राम

‘अधर्म वा पाप करने से सुख का मूल हमेशा के लिए कट जाता हैः आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय’

मनमोहन कुमार आर्य, श्रीमद्दयानन्द आर्ष ज्यातिर्मठ गुरुकुल, पौंधा-देहरादून के वार्षिकोत्सव में आयोजित ‘सद्धर्म सम्मेलन’ में

अयोध्या राम की जन्मस्थली मात्र नहीं आदर्शों की विरासत है !

विरासतें इतिहास के संरक्षण के लिए होती हैं, कल जब आपकी अगली पीढ़ी पूछेगी ये राम कौन थे? कहाँ रहते थे? तब आपके पास किताबों के उत्तर सम्भवतः हों लेकिन दर्शन हेतु कुछ नहीं होगा, हालांकि ये किताबी ज्ञान भी धीरे धीरे विलुप्त हो जायेगा, फिर कैसा ज्ञान और कैसे राम! हम कितने ही विलुप्त इतिहास के गवाह हैं जो अब किसी पन्ने तक में दर्ज नहीं । आज जो आख्यान हम किताबों में पढ़ते हैं और जब उन्हें देखने की जिज्ञाशा होती है किसी म्यूजियम में उनके होने का एहसास करने का प्रयास करते हैं लेकिन राम को हम कहाँ पायेंगे? किस अयोध्या को रामराज का साक्षी बतायेंगे ?

राम और रामराज्य

गांधीजी कहते थे- ‘‘अपराधी से नहीं अपराध से घृणा होनी चाहिये।’’ कितना भी बड़ा अपराध क्यों न हो, उसे एहसास करनें वाला, लज्जित होने वाला अपराध का परिमार्जन कर देता है। निश्चित रूप से अपराधबोध से ग्रस्तव्यक्ति का व्यक्तित्व भी विभाजित होगा और ऐसे व्यक्ति एक आदर्श समाज बनाने मे सहायक नहीं हो सकते। श्री राम को यह बात अच्छी तरह पता है। यद्यपि सत्ता के लिये निकटतम सम्बंधियों की हत्याओं से इतिहास भरा पड़ा है। मुस्लिमों की परम्पराओं पर इस सम्बंध में अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है। वहीं सिंहासन की जगह वनवास दिलाने वाली कैकेयी को श्री राम लज्जित समझकर सबसे पहले उसी से मिलकर उसे अपराध बोध से मुक्त कराते हैं। इस तरह से श्रीराम जैसे उदात्त दृष्टि वाले शासक अथवा अग्रणी व्यक्ति होंगे, तभी इस धरती पर रामराज्य संभव है।

राम के नाम चुनावी नैया

रामाश्रय लेना राजनीतिक दलों के लिए शायद इसलिए जरूरी लग रहा है, क्योंकि उनके पास राज्य के विकास का कोई ठोस अजेंडा नहीं है। साथ ही इतना आत्मविश्वास भी नहीं है कि सिर्फ विकास और सुद्ढ़ कानून व्यवस्था पर वोट मांग सकें, क्योंकि अराजकता पर नियंत्रण कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए जाति और धर्म से जुड़े प्रतीकों को विकल्पों के रूप में आजमाने की कोशिशें तेज हो रही हैं