जरूर पढ़ें लोकतंत्र के सशक्तिकरण में नए प्रयोगों की आवश्यकता

लोकतंत्र के सशक्तिकरण में नए प्रयोगों की आवश्यकता

-सत्यव्रत त्रिपाठी- गतिशील लोकतंत्र के लिए मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है। लोकतांत्रिक मशीनरी को ठीक से चलाने के लिए मतदाताओं की सहभागिता तेल की तरह काम करती है। इसके अलावा मतदातओं की बढ़ी हुई सहभागिता विविध जगहों के लोगों को मुख्यधारा में लाकर सामाजिकरूप से एकीकृत करती है। यह एकीकरण उम्र उदाहरण के तौर पर युवाओं का समाज से एकीकरण लिंग, श्रेणी, क्षेत्र और कई अन्य उप समूहों के बंधनों को तोड़ देता है। इसलिए चुनाव सहभागिता सामाजिक समावेश सुनिश्चित करती है। साथ ही ऐसी नीतियों की ओर उन्मुख करतीहै जो समाज के विभिन्न खंडों और विविध हितों का ध्यान रखती हैं। भारत के संदर्भ में यह अभिकथन इस मायने में ज्यादा महत्व रखता है जहां राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों की तरफ से मतदाताओं को जानबूझकर हिस्सों में बांटना एक आम रणनीति है। कई बारपार्टी और उसके प्रत्याशी अपने वोट बैंक का उल्लेख करते हैं। ये वोट बैंक प्रत्याशियों की तरफ से जाति, धर्म और क्षेत्र की छोटी संकुचित सोच के आधार पर बनाए जाते हैं। वर्तमान की एफपीटीपी व्यवस्था में (झूठ और धोखे के कारण जो कि भारत में व्याप्त हैं) अगर कोईप्रत्याशी अपने क्षेत्र में किसी बेहद छोटे और अमहत्वपूर्ण समूह को अपने पक्ष में कर लेता है तो सीट हासिल करना आसान होता है। इसीलिए प्रत्याशी या राजनीतिक दल एक छोटा मतदाता वर्ग बनाने की रणनीति पर केंद्रित करते हैं या संकीर्ण सोच के आधार पर विशेष वोट बैंकपर निर्भर रहते हैं। यह कोशिश हमारे देश के लोकतंत्र को बर्बाद करने वाली है क्योंकि यह राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं को गलत तरीके से बदल देती है। उनका ध्यान बिंदु सभी के विकास के लिए नीतियां बनाने और इसे लागू कराने की जरूरत से बदल जाता है। उपचार केतौर पर वह लोग जो किसी विशेष वोट बैंक का हिस्सा नहीं हैं और अगर उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए तो अलग-अलग राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों के लिए ये लोग महत्वपूर्ण होंगे और वे संकीर्ण सोच को व्यापक करने को मजबूर होंगे। यह स्पष्ट है कि कई जनतंत्रों में मतदाताओं की सहभागिता लगातार गिरावट की ओर है। कई देश इस गिरावट को रोकने के लिए नए रास्ते निकाल रही हैं। इन सभी प्रयासों का मुख्य उद्देश्य मतदान न करने की प्रवृत्ति कम करना है। यह कई तरीकों जैसे पंजीकरण करने कीप्रक्रिया को कम कष्टकर और कम महंगा बनाने, मतदाताओं का श्रम घटाने जिससे सहभागिता घटती है, चुनावों की बारंबारता और जटिलता घटाने, जागरूकता अभियान चलाकर मतदान को आदत और सामाजिक नियम बनाने से किया जा रहा है। भारत में चुनाव सुधारों के क्षेत्र मेंसक्रिय लोगों ने कई सुझाव दिए हैं। उदाहरण के तौर पर चुनाव सुधार के क्षेत्र के चमकते तारे प्रोफेसर सुभाष कश्यप ने मतदान को संवैधानिक तौर पर हर नागरिक को मौलिक कर्तव्य बनाने का सुझाव दिया है। इसे मौलिक कर्तव्यों की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने मतदाताओं की सहभागिता बढ़ाने केलिए प्रोत्साहनों और दंडात्मक कार्रवाई की एक श्रृंखला का भी सुझाव दिया है। उनके अनुसार, हर मतदाता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके पास मतदान का प्रमाणपत्र हो। यह प्रमाणपत्र अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों जैसे गरीबी रेखा के नीचे का राशन कार्ड आदि के लिएमुख्य प्रपत्र के तौर पर काम करेगा। प्रोफेसर कश्यत खास तौर पर मतदान सहभागिता में शहरी आबादी के घटते रुझान से चिंतित हैं। इसके लिए वह सुझाव देते हैं कि पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस सिर्फ मतदान प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की दशा में ही जारी किए जाने चाहिए। हालांकि वक्त की जरूरत परंपरागत तरीकों के साथ ही तकनीक में हुई प्रगति का निर्वाचन प्रक्रिया में प्रयोग है। इससे मतदान प्रक्रिया में समय और लागत दोनों घटेंगे। ऐसा ही एक विकल्प ई-मतदान है जिसका कई देशों में प्रयोग किया जा रहा है। यह विकल्प प्रयोग करने वालेकई देशों में मतदाताओं की सहभागिता और आम नागरिकों के उत्साह में काफी अच्छे नतीजे आए हैं। जहां तक भारत का प्रश्न है, हम भी मतदान सहभागिता में गिरावट के चिंताजनक मुद्दे से लड़ रहे हैं। यद्यपि भारत के चुनाव आयोग ने कई सालों में इस संबंध में प्रशंसनीयऔर गंभीर कदम उठाए हैं लेकिन परिणाम संतुष्टिजनक नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, शहरी उच्च मध्य वर्ग नागरिक लगातार राजनीतिक प्रक्रिया के प्रति उदासनीता दिखा रहे हैं। उनकी सहभागिता भी चिंता का एक विषय है। इसलिए चुनाव क्षेत्र में नए आविष्कारों की तत्काल जरूरत हैजिससे आबादी के इस हिस्से में वोट न डालने की आदत को बड़े पैमाने पर घटाया जा सके। गुजरात के पालिका चुनावों में कुछ क्षेत्रों में ई-मतदान का सहारा लेकर इस संबंध में राह दिखाई गई है। यह मॉडल विशेष तौर पर उच्च मध्यम वर्ग को लक्षित करने में उपयुक्त हो सकता है ताकि इनकी वोट न डालने की आदत खत्म की जा सके और इनको चुनावों में बड़ेपैमाने पर भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। ई-मतदान की उपयुक्तता को तलाशने और अन्य राज्यों में इसे लागू करने या न करने पर गंभीर शोध किए जाने चाहिए। इसे शुरू करने के लिए हम सभी राज्यों के स्थानीय निकाय के चुनावों में इसकी शुरुआत कर सकतेहैं। अगर परिणाम सकारात्मक आएं तो धीरे-धीरे हर तरह के चुनावों में हम इस व्यवस्था का प्रयोग करना चाहिए। काफी जनसंख्या होने के कारण भारत में चुनाव कराना एक बड़ी करसत है। कई बार चुनाव प्रक्रिया बेहद लंबी हो जाती है। कई अवसरों पर यह आम आदमी की कल्पना से भी ज्यादा जटिल हो जाती है। ई-मतदान की अवधारणा पूरी प्रक्रिया में जटिलताओं को खत्म करेगी औरज्यादा मतदाताओं की सहभागिता सुनिश्चित करेगी।  

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राजनीति सबका साथ सबका विनाश, भा.(२)

सबका साथ सबका विनाश, भा.(२)

-डॉ. मधुसूदन– (एक)भा.(१)की प्रतिक्रियाएँ।  आलेख की प्रतिक्रिया में, कुछ विद्वानों के विचार और संदेश आए। एक बड़ा दीर्घ (१० पृष्ठ) अंग्रेज़ी आलेख एक प्रोफेसर ने…

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कविता दिल का अनोखा रिश्ता

दिल का अनोखा रिश्ता

– लक्ष्मी जयसवाल अग्रवाल– सांस दर सांस मुझे याद आते हो तुम    ज़िन्दगी के मेरे सुनहरे पल आज भी जाने अनजाने क्यों सजा जाते हो तुम मेरी…

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राजनीति जनता परिवार, क्या स्थापित हो पाएगा ?

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-मोहम्मद आसिफ इक़बाल– सफर रिक्शा से किया जाये या बस कार और रेल से, सफर के बीच में कई सारे दर्शय हमारी आँखों से गुज़रते…

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राजनीति विपक्ष के एक साल की समीक्षा भी बेहद आवश्यक

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-मृत्युंजय दीक्षित- मोदी सरकार को अब एक साल पूरे हो रहे हैं। मीडिया में मोदी सरकार के कामकाज की समीक्षा पूरे जोर शोर से शुरू…

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मीडिया मीडिया की हकीकत

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-विपिन किशोर सिन्हा- मैं अरविन्द केजरीवाल का समर्थक नहीं हूं, बल्कि उनके घोर विरोधियों में से एक हूं। पाठकों को याद होगा – मैंने उनके…

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जरूर पढ़ें क्या रिश्तों से अपराध की परिभाषा बदल जाती है ?

क्या रिश्तों से अपराध की परिभाषा बदल जाती है ?

-राजेन्द्र बंधु- दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में दिए गए एक फैसले के अनुसार पति द्वारा पत्नी का बलात्कार अपराध की श्रेणी में नहीं…

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परिचर्चा एस.एम.एस. से बन रही है एक नई दुनिया

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-ललित गर्ग- पिछले लगभग दो वर्ष से प्रतिदिन सुबह लगभग 6 बजे मेरे मोबाइल पर एक टंकार बिना किसी नागा के बजती है और मैं…

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कहानी खूबसूरत अंजलि उर्फ़ बदसूरत लड़की की कहानी

खूबसूरत अंजलि उर्फ़ बदसूरत लड़की की कहानी

-सुधीर मौर्य- बहुत खूबसूरत थी वो लड़कपन में। लड़कपन में तो सभी खूबसूरत होते हैं। क्या लड़के, क्या लड़कियां। पर वो कुछ ज्यादा ही खूबसूरत…

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कला-संस्कृति दक्षिण भारत के संत (8) साध्वीअंडाल

दक्षिण भारत के संत (8) साध्वीअंडाल

-बीएन गोयल- पांचवीं और नवीं शताब्दियों के बीच दक्षिण भारत के तमिल भाषी क्षेत्र में आलवार संतों ने भक्तिभाव की एक ऐसी दीपशिखा प्रज्वलित की…

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टॉप स्टोरी सेना के पास हथियारों की कमी

सेना के पास हथियारों की कमी

-प्रमोद भार्गव- -संदर्भः- कैग एवं रक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति की रिपोर्ट- भारतीय रक्षा तंत्र से जुड़ी एक साथ दो हताशा पैदा करने वाली खबरें…

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कला-संस्कृति तीन माताएं:

तीन माताएं:

-डॉ. मधुसूदन- जावे त्याच्या वंशा तेव्हां कळे।-(मराठी) -सन्त तुकाराम जन्मोगे उस वंश में तो ही समझ पाओगे।–सन्त तुकाराम सुना होगा आपने, कि, भगवान हर व्यक्ति…

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