लेख दीपावली पर्व का पौराणिक, ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक महत्व October 22, 2011 / December 5, 2011 by राजेश कश्यप | 6 Comments on दीपावली पर्व का पौराणिक, ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक महत्व राजेश कश्यप दीपावली हमारा सबसे प्राचीन धार्मिक पर्व है। यह पर्व प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। देश-विदेश में यह बड़ी श्रद्धा, विश्वास एवं समर्पित भावना के साथ मनाया जाता है। यह पर्व ‘प्रकाश-पर्व’ के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व के साथ अनेक धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई […] Read more » Diwali festival ऐतिहासिक दीपावली पर्व वैज्ञानिक महत्व
लेख माया की महत्वकांक्षा और दलित October 21, 2011 / December 5, 2011 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा इतनी बलवती हो गर्इ है कि वे दलित उत्पीड़न की हकीकतों से दूर भागती नजर आ रही हैं। दलित यथार्यवाद से वे पलायन कर रही हैं। नोएडा में राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल व ग्रीन गार्डन के उदघाटन अवसर पर कांग्रेस और भाजपा को आड़े […] Read more » Mayawati माया की महत्वकांक्षा और दलित
व्यंग्य व्यंग्य/ मेरो मंत्र भरत ने भी माना! October 20, 2011 / December 5, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment अशोक गौतम पत्नी के हजार बार घर से बाजार को यह कह कर कि दीवाली सिर पर आ गई है, अपने लिए नहीं तो न सही, पर पड़ोसियों के लिए अब तो बाजार जा आओ! नहीं तो पड़ोसियों को क्या मुंह दिखाएंगे? और मैं लोक लाज के लिए बड़ी हिम्मत जुटा बाजार निकल ही गया। […] Read more » मेरो मंत्र
साहित्य कहो कौन्तेय-४३ October 18, 2011 / December 5, 2011 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment विपिन किशोर सिन्हा (दुर्वासा-संकट का समाधान) प्रिय सखी स्मरण करे और श्रीकृष्ण उपस्थित न हों, यह कैसे संभव था? इधर स्तुति समाप्त हुई, उधर श्रीकृष्ण नेत्रों के सामने। आनन्दातिरेक के कारण द्रौपदी के नेत्रों से पुनः पुनः अश्रु छलक पड़े। स्वागत एवं चरण-वन्दना के पश्चात उसने दुर्वासा मुनि के आगमन और भोजन याचना का सारा […] Read more » Kaho Kauntey कहो कौन्तेय
लेख पूंजीवाद मृत्यशय्या पर जा चुका है October 17, 2011 / October 17, 2011 by इक़बाल हिंदुस्तानी | 5 Comments on पूंजीवाद मृत्यशय्या पर जा चुका है इक़बाल हिंदुस्तानी पूंजीवाद मृत्यशय्या पर जा चुका है, अब बचना मुश्किल है! कारपोरेट सैक्टर की लूट अब भारत में भी और नहीं चलेगी! 1930 से अब तक सात बार पूंजीवाद मंदी का शिकार हुआ लेकिन उसकी गति पर हर बार थोड़ा सा ब्रेक लगा और वह संभल गया। इस बार सबप्राइम संकट से अभी वह […] Read more »
लेख मीडिया का नैतिक पतन : एक विवेचना October 17, 2011 / December 5, 2011 by सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र” | 4 Comments on मीडिया का नैतिक पतन : एक विवेचना सिद्धार्थ मिश्र स्वतंत्र खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो, अकबर इलाहबादी’ की ये पंकितयाँ मीडिया की तात्कालिक स्थिति का बखूबी वर्णन करती है। स्वतन्त्रता संग्राम में पत्र –पत्रिकाओं की महती भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। उस दौर में पत्रकारो ने अपनी कलम की रोशनार्इ […] Read more » media मीडिया का नैतिक पतन
साहित्य कहो कौन्तेय-४२ October 17, 2011 / December 5, 2011 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment (महाभारत पर आधारित उपन्यास अंश) (दुर्योधन द्वारा दुर्वासा का दुरुपयोग) विपिन किशोर सिन्हा वन में हमारी दिनचर्या सामान्य रूप से चल रही थी। देखते ही देखते हमलोगों ने ग्यारह वर्ष आनन्द के साथ व्यतीत कर दिए। वनगमन की घड़ी में बारह वर्षों की कल्पना से ही मन सिहर उठता था लेकिन अब हमें वन की […] Read more » Kaho Kauntey कहो कौन्तेय-४२
साहित्य कहो कौन्तेय-४१ October 16, 2011 / December 5, 2011 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment विपिन किशोर सिन्हा (महाभारत पर आधारित उपन्यास-अंश) (कर्ण का महादान) कर्ण की इस उपलब्धि पर देवराज इन्द्र का चिन्तित होना स्वाभाविक था। पांच वर्षों तक स्वर्ग में हम दोनों साथ-साथ रहे थे। वे मेरे पिता थे। उनका वात्सल्य प्रबल से प्रबलतर होता जा रहा था। वे वन में भी आकर कभी-कभी हमलोगों की सुधि लेते […] Read more » Kaho Kauntey कहो कौन्तेय-४१
कहानी एक लोक कथा : आश्रय—पथ; पाथेय—दुःख October 14, 2011 / December 5, 2011 by गंगानन्द झा | Leave a Comment गंगानन्द झा बहुत दिन हुए, दूर के एक देश से होकर कुछ वीर सैनिक अपने अपने घोडों पर सवार होकर चले जा रहे थे । उनकी राह एक घने जंगल से होकर थी, जहाँ उलझी लताएँ काफी घनी और मजबूत हुआ करती थी ; ये इस राह पर भटक गए लोगों की मांसपेशियों को चीर-चीर […] Read more » lok katha एक लोक कथा
व्यंग्य व्यंग्य- सेक्युलर जूता October 14, 2011 / October 14, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | 1 Comment on व्यंग्य- सेक्युलर जूता पंडित सुरेश नीरव विद्वानों का मानना है कि सोना जितना पिटता है उतना ही निखरता है। इससे एक बात तो तय हो ही गई कि कोई उसी को ही पीटता है जिसे वह सोना समझता है। यह किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व या विचार का गैर-राजनैतिक जनमत संग्रह है। वो लोग बहुत दुखी रहते हैं […] Read more »
व्यंग्य व्यंग्य – मुझे नहीं बनना प्रधानमंत्री October 14, 2011 / December 5, 2011 by राजकुमार साहू | Leave a Comment राजकुमार साहू पहले मैं अपने पुराने दिनों की याद ताजा कर लेता हूं। जब हम स्कूल में पढ़ा करते थे, उस दौरान शिक्षक हमें यही कहते थे कि प्रधानमंत्री बनोगे तो क्या करोगे ? इस समय मन में बड़े-बड़े सपने होते थे। उस सपने को पाले बैठे, अपन आज बचपन से जवानी की दहलीज में […] Read more »
लेख समाज युवा पीढी नही देश का भविष्य बिगड़ रहा है ? October 13, 2011 / December 5, 2011 by शादाब जाफर 'शादाब' | 8 Comments on युवा पीढी नही देश का भविष्य बिगड़ रहा है ? आज हमारी युवा पीढी को न जाने क्या हो रहा है माँ बाप और टीचरों की जरा जरा सी बातो और डाट फटकार पर खुदकुशी और मारपीट की खबरें बहुत तेजी से सुनने को मिल रही हैं। अभी पिछले दिनों ही एक छात्र की करतूत ने गुरू शिष्य परंपरा को ही कलंकित कर के रख […] Read more » Country Future Young Generation देश का भविष्य युवा पीढी