कविता साहित्य कविता \ रंग October 9, 2009 / December 26, 2011 by हिमांशु डबराल | Leave a Comment रंग बदल जाते है धुप में, सुना था फीके पड़ जाते है, सुना था पर उड़ जायेंगे ये पता न था! हाँ ये रंग उड़ गए है शायद… जिंदगी के रंग इंसानियत के संग, उड़ गए है शायद… अब रंगीन कहे जाने वाली जिंदगी, हमे बेरंग सी लगती है, शक्कर भी हमें अब फीकी सी […] Read more » poem कविता
कविता छोड़ दो थोड़ा-सा दूध थनों में : प्रणय प्रियंवद October 9, 2009 / December 26, 2011 by जयराम 'विप्लव' | Leave a Comment छोड़ दो थोड़ा-सा दूध थनों में गायों के बच्चों के लिए पेड़ में कुछ टहनियां छोड़ दो नई कोपलों के आने के लिए Read more » Jairam जयराम "विप्लव"
कविता साहित्य सुशील कुमार पटियाल की दो कविताएं October 7, 2009 / December 26, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on सुशील कुमार पटियाल की दो कविताएं बांधो ना मुझे तुम बंधन में बांधो न मुझे तुम बंधन में, बंधन में मैं मर जाऊंगा ! उन्मुक्त गगन का पंछी हूं, उन्मुक्त ही रहना चाहूंगा ! मिल जाए मुझे कुछ भी चाहे , पर दिल को मेरे कुछ भाए ना ! मैं गीत खुशी के गाता था, मैं गीत ये हरदम गाऊंगा ! […] Read more » Susheel Kumar Patiyala सुशील कुमार पटियाल
कविता साहित्य कविता : पंख फैलाकर वो उड़ गया…..!! October 6, 2009 / December 26, 2011 by शालिनी अग्रहरि | 12 Comments on कविता : पंख फैलाकर वो उड़ गया…..!! आसमान से एक पक्षी गिरा, फिर शुरू हुआ उसके जीवन का सिलसिला जब-जब वो उड़ना चाहे, तब-तब वो नीचे गिर जाए जब-जब उसने पंख फैलाए तब-तब उसके दर्द उभर आये, उसके थे बस इतने अरमान, वो बने सबके दिल का मेहमान, उसकी नहीं टूटी आस, उसको था खुद पर विश्वास, उसका विश्वास हिम्मत बन गया, […] Read more » poem कविता
कविता साहित्य विजयादशमी हमारे आत्म-मंथन का दिन है September 27, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 3 Comments on विजयादशमी हमारे आत्म-मंथन का दिन है हम पराजित किस्म के लोग विजयादशमी मनाकर खुश होने का स्वांग भरते रहते हैं. बहुत-कुछ सोचना-विचारना है हमको. कुछ लोग तो यह काम करते है. इसीलिए वे प्रवक्ता के रूप में सामने आते है. लेकिन ज्यादातर लोग क्या कर रहे हैं..? ये लोग उत्सव प्रेमी है. उत्सव मनाने में माहिर. खा-पीकर अघाये लोग… उत्सव के […] Read more » Dussehra विजयादशमी
कविता साहित्य नवरात्र पर विशेष कविता : स्त्री September 26, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 7 Comments on नवरात्र पर विशेष कविता : स्त्री नवरात्र का महापर्व चल रहा है. देवी की आराधना हो रही है. स्त्री भी देवी का ही एक रूप है. समाज में तरह-तरह के लोग है. किसी लम्पट आदमी ने औरत को जला दिया, या बलात्कार कर लिया तो इससे औरत का महत्त्व कम नहीं हो जाता. उथली मानसिकता से ग्रस्त लोगो द्वारा अकसर व्यंग्य […] Read more » Navratra नवरात्र
कविता कविता : रोकते क्यों हो-मैं रामदेव हूं September 26, 2009 / December 26, 2011 by स्मिता | Leave a Comment रोकते क्यों हो रूक पाऊँगा इतनी शक्ति नहीं तुम मुझको रोको माँ के आँचल में पिता के स्नेह में घर के आँगन में सात किताबें पढे हो चापलूसी और परिक्रमा से आठ सीढियां चढ़े हो गरीबों की रोटी छीन अपनी कोठियां भरे हो घमंड इसका, जरा सोच मातृछाया से दूर परमपिता की छांह में खुले […] Read more » Ramdev रामदेव
कविता साहित्य एक पाती ऐसी हम लिखें September 24, 2009 / December 26, 2011 by पंकज व्यास | 1 Comment on एक पाती ऐसी हम लिखें एक पाती ऐसी हम लिखें, मां भारती के नाम हम लिखें, सो रहे हैं, लोग जो, उनकी चेतना के नाम, गान हम लिखें… एक पाती ऐसी हम लिखें… तिरंगे की आन के लिए, मां भारती की बान के लिए, देश की शान के लिए, जो मिट गए, उनको सलाम हम लिखें, एक पाती ऐसी हम […] Read more » Write लिखें
कविता हिंदी हूँ मैं… September 14, 2009 / December 26, 2011 by हिमांशु डबराल | 1 Comment on हिंदी हूँ मैं… कल रात जब मैं सोया तो मैंने एक सपना देखा, जिसका जिक्र मै आपसे करने पर विवश हो गया हूं… सपने में मै हिंदी दिवस मनाने जा रहा था तभी कही से आवाज आई… रुको! मैने मुड़ के देखा तों वहा कोई नहीं था… मै फिर चल पड़ा… फिर आवाज आयी… रुको! मेरी बात सुनो… […] Read more » hindi हिंदी
कविता हिंदी दिवस पर विशेष : वह एक बूढी औरत September 14, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 8 Comments on हिंदी दिवस पर विशेष : वह एक बूढी औरत एक बूढी औरत…. राजघाट पर बैठे-बैठे रो रही थी न जाने किसका पाप था जो अपने आंसुओं से धो रही थी। मैंने पूछा- माँ , तुम कौन? मेरी बात सुन कर वह बहुत देर तक रही मौन लेकिन जैसे ही उसने अपना मुह खोला लगा दिल्ली का सिंहासन डोला वह बोली-अरे, तुम जैसी नालायको के […] Read more » Hindi Diwas हिंदी दिवस
कविता कविता / नचिकेता शेष है, भगीरथ जिंदा है September 5, 2009 / December 26, 2011 by राकेश उपाध्याय | 2 Comments on कविता / नचिकेता शेष है, भगीरथ जिंदा है उम्र से बड़प्पन नहीं आता दिमाग से भी नहीं, ये दिल का सवाल है भाई दिल बड़ा है तो आदमी भी बड़ा हो जाता है। जगत में आए हो तो कुछ ऐसा कर जाओ कि आने वाली नस्लें तुम्हें सम्मान से याद करें, जब तुम मिलो अपने चाहने वालों से तो तुम्हारी आंख ना झुके। […] Read more » poem कविता
कविता अमल कुमार श्रीवास्तव……..की कविता September 5, 2009 / December 26, 2011 by अमल कुमार श्रीवास्तव | 3 Comments on अमल कुमार श्रीवास्तव……..की कविता न छेड़ो चिंगारियों को आग लग जाएंगी जलजले उठ जाएंगे सारी चमन जल जाएंगी न समझो इन्सानियत को हमारे तुम बेकारगी जो खड़े हो गए भारत मां के सच्चे सपूत तो आतंकियों तुम्हारी अस्तित्व ही मिट जाएंगी।… Read more » poem