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पिता बिन कहे सब कहे, मां कभी चुप ना रहे

—विनय कुमार विनायक
पिता जो बिन कहे सबकुछ कहे
उसे पिता कहते हैं!

माता जो कभी चुप ना रहे कहे
मुंह गोहे मां कहते हैं!

पिता जो रोए बिना आवाज के
मुस्कुराए मन ही मन
उसे पिता कहते हैं!

माता कभी रोती नहीं सामने
सिर्फ उदास हो लेती
उसे मां कहते हैं!

पिता सोए बच्चों को निहार के
आश्वस्त हो लेते हैं!
मां बार-बार निहारती बच्चों को
बलैयां लेती कुछ ना हो!

पिता हमेशा ख्वाब देखते भोली सी
एक पुत्रवधू को लाने का!
माता ख्वाब संजोए होती बेटी का
एक बेटे सा गुड्डा पाने का!

पिता ने जैसे देखा अपने पिता को
वैसे ही देखते हैं पुत्र को भी!
माता को जैसा गुड्डा मिला
वैसा ही तलाशती बेटी के लिए भी!

पिता को वैसी चाहिए वधू
जिसमें दिखे अपनी मां जैसी ममता,
तब कही बेटे के लिए आश्वस्त होता!
मां को चाहिए चांद सी वधू
मां को बचपन से बुढ़ापे तक पसंद है
चांद-चांदनी सा गुड्डा-गुड़िया!

पिता की हमेशा से ही चाहत रही
अपनी मां सी प्यारी एक पुत्रवधू हो
और अपने पिता सा जमाई!
जिसमें आश्वस्ति-विश्वसनीयता हो
खुशहाल जिन्दगी जीने की!

पिता सदा माता-पिता के साथ रहते,
माता-पिता के बाद अगली पीढ़ी में
आजीवन तलाशते अपने माता-पिता!

कोई पिता छोड़ता नहीं मां पिता का घर,
जबकि मां अपने मां-पिता को त्याग कर
बसा लेती नया घर मगर भूलती नहीं
गुड्डा-गुड़िया का खेल,चांद चाहिए की मांग
बनी रहती लाड़ली अपने मां पिता की!

मेरे पिता मुझे बाबू,बाबू कहके चले गए
और मां गुड़िया,पुतली बुदबुदाके के गई!
मैं बाबू का बाबू हूं,मेरी बहन मां की गुड़िया,
देशी रिवाज है पिता व पुत्र को बाबू कहना!

जबकि बेटी गुड़िया, पुतली,परी ही होती
मां मासूम होती गुड़ियों सी,गुड्डा-गुड्डी खेली
गुड्डा-गुड़िया जनती,उससे घुल-मिल जाती
और उसकी याद में ही आंखें मूंद लेती!

पिता को चाहिए अपने माता-पिता जैसा
बहू-बेटा,बेटी-जमाता अन्यथा रहते गुमसुम सा!
—विनय कुमार विनायक

अंततः वैश्विक अर्थव्यवस्था को संवारता दिख रहा है पेरिस समझौता


कोविड महामारी के बीच पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, और अर्थव्यवस्था पर इन सबके असर के हवाले से एक बढ़िया ख़बर आ रही है। और खबर ये है कि पेरिस समझौते का असर शामिल देशों की कथनी और करनी में दिख रहा है।
इस बात की तस्दीक करती है ग्लोबल कंसल्टेंसी सिस्टमआईक्यू (SYSTEMIQ) की  द पेरिस इफ़ेक्ट नामक रिपोर्ट जो यह बताती है कि जलवायु समझौता (Paris Agreement), वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुनर्परिभाषित कर रहा है।
और जो सबसे उत्साहवर्धक बात निकल कर इससे आयी है वो है कि 2015 के पेरिस समझौते के बाद से कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले समाधानों के निवेश और अपनाने में तेजी आयी है। एक नए आंकलन से साफ़ ज़ाहिर होता है कि 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन के 70% के लिए ज़िम्मेदार क्षेत्रों में 2020 से, कम कार्बन उत्सर्जन के समाधान अपनाने मं  प्रतिस्पर्धा के चलते बहुत तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। यह बदलाव एक शून्य-कार्बन अर्थव्यवस्था लाने में मदद कर सकते हैं जो आगे आने वाले समय में 350 लाख (35 मिलियन) नौकरियां पैदा करेगी।
यूरोपीय संघ यू.के और अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बिडेन (जो संयुक्त रूप से 30% वैश्विक आयात करते हैं), आपस में कार्बन बॉर्डर टैक्स लगाने  पर विचार कर रहे हैं।
ऐसा अनुमान है कि 2030 के दशक तक -शून्य कार्बन अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण से रिन्यूएबिल एनर्जी, ऊर्जा-दक्ष( energy efficient) इमारतों, स्थानीय खाद्य व्यवस्थाओं (यानि अपने आस पास मौजूद  खाना ही इस्तेमाल करके)  और ज़मीन को पुनर्बहाल करने जैसे क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर 35 मिलियन से ज्यादा नई प्रत्यक्ष नौकरियां सृजित होने जा रही हैं।COVID-के बाद के स्वास्थ्य लाभ के लिए यह पहले से कहीं अधिक ज़रूरी हैं। वहीं दूसरी तरफ शून्य-कार्बन समाधान अब, अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए, डिज़िटलाइजेशन के साथ संयोजित होंगे।
दस से ज्यादा कार निर्माताओं (Volvo, Renault और Fiat सहित) ने 2020 और 2025 के बीच की अवधि के लिए EV बिक्री लक्ष्यों के लिए प्रतिबद्धता जताई है। VW समूह अकेले 2024 तक $66 बिलियन निवेश करने की योजना बना रहा है।शिपिंग की दुनिया के सबसे बड़े नाम  Maersk और CMA CGM 2050 तक नेट जीरो के लिए प्रतिबद्ध हैं। वैश्विक सीमेंट उत्पादन क्षमता के एक-तिहाई का प्रतिनिधित्व करने वाली 40 कंपनियां वैश्विक सीमेंट और कंक्रीट संघ के माध्यम से 2050 तक कार्बन न्यूट्रल होने के लिए प्रतिबद्ध हैं। Dalmia Cement and Heidelberg Cement ने क्रमशः 2040 और 2050 तक कार्बन न्यूट्रल के लिए अलग से प्रतिबद्धता दर्ज की है।
इस सन्दर्भ में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पेरिस समझौते के वास्तुकार और यूरोपियन क्लाइमेट फाउंडेशन के सीईओ, लॉरेंस टुबियाना, कहते हैं, “अब यह तो साफ़ है पेरिस समझौते के लक्ष्य दुनिया की तमाम सरकारों और वित्तीय संस्थाओं के लिए एक संदर्भ बिंदु हैं। विश्व के नेताओं ने साल 2015 में जिस यात्रा की शुरूआत की, उसे अब गति देने का समय आ गया है। यह साफ़ है कि वैश्विक तापमान और उत्सर्जन बढ़ रहा है, लेकिन इस आकलन से हमें यह उम्मीद मिलती है कि साथ साथ पेरिस समझौता भी अपना काम कर रहा है
पेरिस समझौते के बाद से तय की गई गतिशीलता ने पिछले पाँच वर्षों में निम्न-कार्बन समाधानों और बाज़ारों के लिए नाटकीय रूप से प्रगति करने के लिए परिस्थितियां पैदा की हैं। इस समझौते ने – इस अंतर्निहित ‘शफ़्ट’ ने – 195 देशों के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को लगातार कम करने के लिए एक साफ़ रास्ता तैयार कर दिया। इलेक्ट्रिक वाहनों से वैकल्पिक प्रोटीन्स से लेकर स्थायी उड्डयन ईंधन तक सब के लिए अनुकूल परिस्थितियों तैयार हो गयी नजर आ रही  है।
50% से ज्यादा सकल घरेलू उत्पाद के लिए ज़िम्मेदार देश, शहर, क्षेत्र और कंपनियों ने शुद्ध शून्य लक्ष्य स्थापित किए हैं । यूरोपीय संघ, यू.के. और अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बिडेन (जो संयुक्त रूप से 30% से ज्यादा वैश्विक आयात करते हैं) द्वारा कार्बन सीमा कर समायोजनों की वास्तविक संभावना पहले से ही इस्पात और एल्यूमीनियम जैसी वस्तुओं के लिए बाज़ार में व्यवहार में एक तरह का व्यावधान उत्पन्न कर रही हैं। अबखाद्य कंपनियों पर यह साबित करने की ज़िम्मेदारी कि उनकी आपूर्ति शृंखलाएं वनों की कटाई से मुक्त हैं, आवश्यकताओं की विश्वसनीय संभावना व्यवहार को बदल रही है।  
इसी क्रम में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र और गवर्नेंस के प्रोफेसर और वहीँ पर, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण पर अनुदान अनुसंधान संस्थान के अध्यक्ष, निकोलस स्टर्न, अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं, “हम जानते हैं कि अपर्याप्त कार्रवाई आगे चल कर बड़े और महंगे जलवायु जोखिम में तब्दील हो जाती है। इसलिए बुद्धिमान नीति निर्माता और निवेशक ऐसा कुछ करने से बचेंगे और ऐसे लक्ष्य बनायेंगे जिनसे नौकरियों का सृजन हो और व्यवस्था में लचीलापन। और ये सब सिर्फ़ एक शुद्ध-शून्य अर्थव्यवस्था के माध्यम से ही किया जा सकता हैं।”
यह दर्शाता है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और वैश्विक तापमान में वृद्धि जारी है, अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में कम कार्बन प्रगति अब तेज हो रही है। सौर और पवन की तेजी से गिरती लागत पहले से ही कई बाजारों में जीवाश्म ईंधन की तुलना में बेहतर दांव लगाती है, जबकि इलेक्ट्रिक वाहन विकास की गति ने अनुमानों को दोहराया है। 2030 तक, 70% उत्सर्जन में योगदान करने वाले क्षेत्रों के लिए, हमारे पास भारी सड़क परिवहन, भारी उद्योग और कृषि सहित प्रतिस्पर्धी कम या लो  कार्बन समाधान होंगे।
अब 2020 के दशक में जीरो-कार्बन उद्योगों की प्रगति, समृद्ध विकास करने, लाखों नौकरियों और अधिक लचीली अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण करने के लिए पीढ़ी में एक बार आने वाला अवसर है। पेरिस इफेक्ट के चलते भारी उद्योग क्षेत्रों में पर्यावरण अनुकूल समाधानों को प्राथमिकता मिलेगी जिससे शिपिंग और विमानन जैसे क्षेत्र अपने ग़ैर-हरित समकक्षों की तुलना में तेजी से प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे। चीन के बाहर कोयले में नये निवेशों में तेज़ी से गिरावट दर्ज जो रही है और नई डीजल और पेट्रोल चालित कारों को 2030 के दशक तक कुछ ख़ास बाजारों में ही वापस लाये जाने की संभावना है। और इस सब के बीच जिस तरह से तेल की बड़ी कंपनियों के वैल्यूएशन में गिरावट दिख रही है, उससे पीक ऑयल डिमांड एक हक़ीक़त लग रही है।
एक नज़र भारत पर

भारतीय रेलवे ने वर्ष 2030 तक प्रदूषणमुक्त संचालन वाली दुनिया की पहली रेलवे बनने का लक्ष्य तय किया है। भारत कूलिंग एक्शन प्लान घोषित करने वाले दुनिया के पहले देशों में शामिल है। भारत अक्षय ऊर्जा के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों और ऊर्जा दक्षता के मामले में भी अग्रणी है। ये सभी चीजें पैरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने के लिहाज से भारत की सकारात्मक
तस्वीर पेश करती हैं।

भारत ने राउंड द क्‍लॉक रिन्‍यूएबल्‍स की 38 डॉलर प्रति मेगावाट के हिसाब से नीलामी की और ताजा सोलर बिड 27 डॉलर प्रति मेगावाट रही है। एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में बहुत उछाल आने वाला है और जब इलेक्ट्रिक वाहनों की कीमतें परंपरागत ईंधन से चलने वाले वाहनों के मूल्यों के बराबर हो जाएंगी, तब इलेक्ट्रिक वाहनों के बाजार में जबरदस्त उछाल आएगा।

पेरिस समझौते की सालगिरह से पहले उसी संदर्भ में हुई एक  वेबिनार में टेरी की प्रोग्राम डायरेक्टर रजनी आर. रश्मि ने कहा, “जहां तक अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का सवाल है तो मेरे हिसाब से भारत सही रास्ते पर है। भारत अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहा है। वह एमिशंस इंटेंसिटी के मामले में 24% की गिरावट दर्ज कर चुका है।”

उसी वेबिनार में डब्‍ल्‍यूआरआई इंडिया की जलवायु कार्यक्रम की निदेशक उल्‍का केलकर कहती हैं “पहले माल ढुलाई का काम रेलवे से ज्यादा होता था लेकिन अब यह काम डीजल से चलने वाले ट्रकों पर आ गया है। यहां पर प्रदूषण कम करने के लिहाज से जबर्दस्‍त सम्‍भावनाएं हैं। अगर भारत को अपने सतत विकास लक्ष्‍यों को हासिल करना है तो सीमेंट और स्टील जैसे उद्योगों में अक्षय ऊर्जा के इस्‍तेमाल के प्रति दक्षता लानी होगी। कार्बन प्राइसिंग और कार्बन ट्रेडिंग के जरिए इन उद्योगों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।’’

बियोंड द चाक- रणजीत सर

फर्स्ट बेस्ट इंडियन टीचर ऑफ़ द वर्ल्ड- 2020 

  • श्याम सुंदर भाटिया

महाराष्ट्र एक बार फिर सुर्ख़ियों में है, लेकिन इस दफा टेक्नोलॉजी के क्रांतिकारी उपयोग, नवाचार के संकल्प, शिक्षा के प्रति समर्पण और गर्ल्स एजुकेशन के प्रति सेवा भाव का अनूठा समन्वय है। इस सूबे की महक दुनिया शिद्द्त से महसूस कर रही है। सोलापुर के प्राइमरी टीचर रणजीत सिंह महादेव डिसले की टीचिंग ने दुनिया का दिल जीत लिया है। उन्होंने गर्ल्स एजुकेशन को बढ़ावा और क्यूआर कोड वाली पाठय पुस्तकों की क्रांति को गति देने के बूते ग्लोबल टीचर प्राइज- 2020 जीता है। इसके तहत उन्हें 7.38 करोड़ की धनराशि बतौर पुरस्कार मिलेगी। टीचिंग का यह वैश्विक अवार्ड यूनेस्को और ब्रिटेन के वार्की फाउंडेशन की ओर से दिया गया है। इस अवार्ड की दौड़ में 140 देशों के 12 हजार से शुमार थे। इनमें से रणजीत सिंह डिसले समेत 10 फाइनलिस्ट चुने गए। अंततः अदभुत शिक्षक का यह अवार्ड महाराष्ट्र के शिक्षक श्री रणजीत सिंह डिसले की झोली में गया। लंदन में ऑनलाइन समारोह में डिसले के ग्लोबल टीचर प्राइज- 2020 चुने जाने की घोषणा हॉलीवुड मशहूर अभिनेता स्टीफन फ्राई ने की। रणजीत सिंह डिसले पहले भारतीय हैं, जिन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला है। पुरस्कार विजेता डिसले का मानना है, वह दुनिया के सभी छात्रों के लिए काम करना चाहते हैं। डिसले का मानना है, पूरी दुनिया एक कक्षा है। वह खुद हमेशा देने और साझा करने में विश्वास करते हैं।  रणजीत सिंह अब तक 12 अंतर्राष्ट्रीय और 7 राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं। इसके अलावा 12 एजुकेशनल पेटेंट उनके नाम पर हैं। माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला ने रणजीत के काम की तारीफ करते हुए स्पेशल वीडियो हिट रिफ्रेश लॉन्च किया है। वार्के फाउंडेशन 2014 से हर साल ग्लोबल टीचर प्राइज दे रही है।

परितेवाड़ी जिला परिषद स्कूल में 32 बरस के डिसले ने 2009 में टीचिंग शुरु की थी। तब वहां मवेशियों को रखने के लिए शेड बना हुआ था। रणजीत ने प्रशासन और स्थानीय लोगों से गुहार लगवाकर स्कूल को ठीक करवाया। रणजीत ने बताया, मुझे नौकरी मिलने की खुशी थी, लेकिन जब मैं स्कूल पहुंचा तो स्कूल के हाल ने मुझे दुखी कर दिया। यह स्कूल कम और बकरियों को बांधने का बाड़ा ज्यादा लग रहा था। सिर्फ स्कूल ही नहीं, स्थानीय लोगों को बेटियों को स्कूल भेजने के लिए मनाने का काम भी उन्होंने किया। मुफलिसी में जीने वाले ज्यादातर लोग हर दिन अपने बच्चों को खेत में काम करने के लिए भेज देते थे। उन्हें स्कूल आने के लिए मनाने का काम आसान नहीं था। डिसले ने सबसे पहले माता-पिता को अवेयर किया, फिर घर-घर जाकर बच्चों को स्कूल लाने का काम किया। स्कूल आने वाले बच्चों को सिलेबस और किताबों से बोरियत न हो, इसीलिए छह महीने तक उन्हें किताबें खोलने ही नहीं दीं। मोबाइल और लैपटॉप की मदद से उन्हें गाने, कहानी और कार्टून दिखाए जाते। साथ ही उनकी नॉलेज बढ़ाने की कोशिश भी करते रहे। बच्चों ने धीरे-धीरे स्कूल आना शुरू कर दिया। लॉकडाउन से पहले तक स्कूल में फुल स्ट्रेंथ में बच्चे पढ़ने आते रहे।

रैगिंग से आजिज होकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले रंजीत सिंह महादेव डिसले के मुताबिक दुनियाभर में बदलाव लाने वाले सिर्फ टीचर होते हैं। एक टीचर अपने हाथों में चॉक लेकर दुनिया की चुनौतियों को सॉल्व करने वाले होते हैं। डिसले ने पुरस्कार में मिली राशि के आधे हिस्से से साथी प्रतिभागियों की मदद करने का ऐलान किया है, जिससे उनके योगदान को भी वैश्विक स्तर पर सम्मान मिल सके। डिसले इनाम में मिली राशि के पचास फीसदी हिस्से को खुद के साथ चयनित अन्य नौ और उप विजेता टीचर्स में बाटेंगे ताकि वे हायर एजुकेशन से अपने सपनों को पंख देंगे। कोविड-19 महामारी के चलते शिक्षा और सम्बंधित समुदाय को मुश्किल स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। वह मानते हैं, शिक्षक इनकम के लिए नहीं, बल्कि आउटकम के लिए काम करते हैं। सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में नहीं, रणजीत सिंह महादेव ने दुनिया के आठ देशों में घूम-घूम कर पांच हजार स्टुडेंट्स को साथ लेकर एक शांति सेना बनाई है। ये आठ देश- भारत, पाकिस्तान, ईरान, इराक, इजरायल, फिलिस्तीन, अमेरिका और उत्तर कोरिया हैं। इन देशों में शांति स्थापित करने की कोशिश में उनका लेट्स क्रॉस द बॉर्डर प्रोजेक्ट है। विदेशों में रणजीत माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, ब्रिटिश काउंसिल, प्लिपग्रिड, प्लकर्स जैसे इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशंस के साथ काम करते हैं। वर्तमान में वर्चुअल फील्ड ट्रिप प्रोजेक्ट के जरिए दुनियाभर के 87 देशों के 300 से ज्यादा स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

उन्होंने न केवल पाठ्यपुस्तकों का विद्यार्थियों की मातृभाषा में अनुवाद किया बल्कि उनमें विशिष्ट क्यूआर कोड की व्यवस्था की ताकि छात्र-छात्राएं ऑडियो कविताएं और वीडियो लेक्चर, कहानियां और होमवर्क पा सकें। क्यूआर कोड की फुल फॉर्म है- क्विक रिस्पॉन्स कोड। इसे बारकोड की अगली जेनरेशन भी कहा जाता है, जिसमें हजारों जानकारियां सुरक्षित रहती हैं। अपने नाम के ही मुताबिक ये तेजी से स्कैन करने का काम करता है। ये स्क्वायर आकार के कोड होते हैं, जिनमें सारी जानकारी होती है। किसी उत्पाद, फिर चाहे वे किताबें हों या अखबार या फिर वेबसाइट, सबका एक क्यूआर कोड होता है। ग्लोबल टीचर प्राइज- 2020 के विजेता के हस्तक्षेपों का असर यह हुआ है,अब गाँव में किशोर विवाह नहीं होते हैं। लड़कियों की स्कूल में शत-प्रतिशत उपस्थिति होती है। डिसले का स्कूल महाराष्ट्र में क्यूआर कोड पेश करने वाला पहला राज्य बन गया। राज्य सरकार तो पहले ही घोषणा कर चुकी है, वह पूरे राज्य में क्यूआर कोडित पाठ्यपुस्तकों को लागू  करेगी। पुरस्कार के संस्थापक एवं परमार्थवादी सन्नी वारके ने रणजीत सिंह डिसले की कंठमुक्त प्रशंसा करते हुए कहा, पुरस्कार राशि साझा करके आप दुनिया को देने का महत्व पढ़ाते हैं। इस अवार्ड के साझेदार-यूनेस्को में सहायक शिक्षा निदेशक स्टेफानिया गियानिनि ने कहा,रणजीत सिंह जैसे शिक्षक जलवायु परिवर्तन रोकेंगे। शांतिपूर्ण एवं न्यायपूर्ण समाज बनाएंगे। असमानताएं दूर करेंगे। आर्थिक वृद्धि की ओर चीजें ले जाएंगे।

महाराष्ट्र के इस गौरव पर हिंदुस्तान को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को नाज है। महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे तो अपने इस होनहार शिक्षक के कायल हैं। उन्होंने इस अद्भुत टीचर का सम्मान भी किया। सत्कार समारोह की खासियत यह रही, न केवल डिसले के माता-पिता की गरिमामयी मौजूदगी रही, बल्कि ठाकरे सरकार का करीब-करीब पूरा मंत्रिमंडल भी मौजूद रहा। इस मौके पर सीएम बोले, डिसले में शिक्षा के प्रति गजब का जुनून है। डिसले सरीखे तकनीकी प्रेमी और नवाचारी शिक्षकों के बूते राज्य के अंतिम छात्र तक नवाचार की अलख जगाएंगे।

बिहार सासाराम का शेरशाह सूरी

—विनय कुमार विनायक
छबीला बाबर छब्बीस दिसंबर
पन्द्रह सौ तीस में मर गया!
किन्तु ,“पानी’ ‘खा’ ‘चन्द’ ‘घाघ” जीता रहा
(पानीपत की लड़ाई/20 अप्रैल 1526 ई.
बाबर और इब्राहीम लोदी के बीच/
अफगान शक्ति पराजित)
(खान्वा की लड़ाई/16 मार्च 1527 ई.
बाबर और राणा सांगा के बीच/
हिन्दू शक्ति पराजित)
(चंदेरी की लड़ाई/29 जनवरी 1528 ई.
बाबर और मेदिनी राय के बीच/
हिन्दू शक्ति पराजित)
(घाघरा की लड़ाई/06 मई 1529 ई.
बाबर और इब्राहीम लोदी का भाई
महमूद लोदी के बीच
अफगान शक्ति पराजित)
प्रतिशोध की आग में जलता रहा!
घूंट जहर का पीता रहा!
मौका मिला नौ साल के बाद
1539 ई. में चौसा के मैदान में
कलंक का टीका लगा मुगलों की शान में
हारा हुमायूं, जीता पानीपत घाघरा में
बेघर हुए शेरों के शेर ‘शेर खां’
खिताब पाकर ‘शेरशाह’ बना बादशाह
सिक्के चलाकर पढ़ा उसने फतवा
किन्तु हुमायूं को यकीन था कहां?
पुनः सन् पंद्रह सौ चालीस में
वह नाखालिश आ पड़ा
मैदाने कन्नौज/बिलग्राम में
किन्तु पीठ दिखाकर भागा कायर
भारत छोड़ ईरान में पनाह मांगने!
अब दिल्ली की गद्दी पर
निशंक शेरशाह बैठा था
और बर्बर बाबर का बेटा
कहीं धूल में लेटा था।
शेरशाह था बिहारी सूरी अफगान,
साम्प्रदायिक कम, ज्यादा इंसान,
पांच वर्षीय शासन में बनी पहचान,
कलकत्ता से पेशावर तक जीटी रोड़,
किनारे आम के पेड़,सराय निर्माण,
कर रियायत, खुश रियाया किसान!
—विनय कुमार विनायक

किसान बचें नेताओं से

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
किसान नेताओं को सरकार ने जो सुझाव भेजे हैं, वे काफी तर्कसंगत और व्यवहारिक हैं। किसानों के इस डर को बिल्कुल दूर कर दिया गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म होनेवाला है। वह खत्म नहीं होगा। सरकार इस संबंध में लिखित आश्वासन देगी। कुछ किसान नेता चाहते हैं कि इस मुद्दे पर कानून बने। याने जो सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य से कम पर खरीदी करे, उसे जेल जाना पड़े। ऐसा कानून यदि बनेगा तो वे किसान भी जेल जाएंगे जो अपना माल निर्धारित मूल्य से कम पर बेचेंगे। क्या इसके लिए नेता तैयार हैं ? इसके अलावा सरकार सख्त कानून तो जरुर बना दे लेकिन वह निर्धारित मूल्य पर गेहूं और धान खरीदना बंद कर दे या बहुत कम कर दे तो ये किसान नेता क्या करेंगे ? ये अपने किसानों का हित कैसे साधेंगे ? सरकार ने किसानों की यह बात भी मान ली है कि अपने विवाद सुलझाने के लिए वे अदालत में जा सकेंगे याने वह सरकारी अफसरों की दया पर निर्भर नहीं रहेंगे। यह प्रावधान तो पहले से ही है कि जो भी निजी कंपनी किसानों से अपने समझौते को तोड़ेगी, वह मूल समझौते की रकम से डेढ़ गुना राशि का भुगतान करेगी। इसके अलावा मंडी-व्यवस्था को भंग नहीं किया जा रहा है। जो बड़ी कंपनियां या उद्योगपति या निर्यातक लोग किसानों से समझौते करेंगे, वे सिर्फ फसलों के बारे में होंगे। उन्हें किसानों की जमीन पर कब्जा नहीं करने दिया जाएगा। इसके अलावा भी यदि किसान नेता कोई व्यावहारिक सुझाव देते हैं तो सरकार उन्हें मानने को तैयार है। अब तक कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर और गृहमंत्री अमित शाह का रवैया काफी लचीला और समझदारी का रहा है लेकिन कुछ किसान नेताओं के बयान काफी उग्र हैं। क्या उन्हें पता नहीं है कि उनका भारत बंद सिर्फ पंजाब और हरयाणा और दिल्ली के सीमांतों में सिमटकर रह गया है ? देश के 94 प्रतिशत किसानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य से कुछ लेना-देना नहीं है। बेचारे किसान यदि विपक्षी नेताओं के भरोसे रहेंगे तो उन्हें बाद में पछताना ही पड़ेगा। राष्ट्रपति से मिलनेवाले प्रमुख नेता वही हैं, जिन्होंने मंडी-व्यवस्था को खत्म करने का नारा दिया था। किसान अपना हित जरुर साधे लेकिन अपने आप को इन नेताओं से बचाएं।

सुदर्शन चक्र बनाम प्रतिशोध चक्र

महाराष्ट्र में महाविकास आघाड़ी सरकार के एक बरस मुकम्मल होने पर मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे ने शिवसेना के मुखपत्र-सामना मराठी को दिए अभिनन्दन साक्षात्कार में न केवल भारतीय जनता पार्टी को आईना दिखाया है, बल्कि अपनी सरकार की बेमिसाल उपलब्धियां भी गिनाई हैं। अपने इस आक्रामक इंटरव्यू में श्री ठाकरे के तल्ख़ तेवर और कठोर भाषा रही। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से भारतीय जनता पार्टी, भाजपा के आकाओं, सत्ता, राजधर्म, कोविड-19, ईडी, सीबीआई को लेकर अपनी बेबाक राय रखी। इस लम्बी गुफ़्तगू के महत्वपूर्ण अंश आप जैसे सुधी पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं…

  • श्याम सुंदर भाटिया

राजनीति में बदले की भावना कतई नहीं चलती है। हम पर हावी होने वाले लोगों का भी परिवार और बच्चे हैं। तुम धोए हुए चावल नहीं हो, तुम्हारी खिचड़ी कैसे पका सकते हैं, हम पका सकते हैं। महाराष्ट्र की सरकार आज गिराएंगे, कल गिराएंगे -ऐसा बोलने वालों के दांत गिर पड़ें हैं। वर्षा बंगले से लेकर मातोश्री तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे ने साझा सरकार के दूसरे वर्ष में मंगल प्रवेश पर राजसभा के सदस्य एवं मराठी सामना के कार्यकारी संपादक श्री संजय राउत से लंबी गुफ़्तगू में उन्होंने हर सवाल का जवाब बड़ी बेबाकी से दिया। शिवसेना के मुखपत्र- सामना मराठी को दिया यह साक्षात्कार परोक्ष रुप से शिवसेना पुरानी दोस्त भारतीय जनता पार्टी और उसके आकाओं पर जोरदार हमला है। हालाँकि इस इंटरव्यू की खास बात यह है, न तो सवाल और न ही जवाब में कहीं भी भाजपा, राज्यपाल या किसी विरोधी दल का नाम नहीं लिया गया है। इशारों ही इशारों में भाजपा को अपनी हैसियत में रहने की हिदायत दे डाली है। साथ ही राजधर्म का भी स्मरण करा दिया है। इस इंटरव्यू में उन्होंने चेताया- फ़िलहाल में सिर्फ हाथ धो रहा हूँ। हावी होंगे तो हाथ धोकर पीछे पड़ जाऊंगा। तीखा प्रहार करते हुए कहते हैं, कुछ लोगों के दिमाग में विकार आ गया है। इसका इलाज करना ही होगा। इस बहुचर्चित, बहुपठनीय और दमदार गुफ़्तगू में बोले, मराठी माणुस को गाड़ कर उस पर कोई नाच नहीं सकता है।

अभिनन्दन साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया, शिवसेना के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस का आना और साझा सरकार का गठन किसी लोकतांत्रिक चमत्कार से कम नहीं है। उन्होंने कहा, कांग्रेस की कार्यवाहक श्रीमती सोनिया गांधी और राष्ट्रवादी कांग्रेस के सुप्रीमो श्री शरद पवार का ह्रदय से आभारी हूँ। अपने विरोधियों को करारा जवाब देते हुए बोले, यह अप्राकृतिक सरकार नहीं है। यह गठबंधन सियासी साहस, नए प्रयोग और विश्वास के प्रतीक हैं। एक बरस की सरकार चलाने में उन्हें किसी प्रकार की कसरत नहीं करनी पड़ी है। मुझे भरोसा है, आगामी चार साल भी महाविकास आघाड़ी सरकार और बेहतर प्रदर्शन करेगी। जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगी। ईडी और सीबीआई के मिसयूज पर कहते हैं, सच्चाई यह है- जब भी मुझे चुनौती मिलती है तो ज्यादा स्फूर्ति आ जाती है। वह अपने दादा जी का भावपूर्व स्मरण करते हुए इस इंटरव्यू में कहते हैं, दशहरे के मैंने अपने भाषण में कहा था, महाराष्ट्र ने मरी हुई माँ का दूध नहीं पिया हुआ है। महाराष्ट्र बाघ की संतान है। कोई भी महाराष्ट्र के आड़े आएगा और फिर नाहक बिना वजह दबाने की कोशिश करेगा तो क्या होगा, इसका उदाहरण इतिहास में दर्ज है। महाराष्ट्र कभी रुका नहीं है। महाराष्ट्र कभी रुकेगा नहीं। महाराष्ट्र हमेशा आगे बढ़ता रहा है, बढ़ता रहेगा।  

श्री ठाकरे चुनौती देने वालों से कहते हैं, ऐसी चुनौती देकर आप प्रतिशोध चक्र चलाने वाले होंगे तो फ़िलहाल प्रतिशोध चक्र में उलझने की मेरा कोई इच्छा नहीं है। यदि आपने इसके लिए विवश किया तो आप हमें हिंदूवादी कहते हो ना तो फिर ठीक है। प्रतिशोध चक्र आपके पास है तो हमारे पास सुदर्शन चक्र है। वह नाम लिए बिना भाजपा को सलाह देते हैं, राजनीति, राजनीति की तरह करो। सत्ता हमेशा किसी के पास नहीं रहती है। लोकत्रंत में जनता ही सबसे बड़ी ताकत है। प्रतिशोध का विचार महाराष्ट्र में कभी पनपा ही नहीं है। शत्रु को पराजित करना है, लेकिन इस तरह से बेवजह… राजनीतिक शत्रु का कांटा निकलना महाराष्ट्र की संस्कृति नहीं है। ऐसी प्रतिशोध की भावना महाराष्ट्र की मिट्टी में नहीं है। ललकारते और नेक सलाह देते हुए वह कहते हैं, क्रांतिकारी और पराक्रमी महाराष्ट्र की महाराष्ट्र की मिट्टी में जन्म लेते हैं। इस साक्षात्कार में वह ईमानदारी से स्वीकारते हैं, मैं शासन- प्रशासन की श्रेणी का नहीं हूँ। हमारा घराना सेवाव्रती है। महाराष्ट्र की सेवा करनी वाली है, छठवीं पीढ़ी है। सरकार चलाने में मनपा का वर्षों का अनुभव काम आया है। हालांकि पूर्व में प्रत्यक्ष रुप से भले की सत्ता का उपभोग नहीं किया हो, लेकिन फिर भी सत्ता को करीब से देखता आया हूँ, इसीलिए एक बरस के कामकाज में कोई दबाव महसूस नहीं हुआ। हाँ, इस एक साल में शिव सैनिकों से थोड़ा दूर हो गया। मुलाकातें नहीं हो पाती हैं, इसकी बड़ी वजह कोविड-19 है, लेकिन जल्द ही मेलमिलाप का सिलसिला प्रारभ्म हो जाएगा। महाराष्ट्र में कोविड-19 पर भी उन्होंने अपना नजरिया साफ़ किया। महाराष्ट्र की मेरा परिवार- मेरी जिम्मेदारी को बेमिसाल बताते हुए बोले, सूबे में इस अनसीन महामारी में डॉक्टर्स, स्वास्थ्य कर्मी- आशा, आंगनबाड़ी सेविका के संग-संग पुलिस और स्वयं सेवी संगठनों का योगदान अनमोल रहा। प्रधानमंत्री को मेरी यह सलाह है, कोरोना को लेकर पुरे देश में एक नीति तय करें। वैक्सीन कब आएगी, नहीं पता -लेकिन मास्क लगाओ, फासला रखो और हाथ धोओ सरीखे उपायों के चलते वायरस हमसे दूरी रखेगा, वैश्विक सच्चाई यही है।

बोले, इस कालावधि में वर्क फ्रॉम होम का उदय हुआ है। ऑनलाइन एजुकेशन को लेकर महाराष्ट्र सरकार संजीदा है, लेकिन इसके लिए नेटवर्किंग सुविधा पुख्ता होनी चाहिए। धरतीपुत्रों के प्रति हमारी सरकार का समर्पण उल्लेखनीय है। मैंने सीएम की शपथ लेते ही काश्तकारों को दो लाख का खर्च माफ़ कर दिया था। इसका लाभ सूबे के साढ़े 29 लाख किसानों को हुआ। उद्योगों और रोजगार को लेकर भी सरकार गंभीर है। बिना नाम लिए इशारों-इशारों में भाजपा और राजभवन पर बोले, मैं शिवसेना प्रमुख और अपने दादा जी के हिंदुत्व का हिमायती हूँ। वह कहते हैं , बेवजह किसी भी धर्म की आड़ में आप राजनीति मत करो… हमें हिंदुत्व सिखाने के पचड़े में मत पड़ो। इस देश में भगवा का पहला स्वराज्य छत्रपति शिवाजी महाराज ने ही स्थापित किया। मुख्यमंत्री का पद तो आता-जाता है। कुछ लोग पद और उसके सिंहासन को सर्वाधिक तवज्जो देते हैं, लेकिन ऐसा होना नहीं चाहिए। मुख्यमंत्री भी इंसान होता है। प्रधानमंत्री भी इंसान होता है। सीएम हो या पीएम हो, अंदर की इंसानियत  हमेशा जिन्दी रहनी चाहिए।

रोज़गार का सशक्त माध्यम बन सकता है पशुधन

फूलदेव पटेल

मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार 


ऐसे वक़्त में जबकि देश में रोज़गार के अवसर कम होते जा रहे हैं, बड़ी बड़ी कंपनियां कर्मचारियों की छटनी कर रही हैं, रोज़गार के अवसर लगातार सीमित होते जा रहे हैं, ऐसे वक़्त में भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में रोज़गार के अवसर उपलब्ध हैं। वास्तव में देश की एक बड़ी आबादी कृषि तथा कृषि आधारित रोज़गार पर निर्भर है। जिसमें पशुपालन और उससे जुड़े अन्य रोज़गार भी शामिल है। इन्हीं में डेयरी उद्योग भी जुड़ा है। जिससे युवा किसानों को नए रोज़गार भी मिल रहे हैं। प्रत्येक गांव और कस्बों में डेयरी सेंटरों की संख्या बढ़ रही है। यह संभव हुआ है दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने से। एक समय था जब श्वेत क्रांति के लिए पूरी दुनिया में भारत को जाना जाता था। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों द्वारा ज़्यादा से ज़्यादा गाय, भैंस और बकरी पालने की वजह से दूध का कारोबार फल फूल रहा था। लेकिन बदलते परिदृश्य में शहरी आबादी के साथ साथ ग्रामीण जनता भी इस व्यवसाय से दूर होती जा रही है। शहर में जहां जानवरों के चारे की दिक्कत है, तो वहीं गांव में समुचित सुविधा और प्रशिक्षण के अभाव में पशुपालकों की संख्या घट रही है।


हालांकि सालों भर रोज़गार देने वाले इस काम को बढ़ावा देने के लिए केंद्र से लेकर विभिन्न राज्य सरकारें अनेक योजनाएं संचालित कर रही हैं। बिहार में पशुपालन को अधिक से अधिक रोज़गार के रूप में उपलब्ध कराने के लिए समग्र गव्य विकास योजना भी चलाई जा रही है। इसके तहत पशुपालकों को प्रशिक्षण, ऋण और अनुदान भी दिए जाने का प्रावधान है। बिहार सरकार डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए समग्र गव्य विकास योजना के तहत 50 से 75 प्रतिशत तक सरकारी अनुदान देती है। इस योजना के तहत अलग अलग दुधारू मवेशियों की संख्या के अनुसार अनुदान की व्यवस्था की गई है। इसमें सामान्य जाति के लोगों को 50 प्रतिशत जबकि अनुसूचित जाति के लोगों को 75 प्रतिशत अनुदान का लाभ दिया जाता है।


देश में दूध के नाम पर आम लोगों की सेहत की चिंता किए बिना यूरिया से दूध बनाने का खुलेआम काला धंधा भी चल रहा है। सरकारी हुक्मरानों की उदासीनता व भ्रष्ट रवैये के कारण लाखों लोगों का स्वास्थ्य राम भरोसे है। यह बात जरूर है कि शहरी क्षेत्रों में खटालों के जरिये दूध का उत्पादन हो रहा है, जो रोजगार व सेहत दोनों के लिए ठोस कदम माना जा सकता है। इससे इतर देहाती इलाकों में भी दुधारू पशु रोज़गार और आय का एक सशक्त माध्यम है, परंतु उचित प्रशिक्षण व रोगोपचार की जानकारी के अभाव में इन पशुपालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है, जो चिंता का सबब है। हालांकि अभी भी गरीब कृषकों के लिए पशुपालन वरदान साबित हो रहा है। छोटे-छोटे पशुपालक दूध, दही, घी व मक्खन बेचकर न केवल आय का अच्छा स्रोत जुटा रहे हैं बल्कि अपने बच्चों को भी अच्छी शिक्षा दिलाकर देश-दुनिया के लिए मिसाल कायम कर रहे हैं।

इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिला स्थित साहेबगंज प्रखण्ड के एक छोटा सा गाँव हुस्सेपुर महुआनी है। जहां दर्जनों गरीब परिवार कृषि के साथ साथ पशुपालन का व्यवसाय अपनाकर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। इन्हीं में एक बेहद गरीब किसान मुन्नी राय भी हैं। एक समय था जब उनका पारिवारिक जीवन बहुत ही कष्टमय बीतता था। लेकिन आज पशुपालन की बदौलत उन्होंने अपने बेटे को प्रतिष्ठित ‘आइआइटी’ से पढाई पूरी करवायी है। मुन्नी राय स्वयं अशिक्षित हैं लेकिन अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए पूरे लगन से गाय व भैंस पालने में लगे हैं। मुन्नी राय के पास इतनी कम ज़मीन है कि उससे खेती करके परिवार का भरण-पोषण और शिक्षा का काम मुश्किल हो गया था। लेकिन जब इंसान के पास हिम्मत और साहस हो तो कुछ भी संभव हो सकता है। मुन्नी राय ने खेती के साथ साथ पशुपालन व्यवसाय भी शुरू किया। गाय और भैंस का दूध को बेचकर उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होने लगी। जिससे आर्थिक स्थिती में पहले की तुलना में काफी सुधार आने लगा। उनकी देखा-देखी गांव के दर्जनों गरीब किसानों ने पशुपालन को अपनी जीविका का आधार बनाया है। धर्मनाथ सहनी, लाल बिहारी राय, संजय राय, जनक राय, प्रभु राय, मनक राय, फूलदेव राय, राम अशीष राय, रामाधार राय, रधुवर यादव, रवीन्द्र राय आदि ऐसे दर्जनों गरीब किसान हैं, जिनकी आय का मुख्य स्रोत पशुपालन बन चुका है।

हालांकि पशुपालन व्यवसाय में कई कठिनाइयां भी हैं। इस संबंध में एक पशुपालक आशीष राय कहते हैं कि स्थानीय ग्रामीण बैंक से समय पर किसानों को क्रेडिट कार्ड नहीं मिलता है। जिससे गांव के साहूकार से 5 प्रतिशत मासिक ब्याज पर पैसे लेकर पशुओं का दाना-साना तथा दवा करनी पड़ती है। केसीसी के नाम पर आवंटित राशि का 10 प्रतिशत रिश्वत सरकारी बाबुओं को देनी पड़ती है। ऐसे में महाजन (साहूकार) से ब्याज पर पैसे लेकर काम चलाना अच्छा है। दूसरी ओर हुस्सेपुर परनी छपड़ा गांव के सहिन्द्र बारी कहते हैं कि पशुओं के टीकाकरण और बीमारियों का निदान सरकारी स्तर पर नहीं मिलने के कारण अधिकांश पशुओं की असमय मृत्यु हो जाती है। पशुओं के रोग से अनभिज्ञ पशुपालक भारी-भरकम पूंजी गंवा देते हैं इसलिए लोग पशुपालन से मुंह मोड़ने लगते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी स्तर पर चलाई जा रही योजना, रोगोपचार और प्रशिक्षण आदि क्या केवल कागज पर खानापूर्ति के लिए है? 

हालांकि पारु ब्लॉक के पशु चिकित्सक डा. अरुण कुमार का कहना है कि सरकारी स्तर से मवेशियों को सुरक्षित और स्वस्थ्य रखने के लिए टीकाकरण किया जाता है। खासकर मवेशी को खसरा, डकहाँ, जैसी बीमारियों से ज्यादा परेशानी होती है। इसके लिए समय-समय पर सरकार पशु गणना करवा रही है। साथ ही पशुओं के टैग जिसे पशु आधार कार्ड भी कहा जाता है, पशुपालकों को उपलब्ध कराई जाती है, साथ ही पशुओं के लिए प्रखण्ड स्तर पर दवा भी उपल्बध है। लेकिन पशुपालक इन्दु देवी, धर्मशीला देवी, राकेश यादव ,संजय यादव आदि कहते हैं कि मवेशी के लिए जो भी दवाएं आती हैं, वह सभी पशुपालकों को नही मिलती है।

वास्तव में सरकार द्वारा चलाई जा रही अनेकों योजनाएं ऐसी हैं, जिससे गरीबों और किसानों के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है, लेकिन विडंबना यह है कि इनमें से अधिकतर योजनाएं ज़मीनी स्तर की तुलना में कागज पर अधिक काम करते हैं। यही कारण है कि मुन्नी राय जैसे लाखों पशुपालक सरकारी लाभ नहीं ले पाते हैं और उन्हें पशुधन को बचाने के लिए साहूकार से कर्ज लेना पड़ता है। यदि रोज़गार के लिए पशुधन को सशक्त माध्यम बनाना है तो पहले पशुपालकों को उचित प्रशिक्षण समेत समुचित जानकारियां उपलब्ध करवानी होगी। उन्हें टीकाकरण, रोगोपचार, संरक्षण और संवर्द्धन के लिए प्रशिक्षित करना ही होना होगा।

ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों में गृहस्थ आरम्भ ही ज्येष्ठ है

-मनमोहन कुमार आर्य
वैदिक धर्म वह धर्म है जिसका आविर्भाव ईश्वर प्रदत्त ज्ञान, ‘वेद’ के पालन व आचरण से हुआ है। वैदिक धर्म के अनुसार मनुष्य को ईश्वर प्रदत्त शिक्षाओं को ही मानना व आचरण करना होता है। ऐसे ग्रन्थ वेद हैं जिसमें परमात्मा के सृष्टि की आदि में दिए गये सभी वचन व शिक्षायें विद्यमान है। हमारे विद्वान मनीषी ऋषियों की मान्यता रही है कि वेद सब विषयों में स्वतः प्रमाण है और अन्य ग्रन्थ व विद्वानों के वचन व बातें परतः प्रमाण है। किसी भी ग्रन्थ की वही बातें प्रामाणिक होती है जो वेदों की मान्यता व भावना से पुष्ट होती है। इसी आधार पर ऋषि दयानन्द ने वेदों को विद्या के ग्रन्थ कहा है और इतर सभी ग्रन्थों की जो बातें वेद विरुद्ध देखने को मिली उसको उन्होंने अविद्या बताया व उसका प्रसंगानुसार खण्डन भी किया है। वह कहते हैं कि मनुष्य जाति की उन्नति का एक मात्र कारण सत्य का ग्रहण करना और असत्य का त्याग करना है। सत्य वही होता है कि जो विद्या से युक्त तथा अविद्या से मुक्त हो। अतः सभी मनुष्यों को वेदों का अध्ययन कर उससे ईश्वर, जीव तथा सृष्टि सहित मनुष्य के कर्तव्यों एव आचरणों आदि की शिक्षा लेकर उसी के अनुसार आचरण व कार्य करने चाहियें। यदि हम ऐसा करेंगे तो हम एक सच्चे ईश्वरभक्त होकर धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं और इनको यत्किंचित प्राप्त भी कर सकते हैं। वेद विरुद्ध आचरण अशुभ व पाप कर्मों में आता है। इससे मनुष्य की आत्मा व जीवन की उन्नति न होकर अवनति होती है। मनुष्य को जीवन के उत्तर काल में ज्ञान प्राप्त होने पर पछताना पड़ता है। अतः मनुष्य का कर्तव्य है कि वह विद्वानों की संगति करें और उनके जीवन व आचरण के अनुकूल अपने जीवन व आचरण को बनायें। ऐसा करके एक साधारण अशिक्षित मनुष्य भी जीवन में उच्च स्थिति को प्राप्त हो सकता है। आर्यसमाज में जाने पर इस उद्देश्य की पूर्ति होती है। वहां अनेक विषयों के विद्वानों तथा सभ्य व वैदिक विद्वानों के दर्शन होने सहित विचार सुनने को मिलते हैं। आर्यसमाज में सन्ध्या तथा यज्ञ, माता-पिता की सेवा, अतिथि सत्कार तथा पशुओं से प्रेम आदि की शिक्षा सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं वेदों के स्वाध्याय की प्रेरणा मिलती है। इस प्रक्रिया से मनुष्य की आत्मा, मन व बुद्धि सहित शरीर की उन्नति होती है तथा वह सामाजिक व पारलौकिक उन्नति को भी प्राप्त होता है।

वेदों ने मनुष्य की आयु लगभग 100 वर्ष को चार आश्रमों में विभक्त किया है। मनुष्य का जीवन काल जन्म लेकर शैशवास्था से हो आरम्भ होता है। आरम्भ में माता-पिता के सान्निध्य में रहकर शिशु आरम्भिक ज्ञान एवं शारीरिक पोषण प्राप्त करता है। आठ वर्ष व उससे कुछ कम वय का होने पर उसे गुरु के पास अध्ययन के लिये भेजा जाता है। उसका अध्ययन सामान्यतः 25 वर्ष में पूरा होता था। इस 25 वर्ष की आयु को ब्रह्मचर्य आश्रम कहा जाता है। प्राचीन काल के वैदिक युग में इस अवस्था में मनुष्य अधिक से अधिक विद्याओं को ग्रहण करता था जिसमें वेदों का यथोचित ज्ञान प्राप्त करना मुख्य कर्तव्य होता था। विद्या पूरी करने पर ब्रह्मचारी का समावर्तन व विवाह संस्कार होता था। विवाह होने पर युवक व युवती का ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश होता है। इस आश्रम की अवधि भी 25 वर्ष निर्धारित है। गृहस्थ जीवन में रहकर मनुष्य को अर्थोपार्जन करने सहित सन्तानों को जन्म देना व उन्हें सुसंस्कारित करने सहित उनको विद्यावान बनाना होता है। अतिथियों का सत्कार तथा माता पिता आदि संबंधियों की सेवा करनी होती है। ऐसा करना माता पिता व विद्वान अतिथियों के ऋण से उऋण होने सहित सामाजिक तथा देश की उन्नति के लिये आवश्यक होता है। गृहस्थ जीवन में माता-पिता व दम्पत्तियों को यथासमय ईश्वरोपासना तथा दैनिक यज्ञ सहित परोपकार व दान आदि का भी सेवन करना होता है। स्वाध्याय प्रत्येक गृहस्थी के लिए अनिवार्य होता है। इससे मनुष्य का ज्ञान बढ़ने सहित आत्मा की उन्नति भी होती है। स्वाध्याय से हम सावधान रहते हैं और मिथ्या व अन्धविश्वासों में नहीं फंसते तथा अपने स्वाध्याय से अर्जित ज्ञान से अन्धविश्वासों में फंसे अपने निकटस्थ बन्धुओं को निकालने में भी सहयोगी होते हैं। अतः गृहस्थ जीवन काल में भी प्रत्येक दम्पत्ति को वैदिक धर्म की मान्यताओें के अनुसार अपने सभी कर्तव्यों का सेवन करना चाहिये और मुख्यतः अपनी सन्तानों को वेदों के अनुसार ज्ञानी व बलिष्ठ बनाना चाहिये। वह सब सदाचारी हों इसी में माता-पिता के जीवन की सार्थकता होती है। 

जब गृहस्थी पचास वर्ष की आयु के हो जायें तो उन्हें अपने गृहस्थ के दायित्वों को अपने पुत्रों को सौंप कर वानप्रस्थी होने का विधान वैदिक धर्म में किया गया है। आजकल स्थिति सर्वथा भिन्न है। वैदिक काल में ऐसा होता रहा है, ऐसा हम अनुमान व विश्वास करते हैं। आज भी आर्यसमाज से जुड़े लोग अपनी अपनी भावना व सुविधा के अनुसार वानप्रस्थी बनते हैं। आर्यसमाज के एक विद्वान एवं ऋषि दयानन्द भक्त श्री शैलेशमुनि सत्यार्थी जी हैं। उन्होंने वानप्रस्थ आश्रम की लगभग सही समय पर दीक्षा ली। वर्तमान में वह आर्यसमाज द्वारा संचालित आर्य वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम, ज्वालपुर-हरिद्वार में निवास करते हैं। उनका जीवन अध्ययन, चिन्तन, मनन तथा वैदिक धर्म के प्रचार में व्यतीत होता है। फेसबुक आदि के माध्यम से भी वह लोगों को सत्प्रेरणायें करते रहते हैं। ऐसे लोगों से ही वैदिक धर्म व संस्कृति की शोभा है। सभी को उनका अनुकरण करना चाहिये। वानप्रस्थ में रहकर हम स्वाध्याय, चिन्तन, मनन, ईश्वर का ध्यान तथा यज्ञ आदि से अपने जीवन में शुभ कर्मों का संचय कर इसे मुक्ति प्राप्त करने की ओर अग्रसर कर सकते हैं। इससे आत्म तथा ईश्वर साक्षात्कार में भी हम उन्नति कर सकते हैं। अतः वानप्रस्थ आश्रम का अपना महत्व है। सारा जीवन धनोपार्जन में लगे रहना आदर्श व प्रशंसनीय मनुष्य जीवन नहीं है। जीवन में स्वाध्याय के साथ ईश्वर प्राप्ति की साधना सहित आत्मा व जीवन को ऊंचा उठाने के कार्य होने चाहियंे जिनके लिये वानप्रस्थ लेकर अवकाश निकालना चाहिये। यह ध्यान रखना चाहिये कि हमारा जीवन किसी भी समय समाप्त हो सकता है। हम कल रहेंगे या नहीं, यह किसी को पता नहीं। अतः हमें समय रहते और ऋषियों के विधानों पर आस्था रखकर उनका यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक पालन करना चाहिये। वानप्रस्थ का काल आत्मकल्याण का काल होता है। इसमें हम धर्म प्रचार का कार्य भी कर सकते हैं जिससे हमें पुण्य कर्मों का लाभ होने सहित हमारी आत्मा की उन्नति भी होती है और हमारा समाज व देश संवरता है। 

मनुष्य जीवन का चौथा आश्रम संन्यास आश्रम है। इसकी अवधि सामान्यतः 75 वर्ष की आयु से आरम्भ होती है। वैराग्य होने पर इसे ब्रह्मचर्य के बाद कभी भी धारण किया जा सकता है। इस अवस्था में मनुष्य को अपना समय ईश्वर की प्राप्ति हेतु साधना में लगाने के साथ पूर्व के तीन आश्रम में जो ज्ञान व अनुभव प्राप्त किया होता है उससे समाज व देश का मार्ग दर्शन करना होता है। ऋषि दयानन्द का जीवन एक आदर्श संन्यासी का जीवन था। स्वामी श्रद्धानन्द, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती एवं महात्मा नारायण स्वामी आदि विद्वान हमारे आदर्श संन्यासी रहे हैं। हमें इनके जैसा जीवन बनाकर परमार्थ का संग्रह करना है। संन्यास में मनुष्य का अपने परिवार से संबंध समाप्त हो जाता है। पूरा विश्व व इसके सभी लोग ही संन्यासी का परिवार होते हैं। इनके कल्याण के लिये ही वह सत्योपदेश एवं इतर कार्य करता है। वैदिक काल में यह व्यवस्थायें उत्तम अवस्था को प्राप्त थी। महाभारत युद्ध के बाद देश व समाज का पतन हुआ। वेदों का व्यवहार आलस्य व प्रमाद के कारण छूट गया। समाज में नाना प्रकार के अन्धविश्वास व कुरीतियां उत्पन्न हुईं। आज यह वृद्धि को प्राप्त हो रही हैं। ऋषि दयानन्द ने अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड और कुरीतियों को दूर करने के अनेक प्रयत्न किये परन्तु अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों एवं आचार्यों ने उनके इस दैवकार्य में सहयोग नहीं किया। परिणाम हमारे सामने है। आज स्थिति भयावह है। हमारे भाईयों का धर्मान्तरण एवं अनेक प्रकार से उत्पीड़न किया जाता है और हम एक दर्शक बन कर रह जाते हैं। ऐसी समस्याओं का हमारे पास कोई समाधान नहीं है। हमारी व्यवस्था भी लाचार दीखती है। यह स्थिति वेद प्रचार व संगठन को बलवान बनाकर ही कुछ हल की जा सकती है। अतः सुख, शान्ति और कल्याण की विश्व में स्थापना हेतु वैदिक आश्रम व्यवस्था को लागू करने की महती आवश्यकता है। आर्यसमाज इसके लिए प्रयत्नशील है। ईश्वर कृपा करेंगे तो यह कार्य भविष्य में शायद सफल हो सकेगा। 

वैदिक धर्म में चार आश्रम हैं। इनमें अपनी अपनी जगह सभी बड़े हैं परन्तु गृहस्थाश्रम का महत्व अधिक माना जाता है। ब्रह्मचारी स्वयं को बड़ा, वानप्रस्थी स्वयं को बड़ा तथा संन्यासी स्वयं को सबसे बड़ा मानते हैं। लोगों में इस विषयक अनेक भ्रान्तियां हैं। प्रायः सभी संन्यासी को सबसे बड़ा मानते हैं। ऋषि दयानन्द ने इन सब भ्रान्तियों का समाधान हेतु सहित यह कहकर किया है कि गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा है। सत्यार्थप्रकाश के चैथे समुल्लास के अन्त में उन्होंने प्रश्न किया है कि गृहाश्रम सब से छोटा वा बड़ा है? इसका उत्तर उन्होंने दिया है कि अपने-अपने कर्तव्यकर्मों में सब बड़े हैं। परन्तु यथा ‘नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्। तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्।।1।। यथा वायुं समाश्रित्य वत्र्तन्ते सर्वजन्तवः। तथा गृहस्थमाश्रित्य वत्र्तन्ते सर्व आश्रमाः।।2।।’ ऋषि ने इसके आगे मनुस्मृति के ही दो और श्लोक भी दिये हैं। वह लिखते हैं कि जैसे नदी और बड़े-बड़े नद तब तक भ्रमते ही रहते हैं जब तक समुद्र को प्राप्त नहीं होते? वैसे गृहस्थ ही के आश्रय से सब आश्रम स्थिर रहते हैं।1। विना इस आश्रम के किसी आश्रम का कोई व्यवहार सिद्ध नहीं होता।2। जिस से ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी तीन आश्रमों को दान और अन्नादि देके प्रतिदिन गृहस्थ ही धारण करता है इससे गृहस्थ ज्येष्ठाश्रम है, अर्थात् सब व्यवहारों में धुरन्धर कहाता है। इसलिये जो अक्षय मोक्ष और संसार के सुख की इच्छा करता हो वह प्रयत्न से गृहाश्रम का धारण करे। जो गृहाश्रम दुर्बलेन्द्रिय अर्थात् भीरु और निर्बल पुरुषों से धारण करने के अयोग्य है, उसको (निर्भीक एवं सबल पुरुष) अच्छे प्रकार धारण करें। ऋषि आगे लिखते हैं कि इसलिये जितना कुछ व्यवहार संसार में है उस का आधार गृहाश्रम है। जो यह गृहाश्रम न होता तो सन्तानोत्पत्ति के न होने से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम कहां से हो सकते? जो कोई गृहाश्रम की निन्दा करता है वही निन्दनीय है और जो प्रशंसा करता है वही प्रशंसनीय है। परन्तु तभी गृहाश्रम में सुख होता है जब स्त्री पुरुष दोनों परस्पर प्रसन्न, पुरुषार्थी और सब प्रकार के व्यवहारों के ज्ञाता हों। इसलिये गृहाश्रम के सुख का मुख्य कारण ब्रह्मचर्य और स्वयंवर विवाह है। 

हमाने वैदिक आश्रम व्यवस्था में आश्रम का उल्लेख कर गृहस्थ आश्रम की महत्ता को वेदों के महान ऋषि दयानन्द जी के शब्दों में प्रतिपादित किया है। इससे लोगों का भ्रम निवारण होता है। आज भी लोग संन्यासियों को ही सबसे अधिक महत्व देते हैं और संन्यासियों में अनेक यथार्थ वैराग्यवान संन्यासी न होकर अपने भक्तों का आर्थिक शोषण करते ही दीखते हैं। सभी को ऋषि दयानन्द के विचारों को पढ़कर लाभ उठाना चाहिये। गृहस्थ आश्रम की महत्ता का इससे अधिक उपयुक्त वर्णन कहीं देखने को नहीं मिलता। ऋषि दयानन्द जी को सादर नमन। 

मुगल बादशाह नसीरुद्दीन हुमायूं

—विनय कुमार विनायक
बाबर की बीबी महीम बेगम को था
चार लाल-हुमायूं, असकरी और हिंदाल!
पन्द्रह सौ तीस दिसंबर में
हुमायूं बैठा आगरा की गद्दी पर
कामरान को काबुल, कांधार
असकरी को संभल
और हिंदाल को अलवर का हिस्सा
यह था बाबरी उतराधिकार का किस्सा।
सन् पंद्रह सौ इकतीस में
हुमायूं ने कालिंजर को घेरा
सन् पंद्रह सौ बत्तीस में लगा
दौराहा का फेरा/दादरा का युद्ध
जिसमें महमूद लोदी अफगान
मुगलों से तीसरी बार हारा!
सन् पंद्रह सौ पैंतीस से छत्तीस तक
हुमायूं लड़ा बहादुरशाह के साथ में
युद्ध जीता गुजरात में
पंद्रह सौ सैंतीस से उन्चालीस तक
घेरा किला चुनार को
पर स्वीकार कर हार को
चला हुमायूं चौसा का मैदान
सुनकर शेर खां के हुंकार को
पर सह नहीं सका उस कायर ने
चौसा से कन्नौज तक की लंबी
शेर खां की मार को।
सन् पंद्रह सौ चालीस से चौवन तक
हुमायूं खाक छानता रहा वन-वन
फिर पचपन में माछीवाड़ा
और सरहिंद का युद्ध लड़ा
सिकंदर सूर को दूर ठेलकर
वह धैर्य से रहा खड़ा
अब दिल्ली दूर नहीं थी,
विजय हुमायूं के सामने खड़ा
पुनः गद्दी पर बैठा ही था
कि सीढ़ी पर से लुढ़क पड़ा
सन् पंद्रह सौ छप्पन में छिपा
कब्र में चैन-सुकून पाने।
हुमायूं की जीवनी हुमायूं नामा,
उसकी बहन गुलबदन ने लिखी,
बनवाई थी हुमायूं का मकबरा,
दिल्ली दीनपनाह के निकट में
उसकी विधवा हमीदा बानो ने!
हुमायूं ने स्वीकारा रक्षा बंधन,
चित्तौड़ की रानी कर्णावती का,
किन्तु बहादुरशाह के कहर औ
जौहर से बचा नहीं पाए बहन!
हुमायूं लुढ़कते रहे थे आजीवन,
अंततः सैंतालीस वर्ष में लुढ़क
सीढ़ी से समाप्त हुआ जीवन!
—विनय कुमार विनायक

कृषि क्षेत्र में मध्य प्रदेश की अनुकरणीय प्रगति

आज से कुछ ही साल पहले तक मध्य प्रदेश की गिनती देश के बीमारु राज्यों की श्रेणी में की जाती थी। बीमारु राज्यों की श्रेणी में मध्य प्रदेश के अलावा तीन अन्य राज्य भी शामिल थे, यथा, बिहार, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश। इन राज्यों को बीमारु राज्य इसलिए कहा गया था क्योंकि इन राज्यों में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर बहुत कम थी एवं औसत प्रति व्यक्ति आय भी बहुत कम होने के चलते ग़रीबी से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या भी बहुत अधिक थी। इसके कारण, इन प्रदेशों में अशिक्षा की दर अधिक थी, ग्रामों में चिकित्सा सहित अन्य सुविधाओं का नितांत अभाव था तथा इन प्रदेशों में जनसंख्या वृद्धि दर भी तुलनात्मक रूप से अधिक थी। कुल मिलाकर, ये प्रदेश कुछ ऐसी विपरीत परिस्थितियों में फ़सें हुए थे कि इन प्रदेशों में विकास की दर को बढ़ाना बहुत ही मुश्किलों भरा कार्य था, इसलिए इन्हें बीमारु राज्य बोला जाता था।

मध्य प्रदेश की आर्थिक व्यवस्था मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र पर आधारित है। प्रदेश में लगभग दो तिहाई आबादी ग्रामों में निवास करती है एवं यहां लगभग 54 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। वर्ष 2005-06 से 2014-15 के दौरान मध्य प्रदेश ने कृषि के क्षेत्र में औसतन 9.7 प्रतिशत की वृद्धि दर अर्जित की है। इसके बाद के 5 वर्षों के दौरान तो कृषि क्षेत्र में औसत विकास दर बढ़कर 14.2 प्रतिशत प्रतिवर्ष की रही है। यह पूरे देश में सभी राज्यों के बीच कृषि क्षेत्र में अर्जित की गई सबसे अधिक विकास दर है।

आज मध्य प्रदेश अन्य सभी प्रदेशों के सामने एक उदाहरण पेश कर रहा है कि किस प्रकार इस प्रदेश ने कृषि के क्षेत्र में एतिहासिक उपलब्धियाँ अर्जित की है। आज मध्य प्रदेश कई क़िस्म के उत्पादों की पैदावार में देश में प्रथम स्थान पर आ गया है। उदाहरण के तौर पर, संतरा (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 30 प्रतिशत है), चना (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 45 प्रतिशत है), तिलहन, दालें (तूर, चना, उड़द, आदि), सोयाबीन (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 57 प्रतिशत है), लहसुन (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 32 प्रतिशत है) एवं टमाटर (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 16 प्रतिशत है) के उत्पादन में मध्य प्रदेश, पूरे देश में, प्रथम स्थान पर आ गया है।

इसी प्रकार, गेहूँ (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 19 प्रतिशत है), प्याज़ (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 15 प्रतिशत है), हरा मटर (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत है), अमरूद (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 14 प्रतिशत है) एवं मक्का (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 12 प्रतिशत है) के उत्पादन में मध्य प्रदेश, पूरे देश में द्वितीय, स्थान पर आ गया है। साथ ही, धनिया (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 19 प्रतिशत है), लाल मिर्ची,(देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 7 प्रतिशत है), सरसों एवं दूध के उत्पादन में मध्य प्रदेश, पूरे देश में, तीसरे स्थान पर आ गया है। खाद्य पदार्थों के उत्पादन के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद आज मध्य प्रदेश पूरे देश में दूसरे नम्बर पर है।

मध्य प्रदेश ने दरअसल इस बीच ग्रामीण क्षेत्रों में कई प्रकार की सुविधाएँ किसानों को उपलब्ध करायीं हैं जिसके कारण कृषि के क्षेत्र में मध्य प्रदेश ने चहुंमुखी विकास किया है। सबसे पहिले तो सिंचाई की सुविधाओं को वृहद्द स्तर पर गावों में उपलब्ध कराया गया है। मध्य प्रदेश में वर्ष 2000-01 में सिंचाई सुविधाओं का औसत 24 प्रतिशत था, जो कि राष्ट्रीय स्तर के औसत 41.2 प्रतिशत से बहुत ही कम था। परंतु मध्य प्रदेश की सरकार के इस क्षेत्र में मिशन मोड में काम करने के कारण सिंचाई सुविधाओं का औसत स्तर वर्ष 2014-15 में बढ़कर 42.8 प्रतिशत हो गया जो राष्ट्रीय औसत के 47.8 प्रतिशत के काफ़ी क़रीब पहुँच गया। आज तो यह औसत और भी अधिक आगे आ गया है। साथ ही, किसानों के फ़सल की बुआई एवं कटाई करते समय जब जब बिजली की आवश्यकता थी, उसे समय पर उपलब्ध करायी गयी। आज तो मध्य प्रदेश के अधिकतर गावों में लगभग 24 घंटे बिजली उपलब्ध है। इन सबके ऊपर, प्रदेश के सारे गावों को सभी मौसमों में 24 घंटे उपलब्ध रोड के साथ जोड़ दिया गया है। साथ ही साथ, गेहूँ की ख़रीद पर प्रदेश सरकार की ओर से विशेष बोनस किसानों को उपलब्ध कराया गया है, जिसके चलते किसान गेहूँ की फ़सल को बोने की ओर प्रेरित हुए हैं एवं गेहूँ के उत्पादन में मध्य प्रदेश पूरे देश में द्वितीय स्थान पर आ गया है। कृषि उत्पादों के भंडारण क्षमता में भी मध्य प्रदेश ने अभूतपूर्व प्रगति की है, जिसके चलते इन उत्पादों के नुक़सान में काफ़ी कमी देखने में आई है।

मध्य प्रदेश में विभिन्न कृषि उत्पादों की फ़सल बढ़ाने के उद्देश्य से ज़िला स्तर पर उत्पाद विशेष के समूह विकसित किये गए, जिसके चलते उस उत्पाद विशेष का उत्पादन इन जिलों में बहुत तेज़ी से बढ़ने लगा। जैसे, मंदसौर, नीमच, राजगढ़, शाजापुर, देवास, सिहोर आदि जिलों में संतरे की खेती को प्रोत्साहन दिया गया। अमरूद की खेती बढ़ाने के उद्देश्य से मुरेना, श्योपुर, रतलाम, उज्जैन, शाजापुर, सिहोर, सागर, विदिशा, आदि जिलों में समूह विकसित किए गए। इसी प्रकार, केला के उत्पादन के लिए, बुरहानपुर, खरगोन, बड़वाह, खंडवा, हरदा, धार, आदि जिले विकसित किए गए। आलू के उत्पादन हेतु मुरेना, ग्वालियर, शिवपुरी, राजगढ़, शाजापुर, उज्जैन, इंदौर, देवास आदि जिलों में समूह बनाए गए। हरे मटर का उत्पादन बढ़ने के उद्देश्य से ग्वालियर, दतिया, सागर, जबलपुर, नरसिंहपुर, सिवनी, छिंदवाड़ा आदि जिलों में समूहों का गठन किया गया। इसी प्रकार, लाल मिर्ची, धनिया, लहसुन, आम, अनार, प्याज़, टमाटर, आदि उत्पादों हेतु भी प्रदेश के विभिन्न जिलों को उस फ़सल के समूह के तौर पर विकसित किया गया। इस पद्धति के चलते भी प्रदेश में इन फलों, सब्ज़ियों आदि का उत्पादन बहुत तेज़ गति से आगे बढ़ा है।

आज मध्य प्रदेश न केवल उत्पादन के मामले में बल्कि कृषि उत्पादों के निर्यात के मामले में भी चहुमुखी तरक़्क़ी कर रहा है। मध्य प्रदेश में उत्पादित शरबती गेहूँ तो पूरे विश्व में अपनी धाक जमा चुका है। इसी प्रकार, मध्य प्रदेश में उत्पादित फलों एवं सब्ज़ियों यथा, संतरे, आम, अमरूद, केला, अनार, प्याज़, टमाटर, आलू, मटर, लहसुन, लाल मिर्ची, धनिया, सोयाबीन, चना, आदि की माँग अब वैश्विक स्तर पर होने लगी है। मध्य प्रदेश से वित्तीय वर्ष 2019-20 में 532 करोड़ अमेरिकी डॉलर की वस्तुओं का निर्यात किया गया था, जो वित्तीय वर्ष 2020-21 के अप्रेल-जुलाई 2020 की अवधि के दौरान और आगे बढ़कर 176 करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो चुका है।

विश्व में मुख्यतः पश्चिमी राष्ट्रों ने सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर तेज़ करने के लिए औद्योगिक विकास का सहारा लिया है। अर्थशास्त्र में ऐसा कहा भी जाता है कि कृषि क्षेत्र के विकसित अवस्था में आने के बाद औद्योगिक विकास के सहारे ही सकल घरेलू उत्पाद में तेज़ वृद्धि दर्ज की जा सकती है परंतु मध्य प्रदेश राज्य ने एक अलग ही राह दिखाई है एवं लगातार पिछले 5 वर्षों के दौरान कृषि क्षेत्र में 14 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज कर अपने सकल घरेलू उत्पाद में तेज़ गति से वृद्धि दर्ज करने में सफलता पाई है। मुख्यतः कृषि क्षेत्र में की गई प्रगति के सहारे ही मध्य प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद वर्ष 2019-20 में बढ़कर 9.07 लाख करोड़ रुपए (12973 करोड़ अमेरिकी डॉलर) का हो गया है। मध्य प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद वर्ष 2015-16 एवं 2019-20 के दौरान 13.78 प्रतिशत प्रतिवर्ष की औसत दर से बढ़ा है। मध्य प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में प्राइमरी (मूलभूत) क्षेत्र का योगदान वर्ष 2011-12 के 33.85 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2019-20 में 56.70 प्रतिशत हो गया है। इस मूलभूत क्षेत्र में कृषि क्षेत्र का अधिक योगदान भी शामिल है।

प्रति व्यक्ति आय भी अब बढ़कर 1324 अमेरिकी डॉलर हो गई है। मध्य प्रदेश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी अक्टोबर 2019 से जून 2020 के बीच बढ़कर 17.29 करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया है।

कृषि क्षेत्र में राह दिखने के बाद अब मध्य प्रदेश सौर ऊर्जा के उत्पादन के क्षेत्र में भी अनुकरणीय कार्य करता दिख रहा है। अक्टोबर 2019 तक मध्य प्रदेश में 1882.32 मेगावॉट की उत्पादन क्षमता स्थापित की जा चुकी है। माह दिसम्बर 2019 में 2000 मेगावाट के सौर ऊर्जा पार्क की स्थापना बुदेलखंड एवं चम्बल क्षेत्रों में करने की घोषणा मध्य प्रदेश सरकार ने की है। एशिया में सबसे बड़े, 750 मेगावाट की क्षमता के सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट का उद्घाटन, मध्य प्रदेश के रीवा में, भारत के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में किया है।

(नोंद- इस लेख में प्रयोग किए गए कुछ आँकड़े पिछले वर्षों के हैं)

आंदोलन में ‘उत्सव’ जैसा रसास्वादन, पिज्जा-बर्गर, चाय-कॉफी सब हाजिर

सुशील कुमार’नवीन’

खाने को पिज्जा, लच्छा परांठा, तंदूरी नान,तवा नान, चिल्ला, डोसा वो सब हैं, जो मसालेदार खाने वालों को चाहिए। देसी चटखारे के लिए मक्के की रोटी, सरसों का साग, दाल तड़का, कढ़ी,चावल, राजमा जितना चाहो उतना छक लो। मीठे में देसी घी का हलवा, गर्म जलेबी, लड्डू, बूंदी तो हैं ही। हरियाणवीं तड़का लिए बाजरे की रोटी, अलुणी घी, लाल मिर्च की चटनी लंगर के प्रसादे को और चार चांद लगा रही हैं।

 लस्सी-दूध भरे बड़े-बड़े ड्रम नजदीकी गांवों से बिना कहे पहुंच रहे हैं। सुबह उठते ही गर्म चाय तैयार मिल रही है। पीने को पानी की पैक्ड बोतल हर वक्त उपलब्ध है। इम्युनिटी बढ़ोतरी के लिए बादाम का काढ़ा बनाया जा रहा है। बिछाने के लिए गद्दे, ओढ़ने के लिए रजाई, गर्म मोटे कम्बल। मिनी थियेटर तक साथ लिए हैं। मनोरंजन के लिए रोज पंजाबी-हरियाणवीं कलाकार बिन बुलाए पहुंच रहे है। यूँ लग ही नहीं रहा कि किसान दिल्ली बार्डर पर आंदोलन पर हैं। इन्हें देखकर तो यही लगता है मानो किसी बड़े उत्सव का आयोजन यहां हो रहा है। 

आंदोलन जारी हुए दो हफ्ते होने को है। आमतौर पर ज्यों-ज्यों आंदोलन लंबा खींचता जाता है। उसके बिखराव की संभावनाएं और अधिक होती चली जाती हैं। आंदोलनकारियों के हौंसले तक जवाब देने लग जाते हैं। भीड़ लाखों से हजारों, हजारों से सैंकड़ों में पहुंच जाती है। पर यहां मामला इतिहास के सामने नया उदाहरण प्रस्तुत करने जा रहा है।

सेवा भाव में सिखों का कोई सानी नहीं है। लंगर क्या होता है, इसकी सही परिभाषा यही बता सकते हैं। सेवा में वैरायटी की इनके पास भरमार है। हम प्रायः देखते है जब भी कोई इनकी धार्मिक यात्रा का जिस भी शहर या बड़े गांव में आगमन होता है तो वहां के स्थानीय धर्मप्रेमियों की सेवाभाव अतुलनीय होती है। मीठे पानी की छबील, हलवा, छोले-पुरी तक ही ये सीमित नहीं होते। हर छोटी से बड़ी चीज सेवाभावियों द्वारा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। खास बात सेवा करने वाले भी कोई साधारण नहीं होते हैं। बड़े-बड़े अफसरों,खिलाड़ियों, सिने कलाकारों, राजनेताओं को देखा जा सकता है।

 यही भाव किसान आंदोलन की जड़ें जमाये हुए है। इसे और अधिक मजबूती हरियाणा वालों का 'सहयोग का लंगर' प्रदान कर रहा है। हरियाणा की तरफ से आने वाले हर वाहन में आटे की बोरियां, सब्जी, दाल, दूध, लस्सी इतना अधिक मात्रा में पहुंच रहा है। दिल्ली आंदोलन में भागीदारी निभा रही अंतरराष्ट्रीय योगा एथलीट कविता आर्य के अनुसार वहां किसी चीज की कमी नहीं है। लस्सी-दूध के टैंकर अपने आप पहुंच रहे है। किसी ने जलेबी का लंगर चला रखा है तो किसी ने लड्डू-बर्फी का। कोई गन्ने का जूस पिला रहा है तो कोई किन्नू, गाजर का मिक्स जूस। साबुन, तेल जो चाहिए, सेवा भाव में हाजिर है। मच्छर आदि न काटे, इसके लिए कछुआ छाप, गुड नाइट आदि क्वाइल यहां तक ओडोमास क्रीम तक मिल जाएगी। 

सोशल एक्टिविस्ट सुशील वर्मा बताते हैं कि यहां लगता ही नही कि कोई आंदोलन चल रहा है। मैनेजमेंट गजब का है। देशी के साथ विदेशी फीलिंग यहां महसूस की जा सकती है। पैक्ड बोतल में पानी चाहिए तो वो भी मिल जाएगा। पिज्जा, बर्गर सब तैयार मिलते हैं। काय-कॉफी की कोई कमी नहीं। स्नेक्स भी अलग-अलग प्रकार के। बिस्किटस की दुनियाभर की वैरायटी। आंदोलन भले ही रोड पर चल रहा हो, पर बंदों ने अपने जीवन शैली को अपने ही स्टाइल में बरकरार रखा हुआ है। ट्रेक्टर ट्रालियां रेन बसेरों का रूप लिए हैं। कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन हैं। रजाई-गद्दों की कोई कमी नहीं। सेवा करने वाले कुछ पूछते नहीं, अपने आप काम लग जाते हैं। कोई किसी को काम की नहीं बोल रहा। सब के सब भोर होते ही ड्यूटी सम्भाल लेते हैं। आंदोलन कब खत्म होगा इसका किसी को पता नहीं। बस जम गए तो जम गए। एक ही आवाज खाली हाथ नहीं लौटेंगे।

किसानों का असली दुश्मन, जलवायु परिवर्तन

फ़िलहाल देश में किसानों का आन्दोलन मीडिया की सुर्खिया बटोर रहा है। किसानों से जुड़ी हर रिपोर्ट में एमएसपी और आढ़ती शब्द जगह बनाए हुए हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन एक ऐसा शब्द युग्म है जिसका प्रयोग किसानों और किसानी के संदर्भ में ज़्यादा से ज़्यादा होना चाहिए।

इसकी वजह यह है कि भारतीय किसानों का सबसे बड़ा दुश्मन जलवायु परिवर्तन है। लेकिन समस्या यह है कि इस दुश्मन को न किसान देख पा रहे हैं हैं उन्हें मीडिया दिखा रही है। फ़िलहाल, ताज़ा ख़बर ये है कि भारतीय किसान पहले से ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की चपेट में हैं। औसत वार्षिक तापमान बढ़ने से फसल की पैदावार/ उपज में गिरावट आई है और बेमौसम बारिश और भारी बाढ़ से फसल क्षति के क्षेत्र में वृद्धि हो रही है। यह सारी जानकारी आज क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट से मिलती है। इस ब्रीफिंग रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे जलवायु परिवर्तन भारत की कृषि को प्रभावित कर रहा है।

ब्रीफिंग  में कहा गया है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन निश्चित रूप से भारत के कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इस बात के बढ़ते सबूत हैं कि इन परिवर्तनों से भूमि उत्पादकता में कमी आएगी और सभी भारतीय प्रमुख अनाज फसलों की उपज के साथ-साथ उपज परिवर्तनशीलता में भी वृद्धि होगी। प्रमुख उत्पादित फसलों में, गेहूं और चावल सबसे कमज़ोर हैं। बढ़ता तापमान भारतीय कृषि के लिए सबसे बड़ा जोखिम है। सबसे बुरी स्थिति में, भारत अपनी आबादी को खाना खिलाने के लिए भोजन का आयातक बन सकता है।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जलवायु-प्रेरित फसल की विफलताएँ आय में कमी ला रहीं हैं और भविष्य में, वार्षिक कृषि आय के नुकसान का अनुमान 15% -18% के बीच है, जो असिंचित क्षेत्रों के लिए 20% -25% है। किसानों की आजीविका पर आय में गिरावट का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है, पहले से ही किसानों में ऋणग्रस्तता, बेरोजगारी, मिटिगेशन, भूख और आत्महत्याओं की वृद्धि हुई है।

● कोविड-19 ने भारत की कृषि की कमजोरियों को उजागर किया क्योंकि एक से संकट ने सभी आकारों के खेतों को चोट पहुंचाई। लेकिन इस सेक्टर को “प्रकृति-आधारित रिकवरी” की ओर अग्रसर करने का एक अवसर है। जलवायु-स्मार्ट कृषि उपज और आय बढ़ा सकता है और उत्सर्जन को कम कर सकता है। प्रकृति में निवेश महान आर्थिक लाभ और व्यापार के अवसरों को उजागर कर सकता है। फसल बीमा और ऋण जैसे संरचनात्मक सुधार, पूंजी तक पहुंच और पैदावार को बढ़ावा दे सकते हैं। स्थानीय और छोटी आपूर्ति श्रृंखलाओं को बढ़ाने से लचीलापन बढ़ सकता है और किसानों को बाजारों में जोड़ा जा सकता है, जो लॉकडाउन के दौरान प्रमुख समस्याओं में से एक रही।

ये यह भी बताता है कि इन परिवर्तनों से किसानों द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना कैसे होगा।

रिपोर्ट की कुछ मुख्य बातें:

– इस बात के सबूत बढ़ते जा रहे हैं कि औसत अधिकतम तापमान, औसत न्यूनतम तापमान, उतार-चढ़ाव और अत्यधिक वर्षा में परिवर्तन से भूमि उत्पादकता में कमी और अधिकांश फसलों की उपज में कमी, साथ ही उपज परिवर्तनशीलता में वृद्धि हुए और होने वाले हैं।

– अनुमानों में तब्दीली के साथ – गेहूं, चावल, मक्का, चारा, सरसो, सोयाबीन और अन्य गैर-खाद्य अनाज फसलों की उत्पादकता कम होने की संभावना है।

– जलवायु-प्रेरित फसल विफलताएँ आय में कमी कर रही हैं और भविष्य में वार्षिक कृषि आय के नुकसान का अनुमान 15% -18% के बीच है, जो असिंचित क्षेत्रों के लिए 20% -25% है। भारत में कुल श्रमिकों का 55% या 263 मिलियन कृषि श्रमिक प्रतिनिधित्व करतें हैं।

भारत सरकार के अनुसार, मॉडल्स बताते हैं कि 21-वीं शताब्दी के अंत तक औसत तापमान 4.4 ° C बढ़ सकता है, जिससे हीटवेव बढ़ेंगें (3-4 बार) और सूखा भी  (2100 तक 150% तक)। औसत, वर्षा की चरम और अंतर-वार्षिक परिवर्तनशीलता बढ़ जाएगी, और अनुमान है कि मानसून का मौसम अधिक तीव्र होगा और बड़े क्षेत्रों को प्रभावित करेगा। 2100 तक समुद्र का स्तर 20-30 सेमी बढ़ने की उम्मीद है, विशेष रूप से उत्तर हिंद महासागर में। ये सभी बदलाव कृषि के महत्वपूर्ण क्षेत्रों, विशेष रूप से तटीय दक्षिण भारत, मध्य महाराष्ट्र, इंडो-गेनजेटिक मैदानों और पश्चिमी घाटों, को प्रभावित करेंगे।

– कृषि संकट के कारण 2011-2016 के बीच औसतन नौ मिलियन श्रमिक प्रवास कर गए। किसान बेहतर परिस्थितियों के लिए भी विरोध कर रहे हैं; 2014-16 के बीच विरोध प्रदर्शन आठ गुना बढ़ गए हैं।

– फसल बीमा योजनाओं से निजी बीमाकर्ता बाहर हो रहे हैं, इसके लिए जलवायु परिवर्तन को आंशिक रूप से जिम्मेदार ठहराया गया है। यह घटती उत्पादकता लागत को बढ़ाती है और किसानों के लिए अपने ऋणों को चुकाना कठिन बना देती है, विशेषकर बीमा तक पहुँच के बिना। परिणामस्वरूप, भारत की जनगणना के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में औसत मृत्यु दर (2014-16 के बीच 5.1%) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में औसत मृत्यु दर (2014-16 के बीच 7.1% औसत क्रूड डेथ रेट) अधिक है, और हालांकि आत्महत्याएं इसका एक छोटा सा हिस्सा हैं, वे बहुत चिंता का कारण हैं।

– एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि वार्मिंग पूरे भारत में सालाना 4,000 से अधिक अतिरिक्त मौतों के लिए जिम्मेदार है, जो वार्षिक आत्महत्याओं के ∼3% के लिए जिम्मेदार है। 1980 के बाद से, वार्मिंग और आगामी फसल क्षति को 59,300 किसान आत्महत्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

– जैसे-जैसे किसानों को अधिक उत्पादन घाटा होगा, सरकारी खर्चों में वृद्धि होगी। यह अनुमान लगाया गया है कि कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 1.5% की हानि होगी, जबकि RBI भविष्यवाणी करता है कि GDP का लगभग 3% उन्हें काउंटर करने पर खर्च किया जाएगा।

– अंतर्राष्ट्रीय स्वीकरन बढ़ रहा है कि कोविड दुनिया को अधिक प्रकृति आधारित वसूली को शामिल करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से कृषि और कृषि वानिकी क्षेत्रों के लिए। खाद्य और भूमि उपयोग गठबंधन की एक हालिया रिपोर्ट में पाया गया कि हम जिस तरह से खेती करते हैं और भोजन का उत्पादन करते हैं, वह 2030 तक वैश्विक रूप से नए व्यापार अवसरों में एक वर्ष में USD 4.5 ट्रिलियन जारी कर सकता है। विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम) की न्यू नेचर इकोनॉमी (नई प्रकृति अर्थव्यवस्था) रिपोर्ट में पाया गया कि 2030 तक खाद्य, भूमि और महासागर क्षेत्र में निवेश से वैश्विक स्तर पर 191 मिलियन नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं।