Category: समाज

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वेल्थ के हवाले हेल्थ

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भारत के नीति निर्माताओं ने स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफा पसंदों के हवाले कर दिया है. आज भारत उन अग्रणी मुल्कों में शामिल है जहाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य का तेजी से निजीकरण हुआ है. आजादी के बाद के हमारे देश में निजी अस्पतालों की संख्या 8% से बढक़र 93 % हो हो गयी है. आज देश में स्वास्थ्य सेवाओं के कुल निवेश में निजी क्षेत्र का निवेश 75 प्रतिशत तक पहुँच गया है. निजी क्षेत्र का प्रमुख लक्ष्य मुनाफा बटोरना है जिसमें दावा कम्पनियां भी शामिल हैं, जिनके लालच और दबाव में डॉक्टरों द्वारा महंगी और गैरजरूरी दवाइयां और जांच लिखना बहुत आम हो गया है.

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समाज

मुस्लिम महिलाओं के प्रति प्रगतिशील सोच की दरकार

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अपनी धर्मरूपी सीमित शिक्षा तथा प्रतिभावान मुस्लिम महिलाओं को दी जाने वाली ऐसी शिक्षा जो उन्हें आईएएस,आईपीएस,पायलेट,इंजीनियर,वैज्ञानिक आदि बनाती हो, का तुलनात्मक अध्ययन करें तो धर्मगुरुओं को अपनी शिक्षा व ज्ञान का अंदाज़ा स्वयं हो जाएगा। और यदि मुस्लिम समाज को आगे ले जाना है, इसे आर्थिक व सामाजिक रूप से समृद्ध बनाना है तो मर्दों के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं को भी अपनी प्रतिभाओं तथा योग्यताओं को ज़ाहिर करना होगा।

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कला-संस्कृति शख्सियत समाज

किशोरी अमोनकर के शास्त्रीय संगीत में भारतीय संस्कृति की आत्मा बसती थी

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किशोरी अमोनकर की प्रस्तुतियां ऊर्जा और सौन्दर्य से भरी हुई होती थीं। उनकी प्रत्येक प्रस्तुति प्रशंसकों सहित संगीत की समझ न रखने वालों को भी मंत्रमुग्ध कर देती थी। उन्हें संगीत की गहरी समझ थी। उनकी संगीत प्रस्तुति प्रमुख रूप से पारंपरिक रागों, जैसे जौनपुरी, पटट् बिहाग, अहीर पर होती थी। इन रागों के अलावा किशोरी अमोनकर ठुमरी, भजन और खयाल भी गाती थीं। किशोरी अमोनकर ने फिल्म संगीत में भी रुचि ली और उन्होंने 1964 में आई फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने’ के लिए गाने भी गाए।

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समाज

‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के साथ ‘मैकाले’ से भी हो दो-दो हाथ

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विष-वृक्ष को काट-पीट कर उसका सफाया कर देना पर्याप्त नहीं होता, जब तक उसे खाद-पानी देते रहने वाली उसकी जड-मूल को नष्ट न कर दिया जाय । ऐसे में जरूरत है कि ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ अभियान के साथ-साथ मैकाले से भी दो-दो हाथ कर उसकी षडयंत्रकारी अभारतीय शिक्षा-पद्धति को उखाड कर भारतीय जीवन-दर्शन की शिक्षा-पद्धति स्थापित की जाए , तभी सही अर्थों में स्थायी तौर पर ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का निर्माण हो सकेगा ,

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समाज

सर्वसमावेशी है हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा

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हमनें सदा से विदेशियों को प्रश्रय व उनकें विचारों को सम्मान दिया है ऐसा करके हम हमारें नेसर्गिक “वसुधेव कुटुम्बकम” के मूल विचार को आगे ही बढ़ा रहे थे किंतु भारत भूमि पर बलात आने वाले मुस्लिम व ईसाई शासकों ने हमारी इस दयालुता, सहिष्णुता व भोलेपन का गलत लाभ उठाया है. इनके अतिरिक्त हमें कम्युनिस्टों से भी बड़ी हानि झेलनी पड़ी है जिन्होनें अंग्रेजों के बाद हमारा समूचा इतिहास गड्डमगड्ड कर डाला व हमारें “धर्मप्राण राष्ट्र” में “धर्म को अफीम” कहना प्रारंभ किया.

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समाज

हिन्दुओं को मिले तीन विकल्प-इस्लाम, मृत्यु, कश्मीर छोड़ो

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‘भारत में मूत्र्ति पूजा’ का लेखक हमें बताता है-‘‘मुसलमान फकीर हिंदू वेष में मंदिरों में रहकर वहां की आंतरिक दशा का अध्ययन करते थे और उसकी सूचना अपने प्रचारकों तथा मुस्लिम शासकों को देते रहते थे। जो उस समय उनसे पूरा लाभ उठाते थे। इब्नबतूता का कहना है कि चंदापुर के निकट एक मंदिर में उसकी भेंट एक ऐसे जोगी से हुई जो वास्तव में एक मुसलमान सूफी था और केवल संकेत से बातचीत करता था। फारसी का प्रसिद्घ कवि शेख सादी सोमनाथ के मंदिर में कुछ समय हिंदू साधु बनकर रह गया था।

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समाज

कलियुग, मानव और व्यवस्था

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ऐसा नही है कि समाज में व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य ही ऐसा होता है। आज की सारी व्यवस्था ही इसमें लिप्त है। जब धर्म को खुलेआम सडक़ों पर बेचा जा रहा हो, तब न्याय की अपेक्षा व्यवस्था से नही की जा सकती। अब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र और राज्य सरकारों को फटकार लगायी है कि केन्द्र और प्रांतों की सरकारें समय पर सरकारी जमीनों पर अवैध अतिक्रमण करने वालों पर कठोर कार्यवाही नही करातीं। जबकि बहुत से धार्मिक स्थलों को लोग जानबूझकर सार्वजनिक मार्गों में बना लेते हैं।

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एक मुस्लिम नास्तिक की हत्या

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वे अपने मजहब की तौहीन इस प्रकार करते हैं कि वे उसमें अंधविश्वास करने की वकालत करते हैं। वे तर्क नहीं करना चाहते। वे वाद-विवाद से डरते हैं। क्या उनका धर्म या मजहब इतना पोंगापंथी है कि उस पर कोई बहस ही नहीं हो सकती? भारत में तो शास्त्रार्थ की परंपरा बहुत प्राचीन है। शंकराचार्य से लेकर महर्षि दयानंद तक धार्मिक मान्यताओं की बखिया उधेड़ते रहे हैं। भारत में नास्तिक मतों को भी पलने-पालने की बड़ी परंपरा है।

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