लेख अधिकार से पहले कर्तव्य , अध्याय — 3 , माता पिता के प्रति हम क्यों बने सेवाभावी ?

अधिकार से पहले कर्तव्य , अध्याय — 3 , माता पिता के प्रति हम क्यों बने सेवाभावी ?

  माँ का हमारे जीवन में अति महत्वपूर्ण स्थान है । माँ के बिना हमारे जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती । माँ है…

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राजनीति कोरोना के बहाने आइए अपने असल संकटों पर विचार करें

कोरोना के बहाने आइए अपने असल संकटों पर विचार करें

देश के दुखों की नदी में तैरते सवाल -प्रो. संजय द्विवेदी   कोरोना संकट के बहाने भारत के दुख-दर्द,उसकी जिजीविषा, उसकी शक्ति, संबल, लाचारी, बेबसी,…

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विश्ववार्ता जो मुसलमान इनको कहे वह मेरी नज़रों में इंसान नहीं है

जो मुसलमान इनको कहे वह मेरी नज़रों में इंसान नहीं है

तनवीर जाफ़री  कोरोना वायरस ने पूरे विश्व के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। ख़ास तौर पर पिछले दिनों जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साफ़ शब्दों में चेतावनी दे दी कि संभव है कि कोरोना वायरस संसार से कभी ख़त्म ही ना हो,इसकी भयावहतः और भी पुख़्ता हो गयी।  इस चेतावनी के आते ही विशेषज्ञों ने यह कहना शुरू कर दिया कि पूरी दुनिया में इस महामारी की वजह से मानसिक स्वास्थ का संकट भी पैदा हो जाएगा।  विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानसिक स्वास्थ्य विभाग की एक अन्य रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र को एक और ख़तरनाक संकट को लेकर आगाह किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानसिक स्वास्थ्य विभाग की निदेशक के अनुसार इस समय पूरी दुनिया में छाया अकेलापन, भय, अनिश्चितता तथा आर्थिक रूप से होने वाली उथल-पुथल आदि बातें मनोवैज्ञानिक परेशानी  का सबब बन सकती हैं.उन्होंने आगाह किया कि बच्चों, युवाओं यहां तक की स्वास्थ्य कर्मियों में भी मानसिक कमज़ोरी पाई जा सकती है। गोया मानव के समक्ष एक ऐसा प्रलय रुपी संकट आ चुका है कि बड़े से बड़े वैज्ञानिक,रणनीतिकार,शासक,प्रशास अफ़लातून सभी फ़िलहाल असहाय बने हुए है। स्वयंभू भगवान व उनके ईश्वर-अल्लाह के स्वयंभू एजेंट अपनी जानें बचाते  फिर रहे हैं। बड़े बड़े ‘धर्मउद्योग ‘ ठप्प पड़े हुए हैं। इसी बीच महामारी की इस घड़ी में सड़कों पर इंसानियत का एक ऐसा जज़्बा उमड़ता दिखाई दे रहा है जो पहले कभी नहीं देखा गया। ग़रीब- अमीर हर शख़्स अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक दूसरे की मदद करता नज़र आ रहा है। कोरोना से प्रभावित लगभग सभी देशों में सामुदायिक भोजनालय चल रहे हैं। जगह जगह रक्तदान शिविर लगाकर बीमारों को स्वस्थ करने के प्रयास किये जा रहे हैं। प्रकृतिक क़हर के इस संकट में दुनिया धर्म जाति के भेद भुला कर इंसानियत का प्रदर्शन कर रही है और ईश्वर-अल्लाह से पनाह मांग रही है। परन्तु ठीक इसके विपरीत कुछ शक्तियां ऐसी भी हैं जिन्होंने राक्षस या शैतान होते हुए भी दुर्भाग्यवश मानव का केचुल ओढ़ रखा है।  ये स्वयं को अल्लाह वाले और मुसलमान भी बताते हैं। इतना ही नहीं बल्कि सिर्फ़ अपनी विचारधारा को ही इस्लामी विचारधारा बताते हैं। शरीया का स्वयंभू रूप से ठेका भी इन्हीं राक्षसों ने लिया हुआ है। वैसे तो कभी तालिबान तो कभी अलक़ायदा तो कभी आई एस व इन जैसे कई चरमपंथी संगठनों ने बर्बरता के कई ऐसे अध्याय लिखे हैं जिनसे मानवता कांपती रही है। परन्तु गत 12 मई मंगलवार को अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी क़ाबुल में चरमपंथियों द्वारा बर्बरता की वह भयानक इबारत लिखी गयी जिसे युद्ध अपराध का दर्जा देना भी पर्याप्त नहीं। रमज़ान के पवित्र महीने में इन दरिंदों ने काबुल के एक मैटरनिटी हॉस्पिटल पर ऐसा हमला किया जिसमें  24 लोगों की जानें चली गयीं । मरने वालों में ज़्यादातर नवजात बच्चे प्रसूता माताएं और अस्पताल की डॉक्टर व नर्सों समेत कई अन्य लोग शामिल हैं। जिस समय ये राक्षस इन निहत्थे बेगुनाहों पर गोलीबारी कर रहे थे ठीक उसी समय एक मां अपने बच्चे को जन्म दे रही थी। उस मां की मनोस्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जिनके नवजात बच्चे इस दुनिया में साँस लेते ही चरमपंथियों की गोलियों का शिकार होकर चिथड़े चिथड़े हो गए उनपर क्या बीती होगी ?                                                                           इसके पहले भी यह निर्दयी विचारधारा स्कूलों अस्पतालों पर हमले चुकी है। पढाई लिखाई,आत्मनिर्भरता,जागरूकता,जैसी बातें तो इन धर्मांधों को तो रास  आतीं। मस्जिदों में नमाज़ियों व दरगाहों व धार्मिक जुलूसों में अक़ीदतमंदों पर हमले करना तो मानो इनकी फ़ितरत में शामिल हो चुका है। कुछ समय तक इन ख़बीसों की अफ़ग़ानिस्तान में हुकूमत का वह दौर पूरी दुनिया ने देखा है जब यह इंसानी दुशमन मनमाने तरीक़े से लोगों को सार्वजनिक रूप से सज़ाएं देकर समाज में दहशत का माहौल पैदा करते थे।आज अफ़ग़ानिस्तान सहित कई जगहों पर इन चरमपंथियों के चलते आम नागरिकों को जिन हालात का सामना करना पड़ रहा है वह बेहद चिंतनीय है। पूरे उदारवादी मुस्लिम जगत को किसी भी दशा में इनका न केवल मुक़ाबला करना होगा बल्कि इनके संरक्षकों,इनके स्रोतों व इनके हमदर्दों सभी को बेनक़ाब करना होगा। मैटरनिटी हॉस्पिटल पर हमला कर महिलाओं और नवजात बच्चों का क़त्ल करना इससे निर्दयी व दुखदायी घटना और क्या हो सकती है? कौन सा धर्म किस धर्म का अल्लाह या ईश्वर कौन सा धर्मग्रन्थ उन बच्चों की हत्या को सही ठहरा सकता है कि जो मासूम हैं और जिन्होंने अभी अपने जीवन की चंद साँसें ही ली हैं ?                                                                                     आज इन्हीं कमबख़्तों की वजह से इस्लाम से जन्मज़ात नफ़रत करने वाले लोग इस्लाम का मज़ाक़ ऐसी ही घटनाओं का हवाला देकर यही कहकर उड़ाते हैं कि क्या यही  है ‘ शांति और अमन का मज़हब’? इन सपोलों ने यह भी नहीं सोचा कि एक तो यह रमज़ान का पवित्र महीना था दूसरे हमले का दिन हज़रत अली की शहादत का दिन था।हज़रत अली को तो ये राक्षस अपना चौथा ख़लीफ़ा मानते हैं। कम से कम हमले के दिन हज़रत अली की शहादत और उनके चरित्र को ही याद कर लेते? हज़रत अली के सामने जब उनके हत्यारे को पेश किया गया था तो उन्होंने अपने बेटे से कहा कि था ‘कि यह प्यासा है,इसे पानी पिलाओ’। इस्लामी महापुरुषों के जीवन की कोई कारगुज़ारी ऐसे हमलों को जाएज़ नहीं ठहरा सकती। यह नीतियां साफ़ तौर से हज़रत अली के हत्यारे इब्ने मुल्जिम व करबला के बदकिरदार यज़ीद से प्रेरित नज़र आती हैं ।क्योंकि वे सभी नमाज़ी भी थे,ला इलाह के झंडाबरदार भी थे और कलमागो भी थे। आज ख़ून की होलियां खेलने वाले ये राक्षस भी उन्हीं का अनुसरण करते दिखाई दे रहे हैं। बेशक यह भी अपने को मुसलमान भी कहते हैं,और शरिया की बातें भी करते हैं। परन्तु दरअसल ये शक्तियां यज़ीद की ही तरह दहशत का साम्राज्य स्थापित करना चाहती हैं। अफ़ीम की कमाई से हथियार ख़रीद कर अपने द्वारा परिभाषित इस्लाम धर्म का ताक़त के बल पर विस्तार करना चाहती हैं। संभव है इनकी मानसिकता की श्रेणी के कुछ लोग इनको मुसलमान कहते या समझते हों  परन्तु मेरी लिए  इनको मुसलमान क्या कहना बल्कि -‘जो मुसलमान इनको कहे वह,मेरी नज़रों में इंसान नहीं है। तनवीर जाफ़री

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कविता है ! मानुष मन में जरा धीरज धरे।

है ! मानुष मन में जरा धीरज धरे।

है ! मानुष मन में जरा धीरज धरे।ये कोरोना आया है,एक दिन जरूर टरे।।जो आवत है वो जावत है,ये प्रकृति नियम न टरे।जो जन्मा है…

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खान-पान तामसिक भोजन व मांसाहार करने वाला मनुष्य ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता

तामसिक भोजन व मांसाहार करने वाला मनुष्य ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता

–मनमोहन कुमार आर्य                हम और हमारा यह संसार परमात्मा के बनाये हुए हैं। संसार में जितने भी प्राणी हैं वह सब भी परमेश्वर ने…

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धर्म-अध्यात्म धार्मिक एवं सामाजिक साहित्य में सत्यार्थप्रकाश का अग्रणीय स्थान

धार्मिक एवं सामाजिक साहित्य में सत्यार्थप्रकाश का अग्रणीय स्थान

–मनमोहन कुमार आर्य                संसार में धर्म व नैतिकता विषयक अनेक ग्रन्थ हैं जिनका अपना-अपना महत्व है। इन सब ग्रन्थों की रचना व परम्परा का…

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कविता माँ तेरी स्वच्छंद गोद में, स्वर्ग सुख पाया है।

माँ तेरी स्वच्छंद गोद में, स्वर्ग सुख पाया है।

माँ तेरी स्वच्छंद गोद में जो स्वर्ग सुख पाया है।कृपा वितान तले तेरे, हो निश्चिन्त गान गाया है ।उसका कोई मोल करे क्या? करे तो,…

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समाज गांव से शहरो की ओर पलायन जिम्मेदार कौन

गांव से शहरो की ओर पलायन जिम्मेदार कौन

भारत गाँवों का देश है। भारत की अधिकतम जनता गाँवों में निवास करती हैं। महात्मा गाँधी जी कहते थे कि वास्तविक भारका दर्शन गाँवों में…

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व्यंग्य ‘आत्मनिर्भरता’ का फ्लेवर और कलेवर !

‘आत्मनिर्भरता’ का फ्लेवर और कलेवर !

                        प्रभुनाथ शुक्ल  ‘आत्मनिर्भरता’ यानी स्वावलंबन जीवन में बेहद आवश्यक है। लेकिन आजकल बगैर…

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राजनीति दुनियां अपनाएगी मोदी रंग

दुनियां अपनाएगी मोदी रंग

लॉकडाउन का चौथा चरण पूरी तरह नए रंग रूप और नए नियमों वाला होगा। राज्यों से मिल रहे सुझावों के आधार पर लॉकडाउन 4 के…

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विश्ववार्ता बारूद के ढेर पर बैठी है दुनिया : कोई भी एक चिंगारी विश्वयुद्ध भड़का सकती है

बारूद के ढेर पर बैठी है दुनिया : कोई भी एक चिंगारी विश्वयुद्ध भड़का सकती है

दुनिया की शक्ति कहे जाने वाले देश जिस प्रकार इस समय परस्पर भिड़ने की तैयारियों में लगे हुए हैं उससे लगता है कि दुनिया तीसरे…

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धर्म-अध्यात्म ऋषि दयानन्द ने विश्व को सद्धर्म और उसके लाभों से परिचित कराया

ऋषि दयानन्द ने विश्व को सद्धर्म और उसके लाभों से परिचित कराया

–मनमोहन कुमार आर्य                महर्षि दयानन्द (1825-1883) ने देश में वैदिक धर्म के सत्यस्वरूप को प्रस्तुत कर उसका प्रचार किया था। उनके समय में धर्म…

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