समान नागरिक संहिता

विश्व भर के मुस्लिमों को राह दिखाएगा भारतीय मुस्लिम

हाल ही में जब कोर्ट ने केंद्र से तीन तलाक के विषय में कोर्ट में हलफनामा प्रस्तुत करनें के लिए कहा तब नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछली सरकारों की तरह इस मुद्दें पर कन्नी काटने व चुप बैठे रहनें के स्थान पर संविधान की धारा 44 के मर्म को समझ कर अपनी जिम्मेदारी निभाई व तीन तलाक के मुद्दे पर स्पष्ट असहमति व्यक्त कर दी है. 1840 में यह विवाद प्रथम बार उभरा था और 1985 में राजीव गांधी सरकार के समय तो शाह बानो प्रकरण से यूनिफार्म सिविल कोड अतीव सुर्ख़ियों में आया था.

“समान नागरिक संहिता” क्यों आवश्यक है…?

“समान नागरिक संहिता” ऐसी होनी चाहिये जिसका मुख्य आधार केवल भारतीय नागरिक होना चाहिये और कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति व सम्प्रदाय का हो सभी को सहज स्वीकार हो। जबकी विडम्बना यह है कि एक समान कानून की मांग को साम्प्रदायिकता का चोला पहना कर हिन्दू कानूनों को अल्पसंख्यकों पर थोपने के रुप में प्रस्तुत किया जाने का कुप्रचार किया जा रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1947 में हुए धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी हम आज लगभग 70 वर्ष बाद भी उस विभाजनकारी व समाजघाती सोच को समाप्त न कर सकें बल्कि उन समस्त कारणों को अल्पसंख्यकवाद के मोह में फंस कर प्रोत्साहित ही करते आ रहे है। हमारे मौलिक व संवैधानिक अधिकारो व साथ में पर्सनल लॉ की मान्यताए कई बार विषम परिस्थितियां खड़ी कर देती है , तभी तो उच्चतम न्यायालय “समान नागरिक संहिता” बनाने के लिए सरकार से बार-बार आग्रह कर रहा है।

गाँव, गरीब और किसानों के लिए संकल्पबद्ध योगी सरकार

प्रदेश सरकार बनने के बाद सबसे बड़ा बदलाव यह दिखलायी पड़ रहा है कि अब प्रदेश के अफसरों को सुबह साढ़े नौ बजे तक कार्यालय में आ ही जाना होगा। मंत्रियों के अचानक निरीक्षणों के दौरान प्रदेश के कई सरकारी कार्यालयों में अनपुस्थित व देर से आने वाले अफसरों व कर्मचारियों के वेतन काटे जाने व नोटिस जारी करने का अभियान चल रहा हैं जिसकी गूंज दूर तक सूनायी पड़ रही है। सरकार ने एक बड़ा बदलाव करते हुूए बायोमैट्रिक हाजिरी व्यस्था भी लागू कर दी है। सरकार ने सबसे बड़ा कदम यह उठाया है कि किसी भी योजना का नाम समाजवादी नहीं रहेगा।

तीन तलाक,समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार

मुस्लिम महिलाओं की तरफ से समान नागरिक संहिता नहीं बल्कि एकतरफा तीन तलाक़, हलाला व बहुविवाह के खिलाफ आवाज उठायी जा रही है उनकी मांग है कि इन प्रथाओं पर रोक लगाया जाए और उन्हें भी खुला का हक मिले.