कविता विघ्नहरण गणपति

विघ्नहरण गणपति

अड़चन को विघ्न हम कहते हैं ,सदा उनसे डरते हैं , सदा उनसे बचते हैं ।विघ्नहरण गणपति की वन्दना हम करते हैं,विघ्नों को हरने की…

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लेख सभ्य समाज का नासूर है नारी हिंसा और उत्पीड़न

सभ्य समाज का नासूर है नारी हिंसा और उत्पीड़न

अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस  ( 25 नवम्बर, 2020 ) परललित गर्ग भारत ही नहीं, दुुनियाभर की महिलाओं पर बढ़ती हिंसा, शोषण, असुरक्षा एवं उत्पीड़न की…

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धर्म-अध्यात्म मनुष्य को सुख ईश्वर की भक्ति व सत्कर्मों से ही मिलता है

मनुष्य को सुख ईश्वर की भक्ति व सत्कर्मों से ही मिलता है

–मनमोहन कुमार आर्य                 हमें जो सुख व दुःख की अनुभूति होती है वह शरीर व इन्द्रियों के द्वारा हमारी आत्मा को होती है। आत्मा…

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राजनीति कोरोना : अभी ढिलाई ठीक नहीं

कोरोना : अभी ढिलाई ठीक नहीं

सुरेश हिन्दुस्थानीकोरोना के प्रति शासन, प्रशासन और आम जनता की लापरवाही के परिणाम अत्यंत भयावह रूप लेते दिखाई दे रहे हैं। संक्रमितों की संख्या में…

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पर्यावरण जलवायु परिवर्तन सम्बंधी लक्ष्यों को केवल भारत ही प्राप्त करता दिख रहा है

जलवायु परिवर्तन सम्बंधी लक्ष्यों को केवल भारत ही प्राप्त करता दिख रहा है

कोरोना वायरस महामारी इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में पूरे विश्व पर आई है लेकिन आगे आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन…

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कविता जीवन है अनमोल

जीवन है अनमोल

जीवन है बडा अनमोल,इसका कोई नहीं है मोल।इसको बचा कर तुम रखिए,मास्क लगा कर तुम रखिए।। घर छोड़कर नहीं जाओ,कोरोना को नहीं बुलाओ।भले ही कितनी…

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कविता जो शहीद हुए हैं वतन पे

जो शहीद हुए हैं वतन पे

—विनय कुमार विनायकजो शहीद हुए हैं वतन पेउन्होंने ऐसे वतन को रख छोड़ा हैजो अभिमान है सबके! जो शहीद हुए हैं वतन पेउन्होंने ऐसे पिता…

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कविता जीवन में आशा निराशा

जीवन में आशा निराशा

लाओ न निराशा जीवन में,आशा का तुम संचार करो।निराशा कर देती जीवन नष्ट,इसका तुम बहिष्कार करो।। आशा ही तो एक जीवन है,निराशा तो अंधकार लाती…

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कविता राजगृह का राजवैद्य जीवक

राजगृह का राजवैद्य जीवक

—विनय कुमार विनायकमगधराज बिम्बिसार की अभिषिक्त,शालवती थी नगर वधू राजगृह की!राजतंत्र की देवदासी सी एक कुरीति,वैशाली की गणिका आम्रपाली जैसी!किन्तु गणिका नहीं राज नर्तकी थी,गणिका…

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पर्व - त्यौहार मांगलिक कार्य आरम्भ होने का दिन है ‘‘देवोत्थान एकादशी’’

मांगलिक कार्य आरम्भ होने का दिन है ‘‘देवोत्थान एकादशी’’

देवोत्थान एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं। दीपावली के ग्यारह दिन बाद आने वाली एकादशी को ही प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी या देव-उठनी एकादशी कहा जाता है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव चार मास के लिए शयन करते हैं। इस बीच हिन्दू धर्म में कोई भी मांगलिक कार्य शादी, विवाह आदि नहीं होते। देव चार महीने शयन करने के बाद कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं। इसीलिए इसे देवोत्थान (देव-उठनी) एकादशी कहा जाता है। देवोत्थान एकादशी तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में भी मनाई जाती है। इस दिन लोग तुलसी और सालिग्राम का विवाह कराते हैं और मांगलिक कार्यों की शुरुआत करते हैं। हिन्दू धर्म में प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी का अपना ही महत्त्व है। इस दिन जो व्यक्ति व्रत करता है उसको दिव्य फल प्राप्त होता है। उत्तर भारत में कुंवारी और विवाहित स्त्रियां एक परम्परा के रूप में कार्तिक मास में स्नान करती हैं। ऐसा करने से भगवान् विष्णु उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। जब कार्तिक मास में देवोत्थान एकादशी आती है, तब कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियाँ शालिग्राम और तुलसी का विवाह रचाती है। पूरे विधि विधान पूर्वक गाजे बाजे के साथ एक सुन्दर मण्डप के नीचे यह कार्य सम्पन्न होता है। विवाह के समय स्त्रियाँ मंगल गीत तथा भजन गाती है। कहा जाता है कि ऐसा करने से भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं और कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं। हिन्दू धर्म के शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दंपत्तियों के संतान नहीं होती, वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। अर्थात जिन लोगों के कन्या नहीं होती उनकी देहरी सूनी रह जाती है। क्योंकि देहरी पर कन्या का विवाह होना अत्यधिक शुभ होता है। इसलिए लोग तुलसी को बेटी मानकर उसका विवाह सालिगराम के साथ करते हैं और अपनी देहरी का सूनापन दूर करते हैं। प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी के दिन भीष्म पंचक व्रत भी शुरू होता है, जो कि देवोत्थान एकादशी से शुरू होकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक चलता है। इसलिए इसे इसे भीष्म पंचक कहा जाता है। कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियाँ या पुरूष बिना आहार के रहकर यह व्रत पूरे विधि विधान से करते हैं। इस व्रत के पीछे मान्यता है कि युधिष्ठर के कहने पर भीष्म पितामह ने पाँच दिनो तक (देवोत्थान एकादशी से लेकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक)  राज धर्म, वर्णधर्म मोक्षधर्म आदि पर उपदेश दिया था। इसकी स्मृति में भगवान् श्रीकृष्ण ने भीष्म पितामह के नाम पर भीष्म पंचक व्रत स्थापित किया था। मान्यता है कि जो लोग इस व्रत को करते हैं वो जीवन भर विविध सुख भोगकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त करते हैं। देवोत्थान एकादशी की कथा एक समय भगवान विष्णु से लक्ष्मी जी ने कहा- हे प्रभु ! अब आप दिन-रात जागा करते हैं…

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विधि-कानून भारतीय संविधान के 71 वर्ष

भारतीय संविधान के 71 वर्ष

संविधान दिवस (26 नवम्बर) पर विशेष– श्वेता गोयलप्रतिवर्ष 26 नवम्बर को देश में संविधान दिवस मनाया जाता है। हालांकि वैसे तो भारतीय संविधान 26 जनवरी…

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धर्म-अध्यात्म सृष्टि बनाकर हमें मनुष्य जन्म एवं सुख आदि देने से ईश्वर उपासनीय है

सृष्टि बनाकर हमें मनुष्य जन्म एवं सुख आदि देने से ईश्वर उपासनीय है

–मनमोहन कुमार आर्य                 हम मनुष्य हैं। हमें यह मनुष्य जन्म परमात्मा ने दिया है। जन्म व मृत्यु के मध्य की हमारी अवस्था जीवात्मा वा…

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