रयासों द्वारा समाज में बड़े परिवर्तन ला सकते हैं, जो आने वाले समय में हिंदी के विकास में अपना महत्वपूर्ण स्थान दे सकता है। राष्ट्रभाषा को प्रतिष्ठापित करने एवं सांस्कृतिक सुरक्षा के लिये अनेक विशिष्ट व्यक्तियों ने व्यापक प्रयत्न किये जिनमें सुमित्रानन्दन पंत, महादेवी वर्मा और वर्तमान में वेदप्रताप वैदिक प्रमुख हैं। आगरा के सांसद सेठ गोविन्ददासजी ने तो अंग्रेजी के विरोध में अपनी पद्मभूषण की उपाधि केन्द्र सरकार को वापिस लौटा दी।
कुछ राजनीतिज्ञ अपना उल्लू सीधा करने के लिये भाषायी विवाद खड़े करते रहे हैं और वर्तमान में भी कर रहे हैं। यह देश के साथ मजाक है। जब तक राष्ट्र के लिये निजी-स्वार्थ को विसर्जित करने की भावना पुष्ट नहीं होगी, राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक उन्नयन एवं सशक्त भारत का नारा सार्थक नहीं होगा। हिन्दी को सम्मान एवं सुदृढ़ता दिलाने के लिये केन्द्र सरकार के साथ-साथ प्रांतों की सरकारों को संकल्पित होना ही होगा। नरेन्द्र मोदी ने विदेशों में हिन्दी की प्रतिष्ठा के अनेक प्रयास किये हैं, ऐसे ही प्रयासों का परिणाम है हिन्दी का दुनिया में सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषाओं में तीसरे स्थान पर आना। लेकिन उनके शासन में विदेशों में ही नहीं देश में भी हिन्दी की स्थिति सुदृढ़ बननी चाहिए। यदि उनके शासन में हिन्दी को राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित नहीं किया जा सका तो भविष्य में इसकी उपेक्षा के बादल घनघोर ही होंगे, यह एक दिवास्वप्न बनकर रह जायेगा। हाल में कर्नाटक एवं तमिलनाडू में हिन्दी विरोध की स्थितियां उग्र बनी। हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी दक्षिण भारत में इसकी इतनी उपेक्षा क्यों? क्षेत्रीय भाषा के नाम पर हिन्दी की अवमानना एवं उपेक्षा के दृश्य उभरते रहे हैं, लेकिन प्रश्न है कि हिन्दी को इन जटिल स्थितियों में कैसे राष्ट्रीय गौरव प्राप्त होगा। भाषायी संकीर्णता न राष्ट्रीय एकता के हित में है और न ही प्रान्त के हित में। प्रान्तीय भाषा के प्रेम को इतना उभार देना, जिससे राष्ट्रीय भाषा के साथ टकराहट पैदा हो जाये, यह देश के लिये उचित कैसे हो सकता है?
अतीत के विपरीत लोग अब हिंदी विरोधी के इरादों और तमिल-कन्नड़ की सुरक्षा के नाम पर की जा रही राजनीति को समझते हैं। दरअसल बाजार और रोजगार की बड़ी संभावनाओं के बीच हिंदी विरोध की राजनीति को अब उतना महत्व नहीं मिलता, क्योंकि लोग हिंदी की ताकत को समझते हैं। पहले की तरह उन्हें हिंदी विरोध के नाम पर बरगलाया नहीं जा सकता। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने कहा था – जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं! वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं!! हिन्दी भाषा का मामला भावुकता का नहीं, ठोस यथार्थ का है, राष्ट्रीयता का है।
हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है। महात्मा गांधी ने सही कहा था कि राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।’ यह कैसी विडम्बना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो, उसकी घोर उपेक्षा हो रही है, इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति को नरेन्द्र मोदी सरकार कुछ ठोस संकल्पों एवं अनूठे प्रयोगों से दूर करने के लिये प्रतिबद्ध हो, हिन्दी को मूल्यवान अधिमान दिया जाये। ऐसा होना हमारी सांस्कृतिक परतंत्रता से मुक्ति का एक नया इतिहास होना, तभी हिन्दी अपना वैश्विक विकास करते हुए तीसरे स्थान से पहले स्थान की ओर अग्रसर हो सकेगी। 

किस से करे गुहार !

सच्चे पावन प्यार से, महके मन के खेत !
दगा झूठ अभिमान से, हो जाते सब रेत !!

किस से बातें वो करे, किस से करे गुहार !
भटकी राहें भेड़ जो, त्यागे स्व परिवार !!

मंत्र प्यार का फूँकते, दिल में रखते घात !
रिश्ते क्या बेकार है, करना उन से बात !!

नेह-स्नेह सूखे सभी, पाले बैठे बैर !
अपने ताबूत ठोकते, देते कन्धा गैर !!

क्या खोया; क्या पा लिया, जीते जी के ऐब !
ज्यों आये त्यों चल दिए, नहीं कफ़न में जेब !!

बुझ पाए कैसे भला, ये नफरत की आग !
बस्ती-बस्ती गा रही,फूट-कलह के राग !!

सील गए रिश्ते सभी, बिना प्यार की धूप !!
धुंध बैर की छा रही, करती ओझल रूप !!

भाजपा और ममता में टक्कर

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर इलाके में भाजपा अध्यक्ष जगत नड्डा और भाजपा प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय के काफिले पर जो हमला हुआ, उसमें ऐसा कुछ भी हो सकता था, जिसके कारण ममता बनर्जी की सरकार को भंग करने की नौबत भी आ सकती थी। यदि नड्डा की कार सुरक्षित नहीं होती तो यह हमला जानलेवा ही सिद्ध होता। कैलाश विजयवर्गीय की कार विशेष सुरक्षित नहीं थी तो उनको काफी चोटें लगीं। क्या इस तरह की घटनाओं से ममता सरकार की इज्जत या लोकप्रियता बढ़ती है ? यह ठीक है कि भाजपा के काफिले पर यह हमला ममता ने नहीं करवाया होगा। शायद इसका उन्हें पहले से पता भी न हो लेकिन उनके कार्यकर्ताओं द्वारा यह हमला किए जाने के बाद उन्होंने न तो उसकी कड़ी भर्त्सना की और न ही अपने कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई की। बंगाल की पुलिस ने जो प्रतिक्रिया ट्वीट की, वह यह थी कि घटना-स्थल पर ‘‘खास कुछ हुआ ही नहीं’’। पुलिस ने यह भी कहा कि ‘‘कुछ लोगों ने पत्थर जरुर फेंके लेकिन सभी लोग सुरक्षित हैं। सारी स्थिति शांतिपूर्ण है।’’ जरा सोचिए कि पुलिसवाले इस तरह का रवैया आखिर क्यों रख रहे हैं ? क्योंकि वे आंख मींचकर ममता सरकार के इशारों पर थिरक रहे हैं। सरकार ने उन्हें यदि यह कहने के लिए प्रेरित नहीं किया हो तो भी उनका यह रवैया सरकार की मंशा के प्रति शक पैदा करता है। यह शक इसलिए भी पैदा होता है कि ममता-राज में दर्जनों भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है और उक्त घटना के बाद कल भी एक और हत्याकांड हुआ है। प. बंगाल के चुनाव सिर पर हैं। यदि हत्या और हिंसा का यह सिलसिला नहीं रुका तो चुनाव तक अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है। केंद्र और राज्य में इतनी ज्यादा ठन सकती है कि ममता सरकार को भंग करने की नौबत भी आ सकती है। उसका एक संकेत तो अभी-अभी आ चुका है। पुलिस के तीन बड़े केंद्रीय अफसर, जो बंगाल में नियुक्त थे और जो नड्डा-काफिले की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे, उन्हें गृहमंत्री अमित शाह ने वापस दिल्ली बुला लिया है। ममता इससे सहमत नहीं है। लेकिन इस तरह के कई मामलों में अदालत ने केंद्र को सही ठहराया है। ममता को आखिरकार झुकना ही पड़ेगा। राज्यपाल जगदीप धनखड़ और ममता के बीच रस्साकशी की खबरें प्रायः आती ही रहती हैं। भाजपा की केंद्र सरकार और ममता सरकार को जरा संयम से काम लेना होगा, वरना बंगाल की राजनीति को रक्तरंजित होने से कोई रोक नहीं पाएगा। 

पारंपरिक औषधि का वैश्विक-केंद्र बनता भारत


                ‘दुनिया की फार्मेसी’ के बाद भारत  ‘वैश्विक आरोग्य’ का केंद्र भी बनकर  दिखा सकता है ये  कल्पना मात्र  नहीं, बल्कि अब ये घोषित सत्य बन चुका है . पारंपरिक औषधि का वैश्विक-केंद्र के रूप में भारत के चुनाव की ये घोषणा विश्व स्वास्थ्य संगठन के डायरेक्टर जनरल टेडरोज़ ऐडहानाम  ‎ नें भारत को विडियो के माध्यम से भेजे अपने सन्देश में उस समय की जब ५वें आयुर्वेदिक दिवस के उपलक्ष्य में श्री नरेंद्र मोदी नें भविष्य में तैयार होने वाले जयपुर और जामनगर में स्थित दो आयुर्वेदिक संस्थानों का विडियो-कॉन्फ़्रेंसिंग के द्वारा उद्घाटन किया.पिछले साल की तुलना में इस साल सितम्बर में आयुर्वेदिक-उत्पादों का निर्यात ४५% बढ़ा है, जो ये समझने के लिए काफी है कि आयुर्वेद पर दुनिया के देशों नें कितना भरोसा दिखाया है.  और यही कारण है  कि जिसका परिणाम डब्लू एच ओ की इस घोषणा के रूप में सामने आया है.
                दुनिया भर में पायी जाने वाली जड़ी-बूटीयों में आधे से अधिक भारत में पैदा होतीं हैं. लेकिन इसकी सही मायने में सुध तभी जाकर ली गयी, जब सन २००० में अटल बिहारी की एनडीऐ सरकार नें पहली बार भारतीय चिकत्सा पद्धतियों के लिए अलग से राष्ट्रीय नीति बनायी. जिसके अंतर्गत आयुर्वेद तथा यूनानी चिकत्सा पद्धति को हरित उद्धोग की श्रेणी में लाने का अभूतपूर्व कार्य किया गया. और तभी जाकर आंवला, अश्वगंधा, चन्दन आदि आयुर्वेद में उपयोग होने वाली जड़ी-बूटीयों को नेशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड नें पहली बार उनके संरक्षण-संवर्धन को लेकर योजना बनाने पर ध्यान देना शुरू किया.  और अटलजी की सरकार के दौरान ही कोच्ची[केरल] में प्रथम ‘विश्व आयुर्वेदिक सम्मेलन व हर्बल मेला’ आयोजित कर दुनिया को बताया कि उसके पास उसे देने को उसकी अपनी क्या बेमिसाल निधि है. इस आयोजन में अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड दक्षिण अफ्रीका,डेनमार्क, केनेडा समेत दुनिया के ५० देशों के २५०० प्रतिनिधियों नें बढ़चढ़कर भाग लिया था.
                     कोरोना के इस काल में निराश मानव जाति के लिए आयुर्वेद नयी आशा की किरण लेकर आया है. यहाँ तक कि देश की सीमा लांघ विदेश तक में अब इसने सुर्खियाँ बटोरना शुरू कर दिया है-‘ कोरोना वायरस टोंसिल से फेफड़े में पहुंचकर शरीर में तेजी से फैलता है. हल्दी और चूना मिलकर विषनाशक बन जाते हैं.शरीर में फ्री रेडिकल्स और यूरिक एसिड नहीं बन पता, जिससे लंग्स समेत अन्य अंगों में सूजन नहीं आती.दोनों औषधि[हल्दी-चूना] प्रतिरोधक-क्षमता बढ़ाती हैं, जो कोरोना मरीज़ को देने से सिद्ध भी हुआ है . अमेरिका के मेडिकल जर्नल में इस पर  शोध छपा है.यह शुगर समेत कई अन्य बीमारियों का भी इलाज है.’-डॉ देवदत्त भाद्लीकर,आयुर्वेद प्रोफेसरऔर हल्दी-चूने से रोगों के उपचार की विधि के विशेषज्ञ. पंचभौतिक  [धरती,अग्नि,जल,वायु और आकाश ]अवधारणा पर आधारित आयुर्वेद में मनुष्य जीवन के भौतिक व अध्यात्मिक दोनों ही पक्षों का संतुलित विचार होता है. इसलिए इसके अंतर्गत होने वाले उपचार में स्वास्थ शरीर के साथ-साथ मन के निग्रह व आत्मा के उत्थान को भी ध्यान रखा जाता है. और, इसी कारण से योगासन को आयुर्वेद से जोड़ा गया है.  महर्षि सूश्रूत नें स्वस्थ व्यक्ति की व्याख्या ऐसे व्यक्ति से की है जिसके शरीर त्रिदोष वात, पित, कफ़ संतुलित अवस्था में हों, प्राणभूत द्रव पदार्थ सामान्य अवस्था में हों और साथ ही आत्मा, मन, और इन्द्रिय शांत अवस्था में हों . यही आयुर्वेद का एकात्म दृष्टिकोण है. सम्पूर्ण रोग-प्रतिरोधक क्षमता [आरोग्य]को प्राप्त करने में शाकाहार की बड़ी भूमिका है, जिसे आयुर्वेद नें प्रधानता से स्वीकारा है. दूसरी ओर  गिलोय, शतावरी, अश्वगंधा, तुलसी, काली मिर्च   में निहित इम्युनिटी बढ़ाने के गुणों से दुनिया अब अनजान नहीं, इसी के कारण से आज आयुर्वेदिक औषधियां  के निर्यात में इतनी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. आज लगभग ९० देशों में आयुर्वेदिक दवाओं का सेवन करने वालों की अच्छी-खासी संख्या है.
                       आयुर्वेद के द्वारा देश को प्राप्त इस गौरव के पीछे एनडीए सरकार की भूमिका को सदेव स्मरण किया जाता रहेगा.  जब केंद्र में नरेंद्र मोदी नें सत्ता संभाली तो आयुर्वेद को पृथक आयुष मंत्रालय मिला. प्रधान मंत्री विदेश में जहां भी गए उन्होंनें नें भारतीय पारंपरिक ओषधियों को प्रोत्साहित करने के लिए करार किये. साथ ही भारतीय दूतावासों में आयुष सूचना केंद्र भी स्थापित किये.

कोरोना मे दिन मैंने कैसे काटे

मत पूछो,कोरोना मे दिन कैसे मैंने काटे,
हाथो मे पड थे छाले,पैरों में चुभे थे कांटे।
दर दर ठोकरें हर जगह मुझे खानी पड़ी थी,
ये मेरे लिए मुश्किल की बहुत बड़ी घड़ी थी।

घर में बन्द था,नहीं जा सकता था मै बाहर,
बच्चे भी मना कर रहे थे,जाओ नहीं बाहर।
घर में बैठ कर लिखता था मै कुछ कविता,
तड़फ रहा था मै सुने तो मेरी कोई कविता।

कर रहा था मै घर से ही दफ्तर का काम,
मिल रहा न था मुझे तनिक भी विश्राम।
बना लिया था घर को मैंने अपना था कार्यलय,
मंदिर भी बन्द थे इसलिए घर बना था देवालय।

मुंह पर मास्क लगाना,रकखी दो गज की दूरी,
समझो इसे डर मेरा,या समझो मेरी मजबूरी।
घुटता था दम मेरा काम करने में होती परेशानी,
जान है तो जहान है इसे समझो न मेरी नादानी।

कुछ फरमाइशें लेकर मतलब से कोई मिलने आया,
जिनकी की थी मैंने सहायता कोई काम न मेरे आया।
ले रहे थे सब अपने अपने मतलब के खर्राटे,
पूछो मत कोरोना मे दिन मैंने किस तरह काटे।

आर के रस्तोगी

‘आरएसएस 360’: संघ की पूर्ण प्रतिमा

– लोकेन्द्र सिंह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस, 2025 में अपनी यात्रा के 100 वर्ष पूरे कर लेगा। यह किसी भी संगठन के लिए महत्वपूर्ण बात होती है कि इतने लंबे कार्यकाल में उसका निरंतर विस्तार होता रहे। अपने 100 वर्ष की यात्रा में संघ ने समाज का विश्वास जीता है। यही कारण है कि जब मीडिया में आरएसएस को लेकर भ्रामक जानकारी आती है, तब सामान्य व्यक्ति चकित हो उठता है, क्योंकि उसके जीवन में आरएसएस सकारात्मक रूप में उपस्थित रहता है, जबकि आरएसएस विरोधी ताकतों द्वारा मीडिया में उसकी नकारात्मक छवि प्रस्तुत की जाती है। संघ ने लंबे समय तक इस प्रकार के दुष्प्रचार का खण्डन नहीं किया। अब भी बहुत आवश्यकता होने पर ही संघ अपना पक्ष रखता है। दरअसल, इसके पीछे संघ का विचार रहा है कि- ‘कथनी नहीं, व्यवहार से स्वयं को समाज के समक्ष प्रस्तुत करो’। 1925 के विजयदशमी पर्व से अब तक संघ के स्वयंसेवकों ने यही किया। परिणामस्वरूप, सुनियोजित विरोध, कुप्रचार और षड्यंत्रों के बाद भी संघ अपने ध्येय पथ पर बढ़ता रहा। इसी संदर्भ में यह भी देखना होगा कि जब भी संघ को जानने या समझने का प्रश्न आता है, तब वरिष्ठ प्रचारक यही कहते हैं- ‘संघ को समझना है तो शाखा में आना होगा’। अर्थात् शाखा आए बिना संघ को नहीं समझा जा सकता। यह सत्य है कि किसी पुस्तक को पढ़ कर संघ की वास्तविक प्रतिमा से परिचित नहीं हुआ जा सकता। किंतु, संघ को नजदीक से देखने वाले लेखक जब कुछ लिखते हैं, तब उनकी पुस्तकें संघ के संबंध में प्राथमिक और सैद्धांतिक परिचय करा ही देती हैं। इस क्रम में सुप्रसिद्ध लेखक रतन शारदा की पुस्तक ‘आरएसएस 360’ हमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के और नजदीक ले जाती है। यह पुस्तक संघ पर उपलब्ध अन्य पुस्तकों से भिन्न है। दरअसल, पुस्तक में संघ के किसी एक पक्ष को रेखांकित नहीं किया गया है और न ही एक प्रकार के दृष्टिकोण से संघ को देखा गया है। पुस्तक में संघ के विराट स्वरूप को दिखाने का प्रयास लेखक ने किया है।

            लेखक रतन शारदा ने संघ की अविरल यात्रा का निकट से अनुभव किया है। उन्होंने संघ में लगभग 50 वर्ष विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया है। इसलिए उनकी पुस्तक में संघ की यात्रा के लगभग सभी पड़ाव शामिल हो पाए हैं। चूँकि संघ का स्वरूप इतना विराट है कि उसको एक पुस्तक में प्रस्तुत कर देना संभव नहीं है। इसके बाद भी यह कठिन कार्य करने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक भ्रम के उन जालों को भी हटाने का महत्वपूर्ण कार्य करती है, जो हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल्स की संतानों ने फैलाए हैं। आज बहुत से लोग संघ के संबंध में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसे जिज्ञासु लोगों के लिए यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। स्वयं लेखक ने लिखा है कि “इस पुस्तक का जन्म मेरी उस इच्छा से हुआ था कि जो लोग संघ से नहीं जुड़े हैं या जिनको जानकारी नहीं है, उन्हें आरएसएस के बारे में बताना चाहिए”। पुस्तक पढ़ने के बाद संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध वर्ग की प्रतिक्रियाएं भी इस बात की पुष्टी करती हैं कि पुस्तक अपने उद्देश्य की पूर्ति करती है। सुप्रसिद्ध लेखिका मधु पूर्णिमा किश्वर ने पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है। उन्होंने भी उन ताकतों की ओर इशारा किया है, जो संघ के विरुद्ध तो दुष्प्रचार करती ही हैं, संघ की प्रशंसा करने वाले लोगों के प्रति भी घोर असहिष्णुता प्रकट करती हैं।

            पुस्तक की सामग्री को तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है। भाग-1 को ‘आत्मा’ शीर्षक दिया गया है, जो सर्वथा उपयुक्त है। लेखक ने इस भाग में संघ के संविधान का सारांश प्रस्तुत किया है और संघ की आवश्यकता को रेखांकित किया है। इसी अध्याय में उस पृष्ठभूमि का उल्लेख आता है, जिसमें डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना की और संघ की स्थापना के उद्देश्य को स्पष्ट किया। संघ का उद्देश्य क्या है? अकसर इस बात को लेकर कुछेक लोगों द्वारा खूब अपप्रचार किया जाता है। संघ का उद्देश्य उसकी प्रार्थना में प्रकट होता है, जिसे संघ स्थान पर प्रतिदिन स्वयंसेवक उच्चारित करते हैं। उस प्रार्थना के भाव को भी इस अध्याय में समझाने का प्रयत्न किया गया है। भाग-2 ‘स्वरूप’ शीर्षक से है, जिसमें संघ के विराट स्वरूप को सरलता से प्रस्तुत किया गया है। शाखा का महत्व, आरएसएस की संगठनात्मक संरचना और प्रचारक पद्धति पर लेखक ने विस्तार से लिखा है। यह अध्याय हमें संघ की बुनियादी संरचना और जानकारी देता है। ‘अभिव्यक्ति’ शीर्षक से भाग-3 में आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों की जानकारी है, जिससे हमें पता चलता है कि वर्तमान परिदृश्य में संघ के स्वयंसेवक कितने क्षेत्रों में निष्ठा, समर्पण और प्रामाणिकता से कार्य कर रहे हैं। ‘राष्ट्र, समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ में लेखक रतन शारदा ने संघ के उन कार्यों का उल्लेख किया है, जिनको अपना कर्तव्य मान कर संकोचवश संघ बार-बार बताता नहीं है। 1947 में विभाजन की त्रासदी में लोगों का जीवन बचाने का उपक्रम हो, या फिर 1948 और 1962 के युद्ध में सुरक्षा बलों का सहयोग, संघ के स्वयंसेवक सदैव तत्पर रहे। देश में आई बड़ी आपदाओं में भी संघ ने आगे बढ़ कर राहत कार्य किए हैं। कोरोना महामारी का यह दौर हमारे सामने है ही, जब सबने देखा कि कैसे संघ ने बड़े पैमाने पर सेवा और राहत कार्यों का संचालन किया। बहरहाल, सामाजिक समरसता और सेवा के क्षेत्र में किए गए कार्यों का प्रामाणिक विवरण ‘आरएसएस 360’ में हमें मिलता है। इसके अतिरिक्त ‘आपातकाल में लोकतंत्र के लिए संघ की लड़ाई’ और ‘संघ कार्य में मील के पत्थर’ जैसे महत्वपूर्ण विवरण के साथ पुस्तक का आरंभ होता है और अंत में पाँच अत्यंत महत्वपूर्ण परिशिष्ट शामिल किए गए हैं। इनमें संघ के अब तक के सरसंघचालकों की संक्षिप्त जानकारी, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ की भूमिका, 1948 में संघ पर प्रतिबंध की पृष्ठभूमि, प्रतिबंध के विरुद्ध सत्याग्रह के साथ ही संघ, पटेल और नेहरू के पत्राचार को शामिल किया गया है।

            निस्संदेह लेखक रतन शारदा की पुस्तक ‘आरएसएस 360’ पाठकों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में न केवल आधारभूत जानकारी देती है बल्कि उसके दर्शन, उसकी कार्यपद्धति और उसके उद्देश्य का समीप से परिचय कराती है। आरएसएस के संघर्षपूर्ण इतिहास के पृष्ठ भी हमारे सामने खोलती है। समाज, देश और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में संघ के कार्यों का विवरण भी देती है। पूर्व में यह पुस्तक अंग्रेजी में ‘सीक्रेट्स ऑफ आरएसएस डिमिस्टिफायिंग-संघ’ शीर्षक से आई थी, जिसे बहुत स्वागत हुआ। हिन्दी जगत में ऐसी पुस्तक की आवश्यकता थी, इसलिए यहाँ भी यह भरपूर सराही जाएगी। पुस्तक का प्रकाशन ब्लूम्सबरी भारत ने किया है। पुस्तक में लगभग 350 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य 599 रुपये है।

दीदी के अंगने में भाजपा का क्या काम है

नवेन्दु उन्मेष

कोलकाता की सड़कों पर भाजपा के लोग अकसर एक फिल्मी गीत गाते हुए मिलते
हैं-एक बंगला बने न्यारा, रहे कुनबा जिसमें सारा, सोने का बंगला, चंदन का
जंगला, अति सुंदर प्यारा-प्यारा। वहीं दीदी के कार्यकर्ता गाते हैं कि
मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है। अब मुसीबत यह है कि एक दल के लोग
वहां एक बंगला बनाना चाहते हैं तो दूसरी ओर दीदी के कार्यकर्ताओं का कहना
है कि मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है। इस कारण वे अगर एक दूसरे के
काफिले पर आक्रमण करते हैं तो इसकी वजह समझ में आती है। हालांकि भारतीय
संविधान ने सभी को यह अधिकार दे रखा है कि वह जहां चाहे वहां बंगला बना
सकता है। वोट के आधार पर चुनावी जमीन खरीद सकता है लेकिन दीदी के
कार्यकर्ता इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं। यहां तक कि दीदी भी अपनी
चुनावी जमीन बचाकर रखना चाहती हैं। वह नहीं चाहतीं कि कोई उनकी चुनावी
जमीन का अतिक्रमण करे। आखिर उन्होंने बड़ी मेहनत से लाल-लाल बंगाल में
अपना झंडा गाड़ा था। तब उन्हें भी लाल झंडे वालों से जूझना पड़ा था। लाल
झंडे को उखाड़ने के लिए उनके कई कार्यकर्ता भी शहीद हुए थे। अब जब लाल
झंडा उखड़ गया तो भाजपा वहां अपना एक बंगला बनाना चाहती है। यह दीदी कैसे
बर्दाश्त कर सकती हैं।
वैसे भी बंगाल में देवियों की पूजा की परंपरा है। ऐसे में दीदी ने अपना
परचम लहरा रखा है तो वह दूसरे दल के परचम को कैसे लहराने दे सकती हैं। इस
लिए आये दिन उनके कार्यकर्ता बंगला बनाने का सपना देख रहे भाजपा के लोगों
पर आक्रमण करते रहते है। यहां मुख्य लड़ाई बंगला बनाने को लेकर है।
अब आने वाला विधान सभा चुनाव ही यह बतलायेगा कि वहां भाजपा का सुंदर और
न्यारा बंगला बनाता है या दीदी का परचम लहराता है। वैसे अभी तक जो हाल है
उसमें दीदी किसी भाजपा नेता को बंगाल में घुसने नहीं देना चाहती हैं। वह
जानती है कि अगर भाजपा नेता बंगाल जाने वाली ट्रेन के डिब्बे में पैर
रखने की जगह पा लेंगे तो आगे चलकर पूरी सीट पर अपना बिस्तर लगा लेंगे और
कोलकाता आकर बंगला भी बना लेंगे। इसलिए उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को
निर्देश दे रखा है कि गाओ मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है। अंगना
मेरा है तो इसे बुहारने का काम भी मेरा है। इसे सजाने और संवारने का काम
भी मेरा है।
दीदी यह भी जानती है कि भाजपा के लोग किसी भी राज्य में अपना बंगला बनाने
के माहिर खिलाड़ी हैं। बहुमत न भी मिले तो भी वे जोड़-तोड़कर अपना बंगला बना
ही लेते हैं और अपना पहरेदार भी बहाल कर लेते हैं। इसलिए उन्होंने यह
नुस्खा अजमा रखा है कि इन्हें बंगाल आने ही नहीं देना है। अगर ये बंगाल
आयेंगे ही नहीं, तो चुनावी जमीन पर कब्जा करके बंगला भी नहीं बना
पायेंगे। लेकिन भाजपा के लोग भी है जो मानने को तैयार नहीं हैं। वे
कोलकाता की सड़कों पर गाते हुए मिलते हैं कि दिल तोड़ के हंसती हो मेरा
वफायें मेरी याद करोगी। मेंहदी प्यार वाली हाथों पे रचाओगी, घर मेरे बाद
गैर का बसाओगी। वे नहीं चाहते कि विधान सभा चुनाव के दौरान वोटर रूपी
प्रेमिका उनसे रूठ जाये और प्यार वाले हाथों में मेंहदी लगाकर घर दूसरे
का बसाये। इसलिए वे वोटर रूपी प्रेमिका को लुभाने का काई कोरकसर बाकी
नहीं रखना चाहतें। दीदी है कि मानती ही नहीं। उन्हें लगता है कि भाजपा के
लोगों का बंगाल में बंगला बनाने का सपना टूट जाये तो टूट जाये, लेकिन
मेरा दिल बंगाल की जनता के साथ हमेशा जुड़े रहना चाहिए। अब देखना यह है कि
बंगाल के लोग जो मेरा नाम जोकर फिल्म की तर्ज पर एक बड़ा दिल लिए बैठे हैं
वे आने वाले विधान सभा चुनाव में उसे किसे देते हैं। यह दिल दीदी के
कब्जे में होगा या भाजपा के।

भारत किसी का पिछलग्गू नहीं

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
रुस के विदेश मंत्री सर्गेइ लावरोव ने बर्र के छत्ते को छेड़ दिया है। उन्होंने रुस की अंतरराष्ट्रीय राजनीति परिषद को संबोधित करते हुए ऐसा कुछ कह दिया, जो रुस के किसी नेता या राजनयिक या विद्वान ने अब तक नहीं कहा था। उन्होंने कहा कि अमेरिका चीन और रुस को अपने मातहत करना चाहता है। वह सारे संसार पर अपनी दादागीरी जमाना चाहता है। विश्व-राजनीति को वह एकध्रुवीय बनाना चाहता है। इसीलिए वह भारत की पीठ ठोक रहा है और उसने भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिका का चौगुटा खड़ा कर दिया है। उसने प्रशांत महासागर क्षेत्र को ‘भारत-प्रशांत’ का नाम देकर कोशिश की है कि भारत-चीन मुठभेड़ होती रहे। उसकी कोशिश है कि रुस के साथ भारत के जो परंपरागत मैत्री-संबंध हैं, वे भी शिथिल हो जाएं। हो सकता है कि ट्रंप-प्रशासन की इसी नीति को आगे बढ़ाते हुए बाइडेन-प्रशासन रुस के एस-400 मिसाइल प्रक्षेपास्त्रों की भारतीय खरीद का भी विरोध करे। ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में जाते-जाते भारत के साथ ‘बेका’ नामक सामरिक समझौता भी कर डाला है, जिसके अंतर्गत दोनों देश गुप्तचर सूचनाओं का भी आदान-प्रदान करेंगे। रुसी विदेश मंत्री के उक्त संदेह निराधार नहीं हैं। उनको इस तथ्य ने भी मजबूती प्रदान की है कि इस्राइल, सउदी अरब और यूएई, जो कि अमेरिका के पक्के समर्थक हैं, आजकल भारत उनके भी काफी करीब होता जा रहा है। भारत के सेनापति आजकल खाड़ी देशों की यात्रा पर गए हुए हैं। लेकिन रुसी विदेश मंत्री क्या यह भूल गए कि रुस से अपने संबंधों को महत्व देने में भारत ने कभी कोताही नहीं की। पिछले दिनों भारत के रक्षामंत्री और विदेश मंत्री मास्को गए थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पूतिन के बीच सीधा संवाद जारी है। यह ठीक है कि इस वक्त भारत और चीन के बीच तनाव कायम है। उसका फायदा कुछ हद तक अमेरिका जरुर उठा रहा है लेकिन भारत का चरित्र ही ऐसा है कि वह किसी का पिछलग्गू नहीं बन सकता है। 

ईश्वर की उपासना से उपासक को ज्ञान व ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं

-मनमोहन कुमार आर्य

                मनुष्य जब किसी कार्य को उचित रीति से ज्ञानपूर्वक करता है तो उसका इष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है। उपासना भी ईश्वर को उसके यथार्थ स्वरूप में जानकर उचित विधि से करने पर ही सार्थक लाभकारी सिद्ध होती है। उपासना के लिये ही प्राचीन काल में ऋषि पतंजलि ने योगदर्शन ग्रन्थ का निर्माण किया था। महाभारत युद्ध के बाद केवल वेदों का ही अभ्यास होने के कारण यह ग्रन्थ विलुप्त हुए अपितु वेदानुकूल सभी वेदांग एवं उपांग जिनमें दर्शन एवं उपनिषद सहित मनुस्मृति ग्रन्थ भी सम्मिलित हैं, यह सभी ग्रन्थ इनके सत्य आशय भी देश की जनता की आंखों से ओझल हो गये थे। इस काल में वेदों का ज्ञान कुछ गिने चुने विद्वानों तक ही सीमित हो गया था। ऐसी स्थिति में सन् 1863 व उसके कुछ समय बाद ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने देश की जनता का ध्यान वेदों और उसके सत्य सिद्धान्तों की ओर दिलाया और इतिहास में पहली बार लोकभाषा हिन्दी में वेदों की सभी मान्यताओं का न केवल मौखिक प्रचार ही किया अपितु वेदों के सत्य वेदार्थ को सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित वेदों पर संस्कृत व हिन्दी भाष्य के माध्यम से जन सामान्य के सम्मुख प्रस्तुत किया। वेदों के गूढ़ अर्थ जो अधिकांश विद्वान भी नही जानते थे और अपनी मिथ्या कल्पनाओं में ही जीवन व्यतीत कर देते थे, न केवल उनका, अपितु साधारण मनुष्य को भी वेद के गूढ़ अर्थों का यथार्थ ज्ञान भी ऋषि दयानन्द के प्रचार तथा ग्रन्थों के अध्ययन से हुआ। ऋषि दयानन्द ने अपने सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में ईश्वर, जीवात्मा तथा सृष्टि के ज्ञान सहित मनुष्य के कर्तव्यों का भी ज्ञान कराया है। ऐसा ज्ञान ऋषि दयानन्द से पूर्व किन्हीं पुस्तकों व मताचार्यों के उपदेशों से भी प्राप्त नहीं होता था। ऋषि दयानन्द के प्रयासों से साधारण मनुष्य भी ईश्वर सहित जीवात्मा व प्रकृति के यथार्थ स्वरूप से परिचित हुए तथा उन्हें धर्म के सत्यस्वरूप का, जो वस्तुतः वेदाचरण व सत्याचरण ही है, बोध हुआ। ऋषि दयानन्द के वेदप्रचार से मत-मतान्तरों की अधिकांश शिक्षायें अविद्यायुक्त होने से निरर्थक हो गईं परन्तु अनेक कारणों से लोगों ने अविद्या को छोड़ा नहीं है। ऋषि दयानन्द विद्या व वेद का प्रचार कर एक महापुरुष व एक सच्चे ऋषि का कर्तव्य पूरा कर गये हैं। हमारा कर्तव्य हैं कि हम उनकी भावनाओं व कार्यों को जानकर उसका सदुपयोग करते हुए अपने जीवन की उन्नति करें तथा वैदिक ज्ञान से प्राप्त होने वाली सांसारिक तथा पारलौकिक उन्नति दोनों को ही प्राप्त करें।

                मनुष्यचेतन जीवात्माओं का मनुष्य योनि में जन्म होने तथा उसके मृत्यु परिवर्तन जीवन को कहते हैं। मनुष्य की चेतन आत्मा अल्पज्ञ, एकदेशी, ससीम होने सहित अनादि नित्य सत्ता है। यह अविनाशी अमर है। शस्त्र इसे काट नहीं सकते, वायु इसे सूखा नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं कर सकते तथा अग्नि इसे जला कर नष्ट नहीं कर सकती। यह आत्मा सभी आत्मायें परमात्मा की कृपा से अपने पूर्वजन्मों के कर्मों का भोग करने के लिए जन्म लेती हैं। आत्मा को जन्म मिलने का भी एक मुख्य प्रयोजन होता है। यह प्रयोजन आत्मा में ज्ञान की उन्नति करने सहित सत्कर्मों को प्राप्त होकर जन्म मरण के बन्धनों से मुक्त होकर पूर्णानन्द से युक्त सर्वव्यापक सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा को प्राप्त होना होता है। मुक्ति में भी आत्मा का नाश व अभाव नहीं होता है। आत्मा मुक्ति वा मोक्ष में परमात्मा के सान्निध्य में रहकर एवं ईश्वर प्रदत्त अनेक शक्तियों से युक्त होकर सुख व आनन्द का भोग करती है। यह परमपद मोक्ष ही परम ऐश्वर्य होता है। यह ज्ञान व विद्या सहित वेदविहित सत्मकर्मों को करने से प्राप्त होता है। इसकी उपलब्धि जीवात्मा को मनुष्य योनि में जन्म लेने पर ईश्वर के यथार्थस्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर व उसकी अहर्निश उचित विधि से उपासना करने सहित वेदों में परमात्मा की आज्ञा के अनुकूल कर्म करने से प्राप्त होती है। स्वाध्याय भी उपासना का एक भाग होता है। स्वाध्याय से मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होती है। स्वाध्याय वेद एवं वेदानुकूल ग्रन्थों का ही करना चाहिये और शास्त्रों व किसी भी ग्रन्थ की उसी बात को मानना चाहिये जो ज्ञान व तर्क से सत्य होती हों। मनुष्य को असत्य का त्याग तथा सत्य का ग्रहण करना चाहिये। तभी वह मनुष्य होने की अर्हता को पूरी करता है। ऐसा मनुष्य ही उपासना करते हुए ईश्वर से सद्ज्ञान व सद्प्रेरणायें प्राप्त करता है। उसका अज्ञान व अज्ञान से प्राप्त होने वाले सभी क्लेश व दुःख दूर हो जाते हैं। अतः सभी मनुष्यों को स्वाध्याय व सत्पुरुषों की संगति कर उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये और ईश्वर की उपासना तथा परोपकारमय सत्कर्मों को करके मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने चाहियें।

                ईश्वर की उपासना सही विधि से हो इसके लिये ऋषि दयानन्द ने पंचमहायज्ञ विधि पुस्तक की रचना की है। इसमें प्रथम स्थान पर सन्ध्या जिसे ब्रह्मयज्ञ भी कहा जाता है, उसकी विधि को प्रस्तुत किया गया है। इस विधि पर अनेक विद्वानों की विद्वतापूर्ण टीकीयें भी उपलब्ध हैं। पं. विश्वनाथ वेदोपाध्याय, पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय, पं. चमूपति जी तथा स्वामी आत्मानन्द जी आदि की सन्ध्या की व्याख्याओं से लाभ उठाया जा सकता है। इनका अध्ययन करने पर हम ईश्वर की सही विधि से उपासना जिसमें ईश्वर की स्तुति प्रार्थना भी सम्मिलित होती है, कर सकते हैं। उपासना में मनुष्य को यम व नियमों का पूर्णरूपेण पालन करना होता है। यम पांच होते हैं जिनके नाम हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह। नियम भी पांच हैं जिनके नाम हैं शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान। अष्टांग योग की विधि से उपासना करने से शीघ्र सफलता मिलती है। इस विधि से उपासना करने से ईश्वर के साथ संगति होने से ईश्वर के गुणों का उपासक की आत्मा में आधान व प्रवेश होता है। इससे उपासक की आत्मा के दुर्गुण व दुव्र्यसन छूट जाते हैं। उपासक के गुण, कर्म व स्वभाव में सुधार होता जाता है और वह समय बीतने के साथ यथासम्भव ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव के अनुरूप बन जाते हैं। इस प्रकार से मनुष्य उपासना को करके अपनी आत्मा की उन्नति को प्राप्त होता है। इस विधि से उपासना करते हुए उपासक को सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी ईश्वर का साक्षात्कार भी होता है। ऋषि दयानन्द ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए सिद्ध योगी थे। जो भी मनुष्य इस विधि से उपासना करेगा वह ईश्वर के निकट से निकटतर होता जायेगा और अन्ततः ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है। आर्यसमाज ही ऐसा संगठन है जिसके देश देशान्तर के सभी अनुयायी इस वैदिक विधि से ही ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करते हैं। अन्य सब लोगों को भी अपने लाभ व उन्नति के लिये वैदिक विधि से ही उपासना करनी चाहिये और इसके विपरीत व विरुद्ध उपासना विधियों का त्याग कर देना चाहिये।

                ईश्वर सर्वज्ञ होने सहित सब ऐश्वर्यों का स्वामी भी है। सभी ऐश्वर्य सृष्टिकर्ता ईश्वर ने बनाकर ही मनुष्यों को प्रदान किये हैं। सबको ईश्वर की व्यवस्था से अपने अपने कर्म व पुरुषार्थ के अनुसार सुख व ऐश्वर्य प्राप्त होता है। अतः उपासना करने पर उपासक को भी ईश्वर उसकी योग्यता के अनुसार आवश्यक मात्रा में सभी ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। सच्चे व ईश्वर में दृण विश्वास रखने वाले उपासकों को कभी किसी आवश्यक पदार्थ का अभाव व न्यूनता नहीं होती। ईश्वर एक साधारण चींटी तक के भोजन की व्यवस्था करता है। क्या वह अपने किसी पुरुषार्थी उपासक को उसके लिए आवश्यक पदार्थों से दूर रख सकता है? कदापि नहीं। हमने अनेक आर्य महापुरुषों के जीवन चरित पढ़े हैं। परमात्मा की कृपा से सभी जीवन में सन्तुष्ट सम्पन्न रहे। सबकी सब आवश्यकतायें परमात्मा ने पूरी की। अतः मनुष्य को धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, शारीरिक सुख, बल आदि की प्राप्ति के लिये भी परमात्मा से ही प्रार्थना करनी चाहिये। परमात्मा उन्हें अवश्य पूरी करते हैं।

                वैदिक उपासना की यही विशेषता है कि इससे मनुष्य की ज्ञान, सुख, ऐश्वर्य तथा यश प्राप्ति आदि सभी प्रकार की आवश्यकतायें पूर्ण होती हैं। सत्यार्थप्रकाश, वेदों का भाष्य तथा ऋषि दयानन्द का जीवन चरित्र पढ़ने से इसका पूरा विश्वास होता है। इस लेख को हम यही विराम देते हैं। ओ३म् शम्।