कविता ‘आज’ का क्या करूं मै June 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment वो शाम चुलबुली सी रातें खिली खिली सी वक़्त के समंदर में वो वक़्त ही घुल गया है। अब शांत सी शामें हैं, चादर में नहीं हैं सिलवट नींद से रूठा मनाई, यादें आईं नई पुरानी, बचपन की कोई कहानी या जवानी की नादानी, रातों को आंखो में आकर, नीदें चुराने लगी हैं। भविष्य भी […] Read more » ‘आज' का क्या करूं मै
कविता साहित्य मैं मैं हूँ मैं ही रहूँगी June 6, 2017 by बीनू भटनागर | 10 Comments on मैं मैं हूँ मैं ही रहूँगी मै नहीं राधा बनूंगी, मेरी प्रेम कहानी में, किसी और का पति हो, रुक्मिनी की आँख की किरकिरी मैं क्यों बनूंगी मै नहीं राधा बनूँगी। मै सीता नहीं बनूँगी, मै अपनी पवित्रता का, प्रमाणपत्र नहीं दूँगी आग पे नहीं चलूंगी वो क्या मुझे छोड़ देगा मै ही उसे छोड़ दूँगी, मै सीता नहीं बनूँगी। मै […] Read more » मैं मैं हूँ मैं ही रहूँगी
कविता लपक लिए आम June 3, 2017 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment प्रभुदयाल श्रीवास्तव लपकी ने लपक लिए, थैले से आम। अम्मा से बोली है, आठ आम लूँगी मैं। भैया को दीदी को, एक नहीं दूँगी मैं। जो भी हो फिर चाहे, इसका अंजाम। न जाने किसने कल ,बीस आम खाये थे। अम्मा ने दिन में जो, फ्रिज में रखवाए थे। शक के घेरे में था, मेरा […] Read more » लपक लिए आम
कविता साहित्य वीरवार बाज़ार May 25, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment महानगरों में भी लगता है, हफ्ते का हाट, मौलों की चकाचौंध और एयर कंडीशन्ड बड़े बडे शो रूमों नये से नये रैस्टोरैंट के बीच ज़िन्दा है अभी भी हफ्ते का हाट! हमारा वीर बाजार! यहाँ सब कुछ मिलता है…. सब्ज़ी फल के लियें लोग यहाँ आते है बड़ी बड़ी गाड़ियों वाले भी भर के ले […] Read more » वीरवार बाज़ार
कविता बाल्कनी May 25, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment महानगरों में, ऊँची उँची इमारते, यहाँ कोई पिछवाड़ा नहीं, ना कोई सामने का दरवाज़ा, इमारत के चारों तरफ़ , बाल्कनी का नज़ारा, धुले हुए कपड़े……… बाल्कनी में लहराते सूखते, कभी झाड़न पोछन सूखते, कभी कालीन या रजाई को धूप मिलती, घर के फालतू सामान को पनाह देती है ये बाल्कनी, घर का अहम हिस्सा है […] Read more » बाल्कनी
कविता साहित्य मेरा एकालाप May 15, 2017 by आशुतोष माधव | Leave a Comment बोल उठी तब त्रिपुरसुंदरी तू डूबे क्यों,क्यों पार तरे? तेरे समस्त गान, रुदन औ' हास ऊँ नमो मणिपद्मे हुं का पाठ तेरा प्रचलन मेरी प्रदक्षिणा तेरा कुछ भी मेरा सबकुछ ओ मेरे प्यारे अबोध शिशु गोद भरे,तू मुझमें नित-नूतन मोद भरे। Read more » Featured चन्द्रमा देवदारु हिमालय
कविता साहित्य रेलवे स्टेशन पर: बारिश की एक शाम May 15, 2017 by आशुतोष माधव | Leave a Comment आशुतोष माधव भीग-भीग कर सड़ता एक पीला उदास स्टेशन. जर्जर सराय सा, हाँफ-हाँफकर पहुँचते जाने कितने कलावंत गर्जन तर्जन लोहित देह; कुछ श्रीमंत केवल छूकर कर जाते छि:, चलन ऐसा मानो मैनाक को धन्य कर रहे हों हनुमान. यह प्रौढ़ा चिर-सधवा पीली देह उदास तार तार उतारती रहती पार-पार नाविक तरणी पतवार मँझधार शहरी गँवार […] Read more » बारिश की एक शाम
कविता साहित्य सुकमा और कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि April 30, 2017 by हेमंत कुमावत 'हेमू ' | 2 Comments on सुकमा और कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि व्यथित है मेरी भारत माँ, कैसे छंद प्यार के गाऊँ कैसे मैं श्रृंगार लिखुँ, कैसे तुमको आज हँसाऊ कलम हुई आक्रोशित, शोणित आखर ही लिख पाऊँ वीर शहीदों की शहादत को , शत शत शीश झुकाऊँ सिंदूर उजड़ गया माथे का, कंगना चूर चूर टूटे शहीद की विधवा के, पायल बिंदिया काजल छूटे हृदय […] Read more » कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि सुकमा और कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि सुकमा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि
कविता साहित्य किलकि चहकि खिलत जात ! April 27, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment किलकि चहकि खिलत जात ! किलकि चहकि खिलत जात, हर डालन कलिका; बागन में फागुन में, पुलक देत कहका ! केका कूँ टेरि चलत, कलरव सुनि मन चाहत; मौन रहन ना चहवत, सैनन सब थिरकावत ! चेतन जब ह्वै जावत, उर पाँखुड़ि खुलि पावत; अन्दर ना रहि पावत, बाहर झाँकन चाहत ! मोहत मोहिनी होवत, […] Read more » किलकि चहकि खिलत जात
कविता साहित्य आज मेरे देश की ज़मीं जी भर के रोई है, April 26, 2017 / April 26, 2017 by हिमांशु तिवारी आत्मीय | Leave a Comment हिमांशु तिवारी आत्मीय अपने लाल की फिक्र में वो न रात सोई है, हौले से उठाती है वो अपना आंचल, सूखे हुए आंसुओं से भी तलाश लेती है हर दर्द उसका, वो उंगलियां थामकर चलता था, हर तकलीफ में उसे मां याद आती थी, नींद न आती तो मां उसे लोरियां सुनाती थी, कई […] Read more » आज मेरे देश की ज़मीं जी भर के रोई है
कविता साहित्य धरती बेहद उदास है.. April 22, 2017 by अरुण तिवारी | Leave a Comment २२ अप्रैल – पृथ्वी दिवस पर विशेष कहते हैं, इन दिनों धरती बेहद उदास है इसके रंजो-गम के कारण कुछ खास हैं। कहते हैं, धरती को बुखार है; फेफङें बीमार हैं। कहीं काली, कहीं लाल, पीली, तो कहीं भूरी पङ गईं हैं नीली धमनियां। कहते हैं, इन दिनों…. कहीं चटके… कहीं गादों से भरे हैं […] Read more » धरती बेहद उदास है पृथ्वी दिवस
कविता साहित्य उठे कहाँ मन अब तक ! April 22, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment शब्द परश रूप गंध, रस हैं तन्मात्रा; छाता जब श्याम भाव, होता मधु-छत्ता ! राधा भव-बाधा हर, मिल जाती भूमा; अणिमा महिमा गरिमा, भा जाती लघिमा ! तनिमा तरती जड़ता, सुरभित कर उर कलिका; झंकृत तन्त्रित झलका, सुर आता रस छलका ! Read more » उठे कहाँ मन अब त