समाजवादी पार्टी

समाजवादी पार्टी में भाई-भाई का विरासत संघर्ष

मार्च सन् 2012 में मुख्यमंत्री बनने पर अखिलेश यादव शुरू में साधना गुप्ता को कतई घास नहीं डालते थे। इससे मुलायम नाराज़ हो गए और अखिलेश को झुकना पड़ा। इस तरह साधना गुप्ता ने मुलायम के ज़रिए मुख्यमंत्री पर शिकंजा कस दिया और अपने चहेते अफ़सरों को मन पसंद पोस्टिंग दिलाने लगीं। ‘द संडे गार्डियन’ ने सितंबर 2012 में साधना गुप्ता की सिफारिश पर मलाईदार पोस्टिंग पाने वाले अधिकारियों की पूरी फेहरिस्त छाप दी, तब साधना गुप्ता पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आईं।

समाजवादी पार्टी अपने इस संकट के लिए अभिशप्त है

अनुभवी मुलायम सिंह यादव इस बात को समझते हैं कि अगला विधानसभा चुनाव अखिलेश के चेहरे के सहारे ही लड़ा जा सकता है लेकिन उन्हें यह भी पता है कि अकेले यही काफी नहीं होगा. इसके लिए शिवपाल की सांगठनिक पकड़ और अमर सिंह के “नेटवर्क” की जरूरत भी पड़ेगी. इसलिये चुनाव से ठीक पहले मुलायम का पूरा जोर बैलेंस बनाने पर है. लेकिन संकट इससे कहीं बड़ा है और बात चुनाव में हार-जीत के गुणा-भाग से आगे बढ़ चुकी है. अब मामला पार्टी और इसके संभावित वारिसों के आस्तित्व का बन चूका है.

नेताजी के कुनबे में राजनीतिक भूचाल?

चाचा-भतीजे की लड़ाई में विपछी पार्टियां खूल चुटकियां ले रही हैं वहीं कुछ दिन पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि मुलायम सिंह अपने कुनबे को तो सभाल नहीं पा रहे हैं तो यूपी क्या सभालेंगे। वे यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा कि पैर उतने ही पसारने चाहिए कि जितनी बड़ी चादर हो वरना ढंड लग जाएगी।

सपाः ‘बेटाजी’ जी सामने बौने पड़े नेताजी

पार्टी के भीतर की इस रस्साकसी से सबसे अधिक भ्रम में पार्टी के छोटे नेता ओर कार्यकर्ता हैं। उनके लिए तय करना मुश्किल हो रहा है कि वह किस पाले में बैठें। कल तक भले ही सपा में मुलायम की ही चलती रहती हो,लेकिन अब ऐसा नही है। इस समय सपा की सियासत कई कोणों में बंटी हुई नजर आ रही है। जानकारों का कहना है कि कुनबे की रार का मुकम्मल रास्ता न निकलते देख अखिलेश ने आगे बढ़ने का फैसला किया है,जो समय के हिसाब से लाजिमी भी है। अब इसमें वह कितना आगे जायेंगे यह देखने वाली बात होगी।