रामनाथ कोविंद

कोविंद अगर गुमनाम हैं, तो जिम्मेदार कौन है?

अब हम सब जान चुके हैं कि रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल हैं। दो बार के राज्यसभा सांसद रह चुके कोविंद पहले उच्चतम न्यायालय में वकालत करते थे और पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के सहयोगी रह चुके हैं। वह पहले आईआईएम कोलकाता के बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। आजकल वो अखिल भारतीय कोली समाज के अध्यक्ष भी हैं, जिसके अपने सरोकार होते हैं जो मीडिया-सोशल मीडिया के लोगों को ज्यादातर नहीं दिखते या वो देखना नहीं चाहते। यहां सवाल यह उठता है कि इतना सक्रिय राजनीतिक और सामाजिक जीवन होने के बावजूद वो हमें दिखाई क्यों नहीं दिए या ऐसे कहें कि हमारी मीडिया ने उन्हें क्यों नहीं दिखाया?

भाजपाई सोशल इंजीनियरिंग के शिल्प: कोविंद

भारत में राष्ट्रपति चुनावों में प्रत्याशियों के चयन का बेहद उजला व प्रतिष्ठाजनक इतिहास रहा है तो वहीँ दूसरी ओर ग्यानी जैलसिंह व प्रतिभा पाटिल जैसे नाम भी रहें हैं जिन्होनें राष्ट्रपति भवन की गरिमा को दीर्घकालीन चोटिल किया है. ज्ञानी जैलसिंह सिंह ने तो सार्वजनिक रूप से कह दिया था कि मैं सार्वजनिक रूप से इंदिरा गांधी की चप्पलें भी उठा सकता हूँ. ठीक इसी भातिं प्रतिभा ताई पाटिल की सबसे बड़ी योग्यता “गांधी परिवार की वफादारी” मात्र ही थी.

राष्ट्रपति चुनावः पसोपेश में विपक्ष

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद इस फैसले को इकतरफा मानकर चल रहे है। ऐसी ही राय सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी की है। दरअसल देरी से उम्मीदवारी की घोषणा करना भाजपा की रणनीति का हिस्सा है, ताकि अंतिम दिनों में विपक्ष अपना प्रत्याशी चुनने की हड़बड़ी में कमजोर प्रत्याशी उतार दें। इसीलिए जब राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू ने सोनिया गांधी और येचुरी से राष्ट्रपति चुनाव पर आम सहमति बनाने की कवायद की थी, तब किसी नाम पर कोई चर्चा नहीं हुई थी। इसलिए आम सहमति विपक्ष को भ्रम में रखने की महज एक रस्म-अदायगी थी।