समाज का नासूर: दलित उत्पीड़न

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-निर्मल रानी- हमारे देश की सामाजिक न्याय व्यवस्था भी क्या अजीबो-गरीब है कि यहां गंदगी फैलाने वालों को तो उच्च जाति का समझा जाता है जबकि उनके द्वारा फैलाई जाने वाली गंदगी को साफ करने वाले को नीच अथवा दलित जाति का समझा जाता है। धर्मशास्त्रों में सदियों से दुष्प्रचारित की गई इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था… Read more »

कौन तोड़ना चाहता है जातिवाद?

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के द्वारा लोहिया जी की प्रतिमा का माल्यार्पण करने के बाद ‘लोहिया विचार मंच’ के एक युवक के द्वारा उस प्रतिमा को गंगाजल से धोने की निहायत शर्मनाक घटना सामने आई है. जातिवाद और छूत-अछूत की यही सोच हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है. जातिवाद की सोच… Read more »

दलित हित के बगैर सामाजिक समरसता असंभव

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-गोपाल प्रसाद- दलितों पर अत्याचार कोई नई बात नहीं है. आए दिन ऐसी घटनाएं पढ़ने/ सुनने को मिलती रहती है की दलित दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया गया, इसके अतिरिक्त नाबालिग दलित बालिकाओं के साथ छेड़छाड़ या बलात्कार की घटनाएं भी होती रहती है. इस तरह की घटनाओं पर तब तक अंकुश नहीं… Read more »

दलित कब जी सकेंगे स्वछन्द जीवन ?

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-जगमोहन ठाकन- भले ही देश को आज़ाद हुए छह दशक से अधिक समय हो चुका हो, सरकार कितना ही दावा करे कि स्वंतत्र भारत में हर व्यक्ति को कानून के दायरे में अपने ढंग से जीने की स्वंतत्रता है, परन्तु वास्तविक धरातल पर आज भी दलित समुदाय पर वही पुराना दबंग वर्ग का कानून चलता… Read more »

दलितों के दुश्मन दोस्त / शंकर शरण

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ऐतिहासिक रूप से ‘दलित’ एक नया अकादमिक-राजनीतिक मुहावरा है जो हिन्दुओं में अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लिए प्रयोग किया जाता है। ‘अनुसूचित’ शब्द भी अंग्रेजों की देन है। उस से पहले हिन्दुओं में जातियों की सामाजिक स्थिति की कोई स्थाई श्रेणीबद्धता नहीं थी। ‘दलित’ संज्ञा का प्रयोग सर्वप्रथम स्वामी श्रद्धानन्द ने तब अछूत कहलाने वाले… Read more »

दलितों-आदिवासियों की हत्या कैसा वर्ग-संघर्ष है ?

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जयराम विप्लव   लाल आतंकवाद ( माओवाद ) समर्थक बताएंगे कि दलितों/ वंचितों /आदिवासियों की हत्या कैसा “वर्ग-संघर्ष” है ? एक दशक पहले हुए दंगों पर हर रोज गला साफ़ करने वाले दिल्ली में जमे कुबुद्धिजीवी लोग माओवादियों द्वारा किये जा रहे सामूहिक नरसंहारों के ऊपर चुप्पी क्यों साधे रहते हैं ? इस तरह की घटनाओं… Read more »

उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न एक बड़ा सवाल

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अखिलेश आर्येन्दु उत्तर प्रदेश में मायावती को सत्तासीन करने वाला दलित वर्ग आज भी उसी तरह उत्पीड़ित और शोषित है जैसे चार साल पहले था। इसके बावजूद वह मायावती को अपना नेता मानता है और बसपा के नाम पर मर मिटने के लिए हमेशा तैयार रहता है। दलित वर्ग में पैदा होने के कारण मायावती… Read more »

भीमराव आंबेडकर के 54वें परिनिर्वाण दिवस पर विशेष- अस्मिता की राजनीति का मसीहा

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी आखिरकार आधुनिक युग में अछूत कैसे जीएंगे ? गैर अछूत कैसे जीएंगे इसके बारे में कोई विवाद ही नहीं था क्योंकि हम सब जानते थे कि वे कैसे हैं और उन्हें क्या चाहिए ?किंतु अछूत को हम नहीं जानते थे। हम कबीर को जानते थे,रैदास को जानते थे। ये हमारे लिए कवि थे।… Read more »

शूद्र सांस्कृतिक बंधुत्व से भागे हुए हिन्दू

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी हम सबके अंदर जातिप्रेम और दलितघृणा कूट-कूट भरी हुई। किसी भी अवसर पर हमारी बुद्धि नंगे रूप में दलित विरोध की आग उगलने लगती है। दलितों से मेरा तात्पर्य शूद्रों से है। अछूतों से हैं। सवाल उठता है अछूतों से आजादी के 60 साल बाद भी हमारा समाज प्रेम क्यों नहीं कर पाया?… Read more »

दलीय राजनीति और महिलाएं

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-राखी रघुवंशी दलित महिलाओं की स्थिति पर अक्सर मीडिया का ध्यान तब जाता है जब वे बलात्कार की शिकार होती हैं या उन्हें नग्न, अर्धनग्न करके सड़कों पर घुमाया जाता है। ऐसी शर्मनाक घटनाओं की रिर्पोटिंग के बाद उनका फॉलोअप बहुत ही कम किया जाता है। दरअसल आजादी के छह दशक बाद भी दलित महिलाओं… Read more »