आज भी तरसते है हम उन सब लम्हों के लिये
Updated: June 11, 2018
कुछ लम्हें आये जिन्दगी में,कुछ लम्हों के लिये आज भी तरसते है हम,उन सब लम्हों के लिये ख़ुदा ने हमसे कहा,कुछ तो मांग लो मुझ…
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“गोरक्षा के लिए आपको गाय पालनी चाहियेः डा. सोमदेव शास्त्री”
Updated: June 11, 2018
मनमोहन कुमार आर्य, श्रीमद्दयानन्द ज्यातिर्मठ आर्ष गुरुकुल, पौन्धा-देहरादून के तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव के दूसरे दिन 2 जून, 2018 को ‘गो–कृष्यादि रक्षा सम्मेलन’ का आयोजन…
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विकास हो मनुष्यता का, नैतिकता का न कि भौतिकता का
Updated: June 10, 2022
संपूर्ण विश्व में प्रथम विश्व युद्ध के बाद से चहुं ओर विकास-विकास-विकास का डंका बजाया जा रहा है। कुछ देशों ने अपने आप को विकसित मानकर अन्य देशों को विकासशील या अविकसित देशों की श्रेणी में डाल दिया और अपनी विकसित योजनाओं को लेकर, विकास का नारा देकर, पूरे विश्व में इन योजनाओं को थोपने का काम किया है लेकिन किसी कीमत पर यह विषय चिंतनीय और मनन करने योग्य है। इतिहास को उठाकर देखें तो जब भारत विश्व गुरु कहलाता था उस समय की शिक्षा पद्धति, संस्कृति और सभ्यता पूर्णतया नैतिकता पर आधारित होती थी। नैतिकता के पाठ का असर आचरण और व्यवहार में परिलक्षित और सर्वप्रिय होता था परंतु प्रथम विश्व युद्ध के बाद से ही नैतिकता का और चारित्रिक पतन शुरू हो गया क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद जिन लोगों ने उस समय भयावह युद्ध को और युद्ध के पश्चात भयावह मंदी को झेला था उससेे नैतिकता के सब्र के बांध न सिर्फ हिल गये, बल्कि बिखर गये थे। तत्पश्चात मनुष्य को मात्रा एक ऊंची जाति के जानवर की तरह माना जाने लगा जिसमें बड़े-बड़े और ताकतवर लोगों का कमजोर लोगों और निम्न दर्जे के लोगों को दबाने की प्रवृत्ति हावी होने लगी। इसी बीच इस विकासवाद के बहाने लोगों पर अपना वर्चस्व जमाकर एवं दिखाकर अपने प्रभाव में लेने का सिलसिला शुरू हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया में हालात इतने खराब हुए कि अधिकतर लोग ऊसूल और नैतिक सिद्धांतों को ताक पर रख सुख-सुविधा-विलास के पीछे भागने लगे और उन पर अमीर बनने का जुनून सवार हुआ और यहीं से विकासवाद का परचम फहराने की और नैतिकता के पतन की शुरुआत हो गयी। भारतीय सभ्यता व संस्कृति में नैतिकता को शुरू से ही ऊच्च स्थान दिया गया है। नैतिकता हमें हर कदम पर सही-गलत के ज्ञान का आभास कराती है। नैतिकता के अभाव में व्यक्ति और समाज असंतोष, अलगाववाद, उपद्रव, आंदोलन, असमानता, असामंजस्य, अराजकता, आदर्शविहीन, अन्याय, अत्याचार, अपमान, असफलता अवसाद, अस्थिरता, अनिश्चितता, संघर्ष, हिंसा आदि में घिरकर और फंस कर रह जाता है। इसके मूल कारण में देखें तो व्यक्ति और समाज सांप्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्राीयतावाद और हिंसा की संकीर्ण भावनाओं व समस्याओं में उलझ कर रह जाता है। हालांकि,…
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आरक्षण या संरक्षण ?
Updated: June 10, 2022
आरक्षण एक पूर्णरूपेण व्यवस्था है जिसमें पालन-पोषण, सुरक्षा इत्यादि स्वतः ही समाहित हो जाती है। जिस प्रकार माता-पिता का बच्चों को संरक्षण प्राप्त होता है उसे स्वाभाविक ;छंजनतंसद्ध संरक्षण कहा जाता है जबकि किसी एक देश के व्यक्ति को दूसरे देश में संरक्षण प्राप्त होता है तो उसे राजनीतिक संरक्षण कहा जाता है यानी संरक्षण के प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। इस संरक्षण का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि संसाधनों के अभाव में किसी का पालन-पोषण एवं विकास रुक न जाये। इसको यदि उदाहरण के तौर पर देखा जाये तो जब कोई बच्चा अनाथ हो जाता है या उसके मां-बाप या संरक्षक उसका पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं होते हैं तो उसकी जिम्मेदारी जो लोग स्वतः लेते हैं या जिन्हें आग्रह करके दिया जाता है, ऐसे लोग संरक्षक की भूमिका में आ जाते हैं एवं इस पूरी प्रक्रिया को संरक्षणवाद कहा जा सकता है। यह संरक्षण सामाजिक स्तर पर भी हो सकता है तो इसका आधार पारिवारिक या किसी भी रूप में हो सकता है किंतु इसे जब संवैधानिक तौर-तरीकों या कानूनी रूप से किया जाता है तो निश्चित रूप से इसका पूरा तरीका बदल जाता है और सही अर्थों में देखा जाये तो इसे ही आरक्षण कहा जाता है। आरक्षण संरक्षण से भिन्न शब्द है जो कि एक अल्पकालिक सुविधा है चाहे वह किसी बस, टेªेन, हवाई जहाज या सिनेमा हाल में हो या यूं कहिए कि जहां पर आवेदन-निवेदन करने के पश्चात निश्चित समय के लिए प्राप्त हुई यह सुविधा का समय रहता है। तब तक इसमें अधिकार समाहित रहता है मगर यह अधिकार समय सीमा की समाप्ति पर स्वतः ही समाप्त हो जाता है। भारतीय संविधान में जिस उद्देश्य से, जिस लक्ष्य को लेकर आरक्षण व्यवस्था की गयी है उसके मूल में जाकर हम देखते हैं तो ज्ञात होता है कि एक वर्ग जो कि सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से समाज की मुख्य धारा से कटा हुआ है, उसके लिए एक सक्षम प्रतिनिधित्व तैयार हो सके, ऐसा सोचकर ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति’ शब्द को संविधान में शामिल किया जाये और इसी कड़ी में अत्यंत पिछड़े वर्ग को भी सम्मिलित कर दिया जाये। आरक्षण का उद्देश्य मूलतः सामाजिक आरक्षण को राजनीति के माध्यम से आरक्षण था और उसका प्रावधान दस वर्ष तक के लिए था परंतु राजनीतिक ठेकेदारों ने समाजोत्थान की इस भावना को धूमिल कर एवं तोड़-मरोड़कर राजनीतिक कारणों से सामाजिक आरक्षण को जातिगत या जाति आधारित आरक्षण बना दिया। आज स्थिति यह है कि तमाम जातियां इस आरक्षण की श्रेणी में आने के लिए बेचैन हैं और संघर्ष भी कर रही हैं। राजस्थान में गुर्जरों का आरक्षण पाने के लिए जो संघर्ष रहा है उससे अन्य जातियां भी प्रेरित हो रही हैं। ऐसे में स्थिति यह भी बन सकती है कि कौन-सी जाति आरक्षण के योग्य नहीं है। बहस का विषय यह होगा। इस देश में तमाम ऐसे नेता हैं जिनका मानना है कि कुछ लोग आरक्षण समाप्त करने की बात कर रहे हैं, जबकि अभी तो आरक्षण मांगने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। स्थिति यदि ऐसे ही रही तो भविष्य में चर्चा इस बात की होगी कि कौन-सी जाति आरक्षण से बाहर रहेगी और 100 प्रतिशत में कितना हिस्सा ऐसा होगा जो आरक्षण की श्रेणी से बाहर होगा। आरक्षण के कारणों से जिस प्रकार खंडित भावनाओं की उत्पत्ति में बढ़ोत्तरी हुई है वह देश के लिए आत्मघाती है। इस आरक्षण के कारण क्षेत्राीय, जातीय और भाषायी आधार पर आरक्षण की मांगों का प्रतिपादन हुआ है। अपनी राजनीतिक पूर्ति के लिए नेताओं ने सत्ता लोलुपता के कारण समय-समय पर इन भावनाओं को भड़काया, उकसाया एवं हवा भी दी और अपनी राजनीतिक रोटियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए देश भावना को दिन-प्रतिदिन खंडित कर रहे हैं। जब कोई व्यक्ति सर्वोच्च पद पर पहुंच जाता है तो वह देश का प्रतिनिधित्व करता है न कि किसी वर्ग, जाति और क्षेत्रा का। आज के राजनीतिज्ञ इन सब बातों को जानते एवं समझते हुए भी अपने को देशभक्ति से ओत-प्रोत बताते हुए भी सत्ता लोलुपता के कारण इन सभी पहलुओं को ध्वस्त कर, पूरे देश में विघटनकारी वातावरण बनाये रखना चाहते हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी,…
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प्रणव मुखर्जी का नागपुरी छक्का
Updated: June 9, 2018
विजय कुमार आखिर प्रणव दादा नागपुर चले ही गये। जब से ये खबर आयी थी, तब से कांग्रेसी परेशान थे। क्या हो गया उन्हें; क्यों…
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सांस्कृतिक मंच की भाषा
Updated: June 9, 2018
डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री हाल ही में देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी नागपुर आए जहाँ सांस्कृतिक संगठन कहे जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक…
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-गुरुकुल पौंधा देहरादून में वेद-वेदांग सम्मेलन-“ऋषि दयानन्द ने अपने ब्रह्मचर्य व ऋषित्व से वेदों परलगी कालिमा को धो दियाः आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय”
Updated: June 9, 2018
मनमोहन कुमार आर्य श्रीमद्दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, देहरादून के वार्षिकोत्सव में दिनांक 1 जून, 2018 को सायं आयोजित वेद-वेदांग सम्मेलन में वैदिक विद्वान आचार्य…
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संविधान नही आस्थाओं के व्यापार पर संकट”
Updated: June 8, 2018
विनोद कुमार सर्वोदय यह अत्यंत दुःखद है कि जब से देश में भाजपानीत सरकार अस्तित्व में आयी है और श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में…
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“प्रलोभनों को त्याग कर सत्य मार्ग पर चलें : आचार्य आशीष
Updated: June 8, 2018
मनमोहन आर्या द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल महाविद्यालय का वार्षिकोत्सव 4 जून से आरम्भ हुआ है जो 6 जून 2018 को समाप्त होगा। हमें आज इस गुरुकुल…
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इफ्तार को नमस्कार !
Updated: June 8, 2018
डॉ. वेदप्रताप वैदिक राष्ट्रपति भवन में अब इफ्तार की पार्टी नहीं होगी, यह खबर पढ़कर मेरे कुछ वामपंथी और मुसलमान मित्रों ने मुझे फोन करके…
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एक बिहारी- सब पर भारी: कल्पना कुमारी
Updated: June 8, 2018
हमारे देश में महिलाओं को लेकर समाज में पाया जाने वाला दोहरापन किसी से छुपा नहीं है। यह वही भारत महान है जहां कन्याओं की…
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सत्ता प्राप्ति की आपाधापी से उपजी समस्याएं
Updated: June 7, 2018
ललित गर्ग किसान आन्दोलन, शिलांग में हिंसा, रामजन्म भूमि विवाद, कावेरी जल, नक्सलवाद, कश्मीर मुद्दा आदि ऐसी समस्याएं हैं, जो चुनाव के निकट आते ही…
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