कविता साहित्य ज्वालामुखी October 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment हर आदमी आज यहाँ, ज्वालामुखी बन चुका है। क्रोध कुंठा ईर्ष्या की आग भीतर ही भीतर सुलग रही है। कोई फटने को तैयार बैठा हैं, कोई आग को दबाये बैठा है, किसी के मन की भीतरी परत में, चिंगारियां लग चुकी हैं। कोई ज्वालामुखी सुप्त है, कोई कब फट पड़े कोई नहीं जानता। समाज की विद्रूपताओं का सामना करने वाले या उनको बदलने वाले अब नहीं रहे क्योंकि सब जल रहे हैं भीतर से और बाहर से. क्योंकि वो ज्वालामुखी बन चुके हैं। ज्वालामुखी का पूरा समूह फटता है , तो कई निर्दोष मरते है, जब बम फटते है, नाइन इलैवन या ट्वैनटी सिक्स इलैवन होता है। किसी बड़े ज्वालामुखी के फटने से प्रद्युम्न मरते है या निर्भया, गुड़िया,या किसी मीना की इज्जत पर डाके पड़ते है, फिर हाल बेहाल, वो कही सड़क पर कहीं फेंक चलते है। कभी कार मे छोटी सी खरोंच आनेपर चाकू छुरी या देसी कट्टे चलतेहैं क्योंकि वो आदमी नहीं है ज्वालामुखी बन चुके हैं क्रोध कहीं से लिया और कहीं दाग़ दिया क्रोध कुँठा से ही ज्वालामुख बनते हैं औरों के साथ ख़ुद के लियें भी ,ख़तरा बनते हैं। कुछ ज्वालामुखी भीतर ही भीतर धदकते है ये भड़कर फटते भी नहीं हैं, अपनी ही जान लेते हैं। कोई गरीबी में जलता है, कोई प्रेम त्रिकोण में फंसता है कोई परीक्षा में असफल है, कोई उपेक्षित महसूस करता है या फिर अवसाद रोग से जलता रहा है कुछ कह नहीं रहा…,.,……. किसी की प्रेमिका ने किसी और के संग करली है सगाई……….. ये सब ज्वालामुखी धधक रहे हैं शायद ही किसी की आग कोई बुझा सके तो अच्छा हो, वरना ये ज्वालामुखी, अन्दर ही फटते है कोई पंखे पे लटक गया कोई नवीं, मंजिल से कूदा है इन ज्वालामुखियों के फटने से रोज खून इतना बहता है कि अखबार के चार पन्ने लाल होते हैं यहाँ हर आदमी ज्वालामुखी बन चुका है अब, हम जी तो रह है, पर डर के साये में, कौन कब फटे बस यही किसी को नहीं पता! Read more » Featured ज्वालामुखी
कविता साहित्य तुम्हारी हर ख्वाहिशें October 5, 2017 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment अर्पण जैन ‘अविचल’ हर ख्वाब तेरे सिरहाने रख दुँ, जैसे चांद के पास सारी चांदनी बिखरते हुए अशकार समेट लूं, जैसे शायरी से मिलकर बनती है गजल कुछ खिलौनों-सी जिद है जिन्दगी, जैसे बचपन की गुड़िया की रसोई फर्श पर फिसलते मेरे इश्तेहार जैसे स्याही के बिखरने से बिगड़ता कागज […] Read more » तुम्हारी हर ख्वाहिशें
कविता साहित्य भारत के वे “लाल” यशस्वी,सचमुच बड़े “बहादुर” थे । September 28, 2017 by शकुन्तला बहादुर | 4 Comments on भारत के वे “लाल” यशस्वी,सचमुच बड़े “बहादुर” थे । भारत के यशस्वी पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री जी को * सादर समर्पित श्रद्धा-सुमन ********* भारत के वे “लाल” यशस्वी,सचमुच बड़े “बहादुर” थे । क़द छोटा, इंसान बड़े थे , देश-प्रेम हित आतुर थे ।। पले अभावों में थे लेकिन,मन से बड़े उदारमना । कर्त्तव्यों में निष्ठा थी,निज कष्टों को नहीं गिना ।। काशी विद्यापीठ […] Read more » सादर समर्पित श्रद्धा-सुमन स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री जी
कविता साहित्य कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ ! September 18, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ, कुहक ले चल पड़ो कृष्ण चाहे; कृपा पा जाओगे राह आए, कुटिल भागेंगे भक्ति रस पाए ! भयंकर रूप जो रहे छाए, भाग वे जाएँगे वक़्त आए; छटेंगे बादलों की भाँति गगन, आँधियाँ ज्यों ही विश्व प्रभु लाएँ ! देखलो क्या रहा था उनके मन, जान लो कहाँ […] Read more » कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ !
कविता हरसिंगार September 17, 2017 / September 18, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment हरसिंगार की ख़ुशबू कितनी ही निराली हो चाहें रात खिले और सुबह झड़ गये बस इतनी ज़िन्दगानी है। जीवन छोटा सा हो या हो लम्बा, ये बात ज़रा बेमानी है, ख़ुशबू बिखेर कर चले गये या घुट घुट के जीलें चाहें जितना। जो देकर ही कुछ चले गये उनकी ही बनती कहानी है। प्राजक्ता कहलो या पारितोष कहो केसरिया डंडी श्वेत फूल की चादर बिछी पेड़ के नीचे वर्षा रितु कीबिदाई है शरद रितु की अगवानी है। अब शाम सुबह सुहानी हैं। Read more » हरसिंगार
कविता मैं भी तो आगे बढ़ नहीं पायी September 17, 2017 / September 18, 2017 by अनुप्रिया अंशुमान | 5 Comments on मैं भी तो आगे बढ़ नहीं पायी जब गुजरती हूँ उन राहों से, मेरी तेज धड़कने आज भी तेरे होने का एहसास करा जाती है । जब गुज़रती हूँ उन गलियों से, मेरे खामोश कदमों से भी आहट तुम्हारी आती है । देखो… देखो …. उन सीढ़ियों पर बैठकर, तुम आज भी मेरा हाथ थाम लेते हो; देखो …. […] Read more » आगे बढ़ नहीं पायी
कविता साहित्य जिन आँखों के तारे थे हम उन आँखों में पानी है ! September 8, 2017 by राकेश कुमार सिंह | Leave a Comment जिन आँखों के तारे थे हम उन आँखों में पानी है ! सुलगते हुये रिस्तो की सच्ची यही कहानी है ! जरा सी चोट लगी जब हमको माँ कितना रोई थी ! सूखे में हमें सुलाया खुद गीले में सोई थी ! ऐसी माँ की क़द्र ना करना क्या बात नहीं बेईमानी है ! सुबह […] Read more » आँखों के तारे
कविता सुरमई शाम ढल रही है September 7, 2017 by राकेश कुमार सिंह | Leave a Comment राकेश कुमार सिंह सुरमई शाम ढल रही है, बेताबियाँ सीने पर, नस्तर चला रही है, आज फिर से उनका, ख्याल आ रहा है ! भोली सूरत, कजरारी आँखे, जुल्फें ऐसी, बादल भी सरमाये, उनकी यादो का, उन मुलाकातों का, प्यारा सरमाया, बेजार कर रहा है ! पहचान वो बर्षो पुराना, रवां हो रहा है, ख्यालो […] Read more » शाम
कविता अक्सर … September 7, 2017 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment बारिशो के मौसम में ; यूँ ही पानी की तेज बरसाती बौछारों में ; मैं अपना हाथ बढाता हूँ कि तुम थाम लो , पर सिर्फ तुम्हारी यादो की बूंदे ही ; मेरी हथेली पर तेरा नाम लिख जाती है .. ! और फिर गले में कुछ गीला सा अटक जाता है ; जो पिछली बारिश की याद दिलाता है , जो […] Read more » अक्सर
कविता ये नौकर September 6, 2017 / September 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment घर का कोई पुराना नौकर, ईमानदार वफ़ादार सा नौकर, हर व्यक्ति की सेवा करता मुश्किल से मिलता था ये नौकर लैण्ड लाइन सा ना कोई नौकर अब बूढा होकर ये नौकर पड़ा है इक कौने में नौकर कितना सुन्दर था ये नौकर मालिक का सर गर्व से उठता जिसके घर होता ये नौकर। मेज़पर […] Read more » ये नौकर
कविता चल वहां चल …………… September 5, 2017 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment चल वहां चल , किसी एक लम्हे में वक़्त की उँगली को थाम कर !!!! जहाँ नीली नदी खामोश बहती हो जहाँ पर्वत सर झुकाए थमे हुए हो जहाँ चीड़ के ऊंचे पेड़ चुपचाप खड़े हो जहाँ शाम धुन्धलाती न हो जहाँ कुल जहान का मौन हो जहाँ खुदा मौजूद हो , उसका करम हो […] Read more » चल वहां चल ……………
कविता साहित्य खुशिओं के दिन फिर आयेगे August 22, 2017 by राकेश कुमार सिंह | Leave a Comment राकेश कुमार सिंह मुसाफिर चलता जा, कोशिस करता जा, गम के बादल छट जायेगे, खुशिओं के दिन फिर आयेंगे ! मंजिल जब मिल जायेगी ! मेहनत से इतिहास बदल दो, दुनिया का आगाज बदल दो, लहू से अपने सींच धरा को, फिर से अपनी परवाज बदल दो, खुशिओं के दिन फिर आयेगे ! मंजिल जब […] Read more » खुशिओं के दिन फिर आयेगे