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अत्यंत दुःखद है भारत का कोई राष्ट्रभाषा नहीं होना

अशोक प्रवृद्ध

यह अत्यंत दुर्भाग्यजनक स्थिति है कि भारत का आज तक कोई राष्ट्रभाषा नहीं है और न ही भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्र भाषा के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। हाँ, यह सच है कि केन्द्र सरकार ने अपने कार्यों के लिए हिन्दी और अंग्रेजी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता प्रदान की है, और असमी, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संतली, सिंधी, तमिल, तेलुगू, बोड़ो, डोगरी, बंगाली और गुजराती आदि बाईस स्थानीय भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी है, जिसमें केन्द्र सरकार या राज्य सरकारें अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में चुन सकती है। वर्तमान में सभी 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है। 2010 में गुजरात उच्च न्यायालय ने भी सभी भाषाओं को समान अधिकार के साथ रखने की बात की थी, हालांकि न्यायालयों और कई स्थानों में सिर्फ और सिर्फ विदेशी अंग्रेजी भाषा को ही जगह दिया गया है।

उल्लेखनीय है कि भारत की जन- जन की प्रिय भाषा हिन्दी भारतीय गणराज की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है। सन 2001 की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिन्दी भाषा का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी पचास से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं। सन 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के आँकड़े में हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। समस्त रूपों में राष्ट्रभाषा का स्थान प्राप्त करने की क्षमता रखते हुए भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया जाना राष्ट्रप्रेमियों के लिए अत्यंत दुःखदायक है। ध्यातव्य हो कि समस्त राष्ट्र में जन- जन के विचार विनिमय का माध्यम जो भाषा हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है। इस प्रकार राष्ट्रभाषा का शाब्दिक अर्थ हुआ – समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त होने वाली भाषा अर्थात आमजन की भाषा अर्थात जनभाषा। राष्ट्रभाषा ही राष्ट्रीय एकता एवं अंतर्राष्ट्रीय संवाद सम्पर्क की आवश्यकता की उपज होती है। वैसे तो सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ होती हैं, किन्तु जब राष्ट्र की जनता स्थानीय एवं तात्कालिक हितों व पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र की कई भाषाओं में से किसी एक भाषा को चुनकर उसे राष्ट्रीय अस्मिता का एक आवश्यक उपादान समझने लगती है तो वही भाषा राष्ट्रभाषा होती है। स्वाधीनता संग्राम जैसी स्थिति में राष्ट्रभाषा की आवश्यकता महसूस होती है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के समय भी ऐसी आवश्यकता स्वाधीनता सेनानियों को महसूस हुई, तो इस आवश्यकता की पूर्ति हिन्दी भाषा  ने ही की। और स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही हिन्दी राष्ट्रभाषा बनी और इस भूमिका को बखूबी निभाई भी। लेकिन क्षोभकारक स्थिति यह है कि हिन्दी आज भी हमारी राष्ट्रभाषा न होकर राजभाषा है और राष्ट्रप्रेमियों के लाख कोशिश के बाद भी आज तक यह राजभाषा के दर्जे से आगे बढ़कर राष्ट्रभाषा के सम्मानित स्थान को प्राप्त करने में असफल रही है। इसके असफल होने के पीछे एक गहरा षड्यंत्र काम करता रहा है। जहां राजनीतिक लोगों की संकीर्ण राजनीतिक सोच इसके लिए जिम्मेदार है, वहीं कुछ अन्य सामाजिक संगठन व भाषाई पूर्वाग्रह रखने वाले लोगों को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जा सकता है। भारत, भारतीय और भारतीयता के विरोधियों की फैलाई गई भ्रान्ति के अनुसार भारत विविधताओं का देश है, और इन सारी विभिन्नताओं को ज्यों का त्यों बनाए रखकर इसकी एकता स्थापित की जानी चाहिए। जबकि ऐसा होना कदापि सम्भव नहीं कि सारी विभिन्नताओं को पृथक -पृथक दूध पिला पालते- पोसते हुए एकता – समन्वय हो सके। एकता के लिए यह आवश्यक है कि विभिन्नताओं के उभरते स्वरूपों को शनैः- शनैः निःशेषप्राय समाप्त कर दिया जाए और एक स्थान पर लाकर सबको सहमत कर लिया जाए । लेकिन ठीक इसके विपरीत देश में विभिन्नताओं को बनाए रखने के लिए राजनेताओं ने भारत की अनेकों भाषाओं को दूध पिला- पिला कर उन्हें भारत की राजभाषा की विरोधी बनाने का घृणित कार्य किया है। देश की सभी भाषाएं अपने स्थान पर सम्मान पूर्ण ढंग से बनी रहें , यह प्रयास करना एक अलग बात है, लेकिन इससे बड़ी श्रेष्ठ व प्रशंसनीय बात यह है कि देश की सभी भाषाओं को इतना उदार और सहिष्णु बना देना कि वह राजभाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में सम्मानित कर सकें । जिसके लिए प्रयास किया जाना अपेक्षित था, लेकिन वह भारत विभाजन के पश्चात सतराधिक वर्षों में नहीं हो सका। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर 1949 को मिला था, लेकिन राष्ट्रभाषा की दर्जा देने को लेकर लंबी बहसें चली और परिणाम कुछ नहीं निकला। जबकि देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा होने के कारण ही मोहन दास करमचन्द गांधी ने हिन्दी को जनमानस की भाषा कहा था, और वर्ष 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही थी। गांधी के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू ने भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की वकालत की थी। लेकिन ठीक इसके विपरीत नेहरू के शासनकाल में हिन्दी को एक खिचड़ी भाषा के रूप में विकसित करने का अतार्किक और अवैज्ञानिक प्रयास किया गया। शासकीय स्तर पर हिन्दी में देश की सभी भाषाओं के शब्दों को सम्मिलित कर एक ऐसी खिचड़ी भाषा  बना लेने की कोशिश की गई,जिस पर किसी को आपत्ति न हो । देखने में तो अच्छा लगने वाला यह प्रयास वास्तव में हिन्दी का सर्वनाश करने वाला सिद्ध हुआ।

उल्लेखनीय यह भी है कि संविधान निर्माण के समय भी निर्माताओं के समक्ष भी यह प्रश्न बड़ी गंभीरता से सामने आया कि देश की राष्ट्रभाषा किसे बनाया जाए? यह अत्यंत दुखद स्थिति है कि हिन्दी जैसी समृद्ध भाषा और देवनागरी जैसी वैज्ञानिक लिपि होने के बाद भी यह प्रश्न संविधान निर्माताओं के समक्ष उपस्थित हुआ कि देश के संविधान को किस भाषा में लिखा जाए ? उस समय कभी हिन्दी की वकालत करने वाले गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने हिंदुस्तानी अर्थात हिन्दी और ऊर्दू के मिश्रित भाषा का समर्थन किया। उस समय विभाजन की पीड़ा से पीड़ित बहुत से सदस्य गांधी और नेहरू के उपरोक्त खिचड़ी भाषा के प्रस्ताव से असहमति रखते थे और उन्होंने गांधी नेहरू के इस प्रस्ताव को गिरा दिया गया, परन्तु बाद में जब नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपनी बात को ही सर्वोपरि रखने के लिए खिचड़ी भाषा हिंदुस्तानी के प्रयोग को ही जारी रखना उचित समझा और उन्होंने जबरन ऐसा ही किया। संविधान के निर्माण के समय संविधान सभा में बैठकर बहस करने वाले कुछ सदस्य ऐसे थे जो हिंदुस्तानी और हिन्दी में अपनी बातों को कहने का प्रयास करने वालों का विरोध करते थे । ऐसे सदस्य हिंदुस्तानी और हिन्दी में  रखे गये किसी भी वक्तव्य का अनुवाद अंग्रेजी में करने की मांग करते थे। इससे हिन्दी विरोध की गूंज संविधान सभा में रह रहकर उठने लगी । मुट्ठी भर सदस्य हिन्दी विरोध के नाम पर लामबंद होने लगे । ये लोग नहीं चाहते थे कि हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में सम्मान प्राप्त करे। दक्षिण भारत के कुछ बड़बोले नेताओं ने तो इस मुद्दे पर देश के बंटवारे की चेतावनी तक दे डाली । फिर भी लंबी बहस के बाद संविधान सभा ने यह फैसला लिया कि भारत की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागिरी लिपि होगी, और संविधान लागू होने के 15 वर्ष पश्चात अर्थात 1965 तक सभी राजकाज के काम अंग्रेजी भाषा में किए जाएंगे। उसके बाद इस विषय पर विचार कर हिन्दी को राष्ट्रभाषा की दर्जा दिए जाने पर कोई निर्णय लिया जाएगा । हिन्दी समर्थक नेताओं बालकृष्णन शर्मा और पुरुषोत्तम दास टंडन ने अंग्रेजी का पुरजोर विरोध किया, लेकिन विदेशी भाषा समर्थकों के आगे इनके एक न चली। संबिधान सभा के फैसले के अनुसार 1965 में राष्ट्रभाषा पर फैसला लेने का समय आया तो, तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का निर्णय ले लिया था लेकिन इसके बाद तमिलनाडु में हिंसक प्रदर्शन हुए। प्रदर्शन के दौरान दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में हिन्दी की पुस्तकें जलाई गईं, कई लोगों ने तमिल भाषा के समर्थन के लिए अपनी जान तक दे दी, जिसके बाद कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने अपने निर्णय पर नर्मी दिखाई और घोषणा की कि राज्य अपने यहां होने वाले सरकारी काम- काज के लिए कोई भी भाषा चुन सकता है। कांग्रेस के फैसले में कहा गया कि केंद्रीय स्तर पर हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग किया जाएगा और इस प्रकार हिन्दी के कड़े विरोध के बाद देश की केवल राजभाषा बनकर ही रह गई, राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। ऐसे कांग्रेसियों का नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित कर रही थीं। तब से लेकर अब तक हिन्दी को उसका सर्वोच्च स्थान अर्थात राष्ट्रभाषा का दर्जा दिए जाने के सम्बन्ध में कोई विशेष कार्रवाई नहीं हो सकी है, जबकि हर वर्ष हिन्दी दिवसादि पर हिन्दी भाषा से सम्बन्धित अनेकानेक कार्यक्रम सरकारी- गैरसरकारी स्तर पर आयोजित किये जाते रहे हैं । प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के केन्द्रीय सत्ता में सत्तारुढ़ होने के बाद हिन्दी के राष्ट्रभाषा का दर्जा दिए जाने और जन -जन के प्रिय भारत की इस भाषा के दिन बहुरने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन खेदजनक स्थिति यह है कि अब तक इस सन्दर्भ में मोदी सरकार के द्वारा कुछ नहीं किया गया ।

विश्व सीनियर सिटीजन दिवस :: करें बुजुर्गों का आदर सत्कार व देखभाल ,ये है जीवन का अनमोल आधार

भगवत कौशिक

आज 21 अगस्त यानी वर्ल्ड सीनियर सिटीजन दिवस,स्पष्ट शब्दों मे कहे तो अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस।हमारे बुजुर्गों के लिए सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से ही हर वर्ष 21 अगस्त को विश्व सीनियर सिटीजन दिवस मनाया जाता है। बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना प्रकट करने व उनको यह अहसास दिलाने की आप हमारे लिए महत्वपूर्ण और सम्मानीय हो इसी उद्देश्य के चलते अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने इस दिन को देश-दुनिया के सीनियर सिटीजेन्स को समर्पित करने के लिए इस दिन को मनाने की शुरुआत की। इसलिए आप भी कोशिश करें कि अपने परिवार और आस-पास के सभी वरिष्ठ जनों का सम्मान करेंगे
■ संस्कारों और अनुभव का खजाना है हमारे बुजुर्ग –
 हमारे समाज मे बुजुर्ग हमेशा से परिवार के मुखिया के तौर पर सम्मानिय रहे है।सयुंक्त परिवार मे तो बुजुर्ग की अहमियत सबसे ज्यादा रही है।परिवार को एक सूत्र मे पिरोने का कार्य हमेशा से हमारे बुजुर्गों ने किया है।इनकी अहमियत का अंदाजा हम इन शब्दों से लगा सकते है कि “कुछ पल बैठा करो बुजुर्गों के पास हर चीज गूगल पर नहीं मिलती”। जी हा आज के इस आधुनिक युग मे हम इंटरनेट के माध्यम से हर जानकारी तो कुछ पल मे ही हासिल कर सकते है ,लेकिन अच्छे संस्कार और आचरण हमे परिवार के बुजुर्ग सदस्यों से बढकर कोई नहीं दे सकता।बुजुर्ग हैं तो बच्चों की कहानियां गुलजार हैं। दुआओं की दुनिया आबाद है। रिश्तों की अहमियत बरकरार है। अनुभव का खजाना, स्नेह का नजराना। कंपकपाती अंगुलियों से बरसा आशीर्वाद ऊर्जा का संचार करता है। इस सब गुणों का एकमात्र भंडार हमारे बुजुर्ग ही है।
भारत, पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है और अब ये आत्मनिर्भर लोगों का भी देश बन चुका है। बावजूद यहां वरिष्ठ नागरिकों की स्थिति को लेकर हमेशा सवाल खड़े होते रहते हैं। देश में बुजुर्गों के साथ होने वाले अपराधों की संख्या भी बहुत ज्यादा है। ये एक ऐसी अवस्था है जब तन ही नहीं, व्यक्ति मन से भी बीमार पड़ने लगता है। ऐसे में बुजुर्गों को खास देखभाल की जरूरत होती हैइतिहास में अनेकों ऐसे उदाहरण है कि माता-पिता की आज्ञा से भगवान श्रीराम जैसे अवतारी पुरुषों ने राजपाट त्याग कर वनों में विचरण किया, मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार ने अपने अन्धे माता-पिता को काँवड़ में बैठाकर चारधाम की यात्रा कराई। फिर क्यों आधुनिक समाज में वृद्ध माता-पिता और उनकी संतान के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं। आज का वृद्ध समाज-परिवार से कटा रहता है और सामान्यतः इस बात से सर्वाधिक दुःखी है कि जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो लेना चाहता है और न ही उनकी राय को महत्व देता है। समाज में अपनी एक तरह से अहमितय न समझे जाने के कारण हमारा वृद्ध समाज दुःखी, उपेक्षित एवं त्रासद जीवन जीने को विवश है।
■ भारत मे बुजुर्गों की संख्या –
भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की जनसंख्या 104 करोड़ थी। इनमें 51 करोड़ पुरुष और 53 करोड़ महिलाएं थीं। अनुमान है कि इस वक्त भारत में 125 से 150 करोड़ बुजुर्ग नागरिक होंगे।
■ देश में एक चौथाई बुजुर्ग अकेले रहने को मजबूर–
मां-बाप बड़े अरमानों से बच्चों को पढ़ा लिखाकर काबिल बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन हैरानी तब होती है जब बुढ़ापे में ये ही बच्चे मां-बाप को उनके हाल पर अकेला छोड़ देते हैं। पिछले साल दिल्ली के एक गैर सरकारी संगठन एजवेल फाउंडेशन ने देश के 20 राज्यों के 10 हजार बुजुर्गों पर एक सर्वेक्षण किया था। इसकी रिपोर्ट डराने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक, 23.44 फीसद यानी देश का का हर चौथा बुजुर्ग देश में अकेला रहने को मजबूर है। ऐसा भी नहीं कि यह बुराई शहरों तक सीमित है। रिपोर्ट कहती है कि 21.38 फीसद बुजुर्ग गांवों में जबकि 25.3 फीसद शहरों में अकेले रह रहे हैं।
■ आदर, सेवा और सम्‍मान के अधिकारी है बुजुर्ग –
 वृद्धावस्था जीवन का अनिवार्य सत्य है। जो आज युवा है, वह कल बूढ़ा भी होगा ही, ऐसे में युवाओं को एक बात बड़ी गहराई से बैठा लेनी होगी कि उन्हें भी समय के इस चक्र के गुजरना होगा और बुजुर्गों का आदर सम्मान और सेवा करनी चाहिए।
■ आखिर बुजुर्गों की समस्या का कारण क्या है —
 जब युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों को उपेक्षा की निगाह से देखने लगती है और उन्हें अपने बुढ़ापे और अकेलेपन से लड़ने के लिए असहाय छोड़ देती है। आज वृद्धों को अकेलापन, परिवार के सदस्यों द्वारा उपेक्षा, तिरस्कार, कटुक्तियां, घर से निकाले जाने का भय या एक छत की तलाश में इधर-उधर भटकने का गम हरदम सालता रहता। वृद्धों को लेकर जो गंभीर समस्याएं आज पैदा हुई हैं, वह अचानक ही नहीं हुई, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति तथा महानगरीय अधुनातन बोध के तहत बदलते सामाजिक मूल्यों, नई पीढ़ी की सोच में परिवर्तन आने, महंगाई के बढ़ने और व्यक्ति के अपने बच्चों और पत्नी तक सीमित हो जाने की प्रवृत्ति के कारण बड़े-बूढ़ों के लिए अनेक समस्याएं आ खड़ी हुई हैं।
■ परिवार को जोड़ने की अहम कड़ी हैं बुजुर्ग-
 बुजुर्ग परिवार की  शान होते हैं और इनसे परिवार एक गांठ में जुड़ा रहता है।बुजुर्गों के कारण ही आज भी समाज मे संयुक्त परिवार बचे हुए है।परिवार के सुख दुख मे हमारे बुजुर्ग एक अहम भूमिका निभाते है और परिवार का हिम्मत और हौसला बढाते है।

■  केवल सम्मान और प्यार की ही रखते है इच्छा –
जबकि, एक तरह से देखा जाए तो परिवार के वरिष्ठ नागरिक आपसे सिर्फ सम्मान और प्यार की आशा रखते हैं, न कि धन और सुख-सुविधाओं की। वाबजूद इसके अक्सर लोग अपने परिवार के वरिष्ठजनों के साथ रहने में हिचकिचाते हैं और उनसे अलग रहना पसंद करते हैं।
हमें समझना होगा कि अगर समाज के इस अनुभवी स्तंभ को यूं ही नजरअंदाज किया जाता रहा तो हम उस अनुभव से भी दूर हो जाएंगे, जो हमारे समाज और खासकर बच्चों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

शुक्र मनाइए कि आपकी नौकरी बची हुई है !

-निरंजन परिहार

शुक्र मनाइए कि आप उन दो करोड़ लोगों में नहीं है, जिनकी, लॉकडाउन में चलती नौकरियां चली गई हैं और अगर आप उन 22 करोड़ लोगो में नहीं है, जो लॉकडाउन में काम धंधा बंद होने से बेरोजगार होकर घर बैठने को मजबूर हैं, तो भी शुक्र मनाइए। क्योंकि हमारे हिंदुस्तान में कोरोना ने कोहराम मचा रखा है। जिंदगियों के साथ वह रोजगार भी खाए जा रहा है। वायरस से फैल रही इस महामारी ने हमारे हिंदुस्तान में 29 लाख लोगों बीमार कर रखा है। इसलिए लोग डर रहे हैं। लगभग 55 हजार लोग मर गए हैं, सो सारा समाज भयभीत है। इन दिनों हमारा सारा ध्यान केवल कोरोना के बीमार, कोरोना की बीमारी और कोरोना के मामले में की जा रही सरकार की बातों पर है। लेकिन सच कहें, तो कोरोना की बीमारी का जितना हल्ला मचाया जा रहा है, उससे बहुत ज्यादा डरने की जरूरत नहीं लगती। बल्कि डरिए इस बात से कि कल आपका रोजगार बचेगा कि नहीं। डरिए इस तथ्य से कि आपकी नौकरी पर मंडराता खतरा आनेवाले दिनों में आपकी आय को खा रहा है।  और डरिए इस बात से कि आनेवाले किसी रोज आप अचानक सड़क पर आनेवाले हैं। कोरोना की महामारी ने भारत में बेकारी और बेरोजगारी की बाढ़ ला दी है।  लॉकडाउन ने करोड़ों जिंदगियों की खुशियों पर लॉक लगा दिया है और इतने ही परिवारों की जिंदगी को डाउनफॉल में धकेल दिया है। अप्रैल से अब तक 1 करोड़ 89 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है, लेकिन कुल मिलाकर देश में लगभग 22 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया है।

रोजगार रेजगारी की तरह बिखर रहे हैं।  इस मामले में भारत की तस्वीर बहुत भयावह है, और सरकार है कि सिर्फ संक्रमण की बीमारी का हल्ला मचाए हुए है। भारत की कुल 135 करोड़ जनता में से कोरोना वायरस संक्रमण से बीमार तो केवल 28 लाख 71 हजार 35 लोग ही हुए हैं, लेकिन कोरोना ने बीते 5 महीनों में लगभग दो करोड़ लोगों को बेराजगार कर दिया है। एक करोड़ से ज्यादा लोगों की सैलरी आधी हो गई हैं और इतने ही परिवार आयविहीन हो गए हैं। ऐसे में आप और हम सारे लोग सरकार की बातों की तरफ ध्यान देकर सिर्फ कोरोना से बीमार लोगों के आंकड़ों को देख देख कर डर रहे हैं, रो रहे हैं और कोहराम मचा रहे हैं। हालांकि बीमार तो फिर भी ठीक हो जाएंगे, और बहुत बड़ी संख्या में हो भी रहे हैं। लेकिन छूटी हुई नौकरियां फिर से मिलने की संभावनाएं क्षीण हो रही हैं। आधी तनख्वाह में भी लोगों को काम नहीं मिल रहा है। यह तथ्य है कि 24 मार्च से लॉकडाउन शुरू होने के बाद अब तक कुल भारत में 2 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़े गवाह है कि भारत में लॉकडाउन ने बेरोजगारों की बाढ़ ला दी है। सीएमआईई के आंकड़ों में यह बात सामने आई है कि अप्रेल की शुरूआत से अब तक  भारत में 1 करोड़ 89 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। इस रिपोर्ट का अध्ययन करने पर साफ पता चलता है कि अकेले जुलाई महीने में लगभग 50 लाख लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है। इस रिपोर्ट के पिछले आंकड़ों को देखें, तो अप्रैल महीने में 1 करोड़ 77 लाख लोगों की नौकरी गई थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि जून महीने में लगभग 39 लाख नौकरियां मिली थीं, लेकिन उससे पहले मई महीने में लगभग 1 लाख लोगों की नौकरी गई।

एक साथ इतनी सारी नौकरियां खोने के इतने अधिक मामले भारत में पिछले हजारों सालों के इतिहास में सबसे बुरे स्तर पर माने जा रहे है। क्योंकि इससे पहले भारत में इतनी बड़ी संख्या में रोजगार कभी नहीं छिने गए। केवल पांच महीनों में लगभग 2 करोड़ लोगों को नौकरी से निकाला जाना अपने आप में बहुत चिंताजनक बात है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार, नौकरी से निकाले जाने और बेरोजगारी में फर्क है। नौकरी से हटाया जाना चलते काम का समाप्त होना है और बेरोजगारी की परिभाषा यह है कि किसी व्यक्ति द्वारा सक्रियता से रोज़गार की तलाश किये जाने के बावजूद जब उसे काम नहीं मिल पाता तो यह अवस्था बेरोज़गारी कहलाती है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की स्थापना एक स्वतंत्र थिंक टैंक के रूप में 1976 में की गई थी। यह प्राथमिक डेटा संग्रहण, विश्लेषण और पूर्वानुमानों द्वारा सरकारों, शिक्षाविदों, वित्तीय बाजारों, व्यावसायिक उद्यमों, पेशेवरों और मीडिया सहित व्यापार सूचना उपभोक्ताओं के पूरे स्पेक्ट्रम को अपनी सेवाएँ प्रदान करता है। सीएमआईई के सीईओ महेश व्यास ने कहा कि आमतौर पर वेतनभोगियों की नौकरियां जल्दी नहीं जाती। लेकिन जब जाती है तो, दोबारा पाना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए ये हम सभी के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय है। रिपोर्ट के मुताबिक कोरोनावायरस महामारी के मद्देनजर विभिन्न सेक्टर की कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के वेतन काटे या फिर उन्हें बिना भुगतान के छुट्टी दे दी। उद्योग निकायों और कई अर्थशास्त्रियों ने बड़े पैमाने पर कंपनियों पर महामारी के प्रभाव से बचने और नौकरी के नुकसान से बचने के लिए उद्योग को सरकारी समर्थन देने का अनुरोध किया है। क्योंकि देश में कोरोना के कारण लगभग 22 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया है। और हम हैं कि सिर्फ बीमारी से डर रहै हैं। जबकि डर दूसरा बहुत बड़ा है, जिसके जल्दी सुधरने के कोई आसार ही नहीं है। इसीलिए अपना डर है कि कल आपका रोजगार बचेगा कि नहीं। लेकिन इसके बावजूद आप अगर सरकार द्वारा मचाए जा रहे कोरोना से बीमार होने के हल्ले से डरे हुए हैं, तो डरिए। कोई आपका क्या कर सकता है।

महिलाओं के लिए विवाह की आयु बढ़ाना सही रहेगा या नहीं।

  भारत में जिस समय महिलाओं को उनके भविष्य और शिक्षा की ओर ध्यान देना चाहिये, उस समय उन्हें विवाह के बोझ से दबा दिया जाता है, आज अब 21वीं सदी में इस रुढ़िवादी प्रथा में बदलाव की आवश्यकता है, जो कि महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा।

—प्रियंका सौरभ 

प्रधान मंत्री ने 74 वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को  संबोधन के दौरान लाल किले से महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु पर पुनर्विचार करने के लिए एक समिति/कानून के बारे में बताया। ये कानून बाल विवाह की न्यूनतम आयु को अनिवार्य रूप से बाल विवाह और नाबालिगों के दुरुपयोग को रोकने के लिए बनाया गया है। विवाह से निपटने वाले विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों के अपने मानक हैं।

भारत में विवाह की न्यूनतम आयु खासकर महिलाओं के लिये विवाह की न्यूनतम आयु सदैव एक विवादास्पद विषय ही रहा है, और जब भी इस प्रकार के नियमों में परिवर्तन की बात की गई है तो सामाजिक और धार्मिक रुढ़िवादियों का कड़ा प्रतिरोध देखने को भी मिला है। वर्तमान  नियमों के अनुसार पुरुषों और महिलाओं के लिये विवाह की न्यूनतम आयु क्रमशः 21 और 18 वर्ष है।

 केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय ने जया जेटली की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जो मातृत्व की आयु, मातृ मृत्यु दर को कम करने की अनिवार्यता और महिलाओं के बीच पोषण के स्तर में सुधार जैसे मामलों की जांच करेगी। यह गर्भावस्था, जन्म और उसके बाद, स्वास्थ्य, चिकित्सा भलाई और मां और नवजात, शिशु या बच्चे के पोषण की स्थिति के साथ विवाह और मातृत्व की उम्र के संबंध की जांच करेगी।

ये कानून शिशु मृत्यु दर (आईएमआर), मातृ मृत्यु दर (एमएमआर), कुल प्रजनन दर (टीएफआर), जन्म के समय लिंग अनुपात (एसआरबी) और बाल लिंग अनुपात (सीएसआर) जैसे प्रमुख मापदंडों को भी देखेगा और संभावना की जांच करेगा कि अब वर्तमान 18 वर्ष से 21 वर्ष तक की महिलाओं के लिए विवाह की आयु बढ़ाना सही रहेगा या नहीं।

विवाह और पोषण की आयु के बीच लिंक जीवविज्ञानी तथ्य है, इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि किशोर माताओं (10-19 वर्ष) के लिए पैदा होने वाले बच्चों की आयु की तुलना में  युवा वयस्कों के लिए जन्म (20-24 वर्ष) 5% अंक अधिक स्ट्यूड (उनकी उम्र के लिए कम) होने की संभावना थी, वे वयस्क माताओं (25 वर्ष या उससे अधिक उम्र) के बच्चों की तुलना में 11 प्रतिशत अधिक थे। किशोर माताओं से जन्म लेने वाले बच्चों में वयस्क माताओं के रूप में कम वजन के 10 प्रतिशत अंक अधिक होते हैं।

इसने अन्य कारकों को भी उजागर किया, जैसे किशोर माताओं के बीच कम शिक्षा और उनकी खराब आर्थिक स्थिति, जिसमें बच्चे की ऊंचाई और वजन माप के साथ सबसे मजबूत संबंध थे। इन सबके उपरांत यह सिफारिश की गई कि पहली शादी में बढ़ती उम्र, पहले जन्म में उम्र और लड़की की शिक्षा मातृ और बाल पोषण में सुधार के लिए एक आशाजनक दृष्टिकोण है।

विवाह के लिये महिलाओं और पुरुषों की न्यूनतम आयु एकसमान न होने का कोई भी कानूनी तर्क दिखाई नहीं देता है, हालाँकि कई लोग इसके विरुद्ध तर्क देते हैं मगर देखे तो इस प्रकार के तर्क अलग-अलग नियम संविधान के अनुच्छेद 14 ( समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार) का उल्लंघन करते है।  विवाह के लिये महिलाओं और पुरुषों की अलग-अलग आयु समाज में रूढ़िवादिता को बढ़ावा देती है।  महिलाओं और पुरुषों के लिये विवाह की उम्र में अंतर का कानून में कोई आधार नहीं है क्योंकि विवाह में शामिल होने वाले महिला पुरुष हर तरह से एक समान होते हैं और इसलिये उनकी हर साझेदारी भी एक समान होनी चाहिये।

दूसरी तरफ देखे तो महिलाओं के विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाने के खिलाफ तर्क भी आये है,
किशोरों के लिए राष्ट्रीय गठबंधन की वकालत इस बात का दावा करती है कि लड़कियों के लिए विवाह की कानूनी उम्र को बढ़ाना केवल “कृत्रिम रूप से कम समझे गए विवाहित व्यक्तियों की संख्या का विस्तार, उनका अपराधीकरण करना और कानूनी संरक्षण के बिना कम उम्र की विवाहित लड़कियों सेक्स के लिए आकर्षित करना होगा।

इन सबके बीच महिलाओं की शादी की न्यूनतम आयु बढ़ाने के पक्ष में कई तर्क हैं। लोकतान्त्रिक युग में लैंगिक-तटस्थता लाने की जरूरत है। महिलाओं में शुरुआती गर्भावस्था के जोखिमों को कम करने की आवश्यकता है। प्रारंभिक गर्भावस्था बढ़ी हुई बाल मृत्यु दर से जुड़ी होती है और माँ के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। न्यूनतम आयु को कम करने और नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाने के कानूनों के बावजूद, भारत में बाल विवाह बहुत प्रचलित हैं।

प्रारंभिक गर्भावस्था बढ़ी हुई बाल मृत्यु दर से जुड़ी होती है और माँ के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। इस प्रकार, एक बच्चे को ले जाने के लिए माँ के स्वास्थ्य और तत्परता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। सरकार को महिलाओं और लड़कियों के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण पर जोर देने की जरूरत है, साथ ही लक्षित सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार अभियान के साथ-साथ महिलाओं के विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाने से लिंग-तटस्थता भी बढ़ेगी।

आंकड़ों के अनुसार भारत में वर्ष 2017 में गर्भावस्था और प्रसव के दौरान जटिलताओं के कारण 35000 महिलाओं की मृत्यु हुई थी। ये सच है कि भारत में जिस समय महिलाओं को उनके भविष्य और शिक्षा की ओर ध्यान देना चाहिये, उस समय उन्हें विवाह के बोझ से दबा दिया जाता है, आज अब 21वीं सदी में इस रुढ़िवादी प्रथा में बदलाव की आवश्यकता है, जो कि महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा।

 महिलाओं के विवाह की न्यूनतम आयु को बढ़ाने से महिलाओं को शिक्षित होने, कॉलेजों में प्रवेश करने और उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु अधिक समय मिलेगा । इस निर्णय से संपूर्ण भारतीय समाज खासतौर पर निम्न आर्थिक वर्ग को प्रगति का अवसर मिलेगा।
 — —प्रियंका सौरभ 

राजस्थान में अभी पायलट का दांव बाकी है।

राजस्थान प्रदेश प्रभारी के पद पर अविनाश पांडे की जगह अजय माकन की ताज़ा नियुक्ति इस बात का संकेत है कि  राजस्थान की राजनीति में अभी बहुत कुछ बाकी है। सचिन पायलट और अशोक गहलोत की हाथ मिलाती तस्वीरों से भले ही यह संदेश देने की कोशिश की गई हो कि सब कुछ सामान्य हो गया है लेकिन अजय माकन के प्रदेश प्रभारी के पद की नियुक्ति उन तस्वीरों को धुंधला कर रही है। अजय माकन की ताज़ा नियुक्ति इस बात की ओर इशारा कर रही है कि राजस्थान का राजनैतिक संकट खत्म नहीं हुआ है बस कुछ समय के लिए टल गया है। क्योंकि यह केवल तजुर्बे और युवा जोश की लड़ाई नहीं है,यह अहम का टकराव है अस्तित्व का संघर्ष है।

दरअसल पहले कर्नाटक और फिर मध्यप्रदेश में कांग्रेस के हाथ आई हुई सत्ता फिसलने के बाद राजस्थान कांग्रेस के लिए काफी अहम बन चुका था। गहलोत और पायलट की आपसी खींचतान की कीमत इस बार कांग्रेस आलाकमान चुकाने के लिए तैयार नहीं थी। इसलिए उसने मध्यप्रदेश में अपनी गलती से सबक सीखा। जिस संवादहीनता और संवेदनशून्यता को ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने का सबसे बड़ा कारण माना गया उसे सचिन पायलट के संदर्भ में कारण नहीं बनने दिया गया। लेकिन जिस तरह के कदम पायलट द्वारा उठाए गए और उनके प्रतिउत्तर में जिस प्रकार के बयान गहलोत द्वारा दिए गए उससे राजस्थान में कांग्रेस की स्थिति वाकई में दो मुँही तलवार पर चलने जैसी हो गई थी। क्योंकि गहलोत पीछे हटने को तैयार नहीं थे और पायलट सब्र करने  के लिए। नतीजन आत्मविश्वास से भरे अनुभवी गहलोत ने सरकार बचाने के लिए आक्रमक होने का फैसला लिया। उन्होंने पायलट को चारों तरफ से घेर लिया। उनके द्वारा लगातार सचिन पायलट पर पर्सनल अटैक करके उनके स्वाभिमान पर चोट की जा रही थी। ऐसी स्थिति में पायलट को कांग्रेस में रोके रखना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती थी। क्योंकि स्थिति वहाँ तक पहुंच गई थी जहाँ राज्य के स्पेशल ऑपेरशन ग्रुप द्वारा पायलट को नोटिस भेजा जाता है। गहलोत के खेमे के विधायकों को एक होटल में ठहराया जाता है जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता। विधायकों से कोई भी बाहरी व्यक्ति किसी भी प्रकार संपर्क न कर पाए इसके लिए उस होटल में जैमर्स तक लगाए जाते हैं। विधायकों की खरीद फरोख्त की एफआईआर दर्ज करवाई जाती है। पायलट पर भाजपा के साथ मिलकर सरकार गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाया जाता है। इसकी शिकायत करते हुए गहलोत द्वारा प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी जाती है।  इतना सब होने के बाद भी अगर आज सचिन पायलट कांग्रेस में हैं और गहलोत सरकार को अभयदान प्राप्त हो जाता है तो कांग्रेस बधाई की पात्र तो है लेकिन इसका श्रेय उसे अकेले नहीं दिया जा सकता। दरअसल कई बार कमजोर प्रतिद्वंद्वी भी जीत का कारण बन जाता है। राजस्थान में भी कुछ ऐसा ही हुआ  राजस्थान में भाजपा अपनी आपसी फूट के चलते कांग्रेस की फूट का वैसा फायदा नहीं उठा पाई जैसा उसने मध्यप्रदेश में उठाया।

 यहाँ यह बात भी गौर करने लायक है कि भले ही सचिन पायलट की सिंधिया की ही तरह भाजपा में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही थीं लेकिन दोनों की परिस्थितियों में बहुत फर्क था। यह भी शायद राजस्थान के मामले में कांग्रेस के पक्ष में बाज़ी जाने का एक प्रमुख कारण कहा जा सकता है। क्योंकि जहाँ सिंधिया की पारिवारिक पृष्टभूमि में भाजपा शामिल रही है, राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं और आज भी वो भाजपा में  अटलबिहारी के समकक्ष कद रखती हैं। उनकी बुआ यशोधरा और वसुंधरा भाजपा की वरिष्ठ नेत्री हैं। वहीं सचिन पायलट का भाजपा से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं रहा है। बल्कि यदि यह कहा जाए कि भाजपा विरोध की उनकी पृष्ठभूमि रही है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि उनकी पत्नी कश्मीर में भाजपा की विरोधी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला की बेटी और उमर अब्दुल्ला की बहन हैं। ये दोनों ही जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद नज़रबंद कर दिए गए थे और जिन पर पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट भी लगाया गया था। यही वजह थी कि जहाँ एक ओर सिंधिया ने धारा 370 पर कांग्रेस में रहते हुए पार्टी लाइन के विपरीत मोदी सरकार के फैसले का स्वागत किया था,  वहीं पायलट ने हालांकि धारा 370 पर कोई बयान नहीं दिया था लेकिन फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की नजरबंदी पर सवाल उठाए थे।

ऐसे में पायलट की भाजपा में एंट्री सिंधिया जितनी सहज नहीं थीं। लेकिन कहते है कि राजनीति में ना कोई मित्र होता है ना कोई शत्रु। समय और परिस्थितियां सब समीकरण बदल देते हैं। हो सकता है कि जो समीकरण आज की परिस्थितियों में  नहीं बन पाए वो समय के साथ कल बन जाए क्योंकि राजनीति में असंभव कुछ भी नहीं होता। क्योंकि अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि गहलोत सरकार को अभयदान के बाद अब पायलट अपने विधायकों के लिए एक डिप्टी सीएम समेत सरकार में पांच पदों की मांग कर रहे हैं। स्पष्ट है कि इस राजनैतिक ड्रामे का अभी अंत नहीं मध्यांतर हुआ है। राजस्थान की राजनीति में अभी बहुत कुछ शेष है। पिक्चर अभी बाकी है।

डॉ नीलम महेंद्र

मानुष गढ़ता मोक्ष का पथिक : आचार्य ज्ञानसागरजी


-ः ललित गर्ग:-

विश्व पटल पर कतिपय ऐसे विशिष्ट व्यक्तित्व अवतरित हुए हैं जिनके अवदानों से पूरा मानव समाज उपकृत हुआ है। उनके व्यक्तित्व की सौरभ क्षेत्र और काल की सीमा से अतीत होती है। अपने पुरुषार्थ और विचार-वैभव से वे देश एवं दुनिया में अभिनव चेतना और जागृति का संचार करते हैं। उन महापुरुषों की परम्परा में जैन धर्मगुरुओं एवं साधकों ने अध्यात्म को समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाया है। ऐसे ही जैन आचार्यों की श्रृंखला में आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज इक्कीसवीं सदी के शिखर पुरुष हैं। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी हैं। जिन्होंने अपने त्याग, तपस्या, साहित्य-सृजन, संस्कृति-उद्धार के उपक्रमों से एक नया इतिहास बनाया है। एक सफल साहित्यकार, प्रवक्ता, साधक एवं चैतन्य रश्मि के रूप में न केवल जैन समाज बल्कि सम्पूर्ण अध्यात्म-जगत में सुनाम अर्जित किया है। विशाल साहित्य आलेखन कर उन्होंने साहित्य जगत में एक नई पहचान बनाई है। उनके पुरुषार्थ की लेखनी से इतिहास के पृष्ठों पर अनेक अमिट रेखाओं का निर्माण हो रहा है। एक धर्माचार्य के रूप में वे जो पवित्र और प्रेरक रेखाएं अंकित कर रहे हैं, उनकी उपयोगिता, प्रासंगिकता एवं आहट युग-युगों तक समाज को दिशा-दर्शन करती रहेगी। आपने कोरोना महाव्याधि में निरन्तर सेवा, सहयोग एवं जन-सहायता के उपक्रम चलाये, जिनमें जरूरतमंदों को खाद्य सामग्री सहित दवाई, जरूरत का सामान आदि वितरित किया गया। भारत सरकार ने हाल ही में नई शिक्षा नीति घोषित की है, उसमें अनेक जैन आचार्यों का योगदान एवं प्रेरणाएं रही है, उनमें आप भी प्रमुख हैं। आपकी संतचेतना में एक दृढ़ निश्चयी, गहन अध्यवसायी, पुरुषार्थी और संवेदनशील ऋषि-आत्मा निवास करती है। वे एक ऋषि, देवर्षि, ब्रह्मर्षि एवं राजर्षि हैं, जिन्होंने अपने पुरुषार्थ से अनेक तीर्थों की स्थापना की है। वे पुरुषार्थ की महागाथा हैं, कीर्तिमानों के कीर्तिमान हैं।
सराकोद्धारक संत आचार्य ज्ञानसागरजी आचार्य शांतिसागरजी (छाणी) परम्परा में दीक्षित यशस्वी आचार्य है। यशलिप्सा से कोसों दूर उन्होंने सुविधा एवं सामथ्र्य होने के बावजूद स्वयं साहित्य का सृजन नहीं किया अपितु श्रुताराधकों को प्रेरणा देने, संसाधन जुटाने उनकी आर्थिक एवं अकादमिक समस्याओं के निराकरण, ग्रंथों के वाचन, सम्पादन एवं संशोधन में सतत सचेष्ट रहना श्रेयस्कर माना। आज समाज में अकादमिक विषयों पर कम रुचि होने के बावजूद आप व्यक्तिगत रुचि लेकर एक नहीं अनेक विद्वत् सम्मेलन, शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर, सेमिनार, संगोष्ठियां आयोजित करा चुके हैं। दीक्षा गुरु ने आपको संघस्थ साधुओं के अध्यापन का गुरुतर दायित्व प्रदान किया। तब से आप सतत आगमोक्त चर्या का निर्वाह करने के साथ ही जिनवाणी के संरक्षण, अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद, मानव-कल्याण, नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा एवं उसके प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं। आपने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को जिस चैतन्य एवं प्रकाश के साथ जीया है, वह भारतीय ऋषि परम्परा के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। आपने स्वयं ही प्रेरक जीवन नहीं जीया, बल्कि लोकजीवन को ऊंचा उठाने का जो हिमालयी प्रयत्न किया है, वह भी अद्भुत एवं आश्चर्यकारी है। आपने अपनी कलात्मक अंगुलियों से नित-नये इतिहासों का सृजन कर भारत की आध्यात्मिक विरासत एवं सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध बनाया है। आपका जीवन अथाह ऊर्जा, प्रेेरणा एवं जिजीविषा से संचालित तथा स्वप्रकाशी है। वह एक ऐसा प्रभापुंज, प्रकाशगृह है जिससे निकलने वाली एक-एक रश्मि का संस्पर्श जड़ में चेतना का संचार कर सकता है।
आचार्य ज्ञानसागरजी की प्रेरणा से देश में अनेक निर्माण कार्य चल रहे हैंै। मगर विशेष बात यह है कि वे मंदिरों, धर्मशालाओं, पाठशालाओं, छात्रावासों, चिकित्सालयों, मान-स्तम्भों के निर्माण के साथ-साथ, अच्छे एवं चरित्रसम्पन्न इंसानों का भी उत्तम निर्माण कर रहे हैं, कभी शिविरों के माध्यम से तो कभी अपने प्रवचनों के माध्यम से। वे छात्रों, पंडितों, विद्वानों, डाक्टरों, इंजीनियरों, जिलाधीशों, शिक्षाविदों, विधि-विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों आदि के शुष्क संसार में धर्मरस का सुंदर संचार कर रहे हैं। आप किसी दबंग-व्यक्तित्व; डेशिंग-पर्सनालिटी को देखकर विचलित नहीं होते। वे यहां भी एक नीति-कथन के समानान्तर हैं-‘सुंदर भेषधारी को देखकर मूर्ख धोखा खा जाते हैं, चतुर नहीं।’ आप उस कोटि के निष्पृह-संत है जिसकी परिभाषा जैनाचार्यों के अतिरिक्त, महान कवि एवं संत कबीरदासजी ने भी की है कि -साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय।।
आचार्य ज्ञानसागरजी अहंकारशून्य किन्तु ज्ञानसम्पन्न हैं, वे सदा अपने गुणों को छुपाये रहते हैं। आप सर्वहारा वर्ग का सदा ध्यान रखते हैं; वे ईश्वर का रहस्य समझ चुके हैं कि भक्तों के मध्य जो दरिद्री है, उसकी चिन्ता परमेश्वर को अधिक रहती है।’ सीमेन्ट, लोहा, पत्थर के निर्माण तो व्यसनी-आदमी भी करने में सफलता प्राप्त कर लेता है, किन्तु सु-संस्कारों के निर्माण में केवल संतजन ही हेतु बनते हैं, सेतु बनते हैं। आप ऐसे संत हैं जो सांसारिक/भौतिक-निर्माणों की भीड़ में अभी भी, दिगम्बरत्व और आकिचन्य की याद ताजा कराकर चल रहे हैं और केवल आदर्श जीवन के कार्य कर रहे हैं, जिनसे एक साधु, ‘श्रेष्ठ-साधु’ बनता है, ठेकेदार नहीं।
आचार्य ज्ञानसागरजी ‘प्रवरसंत’ हैं, वे जगतगुरु हैं, मनीषी-विचारक हैं, प्रवचनकला मर्मज्ञ हैं। वे आत्मसाधना में लीन, लोक-कल्याण के उन्नायक, सर्वश्रेष्ठ लोकनायक हैं। तपः साधक, गुरु-आराधक, महान-धर्मोपदेशक हैं। साक्षात प्रज्ञापुंज, विद्वत् वत्सल, विद्वत् संगोष्ठियों के अधिष्ठाता, विलुप्त-साहित्यान्वेषी और आत्मोपयोगी साहित्य के सृजक हैं। वे प्रवचन सम्राट, वाक्पटु, हित-मित-प्रियभाषी, द्वादशांगवाणी के तलस्पर्शी अध्येता है। वे पंचकल्याणक-प्रतिष्ठा-समारोहों को विकृतियों के भंवरजाल से बचाने वाले नाविक; युवा-पीढ़ी के दीपस्तम्भ, ज्ञानगुणनिधि के आगार, वैयक्तिक-पारिवारिक-सामाजिक-दैशिक समस्याओं के सन्मार्ग-दिवाकर हैं, आत्म-प्रहरी हैं, धर्म-प्रहरी हंै, राष्ट्र-प्रहरी हैं। वे चिर-दिगम्बरत्व के स्वामी है, ऐसे शब्दों के मोहजाल से ऊपर, एक मुनि हैं, संत हैं, ऋषि हैं, यति हैं।
आचार्य ज्ञानसागरजी की साहित्य प्रकाशन एवं आगमिक साहित्य के अध्ययन में रुचि तो प्रारम्भ से ही थी। अपने बुढ़ाना प्रवास में आचार्य श्री शांतिसागर (छाणी) ग्रंथमाला बुढ़ाना एवं गया प्रवास (१९९१) में स्थापित श्रुत संवर्द्धन संस्थान के साथ इन दोनों सहयोगी संस्थाओं को सहयोजित कर लिया गया। आज संस्थान द्वारा अपनी इन प्रकाशन संस्थाओं के माध्यम से शताधिक ग्रंथों का प्रकाशन किया जा चुका है। आपकी लेखनी से 200 से अधिक ग्रंथ प्रसूत हुए और जैन आगमों का महान संरक्षण, संवर्धन और विकास हुआ। प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन, अनुसंधान एवं नवीन पाण्डुलिपियों के प्रकाशन का यह क्रम विश्रृंखलित न हो इस भावना से 5  वार्षिक श्रुत संवर्द्धन पुरस्कारों की स्थापना की गई। जिसके अंतर्गत अब तक 70 विद्वानों का सम्मान किया जा चुका है। मात्र इतना ही नहीं कुछ वर्ष पूर्व संस्था ने आचार्य ज्ञानसागरजी श्रुत संवर्द्धन पुरस्कार की स्थापना की है। जिसके अंतर्गत जैन साहित्य एवं संस्कृति की सेवा करने वाले विशिष्ट समाजसेवी व्यक्ति-संस्था को एक लाख रुपये की सम्मान राशि, प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया जाता है। अब तक यह पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ (दिल्ली), डॉ. डी. वीरेन्द्र हेगडे (धर्मस्थल), तथा वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं प्रशासक प्रो. लक्ष्मीमल ंिसंघवी (दिल्ली) को प्रदान किये जा चुका है। वे एक मन्दिर, धर्मशाला, गौशाला के निर्माण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं पुस्तक लेखन-प्रकाशन को। उनकी दृष्टि में साहित्य-सृजन एक उत्कृष्ट तप एवं पवित्र अनुष्ठान है। दर्शन, धर्म, अध्यात्म, न्याय, गणित, भूगोल, खगोल, नीति, इतिहास, कर्मकाण्ड आदि विषयों पर उनका समान अधिकार है। बनावटी शिल्प से उन्हंे लगाव नहीं है, वे आत्मा से उपजी स्वाभाविक भाषा-बोली के संकेत पर लेखनी चलाते हैं।
आचार्य ज्ञानसागरजी की बहुआयामी प्रवृत्तियों से मुझे भी परिचित होने का अवसर मिला, जब आपके सूर्यनगर-गाजियाबाद चातुर्मास में एक प्रतिभा सम्मान का कार्यक्रम विद्या भारती स्कूल में दो दिन तक आयोजित हुआ। मैं इस विद्यालय का महामंत्री होने के कारण यह आयोजन स्कूल  प्रांगण में कराने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। वे प्रतिवर्ष जहां भी होते हैं स्कूली छात्र-छात्राओं का सम्मानित करते हैं। आपके विद्वत् वात्सल्य की चर्चा तो यत्र-तत्र सर्वत्र थी किन्तु विद्वानों विशेषकर युवाओं के प्रति उनका सहज वात्सल्य तथा ज्ञान प्राप्ति की लालसा मुझे प्रथम बार देखने को मिली। इस अलौकिक, तेजोमयी व्यक्तित्व के प्रथम दर्शन कर मैं अभिभूत हो गया। उनको देखकर लगा कि यहां कुछ है, जीवन मूच्र्छित और परास्त नहीं है। आपके व्यक्तित्व में सजीवता है और एक विशेष प्रकार की एकाग्रता। वातावरण के प्रति उनमें ग्रहणशीलता है और दूसरे व्यक्तियों एवं समुदायों के प्रति संवेदनशीलता। इतना लम्बा संयम जीवन, इतने व्यक्तित्वों का निर्माण, इतना आध्यात्मिक विकास, इतना साहित्य-सृजन, इतनी अधिक रचनात्मक-सृजनात्मक गतिविधियों का नेतृत्व, इतने लोगों से सम्पर्क- वस्तुतः ये सब अद्भुत है अनूठा है, आश्चर्यकारी है। सचमुच आपकी जीवन-गाथा आश्चर्यों की वर्णमाला से आलोकित-गुंफित एक महालेख है। आपकी  प्रेरणा से संचालित होने वाली प्रवृत्तियों में इतनी विविधता है कि जनकल्याण के साथ-साथ संस्कृति उद्धार, शिक्षा, सेवा, प्रतिभा-सम्मान, साहित्य-सृजन के अनेक आयाम उद्घाटित हुए है। देश में अहिंसा, शाकाहार, नशामुक्ति, नारी जागृति, रूढ़ि उन्मूलन एवं नैतिक मूल्यों के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। वे भौतिक वातावरण में अध्यात्म की लौ जलाकर उसे तेजस्वी बनाने का भगीरथ प्रयत्न कर रहे हैं। वे अध्यात्म को परलोक से न जोड़कर वर्तमान जीवन से जोड़ रहे हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में अध्यात्म केवल मुक्ति का पथ ही नहीं, वह शांति का मार्ग है। जीवन जीने की कला है, जागरण की दिशा है और जीवन रूपान्तरण की प्रक्रिया है।

श्योर, प्योर और सिक्योर है अक्षय ऊर्जा

योगेश कुमार गोयल

            न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में पारम्परिक ऊर्जा के मुकाबले अक्षय ऊर्जा की मांग निरन्तर बड़ी तेजी से बढ़ रही है। दरअसल वर्तमान में पूरी दुनिया पर्यावरण संबंधी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है और पारम्परिक ऊर्जा स्रोत इस समस्या को और ज्यादा विकराल बनाने में सहभागी बन रहे हैं जबकि अक्षय ऊर्जा इन चुनौतियों से निपटने में कारगर साबित हो सकती है। पर्यावरण और प्रदूषण पर प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में मैंने अक्षय ऊर्जा के महत्व और इसकी जरूरतों पर विस्तार से चर्चा की है। भारत में अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं और सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा इत्यादि का उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़ी-बड़ी परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं। इसी कड़ी में पिछले ही महीने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा मध्य प्रदेश के रीवा में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये चार हजार करोड़ की लागत से तैयार की गई अत्याधुनिक मेगा सौर ऊर्जा परियोजना का उद्घाटन किया गया था और उन्होंने उस दौरान सौर ऊर्जा को ‘श्योर, प्योर और सिक्योर’ बताते हुए अक्षय ऊर्जा के महत्व को स्पष्ट रेखांकित भी किया था।

            करीब 1500 हेक्टेयर जमीन में फैली रीवा सौर ऊर्जा परियोजना की कुल क्षमता 750 मेगावाट है, जिसके लिए यहां 250-250 मेगावाट की तीन यूनिट स्थापित हैं। रीवा प्लांट की शुरूआत के साथ ही भारत दुनिया के शीर्ष पांच सौर ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल हो गया है। देश का यह पहला ऐसा सोलर प्लांट है, जहां एक ही प्वाइंट पर 750 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन किया जा रहा है। एक ही साइट पर लगी तीन यूनिट से पावर जनरेट होकर एक सब-स्टेशन में जाती है और वहां से ग्रिड लाइन के जरिये मध्य प्रदेश तथा दिल्ली मैट्रो को बिजली की सप्लाई दी जा रही है। हालांकि कर्नाटक के पावगाड़ा में दो हजार मेगावाट से अधिक क्षमता के सोलर पार्क सहित देश में रीवा से ज्यादा सौर ऊर्जा का उत्पादन कर रहे कुछ और सोलर पार्क भी देश में ऊर्जा उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं लेकिन रीवा का सोलर प्लांट अब तक का सबसे बड़ा सोलर प्लांट है। दरअसल सोलर प्लांट केवल एक प्लांट होता है, जैसा कि रीवा में स्थापित किया गया है, जहां एक ही प्वाइंट पर एक लाइन से ऊर्जा उत्पादन किया जाता है जबकि एक सोलर पार्क में अलग-अलग कई सोलर प्लांट हो सकते हैं। सोलर पार्क में अलग-अलग डवलपर कम क्षमताओं के प्लांट से ऊर्जा का उत्पादन करते हैं, जैसा कि कर्नाटक के सोलर पार्क में कुल 11 डवलपर अलग-अलग क्षमता के प्लांटों से दो हजार मेगावाट से अधिक ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं।

            अब यह भी जान लें कि अक्षय ऊर्जा और उसके स्रोत आखिर हैं क्या? हिन्दी अकादमी के सौन्जय से प्रकाशित ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक में बताया गया है कि अक्षय ऊर्जा वह ऊर्जा है, जो असीमित और प्रदूषणरहित है या जिसका नवीकरण होता रहता है। ऊर्जा के ऐसे प्राकृतिक स्रोत, जिनका क्षय नहीं होता, अक्षय ऊर्जा के स्रोत कहे जाते हैं। अक्षय ऊर्जा के महत्वपूर्ण स्रोतों में सूर्य, जल, पवन, ज्वार-भाटा, भूताप इत्यादि प्रमुख हैं। उदाहरण के रूप में सौर ऊर्जा को ही लें। सूर्य सौर ऊर्जा का मुख्य स्रोत है, जिसकी रोशनी स्वतः ही पृथ्वी पर पहुंचती रहती है। यदि हम सूर्य की इस रोशनी को सौर ऊर्जा में परिवर्तित नहीं भी करते हैं, तब भी यह रोशनी तो पृथ्वी पर आती ही रहेगी लेकिन चूंकि सूर्य से प्राप्त होने वाली इस असीमित ऊर्जा के उपयोग से न तो यह ऊर्जा घटती है और न ही इससे पर्यावरण को किसी भी प्रकार की क्षति पहुंचती है, इसीलिए सूर्य से प्राप्त होने वाली इस ऊर्जा को अक्षय ऊर्जा कहा जाता है। ग्लोबल वार्मिंग तथा जलवायु परिवर्तन से बचाव के दृष्टिगत ही आज अक्षय ऊर्जा को अपनाना समय की सबसे बड़ी मांग है। दरअसल पूरी दुनिया इस समय पृथ्वी के बढ़ते तापमान और ग्लोबल वार्मिंग के कारण बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं को लेकर बेहद चिंतित है, इसीलिए कोयला, गैस, पैट्रोलियम पदार्थों जैसे ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों के बजाय अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है।

            आज न केवल भारत बल्कि समूची दुनिया के समक्ष बिजली जैसी ऊर्जा की महत्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करने के लिए सीमित प्राकृतिक संसाधन हैं, साथ ही पर्यावरण असंतुलन और विस्थापन जैसी गंभीर चुनौतियां भी हैं। इन गंभीर समस्याओं और चुनौतियों से निपटने के लिए अक्षय ऊर्जा ही एक ऐसा बेहतरीन विकल्प है, जो पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने के साथ-साथ ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने में भी कारगर साबित होगी।

ब्रह्मचर्य ईश्वर में विचरण, संयम और कर्तव्यों का पालन करना है

मनमोहन कुमार आर्य

                वेद एवं वैदिक साहित्य में ब्रह्मचर्य की चर्चा मिलती है। प्राचीन काल में मनुष्य जीवन को चार आश्रमों में बांटा गया था। प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम कहलाता था। इसके बाद गृहस्थ आश्रम का स्थान था। ब्रह्मचर्य आश्रम जन्म से 25 वर्ष की आयु तक मुख्य रूप से माना जाता है परन्तु ब्रह्मचर्य का पालन मनुष्य को मृत्युपर्यन्त करने का विधान है। शास्त्रों में ब्रह्मचर्य की बड़ी महिमा गाई गई है। यहां तक कहा गया है ब्रह्मचर्य रुपी तप के पालन से राजा राष्ट्र की भली प्रकार से रक्षा कर सकता है। ब्रह्मचर्य के पालन से यवुती अपने सदृश युवा पति को प्राप्ती करती है। ब्रह्मचर्य का पालन योगदर्शन में भी आवश्यक कहा गया है। ब्रह्मचर्य को पाचं यमों में सम्मिलित किया गया है। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन नही करता उसका योग सफल नहीं होता। मनुष्य को स्वस्थ रहने, शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति करने के लिये ब्रह्मचर्य पालन की महती आवश्यकता होती है। ब्रह्मचर्य के पालन से मनुष्य का शरीर स्वस्थ, निरोग, बलवान, विद्या ग्रहण करने की क्षमताओं से युक्त, दीर्घायु तथा यशस्वी बनता है। ब्रह्मचर्य के पालन से ही मनुष्य व देव मृत्यु रूपी दुःख को सहजता से पार होकर ब्रह्मलोक व मोक्ष को प्राप्त होकर जन्म व मरण के बन्धनों से छूट जाते हैं। ब्रह्मचर्य की महिमा अपरम्पार है। विदेशी विधर्मियों व पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव तथा वैदिक धर्म की विशेषताओं से दूर होने के कारण मनुष्य ब्रह्मचर्य जैसी अमृतमय महौषधि से दूर हो गया है जिसका परिणाम हम अल्पायु में नाना प्रकार के रोगों व अकाल मृत्यु के रूप में पाते हैं। शरीर को स्वस्थ रखने तथा विश्व में भारत को गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के लिए हमें ब्रह्मचर्य की उपेक्षा छोड़कर इसके यथार्थ महत्व को जानकर इसका सेवन करना होगा जिससे मनुष्य को वह सुख प्राप्त होगा जो साधरणतया आधुनिक व भौतिक जीवन जीने वाले मनुष्यों को प्राप्त नहीं होता।

                ब्रह्मचर्य ब्रह्म अर्थात् ईश्वर में अपनी आत्मा में लगाने उसमें ही अवस्थित रहने को कहते हैं। ब्रह्म इस संसार को उत्पन्न करने तथा पालन करने वाली शक्ति है और इसी के द्वारा सृष्टि की अवधि पूरी होने पर प्रलय भी की जाती है। इस सृष्टि की आधेय शक्ति ब्रह्म सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि नित्य है। उस ब्रह्म को उसके यथार्थस्वरूप में जानना सभी मनुष्यों का प्रथम कर्तव्य है। ब्रह्म को धार्मिक व ज्ञानी माता-पिताओं सहित आचार्यों के उपदेशों से जाना जाता है। वेद एवं वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय से भी ब्रह्म अर्थात् ईश्वर को जाना जाता है। आर्य विद्वानों ने ईश्वर विषय पर अनेक उत्तम ग्रन्थों की रचना की है। उन ग्रन्थों को पढ़कर ब्रह्म को जाना जा सकता है। ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश, इसका प्रथम व सप्तम् अध्याय, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, ऋषि दयानन्द एवं आर्य विद्वानों के वेदभाष्य, आर्य विद्वानों के ग्रन्थ स्वाध्याय-सन्दोह, वेदमंजरी, श्रुति-सौरभ, वैदिक विनय आदि भी ईश्वर विषयक ज्ञान में सहायक हैं। ईश्वर को जानकर मनुष्य ईश्वर का उपासक बनता है। सद्ज्ञान व उपासना से ही मनुष्य अपनी इच्छाओं को नियंत्रित कर उन्हें सन्मार्ग पर चलाता है जिससे वह इन्द्रियों के अनेक दोषों व उनके हानिकारक प्रभावों से बच जाता है। ब्रह्मचर्य संयम को भी कहते हैं। सभी इन्द्रियों पर पूर्ण संयम रखना ब्रह्मचर्य होता है। अपनी सभी इन्द्रियों को संयम वा नियंत्रण में रखना और उन्हें मर्यादा के अनुसार चलाना व उनका उपयोग लेना ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्य में हम अपनी पांच ज्ञान व पांच कर्म इन्दियों का अपने शरीर व आत्मा की उन्नति के लिये उपयेाग करते हैं। उनका दुरुपयोग किंचित नहीं होने देते। यह भी ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्य पालन से शरीर में शक्ति का जो संचय होता है उसी से मनुष्य स्वाध्याय व साधना पर चल कर ईश्वर को जान पाता है और इसी से वह जीवन के लक्ष्य ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल होता है। यही जीवन मार्ग हमें वेदाध्ययन तथा ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन करने पर विदित होता है। स्वाध्याय एवं उपासना करना ब्रह्मचर्य से युक्त जीवन के आधार है। इससे मनुष्य के जीवन की रक्षा सहित ज्ञान बल की उन्नति होती है। ब्रह्मचर्य की इन कुछ विशेषताओं के कारण ही रामायणकाल में हनुमान जी, महाभारत काल में भीष्म पितामह तथा आधुनिक काल में ऋषि दयानन्द ने ब्रह्मचर्य का सेवन कर अनेक महत्वपूर्ण महान कार्यों को सम्पादित किया। यदि यह महान आत्मायें ब्रह्मचर्य का पालन करने वाली होती तो इनके जीवन की जिन उपलब्धियों पर सभ्य संसार गौरव करता है, वह शायद इनके जीवन में होती।

                महर्षि दयानन्द के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो उनका जीवन अनेक महान कार्यों को सम्पादित करने वाला अपूर्व जीवन दृष्टिगोचर होता है। वह ऐसे महापुरुष थे जिनके समान विश्व में अब तक कोई महापुरुष उत्पन्न नहीं हुआ। सभी महापुरुषों ने अपने समय में अनेक महान कार्यों को किया परन्तु जिन चुनौतियों का ऋषि दयानन्द को सामना करना पड़ा, वैसी चुनौतियां अन्य महापुरुषों के जीवन में देखने को नही मिलती। ऋषि दयानन्द के समय में वैदिक धर्म एवं संस्कृति अधोगति को प्राप्त थी। देश की स्वतन्त्रता विधर्मियों ने वैदिक धर्म में आयी विकृतियों के कारण छीन ली थी। हम पर शताब्दियों से नारकीय अत्याचार किये जा रहे थे। ऐसा कोई महापुरुष उत्पन्न नहीं हुआ जो हमें इन आघातों से बचाता। ऐसे समय में ऋषि दयानन्द (1825-1883) का प्रादुर्भाव हुआ था। उन्होंने संसार में फैली हुई अविद्या का अध्ययन किया था। इसके कारण व समाधान ढूंढने में भी उन्हें सफलता मिली थी। उन्होंने पाया था कि वेदाध्ययन में जो बाधायें आयी हैं उन्हीं से देश व विश्व अविद्या फैली है और अन्याय, पक्षपात, शोषण, अत्याचार व अन्य अन्धविश्वास व कुरीतियां समाज में फैली हैं। यही मनुष्य जाति की अधोगति का कारण बनी हैं। इन्हें दूर करने के लिये ऋषि दयानन्द ने सृष्टि की आदि में ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान का देश देशान्तर में प्रचार किया। इससे अविद्या के बादल छंटे थे। हिन्दू जाति का विभिन्न अवैदिक मतों द्वारा किया जाने वाला धर्मान्तरण वा मतान्तरण रूका था अथवा कम हुआ था। उनके अभियान से देश व समाज उन्नति को प्राप्त हुआ। देश को स्वतन्त्रता प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर करने की प्रेरणा भी ऋषि दयानन्द की ही देन है। देश से अविद्या को दूर कर उसे विद्या ज्ञान से युक्त करने का स्वप्न भी ऋषि ने देखा था तथा अविद्या अज्ञान को दूर करने के लिये गुरुकुलीय शिक्षा का प्रचलन करने की प्रेरणा भी उन्होंने की थी जिसका उनके अनुयायियों ने पालन किया। इस कारण से आज हमारे पास वेद एवं वैदिक साहित्य के शताधिक सहस्रों विद्वान है। आधुनिक शिक्षा के लिये भी आर्यसमाज ने डीएवी स्कूल कालेज खोल कर देश को उन्नत करने का महनीय कार्य किया है।

                ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में समाज कल्याण तथा देशोन्नति सहित ईश्वर की उपासना के क्षेत्र में जिन अविद्यायुक्त कृत्यों का प्रकाश कर उपासना की सत्य विधि का प्रकाश किया उसके पीछे ऋषि दयानन्द का ब्रह्मचर्य से युक्त जीवन ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। यदि ऋषि दयानन्द आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते तो जो उलब्धियां उन्हें अपने जीवन में प्राप्त हुई तथा जो उपलब्धियां देश को प्राप्त हुई हैं वह कदापि नहीं होती। उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए ज्ञान प्राप्ति, ईश्वर प्राप्ति तथा समाज सुधार के क्षेत्र में जो पुरुषार्थ किया, वह उनके ब्रह्मचर्य रूपी तप की ही देन थी। जीवन में सबसे बड़ा तप यदि कोई है तो वह ब्रह्मचर्य ही है। इस व्रत का जीवन भर पालन करना अत्यन्त कठिन एवं प्रायः असम्भव ही है। इसी तप व्रत का ऋषि दयानन्द ने सफलतापूर्वक आजीवन पालन किया था। एक बार उनसे पूछा गया कि क्या आपके मन में काम विषयक विचार कभी नहीं आये? इस प्रश्न को सुनकर ऋषि दयानन्द मौन हो गये थे। कुछ दूर बाद अपने पूरे जीवन पर दृष्टि डालकर उन्होंने कहा था कि वह जीवन भर ईश्वर के चिन्तन, विद्या के अर्जन व प्रचार के कामों में इतने व्यस्त रहे कि काम का विचार उनके मन में कभी उत्पन्न नहीं हुआ। यदि काम ने कभी उनके निकट आने की चेष्टा की भी होगी तो वह द्वार पर खड़ा अवकाश मिलने की प्रतीक्षा करता रहा होगा। ऐसा अवसर न मिलने पर वह स्वयं लौट गया होगा। ब्रह्मचर्य के पालन की इच्छा करने वाले युवाओं व स्त्री-पुरुष सभी को पं. लेखराम, स्वामी सत्यानन्द, पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय तथा डा. भवानीलाल भारतीय आदि आर्य विद्वानों द्वारा लिखित ऋषि दयानन्द के जीवन चरित अवश्य पढ़ने चाहियें। इससे उन्हें अनेक प्रेरणायें प्राप्त होगीं और उनका जीवन भी ऋषि दयानन्द की प्रेरणा से उन्नत, सफल व महान बनेगा।

                ब्रह्मचर्य विषय पर प्रवर वैदिक विद्वान स्वामी ओमानन्द सरस्वती तथा डा. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार आदि ने विषयक केन्द्रित उच्च कोटि के ग्रन्थों का प्रणयन किया है। सभी बन्धुओं को इन ग्रन्थों को पढ़ना चाहिये। इन ग्रन्थों को पढ़कर ब्रह्मचर्य का सत्यस्वरूप इनसे जीवन में होने वाले लाभों का ज्ञान प्राप्त होता है। इससे मनुष्य अनेक बुराईयों पापों से बच जाता है। इसके परिणामस्वरूप उसे सुख यश की प्राप्ति होती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने से ही सभी दुःखों की निवृत्तिरूप मोक्ष की प्राप्ति भी सम्भव होती है। अतः शरीर आत्मा की उन्नति तथा दुःखों की निवृत्ति के लिये वैदिक मान्यताओं के अनुरूप ‘‘ब्रह्मचर्यका पालन सभी को करना चाहिये। यह आश्चर्य है कि हमारा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान स्वास्थ्य एवं जीवन उन्नति के इस महान साधन की उपेक्षा करता रहा है और अब भी कर रहा है। किशार व युवा पीढ़ी को ब्रह्मचर्य का यथार्थ ज्ञान एवं महत्व विशेष रूप से विदित होना चाहिये। ब्रह्मचर्य के पालन से ही हमारे देश की युवापीढ़ी उन्नति को प्राप्त हागी जिससे देश, धर्म एवं मानवता की भी उन्नति होगी। ब्रह्मचर्य के पालन से जीवन अपने लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति की ओर बढ़ सकता है। इससे मनुष्य का परजन्म सुधरेगा और मृत्यु के समय में उद्विग्नता व पश्चाताप न होकर शान्ति होगी। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य

सुशांत, शिवसेना, सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई और सरकार पर संकट !

सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में जांच भले ही सीबीआई को सौंप दी हो लेकिन अभी भी राजनीति रुकने का नाम नहीं ले रही। दिल्ली और बिहार से लेकर मुंबई तक इस मामले में राजनीति देखने व सुनने को मिल रही है। पूरे मामले में साफल लगता रहा कि राजनीतिक दबाव के कारण महाराष्ट्र पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया है। अब लगने लगा है कि महाराष्ट्र सरकार संकट में है।    

-निरंजन परिहार

महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार विपक्ष के साथ अपनों के भी निशाने पर है। सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को सीबीआई को सौंप दिया है। इस मामले में बीजेपी तो शुरू से ही शिवसेना पर हमलावर रही, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद कांग्रेस और एनसीपी के नेता भी शिवसेना के रुख पर खुलकर बोल रहे हैं। इस केस की जांच के मामले में शिवसेना पर शुरू से ही उंगली उठती रही है। कांग्रेस और एनसीपी महाराष्ट्र सरकार में शिवसेना की सहयोगी पार्टियां है और इनके नेताओं व मंत्रियों द्वारा इस मामले में बयानों की  वजह से सरकार की एकता में फूट साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस के तेजतर्रार नेता संजय निरूपम, महाराष्ट्र सरकार में मंत्री असलम शेख और एनसीपी के शरद पवार, पार्थ पवार सहित गृह मंत्री अनिल देशमुख के बयानों सहित बिहार कांग्रेस के नेताओं के बयान इस मामले में शिवसेना पर हमले के रूप में देखे जा रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर सीबीआई जांच से शिवसेना परेशान क्यों हैं। सरकार में शामिल अपनों के ही हमलावर रुख को देखकर माना जा रहा है कि सरकार हिल रही है।  

शिवसेना शुरू से ही सुशांत सिह मामले में शक के दायरे में दिखती रही। उसके नेताओं के बयान भी जैसे किसी के बचाव की मुद्रा वाले ही हमेशा लगे और यह भी साफ लगता रहा कि किसी न किसी को तो इस मामले में बचाने की कोशिश हो रही है। हालांकि शुरू से ही महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री का नाम सुना जाता रहा, लेकिन मुख्यमंत्री के बेटे आदित्य ठाकरे ने जब एक बयान में कहा था कि वे सड़क छाप राजनीति नहीं करते, उनका नाम यूं ही घसीटा जा रहा है, तो सभी को लोगों को लगा कि जिस मंत्री का नाम लिया जा रहा है, वह आदित्य ठाकरे ही हो सकते हैं। लेकिन 14 जून को हुई वारदात को दो महीने से भी ज्यादा वक्त बीत जाने के बावजूद एफआईआऱ दर्ज नहीं होना, मुंबई पुलिस की भूमिका स्पष्ट न होने और शिवसेना के नेताओं की अनाप शनाप बयानबाजी ने इस मामले की जांच पर शक पैदा कर दिया। इसके अलावा बिहार पुलिस की टीम को जांच न करने देना और एक पटना पुलिस के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को जांच के लिए मुंबई आने पर कोरोंटाइन कर दिए जाने से शिवसेना और सरकार की इस मामले में सपष्ट संदेहास्पद भूमिका सामने आई।  

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 अगस्त की सुबह सीबीआई को जांच सौंपे जाने के बाद अब महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार पर अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले चौतरफा हमले शुरू हो गए हैं। कांग्रेस पार्टी के नेता संजय निरुपम ने कहा कि मुंबई पुलिस इस मामले को नाहक प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करे और सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की जांच सीबीआई को सौंप दे। निरुपम ने यह भी कहा कि मुंबई पुलिस की क्षमता पर किसी को शक नहीं है। लेकिन इस मामले की जांच में ढिलाई बरती जा रही थी, यह दिख भी रहा था। मगर इस ढिलाई का कारण तो सरकार ही जानती है। महाराष्ट्र सरकार में कांग्रेस के कोटे से मंत्री असलम शेख ने भी  एएनआई से बातचीत में सीबीई जांच का स्वागत करते हुए कहा कि अगर इस मामले में केंद्र चाहता है कि जांच सीबीआई करे, तो होने देना चाहिए। महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बेटे एनसीपी के नेता पार्थ पवार ने भी ट्वीट करके कहा – सत्यमेव जयते। इस मामले में महाराष्ट्र पुलिस पर लेकर उठ रहे सवालों पर 13 अगस्त को ही शरद पवार ने भी कहा था कि सीबीआई जांच कराए जाने से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने भी कहा है कि वे सुशांत सिंह राजपूत मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हैं। देशमुख ने यह भी कहा कि सीबीआई को जो भी सहयोग की आवश्यकता होगी, वो दी जाएगी।

अभिनेता सुशांत सिंह केस की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है, लेकिन इस केस में शिवसेना अपनी भूमिका पर अड़ी हुई है। यह उसके नेताओं के बयानों से साफ है। सुप्रीम कोर्ट  के फैसले के बाद भी शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने कहा कि सीबीआई को जांच सौंपने की कोई जरूरत नहीं थी। राऊत ने कहा कि मुंबई पुलिस जांच के लिए पूरी तरह सक्षम है। मगर बिहार चुनाव की वजह से मामले में राजनीति हो रही है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को सीबीआई को सौंप दिया है, तो शिवसेना सन्न है क्योंकि सरकार गिरने की बातें भी सुनने को मिल रही है। सरकार में शामिल तीनों दलों में मतभेद भी लगातार बढ़ रहे हैं। ताजा बयानबाजी के संकेत भी साफ हैं। उधर, बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने इसके स्पष्ट संकेत देते हुए कहा है कि दोस्तों जल्दी ही सुनेंगे महाराष्ट्र सरकार जा ‘रिया’ है। शिवसेना का रक्षात्मक रुख, उसके साथ सरकार में शामिल कांग्रेस व एनसीपी के सीधे हमले और संबित पात्रा के बयानों के अलावा महाराष्ट्र भाजपा के दो बड़े नेताओं प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल और हर मामले में बहुत आक्रामक तेवर दिखानेवाले विपक्ष के नेता देवेंद्र पडणवीस की रहस्यमयी चुप्पी किसी बड़ी राजनीतिक उथल पुथल के साफ सकेत दे रही है। शिवसेना शायद इसीलिए सुशांत सिंह की मौत का केस सीबीआई को सौंपे जाने से ज्यादा परेशान हैं।

शांति निकेतन में अशांति के बादल क्यों मंडराये?

-ललित गर्ग-

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्व भारती विश्वविद्यालय यानि शान्ति निकेतन इनदिनों अशांति एवं अराजकता का केन्द्र बना हुआ है। शिक्षा के इस विश्वविख्यात केन्द्र के परिपाश्र्व में जिस तरह की राजनैतिक एवं ़क्षेत्रगत घटनाएं हो रही है, वे दुखद है। इस राष्ट्रीय महत्व के शैक्षिक संस्थान में हिंसा, तोडफोड़ एवं अराजकता का होना एवं सरस्वती के इस पवित्र मन्दिर को राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति का अखाड़ा बनाना बेहद शर्मनाक है। शांति निकेतन केवल शिक्षा का मन्दिर ही नहीं है बल्कि यह बांग्ला संस्कृति के संवर्द्धन का प्रमुख केन्द्र भी है, यह विभिन्न संस्कृतियों विशेषतः पूर्व एवं पश्चिम की संस्कृति का संगम स्थल है। जहां वर्षों से खुल मैदान में प्रतिवर्ष दिसम्बर महीने में ‘पौष उत्सव’ का आयोजन होता रहा है, इस वर्ष शान्ति निकेतन के अधिकारियों ने फैसला किया कि यह आयोजन नहीं होगा एवं उसने मैदान में दीवार खड़ी करने का फैसला किया और उसका काम भी शुरू कर दिया गया। इन निर्णयों प्रभावित लोगों एवं समूहों में अशांति एवं रोष फैला एवं शांति निकेतन अशांति का केन्द्र बन गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं इस पर हस्तक्षेप किया है और वे सर्वमान्य एवं शांति निकेतन की गरिमा के अनुकूल वातावरण बनाने को तत्पर हुए है।
शान्ति निकेतन के अधिकारियों के फैसले को लेकर इस विश्वविद्यालय के करीब रहने वाले लोगों में रोष फैला। तृणमूल कांग्रेस के एक विधायक श्री नरेश बावरी के नेतृत्व में नयी बन रही दीवार और नये बने दरवाजे को तोड़ डाला गया। वास्तव में विश्वविद्यालय प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ संघर्ष करने के लिए स्थानीय लोगों ने ‘पौष मेला मठ बचाओ समिति’ का गठन भी किया था। इसी समिति ने दीवार स्थल पर जाकर आन्दोलन करना शुरू किया और अन्ततः श्री बावरी के नेतृत्व में उसे तोड़ डाला और बुलडोजर तक का इस्तेमाल किया। पौष मेला ग्राउंड के नाम से चर्चित विश्वविद्यालय के इस मैदान में बनी दीवार को लेकर हंगामा होना, बड़ी संख्या में जुटे लोगों द्वारा विश्वविद्यालय की संपत्तियों की नुकसान पहुंचाया जाना बेहद शर्मनाक एवं चिन्ताजनक है। इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण कारणें से शान्ति निकेतन को अनिश्चितकाल तक के लिए बन्द कर दिया जाना और भी आश्चर्यकारी है।
रविन्द्रनाथ टैगोर शान्ति निकेतन विद्यालय की स्थापना से ही संतुष्ट नहीं थे। उनका विचार था कि एक ऐसे शिक्षा केन्द्र की स्थापना की जाए, जहाँ पूर्व और पश्चिम को मिलाया जा सके। सन् 1916 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने विदेशों से भेजे गए एक पत्र में लिखा था-‘शान्ति निकेतन को समस्त जातिगत तथा भौगोलिक बन्धनों से अलग हटाना होगा, यही मेरे मन में है। समस्त मानव-जाति की विजय-ध्वजा यहीं गड़ेगी। पृथ्वी के स्वादेशिक अभिमान के बंधन को छिन्न-भिन्न करना ही मेरे जीवन का शेष कार्य रहेगा।’ अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए टैगोर ने 1921 में शान्ति निकेतन में ‘यत्र विश्वम भवत्येकनीडम’ (सारा विश्व एक घर है) के नए आदर्श वाक्य के साथ विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। तभी से यह संस्था एक अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में ख्याति प्राप्त कर रही है, भारत का गौरव बढ़ा रही है, शिक्षा एवं संस्कृति के माध्यम से इंसान से इंसान को जोड़ने का काम कर रही है, लेकिन ताजा हालातों ने इसकी गरिमा एवं गौरव को आघात पहुंचाया है।
गुरुदेव तो शान्ति निकेतन को खुला (ओपन एयर) विश्वविद्यालय देखना चाहते थे। दीवार बनाना ही उनके विश्वविद्यालय के चरित्र एवं साख के विरुद्ध है। हालांकि दीवार गिराये जाने वाले दिन पुलिस भी हरकत में नजर आयी और उसने आठ लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया है मगर इसके बाद विश्वविद्यालय को अगले आदेश तक बन्द कर दिया गया। पूरे पश्चिम बंगाल में शान्ति निकेतन ही एकमात्र केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। अतः विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में केन्द्र सरकार के सम्बन्धित विभागों को भी सूचित कर रहा है, परन्तु मूल प्रश्न तो रविन्द्रनाथ टैगोर से जुड़ा है, बांग्ला संस्कृति व परंपराओं का है। जरूरी यह है कि शान्ति निकेतन की परंपराओं का ध्यान रखते हुए इस समस्या का हल निकाला जाये और जल्दी से जल्दी विश्वविद्यालय खोला जाए।
अनेक वर्षों से विश्वविद्यालय के खुले परिसर के दायरे में ही पौष उत्सव मनता आ रहा है और इस पर कभी आपत्ति नहीं की गई, फिर ऐसा क्या हुआ कि इस वर्ष इस सांस्कृतिक उत्सव पर रोक लगाने की स्थितियां बनी? शान्ति निकेतन तो सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए ही गुरुदेव ने स्थापित किया था और इसी दृष्टि से इस महोत्सव में विश्वविद्यालय के छात्र व स्थानीय लोग मिल-जुल कर हिस्सा लेते हैं। परन्तु वर्ष 2017 में एनजीटी ने विश्वविद्यालय प्रशासन को चेतावनी दी थी कि वह पर्यावरण के सन्तुलन का ध्यान रखे। उसके बाद प्रशासन ने विगत जुलाई महीने में फैसला किया कि उस स्थान की सीमा बांध दी जाये जहां हर वर्ष पौष उत्सव होता है। विश्वविद्यालय की अधिशासी परिषद द्वारा यह फैसला किया गया। परिषद विश्वविद्यालय की सर्वोच्च प्रशासनिक इकाई होती है। लेकिन प्रश्न है कि इस तरह के निर्णय लेने से पहले काफी सोच-विचार की जरूरत को क्यों नहीं समझा गया? क्यों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने यह सब होने दिया? सम्पूर्ण घटनाक्रम दुखद होने के साथ-साथ अनेक ज्वलंत सवाल खड़े करता है। शांति निकेतन को राजनीति का मोहरा बनाकर उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को धुंधलाना एवं विद्यार्थियों की शिक्षा में व्यवधान उपस्थित करना, गंभीर स्थितियां है।
‘पौष उत्सव’ एवं शांति निकेतन के आपसी संबंधों की प्रगाढ़ता को समझने की जरूरत है। क्योंकि यह लोकसंस्कृति का ऐसा पर्व है, जिस संस्कृति को गुरुदेव बल देते थे, इस उत्सव में आसपास के गांवों व जिलों तक के लोग शामिल होते हैं और पौष मेले में इन इलाकों में रहने वाले दस्तकार, शिल्पकार व कारीगर अपनी कलात्मक कृतियों का प्रदर्शन एक अस्थायी बाजार लगा कर करते हैं। इस महोत्सव का बांग्ला संस्कृति में बहुत महत्व है। सर्दियों के मौसम में पड़ने वाले इस पर्व पर बंगाली लोग प्रकृति की रंग-बिरंगी छटा का उत्सव उसी प्रकार मनाते हैं जिस प्रकार ‘पोहला बैशाख’ पर्व पर, जो कि बांग्ला संस्कृति में ‘नव वर्ष’ होता है। पौहला बैशाख का महत्व इतना है कि बांग्लादेश में भी यह पर्व राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाया जाता है। बंगाल के तीज-त्यौहार धर्म की सीमा से ऊपर होकर मनाये जाते हैं। मजहब का इनसे कोई खास लेना-देना नहीं होता, फिर अब क्यों उन्हें मजहबी रंग दिया जा रहा है? प्रश्न यह भी है कि मैदान की चारदीवारी या उसे बन्द करने की योजना क्यों बनी? बांग्ला संस्कृति एवं शांति निकेतन के विरुद्ध हुए इन घटनाओं के लिये कौन जिम्मेदार है।
शिक्षा, संस्कृति और परम्पराओं की विविधता के बावजूद शांति निकेतन की उपयोगिता एवं महत्व को जो एक रखती आई है, राजनीति ने इसकी मूलभूत भावना को विद्रूप किया है। परन्तु समस्या का समाधान उसका विकल्प खोजने में नहीं अपितु पुनः अर्जित करने में है। आज समाज का सारा नक्शा बदल रहा है। परस्पर समभाव या सद्भाव केवल अब शिक्षा देने तक रह गया है। हो सकता है भीतर ही भीतर कुछ घटित हो रहा है। लेकिन हमें उसकी टोह लेनी होगी। संस्कृति के उपक्रम विश्वास में नहीं, विवेक में है। अन्यथा अन्धविश्वास का फायदा राजनीतिज्ञ व तथाकथित अवसरवादी उठाते रहेंगे।
आज हमें शांति निकेतन के आंगन में दीवार उठाने की नहीं, उसकी दीवारें मजबूत बनाने की जरूरत है। यह मजबूती एक पाॅजिटिव और ईमानदार सोच ही ला सकती है। ऐसी सोच, जो हमें जाति, भाषा, राजनीति और मजहब की दीवारों से आजाद कराए। समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व अगर संविधान में वर्णित शब्द ही बने रहेंगे, तो यह हमारी जड़ता और मूढ़ता का परिचायक होगा। ये शब्द हमारे जीवन का हिस्सा बनने चाहिए। जब तक जाति और मजहब वोट की राजनीति का जरिया बने रहेंगे, जब तक सारा समाज भारतीयता के सूत्र में नहीं बंधेगा, शांति निकेतन की शांति आहत होती रहेगी। दीवारें आंगन छोटा बनाती हैं, जबकि जरूरत इसे बड़ा करने की है। इसे बड़ा करके ही राष्ट्रीयता को मजबूत कर सकेंगे, शांति निकेतन के गौरवपूर्ण शिखर को अक्षुण्ण रख सकेंगे।

नई शिक्षा नीति में छोटे बाबा की सुगंध

● श्याम सुंदर भाटिया
बहुप्रतीक्षित नई शिक्षा नीति-2020 में आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज की सलाह को सर्वोच्च प्राथमिकता के तौर पर शामिल किया गया है। जैन धर्म के इन सबसे बड़े गुरु को उनके अनुयायी छोटे बाबा के नाम से भी जानते हैं। मौजूदा समय में आचार्य शिरोमणि श्री 108 विद्यासागर जी महाराज को लाखों दिगंबर जैन अनुयायी आधुनिक भगवान महावीर मानते हैं। नई शिक्षा नीति-एनईपी में मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा की खुशबू, व्यावसायिक शिक्षा, अंग्रेजी भाषा को वैकल्पिक भाषा, शिक्षा रोजगारपरक होने की तमाम खूबियों में छोटे बाबा की दूरदृष्टि सामाहित है। इसके पीछे बड़ा दिलचस्प और प्रेरणादायी किस्सा है। पदम विभूषण, इसरो के पूर्व अध्यक्ष एवं एनईपी कमेटी के चेयरमैन डॉ. कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन नई शिक्षा नीति के मसौदे के सिलसिले में राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद से मिले तो उन्होंने चेयरमैन डॉ. कस्तूरीरंगन को सलाह दी कि उन्हें एक बार आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज से जरुर मिलना चाहिए और उनकी बेशकीमती राय जाननी चाहिए। राष्ट्रपति की नेक सलाह पर चेयरमैन डॉ. कस्तूरीरंगन अपनी कमेटी के और सदस्यों-प्रो.टीवी कट्टीमनी, डॉ. विनयचन्द्र बीके, डॉ. पीके जैन इत्यादि के संग 21 दिसम्बर, 2017 को दर्शनार्थ और चर्चार्थ छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में विराजित आचार्यश्री से मिले। करीब 53 मिनट के इस बहुमूल्य संवाद और आशीर्वचन की झलक नई शिक्षा नीति में साफ-साफ दिखाई देती है। गुरु संकेतों को बिल्कुल स्पष्ट समझा और पढ़ा जा सकता है। नई शिक्षा नीति के ड्राफ्ट दस्तावेज के पेज नं0-455 पर इसका स्पष्ट उल्लेख है। आचार्यश्री से पहले भारत रत्न एवं मशहूर रसायन विज्ञानी सीएनआर राव का भी नाम दर्ज है।

सारगर्भित इस संवाद में मातृभाषा को लेकर बड़ी सूक्ष्म बातें कही गई थीं। नौ सदस्यीय टीम ने गुरु संकेतों का पालन करके शिक्षा नीति में बड़े बदलाव किए हैं। एनईपी के चेयरमैन ने आचार्यश्री से पूछा-गुरुवर, नई शिक्षा नीति कैसी होनी चाहिए? आचार्य श्रेष्ठ बोले, ऐसी नीति बनाइए-जिसका उपयोग और विनिमय की वस्तु न हो। करीब-करीब एक घंटे के बहुआयामी और सार्थक संवाद में आचार्यश्री बोले, वर्तमान शिक्षा नीति अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। शिक्षा धन से जुड़ गई है।आज की शिक्षा के साथ-साथ अनुभव नहीं है। डिग्री तो मिल जाती है,लेकिन सारी पढ़ाई-लिखाई करने के बाद भी नौकरी नहीं मिलती है। यह सब हमारे देश में पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव है। आज इतिहास को स्कूलों में लीपा-पोती करके पढ़ाया जाता है, हमारा पुराना इतिहास उठा कर देखो। आचार्यश्री ने कहा, मैं भाषा के रूप में अंग्रेजी का विरोध नहीं करता हूँ लेकिन अंग्रेजी भाषा को विश्व की अन्य भाषाओं के साथ ऐच्छिक रखना चाहिए। शिक्षा का माध्यम मातृभाषाएं ही हों। अंग्रेजों ने भारत की परंपरा के साथ चालाकी करके ‘भारत’ को ‘इंडिया’ बना दिया है। भारत के साथ हमारी संस्कृति और इतिहास जुड़ा है, लेकिन इंडिया ने भारत की भारतीयता, जीवन पद्धति, नैतिकता, रहन-सहन और खान-पीन सब कुछ छीन लिया है। अब शिक्षा भारतीय गणित, इतिहास, ज्ञान और परिवेश आधारित होनी चाहिए। प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषाओं में ही हो। इस संपूर्ण भारतीय भाषा ही हो। ऐसा होने से भारत की एकता मजबूत होगी। साथ ही आचार्य शिरोमणि ने सलाह दी, शिक्षा में शोधार्थी की रूचि, किसमें है, इसकी स्वतंत्रता होनी चाहिए। आज मार्गदर्शक के अनुसार शोधार्थी शोधकर्ता हैं। इससे मौलिकता नहीं उभर पा रही है। शिक्षा रोजगार पैदा करने वाली हो, बेरोजगारी बढ़ाने वाली नहीं हो, शिक्षा कोरी किताब नहीं हो। कौशल से जुड़ी हो। घोषित इस नई शिक्षा नीति में मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा, व्यावसायिक शिक्षा, अंग्रेजी वैकल्पिक भाषा, शिक्षा रोजपरक होने का समावेश साफ-साफ परिलक्षित हो रहा है।

छोटे बाबा का मातृभाषा प्रेम, देशभक्ति, हिंदी के प्रति आगाथ आस्था जग जाहिर है। वह हमेशा गर्व से कहते हैं- हिंदी में लिखो, हिंदी बोलो, इंडिया नहीं, भारत बोलो , शिक्षा के साथ संस्कार पाओ, हथकरघा के वस्त्र अपनाओ, स्वदेशी पहनो, स्वावलंबन लाओ, भारतीय संस्कृति बचाओ। वह युवाओं को अपने आशीर्वचन में अक्सर कहते हैं, उन्हें अंग्रेजी मिटानी नहीं है बल्कि अंग्रेजी को हटाना है, क्योंकि इसके पीछे बहुत से कारण हैं। विश्व के कई देशों में अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाती है। वे देश विकास की बुलंदियों पर हैं। फिर हमारा देश हिंदी को अपनाने में पीछे क्यों है। सर्वोच्च और उच्च न्यायलयों में करोड़ों वाद लंबित है। इसके मूल में भी कहीं न कहीं भाषा ही है। अपनी भाषा राष्ट्र भाषा से ही देश का विकास, जन-जन से जुड़ाव और ज्ञान का प्रकाश फैलाना संभव है। व्यापर की भाषा, बोलचाल की भाषा, प्रशासनिक भाषा, राष्ट्र भाषा या प्रादेशिक भाषा होनी चाहिए। छोटे बाबा मानते हैं, कुछ लोगों को लगता है अंग्रेजी का विरोध होने से हम बाकि देशों की भाषा से कट जाएंगे। अंग्रेजी के बिना तो कुछ भी नहीं है, यह केवल भ्रम है। आचार्यश्री युवाओं को नामचीन जर्नलिस्ट डॉ. वेद प्रताप वैदिक की पुस्तक- अंग्रेजी हटाओ क्यों और कैसे? को पढ़ने की सलाह देते हैं, चूँकि उन्होंने भी इस पुस्तक का अध्ययन किया है। यह ही नहीं, डॉ. वैदिक रामटेक हो या नागपुर, वह समय-समय पर जैन संत आचार्यश्री विद्यासागर के दर्शनार्थ आते रहे हैं। उन्होंने छोटे बाबा से स्वभाषा- स्थानीय भाषा और हिंदी भाषा के भविष्य पर चर्चा की। आचार्यश्री लम्बे समय से शिक्षा पद्धति पर बहुत ध्यान देते रहे हैं। नतीजन नई शिक्षा नीति समिति के सदस्यों को दिए गए गुरु संकेत सबके सामने हैं।

20वीं-21वीं शताब्दी के साहित्य जगत में एक नए उदीयमान नक्षत्र के रुप में जाने-पहचाने जाने वाले शब्दों के शिल्पकार, अपराजेय साधक, तपस्या की कसौटी, आदर्श योगी, ध्यान ध्याता-ध्येय के पर्याय, कुशल काव्य शिल्पी, प्रवचन प्रभाकर, अनुपम मेधावी, नवनवोन्मेषी प्रतिभा के धनी, सिद्धांतागम के पारगामी, वाग्मी, ज्ञानसागर के विद्याहंस, प्रभु महावीर के प्रतिबिंब, महाकवि, दिगम्बराचार्य श्री विद्यासागरजी की आध्यात्मिक छवि के कालजयी दर्शन आनंद से भर देते है। सम्प्रदाय मुक्त भक्त हो या दर्शक, पाठक हो या विचारक, अबाल-वृद्ध, नर-नारी उनके बहुमुखी चुम्बकीय व्यक्तित्व-कृतित्व को आदर्श मानकर उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारकर अपने आपको धन्य मानते हैं। आपने राष्ट्रभाषा हिन्दी में प्रेरणादायक युगप्रवर्तक महाकाव्य ‘मूकमाटी’ का सर्जन कर साहित्य जगत में चमत्कार कर दिया है। इसे साहित्यकार ‘फ्यूचर पोयट्री’ एवं श्रेष्ठ दिग्दर्शक के रूप में मानते हैं। विद्वानों का मानना है कि भवानी प्रसाद मिश्र को सपाट बयानी, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय का शब्द विन्यास, महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की छान्दसिक छटा, छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पन्त का प्रकृति व्यवहार, ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता महादेवी वर्मा की मसृष्ण गीतात्मकता, बाबा नागार्जुन का लोक स्पन्दन, केदारनाथ अग्रवाल की बतकही वृत्ति, मुक्तिबोध की फैंटेसी संरचना और धूमिल की तुक संगति आधुनिक काव्य में एक साथ देखनी हो तो वह’मूकमाटी’ में देखी जा सकती है।

22 साल की उम्र में संन्यास लेकर दुनिया को सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले आचार्यश्री विद्यासागर महाराज की एक झलक पाने लाखों लोग मीलों पैदल दौड़ पड़ते हैं। उनके प्रवचनों में धार्मिक व्याख्यान कम और ऐसे सूत्र ज्यादा होते हैं, जो किसी भी व्यक्ति के जीवन को सफल बना सकते हैं। वे अकेले ऐसे संत है, जिनके जीवत रहते हुए उन पर अब तक 55 से अधिक पीएचडी हो चुकी हैं। हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, बांग्ला, कन्नड़, मराठी आदि भाषाओं के जानकार विद्यासागरजी का बचपन भी आम बच्चों की तरह बीता। गिल्ली-डंडा, शतरंज आदि खेलना, चित्रकारी स्वीमिंग आदि का इन्हें भी बहुत शौक रहा, लेकिन जैसे-जैसे बड़े हुए आचार्यश्री का आध्यात्म की ओर रुझान बढ़ता गया। आचार्यश्री का बाल्यकाल का नाम विद्याधर था। कर्नाटक, बेलगांव के ग्राम सदलगा में 10 अक्टूबर 1946 को शरद पूर्णिमा को जन्मे आचार्यश्री ने कन्नड़ के माध्यम से हाई स्कूल तक शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद वे वैराग्य की दिशा में आगे बढ़े और 30 जून 1968 को मुनि दीक्षा ली। आचार्य का पद उन्हें 22 नवंबर 1972 को मिला। जैन संत आचार्य विद्यासागर पर फीचर फिल्म अन्तर्यात्री महापुरुष बनाई जा रही है। यह फिल्म मार्च 2021 में भारत सहित दुनिया के 65 देशों में एक साथ रिलीज होगी। छोटे बाबा की ज्ञान गंगा के सम्मुख करोड़ों-करोड़ लोग नतमस्तक हैं। इनमें तमाम हस्तियां भी शामिल हैं। 1999 पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, 2016 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, 2018 में अमेरिकी राजदूत श्री केनेथ जस्टर, फ्रांसीसी राजनयिक श्री अलेक्जेंड्रे जिग्लर, तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति श्री सुरेश जैन करीब एक दशक पूर्व रामटेक में उनका आशीर्वाद प्राप्त कर चुके हैं। आचार्यश्री ने 28 जुलाई,2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के विशेष आमंत्रण पर मध्यप्रदेश विधान सभा में अपना प्रवचन दिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ ने आचार्यश्री को राज्य अतिथि देने की घोषणा की हुई है। यूपी सरकार प्रोटोकॉल भी जारी कर चुकी है।

जल संकट : कहीं अतित का स्वप्न बन कर ना रह जाए शुद्ध पेयजल —

कोरोना काल मे जलसंकट बना गंभीर चुनौती-

उपलब्ध जल का केवल 3 फीसदी जल ही है पीने योग्य

भगवत कौशिक –

कोरोना से छिडी जंग मे विश्व और हमारे देश भारत के सामने एक बड़ा संकट आ चुका है जिसे देखकर हर कोई या तो अंजान बन रहा है या फिर उन्हें इस संकट की विकरालता का आभास नहीं है। तमाम तरह की चेतावनी और जागरुकता अभियान के बावजूद कोई यह समझने को तैयार नहीं है कि विश्व में जल संकट एक बड़ा विकराल रूप लेता जा रहा है।महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य जो इस समय कोरोना से बुरी तरह जूझ रहे है वहां हर साल गर्मी में एक बड़ी आबादी पानी के संकट से जूझती हुई दिखाई देती है। क्योंकि कोरोना से बचने के लिए लोग घरों में बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग स्वस्छता के लिए कर रहे है।

वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट (डब्ल्यूआरआई) द्वारा जारी नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। पानी का गंभीर संकट झेलने वाले 17 प्रमुख देश अपने क्रम के अनुसार क्रमशः कतर, इज़राइल, लेबनान, ईरान, जॉर्डन, लीबिया, कुवैत, सऊदी अरब, इरिट्रिया, यूएई, सैन मैरिनो, बहरीन, भारत, पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ओमान और बोत्सवाना है। डब्ल्यूआरआई की मानें तो पानी की अत्यधिक कमी का सामना कर रहे यह 17 देश जल्द ही ‘डे जीरो’ जैसी स्थिति का सामना कर सकते हैं ।अगर भविष्य मे ऐसे हालात रहेंगे तो एक कहावत होगी “एक प्यासा कौआ था और वह प्यासा ही मर गया”।वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीटयूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल दो लाख लोग जल अनुपलब्धता और स्वछता संबंधी उचित व्यवहार न होने की वजह से मर जाते है।

नीति आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट में भी यह बात स्वीकार की गयी है कि भारत के कई शहरों में जल संकट गहराता जा रहा है, और आने वाले वक्त में उसके और विकराल रूप लेने के आसार हैं। रिपोर्ट के अनुसार जहां 2030 तक देश की लगभग 40 फीसदी आबादी के लिए जल उपलब्ध नहीं होगा।मौजूदा समय मे भी देश की दस करोड़ से ज्यादा आबादी गंभीर जल संकट का सामना कर रही है।जिसका सबसे बडा कारण है बेशकीमती भूजल का बेतरतीब ढंग से दोहन।

■ पानी बेचना बना व्यवसाय-

जलसंकट को देखते हुए लोगों ने अब पानी को भी व्यवसाय का साधन बना लिया है।शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों मे लोगों ने अवैध आरओ प्लांट लगाकर पानी को बेचना शुरू कर दिया।आज चाहे गांव हो या शहर पीने के पानी का डिब्बा 10 रूपये से लेकर 20 रूपये मे धडल्ले से भेजा जा रहा है।

■गिरता भूजल स्तर, खेतीबाड़ी से हो रहा है पलायन –

पानी के अंधाधुंध दोहन से हालत इस कदर बेकाबू होते जा रहे है कि किसानों के देश भारत मे अब किसान खेती से पलायन करने पर विवश है।बात चाहे पंजाब की हो ,या उत्तर प्रदेश की या हरियाणा की तीनो ही राज्य मे किसानों ने धान,गेहूं व गन्ने जैसी फसलें जिनमें पानी की खपत होती है उसी का रोपण किया।नतीजतन तीनों ही राज्यों मे भूमिगत जल स्तर बहुत ज्यादा नीचे चला गया।
भूजल स्तर की ओर विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट मे तो चेतावनी दी गई है कि यदि अंधाधुंध जलदोहन व जलवायु परिवर्तन का ऐसा ही हाल रहा तो आने वाले एक दशक मे 60 फीसदी कस्बे सुखे की चपेट मे होंगे।

■ ये पानी दोबारा नहीं मिलना–

जी हा यदि भूमिगत जल स्तर का ऐसे ही दोहन होता रहा तो निकट भविष्य मे पानी अतीत का स्वप्न बन कर रह जाएगा।देश मे जंहा पहले 2.26 करोड़ हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र का क्षेत्रफल था,वह अब 6.8 करोड़ हेक्टेयर हो चूका है।यही कारण है कि तालाब व कुएं सूख रहे है।

■ जहरीली धरती और जहरीला पानी –
उत्तर भारत की बात करें तो भूजल के गिरते स्तर ने चिंता बढ़ा दी है। यहां का जल संकट गंभीर संकेत दे रहा है। मैदानी इलाकों के साथ ही पंजाब-हरियाणा में चिनाब, झेलम नदियों के किनारें हों या उत्तराखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश में गंगा-यमुना नदियों के आसपास का क्षेत्र सभी जगह भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है। पंजाब में खेतों में कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों के जहरीले तत्वों के कारण धरती बंजर हो गई और कई स्थानों पर भूजल रसातल पर जा पहुंचा है। पानी और धरती के जहरीले हो जाने के कारण वहां उगा अनाज कई बीमारियों जैसे कैंसर और त्वचा संबंधी रोगों का कारण बन रहा है।

■ जंल संकट का सामना करने वाले राज्य — छत्तीसगढ़, राजस्थान, गोवा, केरल, उड़ीसा, बिहार, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, झारखंड, सिक्किम, असम, नागालैंड,उत्तराखंड, मेघालय

■ केवल 3 फीसदी मीठा जल है पीने के लिए —
“जल ही जीवन है” हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। यह भी पता है कि धरती की सतह 70 फीसदी पानी से पटी हुई है। लेकिन दुनिया में पीने के लिए मीठा पानी सिर्फ 3 फीसदी है। और ये इतना सुलभ नहीं है… इसमें से भी विश्व की नदियों में प्रतिवर्ष बहने वाले 41,000 घन किमी (cubic kilometer) जल में से 14,000 घन किमी का ही उपयोग किया जा सकता है। इस 14,000 घन किमी जल में भी 5,000 घन किमी जल ऐसे स्थानों से गुजरता है, जहां आबादी नहीं है और यदि है भी तो उपयोग करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस प्रकार केवल 9,000 घन किमी जल का ही उपयोग पूरे विश्व की आबादी करती है।

■ डे जीरो के कगार पर शहर-

हमारे देश के प्रमुख शहर मेरठ, दिल्ली, फरीदाबाद, गुरुग्राम, कानपुर, जयपुर, अमरावती, शिमला, धनबाद, जमशेदपुर, आसनसोल, विशाखापत्तनम, विजयवाड़ा, चेन्नई, मदुरै, कोच्चि, बंगलुरु, कोयंबटूर, हैदराबाद, सोलापुर और मुंबई शहर में डे जीरो यानी भू-जल खत्म होने के कगार पर है।

दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान राज्यों में भूजल दोहन का स्तर बहुत अधिक है, जहां भूजल दोहन 100% से अधिक है। इसका अर्थ यह है कि इन राज्यों में वार्षिक भूजल उपभोग वार्षिक भूजल पुनर्भरण से अधिक है। हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश तथा केंद्र शासित प्रदेश पुद्दूचेरी में भूजल विकास का दोहन 70% और उससे अधिक है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भूजल का उपयोग उन क्षेत्रों में बढ़ा है, जहां पानी आसानी से उपलब्ध था।

■ देश में 80 फीसदी पानी का नहीं हो पाता शुद्धिकरण-

देश में वाटर ट्रीटमेंट की भी हालत बहुत खराब है। घरों से निकलने वाले 80 फीसदी से अधिक पानी का ट्रीटमेंट नहीं हो पाता है और ये दूषित पानी के तौर पर नदियों में जाकर उसे भी दूषित करते हैं। इसी के साथ देश में सिर्फ 8 फीसदी बारिश के जल का भंडारण किया जाता है जो कि विश्व में सबसे कम है।

■ आनेवाले समय मे सिर्फ अमीर ही कर पाएंगे जरूरतों को पूरा कर —

यूएन ह्यूमन राइट्स की एक रिपोर्ट का कहना है कि विश्व उस दिशा में तेजी से बढ़ रहा है जहां सिर्फ अमीर लोग ही मूलभूत जरूरतों की भी पूर्ति कर सकेंगे। यूएन रिपोर्ट के मुताबिक साल 2030 तक पानी की जरूरतें दोगुनी बढ़ जाएंगी। इससे करोड़ों लोग जलसंकट की चपेट में आ सकते हैं। इसी संस्था की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक भारत जनसंख्या में चीन को अगले एक दशक में पीछे छोड़ देगा जबकि साल 2050 तक 41.6 करोड़ लोग शहरों में बस जाएंगे।

दुनिया में 100 करोड़ अधिक लोगों को पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं है।तेजी से गहराते जल संकट के बीच सरकारी तंत्र की रुचि कागजी परियोजनाओं तक सिमट कर रह गई है। कानून बनाने या सर्वेक्षण कराने अथवा आकलन की कवायद ही ज्यादा होती रही है। जल संकट से निजात पाने के लिए समाज और सरकार की गंभीर हिस्सेदारी तो आज की सबसे बड़ी जरूरत है ही, व्यक्तिगत स्तर पर भी लोग या छोटे समूह पहल कर सकते हैं।अगर अब भी नहीं संभला गया तो वो दिन दूर नहीं जब तीसरा विश्व युद्ध का कारण पानी होगा और पानी केवल अतीत का स्वप्न बनकर रह जाएगा।