राजनीति असहिष्णुता शांति ही नहीं, स्वास्थ्य के लिये भी घातक

असहिष्णुता शांति ही नहीं, स्वास्थ्य के लिये भी घातक

अन्तर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस – 15 नवम्बर 2024-ललित गर्ग – व्यक्तियों, समाजों एवं राष्ट्रों की एक दूसरे के लिये बढ़ती असहिष्णुता ही युद्ध, नफरत एवं द्वेष…

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खान-पान क्या भारत एक स्वस्थ युवाओं का देश भी है?

क्या भारत एक स्वस्थ युवाओं का देश भी है?

हमारे बच्चों में टाइप 2 मधुमेह के बढ़ते मामलों का गम्भीर विषय सामने आया है । क्या भारत एक स्वस्थ युवाओं का देश भी है?वर्तमान…

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लेख गुरुनानक देव समाजक्रांति एवं धर्मक्रांति के पुरोधा

गुरुनानक देव समाजक्रांति एवं धर्मक्रांति के पुरोधा

गुरुनानक देव जयन्ती- 15 नवम्बर 2024 के उपलक्ष्य में-ललित गर्ग – भारतीय संस्कृति में गुरु नानकदेव एक महान पवित्र आत्मा थे, वे ईश्वर के सच्चे…

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बच्चों का पन्ना किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता सोशल मीडिया

किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता सोशल मीडिया

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने कहा है कि सरकार 16 साल से कम उम्र के लोगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने…

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प्रवक्ता न्यूज़ ब्रिक्स समूह देशों के सम्मेलन में बढ़ा है भारत का कद

ब्रिक्स समूह देशों के सम्मेलन में बढ़ा है भारत का कद

हाल ही में ब्रिक्स समूह के देशों का सम्मेलन रूस के कजान शहर में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में रूस ने भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का गर्मजोशी से स्वागत तो किया ही, साथ ही, चीन के राष्ट्रपति के साथ भी भारत के प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय वार्ता सम्पन्न हुई। इस वार्ता में चीन ने भारत की सीमा के पास जमा कर रक्खे अपने सैनिकों को पीछे हटाकर, सीमा पर वर्ष 2020 की स्थिति बहाल करने की घोषणा की है। भारत को भी अपने सैनिकों को सीमा पर पीछे की ओर ले जाना होगा। इससे भारत एवं चीन की सीमा पर पिछले कुछ वर्षों से लगातार बढ़ रहे तनाव को कम करने में सफलता हासिल होगी। इस संदर्भ में विभिन्न समाचार पत्रों में छपी जानकारी के अनुसार चीन एवं भारत ने अपने 80 से 90 प्रतिशत सैनिकों को वापिस पीछे की ओर हटा लिया है। चीन और भारत के आपस में सम्बंध सुधरने का असर केवल इन दोनों देशों के आपसी तनाव को ही कम नहीं करेगा बल्कि इन सम्बन्धों में सुधार का असर आर्थिक क्षेत्र में भी देखने को मिलेगा। दरअसल चीन आज आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है, चीन में आर्थिक विकास की दर तिमाही दर तिमाही कम हो रही है। चीन के अमेरिका के साथ सम्बंध बहुत अच्छे नहीं रहे है। अमेरिका एवं कई यूरोपीयन देशों ने चीन से विभिन्न वस्तुओं के आयात पर करों को बढ़ा दिया है ताकि चीन से आयात को कम किया जा सके। चीन की आंतरिक अर्थव्यवस्था में भी उत्पादों की मांग लगातार कम हो रही हैं। साथ ही, चीन के भवन निर्माण क्षेत्र एवं बैकिंग क्षेत्र में भी कई प्रकार की समस्याएं खड़ी हो गई हैं। चीन के अपने पड़ौसी देशों, ताईवान, फिलिपींस, जापान, भारत आदि  के साथ भी सम्बंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। इस सबका असर यह रहा है कि चीन ने भारत के साथ अपने सम्बन्धों को सुधारने की पहल शुरू की है ताकि वह भारत के साथ अपने व्यापार को बढ़ा सके एवं अपनी आर्थिक स्थिति को कुछ हद्द तक सुधार सके। हालांकि चीन के विस्तरवादी नीतियों पर चलने के कारण चीन पर तुरंत विश्वास करना बहुत कठिन है। इस संदर्भ में चीन का इतिहास भी इस बात का साक्षी नहीं रहा है कि चीन के सम्बंध किसी भी देश के साथ स्थायी रूप से बहुत अच्छे रहे हों।  ब्रिक्स देशों में विश्व की 45 प्रतिशत आबादी निवास करती है, पूरे विश्व की 33 प्रतिशत भूमि इन देशों के पास है एवं वैश्विक अर्थव्यवस्था में 28 प्रतिशत हिस्सेदारी ब्रिक्स के सदस्य देशों की है। ब्रिक्स समूह ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह गैर पश्चिमी देशों का एक समूह जरूर है, परंतु वह पश्चिमी देशों के विरुद्ध नहीं है। ब्रिक्स समूह को स्थापित करने वाले देशों में ब्राजील, रूस, भारत एवं चीन (BRIC) थे एवं वर्ष 2009 में दक्षिणी अफ्रीका को भी इस समूह में शामिल कर इस BRICS का नाम दिया गया। आगे चलकर मिश्र (ईजिप्ट), ईथीयोपिया, ईरान, सऊदी अरब एवं यूनाइटेड अरब अमीरात को भी ब्रिक्स समूह में शामिल कर इस समूह का विस्तार किया गया। आज विश्व के कई अन्य देश भी ब्रिक्स समूह के सदस्य बनकर ग्लोबल साउथ की आवाज बनना चाहते हैं। हाल ही में रूस के कजान शहर में सम्पन्न ब्रिक्स समूह के सम्मेलन में स्थायी, अस्थाई एवं आमंत्रित 36 देशों ने भाग लिया। ब्रिक्स के इस सम्मेलन में इस विषय पर भी विचार किया गया कि ब्रिक्स देशों के पास एक अपना पेमेंट सिस्टम होना चाहिए एवं वैश्विक स्तर पर हो रहे व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहिए। पश्चिमी देश वर्तमान में पूरे विश्व में लागू स्विफ्ट सिस्टम का दुरुपयोग कर रहे हैं एवं इसके माध्यम से अन्य देशों पर अपनी चौधराहट स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। स्विफ्ट सिस्टम के माध्यम से पूरे विश्व के देशों के बीच धन सम्बंधी व्यवहारों को सम्पन्न किया जाता है। यदि किसी देश को इसकी सदस्यता से हटा लिया जाता है तो वह देश विश्व के अन्य देशों के साथ आर्थिक (धन सम्बंधी) व्यवहार नहीं कर सकता है। रूस यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने जब रूस पर सैंक्शन लगाए थे तब रूस को स्विफ्ट सिस्टम से हटा दिया गया था जिससे रूस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने व्यापार के लेनदेनों का निपटान करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था। इस संदर्भ में, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भारत में लागू यूनिफाईड पेयमेंट सिस्टम (यूपीएस), जिसे भारत में ही विकसित किया गया है, को भी ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों में लागू करने पर विचार करने हेतु समस्त सदस्य देशों से आग्रह किया है। अभी तक भारत के यूनीफाईड पेयमेंट सिस्टम को 7 देशों ने अपना लिया है एवं 30 से अधिक देश इसे अपनाने के लिए विचार कर रहे हैं। भारत में यह सिस्टम बहुत ही सफलता पूर्वक कार्य कर रहा है। दूसरे, पूरे विश्व में डॉलर के प्रभाव को कम करने हेतु भी ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों के बीच चर्चा हुई है। डॉलर के स्थान पर ब्रिक्स करेन्सी को अपनाने अथवा ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों की बीच हो रहे व्यापार सम्बंधी व्यवहारों के निपटान हेतु ये देश आपस में अपनी करेन्सी के उपयोग पर जोर देने पर भी सहमत होते दिखे हैं। ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान ही भारत एवं चीन के बीच हाल ही में सम्पन्न हुए बॉर्डर समझौते के बावजूद भारत को चीन से भारत में होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर अपनी गहरी नजर बनाए रखना चाहिए। भविष्य में भी भारत को चीन से होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति सोच समझकर ही देना चाहिए। क्योंकि, चीन के इतिहास को देखते हुए उस पर आज भी विश्वास नहीं किया जा सकता है। भारत ने हालांकि वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए भारत में होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के 10,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के लक्ष्य को निर्धारित किया है। चीन के साथ भारत के सम्बंध सुधरने के पश्चात इस लक्ष्य को प्राप्त करने में आसानी हो सकती है। परंतु, यह कार्य फिर भी बहुत सोच समझकर ही करना होगा। चीन के साथ भारत का विदेशी व्यापार अत्यधिक मात्रा में ऋणात्मक ही है। भारत ने केलेंडर वर्ष 2023 में चीन से 12,100  करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि के उत्पादों का आयात किया था, परंतु भारत से चीन को निर्यात बहुत ही कम मात्रा में हो रहे हैं तथा चीन द्वारा भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी बहुत कम मात्रा में ही किए जा रहे हैं। चीन, भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाले देशों की सूची में 22वें स्थान पर है और भारत में होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में चीन की हिस्सेदारी केवल 0.37 प्रतिशत की ही है। यह सही है कि चीन के साथ बॉर्डर समझौते के बाद चीन से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ सकता है परंतु भारत को चीन के इतिहास को देखते हुए अभी भी सतर्क रहने की आवश्यकता है।  ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों के बीच आज भारत का कद तो बढ़ ही रहा है, साथ ही, आज विश्व के कई देशों द्वारा यूरोप एवं अमेरिका के प्रभाव से बाहर निकलने के प्रयास भी लगातार किए जा रहे हैं। रूस के राष्ट्रपति ने ब्रिक्स समूह की बैठक में बताया है कि विश्व के कई देश आज ब्रिक्स समूह की सदस्यता ग्रहण करना चाहते हैं। इस प्रकार, ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिणी अफ्रीका) एवं शंघाई समूह आदि संगठन बहुत तेजी से अपने प्रभाव को वैश्विक स्तर पर बढ़ा रहे हैं। दरअसल, आज अमेरिका सहित यूरोपीयन देशों (फ्रान्स, जर्मनी, ब्रिटेन आदि) की आर्थिक परिस्थितियां लगातार बिगड़ती जा रही हैं और इन देशों की आर्थिक प्रगति धीमे धीमे कम हो रही है और ये देश मंदी की चपेट में आने की ओर आगे बढ़ रहे हैं जबकि आर्थिक विकास की दृष्टि से यह सदी अब भारत की होने जा रही है। आने वाले समय में, वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वार्धिक वृद्धि में भारत का योगदान लगभग 16 प्रतिशत तक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। अतः विश्व के कई शक्तिशाली देश आज भारत के साथ अपने सम्बन्धों को मजबूती देना चाहते हैं, इसी के चलते ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों के बीच भी भारत का कद अब बढ़ता दिखाई दे रहा है।  प्रहलाद सबनानी

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लेख लड़कियों को भी खेलने के अवसर मिलने चाहिए

लड़कियों को भी खेलने के अवसर मिलने चाहिए

सरिता नायकलूणकरणसर, राजस्थान हाल ही में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पूर्व स्पिनर नीतू डेविड को अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने अपने हॉल ऑफ़ फेम…

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राजनीति पाकिस्तान का नया दांव है डिजिटल घुसपैठ 

पाकिस्तान का नया दांव है डिजिटल घुसपैठ 

सुनील कुमार महला भारत एक ऐसा देश है जो सदियों से पंचशील के सिद्धांतों का पालन करता आया है। एशिया और अफ्रीका के विभिन्न देशों…

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खान-पान बढ़ते मधुमेह को नियंत्रित करने की वैश्विक चुनौती

बढ़ते मधुमेह को नियंत्रित करने की वैश्विक चुनौती

विश्व मधुमेह दिवस- 14 नवम्बर, 2024-ललित गर्ग- डायबिटीज यानी मधुमेह दुनियाभर में तेजी से बढ़ती ऐसी बीमारी है जो अन्य अनेक बीमारियों एवं शरीर की…

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खान-पान देश के लिये कलंक है मिलावटी व नक़ली खाद्य सामग्री का चलन

देश के लिये कलंक है मिलावटी व नक़ली खाद्य सामग्री का चलन

                                                  …

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पुस्तक समीक्षा बाल प्रज्ञान: बालमन का सुन्दर विश्लेषण

बाल प्रज्ञान: बालमन का सुन्दर विश्लेषण

सन् 1989 में हरियाणा में जन्मे डॉ. सत्यवान सौरभ बालसाहित्य के एक सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक डॉ. सत्यवान सौरभ ने बच्चों के…

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लेख भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज का रहा है विशेष योगदान

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज का रहा है विशेष योगदान

15 नवम्बर: भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिवस एवं जनजातीय गौरव दिवस पर लेख मां भारती को अंग्रेजी शासनकाल की दासता की यन्त्रणा से मुक्त कराने हेतु जनजातीय समाज ने अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए थे। दरअसल, जनजातीय समाज चूंकि बहुत घने जंगलों में निवास करता था अतः वह अंग्रेजों की पकड़ से कुछ दूर ही रहा, हालांकि समय समय पर अंग्रेजी शासन को परेशान करने में सफल जरूर रहा। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कई प्रकार के आंदोलन जनजातीय समाज द्वारा चलाए गए थे। इन आंदोलनों को चलाने में आदिवासीयों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है, इन आदिवासी समुदायों में तामार, सन्थाल, खासी, भील, मिजो और कोल विशेष रूप से शामिल रहे हैं।       भारत में इतिहास को बहुत तोड़ मरोड़कर लिखा गया है। वर्तमान भारतीय इतिहास का अधय्यन करने पर ध्यान में आता है कि भारत के इतिहास को केवल लगभग 800 वर्षों के मुगल शासकों के इर्द गिर्द समेट दिया गया है और भारत में मुगल शासकों का कालखंड जैसे स्वर्णकाल रहा है तथा भारत के इतिहास में इस कालखंड को विशेष स्थान दिया गया है। मुगल शासकों के पश्चात भारत में अंग्रेजी शासनकाल के दौरान जनजातीय समाज द्वारा मां भारती को स्वतंत्रता दिलाने के दिए गए महान योगदान का तो भारत के वर्तमान इतिहास में कहीं वर्णन ही नहीं मिलता है। जनजातीय समाज के कई युवा योद्धा जिन्होंने अंग्रेजों के क्रूर शासन के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजाने में सफलता हासिल की थी, की सूची पर यदि ध्यान दें, तो इस सूची में हम मुख्य रूप से शामिल पाएंगे भगवान बिरसा मुंडा, शहीद वीर नारायण सिंह, श्री अल्लूरी सीताराम राजू, रानी गौडिल्यू और सिद्धू एवं कान्हूं मुर्मू को।  भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को हुआ था, आप मुंडा जनजाति के सदस्य थे एवं आपने 19वीं शताब्दी के अंत में आधुनिक झारखंड एवं बिहार के आदिवासी क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन के दौरान एक भारतीय आदिवासी धार्मिक सहस्त्राब्दी आंदोलन का नेतृत्व किया था। बिरसा मुंडा ने भारत की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने शोषक ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ी। भगवान बिरसा मुंडा की तरह ही देश के अन्य राज्यों में भी जनजातीय समाज के कई रणबांकुरों द्वारा अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को अंग्रेजों के क्रूर शासन से मुक्त कराने में अपना योगदान दिया गया था। भगवान बिरसा मुंडा को “धरती आबा” भी कहा जाता है।  इसी प्रकार, शहीद वीर नारायण सिंह को छत्तीसगढ़ में सोनाखान का गौरव माना जाता है, आपने वर्ष 1856 के अकाल के बाद व्यापारियों के अनाज के गोदामों को लूटकर गरीब नागरिकों के बीच बांट दिया था। आपके बलिदान ने आपको आदिवासी नेता बना दिया एवं आप 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के पहले शहीद बने थे। श्री अल्लूरी सीताराम राजू का जन्म 4 जुलाई 1897 को आन्ध्रप्रदेश में भीमावरम के पास मोगल्लु गांव में हुआ था। श्री अल्लूरी को अंग्रेजों के खिलाफ “रम्पा विद्रोह” का नेतृत्व करने के लिए सबसे अधिक याद किया जाता है, जिसमें आपने विशाखापत्तनम और पूर्वी गोदावरी जिलों के आदिवासी नागरिकों को अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए संगठित किया था। आपका अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन उस खंडकाल में बंगाल के क्रांतिकारियों से प्रेरणा प्राप्त करता था। रानी गौडिल्यू नागा समुदाय की आध्यात्मिक एवं राजनैतिक नेता थीं। आपने भारत में अंग्रेजी शासनकाल के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया था। केवल 13 वर्ष की आयु में आप अपने चचेरे भाई हाईपौ जादोनांग के हेराका धार्मिक आंदोलन में शामिल हो गईं थी। आपके लिए नागा लोगों की स्वतंत्रता के लिए भारत के व्यापक आंदोलन का हिस्सा थीं। आपने मणिपुर क्षेत्र में गांधी जी के संदेश का प्रचार प्रसार भी किया था। 30 जून 1855 को 1857 के विद्रोह से दो वर्ष पूर्व दो सन्थाल भाईयों सिद्धू और कान्हू मुर्मू ने 10,000 संथालों को एकत्रित किया एवं अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की घोषणा कर दी थी। आपके साथ एकत्रित हुए समस्त आदिवासियों ने अंग्रेजों को अपनी मातृभूमि से भगाने की शपथ ली थी। मुर्मू भाईयों की बहनों, फूलो एवं झानो, ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई थी।  पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों ने देश को स्वतंत्रता दिलाने में अतुलनीय योगदान करने वाले रणबांकुरों के योगदान को न केवल पहचाना है बल्कि इस योगदान को भारतीय नागरिकों के बीच रखने के प्रयास भी किया है। वर्ष 2021 में स्वतंत्रता दिवस के 75वें समारोह के उपलक्ष में केंद्र सरकार द्वारा बहादुर आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करने हेतु “15 नवम्बर” को “जनजातीय गौरव दिवस” के रूप में मनाए जाने का निर्णय लिया गया था। इसके बाद से प्रत्येक वर्ष 15 नवम्बर के दिन को सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और राष्ट्रीय गौरव, वीरता एवं आतिथ्य के भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने में आदिवासियों के प्रयासों को मान्यता देने हेतु भारत में “जनजातीय गौरव दिवस” का आयोजन किया जा रहा है। 15 नवम्बर को ही बिरसा मुंडा की जयंती भी रहती है, जिन्हें भारत में जनजातीय समाज में भगवान के रूप में सम्मानित किया जाता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज के योगदान को याद करते हुए अगस्त 2016 में दिल्ली के लाल किले से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के आह्वान पर, रांची स्थित 150 वर्षों से अधिक पुरानी विरासत इमारत को केंद्र एवं राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय के रूप में संरक्षित एवं पुनः स्थापित किया गया है। यह इमारत पहले एक जेल के रूप में इस्तेमाल हो चुकी है, जहां भगवान बिरसा मुंडा को कैद किया गया था। 25 एकड़ में फैले इस संग्रहालय में कई पर्यटक आकर्षण हैं, जिनमें अंडमान जेल की तर्ज पर मनमोहक लाइट और साउंड शो का आयोजन किया जाता है तथा भगवान बिरसा मुंडा के जन्म से मृत्यु तक के जीवन के विभिन्न चरणों को दिखाने वाली तीन दीर्घाओं (चलचित्र कक्ष) में लगभग 20 मिनट की एक आडियो विजुअल फिल्म दिखाई जाती है। संग्रहालय के बाहरी लॉन में उलीहातू गांव को फिर से बनाया गया है। संग्रहालय में भगवान बिरसा मुंडा की 25 फीट की मूर्ति भी है। इसके साथ ही, संग्रहालय में विभिन्न आंदोलनों से जुड़े अन्य स्वतंत्रता सेनानियों जैसे शहीद बुधू भगत, सिद्धू-कान्हू, नीलाम्बर-पीताम्बर, दिवा-किसुन, तेलंगा खाड़िया, गया मुंडा, जात्रा भगत, पोटो एच, भागीरथ मांझी, गंगा नारायण सिंह की नौ फीट की मूर्तियां भी शामिल हैं। बगल के 25 एकड़ रकबे में स्मृति उद्यान को विकसित किया गया है और इसमें संगीतमय फव्वारा, फूड कोर्ट, चिल्ड्रन पार्क, इन्फिनिटी पूल, उद्यान और अन्य मनोरंजन सुविधाएं मौजूद हैं। इस संग्रहालय का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा 15 जवंबर 2021 को पहिले जनजातीय गौरव दिवस के शुभ अवसर पर किया गया था। इसी प्रकार, आज केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा विशेष रूप से जनजातीय समाज के हितार्थ आर्थिक क्षेत्र, शिक्षा के क्षेत्र, चिकित्सा के क्षेत्र, आदि में कई प्रकार की योजनाएं पूरे देश में चलाई जा रही हैं। प्रहलाद सबनानी

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कमलेश पांडेय आखिर हिंदुओं की मुख्यधारा से पहले सिख, फिर बौद्ध और जैन को तोड़ने के बाद अब जिस तरह से सरना की आड़ में…

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