कविता राजनीति तेरा चेहरा August 18, 2012 / August 18, 2012 by बलबीर राणा | Leave a Comment बलबीर राणा “भैजी” राजनीति तेरा चेहरा कितना बदल गया जन हित छोड स्वहित पर टिक गया राज नेता राज के लिये नहीं केवल ताज पहनने के लिये होते हैं देश प्रेम में महानुभाव देशद्रोहियों को पालते हैं विकाश की परपाटी को भ्रष्टाचार से पोतते हैं राजनीति तेरा चेहरा कितना बदल गया जन हित छोड […] Read more » poem by balbir rana राजनीति तेरा चेहरा
कविता व्यंग – कविता:आज़ादी August 17, 2012 / August 16, 2012 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार ”राघव” फहर रहा था अमर तिरंगा जगह युनिअन जैक की | गुजर गयी थी स्याह रात चमकी किस्मत देश की | स्वाधीन हुआ परतंत्र देश फिर नया सवेरा आया | पन्द्रह अगस्त का दिन खुशियों की झोली भर कर लाया | बापू, चाचा, सरदार सभी की मेहनत रंग थी लायी | भगत सिंह, […] Read more » poem by raghvenfra व्यंग - कविता:आज़ादी
कविता आज़ादी के जश्न पर एक चिंतन-गीत / गिरीश पंकज August 15, 2012 / August 15, 2012 by गिरीश पंकज | 5 Comments on आज़ादी के जश्न पर एक चिंतन-गीत / गिरीश पंकज आजादी का जश्न अभी भी, फीका-फीका लगता, असफल दिल्ली देख-देख कर दिल अपना यह दुखता एक नए भारत का फिर से, करना है विस्तार, जहाँ कुर्सियां अपने जन से, करे हमेशा प्यार. न वो लाठी चलवाए, न गोली से मरवाए… ——— अभिव्यक्ति पर लगे हैं पहरे, उफ़ काले कानून. लगा है सत्ता के मुँह पर […] Read more » स्वतंत्रता दिवस
कविता गीत-मिट जाऊ वतन पर ये….. August 14, 2012 / August 14, 2012 by शादाब जाफर 'शादाब' | 1 Comment on गीत-मिट जाऊ वतन पर ये….. शादाब जफर ‘‘शादाब’’ मिट जाऊ वतन पर ये मेरे दिल में लगन है। नजरो में मेरी कब से तिरंगे का कफन हैं हर ग़ाम पडौसी को मेरे यू भी जलन है सोने की है धरती यहा चांदी का गगन है पंजाब की रूत है कही कश्मीर की रंगत गंगा का मिलन है कही जमना […] Read more » poem by shadab zafar गीत-मिट जाऊ वतन पर
कविता कविता:थार रेगिस्तान से…. August 12, 2012 / August 12, 2012 by बीनू भटनागर | 1 Comment on कविता:थार रेगिस्तान से…. बीनू भटनागर रेत के टीले रेत का सागर, मीलो तक इनका विस्तार, तेज़ हवा से टीले उड़कर, पंहुच रहे कभी दूसरे गाँव, दूर दूर बसे हैं, ये रीते रीते से गाँव, सीमा पर कंटीले तार, चोकस हैं सेना के जवान शहर बड़ा बस जैसलमेर। ऊँट की सवारी पर व्यापारी, शहर से लाकर गाँव गाँव […] Read more » poem by binu bhatnagar कविता:थार रेगिस्तान से....
कविता कविता:ये मेरा देश August 12, 2012 / August 12, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment राजेश कुमार ये मेरा देश है, जहां अजीब से किस्से होते हैं रोने वाली बात पर हंसते हैं लोग, और चुटकुलों पर रोते हैं बदलाव की चाह करना बेफकूफी है इस देश में जहां सब मुर्दों की तरह जीए जा रहे हैं। कई तो पी रहे हैं विदेशी शराब यहां और बाकी लोग पानी की […] Read more » कविता:ये मेरा देश
कविता कविता – महानगर के मायने August 12, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment मोतीलाल यहाँ मुझे कोई नहीँ पहचानता आकाश की तरह शून्य यहाँ मुझे कोई नहीँ जानता हवाओँ की तरह मुक्त यहाँ मुझे कोई नहीँ दिखता फूलोँ की तरह सौम्य यहाँ मुझे कोई नहीँ सुनता नदी की तरह उनमुक्त यहाँ मुझे कोई नहीँ महसूसता आँच की तरह तपन कोई भी यहाँ नहीँ […] Read more » poem by motilal कविता - महानगर के मायने
कविता निर्दयी मेघ August 7, 2012 / August 7, 2012 by बलबीर राणा | Leave a Comment उत्तराखंड में भीषण मेघ वर्षा का मंजर देखकर मन उद्वेलित होता है, प्रकृति के इस क्रूर व्यवहार से अब किसको दोष दिया जाय नियति या………………….? ??????????????? बलबीर राणा “भैजी” निर्दयी मेघ ये क्या कर गया आना था धरती को सींचने विभित्सिका छोड़ गया हाहाकार मचा गया निर्दोष जीवन पर दोष लगाकर चल गया इतना भी […] Read more »
कविता कविता – राह August 4, 2012 / August 4, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment मोतीलाल वह सड़क जिस पर मैँ चल रहा हूँ तुम्हारे भीतर जाकर खत्म हो जाती है वह सड़क जिस पर तुम चल रही हो किसी चौराहे पर जाकर नहीँ मेरे मन के भीतर खत्म होती है सही है कि सड़क की कोई मंजिल नहीँ होती एक दिशा तो होती ही है उसी दिशा […] Read more »
कविता कविता:काश मै खुदा होता August 4, 2012 / August 4, 2012 by पियूष द्विवेदी 'भारत' | Leave a Comment पियूष द्विवेदी बहुत जलन होती है, आकाश में इतराते हुए, अपनी पाँखे फैलाके, उड़ती चिड़िया को देखकर | नहीं सह पाता हूँ, उसके पाँखों को, उसके उड़ने को, और उसकी, इस निश्चिन्त स्वतंत्रता को | पर यही मन, दुखी भी होता है, उन्ही पाँखों को फड़फड़ाते हुवे, उड़ने का विफल प्रयास करते देखकर किसी शिकारी […] Read more » कविता:काश मै खुदा होता
कविता कविता – लड़ाई July 31, 2012 / July 30, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment मोतीलाल अधिक समय तक हम जिँदा रहने की जिजीविषा मेँ नहीँ देख पाते मुट्ठियोँ मेँ उगे पसीने को और यहीँ से फुटना शुरू होतेँ हैँ तमाम टकराहटोँ के काँटेँ यहीँ से शुरू होता है धरती और आकाश का अंतर चाहे आकाश कितना भी फैला हो और हो उसमेँ ताकत धरती को ढंक लेने की […] Read more » poem by motilal कविता - लड़ाई
कविता कविता:शांति की खोज July 30, 2012 / July 30, 2012 by बलबीर राणा | Leave a Comment बलबीर राणा शांति खोजता रहा धरती के ओर चोर भटकता रहा कहाँ है शांति कहीं तो मिलेगी इस चाह में जीवन कटता रहा समुद्र की गहराई में गोता लगाता रहा झील की शालीनता को निहारता रहा चट्टाने चडता रहा घाटियाँ उतरता रहा पगडंडियों में संभालता रहा रेगिस्तानी में धंसता रहा कीचड़ में फिसलता […] Read more » kavita by balbir rana कविता:शांति की खोज