पुस्तक समीक्षा प्रवक्ता न्यूज़ ‘गल्प के रंग’ आलोचना पुस्तक का लोकार्पण August 20, 2011 / December 7, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment प्रख्यात आलोचक डॉ0 प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा कि जिस भाषा के पास अच्छे आलोचक नहीं होते उस भाषा का विकास संभव नहीं हो पाता। हिन्दी के पास आलोचना की लम्बी परम्परा रही है। लेकिन आज कुछ लोग यह शिकायत करते हैं कि अच्छी आलोचना और नाटक नहीं लिखे जा रहे। मेरा मानना है कि जब […] Read more » गल्प के रंग
लेख संसद में हंगामा किस के लिये ? August 18, 2011 / December 7, 2011 by शादाब जाफर 'शादाब' | Leave a Comment संसद के मानसून सत्र को शुरू हुए लगभग पंद्रह दिन से ज्यादा हो चुके है। पर इन पंद्रह दिनो में संसद में क्या हुआ हम सब लोग जानते है। लोकसभा में जहा मानसून सत्र के पहले सप्ताह में विपक्ष के हंगामे के चलते कोर्इ कार्यवाही न हो सकी जिस के कारण लोकसभा का 47 प्रतिशत […] Read more » Parliament संसद में हंगामा
लेख बाबा रामदेव न संत बन पाये न लीडर August 18, 2011 / December 7, 2011 by शादाब जाफर 'शादाब' | 32 Comments on बाबा रामदेव न संत बन पाये न लीडर शादाब जफर ”शादाब” एक बहुत पुराना और बहुत ही मशहूर है शेर ”ना खुदा ही मिला ना विसाल-ए-सनम,ना इधर के रहे न उधर के रहे। आज ये शेर बाबा रामदेव के जीवन पर कितना सटीक बैठ रहा है। स्वदेशी के मुद्दे को लेकर चले बाबा रामदेव ने गंगा, काले धन और फिर भ्रष्टाचार पर जिस […] Read more » Baba Ramdev बाबा रामदेव
कविता अन्ना हजारे पर डॉ. ए.डी.खत्री की ५ कुण्डलियाँ August 17, 2011 / December 7, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment गृहमंत्री चिदंबरम नहीं जानते अन्ना का स्थान , ऐसे गृहमंत्री मिले , भारत देश महान . भारत देश महान ,निकम्मे नेता पाए, शांति का सच्चा दूत,देश में गुम हो जाए. कहे चिदंबरम पुलस नहीं है बस में मेरे, बढ़ता भ्रष्टाचार ,देश में सांझ – सबेरे. १ . अन्ना की हुंकार भ्रष्टाचार की प्रेरणा, यह मनमोहन […] Read more » Anna Hazare
लेख सोशल नेटवर्किंग बनाम सेक्स नेटवर्किंग August 13, 2011 / December 7, 2011 by डॉ. मनोज चतुर्वेदी | 5 Comments on सोशल नेटवर्किंग बनाम सेक्स नेटवर्किंग डॉ. मनोज चतुर्वेदी मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वह समाज के लिए जीता व मरता है। यदि वह समाज से अलग हो तो या वह देवता होगा या तो दानव होगा, लेकिन जब वह समाज में फ्रेंड्शिप के बहाने सेक्स, जनप्रवाद, अपशब्दों का मायाजाल फैलाए तो गोयबल्स की श्रेणी में आ जाता है। वह समाजिक […] Read more » Sex networking सेक्स नेटवर्किंग सोशल नेटवर्किंग
लेख वुस्तानवी एक शख्सियत नहीं बल्कि एक विचारधारा का संघर्ष August 13, 2011 / December 7, 2011 by इक़बाल हिंदुस्तानी | 1 Comment on वुस्तानवी एक शख्सियत नहीं बल्कि एक विचारधारा का संघर्ष इक़बाल हिंदुस्तानी दारूलउलूम देवबंद विश्वप्रसिद्व इस्लामी संस्था है। मौलाना वुस्तानवी का मामला भले ही शांत दिख रहा हो लेकिन उनके समर्थक अगर उनकी बर्खास्तगी के मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाते हैं तो यह एक बार फिर से ज़बरदस्त चर्चा में आ जायेगा। वहां का मोहतमिम कौन होगा यह उलूम का अंदरूनी मामला होता है। […] Read more » Vustanvi वुस्तानवी
कविता हाँ, हाँ मैंने वक्त बदलते देखा है……. August 13, 2011 / December 7, 2011 by पंकज व्यास | 1 Comment on हाँ, हाँ मैंने वक्त बदलते देखा है……. पंकज व्यास मैंने वक्त बदलते देखा है, दुनिया के दस्तूर बदलते देखे हैं, मैंने, मैंने, रिश्ते और रिश्तेदार बदलते देखे हैं मैंने, अपनो को बैगाना होते देखा है, हाँ, हाँ, मैंने वक्त बदलते देखा है…… मैंने लोगो की मधु-मुस्कान में स्वार्थी बदबू को आते देखा है… कथनी और करनी में अंतर को […] Read more » Changing time वक्त बदलते
कविता सावन तूने निराश किया , धरती को उदास किया . August 13, 2011 / December 7, 2011 by अशोक बजाज | 1 Comment on सावन तूने निराश किया , धरती को उदास किया . खेतों की हरियाली को , किसानों की खुशहाली को ; तूने बहुत हताश किया . सावन तूने निराश किया , धरती को उदास किया . रूठे बादलों को मनाने का , हवाओं को फुसलाने का ; क्यों नहीं प्रयास किया , सावन तूने निराश किया , धरती को उदास किया . अब तू […] Read more » Savana सावन
साहित्य श्रीमद्भगवद्गीता और छद्म धर्मनिरपेक्षवादी – चर्चा-७ August 11, 2011 / December 7, 2011 by विपिन किशोर सिन्हा | 1 Comment on श्रीमद्भगवद्गीता और छद्म धर्मनिरपेक्षवादी – चर्चा-७ विपिन किशोर सिन्हा प्रत्येक मनुष्य, मनुष्य ही नहीं प्रत्येक जीवात्मा में ईश्वर का अंश है। प्रकृति की प्रत्येक कृति ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति कराती है। प्रत्येक मनुष्य ईश्वर का ही अवतार या रूप है, समस्या सिर्फ स्वयं को पहचानने की है। प्रत्येक मनुष्य में ईश्वरत्व प्राप्त करने की क्षमता होती है। गीता के माध्यम […] Read more » Srimadbhagwat Gita छद्म धर्मनिरपेक्षवादी श्रीमद्भगवद्गीता
कहानी कहानी/ चकाचौंध से परे August 11, 2011 / December 7, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment आर. सिंह “चा ऽ चा ऽ”.यह आवाज कानों में पडते हीं मैं थोडा ठीठका.फिर सोचा यह आवाज यहाँ कहाँ से आ सकती है?यह तो मेरे गाँव,मेरे इलाके की आवाज थी और मैं तो गुजर रहा था,कोलकाता में चौरंगी से. आवाज फिर कानों में टकराई,”चा ऽ चा ऽ”. वही खींची हुई आवाज.”हम आप हीं को पुकार […] Read more » Story चकाचौंध से परे
कविता कविता/ हर कोई अन्ना बने तो भ्रष्ट हर चेहरा मिटेगा.. August 11, 2011 / December 7, 2011 by गिरीश पंकज | Leave a Comment गिरीश पंकज चल पडी है एक आंधी, अब नया भारत उठेगा सुप्त-सा यह मुल्क सारा, चेतना ले कर बढ़ेगा.. — हमने जो सपने संजोये, धूल में वो मिल गए. और फूलों की जगह, कुछ ‘बेशरम’ ही खिल गए. स्वप्न की ह्त्या हुई है, और हत्यारा हँसे. सांप थे आस्तीन में ही, दूध पी […] Read more » Anna Hazare अन्ना हजारे भ्रष्टाचार
व्यंग्य देशवासियों के नाम पैगाम! August 10, 2011 / December 7, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment हे मेरे देश के बेगाने देशवासियो! लो आज फिर कम्बख्त स्वतंत्रता दिवस आ गया। सभी किसी न किसी ऐब के गुलाम और वाह रे स्वतंत्रता दिवस! कहीं कोई स्वतंत्र नहीं। सभी एक दूसरे के तलवे चाटते हुए। जी हजूरी कर अपनी अपनी जिंदगी की खाई पाटते हुए। विवशता है कि इस अवसर पर मुझे कुछ […] Read more » Indians देशवासियों के नाम पैगाम