कविता साहित्य आज का अखबार पढ़ लो July 14, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment आजका ख़बार पढ़ लो खून से लथपथ पड़ा है, शाम को समाचार सुन लो बयानबाज़ी से पटा है ज़रा ज़रा सी बात पर किसीने किसी को डसा है, हर वारदात के पीछे कोई नकोई दल घुसा है। छुरा घोंपा गोलीमारी, रोज़ का किस्सा हुआ है गाय भैसों की रक्षा मे आदमी की जान लेलो ये […] Read more » आज का अखबार पढ़ लो
कविता साहित्य मेरी बेटी July 11, 2017 by राकेश कुमार पटेल | Leave a Comment खुशबू है मेरी आंगन की जो सारे घर को महकाती है। लोरी है मेरी दामन की जो खुद को और मुझे सुलाती है। कोयल है एक डाली की जो सारे बाग को चहकाती है कली है एक फुल की जो बेरंग दुनिया में रंग भर जाती है। एक बुंद है सागर की जो मेरी प्यास […] Read more » मेरी बेटी
कविता साहित्य कैक्टस July 9, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment असीमित कैक्टस कैक्टस ही कैक्टस, गोलाकार कैक्टस ऊँचा लम्बा कैक्टस फूलवाला कैक्टस, कम पानी में जीता कैक्टस रेगिस्तान की शान कैक्टस रेत की हरियाली कैक्टस मूलभूमि उतरी अमरीका का कैक्टस विश्व व्यापी कैक्टस, मूलभूमि दक्षिणी अमरीका का कैक्टस पूर्व तक पंहुचा कैसे न कैसे कैक्टस आदर न सत्कार पानेवाला कैक्टस घर के अन्दर न लाया […] Read more » कैक्टस
कविता साहित्य एक गाँव है मेरा | July 6, 2017 / July 10, 2017 by राकेश कुमार पटेल | Leave a Comment एक गाँव है मेरा | ( किसी की यादें ) एक गाँव है मेरा जहाँ शाम है , और है सबेरा जहाँ ठंडी हवाओ में उड़ती होंगी तितलियाँ यादों की स्वर में गूंजता होगा घर आंगन मेरा एक गाँव है मेरा जहाँ शाम है और है सबेरा गाँव में लगें मेले होंगे मिठाईयां और होंगे […] Read more » एक गाँव है मेरा
कविता साहित्य है नाट्यशाला विश्व यह ! June 18, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment है नाट्यशाला विश्व यह, अभिनय अनेकों चल रहे; हैं जीव कितने पल रहे, औ मंच कितने सज रहे ! रंग रूप मन कितने विलग, नाटक जुटे खट-पट किए; पट बदलते नट नाचते, रुख़ नियन्ता लख बदलते ! उर भाँपते सुर काँपते, संसार सागर सरकते; निशि दिवस कर्मों में रसे, रचना के रस में हैं लसे […] Read more » नाटक नियन्ता के अनंत ! हैं कीट कितने विचरते ! है नाट्यशाला विश्व यह !
कविता साहित्य मैं आज तेरा नाम लिख लूँ June 16, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment प्रेम के इक गीत पर मैं आज तेरा नाम लिख लूँ पंछियों की चहक मीठी शहद जैसे मन में घोले कोकिला की मृदु कुहुक पर आज तेरा नाम लिख लूँ रंग हर ऋतु का अलग है ढंग भी उसका नया है धूप के हर क़तरे पर मैं आज तेरा नाम लिख लूं […] Read more » मैं आज तेरा नाम लिख लूँ
कविता साहित्य क्योंकि मोबाइल है… June 16, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment घड़ी पहनने की आदत छूट गई, पहले पैन साथ लेके चलते थे वो आदत भी छूट गई अब तो क्योंकि मोबाइल है……,, कैमरे की भी ज़रूरत नहीं है अब, पहले वीडियो बनाना मुश्किल था, अब स्टिंग इतने होते हैं क्योंकि मोबाइल है…………. पहले कैसेट सी डी से गाने सुनतेथे साथ बैठकर रेडियो भी सुनते थे […] Read more » क्योंकि मोबाइल है...
कविता साहित्य सोने नहीं देते…… June 15, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment कभी कभी कुछ शब्द, सोने नहीं देते…… जब तक उन्हे किसी कविता का आकार न दे दूँ। कभी कभी कोई धुन, सोने नहीं देती….. जब तक उसमे शब्द पिरोकर, गीत का कोई रूप न दे दूँ। कभी कभी कोई विचार सोने नहीं देते….. जब तक विचारों को संजोकर आलेख का आकार न […] Read more » sleeplessness कुछ शब्द सोने नहीं देते
कविता साहित्य आदमी June 13, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment हज़ारों की भीड़ में भी, अकेला है आदमी! आदमी ही आदमी को, नहीं मानता आदमी! संवेदनायें खो गईं, चोरी क़त्ल बढ़ गये, कोई भी दुष्कर्म करते, डरता नहीं अब आदमी। भगवान ऊपर बैठकर ये सोचता होगा कभी, ऐसा नहीं बनाया था मैने क्या बन गया है आदमी! स्वार्थ की इंतहा हुई , भूल गया दोस्ती […] Read more » आदमी
कविता तोहफे June 13, 2017 / June 13, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मै नहीं कोई ताल तलैया ना ही मैं सागर हूँ। मीठे पानी की झील भी नहीं, मैं बहती सरिता हूँ। सरल नहीं रास्ते मेरे चट्टनों को काटा है। ऊपर से नीचे आने.में झरने कई बनाये मैने इन झरनों के गिरने पर प्रकृति भी मुस्काई है पर मेरी इक इक बूँद ने यहाँ हर पल चोट […] Read more » तोहफे
कविता ये ज़रूरी तो नहीं June 8, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मैं ख़ुद से ही रूठी रहती हूँ, कोई मनाये मुझको आकर, ये ज़रूरी तो नहीं, मैं ख़ुद को ही मना लेती हूँ। कुछ भी लिखूं या करूँ मैं जब अपनी प्रशंसा भी कर लेती हूँ , कोई और भी मेरा प्रशंसक हो, ये ज़रूरी तो नहीं………… जो भी काम पूरा कर लेती हूँ, […] Read more » ये ज़रूरी तो नहीं
कविता साहित्य एक क़दम तुम बढ़ाओ…… June 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment एक क़दम तुम बढ़ाओ, दो हम बढ़ायेंगे। फ़ासले जो दरमियां हैं, दूर होते जायेंगे। दूरियाँ मन की नहीं थीं, विचारों के द्वन्द थे, आओ बैठो, बातें करो,मसले सब सुलझ जायेंगे। वक़्त मिलता ही नहीं…,…… कहने से उलझने बढ़ जायेंगी। वक़्त को वक़्त से चुराकर, कुछ वक़्त तो देना पड़ेगा। एक छोर तुम पकड़ना, मैं हर […] Read more » एक क़दम तुम बढ़ाओ