क्या अपसंस्कृति और उपभोक्तावाद के प्रवक्ता हैं टीवी चैनल
Updated: December 19, 2011
-संजय द्विवेदी टीवी चैनलों की धमाल को रोकने के लिए शायद यह सरकार का पहला बड़ा कदम था। ‘बिग बास’ और ‘राखी का इंसाफ’ नाम…
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टेलीविजन का तालिबानी मुक्तराज्य
Updated: December 19, 2011
-जगदीश्वर चतुर्वेदी टेलीविजन में तालिबानी तांडव चल रहा है। भारत के विभिन्न समाचार चैनल टीवी समाचारों के सभी किस्म के एथिक्स और कानूनों को त्यागकर…
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कविता/ यह कैसा लोकतंत्र ?
Updated: December 19, 2011
-राजीव दुबे मानवीय संवेदनाओं पर होता नित निर्मम प्रहार, सीधे चलता जन निर्बल माना जाता, रौंदा जाता जनमत प्रतिदिन…, यह कैसा लोकतंत्र – यह कैसा…
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फासिस्ट कौन ?
Updated: December 19, 2011
-विजय कुमार न जाने कब से दिग्विजय सिंह, अर्जुन सिंह, राहुल गांधी, सोनिया और उनके दुमछल्ले संघ पर झूठे आरोप लगा रहे थे। दिग्विजय सिंह…
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रक्त मुद्रा की समानांतर अर्थव्यवस्था
Updated: December 19, 2011
–रामदास सोनी धन वैध हो या अवैध, मनुष्य के ईमान को हिलाकर रख देता है। अकूत धन कमाने की लालसा निंरतर बढ़ती जाती है, यह…
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अल्पसंख्यक वोट राजनीति और संघ
Updated: December 19, 2011
-आर.एल.फ्रांसिस भारतीय राजनीति ने समाज को जोड़ने की जगह तोड़ने का काम ज्यादा किया है। नेताओं ने वोट बैंक के लालच में भारतीय समाज को…
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साहित्यिक पत्रकारिता के नए आयाम
Updated: December 19, 2011
-जगदीश्वर चतुर्वेदी साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता में थीम का महत्वपूर्ण होना स्वयं में समस्यामूलक है।हिन्दी की अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं ने फासीवाद, प्रेम,बेबफाई , साम्प्रदायिकता, आतंकवाद,भूमंडलीकरण…
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व्यंग्य/विपक्ष का मुंह बंद कर दिया रे……
Updated: December 19, 2011
-अशोक गौतम ‘मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक किस्सा सुनाऊं….. मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक किस्सा सुनाऊं। किसका किस्सा सुनोगे? राष्ट्रमंडल खेलों में खिलाड़ियों…
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व्यर्थ ही बीत गया जैव –विविधता वर्ष
Updated: December 19, 2011
–पंकज चतुर्वेदी संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष २०१० को जैव –विविधता वर्ष घोषित किया है। ऐसा इस लिए की विश्व भर में जैव –विविधता गहरे…
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हिन्दी का भाषा वैभव – डॉ. मधुसूदन उवाच
Updated: December 19, 2011
भाषा की क्षमता के क्या निकष (कसौटियां) होने चाहिये? मैंने इस विषय में कुछ विचार, चिन्तन, मनन किया है और भी करता रहूंगा। अभी तक…
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अवसाद के युग में साहित्य
Updated: December 19, 2011
साहित्य का वर्तमान बदला रूप अधिकतर लोगों की समझ में नहीं आ रहा । इन दिनों भाषिक प्रयोगों और मध्यकालीन विषयवस्तुओं की प्रासंगिकता नजर आ…
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मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता का परोसा जाना…
Updated: December 19, 2011
सूचना एंव संचार के क्षेत्र में आई ज़बरदस्त क्रांति ने टेलीविज़न के क्षेत्र में भी तमाम नए आयाम जोड़े हैं। समय के आगे बढ़ने के…
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